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मंगलवार, 7 अगस्त 2018

गाय पर एक निबंध

वर्तमान भारत में गाय एक धार्मिक और राजनीतिक पशु है. सभी जाति धर्म के लोग गाय पालते हैं. राजनीति गाय पालने के नाम पर उन्मादी भीड़ पालती है. हिंदू गाय की पूजा करते हैं. नेता गाय के नाम पर हत्या करने वालों की माला पहनाकर पूजा करते हैं. गाय दूध देने के काम आती है. गाय दंगा कराने और वोट लेने के भी काम आती है. इसलिए पार्टियों के प्रवक्ता चैनलों पर तेज तेज आवाज में गाय की जबानी पूजा खूब करते हैं.
हिंदुओं में मान्यता है कि मरते वक्त आदमी से गोदान करवा दिया जाए तो वह गाय की पूंछ पकड़कर संसार रूपी वैतरणी पार कर जाता है. भारत के नेताओं में मान्यता है कि गाय के नाम पर अगर जनता में उन्माद भर दिया जाए तो चुनाव रूपी वैतरणी को पार किया जा सकता है.
हमारे देश में आजकल गाय के बहाने लोगों की भीड़ किसी को भी पीट पीटकर मार देती है. भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जहां तमाम किसान और पशु व्यापारी मारे जा चुके हैं. मरने वाले को देशद्रोही अथवा हिंदूद्रोही कहा जाता है जबकि भीड़ का तो कोई चेहरा नहीं होता इसलिए किसे पकड़ा जाए इसका धर्मसंकट बना रहता है. भीड़ बनकर मारने वालों में से अगर कोई पकड़ा जाए तो सरकार उन्हें 'भगत सिंह' और 'निर्दोष बच्चे' कहती है. पकड़े गए लोग जब जेल से छूटते हैं तो सरकार के मंत्री हत्या करने वालों को माला पहनाकर उनका स्वागत करते हैं. देश के सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि ये खूनी खेल बंद करो, लेकिन आदेश के तुरंत बाद एक और इंसान को पीटकर मारा गया. फिर उसे घायल मरने के लिए छोड़ दिया गया और गाय को सुरक्षित गोशाला पहुंचा दिया गया.
बुद्धूबक्सा की दुनिया के एक कुख्यात देशद्रोही रवीश कुमार ने अपने प्रोग्राम में दिखाया है कि पुलिस और नेता मिलकर हत्या करने वालों की भरपूर सुरक्षा करते हैं. गोरक्षा के नाम हत्या करने वाले गिरोहों की ख्याति पूरी दुनिया में फैल चुकी है. इसके चलते हमारे भारत की पूरी दुनिया में लगातार चर्चा भी होती रहती है. लगातार चर्चा होना हमारे ताकतवर होते जाने का प्रत्यक्ष प्रमाण है.
गाय बेजुबान जानवर है. वह बोल नहीं सकती. इसलिए वह पूछ भी नहीं सकती कि मैं किस राज्य में माता हूं किस राज्य में खाया जाने वाला जानवर. पार्टी और सरकारें गोरक्षा का नारा लगाती हैं. वे कुछ राज्यों में गोकुशी पर प्रतिंबध लगा देते हैं. लेकिन गोवा के विधानसभा में कहते हैं कि राज्य में गोमांस की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी. वे पूर्वोत्तर के राज्यों में भी लोगों को गोमांस खिलाने का वादा करके चुनाव जीतते हैं. जिस तरह सभी पार्टियों के नेता चुनाव में देसी ठर्रा बंटवाते हैं, उसी तरह कहीं गोकशी बंद कराने का तो कहीं शुरू कराने का वादा करते हैं.
एक चैनल पर एक वक्रोक्तिपात्र नेताजी से दूसरे नेताजी ने पूछा कि सब राज्यों में गाय काटने पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा देते, आप झूठ का सहारा क्यों लेते हैं? वक्रोक्तिपात्र नेताजी जोर से चिल्लाते हुए कहने लगे कि तुम आतंकवादी हो, क्योंकि हमारे धर्म और आस्था पर सवाल उठाते हो. इस न्याय से यह साबित होता है कि जिस तरह गोकशी पर प्रतिबंध से आस्था जुड़ी है, उसी तरह गाय के काटे जाने से भी आस्था जुड़ी है. शायद इसीलिए सरकारों ने बूचड़खानों को लाइसेंस भी दे रखा है. सरकार ने गाय की हत्या को वैध और अवैध में बांट दिया है. इसलिए हम कह सकते हैं कि लाइसेंसी गोहत्या, गोहत्या न भवति.
मौलाना मदनी और ओवैसी नामक कुछ प्रचंड देशद्रोहियों ने मांग की थी कि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देकर पूरे देश में गोहत्या पर प्रतिबंध लगा दिया जाए, लेकिन सरकारें चूंकि देश की सुरक्षा के लिए होती हैं इसलिए इन देशद्रोहियों पर कान नहीं दिया गया है.
अभी तक के अध्ययन में विद्वानों ने पाया है कि गोरक्षा के नाम पर हत्या वही लोग करते हैं जिन्होंने गाय को या तो इंटरनेट पर देखा है, या फिर सड़क पर आवारा घूमते और पालिथिन खाते देखा है. कोई भी गाय पालने वाले के पास हत्या करने का समय नहीं रहता. दो तीन गायों की परवरिश करने के लिए एक व्यक्ति को दिन के पांच छह घंटे मेहनत करनी होती है. जो किसान गाय पालते हैं, वे उससे प्रेम करते हैं. हिंदू परिवारों में लोग इस बात के लिए सतर्क रहते हैं कि गाय को बेचें भी तो किसी ऐसे के हाथ न पड़े जो गाय को कोई भी नुकसान पहुंचाए. वे खुद उसकी सेवा करते हैं, लेकिन उसकी सेवा के नाम पर किसी की जान नहीं लेते.
आजकल गाय पालने वाले किसानों का भी बुरा हाल है. सरकारी गोरक्षा के चक्कर में पशु मेले लगने बंद हो गए हैं. सरकारों ने कांजी हाउस भी बंद कर दिए हैं जहां आवारा पशु लाकर छोड़ दिए जाते थे. पशुओं की खरीद बिक्री भी बंद हो गई है. अब जो पशु किसान के काम नहीं आ सकते, वे उसे बेच सकते नहीं, इसलिए आवारा छोड़ देते हैं. फिर वे जानवर उन्हीं के खेतों में चरते हैं और फसलें तबाह कर देते हैं. हर इलाके में सैकड़ों की संख्या में आवारा गायें और सांड़ घूमते दिख रहे हैं. किसानों ने इन जानवरों से फसल की सुरक्षा के लिए खेतों में ब्लेड वाला तार लगा दिया है. इन ब्लेड खेत में घुसने का प्रयास करने पर गाय बुरी तरह घायल हो जाती है. कुछ दिन में उसका घाव सड़ जाता है, उसमें कीड़े पड़ जाते हैं. कभी वह बच जाती है, कभी कभी मर भी जाती है. घूमने वाले जानवरों में तमाम घायल जानवर आपको दिख जाएंगे.
कुछ राज्यों में सरकार ने गायों की सुरक्षा के नाम पर गोशालाएं खोली हैं. अब चूंकि किसानों का पूरा परिवार मिलकर गायों की देखभाल करता है. सरकार इतने लोग कहां से लाए. परिणामस्वरूप गोशाला में सैकड़ों की संख्या गाएं भूखों मर जाती हैं. हमारी दादी कहती थीं कि गाय बोल नहीं सकती. अगर उसे खाना पानी समय पर न दो तो पाप लगता है. फिर आदमी नरक में जाता है. गायों को गोशाला नामक नरक में रखने की योजना जिसने बनाई होगी उसे नरक में जाना पड़ेगा. सुना है कि नरक में जो लोग बड़ा पाप करके जाते हैं, उनको पकौड़े की तरह बड़े से कड़ाहे में तला जाता है. हमें नरक के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. हो सकता है कि यह नरक लोक की कोई रोजगार योजना हो जिसमें युवा पकौड़े तलते हों!
आदिकाल में गाय एक पशु मात्र थी. फिर संस्कृति के विकास के साथ लोग प्रकृति की पूजा करने लगे तो उपयोगी जानवरों की भी पूजा करने लगे. गोवंश धार्मिक पशु हो गया. फिर 21वीं सदी में राजनीति गाय के नाम पर लोगों की जान लेने लगी. अब गाय सियासी पशु बन चुका है. हमारे सियासतदां उन उन चीजों की रक्षा का नारा लगाते हैं जो भारतीय जनता की भावनाओं से जुड़ी है, मसलन— धर्म, संस्कृति, देश, मात्रभूमि, देशभक्ति आदि-इत्यादि-अनादि. भगवान राम और गाय माता इसी नारेबाज सियासत के चंगुल में फंस गए हैं. जब तक इसका कोई निदान नहीं होता तब तक हमें यह मानना चाहिए कि एक दिन कोई कृष्ण आएगा जो इन गायों को सियासत के चंगुल से बचाएगा और गाय के नाम पर लोगों को लड़ाने वालों को लाठी लाठी बजाएगा.

