गुरुवार, 19 जुलाई 2018

भगत सिंह का भय सच निकला

ऐसा कुछ नहीं घटा मेरे सामने 
कि कोई महिला प्रधानमंत्री की कॉलर पकड़कर पूछे- 
आज़ादी से क्या मिला?
और प्रधानमंत्री मुस्कराकर कहे-
प्रधानमंत्री की कॉलर पकड़ने की आज़ादी 


ऐसा भी नहीं हुआ कि भगत सिंह से प्रेरित बच्चों ने 
'दुर्गा' बन चुकीं प्रधानमंत्री को 
न घुसने दिया हो अपने प्रांगण में 
और उन्हें देशद्रोही भी नहीं कहा गया हो

हमारे समय में प्रधानमंत्री शोहदों का 'फॉलोवर' है 
हत्यारों को नेताओं का संरक्षण है 
एक विचारधारा है मजहबी उन्माद
इंसानों से घृणा को कहते हैं राष्ट्रवाद
विकास एक ब्लैक होल है जिसमें 
सवा अरब इंसानों को कुदाया जा रहा है 
नये भारत के सपने की खोह जाती है 
एक मंदिर के प्रांगण में 
जिसे उन्माद का सबसे पैना हथियार बना लिया गया है 
क़ानून ऐसी हंसिया है जिससे 
ताक़तवर चाहे दातून छीले 
चाहे तो काट ले किसान की गर्दन

क्या कल यही दर्ज होगा हमारे समय के बारे में?

तवारीख़ में कैसे दिखेंगे हम 
बर्बादी की पहली सीढ़ी के बारे में 
क्या दर्ज होगा किताबों में 
कोई बच्चा मुझसे पूछेगा- 
हिंदुस्तान में लिंचिंग कब शुरू हुई?
गाय के लिए पहला आदमी कौन मारा गया सरकारी निगहबानी में? 
या फिर 
हिंदुस्तान में पहली बार मुर्दे पर मुकदमा कब दर्ज हुआ?

तब क्या कहेगी मेरी लरजती बूढ़ी ज़बान 
क्या मैं अपनी आत्मा में एक कुटिल मुस्कान दबाकर 
नेहरू का नाम बताऊंगा?

अगर वह पूछ ले- 
यह नेहरू सौ साल बाद भी 
हर काम का ज़िम्मेदार कैसे हुआ 
तो क्या तवारीख़ 1955 में पैदा करेगी कोई काल्पनिक अख़लाक़ 
जिसे पाकिस्तानियों ने पीटकर मारा! 
तो क्या जैसे प्रधानसेवक ने तक्षशिला को बिहार में ला पटका, 
वैसे दादरी लाहौर में बताया जाया जाएगा, 
या सबकुछ कहा जायेगा वैसे ही 
जैसे घट रहा है!

एक बर्बर देश अचानक पैदा नहीं होता 
वह धीरे धीरे बनता है लोगों के दिमाग में 
फिर ज़मीन का वह टुकड़ा 
होता जाता है ख़ौफ़नाक 
जहां वे दिमाग चलते फिरते हैं

पहली बार ही कोई मंत्री पहनाता है हत्यारों को फूलों की माला 
पहली ही बार कोई नेता कहता है 
किसी बर्बर को भगत सिंह 
अखबार कहते हैं यह तो फ्रिंज एलिमेंट हैं 
और फ्रिंज बनाते जाते हैं मज़बूत मुख्यधारा

कितना अच्छा होता 
कि मैं 1905 में पैदा होता 
जब भगत सिंह को रही होती फांसी 
उसी दिन मेरे गांव में 
गोरों के नमक में सीझा कोई भूरा सिपाही 
मुझे भी गोली मार देता 
इंसानों के लिए कुर्बानी के दौर में 
अच्छी होती है एक गुमनाम मौत 
कम से कम यह न देखते हम
कि भगत सिंह और बिस्मिल के देश में पीट पीट कर मार दिया जाता है अखलाक़ों को 
फिर इसके बाद सरकार किसी निर्दोष के हत्यारों को
भगत सिंह का वारिस कहती हैं!

मां को लिखे पत्र में 
भगत सिंह का भय सच निकला 
भूरा साहेब गोरे से ज़्यादा क्रूर निकला।


(15 जुलाई, 2018)

सोमवार, 9 जुलाई 2018

अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगने वाले सावरकर ‘वीर’ कैसे हो गए?

सावरकर ने अंग्रेज़ों को सौंपे अपने माफ़ीनामे में लिखा था, ‘अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं यक़ीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा.’


(फोटो: savarkarsmarak.com)
हिंदू धर्म और हिंदू आस्था से अलग, राजनीतिक ‘हिंदुत्व’ की स्थापना करने वाले विनायक दामोदर सावरकर की आज (28 मई) को जन्मतिथि है, जिन्हें वीर सावरकर के नाम से भी जाना जाता है. केंद्र और देश के कई महत्वपूर्ण राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा हिंदुत्व की इस विचारधारा की राजनीति करती है.

हाल ही में अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भाजपा ने राष्ट्रीयता को अपना सबसे प्रमुख एजेंडा बनाने की भी घोषणा की थी. भाजपा जिस हिंदुत्व के विचार के आधार पर भारत निर्माण का सपना देखती है, वह विचार सावरकर ने ही दिया था. आज भाजपा नेताओं के भाषणों से लेकर पार्टी के पोस्टरों तक में सावरकार को महत्वपूर्ण स्थान मिलता है.


एक ऐसे समय में जब उग्र हिंदू राष्ट्रवाद के एजेंडे पर चलने वाली पार्टी सत्ता में हो, हिंदुत्व और उसके प्रणेता वीडी सावरकर पर विचार करना ज़रूरी लगता है. सावरकर के विचार क्या थे? आज़ादी की लड़ाई में उनका योगदान क्या था? स्वतंत्रता आंदोलन में सावरकर की क्या भूमिका थी, जिसके चलते उन्हें वीर सावरकर की उपाधि से नवाज़ा गया, यह सवाल बेहद अहम हैं.


प्रधानमंत्री बनने से पहले मुख्यमंत्री रहने के दौरान नरेंद्र मोदी ने जुलाई, 2013 में रॉयटर्स न्यूज़ एजेंसी के दो पत्रकारों को दिए एक इंटरव्यू में ख़ुद को ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ बताया था.

भारत में राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन का परस्पर अटूट संबंध है. राष्ट्रीयता भारत के स्वाधीनता आंदोलन की वह भावना थी, जो पूरे आंदोलन के मूल में थी. इसी दौरान हिंदू राष्ट्रीयता अथवा हिंदू राष्ट्रवाद का विचार गढ़ा गया.

सावरकर उस हिंदुत्व के जन्मदाता हैं जो हिंदू और मुसलमानों में फूट डालने वाला साबित हुआ. मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र के सिद्धांत की तरह ही उनके हिंदुत्व ने भी अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की नीति में सहायता की.

राजनीति शास्त्री और प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम लिखते हैं, ‘‘हिंदू राष्ट्रवादी’ शब्द की उत्पत्ति ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक ऐतिहासिक संदर्भ में हुई. यह स्वतंत्रता संग्राम मुख्य रूप से एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ा गया था. ‘मुस्लिम राष्ट्रवादियों’ ने मुस्लिम लीग के बैनर तले और ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ ने ‘हिंदू महासभा’ और ‘आरएसएस’ के बैनर तले इस स्वतंत्रता संग्राम का यह कहकर विरोध किया कि हिंदू और मुस्लिम दो पृथक राष्ट्र हैं. स्वतंत्रता संग्राम को विफल करने के लिए इन हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवादियों ने अपने औपनिवेशिक आकाओं से हाथ मिला लिया ताकि वे अपनी पसंद के धार्मिक राज्य ‘हिंदुस्थान’ या ‘हिंदू राष्ट्र’ और पाकिस्तान या इस्लामी राष्ट्र हासिल कर सकें.’

नरेंद्र मोदी के इस साक्षात्कार के बाद प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम ने नरेंद्र मोदी के नाम एक खुला ख़त लिखा था, जिसमें वे लिखते हैं, ‘भारत को विभाजित करने में मुस्लिम लीग की भूमिका और इसकी राजनीति के विषय में लोग अच्छी तरह परिचित हैं लेकिन मुझे लगता है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ ने कैसा घटिया और कुटिल रोल अदा किया इसके विषय में आपकी याददाश्त को ताज़ा करना ज़रूरी है.’

उस पत्र के मुताबिक, ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ मुस्लिम लीग की तरह ही द्विराष्ट्र सिद्धांत में यक़ीन रखते हैं. हिंदुत्व के जन्मदाता, वीडी सावरकर और आरएसएस दोनों की द्विराष्ट्र सिद्धांत में साफ-साफ समझ में आने वाली आस्था रही है कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग राष्ट्र हैं. मुहम्मद अली जिन्नाह के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने 1940 में भारत के मुसलमानों के लिए पाकिस्तान की शक्ल में पृथक होमलैंड की मांग का प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन सावरकर ने तो उससे काफी पहले, 1937 में ही जब वे अहमदाबाद में हिंदू महासभा के 19वें अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण कर रहे थे, तभी उन्होंने घोषणा कर दी थी कि हिंदू और मुसलमान दो पृथक राष्ट्र हैं.

शम्सुल इस्लाम उक्त पत्र में सावरकर के समग्र वांड्मय से उनके विचार उद्घृत करते हैं, ‘फ़िलहाल भारत में दो प्रतिद्वंदी राष्ट्र अगल-बगल रह रहे हैं. कई अपरिपक्व राजनीतिज्ञ यह मान कर गंभीर ग़लती कर बैठते हैं कि हिन्दुस्तान पहले से ही एक सद्भावपूर्ण राष्ट्र के रूप ढल गया है या केवल हमारी इच्छा होने से इस रूप में ढल जाएगा. इस प्रकार के हमारे नेक नीयत वाले पर कच्ची सोच वाले दोस्त मात्र सपनों को सच्चाई में बदलना चाहते हैं. इसलिए वे सांप्रदायिक उलझनों से अधीर हो उठते हैं और इसके लिए सांप्रदायिक संगठनों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. लेकिन ठोस तथ्य यह है कि तथाकथित सांप्रदायिक प्रश्न और कुछ नहीं बल्कि सैकड़ों सालों से हिंदू और मुसलमान के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता के नतीजे में हम तक पहुंचे हैं. हमें अप्रिय इन तथ्यों का हिम्मत के साथ सामना करना चाहिए. आज यह क़तई नहीं माना जा सकता कि हिंदुस्तान एकता में पिरोया हुआ राष्ट्र है, इसके विपरीत हिंदुस्तान में मुख्यतः दो राष्ट्र हैं, हिंदू और मुसलमान.’

सावरकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वह आदि विचारक हैं जो हिंदू-मुसलमान को दो अलग-अलग राष्ट्र मानते हैं. तब से बाद के वर्षों में भी संघ अपनी हिंदू राष्ट्र की कल्पना और हिंदू राष्ट्रवाद के विचार पर टिका हुआ है. इसके उलट संघ भारत-पाकिस्तान बंटवारे के लिए कांग्रेस, महात्मा गांधी, नेहरू को कोसता भी है. मौजूदा दौर में हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए वे लोग सबसे बड़े ‘गद्दार’ हैं जो सांप्रदायिकता के विरोध में हैं, जो सेक्युलर विचार को मानने वाले हैं.

जैसा कि प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि वे ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ हैं, यदि ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ होना गर्व की बात है तो गर्व एक समस्या खड़ी करता है. इसी तरह मुस्लिम राष्ट्रवादी, सिख राष्ट्रवादी, इसाई राष्ट्रवादी होंगे. इतने सारे राष्ट्रवादी ज़ाहिर है कि भारतीय राष्ट्रवाद के मुक़ाबले कई टुकड़ियों में एक ख़तरे के रूप में खड़े होंगे. इस हिंदू राष्ट्रवाद में गर्व करने जैसा क्या है जो भारत जैसे विविधता वाले राष्ट्र को एक ही ढर्रे पर ले जाने की वकालत करता है.

हिंदू राष्ट्रवादियों ने आज़ादी की लड़ाई के वक़्त भारतीय सेनानियों का साथ देने की बजाय अंग्रेज़ों के साथ हो गए और अंग्रेज़ों की तरफ से उन पर कार्रवाई न करने का अभयदान मिला. नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी और जापान की मदद से भारत को आज़ाद कराने का प्रयास किया था. इस दौरान ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मदद करने की जगह ब्रिटिश शासकों का साथ दिया. सावरकर ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए भारत में सैनिकों की भर्ती में मदद की. आगे चलकर सावरकर ने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाया जो हिंदू-मुस्लिमों में भेद पैदा करने में सहायक हुआ.

वीर सावरकर समग्र वांड्मय के हवाले से शम्सुल इस्लाम लिखते हैं, ‘हिंदू राष्ट्रवादियों ने बजाय नेता जी की मदद करने के, नेताजी के मुक्ति संघर्ष को हराने में ब्रिटिश शासकों के हाथ मज़बूत किए. हिंदू महासभा ने ‘वीर’ सावरकर के नेतृत्व में ब्रिटिश फ़ौजों में भर्ती के लिए शिविर लगाए. हिंदुत्ववादियों ने अंग्रेज़ शासकों के समक्ष मुकम्मल समर्पण कर दिया था जो ‘वीर’ सावरकर के निम्न वक्तव्य से और भी साफ हो जाता है-

‘जहां तक भारत की सुरक्षा का सवाल है, हिंदू समाज को भारत सरकार के युद्ध संबंधी प्रयासों में सहानुभूतिपूर्ण सहयोग की भावना से बेहिचक जुड़ जाना चाहिए जब तक यह हिंदू हितों के फ़ायदे में हो. हिंदुओं को बड़ी संख्या में थल सेना, नौसेना और वायुसेना में शामिल होना चाहिए और सभी आयुध, गोला-बारूद, और जंग का सामान बनाने वाले कारख़ानों वगै़रह में प्रवेश करना चाहिए… ग़ौरतलब है कि युद्ध में जापान के कूदने कारण हम ब्रिटेन के शत्रुओं के हमलों के सीधे निशाने पर आ गए हैं. इसलिए हम चाहें या न चाहें, हमें युद्ध के क़हर से अपने परिवार और घर को बचाना है और यह भारत की सुरक्षा के सरकारी युद्ध प्रयासों को ताक़त पहुंचा कर ही किया जा सकता है. इसलिए हिंदू महासभाइयों को ख़ासकर बंगाल और असम के प्रांतों में, जितना असरदार तरीक़े से संभव हो, हिंदुओं को अविलंब सेनाओं में भर्ती होने के लिए प्रेरित करना चाहिए.’

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘कई लोग मानते हैं कि सावरकर एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे. लेकिन सच क्या है? सच ये है ब्रिटिश राज के दौरान कई राष्ट्रवादी गिरफ्तार किए गए. जेल में ब्रिटिश अधिकारी उन्हें प्रलोभन देते थे कि या वे उनके साथ मिल जाएं या पूरी ज़िंदगी जेल में बिताएं. तब कई लोग ब्रिटिश शासन का सहयोगी बन जाने के लिए तैयार हो जाते थे. इसमें सावरकर भी शामिल हैं.’

जस्टिस काटजू कहते हैं, ‘दरअसल, सावरकर केवल 1910 तक राष्ट्रवादी रहे. ये वो समय था जब वे गिरफ्तार किए गए थे और उन्हें उम्र कैद की सज़ा हुई. जेल में करीब दस साल गुजारने के बाद, ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके सामने सहयोगी बन जाने का प्रस्ताव रखा जिसे सावरकर ने स्वीकार कर लिया. जेल से बाहर आने के बाद सावरकर हिंदू सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने का काम करने लगे और एक ब्रिटिश एजेंट बन गए. वह ब्रिटिश नीति ‘बांटो और राज करो’ को आगे बढ़ाने का काम करते थे.’

जस्टिस काटजू लिखते हैं, ‘दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे. उन्होंने तब इस नारे को बढ़ावा दिया, ‘राजनीति को हिंदू रूप दो और हिंदुओं का सैन्यीकरण करो’. सावरकर ने भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा युद्ध के लिए हिंदुओं को सैन्य प्रशिक्षण देने की मांग का भी समर्थन किया. इसके बाद जब कांग्रेस ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की तो सावरकर ने उसकी आलोचना की. उन्होंने हिंदुओं से ब्रिटिश सरकार की अवज्ञा न करने को कहा. साथ ही उन्होंने हिंदुओं से कहा कि वे सेना में भर्ती हों और युद्ध की कला सीखें. क्या सावरकर सम्मान के लायक हैं और उन्हें स्वतंत्रता सेनानी कहा जाना चाहिए? सावरकर के बारे में ‘वीर’ जैसी बात क्यों? वह तो 1910 के बाद ब्रिटिश एजेंट हो गए थे.’


शम्सुल इस्लाम वीर सावरकर के हिंदुत्व की चर्चा करते हुए लिखते हैं, ‘वास्तव में आरएसएस ‘वीर’ सावरकर द्वारा निर्धारित विचारधारा का पालन करता है. यह कोई राज़ नहीं है कि ‘वीर’ सावरकर अपने पूरे जीवन में जातिवाद और मनुस्मृति की पूजा के एक बड़े प्रस्तावक बने रहे. ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की इस प्रेरणा के अनुसार- ‘मनुस्मृति एक ऐसा धर्मग्रंथ है जो हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सर्वाधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति रीति-रिवाज, विचार तथा आचरण का आधार हो गया है. सदियों से इस पुस्तक ने हमारे राष्ट्र के आध्यात्मिक एवं दैविक अभियान को संहिताबद्ध किया है. आज भी करोड़ों हिंदू अपने जीवन तथा आचरण में जिन नियमों का पालन करते हैं, वे मनुस्मृति पर आधारित हैं. आज मनुस्मृति हिंदू विधि है.’


नाथूराम गोडसे ने 1948 में महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी. पूरे महाद्वीप को हिला देने वाली इस हत्या के आठ आरोपी थे जिनमें से एक नाम वी डी सावरकर का भी था. हालांकि, उनके ख़िलाफ़ यह आरोप साबित नहीं हो सका और वे बरी हो गए.

1910-11 तक वे क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल थे. वे पकड़े गए और 1911 में उन्हें अंडमान की कुख्यात जेल में डाल दिया गया. उन्हें 50 वर्षों की सज़ा हुई थी, लेकिन सज़ा शुरू होने के कुछ महीनों में ही उन्होंने अंग्रेज़ सरकार के समक्ष याचिका डाली कि उन्हें रिहा कर दिया जाए. इसके बाद उन्होंने कई याचिकाएं लगाईं. अपनी याचिका में उन्होंने अंग्रेज़ों से यह वादा किया कि ‘यदि मुझे छोड़ दिया जाए तो मैं भारत के स्वतंत्रता संग्राम से ख़ुद को अलग कर लूंगा और ब्रिट्रिश सरकार के प्रति अपनी वफ़ादारी निभाउंगा.’ अंडमान जेल से छूटने के बाद उन्होंने यह वादा निभाया भी और कभी किसी क्रांतिकारी गतिविधि में न शामिल हुए, न पकड़े गए.

वीडी सावरकर ने 1913 में एक याचिका दाख़िल की जिसमें उन्होंने अपने साथ हो रहे तमाम सलूक का ज़िक्र किया और अंत में लिखा, ‘हुजूर, मैं आपको फिर से याद दिलाना चाहता हूं कि आप दयालुता दिखाते हुए सज़ा माफ़ी की मेरी 1911 में भेजी गई याचिका पर पुनर्विचार करें और इसे भारत सरकार को फॉरवर्ड करने की अनुशंसा करें. भारतीय राजनीति के ताज़ा घटनाक्रमों और सबको साथ लेकर चलने की सरकार की नीतियों ने संविधानवादी रास्ते को एक बार फिर खोल दिया है. अब भारत और मानवता की भलाई चाहने वाला कोई भी व्यक्ति, अंधा होकर उन कांटों से भरी राहों पर नहीं चलेगा, जैसा कि 1906-07 की नाउम्मीदी और उत्तेजना से भरे वातावरण ने हमें शांति और तरक्की के रास्ते से भटका दिया था.’


