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शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

गांधी और भगत सिंह के नाम झूठ कौन फैला रहा है?


कुछ सालों से नई पीढ़ी के दिमाग में भरा गया है कि महात्मा गांधी चाहते तो भगत सिंह की फांसी रुक सकती थी लेकिन उन्होंने नहीं चाहा। सोशल मीडिया पर यह मूर्खता खूब चल रही है। जानबूझ कर गलत तथ्य देकर गांधी को भगत सिंह के खिलाफ खड़ा किया जाता है, जैसे पटेल को नेहरू के खिलाफ खड़ा किया जाता है। 


मजेदार है कि यह बात उस विचारधारा के लोग फैला रहे हैं जो उस समय भगत सिंह और उनके साथियों का मजाक उड़ा रहे थे। अपने मुखपत्र में इनका कहना था कि 'ताकतवर से लड़ना बुजदिली है, इसलिए अंग्रेजों से लड़ने की जगह उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। इसके लिए शम्सुल इस्लाम को पढ़ा जा सकता है जहां मुखपत्र और महान गुरुजी की लेखनी के उद्धरण मौजूद हैं।

अंग्रेजी हुक्मरानों को उस समय सफलता नहीं मिली थी, लेकिन सत्तर सालों बाद उनके षड्यंत्र की विषवेल फलफूल रही है। गांधी और भगत सिंह को एक दूसरे का दुश्मन बताया जा रहा है।

सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी किताब "भारत का स्वाधीनता संघर्ष" में लिखा है-"महात्मा जी ने भगत सिंह को फांसी से बचाने की पूरी कोशिश की। अंग्रेजों को गुप्तचर एजेंसियों से पता चला कि यदि भगत सिंह को फांसी दे दी जाये और उसके फलस्वरूप हिंसक आंदोलन उभरेगा, अहिंसक गांधी खुलकर हिंसक आंदोलन का पक्ष नहीं ले पाएंगे तो युवाओं में आक्रोश उभरेगा। वे कांग्रेस और गांधी से अलग हो जायेंगे। इसका असर भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को समाप्त कर देगा।"

पर शुक्र है उस समय भारतीय जनता ने अंग्रेजी साम्राज्यवादी चाल को विफल कर दिया। कुछ नवयुवकों ने आक्रोश में आकर काले झण्डों के साथ प्रदर्शन किया लेकिन उसके बाद ही हिंसक आंदोलन का अंत हो गया। महात्मा गांधी ने अफसोस के साथ कहा, मैंने सारे प्रयत्न किए लेकिन हम सफल नहीं हुए। जो विरोध कर रहे हैं उनको गुस्सा निकालने दीजिए। भगत ने देश की आजादी के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है। बलिदान का ऐसा उदाहरण कम मिलता है।

यह सच है कि अपने जीवन में पहली बार किसी व्यक्ति- भगत सिंह की सजा कम करने के लिए कहने वाले गांधी जी की बात यदि अंग्रेजी हुकूमत द्वारा मान ली गई होती तो इसका सबसे अधिक लाभ गांधी जी का होता, उनकी अहिंसा की विजय होती।

अंग्रेजों की यह साजिश थी कि ऐसी रणनीति बनाई जाये कि अवाम को ऐसा लगे महात्मा के अपील पर फांसी रुक जायेगी, महात्मा ने स्वयं वाइसराय से मिलकर लिखित रूप में अपील की कि भगतसिंह की फांसी रोक दी जाये।

लेकिन अचानक समय से पहले ही भगत सिंह को फांसी दे दी गई। करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन प्रारम्भ होने से पहले ही फांसी देने का एक मात्र मकसद था गांधी के प्रति नवयुवकों में विद्रोह पैदा करना।

भगत सिंह ने स्वयं फांसी के पूर्व अपने वकील से मिलने पर कहा था- मेरा बहुत बहुत आभार पंडित नेहरू और सुभाष बोस को कहियेगा, जिन्होंने हमारी फांसी रुकवाने के लिए इतने प्रयत्न किये।

इतना ही नहीं भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह जी जिन्होंने 23 मार्च को अपना पुत्र खोया था, 26 मार्च को कांग्रेस अधिवेशन में लोगों से अपील कर रहे थे- आप लोगों को अपने जेनरल महात्माजी का और सभी कांग्रेस नेताओं का साथ जरूर देना चाहिए। सिर्फ तभी आप देश की आजादी प्राप्त करेंगे।

इस पिता के उदगार के बाद पूरा पंडाल सिसकियों में डूब गया था। नेहरू, पटेल, मालवीय जी के आंखों से आंसू गिर रहे थे।

वैसे यह झूठ फैलाने वाले दंगापंथियों से एक सवाल है कि जब भगत सिंह को फांसी हो रही थी तब आरएसएस के कई बड़े नेता जैसे हेडगेवार, गोलवलकर, सावरकर, मुंजे आदि क्या कर रहे थे? भगत की फांसी रुकवाने के लिए इन लोगों ने क्या किया? जवाब ज़ाहिर तौर पर यही है कि कुछ नहीं। वे शाखा लगा रहे थे और जिन्ना के साथ हिन्दू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र का खेल रहे थे। जब पूरा देश भारत छोड़ो आंदोलन में लाठियां और गोलियां खा रहा था, तब जनसंघ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अंग्रेजों के लिए कैंप लगाकर सैनिकों की भर्ती कर रहे थे, ताकि हिंदुस्तान के युवा अंग्रेजों की फौज में भर्ती होकर अंग्रेजों की तरफ से विश्वयुद्ध में भाग ले सकें.

भगत सिंह को फांसी हुई तो आरएसएस के मुखपत्र में लेख लिखकर क्रांतिकारी नौजवानों को 'बुजदिल' कहकर उनको अपमानित करने का काम इन्होंने जरूर किया था।
कहते थे कि हम शाखाओं में देश पर मर मिटने वाले युवक तैयार करेंगे। लेकिन अंग्रेजों को लिखित में दे रखा था कि आरएसएस क्रांतिकारी आंदोलन से दूर रहेगा।

संघ शाखा लगाता रहा, लाठी भांजता रहा और तबतक भारत की जांबाज जनता ने देश आजाद करा लिया। जिन मुस्लिमों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को गोलवलकर हिंदुओं का दुश्मन बता रहे थे, वे सब मिलकर लड़े और देश आजाद हो गया।

अब जिन्होंने आज़ादी आंदोलन में नाखून तक न कटवाया, उल्टा राष्ट्रीय आंदोलन के साथ गद्दारी की, वे सबसे बड़े ठेकेदार बनकर सर्टिफिकेट बांटते फिर रहे हैं कि नेहरु ऐसे थे, गांधी ऐसे थे...

इनको इतिहास में जाकर सौ साल पुराना हिसाब इसीलिए करना है क्योंकि ये अपने अतीत से शर्मिंदा हैं। वरना इतिहास का सिर्फ इतना महत्व है कि उससे सबक लिया जाए। नेताओं की गलतियों से बड़ी है लाखों लोगों की कुर्बानी और उसका सम्मान! लेकिन लिंचतंत्र उसे भी अपमानित ही कर रहा है।

सौ साल पहले जो हुआ उसे आज सुधारा नहीं जा सकता, लेकिन नेहरू नेहरू करने में संघ परिवार को बहुत मजा आता है क्योंकि अपना बताने को कुछ है नहीं। इसलिए झूठ फैलाते रहते हैं।


भ्रष्टाचार से लड़ाई जनता को उल्लू बनाने के लिए लड़ी जाती है

भ्रष्टाचार एक ऐसी लड़ाई है जो भारत में जनता को उल्लू बनाने के लिए लड़ी जाती है। मजे की बात है कि नरेंद्र मोदी एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद, भ्रष्टाचार को ही मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री बने। वे आज भी लगभग अपने हर भाषण में भ्रष्टाचार पर जरूर बोलते हैं। लेकिन उनका पिछले छह साल का कार्यकाल यह गवाही देता है कि जनता को बहुत सफाई से उल्लू बना रहे हैं।
फोटो साभार: गूगल

पिछली बार सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने हथियार में दलाली को वैधानिक दर्जा दे दिया था। दूसरा कारनामा राफेल विमान की खरीद में हुआ। राजीव गांधी के कार्यकाल में बोफोर्स घोटाला हुआ था। उसके बाद की सरकारों ने किसी भी रक्षा खरीद के लिए बहुस्तरीय प्रणाली बनाई थी। इस प्रणाली को काफी पारदर्शी बनाते हुए सरकार ने नियम बनाए थे कि किसी भी रक्षा खरीद में सेना, संसद की सुरक्षा समिति, रक्षा मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और मंत्रिमंडल की भूमिका होगी, लेकिन मोदी सरकार ने इन नियमों का पालन नहीं किया और ​राफेल की खरीद में जितने सवाल उठे, उनमें से किसी का भी जवाब नहीं दिया, न ही जांच कराई।

फिर इन्होंने लंबे आंदोलन के बाद बने लोकपाल को नहीं लागू होने दिया और अंततः उसमें संशोधन करके उसे कमजोर किया और फिर लागू किया। अब भारत का लोकपाल संस्था वजूद में तो है, लेकिन उसकी कानूनी स्थिति सीबीआई नामक 'पिंजरे के तोते' से अलग नहीं है, क्योंकि लोकपाल को जांच करने का अधिकार प्रिवेंशन आफ करप्शन एक्ट के तहत है और इस एक्ट में संशोधन करके सरकार ने यह व्यवस्था कर दी है कि बिना सरकार की अनुमति के कोई जांच नहीं जा सकती।

कई मामलों में जहां भ्रष्टाचार का आरोप लगा, मोदी सरकार ने ऐसे किसी भी मामले की जांच नहीं कराई। चाहे वह सहारा बिरला डायरी हो, चाहे फ्री में जमीन बांटने का मामला हो, राफेल घोटाला हो, व्यापम घोटाला हो, चावल घोटाला हो या फिर चिक्की घोटाला। किसी की न कायदे से जांच हुई न मामला अंजाम तक पहुंचा।

व्यापम शायद दुनिया का एकमात्र घोटाला होगा जिसमें दर्जनों लोग मारे गए।

पहले आडवाणी और फिर मोदी ने स्विस बैंक में काले धन को मुद्दा बनाया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद भारत से बाहर एक भी अकॉउंट चिह्नित नहीं किए गए, उल्टा कई लोग जनता का हजारों करोड़ लेकर भाग गए। जनता की जेब पर डाका डाल कर नोटबन्दी कर दी, जिसका फायदा बताया गया कि आतंकवाद और नक्सलवाद खत्म हो जाएगा। नतीजा हुआ कि अर्थव्यवस्था अपने 20 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है, कश्मीर में जो हो रहा है आप देख ही रहे हैं। नक्सलवाद का क्या बिगड़ा है वह खुद घोषणा करने वाले पीएम साब ही जानते होंगे।

अगला वार हुआ भ्रष्टाचार विरोधी कानून प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट पर। राफेल सौदे के बाद सरकार ने इस एक्ट को बदल कर कमजोर कर दिया। अब सरकार में शामिल किसी आदमी की जांच तब तक नहीं हो सकती, जब तक सरकार अनुमति न दे। अब कौन भ्रष्टाचारी इतना बड़ा महापुरुष होगा जो भ्रष्टाचार करके अपने ही खिलाफ जांच का आदेश देगा? चोर को ही कहा गया है कि तुम चौकीदारी करो।

अगला निशाना बना आरटीआई कानून, जो लंबे संघर्ष के बाद जनता को कानूनी अधिकार के रूप में मिला था। मोदी सरकार ने उस संस्था को कमजोर क्यों किया? जवाब साफ है कि भ्रष्टाचारी को बचाने के लिए। जनता सब बात को एक आवेदन से जान लेती थी, मोदी जी को यह अच्छा नहीं लगता था।

योजना आयोग को पिछली सरकार ने क्यों भंग किया था यह आजतक रहस्य ही है। उसकी जगह लेने वाले नीति आयोग ने सरकारी संपत्तियां बेचने की सिफारिश के अलावा आज तक क्या किया, कोई नहीं जानता।

सीबीआई, सीवीसी, आरटीआई, लोकपाल, प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट आदि को कमजोर करना, हथियार दलाली वैध करना और किसी भी घोटाले की जांच न होने का आपस मे गहरा संबंध है।