नोट: यूपीएससी के छात्र इस निंबंध को न रटें वरना नंबर के नाम पर अंडा मिलेगा. देशद्रोही लोग इसे रट लें, जहां भी सुनाएंगे, डंडा मिलेगा.

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

भगत सिंह का भय सच निकला

ऐसा कुछ नहीं घटा मेरे सामने 
कि कोई महिला प्रधानमंत्री की कॉलर पकड़कर पूछे- 
आज़ादी से क्या मिला?
और प्रधानमंत्री मुस्कराकर कहे-
प्रधानमंत्री की कॉलर पकड़ने की आज़ादी 


ऐसा भी नहीं हुआ कि भगत सिंह से प्रेरित बच्चों ने 
'दुर्गा' बन चुकीं प्रधानमंत्री को 
न घुसने दिया हो अपने प्रांगण में 
और उन्हें देशद्रोही भी नहीं कहा गया हो

हमारे समय में प्रधानमंत्री शोहदों का 'फॉलोवर' है 
हत्यारों को नेताओं का संरक्षण है 
एक विचारधारा है मजहबी उन्माद
इंसानों से घृणा को कहते हैं राष्ट्रवाद
विकास एक ब्लैक होल है जिसमें 
सवा अरब इंसानों को कुदाया जा रहा है 
नये भारत के सपने की खोह जाती है 
एक मंदिर के प्रांगण में 
जिसे उन्माद का सबसे पैना हथियार बना लिया गया है 
क़ानून ऐसी हंसिया है जिससे 
ताक़तवर चाहे दातून छीले 
चाहे तो काट ले किसान की गर्दन

क्या कल यही दर्ज होगा हमारे समय के बारे में?