अपनी याचिका में सावरकर लिखते हैं, ‘अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा, जो कि विकास की सबसे पहली शर्त है. जब तक हम जेल में हैं, तब तक महामहिम के सैकड़ों-हजारें वफ़ादार प्रजा के घरों में असली हर्ष और सुख नहीं आ सकता, क्योंकि ख़ून के रिश्ते से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता. अगर हमें रिहा कर दिया जाता है, तो लोग ख़ुशी और कृतज्ञता के साथ सरकार के पक्ष में, जो सज़ा देने और बदला लेने से ज़्यादा माफ़ करना और सुधारना जानती है, नारे लगाएंगे.’

याचिका के अगले हिस्से में वे और भारतीयों को भी सरकार के पक्ष में लाने का वादा करते हुए लिखते हैं, ‘इससे भी बढ़कर संविधानवादी रास्ते में मेरा धर्म-परिवर्तन भारत और भारत से बाहर रह रहे उन सभी भटके हुए नौजवानों को सही रास्ते पर लाएगा, जो कभी मुझे अपने पथ-प्रदर्शक के तौर पर देखते थे. मैं भारत सरकार जैसा चाहे, उस रूप में सेवा करने के लिए तैयार हूं, क्योंकि जैसे मेरा यह रूपांतरण अंतरात्मा की पुकार है, उसी तरह से मेरा भविष्य का व्यवहार भी होगा. मुझे जेल में रखने से आपको होने वाला फ़ायदा मुझे जेल से रिहा करने से होने वाले होने वाले फ़ायदे की तुलना में कुछ भी नहीं है. जो ताक़तवर है, वही दयालु हो सकता है और एक होनहार पुत्र सरकार के दरवाज़े के अलावा और कहां लौट सकता है. आशा है, हुजूर मेरी याचनाओं पर दयालुता से विचार करेंगे.’

ऐसी गतिविधियों में लिप्त और दया की मांग करता हुआ ऐसा माफ़ीनामा डालने वाले सावरकर वीर कैसे कहे जा सकते हैं, जिन्होंने सुभाष चंद्र बोस के उलट अंग्रेज़ी फ़ौज के लिए भारतीयों की भर्ती में मदद की? सावरकर का योगदान यही है कि उन्होंने भारत में हिंदुत्व की वह विचारधारा दी जो लोकतंत्र के उलट एक धर्म के वर्चस्व की वकालत करती है.

(यह लेख 26/02/2018 को द वायर हिंदी वेबसाइट पर छप चुका है.) 

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

हिंदुस्तान किसानों का क़ब्रिस्तान क्यों बनता जा रहा है?

राज्य बनने के बाद तेलंगाना में 3000, मध्य प्रदेश में 21 दिन में 40, मराठवाड़ा में दो हफ़्ते में 42 और छत्तीसगढ़ में एक पखवाड़े में 12 किसानों ने आत्महत्या की है.

किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा बता पाना नामुमकिन है. हर रोज़ दर्जनों किसानों के आत्महत्या कर लेने की सूचनाएं आ रही हैं. हर दिन देश भर से इतनी सूचनाएं प्राप्त हो रही हैं कि यह किसी तबाही से कम नहीं है. इतनी आत्महत्या की सूचनाओं को लेखा-जोखा रख पाना नामुमकिन है.

पिछले कुछ दिनों में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान, पजांब और उत्तराखंड से दर्जनों किसानों के आत्महत्या करने की ख़बरें आई हैं. प्रदेश में जून महीने में ही आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 40 से ज़्यादा हो गई है. मीडिया रिपोर्ट्स के अलावा मध्य प्रदेश की विपक्षी पार्टी ने यह दावा किया है.

नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने दावा किया है कि जून महीने की शुरुआत से अब तक मध्य प्रदेश में 40 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. लेकिन राज्य सरकार किसानों के प्रति संवेदनहीन बनी हुई है.

राज्य के सीहोर, होशंगाबाद, रायसेन, धार, नीमच, छतरपुर, सागर, टीकमगढ़, रायसेन, बालाघाट, बडवानी, छिन्दवाडा, रतलाम, पन्ना, इंदौर, हरदा, देवास, खंडवा, शिवपुरी और विदिशा ज़िलों में किसानों की आत्महत्या की ख़बरें आईं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के गृह ज़िले सीहोर में छह किसानों ने आत्महत्या की है.

मध्य प्रदेश में क़र्ज़ में डूबे किसानों के आत्महत्या करने का सिलसिला थम नहीं रहा है. कई राज्यों के किसानों ने एक जून से दस जून तक आंदोलन किया था. इस दौरान छह जून को मध्य प्रदेश के मंदसौर में गोलीबारी में छह किसानों की मौत की घटना के बाद एक पखवाड़े के भीतर 26 किसानों ने आत्महत्या कर ली थी.

हर दिन दो से पांच आत्महत्याएं

मध्य प्रदेश में 29 जून को सीहोर और होशंगाबाद ज़िलों में दो किसानों ने ख़ुदकुशी कर ली. सीहोर के ईंटाखेड़ा गांव के मारिया आदिवासी (52) ने अपने खेत में पेड़ से फांसी लगाकर जान दे दी.

होशंगाबाद ज़िले में पिपरिया के सांडिया में गुलाब सिंह ने आत्महत्या कर ली. परिजनों के मुताबिक, उनकी 8 एकड़ जमीन पर 2 लाख का क़र्ज़ था, जिसे लगातार फसल ख़राब होने के चलते वे चुका पाने में असमर्थ थे.

28 जून को धार ज़िले में एक किसान मदनलाल ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली. मदनलाल के पुत्र मनोज का दावा है कि क़र्ज़ के चलते वे दबाव में थे, क्योंकि बैंक का क़र्ज़ चुकाने की हालत में नहीं थे. धार ज़िले में 27 और 28 जून के बीच दो किसानों ने आत्महत्या की है.

26 और 27 जून के बीच मध्य प्रदेश में क़र्ज़, सूदखोरों की प्रताड़ना और अन्य कारणों से परेशान होकर पांच और किसानों के आत्महत्या की ख़बर है.

27 जून को भरवेली, बालाघाट के रहने वाले एक किसान डालचंद ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली. डालचंद पर बैंक और सोसाइटी का तीन लाख का क़र्ज़ था. डालचंद के परिजनों ने उनकी मौत के बाद उनका शव सड़क पर रखकर प्रदर्शन किया.

डालचंद के परिजनों के मुताबिक, उन्होंने क़र्ज़ चुकाने की गरज से अपनी डेढ़ एकड़ ज़मीन बेची भी थी, फिर भी क़र्ज़ नहीं चुका पाए. उनके पास बैंक से लगातार फोन आ रहा था, सोसायटी ने उन्हें डिफाल्टर घोषित कर दिया था. इससे परेशान होकर डालचंद ने ख़ुदकुशी कर ली.

समाचार एजेंसी भाषा के मुताबिक, इंदौर ज़िले में क़र्ज़ के बोझ तले दबे 21 वर्षीय किसान ने सोमवार की रात कथित तौर पर ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली.

गांधी नगर पुलिस थाना के प्रभारी आरएस शक्तावत ने बताया कि जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर धरनावदा गांव में पवन केवट ने 26 जून देर रात कथित तौर पर ज़हर खा लिया. उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां जांच के बाद डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. उसकी तीन महीने पहले ही शादी हुई थी.

केवट या उसके पिता के नाम खेती की कोई ज़मीन नहीं है. हालांकि, उसने साल भर पहले एक व्यक्ति से बंटाई पर तीन बीघा ज़मीन लेकर इस पर खेती की थी. बंटाई का क़रार ख़त्म होने के बाद वह इन दिनों मज़दूरी कर रहा था.

पुलिस को शुरुआती जांच में पता चला कि केवट पर एक बैंक का कुछ क़र्ज़ था. पुलिस बैंक से इसकी जानकारी निकलवा रही है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के खंडवा जिले में हरसूद निवासी घिसिया खान (70) ने ईद की रात खेत के कुएं में कूदकर जान दे दी. मंगलवार को घिसिया का शव बरामद हुआ. उन्होंने एक ट्रैक्टर ख़रीदा था, जिसके लिए क़र्ज़ लिया था और क़र्ज़ नहीं चुका पा रहे थे.

प्रदेश के झाबुआ ज़िले के पारा चौकी के आदिवासी किसान जहू ने 26 जून को कीटनाशक पीकर जान दे दी. पुलिस का कहना है कि जहू के बेटे ने एक लड़की के साथ भागकर शादी की थी. पंचायत ने जहू को आदेश दिया था कि वह लड़की वालों को साढ़े चार लाख रुपये दहेज में दे. ज़मीन गिरवी रखने के बाद भी क़र्ज़ नहीं उतरा तो उन्होंने आत्महत्या कर ली.

देवास ज़िले की टोंकखुर्द तहसील के केसली गांव के रहने वाले किसान मनोहर सिंह ने भी ज़हर पीकर जान दे दी. उन पर पांच लाख रुपये का क़र्ज़ था.

रविवार को बुंदेलखंड क्षेत्र के टीकमगढ़ ज़िले में एक 65 वर्षीय किसान बारेलाल अहिरवार ने अपने खेत में पेड़ से लटक कर जान दे दी. हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, उनके बेटे चंद्रभान ने कहा कि उनके पिता ने स्थानीय सूदखोर से 45,000 का क़र्ज़ ले रखा था. लेकिन प्रशासन का कहना है कि अहिरवार मानसिक रूप से बीमार थे.

यह ध्यान रखने की बात है कि जितने किसानों ने आत्महत्या की है, हर मामले में मरने वाले किसानों के परिजन दावा कर रहे हैं कि उन्होंने क़र्ज़ के कारण ख़ुदकुशी की, जबकि लगभग हर मामले में प्रशासन का दावा इससे इतर है. प्रशासन लगातार यह मानने से इनकार करता रहा है कि किसान क़र्ज़ से ख़ुदकुशी कर रहे हैं.