छह साल में ये स्पष्ट हो गया है कि एक पीएमओ के अलावा किसी मंत्रालय का कोई खास मतलब नहीं है। देश की सारी शक्तियां डेढ़ नेताओं और गुजरात कैडर के कुछ अधिकारियों द्वारा संचालित पीएमओ में एकत्र हो गई हैं। अब नया कारनामा होने जा रहा है कि तीनों सेनाओं का एक प्रमुख होगा।

कहने को मोदी के पहले भाषण से लेकर आज अंतिम भाषण तक में भ्रष्टाचार से लड़ने का कड़ा संकल्प मौजूद है।

इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि नेता में भगवान खोज रहे लोगों की नियति ही है अंत में उल्लू बनना। जो उल्लू बनकर खुश हैं उन्हें आप बधाई दे सकते हैं।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

मूर्ख ज़िंदा हैं तब तक शातिर राज करेगा

एक बहुत बड़े महापुरुष की शोक सभा में शामिल मंत्री का ठहाका टीवी पर देखकर घर से निकला ही था कि सुबह सुबह एक पहुंचे हुए बाबा जी मिल गए. सज धज कर, त्रिपुंड लगाकर, गेरुआ पहनकर तैयार होकर पवन वेग से चले जा रहे थे. हमने पूछा, बाबा जी एतना सबेरे सबेरे कहां? बाबा बोले- बच्चा जा रहा हूं दुनिया को बेवकूफ बनाकर व्यौपार करने का नुस्खा देखने. व्यौपार का नुस्खा सुनकर मुझ बेरोजगार के कान खड़े हो गए. हमने तनिक उत्साह से पूछा, बाबा क्या यह नुस्खा कहीं सिखाया जाता है? बाबा बोले, नहीं बच्चा, यह सिखाया दिखाया नहीं जाता. यह अमल में लाया जाता है. जैसे जादूगर हाथ की सफाई दिखाकर लोगों को करतब दिखाता है, वैसे सियासत के जादूगर भी हाथ की सफाई दिखाकर लोगों को करतब दिखाते हैं. मैं अधम संन्यासी वह करतब देखना चाहता हूं कि खून में व्यापार होने का दावा करने वाले सियासतदां किसी महापुरुष की तिजारत कैसे करते हैं?

यह तिजारत जैसा भारी भरकम शब्द मेरी समझ में नहीं आया. मैंने पूछा, बाबा अब यह महापुरुष की तिजारत क्या बला है? बाबा बोले, बच्चा तू तो एकदम नादान है. लगता है जी न्यूज नहीं देखता. इसलिए कम होशियार है. जब किसी गुजर चुके महापुरुष का यश, उसका नाम, उसका काम और यहां तक कि मृत्यु के बाद उसकी अस्थि भस्म तक को भुनाया जाए तो यह हुआ व्यौपार, मतलब तिजारत. मैं वही देखने जा रहा हूं कि अटल बिहारी वाजपेयी नामक हिंदू महापुरुष को मरणोपरांत कैसे सियासत के बाजार में उतारा गया!
मैंने सुबह ही 'हिंदू हृदय सम्राट' अखबार पढ़ा था. पढ़कर संतुष्ट हो गया था, सो उनसे पूछ बैठा, बाबा, लेकिन मरने के बाद अस्थियां गंगा में विसर्जित करने की परंपरा है. वही तो हो रहा है. इसमें गलत क्या है?
बाबा बोले, अरे मूढ़ बालक, अस्थियां गंगा में विसर्जित करने की परंपरा है. सरजू या यमुना में भी हो सकती हैं, लेकिन टेढ़िया नदी, सुरसुरी नदी, खुखरी नदी, मोतिया नदी और जो नदी मर चुकी है, जिसकी अपनी धारा ही नहीं बची है और शहर वालों के गुह से भरी है, उसमें अस्थि विसर्जन का भव्य आजोयन तो किसी विशेष प्रायोजन से ही होगा न? यह धार्मिक परंपरा तो नहीं है.
दूसरी बात बच्चा, अस्थि विसर्जन तो परिवार के लोग करते हैं. ठहाके लगाते मंत्री, मसखरी करते कार्यकर्ताओं, राजनीति करते नेता और सनाका खाती जनता को अस्थि विसर्जन करते देखना और परिवार वालों का सभा में उपेक्षित होकर लौट आने का रहस्य मैं समझना चाहता हूं.
मेरी जिज्ञासा ने उड़ान भरी— लेकिन बाबा अटल जी की पार्टी तो धर्म की रक्षक है. जबसे विकास हेरा गया है, राफेल घोटाला हो गया, नीरव और मेहुल स्मार्ट सिटी से एंटीगा हो गया, तब से वे लगातार कह रहे हैं धर्म खतरे में है. तो वे तो धर्मसम्मत काम ही करेंगे.
अस्थि विसर्जन में शामिल मंत्री के अंदाज में ही बाबा ने ठहाका लगाया और बोले, बस बच्चा, यही तो तुझे समझाना चाह रहा हूं. धर्म के खतरे में होने की बात धर्म का व्यौपार है और यह अस्थि विसर्जन कर्ता और उसके कर्म का व्यौपार है. धर्म को खतरा किससे है? मृत की व्यक्ति की अस्थियों को मोक्ष के लिए गंगा में न बहाकर सियासत के घिनौने कुंड में डाल देना ही असली अधर्म है.
बाबा ने बीन बजाते सपेरे की तरह सांस चढ़ाई और आगे बोले, बेटा मैं बूढ़ा हो गया हूं. मैंने जिन्ना से लेकर दिल्ली वाले खन्ना तक को देखा है. जब कोई कहे कि धर्म से खतरा है तो समझ लो कि खतरा उस व्यक्ति के रूप में हमारे सामने है. यही वह अधम प्राणी है जो हमारी आस्था को लंगी लगाएगा और अंत में हमें मूरख बनाकर हमारा फायदा उठाएगा. धर्म नश्वर नहीं है, धर्म आस्था संबंधी विचार है. धर्म के खतरे में होने की बात भौतिक फायदे का मायाजाल है. यह मायाजाल ही मैं समझना चाह रहा हूं, इसलिए विसर्जन समारोह में जा रहा हूं.
मैंने गीता के कम से कम दो तीन श्लोक पढ़ रखे थे. मैं अपने आप को बाबा से कम ज्ञानी कैसे समझता? मैंने अपना ज्ञान ठेलते हुए कहा, बाबा लेकिन मनुष्य तो परमात्मा का अंश है. आत्मा अमर. फिर कोई अधम मृत व्यक्ति की तिजारत कैसे कर सकता है?
बाबा एक कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए बोले, बच्चा, जब तक तुझ जैसे मूढ़ जिंदा हैं तब तक शातिर इस देश में राज करता रहेगा. अरे आत्मा अमर है, मानव की पकड़ से दूर है, लेकिन सियासत के दलदल में धंसा व्यक्ति सबसे क्रूर है. वह आत्मा को नहीं पकड़ पाएगा तो आत्मा से छूटा शरीर धर दबोचेगा. दबोचकर उसका जलसा मनाएगा, जुलूस निकालेगा. उसकी कला समझो, वह बालू से तेल निकालेगा. प्रकृति के महाविनाश में फंसे लाखों लोगों को मरने के लिए छोड़ देगा और देश का खजाना जलसे और नुमाइश के लिए खोल देगा.
बाबा ने सुरती निकाली, मलते हुए बोले, बच्चा आपने वह पंक्ति सुनी होगी कि जर्मन शासक कहते थे कि ​जनता को रोटी नहीं दे सकते तो सर्कस दो. अब सर्कस का तो जमाना न रहा, सो हुतात्माओं ने मृतात्मा को पकड़ कर सर्कस दिखाना शुरू कर दिया है. यह सर्कस महीनों चलेगा और तू भूखा, बेराजगार, बेकार ऐसे ही सर्कस के बारे में सरसरी जानकारी बटोरता घूमता रहेगा. जा जाकर सर्कस देख. मैं चला, मुझे अतिशत विलंब हो रहा है.
बाबा ने सुरती मलने का महाउपक्रम पूरा करते हुए ताल ठोंकी, गर्दा उड़ाया, सुरती मुंह में प्रक्षेपित की और मुझे छींकने के लिए छोड़कर छिटकते फुदकते हुए आगे बढ़ गए.

सोमवार, 21 नवंबर 2016

क्या आपको भी उन्मादी भीड़ में तब्दील होने की जल्दी है?

कृष्णकांत

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती
सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना...
-पाश

किसी समाज के लिए इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता है कि लोग मुर्दा शांति से भर जाने के लिए बेकरार हों. समाज में सबकुछ सहन कर जाने लायक मुर्दनी छा जाना साधारण बात नहीं है. राममनोहर लोहिया कहते थे- 'जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं किया करतीं.' लेकिन हमारा समय मनहूस समय है. यहां पर कौमों में ​जिंदा दिखने का कोई हौसला नजर नहीं आता.
दुनिया भर में बदलाव हमेशा युवाओं के कंधे पर सवार होकर आता है. हमारे यहां का युवा अपने कंधे पर कुछ भी उठाने को तैयार नहीं है. उसने राजनीतिक मसलों को धार्मिक भावनाओं का मसला बना लिया है और आस्था में अंधे होकर अपनी रीढ़ की हड्डी गवां दी है. इसलिए जब आप सरकार के किसी फैसले या किसी कार्रवाई सवाल करते हैं तो अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े आपको गद्दार कहता है, दलाल कहता है, देशद्रोही कहता है या पाकिस्तान का एजेंट कहता है.
भोपाल एनकाउंटर को लेकर सोशल मीडिया पर वही युद्ध शुरू हो गया है, जो हर मामले में होता है. राष्ट्रवादी बनाम देशद्रोही. सेकुलर बनाम कम्युनल. हिंदुत्ववादी अपनी सांप्रदायिकता को ऐसे पेश करते हैं जैसे कि सांप्रदायिक होना बहुत गौरव की बात हो. चाहे लेखकों की हत्या का मसला रहा हो, दादरी कांड हो, फर्जी गोरक्षा हो, सर्जिकल स्ट्राइक हो या भोपाल में आठ कैदियों का एनकाउंटर.
हर सवाल पर आपको गद्दार और देशद्रोही कहने वाला युवा ऐसी दुनिया में है जहां पर सरकार पर सवाल उठाना पाप है. बिना सवाल और समीक्षा के, बिना आलोचना और प्रतिपक्ष के कैसा समाज ​बनेगा, यह उसकी कल्पना में कहीं नहीं है.
एक गैर-कानूनी सरकारी कार्रवाई पर आप यह सोच कर सवाल उठाते हैं कि कानून का शासन ही लोकतंत्र की पहली शर्त है. लेकिन भीड़ में होते युवा इस आलोचना को अपने राजनीतिक हितों पर होने वाला हमला मानते हैं. वे लोकतंत्र में भागीदारी नहीं चाहते. वे भेड़चाल में दौड़ना चाहते हैं. वे अपने आगे चलने वाली भेड़ के पीछे-पीछे सर झुका कर बस चलते रहना चा​हते हैं. धर्म की चाशनी में डूबी उनकी राजनीतिक ट्रेनिंग ही ऐसी हो रही है कि वे राजनीति को आस्था की आंख से देखते हैं. जैसे प्रजा राजा में आस्था रखती है, जैसे प्रजा राजा के लिए जान देने पर उतारू हो जाए, उसी तरह वे जान दे देने या ले लेने को तैयार हैं.
हमारे देश का युवा उन्मादी भीड़ में तब्दील हो रहा है. उसे इत्मीनान से सोचने से परहेज है, उसे सवाल करने से परहेज है, उसे देश और देश की व्य​वस्था ​पर विचार करने से परहेज है. उसे गाली देने की जल्दी है. उसे किसी को गद्दार, दलाल, देशद्रोही, पाकिस्तानी आदि कह देने की जल्दी है. उसे भारत माता का नारा लगाने की जल्दी है. उसे ​सवाल करती महिला को वेश्या कह देने की जल्दी है. उसे सजा देने की जल्दी है. उसे जज बनकर फैसला सुनाने की जल्दी है. उसे भीड़ में तब्दील होकर किसी को मार डालने की जल्दी है.
इन युवाओं की शिक्षा, जागरूकता और स्वाभिमान की कंडीशनिंग कैसे हुई होगी कि वे लोकतंत्र की मूल भावनाओं को ही गाली देते हैं. वे देशभक्ति में इतने पागल हैं कि देशभक्ति का ड्रामा करने वालों का कोई भी कारनामा बर्दाश्त करने को तैयार हैं. वे देशभक्ति के इन ड्रामों के लिए देश के ही बुनियादी नियमों का उल्लंघन सहने को तैयार हैं. उन्हें इसमें कुछ भी बुरा या असहज करने वाला नहीं लगता.
कितना अच्छा होता कि हर एनकाउंटर को कोर्ट द्वारा ​फर्जी सिद्ध किए जाने से पहले हमारे देश का युवा सरकारों से पूछता कि पुलिस को गोली मारने का अधिकार किसने दिया? वे पूछते कि किसी अपराधी को दंड देने के लिए भीड़ को अधिकार किसने दिया? कोई संगीन अपराधों में लिप्त है तो उसे कानून और अदालतें सजा देंगी, या प्रमोशन का प्यासा अफसर उसे गोली मारकर दंड देगा? काश! हमारे देश के युवा यह पूछते कि अगर हम गैरकानूनी हत्याओं को सेलिब्रेट करेंगे तो तालिबान या आईएसआईएस से अलग एक प्रतिष्ठित लोकतंत्र कैसे बनेंगे? 
लोकतंत्र नागरिक भागीदारी का नाम है, जिसमें आप सत्ता से लगातार सवाल करके उसे निरंकुश होने से रोकते हैं. जब आप सरकारों के पक्ष में खड़े हो जाएं और सवाल करना बंद कर दें, तब समझिए कि आप मुर्दा शांति से भर गए हैं. और जैसा कि पाश कहते हैं, सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना, तड़प का न होना, सब कुछ सहन कर जाना...
हर नागरिक को यह सोचना ​चाहिए कि आप क्या होना चाहते हैं? सवाल करता हुआ, लोकतंत्र को मजबूत करता हुआ एक जागरूक नागरिक या मुर्दा शांति भरा हुआ लोकतंत्र में जनसंख्या बढ़ाने वाला मात्र एक प्राणी? क्या आपको भी उन्मादी भीड़ में तब्दील होने की जल्दी है?


बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

समान नागरिक संहिता : एक देश एक कानून

संविधान सभा में काफी विचार-विमर्श के बाद संविधान के नीति निदेशक तत्वों में यह प्रावधान किया गया था कि राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लाने का प्रयास करेगा. समान नागरिक संहिता का मुद्दा हमेशा चर्चा में तो खूब रहा, चुनावी घोषणा पत्रों में भी शामिल हुआ, लेकिन इसका अब तक कोई प्रारूप तक मौजूद नहीं है. अब नरेंद्र मोदी सरकार ने इस विषय पर लॉ कमीशन से रिपोर्ट सौंपने को कहा है, लेकिन क्या समान नागरिक संहिता के लिए देश तैयार है?



हाल ही में केंद्र सरकार ने विधि आयोग को पत्र लिखकर समान नागरिक संहिता (यूनीफाॅर्म/कॉमन सिविल कोड) यानी सभी के लिए एक जैसे कानून पर सुझाव मांगा है. अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से अपना रुख साफ करने को कहा था. इसके बाद सरकार ने पहली बार विधि आयोग को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर रिपोर्ट देने को कहा था. कुछ दिन पहले सरकार ने विधि आयोग को दोबारा पत्र लिखकर इस मसले की याद दिलाई जिसके बाद यह मसला चर्चा में है.

भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री का पद संभालने के बाद कहा, ‘समान नागरिक संहिता की दिशा में कदम बढ़ाने से पूर्व व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत है. इस दिशा में आगे बढ़ने से पहले सभी हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया जाएगा. इस मसले पर विधि आयोग विचार कर रहा है. संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता का आदेश देता है.’

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि सरकार पूरे देश में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगी. हालांकि, यह अब तक लागू नहीं हो पाया है. समान नागरिक संहिता का मसला धार्मिक पेचीदगियों की वजह से हमेशा संवेदनशील रहा है, इसलिए सरकारों ने इस पर कभी कोई ठोस पहलकदमी नहीं की, हालांकि इस पर गाहे-बगाहे चर्चाएं जरूर होती रही हैं. समान नागरिक संहिता का मुद्दा भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में भी था. केंद्र में सत्ता मिलने के कुछ समय बाद भाजपा के ही सांसद योगी आदित्यनाथ ने सरकार से समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग की थी.

हाल ही में इस मुद्दे को उठाने के बाद भाजपा पर यह आरोप भी लगा कि उत्तर प्रदेश में चुनाव के मद्देनजर उसने इस मुद्दे को छेड़ा है क्योंकि भाजपा की राजनीतिक विचारधारा से जुड़े जो मुद्दे हैं उनमें राम मंदिर, कश्मीर में अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता प्रमुख हैं. हालांकि भाजपा ने इस आरोप से इनकार किया और इस शुरुआत को समान नागरिक संहिता को वजूद में लाने की सामान्य प्रक्रिया बताया.

बीते अक्टूबर में ईसाई समुदाय के एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी कि देश में समान नागरिक संहिता लागू की जाए. याचिका में कहा गया था कि ईसाई दंपति को तलाक लेने के लिए दो वर्ष तक अलग रहने का कानून है जबकि हिंदू व अन्य कानूनों में स्थिति अलग है. इसी सिलसिले में समान नागरिक संहिता की बात उठी थी जिस पर कोर्ट ने केंद्र से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा था. दिसंबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने भी समान नागरिक संहिता को लेकर याचिका दायर की थी. इसमें कहा गया था, ‘समान नागरिक संहिता आधुनिक और प्रगतिशील राष्ट्र का प्रतीक है. इसे लागू करने का मतलब होगा कि देश धर्म-जाति आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करता. देश में आर्थिक प्रगति जरूर हुई है लेकिन सामाजिक रूप से कोई तरक्की नहीं हुई है.’ समान नागरिक संहिता के पक्षधर तबके की दलील है, ‘एक धर्मनिरपेक्ष गणतांत्रिक देश में प्रत्येक व्यक्ति के लिए कानूनी व्यवस्थाएं समान होनी चाहिए.’

इस तरह की ज्यादातर याचिकाएं खारिज करते हुए कोर्ट का बार-बार यह तर्क रहा है कि चूंकि कानून बनाना सरकार का काम है इसलिए कोर्ट इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती, न ही वह सरकार को कानून बनाने का आदेश दे सकती है. लेकिन यदि कोई पीड़ित सुप्रीम कोर्ट जाता है तो कोर्ट को उस पर सुनवाई करनी पड़ती है. पिछले एक साल में ईसाई तलाक कानून और मुस्लिम तीन तलाक कानून के खिलाफ कई मसले सुप्रीम कोर्ट में आए हैं.

सरकार की तरफ से विधि आयोग को पत्र लिखे जाने के बाद कई मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर विचार करना शुरू कर दिया है. इस मसले से जुड़े फैसलों में कोर्ट की टिप्पणियां, दस्तावेज वगैरह जुटाए जा रहे हैं. इस मसले पर आयोग वेबसाइट के जरिए व अन्य माध्यमों से जनता से राय लेकर व्यापक विचार-विमर्श के बाद सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा.

समान नागरिक संहिता की वकालत करने वालों की राय है कि देश में सभी नागरिकों के लिए एक जैसा नागरिक कानून होना चाहिए, भले ही वे किसी भी धर्म से संबंध रखते हों. लेकिन धर्मावलंबी व धर्मगुरु इससे सहमत नहीं हैं. समाज का एक तबका ऐसा भी है जो विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मसलों को भी धर्म से जोड़कर देखता है. दूसरी ओर, समान नागरिक संहिता न होने की वजह से महिलाओं के बीच आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. राजनीतिक दल समान कानून बनाने या समान नागरिक संहिता के पक्षधर तो रहे हैं, लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के चलते किसी भी सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की.

सवाल यह है कि क्या सरकार इस मसले पर आगे बढ़ेगी या हमेशा की तरह यह मुद्दा सिर्फ चुनावी चाल की तरह बार-बार चला जाता रहेगा? इसके साथ और भी कई अहम सवाल इस मसले से जुड़े हैं. दरअसल, कुछ समुदायों के अपने पर्सनल कानून हैं जिन्हें वे न सिर्फ धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते हैं, बल्कि वे इसे अपना संवैधानिक अधिकार मानते हैं. इसके चलते समान नागरिक संहिता का कड़ा विरोध भी हो सकता है.

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने इस मुद्दे पर सर्वे कराया था. इस सर्वे में 57 फीसदी लोगों ने विवाह, तलाक, संपत्ति, गोद लेने और भरण-पोषण जैसे मामलों में समुदायों के लिए पृथक कानून के पक्ष में राय जाहिर की. केवल 23 फीसदी लोग समान नागरिक संहिता के पक्ष में थे. 20 फीसदी लोगों ने कोई राय ही नहीं रखी. 55 फीसदी हिंदुओं ने संपत्ति और विवाह के मामले में समुदायों के अपने कानून रहने देने के पक्ष में राय दी, जबकि ऐसे मुस्लिम 65 फीसदी थे. अन्य अल्पसंख्यक समुदायों (ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन) ने सर्वे में इससे मिलती-जुलती या इससे थोड़ी ज्यादा संख्या में समान नागरिक संहिता का समर्थन किया. अल्पसंख्यक समुदायों का बहुमत मौजूदा व्यवस्था कायम रखने के पक्ष में है. सीएसडीएस का निष्कर्ष था कि शिक्षित वर्ग में भी समान नागरिक संहिता से असहमति रखने वालों का बहुमत है. शिक्षित तबके में समान नागरिक संहिता के पक्ष और विपक्ष में जोरदार दलीलें दी गईं, लेकिन झुकाव इस ओर रहा कि विभिन्न समुदायों के निजी मामले अपने-अपने कानूनों से ही संचालित होने चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता पर समय-समय पर न सिर्फ टिप्पणियां की हैं, बल्कि सरकार को इस दिशा में बढ़ने के निर्देश भी दिए हैं. फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रकरण की सुनवाई करते हुए कहा था कि यह बहुत ही आवश्यक है कि सिविल कानूनों से धर्म को बाहर किया जाए. 11 मई, 1995 को एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता को अनिवार्य रूप से लागू किए जाने पर जोर दिया था. कोर्ट का कहना था कि इससे एक ओर जहां पीड़ित महिलाओं की सुरक्षा हो सकेगी वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय एकता बढ़ाने के लिए भी यह आवश्यक है. कोर्ट ने उस वक्त यहां तक कहा, ‘इस तरह के किसी समुदाय के निजी कानून स्वायत्तता नहीं, बल्कि अत्याचार के प्रतीक हैं. भारतीय नेताओं ने द्विराष्ट्र अथवा तीन राष्ट्रों के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया. भारत एक राष्ट्र है और कोई समुदाय मजहब के आधार पर स्वतंत्र अस्तित्व का दावा नहीं कर सकता.’ कोर्ट ने इस संबंध में कानून मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह जिम्मेदार अधिकारी द्वारा शपथ पत्र प्रस्तुत करके बताए कि समान नागरिक संहिता के लिए न्यायालय के आदेश के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने क्या प्रयास किए. हालांकि, यह बात दीगर है कि आज तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई.

संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप कहते हैं, ‘विचार तो पिछले 70 साल से चल रहा है. विचार करने में कोई कठिनाई नहीं है. लेकिन मेरा निजी विचार है कि कानून लागू करने के लिए राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को भी ध्यान में रखा जाए, वैधानिक परिप्रेक्ष्य को भी ध्यान में रखा जाए तो होना यह चाहिए कि इसकी मांग उस समुदाय के अंदर से उठनी चाहिए और इसको लैंगिक न्याय के रूप में लिया जाना चाहिए. और समान नागरिक संहिता का मतलब ये नहीं है कि किसी के ऊपर हिंदू कोड बिल लागू किया जा रहा है. समान नागरिक संहिता में यह भी हो सकता है कि मुस्लिम लॉ की जो भी अच्छी बातें हों, वे सब उसमें शामिल हों. क्रिश्चियन लॉ की अच्छी बातें हैं, वे भी शामिल हों. यूनीफॉर्म सिविल कोड क्या है, अभी तो कुछ पता ही नहीं है. अभी उसका कोई प्रारूप ही नहीं है.’