तवारीख़ में कैसे दिखेंगे हम 
बर्बादी की पहली सीढ़ी के बारे में 
क्या दर्ज होगा किताबों में 
कोई बच्चा मुझसे पूछेगा- 
हिंदुस्तान में लिंचिंग कब शुरू हुई?
गाय के लिए पहला आदमी कौन मारा गया सरकारी निगहबानी में? 
या फिर 
हिंदुस्तान में पहली बार मुर्दे पर मुकदमा कब दर्ज हुआ?

तब क्या कहेगी मेरी लरजती बूढ़ी ज़बान 
क्या मैं अपनी आत्मा में एक कुटिल मुस्कान दबाकर 
नेहरू का नाम बताऊंगा?

अगर वह पूछ ले- 
यह नेहरू सौ साल बाद भी 
हर काम का ज़िम्मेदार कैसे हुआ 
तो क्या तवारीख़ 1955 में पैदा करेगी कोई काल्पनिक अख़लाक़ 
जिसे पाकिस्तानियों ने पीटकर मारा! 
तो क्या जैसे प्रधानसेवक ने तक्षशिला को बिहार में ला पटका, 
वैसे दादरी लाहौर में बताया जाया जाएगा, 
या सबकुछ कहा जायेगा वैसे ही 
जैसे घट रहा है!

एक बर्बर देश अचानक पैदा नहीं होता 
वह धीरे धीरे बनता है लोगों के दिमाग में 
फिर ज़मीन का वह टुकड़ा 
होता जाता है ख़ौफ़नाक 
जहां वे दिमाग चलते फिरते हैं

पहली बार ही कोई मंत्री पहनाता है हत्यारों को फूलों की माला 
पहली ही बार कोई नेता कहता है 
किसी बर्बर को भगत सिंह 
अखबार कहते हैं यह तो फ्रिंज एलिमेंट हैं 
और फ्रिंज बनाते जाते हैं मज़बूत मुख्यधारा

कितना अच्छा होता 
कि मैं 1905 में पैदा होता 
जब भगत सिंह को रही होती फांसी 
उसी दिन मेरे गांव में 
गोरों के नमक में सीझा कोई भूरा सिपाही 
मुझे भी गोली मार देता 
इंसानों के लिए कुर्बानी के दौर में 
अच्छी होती है एक गुमनाम मौत 
कम से कम यह न देखते हम
कि भगत सिंह और बिस्मिल के देश में पीट पीट कर मार दिया जाता है अखलाक़ों को 
फिर इसके बाद सरकार किसी निर्दोष के हत्यारों को
भगत सिंह का वारिस कहती हैं!

मां को लिखे पत्र में 
भगत सिंह का भय सच निकला 
भूरा साहेब गोरे से ज़्यादा क्रूर निकला।


(15 जुलाई, 2018)

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

मोदी जी के पीएम बनने के बाद संघ के लोगों को चर्बी चढ़ गई है : जिग्नेश मेवाणी

गुजरात में मरी गाय की चमड़ी उतार रहे कुछ दलित युवकों की पिटाई के बाद हजारों की संख्या में दलित
समुदाय के लोग सड़कों पर उतरे. इस उभार के नेतृत्व के केंद्र में जो एक नाम उभर कर आया वह है जिग्नेश मेवाणी. युवकों पर हुए अत्याचार के बाद जिग्नेश सक्रिय हुए और दलित समुदाय के लोगों को इस बात की घोषणा के लिए राजी किया कि अब वे न तो मैला उठाएंगे, न ही मरे हुए पशुओं की चमड़ी उतारने का काम करेंगे. 1980 में मेहसाणा में जन्मे जिग्नेश के पिता क्लर्क थे. अंग्रेजी साहित्य से ग्रैजुएट जिग्नेश पत्रकार भी रह चुके हैं. वे विभिन्न मोर्चों पर सामाजिक कार्यों से जुड़े रहकर दलितों, मजदूरों व किसानों के मुद्दे उठाते रहे हैं. फिलहाल वे वकालत कर रहे हैं. वे गुजरात में आम आदमी पार्टी से भी जुड़े थे, लेकिन 21 अगस्त को उन्होंने इस्तीफा दे दिया. जिग्नेश एक तरफ तो कह रहे हैं कि उनका आंदोलन पूरी तरह सामाजिक है और वे पार्टी नहीं बनाएंगे, लेकिन वे यह भी बयान दे चुके हैं, ‘200 प्रतिशत मैं राजनीति में आऊंगा. लेकिन मैं आम आदमी पार्टी से इसलिए जुड़ा हूं ताकि दलित समुदाय के लिए जो करना चाहता हूं वह सब कर सकूं.’ दलित आंदोलन के बारे में उनकी रणनीतियों और मांगों को लेकर उनसे मेरी बातचीत...

हमारे समाज में गाय को आधार बनाकर छुआछूत की परंपरा पुरानी है. पर अब इसके बहाने दलितों को पीटा जा रहा है.