पिछले हफ़्ते इसी क्षेत्र के पाली गांव के रघुवीर यादव ने अपने खेत में जाकर सल्फास खा लिया था और उनकी मौत हो गई थी. उनके पिता देशपत यादव के मुताबिक, उन पर दस लाख रुपये का क़र्ज़ था. लेकिन प्रशासन ने दावा किया कि रघुवीर ने पारिवारिक विवाद के चलते आत्महत्या की. स्थानीय लोगों का कहना है कि रघुवीर कॉन्ट्रैक्ट पर खेती करते थे और कई सालों से लगातार घाटे में चल रहे थे जिस कारण उन पर बहुत क़र्ज़ हो गया था.

पिछले 16 सालों में मध्य प्रदेश में 21,000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का कहना है कि इन आत्महत्याओं का कारण फसलों का बर्बाद होना, फसलों का उचित दाम न मिलना, क़र्ज़ न चुका पाना, क़र्ज़ चुकाने के लिए बैंकों और सूदखोरों का दबाव होना और कृषि से जुड़े अन्य कारण हैं.

उत्तर प्रदेश में झांसी के सीपरी बाजार थाना क्षेत्र के करारी गांव में एक किसान सीताराम (48) ने अपने खेत में फांसी लगा ली. 24 जून को उनका शव उनके खेत में एक पेड़ से लटका मिला. परिजनों ने बताया है कि कुछ दिन पहले सीताराम का ट्रैक्टर एक कार से टकरा गया था जिससे कार क्षतिग्रस्त हो गई थी. कार मालिक दंबगई करते हुए 20 हज़ार रुपये मांग रहे थे, लेकिन सीताराम के पास पैसे नहीं थे. दबंगों की धमकी से परेशान सीताराम ने आत्महत्या कर ली.

छत्तीसगढ़ में अंबिकापुर ज़िले के उलकिया गांव में सोमवार रात एक किसान फुलेश्वर पैकरा 40 ने फांसी लगा ली. उन्होंने खेती के लिए आदिम जाति सहकारी समिति से क़र्ज़ ले रखा था. पिछले कुछ दिन से वह क़र्ज़ जमा नहीं कर पाने के कारण मानसिक रूप से परेशान था. हालांकि, पुलिस ने क़र्ज़ के कारण आत्महत्या से इनकार किया है.

मराठवाड़ा में दो हफ़्ते में 42 किसानों ने आत्महत्या की

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में पिछले दो हफ़्ते में 42 किसानों ने आत्महत्या की है. औरंगाबाद डिवीजनल कमिश्नरेट, जो किसानों की आत्महत्या का लेखा-जोखा रखता है, के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, ‘इस साल जनवरी से 26 जून तक 445 किसानों ने आत्महत्या की है. एक जून से किसानों के आंदोलन के बाद महाराष्ट्र सरकार ने किसानों की क़र्ज़माफ़ी की घोषणा की थी. इसके बावजूद, महाराष्ट्र के आठ ज़िलों में किसानों ने आत्महत्या की. यहां पिछले दो हफ़्ते में 42 किसानों ने आत्महत्या कर ली. इसकी वजहें कृषि और क़र्ज़ से जुड़ी हैं.’

इस महीने 19 जून से 25 जून के बीच 19 किसानों ने आत्महत्या की. जबकि, 12 जनू से 18 जून के बीच 23 किसानों ने आत्महत्या की.

छत्तीसगढ़ में एक पखवाड़े में 12 किसानों ने दी जान

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में 27 जून को एक किसान फुलेश्वर पैकरा ने आत्महत्या कर ली. टाइम्स आॅफ इंडिया के मुताबिक, इसके साथ ही राज्य में एक पखवाड़े में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 11 हो गई है. विपक्षी दल कांग्रेस का कहना है कि राज्य में पिछले दस दिनों में 12 किसानों ने आत्महत्या कर ली है.

किसानों के प्रदर्शन के बाद धमतरी, राजनंदगांव, सरगुजा, दुर्ग, महासमुंद, कांकेर और कवर्धा जिलों में किसानों ने आत्महत्या की है.

पंजाब में भी 8 दिनों में एक दर्जन किसान आत्महत्याएं

किसानों का क़र्ज़ माफ़ करने की पंजाब सरकार की घोषणा के बाद से अब तक पंजाब में एक दर्जन किसानों ने आत्महत्या कर ली है. 19 जून को सरकार ने यह घोषणा की थी. इंडियन एक्सप्रेस अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक, 19 जून से 27 जून के बीच आठ दिनों के भीतर एक दर्जन किसानों ने ख़ुदकुशी कर ली. जितने किसानों ने ख़ुदकुशी की है उन सभी पर तीन से पांच लाख तक संस्थानिक या निजी क़र्ज़ था.

यह आंकड़ा किसान संगठन ने जुटाया है. राज्य में जितने किसानों ने आत्महत्या की है उनमें से चार मानसा ज़िले से हैं. मानसा के जोगा गांव के बूटा सिंह (44) ने 27 जून को अपने खेत में पेस्टिसाइड पी लिया था. उन पर 8.50 लाख का क़र्ज़ था. पंजाब में जून के पहले हफ़्ते में दस किसानों के आत्महत्या करने की ख़बरें आई थीं.

राजस्थान के हाड़ौती संभाग में पांच ख़ुदकुशी

राजस्थान के हाड़ौती संभाग में इस जून में ही पांच किसानों ने आत्महत्या की है. राजस्थान पत्रिका की एक ख़बर में कहा गया है कि ‘हाड़ौती के किसानों के लिए जून 2017 यमराज बनकर आया. अब तक संभाग में पांच किसान आत्महत्या कर चुके हैं.’

इन आत्महत्याओं का कारण गिरता लहसुन का दाम है. ‘मौजूदा भाव में बुवाई का ख़र्च़ भी नहीं निकल रहा जिससे परेशान होकर किसान आत्महत्या कर रहे हैं.

अख़बार ने लिखा है, ‘हाड़ौती में 3 जून को लहसुन के कम भाव मिलने से सदमे में रोण निवासी सत्यनारायण मीणा की मौत हो गई. 21 जून को सकरावदा निवासी संजय मीणा ने क़र्ज़ से परेशान होकर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. 23 जून को सुनेल निवासी बगदीलाल राठौर ने भी क़र्ज़ के चलते ख़ुदकुशी कर ली. 24 जून को डग निवासी शेख़ हनीफ़ ने क़र्ज़ से परेशान होकर आत्महत्या कर ली. 27 जून को कोटा ज़िले के अयाना थाना क्षेत्र के श्रीपुरा निवासी मुरलीधर मीणा (32) ने लहसुन के कम दाम मिलने से आहत होकर जहर खाकर जान दे दी.’

तेलंगाना में भी तबाही

तेलंगाना राज्य बनने के बाद से अब तक वहां पर 3,000 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अलग राज्य बनने के बाद से तेलंगाना में अब तक 3,026 किसानों ने आत्महत्या कर ली है. एक एनजीओ के हवाले से इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014 में 792, 2015 में 1147 और 2016 में 784 किसानों ने आत्महत्या की. इस साल जनवरी से जून तक 294 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. दक्षिणी राज्यों में तेलंगाना में भी किसानों की ख़ुदकुशी जारी है. तेलंगाना के खम्मम और भद्राद्री कोठागुडम ज़िलों में ही पिछले तीन महीने में 22 किसानों ने आत्महत्या की है.

क्या है किसानों की मूल समस्या

क़रीब 70 प्रतिशत भारतीय कृषि पर निर्भर हैं. इनमें से 9 करोड़ परिवार सीधे तौर पर किसानी से जुड़े हैं. यह आबादी अपने ज़रूरी ख़र्च से कम आमदनी के कारण क़र्ज़ लेने पर मजबूर होती है. अंतत: क़र्ज़ का बोझ अंतत: उसकी जान ले लेता है.

इंडिया स्पेंड के आंकड़ों के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार में छपी एक ख़बर में कहा गया है कि क़रीब 70 प्रतिशत भारतीयों के 90 मिलियन यानी 9 करोड़ परिवार हर महीने अपनी कमाई से ज़्यादा ख़र्च करते हैं, इस कारण उन्हें क़र्ज़ लेना पड़ता है. देश भर में आधे से ज़्यादा किसानों की आत्महत्या का कारण क़र्ज़ ही है.

नेशनल सैंपल सर्वे का डाटा कहता है कि 6 करोड़ से ज्यादा परिवार ऐसे हैं जिनके पास एक एकड़ या उससे कम खेती की ज़मीन है. उनका जितना ख़र्च है उससे कम कमा पाते हैं.

यानी बढ़ती महंगाई, खेती में बढ़ती लागत, कम आमदनी, कृषि उपज का उचित मूल्य न मिलने और इसके फलस्वरूप क़र्ज़ बढ़ने से पूरे देश के मध्यम और सीमांत किसान मुसीबत में हैं. क़र्ज़ चुकाने को लेकर बैंक और सूदखोर इतना दबाव डालते हैं कि किसान पैसे न दे पाने की हालत में आत्महत्या कर रहे हैं.

किसान आत्महत्या के डरावने आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में कहा गया कि नरेंद्र मोदी के शासन काल में 2014-15 के दौरान किसानों के आत्महत्या करने की दर 42 प्रतिशत बढ़ गई है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, पिछले 22 सालों में देश भर में तकरीबन सवा तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. भारत के कई राज्यों में हज़ारों की संख्या में किसान क़र्ज़, फ़सल की लागत बढ़ने, उचित मूल्य न मिलने, फ़सल में घाटा होने, सिंचाई की सुविधा न होने और फ़सल बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं.

ब्यूरो के मुताबिक, 2015 में कृषि से जुड़े 12,602 किसानों ने आत्महत्या की. 2014 में यह संख्या 12,360 थी. इसके पहले 2013 में 11,772, 2012 में 13,754, 2011 में 14 हजार, 2010 में 15 हजार से अधिक, 2009 में 17 हजार से अधिक किसानों ने कृषि संकट, क़र्ज़, फ़सल ख़राब होने जैसे कारणों के चलते आत्महत्या कर ली.