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय कहते हैं, ‘समान नागरिक संहिता तो चल ही रही है. लोगों को यह भ्रम है कि कॉमन सिविल कोड है ही नहीं. कॉमन सिविल कोड पहले से है और उससे 123 करोड़ लोग गवर्न हो रहे हैं. कुछ जो पुराने भ्रम बने हुए हैं उसमें से एक कॉमन सिविल कोड भी है. लेकिन दो-तीन बातें ऐसी हैं जिसको हमारी सरकारें या विभिन्न समुदाय हल नहीं कर पाए हैं. इसलिए कॉमन सिविल कोड की बात चलती रहती है. उनमें से एक मसला ये है कि विवाह का कानून कैसा हो. विवाह अगर टूटता है तो तीन तलाक के माध्यम से हो या कानून के माध्यम से. इसी तरह संपत्ति के वारिस का मामला है. ये दो-तीन बातें ऐसी हैं जिनके बारे में अभी कॉमन सिविल कोड लागू होना है और ये बहुत विवादास्पद है. कई बार सरकारें इस पर पहल नहीं करतीं. अब नई स्थिति यह है कि मामला विधि आयोग को भेजा गया है, लेकिन पहले भी विधि आयोग की रिपोर्ट आती रही है. अब फिर से मामला लॉ कमीशन के सुपुर्द किया गया है. कमीशन की जो रिपोर्ट आएगी, उस पर बातचीत होगी और संसद में यह सवाल उठेगा.’

समान नागरिक संहिता लागू हो या न हो, इसके जवाब में पूर्व मंत्री व नेता आरिफ मोहम्मद खान कहते हैं, ‘यह प्रश्न ही नामुनासिब है क्योंकि खुद हमारा संविधान अपने अनुच्छेद 44 के द्वारा राज्य के ऊपर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह भारत के समस्त नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा. असल में सवाल यह होना चाहिए कि संविधान लागू होने से लेकर आज तक हमारी सरकारों ने इस दिशा में क्या कदम उठाए हैं. वास्तविकता यह है कि समान सिविल संहिता तो छोड़िए, हमने तो क्रिमिनल संहिता को भी समान नहीं रहने दिया. शाह बानो केस में क्रिमिनल संहिता के सेक्शन 125 के तहत निर्णय हुआ था. हमने उसको भी संसद के एक कानून द्वारा निरस्त किया और इस तरह भारतीय महिलाओं के एक वर्ग को उस अधिकार से वंचित कर दिया जो उन्हें क्रिमिनल संहिता के द्वारा मिला हुआ था.’

सुभाष कश्यप भी राजनीतिकरण की बात को स्वीकार करते हुए कहते हैं, ‘इसे लागू करने में कोई तकनीकी मुश्किल नहीं है, बल्कि राजनीतिक मुश्किल है. इस मुद्दे का राजनीतिकरण हुआ है. संविधान राज्य को निर्देश देता है कि समान नागरिक संहिता लागू की जाए. लेकिन क्यों नहीं लाया जा सका है, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर एक-दो सवाल किए. यह अभी तक नहीं लाया गया, इसके कारण राजनीतिक हैं, वोटबैंक पॉलिटिक्स है. जिन समुदायों के पर्सनल कानून हैं, वे समुदाय नाराज न हो जाएं, इसलिए इसे नहीं लाया जा रहा है.’

कानून की समानता का महत्व बताते हुए राम बहादुर रायकहते हैं, ‘फिलहाल हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि सभी का अपना नियम-कानून है. सब अपनी-अपनी रीति और परंपरा से संचालित हैं. इस क्षेत्र में एक समानांतर व्यवस्था चल रही है. बाकी क्षेत्र में ऐसा नहीं है. जैसे मान लिया कि कोई व्यक्ति अपराध करता है तो यह नहीं देखा जाता कि वह किस समुदाय का है. कॉमन सिविल कोड मौजूद है वहां. अगर हम आपकी मानहानि करते हैं तो आप इस आधार पर मुकदमा करते हैं कि हमने आपकी मानहानि की. इस आधार पर नहीं करते कि मैं हिंदू हूं या मुसलमान हूं. दो-तीन बातें हैं जिनका निराकरण हो जाएगा तो यह मसला सुलझ जाएगा.’

अगर मौजूदा व्यवस्था ही बनी रहे, समुदायों के पर्सनल कानून ही लागू रहें तो इसके क्या नुकसान हैं? इसके जवाब में राम बहादुर राय कहते हैं, ‘आप कैसे इस चीज को देखते हैं, इस पर निर्भर करता है. कौन व्यक्ति इसको किस रूप में देखता है, यह महत्वपूर्ण है. हमारे एक मित्र हैं, जिनका मैं बहुत आदर करता हूं. लेकिन उनका मानना है कि खाप पंचायत बहुत आदर्श व्यवस्था है. अब खाप अगर आदर्श व्यवस्था है तो खाप जो फैसला करेगी, उस समुदाय पर वही लागू होगा. किंतु अब सवाल यह है कि जो भारतीय अपराध संहिता है वह लागू होगी या खाप की व्यवस्था लागू होगी. यहां पर टकराव आता है. दूसरा उदाहरण है ट्राइबल इलाकों की पंचायतें. कोई अपराध वगैरह होता है तो वे बैठते हैं और कई-कई दिन तक उस पर बात करते हैं. वहीं खाना-पीना होता है, वहीं पर सोना होता है. वे उस पर सर्वानुमति से फैसला लेते हैं. मेरा ख्याल है कि विनोबा जी ने सर्वोदय में जो सर्वानुमति चलाई, उसकी प्रेरणा यहीं से मिली होगी. अब कोई सरकार अगर वहां सर्वानुमति से राय लेती है कि कोई कानून लागू नहीं होगा और कोई अपराध होता है तब क्या होगा? अरुणाचल प्रदेश में 1980-82 तक कोई जेल नहीं थी. अब वहां पर जेलें हैं. जो लोग इस मुद्दे को उठाते हैं उसके पीछे दो तरह की अवधारणा है. पहली अवधारणा यह है कि हमारे संविधान का जो केंद्रीय बिंदु है, जो मुख्य पात्र है, वह नागरिक है. खाप, पंचायत या दूसरी व्यवस्था मान्य नहीं है. ये व्यवस्थाएं तभी तक चल सकती हैं, जब तक उनका कानून से कोई टकराव न हो. जहां टकराव होता है तो यह मांग उठती है कि भाई सबके लिए एक कानून लागू क्यों नहीं करते. दूसरा, अगर नागरिक के स्तर पर भेदभाव होता है तो सवाल उठता है कि एक को आप कानून से संचालित करना चाहते हैं, दूसरे को आप उसकी मर्जी के कानून से संचालित करते हैं.’

इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका डालने वाले अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘देखिए, मुझे लगता है कि अनुच्छेद 44 हमारे संविधान की आत्मा है. कुछ ऐसे अनुच्छेद हैं, जैसे अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समता की बात करता है और अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की. अगर हम मूल अधिकार में देखें तो ये दोनों मूल अधिकारों की आत्मा हैं. ऐसे ही अगर हम नीति निदेशक तत्वों में जाकर देखें तो अनुच्छेद 44 यानी यूनीफॉर्म सिविल कोड उसकी आत्मा है. हमारे संविधान निर्माताओं ने ‘वन नेशन, वन कांस्टीट्यूशन’ का सपना देखा था और ‘वन नेशन, वन कांस्टीट्यूशन’ में अगर यूनीफॉर्म सिविल कोड नहीं लागू होता और पर्सनल लॉ चलते हैं, तो मुझे लगता है कि हम सिर्फ संविधान का ही अपमान नहीं कर रहे, बल्कि संविधान बनाने वाले बाबा साहेब आंबेडकर, पंडित नेहरू, रफी अहमद किदवई, मौलाना कलाम और तमाम सारे लोगों का अपमान कर रहे हैं. वोटबैंक पॉलिटिक्स के चक्कर में ये अभी तक लागू नहीं किया गया. तमाम लोगों से मेरा एक सवाल है कि अगर बाबा साहेब आंबेडकर, नेहरू, किदवई और तमाम संविधान निर्माता सेक्युलर थे तो उन्हीं का बनाया अनुच्छेद 44 कैसे कम्युनल हो जाएगा. यह बहुत बेसिक बात है. आजादी के बाद संविधान बनाया गया था. उन लोगों को यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि हमारी आने वाली पीढ़ी वोट के चक्कर में क्या-क्या कर देगी. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. वोट की राजनीति ने हमारा बहुत नुकसान किया है.’

समान नागरिक संहिता पर ऐतिहासिक मतभेदों और विवादों का जिक्र करते हुए रामबहादुर राय बताते हैं कि जवाहरलाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद में जो विवाद था वह इसी बात पर था. राजेंद्र प्रसाद यह नहीं चाहते थे कि हिंदू कोड बिल केवल हिंदुओं के लिए लागू हो. अगर आप हिंदू कोड बिल बना रहे हैं तो मुस्लिम कोड बिल भी बनाइए. और हिंदू कोड बिल, मुस्लिम कोड बिल की क्या जरूरत है, कॉमन कोड क्यों नहीं हो सकता? ये 1954-55 से चला आ रहा विवाद है. वे कहते हैं, ‘इसका व्यापक पक्ष जो है वह दूसरा है. वह इससे संबंधित है कि हमने अभी भी भारत के लोगों के लिए, जिसमें हिंदू-मुसलमान-ईसाई-पारसी का सवाल नहीं है, इस पर विचार ही नहीं किया है कि भारतीय नागरिक के लिए किन्हीं परिस्थितियों में कैसा कानून होना चाहिए. जहां कोई अड़चन आती है, वहां मौजूद कानूनों में ही हेरफेर करके काम चला लेते हैं. यह व्यापक प्रश्न है, जिस पर विचार होना चाहिए.’

समान नागरिक संहिता का महत्व और पर्सनल कानून की निरर्थकता बताते हुए अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘दुनिया के बहुत सारे इस्लामिक देशों में यूनीफॉर्म सिविल कोड है. अपने भारत में गोवा में लागू है और वहां चल रहा है. वहां हर समुदाय के लिए एक कॉमन लॉ है. जो लोग इसका विरोध करते हैं, वे महिला और गरीब विरोधी हैं. पर्सनल लॉ महिलाओं को दबाने का स्पेस है. यूनीफॉर्म सिविल कोड आएगा तो महिलाओं के शोषण पर लगाम लग जाएगी. सिर्फ महिलाओं नहीं, कई बार पुरुषों का भी शोषण होता है, वह भी रुकेगा. मेरा अपना मानना है कि हर एक पर्सनल लॉ, हिंदू हो या इस्लामिक या ईसाई, सबमें कुछ-कुछ अच्छी चीजें हैं. उन सबकी बेहतर चीजों को निकालकर एक कॉमन ड्राफ्ट बनाना चाहिए. उस ड्राफ्ट को संसद में ले आना चाहिए फिर उस पर चर्चा हो. अभी दिक्कत ये है कि इसका कोई प्रारूप नहीं है.’

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी इस मसले पर अपनी राय रखते हैं, ‘हम तो उन लोगों में हैं जिन्होंने मुल्क में सेक्युलर दस्तूर को बनवाया है. वह दस्तूर जिसके तहत अपने मजहब पर आजादी के साथ अमल करते हुए मुल्क की तरक्की के लिए, मुल्क को आगे बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए. हमने मजहबी अकलियत को अपनी मजहबी निशानी के साथ दस्तूर में जिंदा रखवाया है. हमारा किरदार है वो. हम सबने गांधी-नेहरू के साथ मिलकर उस दस्तूर को बनवाया है कि जिसमें मुल्क को आगे बढ़ाने में हर आदमी, चाहे वो किसी भी मजहब का हो, मददगार बने और अपने मजहब पर कायम रहने का उसे मुकम्मल हक हो. मुल्क 70 साल से उन्हीं दस्तूरों पर चल रहा है. हम उसके मुखालिफ कैसे हो सकते हैं. हम तो जम्हूरियत और सेक्युलरिज्म की ताईद ही इस वजह से करते हैं कि मुल्क के अंदर तमाम अकलियत को जोड़कर रखने का एक ही रास्ता है और वह है सेक्युलरिज्म. सेक्युलरिज्म ही देश को और मजबूत कर सकता है. तमाम सारी अकलियत को अगर उनके मजहब से काटकर रखा जाएगा तो ये तो झगड़ा पैदा करेगा. हम उसकी ताईद नहीं करते. हम ये मानते हैं कि अपने-अपने मजहब पर अमल करते हुए तमाम लोग मुल्क की आजादी और तरक्की के लिए काम करें. यही अमन और प्यार-मोहब्बत का रास्ता है.’