देखिए, और कोई पशु माता नहीं है तो गाय ही माता क्यों है? यह सबसे अहम सवाल है. गाय को पवित्र बनाकर लंबे अरसे से एक राजनीति चल रही है जिसको संघ परिवार कई दशकों से भुनाता आ रहा है. अब उसी का परिणाम गुजरात में देखा जा रहा है. दलितों का उत्पीड़न कांग्रेस के समय भी होता रहा है, लेकिन मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद संघ परिवार के लोगों को इस तरह चर्बी चढ़ी है कि वे बेखौफ महसूस कर रहे हैं. इन लोगों को दिनदहाड़े अपराध करते हुए कोई डर नहीं है, बल्कि वे खुद वीडियो बनाकर प्रसारित करते हैं क्योंकि इसकी गारंटी है कि पुलिस और प्रशासन उनको बचा लेगा. वे जानते हैं कि वे जो कर रहे हैं उसको प्रश्रय देने वाली राजनीति मौजूद है.

हमें ये मंजूर नहीं है. हम पदयात्रा लेकर निकले और 15 अगस्त को ऊना में सभा की. हमने नारा दिया है कि गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी जमीन दो. आप मरी गाय की चमड़ी उतारने पर हमारी चमड़ी उतार लेंगे? तो आप अपनी गाय से खेलते रहो. हमें न जिंदा गाय से मतलब है, न ही मरी गाय से. हमें जमीनों का आवंटन करो. हम रोजगार की ओर जाएंगे. जिस पेशे के लिए हमें अछूत घोषित किया गया, अब उसी के लिए हमारी चमड़ी उधेड़ रहे हो, यह कैसे चलेगा? जब तक हमारी सारी मांगें मानी नहीं जातीं, हम यह आंदोलन बंद नहीं करेंगे. हमें भारत के अन्य राज्यों और विदेशों से भी समर्थन मिल रहा है.

गोरक्षकों को लेकर प्रधानमंत्री ने बयान दिया, इसके बावजूद घटनाएं रुक नहीं रही हैं. आंध्र की घटना बयान के बाद की है.

ये जो गुंडे लोग हैं, गोरक्षा के नाम पर संगठन चलाते हैं, इन सबको बैन करना चाहिए. लेकिन इससे भी ज्यादा गाय के नाम पर राजनीति खत्म करने का मसला है.  वरना ये सब होता रहेगा. मोदी साहेब का जो बयान आया है उस पर मैं कहूंगा कि भाजपा और संघ परिवार के लोग बहुत गाय माता की दुम हिला रहे थे. अब जिस तरह हजारों की संख्या में दलित शक्ति सड़कों पर उतर आई, जिस तरह से यह आंदोलन फैल रहा है, कहीं न कहीं मोदी साहेब और भाजपा को लग रहा है कि गाय की दुम अब उनके गले का फंदा न बन जाए, तब उन्होंने मुंह खोला है.

क्या मांगें हैं आपकी?

हमारी मांग है कि जिस तरह से कुछ लोगों ने दलित समाज को आतंकित किया है, जब भी उनको बेल मिले तो उन्हें तड़ीपार किया जाए. वीडियो में जो लोग पहचाने गए हैं, उन्हें गिरफ्तार किया जाए. जो पुलिसकर्मी दोषी हैं उनके खिलाफ कार्रवाई हो.  सुरेंद्र नगर में सितंबर 2012 में दो बेगुनाह दलित लड़कों को एके-47 से भूनकर मारा गया था. उसमें तीन एफआईआर हुईं. दो मामलों में चार साल बाद भी चार्जशीट दाखिल नहीं हुई. आरोपी कांस्टेबल गिरफ्तार नहीं हुआ. उस मामले में कार्रवाई हो. गुजरात के सारे जिलों में कानूनी प्रावधान के मुताबिक स्पेशल कोर्ट गठित की जाएं. जो दलित मरे जानवरों का काम नहीं करना चाहते वे और जो भी भूमिहीन दलित हैं, उनको पांच-पांच एकड़ जमीन का आवंटन हो. पहले जो जमीनें बांटी गईं उन पर अभी तक दलितों को कब्जा नहीं मिला है. वह सुनिश्चित किया जाए. गुजरात में रिजर्वेशन एक्ट ही नहीं है. रिजर्वेशन पॉलिसी बने और लागू की जाए. शेड्यूल कास्ट और शेड्यूल ट्राइब्स सबप्लान है, उसके पैसे जनरल कामों में खर्च होते हैं. सरकार एंबुलेंस खरीदती है और कहती है कि एंबुलेंस से तो सब जाएंगे चाहे सवर्ण हों या पिछड़े-दलित हों. हमारी मांग है कि ऐसा कानून बनाया जाए कि उनके लिए आवंटित पैसा उन्हीं पर खर्च हो. इसके अलावा फॉरेस्ट ऐक्ट के तहत आदिवासी समुदाय की जो एक लाख 20 हजार एप्लीकेशन पेंडिंग हैं, उन सभी को क्लियर करें.

15 अगस्त की रैली से लौट रहे दलितों पर हमले की खबर सही है?