2016 का आंकड़ा अभी जारी नहीं हुआ है. लेकिन जिस तरह से राज्यों से किसानों द्वारा आत्महत्या करने की ख़बरें आईं, उस आधार पर कहा जा सकता है कि 2016 और 17 के हालात और भयानक हैं.

पिछले कई बरसों महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा किसान आत्महत्या करते हैं. अकेले महाराष्ट्र में 1995 से लेकिन अब तक 60,000 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

महाराष्ट्र के बाद तेलंगाना दूसरे और कर्नाटक तीसरे नंबर पर है. देश में जितने किसान आत्महत्याएं करते हैं, उनमें से 94 प्रतिशत मात्र छह राज्यों में हैं. ये राज्य हैं- महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध प्रदेश और छत्तीसगढ़.

देश भर में ये सैकड़ों आत्महत्याएं देश के प्रशासन और किसानों को लेकर सरकारों की प्राथमिकता पर गंभीर सवाल खड़ा करती हैं. क्या भारत ऐसा देश बन गया है जहां किसान होना मौत की गारंटी है?

(यह स्टोरी 29/06/2017 को 'द वायर' वेबसाइट पर छप चुकी है.)

रविवार, 11 दिसंबर 2016

नोटबंदी के दौर में फकीरी के जलवे

मैं फकीरी के नाना रूपों के आकर्षण में आजकल त्रिशंकु हो गया हूं. एक तरफ संत कवि कबीर दूसरी तरफ विश्वगुरु बनते भारत के परधानसेवक जी. एक तरफ कबीर की फकीरी खींचती है, दूसरी तरफ परधानसेवक की. गालिब चचा ने ऐसे ही त्रिशंकु हुए मुझ जैसे आदमी के लिए लिखा होगा कि'ईमां मुझे रोके है जो खीचें है मुझे कुफ्र, काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे'.

इनमें से काबा और कलीसा यानी मस्जिद और मयखाना कौन है, यह तो पक्का पता नहीं है लेकिन यह पक्का पता है कि 'होता है शबो-रोज तमाशामेरे आगे.'

बात भटक रही है, इसे भटकने नहीं देना है. मैं मोदी जी को आदर्श फकीर मानकर उन पर कॉन्सन्ट्रेट करना चाह रहा हूं. लेकिन उनकी फकीरी काफीदिलचस्प है. 25 क्विंटल फूलों की महक वाली राजशी फकीरी अपन कबीर—फैन जुलाहों, गढ़रियों पर कहां फबेगी! मैं दोनों फकीरी के बीच मेंचकरायमान हो रहा हूं.

संत कवि कबीर का बड़ा मशहूर भजन है, 'मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में...' आजकल यह अप्रसांगिक हो गया है. न हम पर सूट कर रहा है, न हमारेदेशकाल पर. इस भजन की आगे की पंक्तियां मेरे लेख से निकलकर भागना चाहती हैं.

फकीर का भजन जैसे फूलों के आकर्षण में फंस गया है. वह बहराइच जाना चाहता है. आज बहराइच में मोदी जी की परिवर्तन महारैली है. परिवर्तनयह हुआ है कि देसी रैली में 25 क्विंटल विदेशी फूल आया है. थाईलैंड, दिल्ली, कलकत्ता और नवाबों के शहर लखनउ से.

यह फकीरी का ही प्रताप है कि जिस दिल्ली से चलकर नये नोट बहराइच, गोंडा, बस्ती, लखनउ, कलकत्ता, बेंगलूर नहीं पहुंच सके, उस दिल्ली केप्रशासक के लिए तमाम शहरों से महंगे फूल खुद ही चलकर बहराइच आ गए हैं. पूरे 25 क्विंटल फूल.

फूल क्या हैं! अमीरी का प्रदर्शन. अमीरी क्या है? विनाश का द्वार. फूलों की महक मनुष्य को साधना से विरत करती है! जब तक फूलों का शबाबबरकरार है, तब तक ही उसकी महक बरकरार है और तभी तक अमीरी. शबाब यानी जवानी क्षणभंगुर है, इसलिए महक भी क्षणभंगुर है. महकअमीरी का प्रतीक है. यानी अमीरी भी क्षणभंगुर है. यही साबित करने के लिए फकीर को 25 क्विंटल फूल जुटाने पड़े हैं. विदेश से फूल इसलिए आए हैंताकि किसी को यह भ्रम न रहे कि जम्बूदीप से बाहर कुछ शाश्वत है! उस फूल की महक भी क्षणभंगुर है. हमें फकीरी की साध्ना करनी है!

भारत आध्यात्म की ताकत पर टिका है. वह हर क्षणभंगुर तत्व को नकार देता है. उसने अमीरी को नकार दिया है. सारे लोगों की जेब से, खेत से,संदूक से, बंदूक से, तिजोरी से, छिछोरी से, नौकरी से, लॉटरी से जितना पैसा निकल सकता था, सब निकाल कर बैंकों में जमा करा दिया गया है.लोग फकीर बन—बनकर कतार में खड़े हो गए हैं एटीएम के सामने. एटीएम भी किस देवता से कम है! एटीएम देवता अगर किसी को दाम-दर्शन देरहे हैं तो समझिए कि उसे सशरीर वैकुंठ प्राप्त हुआ.

दूसरी तरफ सारे देश का धन बैंकों में एकत्र हो गया है. समझ लो कि लालची लोगों के लिए नरक का द्वार खुल गया है. लुटेरों और पापियों ने चोर इसेलूटना शुरू कर दिया. उन्हें पकड़कर सजाएं दी जा रही हैं. परधान जी ने कहा है कि आठ नवंबर के बाद सोर पापों का हिसाब होगा.

सारे पापी लंदन भेजे जाएंगे. विजय माल्या नामक पापी ने सैकड़ों करोड़ हड़पने का पाप किया था, वह  लंदन नामक नरक में सज़ा काट रहा है. इसीतरह सारे पापियों को सजा मिलेगी.

मगर फकीर कवि कबीर दास मेरा ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं-'जो सुख पावो राम भजन में, सो सुख नाही अमीरी में.' मैं कबीर दास कोभारत का बड़ा कवि मानते हुए भी उनमें संशोधन की गुस्ताखी करना चाह रहा हूं.

मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में...
जो सुख पावो नोटबंदी में,
सो सुख नाही करंसी में.
भला बुरा सब का सुन लीजै,
कर गुजरान इमरजेंसी में.
दिल्ली नगर में रहिनी हमारी,
रैली बहराइच झूंसी में.
दाल, भात से नरक मिलत है
मुक्ति मिलत है भूसी में.

इतिश्री फकीरी कथा.

सोमवार, 21 नवंबर 2016

क्या आपको भी उन्मादी भीड़ में तब्दील होने की जल्दी है?

कृष्णकांत

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती
सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना...
-पाश

किसी समाज के लिए इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता है कि लोग मुर्दा शांति से भर जाने के लिए बेकरार हों. समाज में सबकुछ सहन कर जाने लायक मुर्दनी छा जाना साधारण बात नहीं है. राममनोहर लोहिया कहते थे- 'जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं किया करतीं.लेकिन हमारा समय मनहूस समय है. यहां पर कौमों में ​जिंदा दिखने का कोई हौसला नजर नहीं आता.
दुनिया भर में बदलाव हमेशा युवाओं के कंधे पर सवार होकर आता है. हमारे यहां का युवा अपने कंधे पर कुछ भी उठाने को तैयार नहीं है. उसने राजनीतिक मसलों को धार्मिक भावनाओं का मसला बना लिया है और आस्था में अंधे होकर अपनी रीढ़ की हड्डी गवां दी है. इसलिए जब आप सरकार के किसी फैसले या किसी कार्रवाई सवाल करते हैं तो अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े आपको गद्दार कहता हैदलाल कहता हैदेशद्रोही कहता है या पाकिस्तान का एजेंट कहता है.
भोपाल एनकाउंटर को लेकर सोशल मीडिया पर वही युद्ध शुरू हो गया हैजो हर मामले में होता है. राष्ट्रवादी बनाम देशद्रोही. सेकुलर बनाम कम्युनल. हिंदुत्ववादी अपनी सांप्रदायिकता को ऐसे पेश करते हैं जैसे कि सांप्रदायिक होना बहुत गौरव की बात हो. चाहे लेखकों की हत्या का मसला रहा होदादरी कांड होफर्जी गोरक्षा होसर्जिकल स्ट्राइक हो या भोपाल में आठ कैदियों का एनकाउंटर.
हर सवाल पर आपको गद्दार और देशद्रोही कहने वाला युवा ऐसी दुनिया में है जहां पर सरकार पर सवाल उठाना पाप है. बिना सवाल और समीक्षा केबिना आलोचना और प्रतिपक्ष के कैसा समाज ​बनेगायह उसकी कल्पना में कहीं नहीं है.
एक गैर-कानूनी सरकारी कार्रवाई पर आप यह सोच कर सवाल उठाते हैं कि कानून का शासन ही लोकतंत्र की पहली शर्त है. लेकिन भीड़ में होते युवा इस आलोचना को अपने राजनीतिक हितों पर होने वाला हमला मानते हैं. वे लोकतंत्र में भागीदारी नहीं चाहते. वे भेड़चाल में दौड़ना चाहते हैं. वे अपने आगे चलने वाली भेड़ के पीछे-पीछे सर झुका कर बस चलते रहना चा​हते हैं. धर्म की चाशनी में डूबी उनकी राजनीतिक ट्रेनिंग ही ऐसी हो रही है कि वे राजनीति को आस्था की आंख से देखते हैं. जैसे प्रजा राजा में आस्था रखती हैजैसे प्रजा राजा के लिए जान देने पर उतारू हो जाएउसी तरह वे जान दे देने या ले लेने को तैयार हैं.
हमारे देश का युवा उन्मादी भीड़ में तब्दील हो रहा है. उसे इत्मीनान से सोचने से परहेज हैउसे सवाल करने से परहेज हैउसे देश और देश की व्य​वस्था ​पर विचार करने से परहेज है. उसे गाली देने की जल्दी है. उसे किसी को गद्दारदलालदेशद्रोहीपाकिस्तानी आदि कह देने की जल्दी है. उसे भारत माता का नारा लगाने की जल्दी है. उसे ​सवाल करती महिला को वेश्या कह देने की जल्दी है. उसे सजा देने की जल्दी है. उसे जज बनकर फैसला सुनाने की जल्दी है. उसे भीड़ में तब्दील होकर किसी को मार डालने की जल्दी है.
इन युवाओं की शिक्षाजागरूकता और स्वाभिमान की कंडीशनिंग कैसे हुई होगी कि वे लोकतंत्र की मूल भावनाओं को ही गाली देते हैं. वे देशभक्ति में इतने पागल हैं कि देशभक्ति का ड्रामा करने वालों का कोई भी कारनामा बर्दाश्त करने को तैयार हैं. वे देशभक्ति के इन ड्रामों के लिए देश के ही बुनियादी नियमों का उल्लंघन सहने को तैयार हैं. उन्हें इसमें कुछ भी बुरा या असहज करने वाला नहीं लगता.
कितना अच्छा होता कि हर एनकाउंटर को कोर्ट द्वारा ​फर्जी सिद्ध किए जाने से पहले हमारे देश का युवा सरकारों से पूछता कि पुलिस को गोली मारने का अधिकार किसने दियावे पूछते कि किसी अपराधी को दंड देने के लिए भीड़ को अधिकार किसने दियाकोई संगीन अपराधों में लिप्त है तो उसे कानून और अदालतें सजा देंगीया प्रमोशन का प्यासा अफसर उसे गोली मारकर दंड देगाकाश! हमारे देश के युवा यह पूछते कि अगर हम गैरकानूनी हत्याओं को सेलिब्रेट करेंगे तो तालिबान या आईएसआईएस से अलग एक प्रतिष्ठित लोकतंत्र कैसे बनेंगे
लोकतंत्र नागरिक भागीदारी का नाम हैजिसमें आप सत्ता से लगातार सवाल करके उसे निरंकुश होने से रोकते हैं. जब आप सरकारों के पक्ष में खड़े हो जाएं और सवाल करना बंद कर देंतब समझिए कि आप मुर्दा शांति से भर गए हैं. और जैसा कि पाश कहते हैंसबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जानातड़प का न होनासब कुछ सहन कर जाना...
हर नागरिक को यह सोचना ​चाहिए कि आप क्या होना चाहते हैंसवाल करता हुआलोकतंत्र को मजबूत करता हुआ एक जागरूक नागरिक या मुर्दा शांति भरा हुआ लोकतंत्र में जनसंख्या बढ़ाने वाला मात्र एक प्राणीक्या आपको भी उन्मादी भीड़ में तब्दील होने की जल्दी है?