दूसरी ओर अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘हमारा संविधान शुरू से सेक्युलर रहा है. लेकिन जब इसमें सेक्युलरिज्म शब्द भी जोड़ दिया गया, फिर तो ये पर्सनल हो ही नहीं सकता. किसी कीमत पर नहीं. क्योंकि सेक्युलरिज्म और पर्सनल लॉ एक नदी के दो छोर हैं. साथ-साथ नहीं चल सकते. या तो आपका देश सेक्युलर हो सकता है, या तो धार्मिक हो सकता है. अगर धार्मिक होगा तो पर्सनल लॉ चलेगा. अगर सेक्युलर है तो आपके पास कॉमन सिविल कोड ही रास्ता है.’ वे आगे कहते हैं, ‘यूनीफॉर्म सिविल कोड लागू होने से ऐसा नहीं होगा कि हिंदुओं को निकाह करना पड़ेगा और मुसलमानों को सात फेरे लेने पड़ेंगे. ऐसा नहीं होगा कि हिंदुओं को दफनाना पड़ेगा और मुसलमानों को जलाना पड़ेगा. ये उसमें कहीं आड़े नहीं आता. सुप्रीम कोर्ट के बहुत सारे फैसले हैं. जस्टिस खरे का है, जस्टिस चंद्रचूड़ का है. बड़ी-बड़ी पीठों के फैसले हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार ये वस्तुत: सेक्युलरिज्म का पार्ट हैं, ये पर्सनल कानून या आस्था से नहीं चल सकते. ऐसा नहीं हो सकता कि एक महिला तलाक ले तो उसे दस रुपये मिलें और दूसरी महिला तलाक ले तो उसे एक पैसा न मिले. ऐसा नहीं चल सकता.’

महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर कहती हैं, ‘मुझे ये समझ में नहीं आ रहा है कि सरकार इसमें इतनी दिलचस्पी क्यों ले रही है कि कॉमन सिविल कोड पर अभी ही चर्चा हो और ये लागू हो. अभी बहुत सारी योजनाएं हैं जिनका चुनाव के टाइम ऐलान किया गया था. सरकार का जो लक्ष्य है 2017 का, सबका साथ सबका विकास, शिक्षा, हेल्थ और तमाम मुद्दे हैं, सरकार उन पर काम करे. जो लोग कॉमन सिविल कोड को किसी खास मकसद से लाना चाहते हैं, वे चुनाव को नजर में रखकर इसे उछाल रहे हैं, तो मेरी यही गुजारिश है मुस्लिम समाज मुस्लिम कानून और मजहब के हिसाब से ही काम करेगा. हम महिलाएं अदालत में अपने कानून को मजबूती से लागू करने की लड़ाई लड़ रही हैं.’

समान नागरिक संहिता की चर्चा में सबसे तीखा विरोध मुस्लिम समुदाय की ओर से उठता है. संविधान सभा में बाबा साहेब आंबेडकर का इस मुद्दे पर भाषण भी मुसलमानों पर ही केंद्रित है. अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘जो तथाकथित धर्मगुरु लोग विरोध करते हैं, उन्हें मालूम है कि यह महिलाओं के पक्ष में है. लेकिन ये लोग अपनी दुकान चलाने के लिए विरोध करते हैं. इससे तो धर्म का फायदा है. इस्लाम की जो बेसिक थीम पैगंबर साहेब ने दी थी, वह बराबर की थी. इस्लाम की बेसिक थीम बराबरी है कि हमारे यहां जाति, लिंग आदि का कोई भेद नहीं होगा. अगर बेसिक कॉन्सेप्ट बराबरी है तो कोई भी पर्सनल लॉ जो आर्टिकल 14 का उल्लंघन करे वह तो होना ही नहीं चाहिए. सबसे बेसिक कानून अनुच्छेद 14 और 21 है. जो लोग बाकी अनुच्छेदों की बातें करते हैं, 13, 25, 29 या 30, ये सब 14 के बाद आते हैं. यह एक आॅर्डर में है. बेसिक कानून 14 है. कानून के समक्ष बराबरी बेसिक है. ऐसा नहीं हो सकता है कि शादी के वक्त आप पूछें कि मंजूर है कि नहीं और तलाक देते वक्त नहीं पूछें कि मंजूर है कि नहीं. इसमें सबसे ज्यादा जरूरी है कि पहले कानून का ड्राफ्ट आ जाए. ड्राफ्ट आ जाएगा तो जितने विवाद हैं, वे ज्यादातर अपने आप हल हो जाएंगे.’

शाइस्ता अंबर यह तो मानती हैं कि मुस्लिम समाज में बहुत-से सुधारों की जरूरत है, लेकिन वे इस बात की हिमायती हैं कि इनका निदान इस्लामी कानून और कुरान के मद्देनजर ही होना चाहिए. बातचीत में वे कहती हैं कि इस्लामी कानून अपने आप में मुकम्मल हैं. वे मानती हैं कि मुसलमान औरतों को न्याय कुरान की बुनियाद पर मिलना चाहिए. उन्होंने बताया कि हमने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक सिफारिश भेजी थी कि जिस तरह हिंदू कोड बिल है, उसी तरह एक मुस्लिम कोड बिल बनाया जाए. वे कहती हैं, ‘हम कॉमन सिविल कोड स्वीकार तब करें जब हमारे मुस्लिम पर्सनल कानून में कुछ गलत हो. जब पर्सनल लॉ में कोई कानून गलत है ही नहीं, पहले से ही सारे अधिकार मिले हुए हैं तो हमें कॉमन सिविल कोड की जरूरत ही नहीं है. हमारा विश्वास ऐसे कानून में है जो कॉमन सिविल कोड से ज्यादा मुकम्मल है.’

चूंकि भाजपा कश्मीर में धारा 370, राम मंदिर और यूनीफॉर्म सिविल कोड को मुद्दा बनाती रही है, इसलिए इस मामले में और भी भ्रम की स्थितियां बनी हैं. भाजपा की हिंदूवादी विचारधारा के कारण मुस्लिम समुदाय में यह संदेश गया है कि यह भाजपा का हिंदूवादी एजेंडा है. मौलाना अरशद मदनी कहते हैं, ‘हम समझ रहे हैं, हो सकता है कि मेरी यह बात किसी को बुरी लगे लेकिन वो जो एक आवाज उठी थी सबको घर वापस लाओ, अब तक वो आवाज जनता के बीच थी, अब सरकार उस आवाज के दरख्त को पालने के लिए पानी दे रही है और ये दूसरे रास्ते से उसी की तरफ लेकर चलना चाहते हैं. हमें तो ये मंजूर नहीं है. हम तो मरना और जीना इस्लाम और मजहब के साथ ही बावस्ता रखना चाहते हैं. हम इसकी ताईद नहीं करेंगे. हमारा अपना स्टैंड है और वह बहुत मजबूत है. हमारा इसमें कोई समर्थन और विरोध नहीं है. हम बस इतना जानते हैं कि हर आदमी मुल्क को आगे बढ़ाए और अपने मजहब पर कायम रहते हुए बढ़ाए.’

अब तक यूनीफॉर्म सिविल कोड लागू न होने के लिए वोटबैंक राजनीति को जिम्मेदार ठहराते हुए अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘वोट के लालच ने देश का बहुत नुकसान किया है. राइट टू एजुकेशन को मूलाधिकार बनाकर 21 ए में रखा गया. लेकिन उसमें भी विसंगतियां हैं. हमारे देश में तीन चीजें बहुत जरूरी हैं. यूनीफॉर्म एजुकेशन, यूनीफॉर्म हेल्थकेयर और यूनीफॉर्म सिविल कोड हो. अगर देश की एकता और अखंडता को बनाए रखना है तो ये तीन चीजें बहुत जरूरी हैं.’

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

भगत सिंह के नाम पर सियासी भगदड़

भगत सिंह जब तक जीवित थे, उन्हें किसी राजनीतिक दल का साथ नहीं मिला. शहादत के बाद उन्हें पूरी तरह भुला दिया गया. लेकिन पिछले कुछ समय से राजनीतिक दलों को अचानक उनकी याद आने लगी है. अब सभी दलों का दावा है कि भगत सिंह उनके हीरो हैं.


कृष्णकांत


‘मां, मुझे कोई शंका नहीं है कि मेरा मुल्क एक दिन आजाद हो जाएगा, पर मुझे डर है कि गोरे साहब जिन कुर्सियों को छोड़कर जाएंगे, उन पर भूरे साहबों का कब्जा हो जाएगा.’ आजादी के तमाम नायकों में से एक शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह ने अपनी मां को लिखी चिट्ठी में यह बात कही थी. उन्हीं भगत सिंह ने शहीद होने से पहले अपनी जेल डायरी में लिखा था, ‘सरकार जेलों और राजमहलों, या कंगाली और शान-शौकत के बीच किसी समझौते के रूप में नहीं होती. यह इसलिए गठित नहीं की जाती कि जरूरतमंद से उसकी दमड़ी भी लूट ली जाए और खस्ताहालों की दुर्दशा और बढ़ा दी जाए.’ उसी डायरी में वे एक जगह लिखते हैं, ‘शासक के लिए यही उचित है कि उसके शासन में कोई भी आदमी ठंड और भूख से पीड़ित न रहे. आदमी के पास जब जीने के मामूली साधन भी नहीं रहते, तो वह अपने नैतिक स्तर को बनाए नहीं रख सकता.’ किसी के भूखे न रहने का सपना देखने वाला यह शहीद देश के शासक वर्ग के लिए सबसे लोकलुभावन हीरो है, जबकि इस देश के सरकारी आंकड़ों में इस वक्त करीब 30 करोड़ लोग भूखे सोते हैं. सवाल उठता है कि भगत सिंह तो सबके हैं लेकिन उनके विचार किसके हैं.

‘जब तक कोई निचला वर्ग है, मैं उसमें ही हूं. जब तक कोई अपराधी तत्व है, मैं उसमें ही हूं. जब तक कोई जेल में कैद है, मैं आजाद नहीं हूं.’ भगत सिंह की जेल डायरी में दर्ज ऐसी तमाम पंक्तियां उनके क्रांतिकारी सपनों का आईना हैं, जिन पर वक्त के साथ उपेक्षाओं की धूल भरी मोटी चादर बिछा दी गई है. भगत सिंह के नाम का नारा लगाने वाले ज्यादातर राजनीतिज्ञ इन सपनों के बारे में शायद ही कोई बात करते हों. अगर भगत सिंह हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं तो भूख से मर रहे लोगों, कर्ज से आत्महत्या करते किसानों और जेलों में सड़ रही लाखों जिंदगियों में क्या भगत सिंह जीवित नहीं हैं, जैसा कि उक्त पंक्तियों में दर्ज है? फिर हमारी सियासत इस बात पर क्यों उलझ गई कि कन्हैया कुमार नामक युवक में भगत सिंह है कि नहीं? भगत सिंह के दस्तावेज गवाह हैं कि उनका सपना मजदूर, किसान, वंचित, दलित और हर उस व्यक्ति के लिए लड़ना रहा जो पीड़ित है. क्या देश की कुर्सी पर ‘भूरे साहबों के कब्जे’ को लेकर भगत सिंह का डर सच साबित हुआ? अगर यह सच न होता तो भगत सिंह की राजनीतिक विरासत और उनके सपनों के हिंदुस्तान पर बहस होती, न कि इस बात पर कि भगत सिंह ‘भारत माता की जय’ बोलकर फांसी पर चढ़ने वाले ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ थे, या भगवा रंग की पगड़ी पहनने वाले सरदार? क्या भगत सिंह का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं है कि उनके लिखे को स्वीकारते हुए उन्हें नास्तिकता, तर्कवाद और वैज्ञानिकता का झंडा बुलंद करने वाला क्रांतिकारी माना जाए और जब तक एक भी व्यक्ति शोषित है, तब तक व्यवस्था बदलने का सतत प्रयास होता रहे?

शहीद भगत सिंह इस देश की राजनीति के लिए अचानक महत्वपूर्ण हो उठे हैं. हर राजनीतिक दल उन्हें अपना साबित करने के लिए बेकरार है. सवाल उठता है कि ऐसा क्या हुआ कि अचानक सियासतदानों को उनकी याद आ गई. इतिहास के पन्ने जिन लोगों को वैचारिक या राजनीतिक तौर पर भगत सिंह के खिलाफ खड़ा करते हैं, वे लोग अब उनकी विरासत के सबसे बड़े झंडाबरदार बनकर खड़े हैं. जिन लोगों ने उनके समय में उनसे दूरी बनाकर रखी, सबसे पहला दावा आज उन्हीं का है. वैचारिक निकटता या अंगीकार के चलते कोई भगत सिंह को अपना कहे तो भी गनीमत है, लेकिन भगत सिंह के सपनों की हत्या करने वाले लोग भी अगर भगत सिंह को अपना कहें तो यह भगत सिंह समेत पूरे क्रांतिकारी आंदोलन का अपमान है जो आजादी के साथ समता, बंधुता और मानव मुक्ति के उद्देश्यों के साथ लड़ा गया.