बिल्कुल सही है. 13 घंटे तक लगातार हमले हुए हैं. दिन के 12 बजे से लेकर रात 1 बजे तक फायरिंग होती रही. यह सोची-समझी साजिश के तहत हुआ. गोरक्षक गुंडे झाड़ियों में छिपकर हमले कर रहे थे. पहले जो लोग रैली में शामिल होने आ रहे थे, उनकी गाड़ियों के कांच तोड़े गए, मारा-पीटा गया, मोबाइल छीने गए. फिर जब लोग वापस जा रहे थे तब हर नाके पर लोगों को पीटा गया. गुंडों ने बस में घुसने की कोशिश की. कई अस्पतालों में लोग भर्ती हैं. हम पुलिस को लगातार सूचना दे रहे थे, पेट्रोलिंग करवाने की कह रहे थे. बार-बार कहा गया कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं. पुलिस को एहतियातन यह सब पहले ही करना था, लेकिन पुलिस ने हमले होने के बाद भी कुछ नहीं किया. एक तरफ मोदी जी कहते हैं कि गोरक्षा के नाम पर फर्जी लोग दुकान खोलकर बैठे हैं. दूसरी तरफ गोरक्षकों को पुलिस ने खुली छूट दे रखी है. कि वे जब चाहें तब दलितों को मारें.

क्या रैली के पहले से अंदाजा था कि दलितों पर हमले हो सकते हैं?

हां बिल्कुल, रैली से पहले भी हमले हुए. रैली में न आने के लिए लोगों को धमकाया गया. रास्ते में लोगों की गाड़ियों पर हमले हुए, मारपीट की गई. इस बारे में हमने पुलिस के सभी बड़े अधिकारियों को बताया, लेकिन पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया. उसके एक दिन पहले छोटी-सी बाइक रैली निकली थी. वहां भी गोरक्षक गुंडों ने हमला किया. दलित युवकों की पिटाई करने वाले 20 आरोपी एक ही गांव के हैं. वे भी हमले में शामिल रहे. इस पर भी एक्शन नहीं लिया गया. जिन युवकों को मरी गाय उठाने के लिए पीटा गया था, उनके परिजनों पर भी हमला होते-होते बचा. उन्हें करीब 7 घंटे थाने में बैठाए रखा गया. हमने पुलिस से पीड़ित परिवारों को सुरक्षा दिए जाने मांग की थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह सब हमारी रैली और आंदोलन को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है.

क्या इसे वैसी स्थिति माना जाए जैसी 2002 में थी ?

बिल्कुल, बिल्कुल. एकदम यही हो रहा है,  उससे भी ज्यादा. एक गांव है सामखेड़, वहां के लोगों ने दलितों को 13 तारीख को पीटा, 14 को पीटा, 15 को भी हमला किया. आज 16 तारीख है, वे लोग हमले कर रहे हैं, लेकिन गांव से एक भी गोरक्षक को पकड़ा नहीं गया है. हम असहाय महसूस कर रहे हैं.

आपने जो मसले उठाए थे, वे दलित समाज के बड़े मसले हैं जिन पर अभी तो कोई बातचीत शुरू ही नहीं हुई. उस पर ये हमले भी हो रहे हैं. जाहिर है कि चुनौती और बढ़ रही है. मुश्किलों को देखते हुए आगे की क्या रणनीति होगी?

हमने कॉल दी है कि हमारी जो दससूत्रीय मांगें हैं, उनमें से एक है जमीन का आवंटन. उस पर विचार करके जमीन आवंटन की प्रक्रिया शुरू करो. यदि नहीं करोगे तो हम 15 सितंबर को रेल रोको आंदोलन करेंगे. इसकी घोषणा हम एक तारीख को करेंगे.

आपके आंदोलन की लीडरशिप पर सवाल उठ रहे हैं कि इसका कोई संगठित नेतृत्व नहीं है. पार्टियों ने ये आंदोलन हाईजैक कर लिया है. लीडरशिप को लेकर कशमकश की बात कही जा रही है.

ऐसा हुआ कि हम लोगों की मर्जी के खिलाफ कुछ पॉलिटिकल एलिमेंट स्टेज पर गए. हमने उन्हें बार-बार कहा भी कि हमारी आयोजन टीम है तय करेगी कि स्टेज पर कौन बैठेगा. लेकिन इसके बावजूद जब वे लोग नहीं माने तो हमने अपना कार्यक्रम कर लिया. रोहित वेमुला की मां और कन्हैया ने अपना भाषण दिया. आनंद पटवर्धन ने उन गुजराती साहित्यकारों को 25 हजार का चेक दिया, जिन्होंने गुजरात सरकार का 25 हजार का अवॉर्ड वापस किया था. इसके बाद हम लोगों ने स्टेज छोड़ दिया कि जिसे जो करना है, करे. जहां तक लीडरशिप की बात है तो कोई भी आंदोलन खड़ा होता है तो दो-चार लोग तो ऐसे रहेंगे जो विरोध करेंगे. जिनको नहीं पसंद आएगा, वे विरोध में खड़े हो जाएंगे. पर हजारों की तादाद में लोग हमारे साथ हैं.

कन्हैया कुमार आपकी मर्जी से आए थे या वे भी जबरन पहुंचे?

यह ओपन कार्यक्रम था. कन्हैया कुमार भी आए. बाकी लोग भी आए. कन्हैया तो हमारे संघर्ष का साथी है, इसलिए हमने उसको बुलाया था और हमें उसके आने की खुशी भी है.

25 गांवों के दलितों के बहिष्कार की खबरें आ रही हैं. क्या ये सही हैं?