रविवार, 6 नवंबर 2016

सैकड़ों शहादतें कैसे रुकेंगी? मीडिया पर प्रतिबंध लगा दो

सीमा पर आज फिर दो जवान शहीद हो गए. इस साल अब तक कुल 76 जवान शहीद हो चुके हैं. पिछले तीन महीनों में 42 भारतीय जवान शहीद हो चुके हैं. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कम से कम 100 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन हुआ है और 8 जवान शहीद हुए हैं.
1988 से सितंबर, 2016 तक कुल 6,250 भारतीय रक्षाकर्मी आतंकी वारदातों में शहीद हुए हैं. वहीं जवाबी कार्रवाई में कुल 23,084 आतंकियों को भारतीय जवानों ने मार गिराया. इन घटनाओं में करीब 15000 लोग मरे हैं.
56 इंची सीने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद दो साल के भीतर 156 जवान शहीद हुए हैं.
यदि ये आंकड़े सही हैं तो पिछले ढाई साल में करीब ढाई सौ जवान शहीद हो चुके हैं. सरकार को इस बारे में स्पष्ट आंकड़ा जारी करके बताना चाहिए कि अब तक कुछ कितने जवान शहीद हुए.
आतंकी वारदातों में मारे गए जवानों की सालाना औसत मृत्यु दर पर नजर डालें, तो यह आंकड़ा कांग्रेस की मनमोहन सरकार से जरा भी कम नहीं है.
मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाओं में वृद्धि हुई है. कश्मीर में आतंकी वारदात की संख्या वाजयेपी और मनमोहन सरकार की तुलना में मोदी सरकार के दौरान बढ़ी हैं.
5 जनवरी 2015 से 15 जनवरी 2016 के बीच आतंक सम्बंधी 146 घटनाएं हुईं, जिसमें 169 लोग मारे गए. इनमे 39 सुरक्षाकर्मी और 22 नागरिक भी शामिल हैं. इसी दौरान राज्य में सीमा पर फायरिंग की 181 घटनाएं हुईं हैं जिसमें 22 लोगों की मौतें हुईं जिनमें 8 सुरक्षाकर्मी और 75 अन्य लोग मारे गए.
मोदी सरकार कहती है कि हम मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं तब आप कूदने लगते हैं, लेकिन पहले भी मुंहतोड़ जवाब ही दिया जाता रहा है. 2008-09 में भी युद्ध होने की कगार पर मामला पहुंच गया था. पहले की सरकारों ने सीमा पर सैनिकों के हाथ में दही नहीं जमाया था. सीमा के भीतर भी और बाहर भी सेना वह सब करती रही है जो करने की उसे जरूरत महसूस हुई. मोदी सेना को भी लेकर चुनाव प्रचार करते हैं, पहले ऐसा नहीं होता था.
प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी कहते थे कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए 56 इंची सीना चाहिए. एक सैनिक के सिर के बदले 10 सिर लाने की बात भी कहते थे. हालांकि, एक प्रधानमंत्री के तौर पर यह बात अहमक किस्म की है. तारीफ तो तब होगी जब वार्ता और कूट​नीति के सहारे इन घटनाओं पर रोक लगाई जाए. वे यह दोनों काम नहीं कर सके. उन्होंने यह जरूर किया कि सेना को चुनावी मंडी में ले जाकर सरे बाजार दुकान सजा बैठे हैं.
मनमोहन थे, तब भी सैनिक मर रहे थे. मोदी हैं तब भी सैनिक मर रहे हैं. सीमा पर गोलियां तब भी चलती थीं, अब भी चलती हैं. अंतर बस इतना आया कि पाकिस्तान ही आतंकी भेजता है और वही जांच दल भी भेजता है. जज, ज्यूरी और जल्लाद सब वही है.
स्पष्ट खुफिया रिपोर्ट होने के बाद भी पठानकोट हमला नहीं रोका जा सका. इस हमले को ​लेकर नियुक्त जांच समिति ने सरकार और सुरक्षा एजेंसियों पर गंभीर सवाल उठाए, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई हुई हो, ऐसा हमें मालूम नहीं है.
अब अगर एक एनडीटीवी को प्रति​बंधित करने या रवीश कुमार को काला पानी भेज देने से हमारी सुरक्षा पुख्ता होती हो तो ऐसा जरूर करना चाहिए. या ऐसा करना चाहिए कि समूचे मीडिया को प्रतिबंधित कर देना चाहिए.
'अंधेर नगरी, चौपट राजा' में भारतेंदु ​हरिश्चंद्र इसका पटाक्षेप इस पंक्ति से करते हैं कि 'जहाँ न धर्म न बुद्धि नहिं, नीति न सुजन समाज, ते ऐसहि आपुहि नसे, जैसे चौपटराज'.

बाकी, बागों में बहार तो हइए है...



*(सारे आंकड़े मीडिया रिपोर्ट्स से)

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

‘लोगों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला हो रहा है, बहस इस पर होनी चाहिए राष्ट्रवाद पर नहीं’







प्रश्न है राज्य की राजनीतिक हिंसा का, जो एक खास तरह की राजनीतिक भाषा में व्यक्त हो रही है. लेकिन पूरी संसद बैठ गई राष्ट्रवाद पर बहस करने, जैसे कि राष्ट्रवाद पर कोई सेमिनार हो रहा हो. बाहर हमले हो रहे हैं, संसद में अकादमिक सेमिनार हो रहा जैसे कि इस बहस से यह मसला निपट जाएगा


अपूर्वानंद

किसी से आप पूछेंगे कि वह किसको मानता है राष्ट्रवाद तो वह नहीं बता पाएगा. कुछ धुंधली-सी अवधारणा है लोगों के दिमाग में कि मुल्क हमेशा खतरे में रहता है, सैनिक उसकी रक्षा करते हैं, वे मारे जाते हैं, और इधर बुद्धिजीवी हैं जो तरह-तरह से सवाल उठाते रहते हैं, जबकि इत्मिनान से तनख्वाहें ले रहे हैं और जनता के पैसे पर शानदार जगहों में बैठकर पढ़ रहे हैं, जबकि हमारे सैनिक सियाचीन में बर्फ में दबकर मर जाते हैं.

अगर आप लोगों से पूछें तो कुल मिलाकर आपको जवाब यही मिलेगा जो आजकल मिल रहा है. अब आप इस अवधारणा को तोड़ेंगे कैसे? इसको तोड़ना बहुत ही मुश्किल है. लोगों को यह समझाना कि जो लोग विश्वविद्यालयों में बैठकर पढ़ रहे हैं, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, या जो सवाल कर रहे हैं, वह सवाल करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. यह समझाना भी बहुत कठिन है कि छत्तीसगढ़ में भी जिन सैनिकों को लगा दिया जा रहा है उनको देश के ही खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है. क्योंकि उनको बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में इस्तेमाल किया जा रहा है. तो इसे कैसे समझाया जाएगा, यह एक प्रश्न है.