आजादी के नायकों में से दो विभूतियों को सबसे ज्यादा सेलिब्रेट किया जाता है एक गांधी और दूसरे भगत सिंह. गांधी के साथ वामपंथ और दक्षिणपंथ की घोर असहमतियां रही हैं, जो अब भी बरकरार हैं, लेकिन भगत सिंह की सभी खुले स्वर में प्रशंसा करते हैं और सभी उन्हें अपना साबित करने की कोशिश करते हैं. वामपंथी भगत सिंह को वामपंथी कहकर उनके सपनों के भारत की बात करते हैं, जबकि संघ परिवार उन्हें कट्टर राष्ट्रवादी और देश के लिए प्राणों की बलि देने वाला देशभक्त बताकर उनका महिमामंडन करता है. लेकिन भगत सिंह को लेकर मची इस छीना-झपटी में असली भगत सिंह कहां हैं? देश को लेकर उनके क्या विचार थे? वे कैसा भारत चाहते थे? वे कैसी राजनीति चाहते थे? आज के राजनीतिक दलों और उनके विचारों का भगत सिंह से कितना साम्य है? आज भगत सिंह होते तो मौजूदा राजनीति में किस तरह से हस्तक्षेप करते? इन सारे सवालों का जवाब उन लेखों और दस्तावेजों में मिल सकता है जो उन्होंने खुद लिखे हैं या जो उनसे संबंधित हैं.

राजनीतिक दलों के बीच भगत सिंह को अपनाने की इस कदर होड़ क्यों मची है, इसके जवाब में पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और इतिहासकार राजीव लोचन कहते हैं, ‘जीते-जी जिस भगत सिंह की राजनीतिक दलों ने अवहेलना की, उसे अब सब अपना कहने पर आमादा हैं. भगत सिंह जब अंग्रेज सरकार के हाथ लगे तो अखबारों ने रिपोर्ट में लिखा कि ‘समाजवादी क्रांतिकारी’ गिरफ्तार हुआ है. पर भारत के वामपंथी आम तौर पर भगत सिंह के मसले पर चुप रहना पसंद करते रहे. आखिर भगत सिंह वामपंथी पार्टी के सदस्य जो नहीं थे. वामपंथियों की तुलना में, कम से कम आज, भारत में कांग्रेस और भाजपा में होड़ लगी है कि किसी तरह भगत सिंह को अपना लें. जिहाद के जाल में फंसे पाकिस्तान में भी कुछ लोग भगत सिंह की याद को ताजा करने में लगे हैं. आखिर भगत सिंह की कर्म भूमि भी तो वह जमीन थी जो आज पाकिस्तान है.’

इन्हीं सवालों को लेकर लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष गाताडे कहते हैं, ‘अपने सीमित राजनीतिक जीवन में भगत सिंह ने जो भविष्यवाणी की थी, आज खुलकर उसे सामने देख रहे हैं. आजादी के बाद कुछ चीजों को लेकर भले ही भ्रम रहा हो, लेकिन अब चाहे सांप्रदायिकता के मसले को देखें, जाति के मसले को देखें या काले अंग्रेज-भूरे अंग्रेज की उनकी जो समझदारी थी, मेरे ख्याल से वो खुलकर सामने आ रहा है. एक तो उनकी भविष्यवाणी सामने आ रही है. इसके अलावा मुझे लगता है कि जो भी संकट दिख रहा है, एक तरफ तो सांप्रदायिक ताकतें हैं, दूसरी तरफ विकल्प के तौर पर जो शक्तियां हैं वे भी संकट में हैं. वामपंथी पार्टियां और आंदोलन खुद संकट में है. ऐसे समय में समाज अपने नायकों को याद करता है. बढ़े हुए संकट के दौर में भगत सिंह लोगों को अपने करीब लगने लगे हैं.’

भगत सिंह को लेकर महत्वपूर्ण शोधकार्य करने वाले प्रो. चमन लाल कहते हैं, ‘कट्टरपंथी राष्ट्रवाद के अभियान का यह चरम है कि भगत सिंह के बारे में ज्ञात तथ्यों को भी झुठलाया जा रहा है. शशि थरूर ने कन्हैया कुमार की तुलना भगत सिंह से की तो प्रतिक्रिया में भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता ने यह झूठ बोलकर भगत सिंह के प्रति शिष्टाचार की सारी हदें पार कर दीं कि ‘भगत सिंह भारत माता की जय बोलकर फांसी पर चढ़े थे.’ सारी दुनिया अब तक यही जानती है कि 23 मार्च, 1931 को फांसी के दौरान भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे लगाए थे. उन्होंने ‘सरफरोशी की तमन्ना’ गाना भी गाया था और चेहरे पर काला कपड़ा पहनने से इनकार कर दिया था. अब फर्जी राष्ट्रवादी, जिनकी पार्टी और पूर्वजों का राष्ट्र निर्माण और स्वतंत्रता संघर्ष में कोई भूमिका नहीं रही है, इतिहास को गोएबल्स की स्टाइल में उलट-पलट रहे हैं, जैसा कि हिटलर के समय किया गया था.’

इतिहासकार राजीव लोचन कहते हैं, ‘कई सालों तक गांधी जी भगत सिंह की क्रांतिकारी गतिविधियों को गौण और असंगत बताते रहे. स्वतंत्रता के बाद के काल में देश अपनी ही समस्याओं में कुछ इस तरह उलझ गया कि स्वतंत्रता संग्राम के सैनिकों को भूल ही गया. बस वे ही याद रहे जिनकी याद सरकार को रही. स्वतंत्रता के उत्साह में देश तेजी से प्रगति भी कर रहा था. ऐसे माहौल में भगत सिंह की याद कम ही लोगों को आई. पर इसके बाद के समय में भी राजनीतिक दलों ने भगत सिंह को अपने से दूर ही रखा. सरकार द्वारा कभी-कभी भगत सिंह के नाम की दुहाई जरूर दी जाती रही पर उनके विचारों को समझने या लोगों तक पहुंचाने की कोई कोशिश नहीं की गई. भगत सिंह को याद करना महज 26 जनवरी और 15 अगस्त को फिल्म ‘शहीद’ के गाने सुनने तक ही रह गया. जैसे-जैसे निजी रेडियो और टीवी स्टेशनों का जाल देश पर फैला, यह थोड़ी-सी याद भी खत्म कर दी गई. इसके बाद 1997 में भगत सिंह की याद आई कम्युनिस्टों को , देश की आजादी की 50वीं सालगिरह पर. कम्युनिस्टों को लगा कि देश की आजादी में उनके योगदान को नकारा जा रहा है.’

वे आगे कहते हैं, ‘इतिहासकार प्रोफेसर बिपन चंद्र 1990 के शुरुआती दशक में भगत सिंह को क्रांतिकारी के रूप में लोगों के सामने ले आए. इसके बाद कम्युनिस्टों ने भगत सिंह को अपना बताते हुए इक्के-दुक्के बयान दिए, भगत सिंह केे कुछ पर्चों के नए संस्करण छापे गए. फिर शांति छा गई. दस साल बाद, नई शताब्दी में दक्षिणपंथियों ने भगत सिंह पर अपना हक जताया. किसी ने उनको पगड़ी पहना दी. हालांकि अभी तक भगत सिंह की सबसे ज्यादा दिखने वाली तस्वीर में वे टोपी पहने दिखाए जाते रहे थे. किसी ने उन पर गेरुआ वस्त्र डाल दिए, तो किसी ने उन्हें भारत की सभ्यता का संरक्षक बना डाला.’

भगत सिंह समेत दूसरे क्रांतिकारियों पर महत्वपूर्ण किताबें लिखने वाले सुधीर विद्यार्थी कहते हैं, ‘शहीद भगत सिंह पर दावेदारी कोई नई बात नहीं है. यह काफी समय से जारी है. खास तौर से जब भगत सिंह की जन्म शताब्दी आई. इस वर्ष उनके सिर पर पगड़ी पहनाने का प्रयास हुआ. ये सब इसलिए ताकि भगत सिंह को जाति और धर्म के खांचे में धकेल दिया जाए ताकि उनका जो पैनापन है, जो विचार उनके पास हैं, पूरे क्रांतिकारी आंदोलन में उनकी जो छवि उभरती है उसे खत्म किया जा सके.’ भगत सिंह की प्रतीकात्मक पहचान और विचारधारा से छेड़छाड़ पर चिंता जताते हुए विद्यार्थी कहते हैं, ‘जिस व्यक्ति ने खुद कहा हो कि अभी तो मैंने केवल बाल कटवाए हैं, मैं धर्मनिरपेक्ष होने और दिखने के लिए अपने शरीर से सिखी का एक-एक नक्श मिटा देना चाहता हूं, आप उसके सिर पर फिर पगड़ी रख रहे हैं. आप यही तो बताना चाह रहे हैं कि भगत सिंह इसलिए बहादुर थे कि सिख थे. तब कहना पड़ेगा कि राम प्रसाद बिस्मिल इसलिए बहादुर थे कि ब्राह्मण थे, रोशन सिंह इसलिए बहादुर थे कि ठाकुर थे, अशफाक उल्ला इसलिए बहादुर थे कि पठान थे. आप कितना भी प्रयास कर लें भगत सिंह के सिर पर पगड़ी रखने का, लेकिन 23 साल का वह युवा क्रांतिकारी इतना बड़ा हो गया है कि उस पर कोई पगड़ी अब फिट नहीं हो सकती.’

भगत सिंह को लेकर आजकल ज्यादा शोर इसलिए सुनाई दे रहा है कि भगत सिंह को अपनाने की होड़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी शामिल हो गया है. संघ पर यह भी आरोप लगता है कि उसके प्रयासों से भगत सिंह को पगड़ी पहनाकर उन्हें धार्मिक दिखाने की कोशिश की गई. सुभाष गाताडे कहते हैं, ‘आरएसएस इस मामले में दिलचस्प है. जिस गांधी की हत्या में उनका या उनकी विचारधारा का हाथ था, जब उन पर दावा कर सकती है, तो और क्या कहा जाए. आंबेडकर जिनके विचारों से उनकी ताउम्र दुश्मनी रही, आंबेडकर ने मनुस्मृति जलाई, ब्राह्मणवाद का विरोध किया, आरएसएस उनको भी क्लेम करता है. आरएसएस को इसमें सलाहियत हासिल है. बस एक ही व्यक्ति बचते हैैं वो हैं नेहरू, क्योंकि उनकी जगह वह सरदार पटेल को अपनाता है. दूसरा, क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर आम जनमानस में जो एक छवि है कि वे पिस्तौल और बम वाले लोग थे, बड़े बहादुर थे, उसके साथ जोड़कर खुद को पेश करते हैं. वे भगत सिंह की टोपी वाली इमेज नहीं दिखाते हैं, उनको सरदार टाइप दिखाते हैं. पगड़ी पहनाकर. आरएसएस और भाजपा आंबेडकर व भगत सिंह को चुनिंदा ढंग से अपनाते हैं. इसमें प्रगतिशील लोगों की कमजोरी है कि आरएसएस नायकों को अपनाने की कोशिश कर पा रहा है.’