बिल्कुल हो सकता है. अभी मुझे पक्की सूचना नहीं है. खबरें मिली हैं. मैं इसे अभी कंफर्म कर रहा हूं. अगर ये हो रहा है तो ये बहुत आश्चर्यजनक है. मुझे याद आता है कि बिल्कुल इसी तरह की घटना महाड़ सत्याग्रह के वक्त हुई थी. जब बाबा साहब दलितों के साथ निकले थे, तब उन पर सवर्णों ने हमला किया था. हम पर भी हमला किया गया. वह भी एक ऐतिहासिक घटना थी, यह भी एक ऐतिहासिक घटना है कि दलितों ने शपथ ली कि हम मरे हुए जानवर नहीं उठाएंगे. उस समय भी दलितों का बहिष्कार हुआ था, यहां भी वही हो रहा है.

आपका आंदोलन काफी बड़ा हो गया है. कहीं ये हाईजैक न हो जाए, सरकार या किसी पार्टी के लोग इसे दबा न दें, इसके लिए आपने क्या रणनीति बनाई है?

आने वाले दिनों में हम रेल रोको कॉल दे रहे हैं. इसमें देश भर से लोग आएंगे. अब गुजरात सरकार एक्सपोज होने वाली है. अगर वह दलितों को जमीन का आवंटन नहीं करती तो उसका असली चेहरा सामने आ जाएगा कि वे चाहते हैं कि हम मैला उठाएं या मरे हुए पशु उठाते रहें. आगे की रणनीति वही है, जो हमने कल मंच से कहा था कि आदिवासी समुदाय की जंगल समस्याओं से जुड़ी एक लाख 20 हजार एप्लीकेशन पेंडिंग हैं. गुजरात सरकार उसका भी निदान करे. हम आदिवासी समुदाय को अपने साथ जोड़ेंगे. हमने कहा था ‘गुजरात मॉडल मुर्दाबाद, दलित-मुस्लिम एकता जिंदाबाद’ तो मुस्लिम समुदाय के संगठन भी हमारे साथ आए हैं. हम अपने संघर्ष में किसानों और मजदूरों को जोड़ेंगे. जितने पीड़ित समुदाय हैं, हम सबको साथ लेंगे और जमकर मुकाबला होगा. जब तक मैं लीडरशिप में हूं, यह आंदोलन सिर्फ दलितों का नहीं रहेगा, बल्कि सभी वंचित समुदायों का होगा, दलित जिसका नेतृत्व करेंगे.

गुजरात में अलग-अलग पार्टियों में जो दलित नेता हैं उनका क्या स्टैंड है? क्या वे आपके समर्थन में आए हैं?

नहीं, वे चुपचाप बैठे हुए हैं. जैसे प्राइमरी के बच्चे होते हैं, टीचर उंगली उठाकर इशारा कर दे तो चुपचाप शांत हो जाते हैं, उनकी वही हालत है.

यह स्पष्ट कीजिए कि यह राजनीतिक आंदोलन है या सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन?

एक सौ प्रतिशत यह राजनीतिक होगा. हमारी जो मांग है वह राजनीतिक है. मैं यह पूछता हूं कि ग्लोबलाइजेशन की पॉलिटिकल इकोनॉमी में लोगों के पास रोटी क्यों नहीं है? यह राजनीति है. आजादी के इतने दशकों के बाद दलितों के पास जमीन का टुकड़ा क्यों नहीं है? ये राजनीति है. ये लोकसंघर्ष और आंदोलन की राजनीति है. वो राजनीति हम करेंगे. पार्टी पॉलिटिक्स हम नहीं करेंगे. हमारी समिति अराजनीतिक संघर्ष समिति है, ये बनी रहेगी.

दिल्ली में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन हुआ था. बाद में यह कहकर उन्होंने पार्टी बनाई कि अब इसके बगैर काम नहीं चल सकता. क्या आप भी इस आंदोलन के जरिए कोई पार्टी बनाएंगे?

ऐसी कोई संभावना नहीं है. हम इसे सामाजिक आंदोलन की तरह चलाएंगे. हजारों की तादाद में दलित उठ खड़े हुए हैं कि हम मरे हुए जानवर नहीं उठाएंगे. हमने बहुत बड़े परिवर्तन की नींव रखी है. डॉ. आंबेडकर के बाद इस तरह मृत पशु उठाने से इनकार करने की कोशिश नहीं हुई. हम इसे पूरे देश में ले जाएंगे.  हमने नारा दिया है कि ‘गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी जमीन दो’.

क्या इस आंदोलन के पहले भी आपकी सामाजिक या राजनीतिक सक्रियता रही है?

इसके पहले मैंने डॉ. मुकुल सिन्हा के जनसंघर्ष मंच के साथ स्वयंसेवक के रूप में आठ साल तक काम किया है. वहां मैंने ट्रेड यूनियन के लिए भी काम किया. उसमें सफाई कर्मियों के सवाल उठाए. मजदूर अधिकार संगठनों के साथ जुड़ा रहा. कंस्ट्रक्शन वर्कर्स और ईंट भट्ठे के मजदूरों के साथ काम किया. निजी तौर पर मैंने दलितों की जमीनों के मुद्दे पर छह-सात साल काम किया है. जमीन सुधार मेरा प्रमुख एजेंडा है. चार साल तक पत्रकारिता भी की है. इसके अलावा मैं गुजरात में आम आदमी पार्टी का सदस्य भी हूं.
(यह इंटरव्यू तहलका हिंदी पत्रिका के अगस्त, 2016 के अंक में छप चुका है.)