जिसको कहा जा रहा है कि राष्ट्रवाद क्या है, इसमें किसी को भी राष्ट्रद्रोही साबित करना बहुत आसान है. राष्ट्रवाद के घालमेल के चलते हिंदूवाद को आत्मसात करना बहुत आसान है. उसके प्रतीक चिह्न, उसके संकेत सारे ऐसे हैं जिसको आप हिंदू धर्म से जोड़कर देख सकते हैं. और एक तरह की प्रतिध्वनि है जो बहुत दिनों से लोगों के मन में चली आ रही है, अब जिसको खुलकर निकलने का मौका मिला है कि यह देश पूरी तरह से हिंदू क्यों नहीं है और क्यों नहीं इसे होने दिया जा रहा है. लंबे समय तक इसके लिए नेहरू को दोषी ठहराया गया, कि नेहरू क्योंकि आधा ईसाई थे, आधा मुसलमान थे, तो उनकी वजह से ऐसा नहीं हो पाया. वरना पटेल, राजेंद्र बाबू होते तो हिंदू राष्ट्र हो ही जाता. वह घृणा अभियान जारी है.

अब इस चीज को समझना अति आवश्यक है कि क्यों सबसे ज्यादा निशाने पर राहुल गांधी हैं. राहुल गांधी सोनिया के बेटे हैं और नेहरू से जुड़े हैं. तो वह जो पुरानी घृणा है उसे इटली से जोड़कर और ताजा किया जा सकता है. तो यह बहुत ही पेचीदा घालमेल किया गया है. अफवाहों और दूसरे तमाम माध्यमों से इसे इतना ज्यादा पकाया गया है, इसकी काट के बारे में बात करने की कभी कोई कोशिश नहीं की गई. हम लोग अगर बात करने लगेंगे समझदारी से तो उसकी तो जगह नहीं है. क्योंकि पूरा सामाजिक विचार-विमर्श है वह इस भाषा में ढल गया है.

दो-तीन चीजें जो बहुत ही असंगत मालूम पड़ती हैं, वो ये कि माओवादी कैसे राष्ट्रविरोधी हो गए? नक्सलवादी कैसे राष्ट्रविरोधी हो गए? यह प्रश्न किया जा सकता है! क्योंकि ये लोग तो सबसे गरीब लोगों के लिए लड़ रहे हैं. यह तो एक आंतरिक संघर्ष है. इनको राष्ट्रविरोधी बार-बार क्यों कहा जा रहा है? यह जो हो रहा है कि आप दोनों-तीनों चीजों का घालमेल कर रहे हैं, इससे कुछ बातें समझ में आती हैं. क्योंकि सशस्त्र माओवादियों का संघर्ष हमारे सैन्य बल से होता है. सैन्य बल राष्ट्र का सबसे बड़ा प्रतीक है. इसलिए आप माओवादियों को राष्ट्रविरोधी घोषित कर सकते हैं, बिना यह सोचे हुए कि ये सैन्य बल आदिवासियों के घर जला रहे हैं, उन पर हमला कर रहे हैं तो ये किनके हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं. ये बातें करेगा कौन?

विश्वविद्यालयों के खिलाफ घृणा का एक माहौल पहले से है. हमारे यहां एक एंटी इंटेलेक्चुअलिज्म है और एक हीनताबोध जो भाजपा-आरएसएस में है कि उनको कोई बौद्धिक मानता नहीं है. बौद्धिकता के विरुद्ध उनके मन में एक घृणा है. और बौद्धिकता मात्र को वामपंथी मान लिया गया है. यह बहुत मजेदार चीज है. लेकिन तब प्रताप भानु मेहता क्या ठहरेंगे? आंद्रे बेते क्या होंगे? पीएन मदान क्या होंगे? आशीष नंदी क्या होंगे? इसी बीच यह खबर आई जिसकी मैं आशीष नंदी से पुष्टि नहीं कर पाया. आशीष नंदी ने कहा है कि वे माफी मांगने को तैयार हैं. उन्होंने गुजरात को लेकर जो लेख वर्षों पहले लिखा था, उसके चलते उन पर देशद्रोह का मुकदमा है. यह मुकदमा उनके खिलाफ है और टाइम्स ऑफ इंडिया, अहमदाबाद के खिलाफ है, जिसने उनका लेख छापा था. यह लेख तो गुजरात सरकार की आलोचना थी. गुजरात जिस दिशा में जा रहा है, उसकी आलोचना थी. उस पर देशद्रोह का मुकदमा कैसे हो गया? वह चल रहा है और आशीष नंदी ने उस पर माफी मांगने की पेशकश की है. वे माफी मांग सकते हैं.

इससे समझा जा सकता है कि दरअसल बौद्धिकता पर हमला बहुत पहले से चल रहा था. गुजरात में वह प्रोजेक्ट पूरा हो गया. इसलिए आप कह सकते हैं अब गुजरात एक तरह का बैरेन लैंड है. अब आप देखें कि कैसे व्यवस्थित ढंग से वह हमला हो रहा है. जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय में अभी कुछ ही दिन पहले एक सेमिनार हुआ ‘कश्मीर में बहुलतावाद की संस्कृति’ विषय पर. अब यह सेमिनार कैसे राष्ट्रविरोधी है? लेकिन इस सेमिनार को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आपत्ति जताता है और उस आपत्ति के आधार पर कुलपति नोटिस जारी करते हैं. तो यह सब क्या हो रहा है?

इसी तरह अभी एक घटना लखनऊ में घटी जो बहुत ही हास्यास्पद थी. हालांकि वह घटना थोड़ी-बहुत मुझसे जुड़ी हुई है, लेकिन हास्यास्पद है. राजेश मिश्रा जो समाजशास्त्र के प्रोफेसर हैं, उन्होंने फेसबुक पर मेरा लेख शेयर किया जो इंडियन एक्सप्रेस में छपा था. उसके चलते उनका पुतला जलाया गया, विरोध-प्रदर्शन किया गया, क्लास नहीं चलने दी गई और कुलपति ने उनको कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. अब देखिए कि मूर्खता किस हद तक जा रही है. वह लेख उन्होंने लिखा भी नहीं है. वह लेख उन्होंने सिर्फ शेयर किया है. उस लेख में कोई हिंसा का आह्वान नहीं है. उन्होंने कोई हिंसा का आह्वान नहीं किया है. लेकिन उनके खिलाफ हिंसा होती है और उन्हीं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया जाता है. तो हम लोग धीरे-धीरे कहां जा रहे हैं, यह तो समझ में आता है.

राष्ट्रवाद चूंकि इतनी धुंधली अवधारणा है कि कई चीजें घुल-मिल जाती हैं जैसे देशभक्ति और राष्ट्रवाद. अवधारणा में तो दोनों दो हैं, लेकिन यहां दोनों एक हो गए. राष्ट्र और राज्य दोनों एक हो गए, जबकि दोनों दो हैं. आप विरोध कर रहे हैं राज्य का लेकिन उसको कहा जा रहा है कि आप राष्ट्र का विरोध कर रहे हैं. देश की अवधारणा तो अलग है न! अपनी भाषाओं में देखें तो हम देश जाते हैं, परदेस जाते हैं. बिहार वालों का चटकल मजदूरों का परदेस कोलकाता हो गया. देश उनका अपना छपरा है, सीवान है. अगर आप पारंपरिक रूप से देखें तो उनका देश और परदेस तो इसी देश में हो जाता है. लोग अपनी मिट्टी में मरने की बात करते हैं. वे यह थोड़े कहते हैं कि मैं भारत में मरूंगा. कोई व्यक्ति जो रह रहा है दिल्ली में उसकी इच्छा होती है कि वह जाकर दफन हो वहीं पर, जहां से वह आया है. उसको आग वहीं दी जाए. तो यह एक दूसरी चीज है जिसे आप अपनी मिट्टी से प्रेम कह सकते हैं. वह राष्ट्रवाद नहीं है. क्योंकि वह तो राष्ट्र है नहीं. अगर मान लिया वह राष्ट्रवादी है तो वह क्यों दिल्ली में ही नहीं मर जाना चाहता है? क्यों वह अपने गांव जाकर ही मरना चाहता है या वहीं की मिट्टी में मिल जाना चाहता है? इसको काफी प्रगतिशील कदम माना जाता है कि अगर मैं लिखकर मर जाऊं कि मेरा शव मेरे गांव न ले जाया जाए. अगर पूरे राष्ट्र की भूमि एक ही है तो यह लगाव, यह खिंचाव क्यों होता है? यह अंतर है, इसको लोगों को समझना चाहिए. लेकिन यहां तो सब घालमेल कर दिया गया.

इसके उलट, राष्ट्रवाद तो एकदम नई अवधारणा है. जो आपका देश है, वही आपका राष्ट्र नहीं है, छपरा के व्यक्ति का देश तो छपरा या वहां का एक गांव मढ़ौरा है, जहां से वह आया है, लेकिन राष्ट्र तो भारत है. उसको यह समझाया है कि मढ़ौरा के मुकाबले भारत का इकबाल बहुत-बहुत ज्यादा है और मढ़ौरा के हितों को भारत के हित पर कुर्बान किया जा सकता है. यह जो भारत है, उसकी देश की जो समझ थी, जो पारंपरिक समझ है, उसके मुकाबले तो यह नई समझ है. इसमें भौगोलिक समझ शामिल है. यह एक भौगोलिक देश है, जिसकी एक चौहद्दी है, जिसके दक्षिण में यह है, उत्तर में यह है, पश्चिम में यह है, यह सब तो उसको बताया गया है कि यह ऐसा है. वह खुद इसका अनुभव नहीं करता है. अगर आप कहें कि मेरे अनुभव की सीमा से बाहर की चीज है. मैं इसकी कल्पना करता हूं, मुझे हर रोज यह बताया जाता है.