इतिहासकार राजीव लोचन कुछ नाराजगी भरे लहजे में कहते हैं, ‘जब भगत सिंह सक्रिय थे, उस समय राजनीतिक दल उनसे बिल्कुल परे हट कर रहते थे. भगत सिंह का जो सीधा संवाद होता था, वो गांधी के साथ होता था. बाकी हमारे जितने नेतागण थे, भगत सिंह की जब मौत हुई तो फट से पल्ला झाड़ा और उसके बाद उन्हें कभी याद नहीं किया. 1980 के बाद भगत सिंह की याद सबको आनी शुरू हुई, जब नेताओं की एनिवर्सरीज आनी शुरू हुईं. अगर आपको याद हो तो 80 और 90 के दशक में रेडियो और टीवी पर जो गाने भगत सिंह को लेकर हुआ करते थे, वे गाने बजने बंद हो गए. उस वक्त कुछ टीवी वालों ने चर्चा में मुझसे कहा था कि अब इसमें कोई दिलचस्पी नहीं लेता, इसलिए अब इसकी कोई जरूरत नहीं है. एनिवर्सरीज नजदीक आईं तो लोगों को भगत सिंह की याद आई. एक तो याद आई हमारे कम्युनिस्ट साथियों को जो कि उस वक्त भगत सिंह का पूरी तरह विरोध करते थे. अभी तो कहने भी लगे हैं कि भगत सिंह हमारे हैं, लेकिन उस वक्त सख्त खिलाफ थे. ये बेचारे इसलिए भी याद करने लगे क्योंकि 60 साल से जूते पड़ रहे थे कि तुम तो गद्दार हो, 1942 में अंग्रेजों का साथ दिया. तो उनको अचानक समझ में आया कि भगत सिंह को इस्तेमाल करके हम भी अपने को राष्ट्रवादी साबित कर सकते हैं. कम्युनिस्ट इस्तेमाल करने लगे तो जो बाकी लोग थे वे भी भगत सिंह पर टूट पड़े और भगत सिंह को सर आंखों पर उठाया. इस पूरे माहौल में बीजेपी एक पार्टी थी जो कि पीछे रही क्योंकि बीजेपी का भगत सिंह के साथ कोई भी संबंध नहीं है. अब बीजेपी ने उनको याद करना शुरू किया और बीजेपी ने जिस तरह याद किया वो हमें दिख ही रहा है.’

भगत सिंह पर असली दावेदारी किसकी है, इस सवाल पर प्रो. चमन लाल कहते हैं, ‘भगत सिंह भारत के कामगार, मजदूर, किसान, दलित और निचले वर्ग के साथ थे. 1929 से 1931 के दौरान जब भगत सिंह के केस का ट्रायल चल रहा था, उस वक्त सभी अखबार वामपंथी और ‘समाजवादी क्रांतिकारी’ लिख रहे थे. 24 जनवरी, 1930 को वे कोर्ट में ‘लाल स्कार्फ’ पहनकर पहुंचे थे और जज से अंतरराष्ट्रीय मजदूर आंदोलन के साथ एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए सोवियत यूनियन को शुभकामना भेजने का अनुरोध किया था.’

वे आगे कहते हैं, ‘एक वक्त पर भगत सिंह, चंद्रशेखर और उनके साथियों ने ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाया था, लेकिन सितंबर, 1928 में अपने संगठन के नाम में सोशलिस्ट शब्द जोड़ने के बाद ‘इंकलाब जिंदाबाद’ व ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे को अपनाया. 2 फरवरी, 1931 को लिखे उनके ‘युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं को पत्र’ में स्पष्ट रूप से ‘समाजवादी सिद्धांत’ को भारतीय स्वतंत्रता का रास्ता बताया है. कोई भी व्यक्ति जिसने ऐतिहासिक दस्तावेज पढ़े हैं, वह भगत सिंह के मार्क्सवादी सिद्धांत पर आधारित ‘समाजवादी क्रांतिकारी राष्ट्रवादी’ होने से इनकार नहीं कर सकता.’

बिपन चंद्र लिखते हैं, ‘वे मार्क्सवादी हो चले थे और इस बात में विश्वास करने लगे थे कि व्यापक जनांदोलन से ही क्रांति लाई जा सकती है. दूसरे शब्दों में जनता ही जनता के लिए क्रांति कर सकती है. अदालत में और अदालत के बाहर भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों ने जो बयान दिए, उनका सार यह है कि क्रांति का अर्थ है क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में समाज के शोषित, दलित व गरीब तबकों के जनांदोलन का विकास. भगत सिंह एक जागरूक, धर्मनिरपेक्ष क्रांतिकारी होने के नाते राष्ट्र और राष्ट्रीय आंदोलन के सम्मुख मौजूद सांप्रदायिकता के खतरे को पहचानते थे. अपने साथियों, श्रोताओं से वे बराबर कहा करते थे कि सांप्रदायिकता उतनी ही खतरनाक है जितना उपनिवेशवाद. नौजवान भारत सभा के छह नियम, जिन्हें भगत सिंह ने तैयार करवाए थे, में से दो इस तरह थे- ‘ऐसी किसी भी संस्था, संगठन या पार्टी से किसी तरह का संपर्क न रखना जो सांप्रदायिकता का प्रचार करती हो’ और ‘धर्म को व्यक्ति का निजी मामला मानते हुए जनता के बीच एक-दूसरे के प्रति सहनशीलता की भावना पैदा करना और इस पर दृढ़ता से काम करना.’

लेखक अशोक कुमार पांडेय कहते हैं, ‘भगत सिंह ने ‘वंदे मातरम’ या ‘भारत माता की जय’ की जगह ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ का नारा दिया. जाहिर है वे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सिर्फ इसलिए नहीं थे कि यह एक विदेशी हुकूमत थी. वे साम्राज्यवाद के खिलाफ थे और इसके विकल्प के रूप में समाजवाद के समर्थक. भगत सिंह निश्चित तौर पर भारत की आधिकारिक कम्युनिस्ट पार्टियों का हिस्सा नहीं थे, लेकिन अपने विचारों में वे वैज्ञानिक समाजवाद के बेहद करीब थे. आजाद हिंदुस्तान को लेकर उनके स्वप्न एक शोषण विहीन और समानता आधारित समाज के थे जिसमें सत्ता का संचालन कामगार वर्ग के हाथ में हो. वह लड़ाई उपनिवेशवाद की मुक्ति तक तो पहुंची लेकिन उसके आगे जाकर वंचित जनों के हाथ में सत्ता देकर एक समतावादी समाज की स्थापना अब भी एक स्वप्न ही है.’

भगत सिंह और उनके साथियों के उद्देश्यों को लेकर इतिहासकार बिपन चंद्र लिखते हैं, ‘भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों ने पहली बार क्रांतिकारियों के समक्ष एक क्रांतिकारी दर्शन रखा. उन्हें बताया कि क्रांति का लक्ष्य क्या होना चाहिए. 1925 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के घोषणापत्र में कहा गया कि हमारा उद्देश्य उन तमाम व्यवस्थाओं का उन्मूलन करना है, जिनके तहत एक व्यक्ति दूसरे का शोषण करता है. क्रांतिकारी लक्ष्य प्राप्त करने में दर्शन या विचारधारा की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है, इस बात को जनता तक पहुंचाने के लिए भगत सिंह ने लाहौर कोर्ट के सामने कहा था, ‘क्रांति की तलवार में धार वैचारिक पत्थर पर रगड़ने से आती है.’

भगत सिंह आज कितने प्रासंगिक हैं, इस सवाल पर लेखक अशोक कुमार पांडेय कहते हैं, ‘हमने जो आर्थिक व्यवस्था चुनी वह समतावादी होने की जगह लगातार विषमता बढ़ाने वाली साबित हुई और आज आजादी के सात दशकों बाद भी हम अपनी जनता के बड़े हिस्से को जरूरी सुविधाएं भी मुहैया नहीं करा पा रहे. सामाजिक ताना-बाना भी बुरी तरह उलझा और ध्वस्त हुआ है. एक अपेक्षाकृत बराबरी वाला संविधान अपनाने के बावजूद समाज के भीतर जातीय, धार्मिक और इलाकाई भेदभाव लगातार बढ़ता गया है. दक्षिणपंथी ताकतें मजबूत हुई हैं और धर्म का स्पेस राजनीति में घटने की जगह भयावह रूप से विस्तारित होता चला जा रहा है. कश्मीर और उत्तर-पूर्व में जिस तरह उत्पीिड़त राष्ट्रीयताओं का प्रतिरोध और दमन देखा जा रहा है वह देश के रूप में हमारी परिकल्पना को ही प्रश्नांकित कर रहा है. ऐसे में भगत सिंह को याद करना उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन की क्रांतिकारी तथा जनपक्षधर धारा को याद करना है.’

सबके अपने-अपने पक्ष हैं और सब पार्टियां और विचारक अपने तरीके से भगत को पेश करते हैं. राजीव लोचन कहते हैं, ‘पार्टियां ऐसा क्यों करती हैं? क्योंकि युवा वर्ग भगत सिंह से बहुत प्रभावित होता है. पंजाब में आप देखेंगे कि भिंडरावाले और भगत सिंह के पोस्टर एक साथ लगे. दोनों एक साथ लोगों का दिल जीतते हैं. युवाओं को लगता है बम और पिस्तौल लेकर सारी समस्या का हल खोज सकते हैं. बाकी लोग तो बेवकूफ की माफिक चर्चाएं कर रहे हैं, सॉल्यूशन तो बंदूक में है. उसे भगत सिंह भी अच्छा लग जाता है, भिंडरावाले भी अच्छा लग जाता है. भाजपा को लग रहा है कि अगर भगत सिंह उसके हो गए तो उसकी बल्ले-बल्ले. लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा. भगत सिंह के सब दस्तावेज मौजूद हैं. उन्हें इंटरनेट पर भी कोई भी देख सकता है. जब आप कहते हैं कि भगत सिंह भारत माता की जय बोलता था, तब लोगों को इसकी हकीकत आसानी से पता चल सकती है. भाजपा के लिए सबसे अच्छा ये रहेगा कि वह पहले अपना रवैया बदले, फिर भगत सिंह का नारा लगाए.’

राजीव लोचन आगे कहते हैं, ‘भगत सिंह पूरी तरह वामपंथी थे. उस समय के लोगों का भी मानना था कि वे वामपंथी हैं. असेंबली में बम फेंकने के बाद अगले दिन की खबर में यह नहीं था कि भगत सिंह ने बम फोड़ा, अखबारों ने लिखा था सोशलिस्टों ने बम फोड़ा.’

भगत सिंह के सहयोगी रहे कॉमरेड शिव वर्मा ने ‘शहीद भगत सिंह की चुनी हुईं कृतियां’ शीर्षक से एक किताब संपादित की, जो 1987 में कानपुर से छपी. इसकी भूमिका में वे लिखते हैं, ‘आम जनता यह बात नहीं जानती कि भगत सिंह वास्तव में थे क्या. वह इतना ही जानती है कि वे एक बहादुर इंसान थे जिन्होंने सांडर्स को मारकर लाला जी की हत्या का बदला लिया और सेंट्रल असेंबली में बम फेंका. यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि भगत सिंह एक उच्च कोटि के बुद्धिजीवी भी थे. इस कारण से स्वार्थी व्यक्तियों के लिए क्रांतिकारी आंदोलन और खासकर भगत सिंह के वैचारिक पक्ष को विकृ​त करना आसान हो जाता है.’

भगत सिंह और उनके साथियों को करीब से जानने वाले शिव वर्मा आगे लिखते हैं, ‘एक बुद्धिजीवी के रूप में भगत सिंह हम सबसे बहुत ऊंचे थे. जिस समय जल्लाद ने उनको जीवन के अधिकार से वंचित किया, वे मुश्किल से 23 साल के थे. इतनी कम आयु में उन्होंने बड़े अधिकार के साथ कई विषयों पर लिखा. राजनीति, ईश्वर, धर्म, भाषा, कला, साहित्य, संस्कृति, प्रेम, सौंदर्य, आत्महत्या, फौरी समस्याओं और कई दूसरे विषयों पर उन्होंने विचार व्यक्त किए थे. क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास का, उसके वैचारिक संघर्ष और विकास का गहरा अध्ययन-मनन उन्होंने किया था और उससे समुचित निष्कर्ष निकाले थे. इसलिए अगर हमें भगत सिंह को ठीक तरह से समझना है तो हमें उनकी इस पृष्ठभूमि की भी कुछ जानकारी होनी चाहिए.’

यह सच है कि राजनीतिक दावेदारी के शोर में भगत सिंह के सपनों की कोई चर्चा नहीं है. भगत सिंह के लेखों और पत्रों से गुजरते हुए आप पाएंगे कि भगत सिंह गरीब, मजदूर, शोषित, वंचित के पक्ष में साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और शोषण के विरुद्ध युद्ध की बार-बार घोषणा कर रहे थे. लाहौर षड्यंत्र केस के तीन अभियुक्तों को फांसी हुई तो इन अभियुक्तों ने मांग की कि उन्हें युद्धबंदी माना जाए और फांसी न देकर गोली से उड़ा दिया जाए. उस समय युद्धबंदियों को गोली से उड़ाया जाता था. लाहौर षड्यंत्र केस के साथियों का साथ देते हुए भगत सिंह और उनके दोनों साथियों ने भी अंग्रेज सरकार से यही मांग रखते हुए पत्र लिखा. उस पत्र में लिखा गया, ‘हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह तब तक जारी रहेगा जब तक मुट्ठी भर शक्तिशाली लोगों ने मेहनत-मजदूरी करने वाले भारतीयों और जनसाधारण के प्राकृतिक साधनों पर अपने स्वार्थसाधन के लिए अधिकार जमा रखा है. इस प्रकार से स्वार्थ साधने वाले चाहे अंग्रेज पूंजीपति हों, चाहे हिंदुस्तानी, उन्होंने आपस में मिलकर लूट जारी कर रखी हो या युद्ध, भारतीय पूंजी के द्वारा ही गरीब का खून चूसा जा रहा हो, इन बातों से अवस्था में कोई अंतर नहीं आता.’