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

गाय, गोबर और गोमूत्र विज्ञान

चूंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुताबिक, सारी दुनिया का ज्ञान वेदों निकला है. और समस्या का समाधान गोबर और गोमूत्र में है. इसलिए हमने गोबर और गौमूत्र पर शोध शुरू किया है.

पहला ज्ञान:

दुनिया का पहला एक कोशिकीय जीव विराट हिंदू था और वह गाय के गोबर से अवतरित हुआ. यहीं से गोबरवाद की नींव पड़ी. अब पहला एक कोशिकीय जीव बनने से पहले गाय कहां से आई, यह सवाल पूछना गोबर के अवतरण पर सवाल है. इसे गोबरनिंदा कहा जाएगा जो ईशनिंदा के बराबर वाली कुरसी पर बैठा है. सवाल उठाने वाला देशद्रोही माना जाएगा. गोबर महात्म्य पर सवाल करना देशद्रोह है.
गोबर महिमा विशुद्ध आस्था का मामला है. देश और देवता दोनों ही गोबरवादियों के लिए आस्था के मामले हैं, क्योंकि दोनों ही मूर्खता की कंचनजंघा पर विराजमान हैं.
तो भइया हुआ ये कि पहले जीव के धरती पर अवतरित होने के साथ ही भारतवर्ष में गोबर विज्ञान की भी शुरुआत हुई. दुनिया का विकास कैसे हुआ इसका राज गोबर में छुपा है. डारबिनवा ने जो कहानी रची है, वह सब फर्जी है. गोबर से प्रत्येक जीव-जंतु और संपूर्ण चराचर जगत की व्युत्पत्ति हुई है. गोबर में मौजूद स्थूल तरंगों से भौतिक संसार का निर्माण हुआ और सूक्ष्म तरंगों व अणुओं से परलोक निर्मित हुआ. इसीलिए एक बिचारी गाय के अंदर 33 करोड़ देवता निवास करते हैं. यह बात गाय को मालूम हो न हो, पर गोबरवादियों को मालूम है.
कालांतर में गोबर की शक्ति बढ़ती गई. देवताओं का जो आकाशवाणी सिस्टम था, वह वायु तरंगों पर आधारित था, जिसका नियंत्रण कक्ष एक गोबर गृह में बना था. गोबर ब्रम्हांड में मौजूद तरंगों से लेकर परमाणुओं और अणुओं तक को नियंत्रित करता है. इसलिए कुछ लोग अपने दिमाग को तरंगों के प्रभाव से बचाने के लिए उसमें गोबर भर लेते हैं. अदृश्य ग्रंथों में लिखा है कि 'दिमाग में गोबर भरा है' किसी के लिए ऐसा कहना भारतीय मूर्ख परंपरा का अपमान करना है. दिमाग में गोबर होना ज्ञान और गौरव की बात है.

दूसरा ज्ञान:

ओलंपिक में कीर्तिमान रचने वाले माइकल फेल्प्स का असली नाम माणिकलाल रामफल पासी है. वह विराट भारतीय हिंदू है. बचपन में वह संघ की शाखा में जाता था. संघ गौसेवा प्रमुख शंकरलाल जी ने उसे अपने भीतर सत्व गुण बढ़ाने की शिक्षा देते थे. फलीराम पासी रोज सुबह शाम ढाई सौ ग्राम गोबर और पांच ग्राम मूत्र से बना पंचगव्य बनाकर पीता था. फलस्वरूप उसने वह शक्ति हासिल कर ली कि जहां भी सोने की प्रतियोगिता होगी, वह सबसे अधिक सोना जीत लेगा. पानी में तैरकर उसके अणुओं से भी सोना निकाल लेना माणिकलाल भाई की खूबी है. यह कौशल उन्हें इसलिए प्राप्त हुआ क्योंकि गोबर और गोमूत्र में सोना पाया जाता है. माणिकलाल रामफल पासी का 1985 में अपहरण करके उसे अमेरिका ले जाया गया था. विराट खुफिया ज्ञान बताता है कि अमेरिका से भारत ने गेहूं खरीदा था. गेहूं के खाली बोरों में भरकर उसे अमेरिका ले जाया गया था. तबसे अमेरिका उसके नाम पर तमाम ख्याति बटोर रहा है. माणिक भाई का चेहरा देखिए, क्या तेज है. वह गोमूत्र और गोबर के दैवीय गुणों का प्रभाव है. भारत के साथ जितनी साजिशें हुई हैं, यह भी उनमें से एक है.