स्कूल में हम लोगों को जो चीज सबसे पहले याद कराई जाती थी वह भारत की चौहद्दी है. यह क्यों बताया जाता था? क्योंकि यह हमारे दिमाग में बैठ जाए. वह भारत कोई अपने आप अनुभव होने वाली चीज नहीं थी. मेरी जो मानवीय अनुभव की सीमा है, उस मानवीय की सीमा में तो भारत ही है. भारत अंतत: एक कल्पना है जिसके बारे में मुझे रोज-रोज बताकर उस कल्पना को मेरे दिमाग में बिठाकर उसको यथार्थ बना दिया जाता है, जिसका एक तिरंगा है, एक राष्ट्रगान है वगैरह-वगैरह. भारत इन्हीं के माध्यम से मेरे मन में मूर्त भी होता है और जीवित भी होता है. यह सब जो हो रहा है, वह बहुत स्पष्ट है. बीएचयू से संदीप पांडेय को तो नक्सली कहकर ही निकाला गया. नक्सली होना ही राष्ट्रविरोधी हो गया. वामपंथी होना ही राष्ट्रविरोधी होना हो गया. यह तो तय हो गया है. अब इसके बारे में बहस नहीं हो सकती. कुछ चीजें स्थापित कर दी गई हैं जिनके बारे में अब बहस की गुंजाइश नहीं है. जैसे आप यह नारा भारत में लगा सकते हैं कि नक्सलवादियों भारत छोड़ो. कैसे लगा सकते हैं यह नारा? आरएसएस वालों भारत छोड़ो यह नारा नहीं लग सकता लेकिन नक्सलवादियों भारत छोड़ो यह नारा लग सकता है. नक्सलवाद की विचारधारा से हमें आपत्ति हो सकती है, उनके तरीके से हमें असहमति हो सकती है, लेकिन नक्सलवादी जो सबसे गरीब लोगों के लिए लड़ते हैं, उनको आप कहते हैं कि भारत छोड़ो. यह बहुत विचित्र है लेकिन यह स्थापित हो चुका है.

अब रहा दलितों का प्रश्न, तो आरएसएस का कहना यह है कि एकमात्र मैं हूं, और कोई नहीं है. गांधी का भी व्याख्याता मैं हूं. आंबेडकर का भी व्याख्याता मैं हूं. मैं किसी और को व्याख्याता होने की इजाजत नहीं देता. हैदराबाद के आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन को लेकर, रोहित वेमुला जिससे जुड़ा था, उसके बारे में वेंकैया नायडू का बयान क्या है? उन्होंने कहा कि वह सिर्फ नाम का आंबेडकरवादी है. वह दरअसल, वाम का मुखौटा है. यह बात वे पहले दिन से कह रहे हैं कि आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन का दलितों से कोई लेना-देना नहीं है, वह दरअसल रेडिकल लेफ्ट का मुखौटा है जो राष्ट्र-विरोधी है, क्योंकि उसने याकूब मेमन की फांसी का विरोध किया. वे यह साबित कर रहे हैं कि इसकी इजाजत दलितों को नहीं है कि वे कौन-सी राजनीति करें और कौन-सी भाषा बोलें, क्योंकि वह हम उनको बताएंगे.

संबित पात्रा ने एक बहस में कहा कि आप दुर्गा के बारे में ऐसा नहीं बोल सकते. हमने कहा कि आप स्क्रिप्ट ताे नहीं देंगे न लिखकर कि हम क्या बोलें और क्या नहीं बोलें! आपकी दुर्गा महिषासुर मर्दिनी होगी. लेकिन जो महिषासुर का शहादत दिवस मनाएंगे, वह दुर्गा के लिए क्या बोलेंगे यह तो वे ही तय करेंगे. आप तो दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी बोले चले जा रहे हैं. आप तो यह ख्याल नहीं कर रहे हैं कि महिषासुर को देवता मानने वालों की भावना का क्या हो रहा है. उलटकर यह प्रश्न किया जाए कि उनकी भावनाओं का क्या हो रहा है. आप उनके शहादत दिवस में मत जाइए. आप अपना महिषासुर मर्दिनी दिवस मनाते रहिए. यह सब जो चल रहा है, इससे निपटना बहुत ही कठिन है. दो स्तर की लड़ाई हो गई है. एक लड़ाई है सांस्कृतिक और एक लड़ाई है राजनीतिक. अब यह पूरी लड़ाई सांस्कृतिक राजनीति में बदल गई है तो और भी कठिन हो गई है. अब देखिए कि यह कितना दिलचस्प है कि एक बहुत बड़ा तबका बिल्कुल खामोश बैठा है. वह है मुसलमानों का तबका. इस पूरी बहस में एक आवाज नहीं है. क्योंकि मान लिया गया है कि वे प्रासंगिक नहीं हैं. अब वे कैसे दावेदारी पेश करें इस भारतीय राष्ट्र पर? वे अपने को इस घोल में मिलाकर ही शामिल हो सकते हैं.

यह जो सांस्कृतिक राजनीति की लड़ाई है यह अभी और तीखी होने वाली है. इसकी तार्किक परिणति कुछ और भी हो सकती है इसके लिए लोगों को, पूरे भारत को तैयार रहना चाहिए, क्योंकि जिस दिशा में धकेल दिया गया है, उस दिशा में आप समाज के दूसरे तबकों को रोक नहीं सकते. तब वे अपनी भाषा में बात करेंगे. आज ऐसा लग रहा है कि वे चुप हैं, लेकिन वे क्यों चुप रहें और कब तक चुप रहें, कब तक अपमानित होते रहें? तो एक तो यह सांस्कृतिक स्तर की लड़ाई है. दूसरे, यह राजनीतिक स्तर की लड़ाई है, जिसमें भाजपा को काफी नुकसान होने वाला है दलितों और आदिवासियों की ओर से. यह तो बहुत स्पष्ट दिख रहा है. उन्होंने रोहित वेमुला और आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन को राष्ट्रविरोधी घोषित करने का जो दांव खेला है, वह उन्हें महंगा पड़ेगा. दलित और आदिवासी अब बेचारे नहीं हैं.

इस सबका रास्ता तो राजनीतिक संघर्ष है. लेकिन अभी जो दिख रहा है वह निराशाजनक है. अगर आज की बात करें तो. मेरी जो समझ है वह यह है कि जो कुछ चल रहा है वह बेहद अप्रसांगिक है. क्योंकि मसला क्या था? मसला राष्ट्रवाद तो है नहीं. मसला तो यह है कि राज्य ने अपनी हिंसा का प्रयोग गैर-आनुपातिक ढंग से किया. उसने आगे बढ़कर हैदराबाद और दिल्ली में छात्रों पर हिंसा का प्रयोग किया. प्रश्न है राज्य की राजनीतिक हिंसा का, जो एक खास तरह की राजनीति की भाषा में व्यक्त हो रही है. प्रश्न राष्ट्रवाद तो नहीं है, लेकिन पूरी संसद बैठ गई राष्ट्रवाद पर बहस करने, जैसे कि राष्ट्रवाद पर कोई सेमिनार हो रहा हो. बाहर हमले हो रहे हैं, लोगों को पीटा जा रहा है, लोगों को गलत ढंग से गिरफ्तार किया जा रहा है, बहस इस पर होनी चाहिए, न कि राष्ट्रवाद पर, लेकिन सब लोग वहां अकादमिक सेमिनार करने लगे. हर कोई राष्ट्रवाद की परिभाषा दे रहा है. जैसे कि इस बहस के खत्म होते ही यह मसला निपट जाएगा. आप जब संसद में बहस कर रहे हैं, उसी समय जम्मू में यह घटना हो गई, उसी समय लखनऊ में यह घटना हुई, उसी समय इलाहाबाद में प्रदर्शनकारियों पर हमला हो गया. मसला है कि लोगों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला हो रहा है. इस पर बहस होनी चाहिए थी. राजनाथ सिंह ने साफ झूठ बोला. वे झूठ बोलकर निकल कैसे गए और विपक्ष ने निकलने कैसे दिया? स्मृति ईरानी झूठ पर झूठ बोले जा रही हैं और निकलती जा रही हैं. अगर जवाबदेही तय करनी है तो विपक्ष इन मामलों में जवाबदेही तय करेगा, न कि राष्ट्रवाद पर बहस करने लगेगा.

मुझे दिख रहा है कि विपक्ष में फ्लोर मैनेजमेंट नहीं है, आपस में समन्वय भी नहीं है, और शायद स्पष्टता भी नहीं है. मसलन राहुल गांधी ने पहले दिन जेएनयू जाकर जो स्पष्टता दिखाई, या रोहित वेमुला मामले में, बाद में क्या कांग्रेस घबरा गई कि भाजपा उसे राष्ट्रवाद के मसले पर पीछे ले जाएगी? क्या कांग्रेस के जो ओल्ड गार्ड्स हैं, वे घबराए हुए हैं? जिन लोगों ने राजीव गांधी को सलाह दी होगी कि राम जन्मभूमि का ताला खुलवाया जाए, जिन्होंने बाबरी मस्जिद गिरने दी, क्या उसी तरह के लोग राहुल को पीछे खींचकर ले गए होंगे कि संसद में मत बोलिए. क्योंकि इससे तो कुछ भी पता नहीं चला कि दरअसल आप करना क्या चाहते हैं. मुझे लगता है कि विपक्ष की तैयारी नहीं है. विपक्ष से ज्यादा स्पष्टता और तैयारी छात्रों में थी, चाहे हैदराबाद के छात्र हों या जेएनयू के. यह सब काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. हम सब काफी लंबा खतरनाक समय झेलने को अभिशप्त हैं. यह सब पता नहीं कहां तक जाएगा.

माहौल यह है कि हम लोग आसानी से बात नहीं कर सकते. कक्षाओं में सहजता नहीं रह गई है. कोई भी चीज अब सहज नहीं रह गई है. माहौल पूरी तरह से तनावपूर्ण है और लोग कन्फ्यूज्ड हैं. मुझे लगता है कि भाजपा की रणनीति संभवत: यह थी कि लोगों के मन में बड़ा कन्फ्यूजन पैदा कर दो और टेम्प्रेचर लगातार ऊपर रखो. जितना टेम्प्रेचर ऊपर होगा, लोग सन्निपात की हालत में होंगे. समाज सन्निपात की अवस्था में होगा तो उसकी सोचने-समझने की शक्ति समाप्त हो जाएगी. उस समय आप कुछ भी कर सकते हैं. क्योंकि तब समाज की आत्म रक्षात्मक स्थिति भी समाप्त हो जाएगी. आप उस पर कब्जा कर लेंगे. स्थितियां बहुत खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं. यह लेख कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित है. यह लेख मार्च, 2016 में तहलका में छप चुका है.)

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...