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

किस्सा-ए-गोरक्षा उर्फ गाय पर चर्चा

आज सुबह सुबह गोरक्षा दल के एक सिपाही से गाली खाकर अपने एक भूतपूर्व मित्र की याद ताजा हो गई. एक महीने पहले की दुर्घटना है जब मेरा वह मित्र शहीद हो गया था.
हुआ यह कि दिल्ली चुनाव में धुलाई हो जाने के बाद संस्कारवान कुनबा कनफ्यूजनात्म अवस्था को प्राप्त हो गया. राम मंदिर में जो निवेश आडवाणी जी ने किया था, वह अब दुहने के काबिल नहीं बचा था. तो कुनबे को अचानक गाय की याद आ गई. गाय दुधारू जानवर तो है ही, सियासत में भी उसे दुहा जा सकता है, जहां दूध की जगह वोट निकलता है.
तो दिल्ली चुनाव के बाद और बिहार चुनाव के पहले उक्त मित्र भूतपूर्व हो गए, क्योंकि वे गोरक्षा के लिए शहादत को तैयार थे.
उनके शहादत की कहानी भी बड़ी मारू है. ऐसे ही एक दिन उनके गायात्मक भावुक उच्छवास के दौरान उनसे पूछ लिया कि मित्र आपने कभी गाय पाली है? कभी पूजा पतिंगा किया है या ऐसे ही भावुक हुए जा रहे हैं? वे तुनक कर बोले— तुम सब वामपंथी लोग देशद्रोही हो. मैंने कहा, हम वामपंथी कैसे हुए? और हम लोग कौन? मैं तो तुम्हारे साथ हूं और तुमको माइनस कर दिया जाए तो अकेला हूं.
तो बोले— तुम लोग मतलब रवीश कुमार वगैरह! तुम सब देशद्रोही हो. अब देशद्रोहियों का सफाया ही एकमात्र चारा है. मैं चकरायमान हो गया. गाय पर चर्चा के दौरान रवीश कुमार, देशद्रोह और सफाये का प्रवेश अवांछनीय था.
उसने आगे कहा, जो गाय नहीं पालता, वह भी दूध पीता है न! उसी तरह जो गाय नहीं पालता, उसे भी तो गाय की रक्षा करने का हक है! कभी गाय पाली नहीं है तो क्या हुआ, यूट्यूब पर तो देखी है! गाय हमारी माता है. गाय पर देवता रहते हैं.
मैंने माहौल सेंसेटिव देखा तो तुम से आप पर आ गया. मेरा मित्र आहतातुर हो गया था. मामला बढ़ने पर वह हत हो सकता था. इसलिए संभलकर मैंने पूछा— जो यूट्यूब वाली गाय आपकी माता है, वह जानवर है जो लावारिस अवस्था में घूमता पाया जाता है और कूड़ा भी खाता है! आप उसे ऐसे नारकीय हालत में कैसे छोड़ देते हैं? गाय पर देवता रहते हैं तो गाय को रस्सी से छांदकर, डंडे से मारकर दुहते हैं, उसके बच्चे यानी आपके भाई के हिस्से का दूध निकाल लेते हैं, उसे कुपोषित बना देते हैं, बच्चा मर जाता है तो इंजेक्शन लगाकर गाय को दुहते हैं. माता के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार होता है. उस पर वास करने वाले देवता भी लगता है सोमरस पीकर मगन रहते हैं. गाय की पीठ पर पड़ने वाला डंडा उनको भी तो लगता होगा. बेचारे क्रिया की प्रतिक्रया नहीं देते, वरना तीन चार हजार कपूतों को तो यूं ही निपटा देते.
दोस्त उखड़ गया. तुम लोग मुसलमानों के कोठे के दलाल हो. मुसलमान गाय खाता है. मुसलमान देशद्रोही है. तुम लोग उनका साथ देते हो. तुम लोग भी देशद्रोही हो. धर्म के नाम पर कलंक हो. मुसलमान आतंकवादी होता है. उसे सबक सिखाना होगा. जो गाय मारता है, उसको काट दिया जाएगा.
मेरी घिग्घी, जहां कहीं होती होगी, वहीं बंध गई. मैंने धीरे से पूछा— मेरे भाई, लेकिन जीव हत्या भी तो पाप है! और गाय पर रहने वाला देवताओं ने आपको कमांडो नियुक्त किया है क्या कि मेरी और गो माता की रक्षा करो? हमारा धरम कहता है कि ईश्वर की मर्जी से पत्ता भी नहीं हिलता. हो सकता है कि ईश्वर की मर्जी हो कि मुसलमान गोमांस खाता हो. उसको उसके कर्म का फल मिलेगा...
वह गुस्से में एकदम तपतपायमान अवस्था में पहुंच गया था, कांपते हुए वह बोला— एक मुल्ले ने अपनी बेटी को दुपट्टा नहीं लेने के लिए मार डाला. आईएसआईएस वाले सबको मार रहे हैं. हिंदुओं पर खतरा है...
उसके बात बदलने से मुझे लगा कि कुछ बात बनेगी. मैंने कहा, मेरे दोस्त, आईएसआईएस वाले मुसलमानों का ही रक्तपान कर रहे हैं, वह भी अरब में, तो हिंदुओं पर खतरा कैसे हो गया? और आप किसी इंसान को मारेंगे तो पाप लगेगा. फिर यमराज आपको ले जाएगा और खौलते तेल से भरे कड़ाहे में आपका पकौड़ा तल देगा. यार तुम तो समझदार आदमी हो. इहलोक को नरक बनाने से परलोक का कैसा संबंध है?
वह फुफकारीय अवस्था में फेचकुर छोड़ते हुए बोला— तुम पक्के वामपंथी हो, तुम देशद्रोही हो. तुम सबकी आत्मा रूस में बसती है. तुम सब भारत के लिए खतरा हो...
इस छोटी सी गाय पर चर्चा में रवीश, देशद्रोह, सफाये के बाद यूट्यूब, देवता, मुसलमान, आईएसआईएस, वामपंथ और रूस के अनधिकृत प्रवेश से मैं सनाका खा गया. सारे तर्क तेल लेने चले गए और मैं अपने घर चला गया.
इस तरह मेरा एक अभूतपूर्व मित्र भूतपूर्व हो गया.

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...