भगत सिंह का नारा लगाकर उन पर दावा ठोंकने वाली सियासत ने इन प्रश्नों पर कब विचार किया है, जो भगत सिंह के लिए मौत के पहले के प्रश्न थे कि ‘मुट्ठी भर शक्तिशाली लोगों ने मेहनत-मजदूरी करने वाले भारतीयों और जनसाधारण के प्राकृतिक साधनों पर अपने स्वार्थसाधन के लिए अधिकार जमा रखा है.’

निचली अदालत में भगत सिंह से पूछा गया था कि क्रांति से उनका क्या मतलब है, इसके जवाब में भगत सिंह ने कहा था, ‘क्रांति के लिए खूनी लड़ाइयां अनिवार्य नहीं हैं. और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है. वो बम और पिस्तौल का संप्रदाय नहीं है. क्रांति से हमारा अभिप्राय है अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन… मजदूरों को उनके अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं. दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए तरस जाते हैं… यह भयानक असमानता और जबरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है. यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती. स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुंह पर बैठकर रंगरेलियां मना रहा है…’ भगत सिंह ने जिन सवालों को ताल ठोंककर अंग्रेज सरकार के सामने उठाया था, वही सवाल अब भारतीय संसद में तीन लाख से अधिक किसानों की आत्महत्या के बाद भी नहीं उठते. क्या भगत सिंह का ‘व्यवस्था पर भूरे साहबों’ द्वारा कब्जा कर लेने से जुड़ा शक सही नहीं हो गया है?

भगत सिंह के पास सिर्फ स्वप्न नहीं थे. उनकी निगाह में हिंसा एक ‘विवशता का हथियार’ भर थी. बाकी पूरी व्यवस्था कैसी होनी चाहिए, इसका स्पष्ट दर्शन बार-बार वे पेश करते रहे. लेकिन उन्होंने शहादत इसलिए दी कि उनकी शहादत ‘युवाओं को मदहोश करेगी और वे आजादी और क्रांति के लिए पागल हो उठेंगे.’ वे ‘बम और पिस्तौल का रास्ता’ अपनाकर खून बहाने की जगह युवाओं को सलाह देते हैं कि ‘करोड़ों लोगों को जागरूक करना’ हमारा कर्तव्य है. वे अदालत में स्वीकार करते हैं कि ‘हम मानव जीवन को अ​कथनीय पवित्रता प्रदान करते हैं और किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुंचाने के बजाय हम मानव-सेवा में हंसते-हंसते अपने प्राण विसर्जित कर देंगे.’ इंसानियत के बचाव और शोषण के विरुद्ध उनके बलिदान की चर्चाएं करने की जगह सिर्फ उनकी विरासत पर कब्जे की कोशिश क्या भगत सिंह को दोबारा फांसी देने के समान नहीं है?

भगत सिंह ने अपनी जेल डायरी में पृष्ठ 24 पर एक स्पेनी शिक्षक फ्रांसिस्को फेरेर, जिन्हें षड्यंत्र के तहत फांसी दी गई थी, की वसीयत लिखी. इसमें कहा गया है, ‘मैं अपने दोस्तों से यह भी कहना चाहूंगा कि वे मेरे बारे में कम से कम चर्चा करेंगे या बिल्कुल ही चर्चा नहीं करेंगे, क्योंकि जब आदमी की तारीफ होने लगती है तो उसे इंसान के बजाय देवप्रतिमा-सा बना दिया जाता है और यह मानव जाति के भविष्य के लिए बहुत बुरी बात है. सिर्फ कर्मों पर ही गौर करना चाहिए, उन्हीं की तारीफ या निंदा होनी चाहिए, चाहे वे किसी के द्वारा किए गए हों. अगर लोगों को इनसे सार्वजनिक हित के लिए प्रेरणा मिलती दिखाई दे तो वे इनकी तारीफ कर सकते हैं, लेकिन अगर ये सामान्य हित के लिए हानिकारक लगें तो वे इनकी निंदा भी कर सकते हैं, ताकि फिर इनकी पुनरावृत्ति न हो सके… मरे हुए के लिए खर्च किए जाने वाले समय का बेहतर इस्तेमाल उन लोगों की जीवन दशाओं को सुधारने में किया जा सकता है जिनमें से बहुतेरों को इसकी भारी आवश्यकता है.’ क्या भगत सिंह के नाम पर नारा लगाकर शोर मचाने वाले सत्ताधारी उनकी इस विरासत पर अमल करेंगे?

(यह लेख अप्रैल, 2016 में तहलका पत्रिका में छप चुका है.)

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

कैराना के मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है : हुकुम सिंह

भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने कुछ दिन पहले 346 हिंदू परिवारों की सूची जारी करते हुए दावा किया कि कैराना से
हिंदुओं का पलायन हो रहा है और इसे कश्मीर बनाने की कोशिश की जा रही है. उनका दावा था कि यहां हिंदुओं को धमकाया जा रहा है, जिससे हिंदू परिवार बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं. हुकुम सिंह और भाजपा ने उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था पर सवाल उठाए. हुकुम सिंह का कहना था कि उन्होंने कैराना से पलायन करने वाले हर घर का सत्यापन कराया है, जबकि बाद में मीडिया रिपोर्टों में उनकी सूची पर सवाल उठाए गए. हालांकि, इस मसले पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी राज्य सरकार को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है. दूसरी तरफ भाजपा ने अपना जांच दल भी भेज दिया तो भाजपा नेता संगीत सोम ने भी निर्भय यात्रा आयोजित कर डाली. भाजपा इस मसले का चुनावी लाभ लेने की पूरी तैयारी में है, लेकिन अब हुकुम सिंह कह रहे हैं कि यह मसला सांप्रदायिक नहीं बल्कि राजनीतिक है. दूसरी ओर, जिला प्रशासन ने अपनी जांच में हुकुम सिंह और भाजपा पर गंभीर सवाल उठाए हैं. हुकुम सिंह से इस बारे में बातचीत.


आपने अपने क्षेत्र कैराना के बारे में यह मसला उठाया था कि वहां से पलायन हो रहा है. असलियत क्या है?

आपको मौका लगे तो कैराना विजिट कर लीजिए. कैराना अब किसी भले आदमी के रहने लायक रहा नहीं. परिस्थिति जैसी उभर कर आ रही है, मौके पर उससे ज्यादा गंभीर है. मैंने 346 लोगों की लिस्ट दी थी, जो मुझको मिल सकी. हर चीज की कुछ बातें होती हैं. मैंने लिस्ट दी थी 346 की. अब इतना तो संभव है नहीं कि उनका आईडी कार्ड भी लेता. मेरे सामने एक रिपोर्ट आई कि यहां से पलायन हो रहा है. पलायन तो मेरे सामने बहुत समय से हो रहा था. यहां गुंडागर्दी का, अपराधीकरण का मामला इतना बढ़ गया था कि किसी भी व्यापारी के लिए वहां रहना मुश्किल था. उनका मुख्य टारगेट वहां का व्यापारी था क्योंकि व्यापारी कभी भी लड़ना नहीं चाहता, न लड़ना उसके वश का है. और लोग समझते हैं कि व्यापारी है, जल्दी पैसा दे ही देगा. तो उन्हीं को टॉरगेट किया गया. किसी से दो लाख, किसी से पांच लाख, किसी से दस लाख मांगे गए. जिसने दे दिया तो उसकी रकम और बढ़ा दी गई. फिर ये हुआ कि किसी ने कहा कि साब मैं तो दो ही दे पाऊंगा तो उन्हें सबक सिखाने और संदेश देने के लिए कि जो मेरी बात नहीं मानेगा, हम उसका इलाज ये करते हैं. फिल्मी स्टाइल में आकर कहते थे कि क्या हमारी औकात एक लाख की है. हमने तो इतने पैसे मांगे थे. हम उसी का सबक सिखाने आए हैं और उसे वहीं पर मार दिया, फिर हथियार लहराते हुए पूरे बाजार में घूमते हुए चले गए. इससे पूरे बाजार में क्या मैसेज जाएगा? इसके चलते लोग वहां से पलायन कर गए. अब लोग कह रहे हैं कि मुस्लिमों का भी पलायन हुआ. मैं जिम्मेदारी के साथ कहता हूं कि मुसलमानों का पलायन नहीं हुआ, क्योंकि वहां मुस्लिम व्यापारी नहीं थे. अगर रहे होते तो वे भी इसी तरह टारगेट बनते. सारा व्यवसाय वहां पर दो समाजों के लोग करते हैं, वैश्य समाज और जैन समाज. उन्हीं को निशाना बनाया गया. लोग वहां से गए और अभी और जाएंगे.

जब इस तरह सरेआम हत्या और फिरौती की घटनाएं हुईं तो ऐसे तत्वों को रोका क्यों नहीं गया? कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

हत्या हुई तो एफआईआर भी हुई. जहां तक पकड़े जाने की बात है तो मैं बता देता हूं कि कैराना में दो गैंग हैं. मुकीम और फुरकान. ये दो कुख्यात नाम हैं, जिन्होंने अपना माहौल बनाया. दोनों संयोग से मुस्लिम हैं इसलिए ये मामला सांप्रदायिक बनाया जा रहा है. मैं पहले दिन से कह रहा हूं कि यह सांप्रदायिक मामला नहीं है. हमें कम्युनल और क्रिमिनल में अंतर करना चाहिए. और ये भी मैं बता रहा हूं कि ये जो कम्युनल बनाने की साजिश है. इसमें एक तो मीडिया का हाथ है उसे छोड़ दीजिए, इसके पीछे का एक कारण ये भी है कि अगर कम्युनल बन गया तो इन दोनों गैंग्स को प्रोटेक्शन मिल जाएगा कि मुसलमान होने के नाते हमें फंसाया गया.

आपके प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद ही मीडिया में खबरें छपीं और यह संदेश प्रसारित हुआ कि मुसलमानों के खौफ से हिंदुओं का पलायन हो रहा है.

नहीं-नहीं, ये कहीं नहीं लिखा गया. मैं असहमत होने की इजाजत चाहता हूं. मेरा स्टैंड शुरू से ही यही रहा है कि अपराधियों के खौफ से लोग गए हैं और अपराधी संयोग से मुस्लिम हैं. मैंने अपना स्टैंड कभी नहीं बदला.

लेकिन स्पष्ट सूचना के साथ खबरें छपीं कि हिंदुओं का पलायन हो रहा है. कश्मीर से तुलना की गई.

मैंने नाम सब दिए हैं और वे सब नाम हिंदू हैं. अब उसको हिंदू पलायन लिखूं या न लिखूं, क्या फर्क पड़ता है. वे सभी हिंदू हैं, उनके नाम दिए हैं, उनका पेशा दिया गया है, मैंने पते दिए हैं उनके. सब हिंदू हैं तो हिंदू हैं.

जब लोगों ने, पत्रकारों ने वहां जाकर चेक किया तो सूची में गड़बड़ियां पाई गईं. आप पर आरोप लगा कि आप झूठ बोल रहे हैं और माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि विधानसभा चुनाव आ रहा है.

अगर अपराधियों के खिलाफ या अपराधियों के बारे में बात करूंगा तो कम्युनल माहौल बनेगा, मुझे तो यह विश्वास नहीं है, न कभी बना है आज तक. और रही चुनाव की बात, तो कम से कम मैंने उन अपराधियों को चैलेंज तो किया. वो अपराधी कुछ लोगों के काम आते होंगे चुनाव में, मैं तो उनसे काम लेना चाहता नहीं. मैं उनका विरोध आज भी कर रहा हूं, कल भी करूंगा. परिणाम जो भी हो. मैं चुनाव में बाहुबल की चिंता नहीं करता.

आप सांसद हैं. आप ही खौफ में रहेंगे तो जनता का क्या होगा?

यही तो मैं कह रहा हूं. खैर, ऐसी कोई बात नहीं है. आप भी जानते होंगे कि सांसद और विधायक भी कुछ ऐसे होते होंगे, हमारी असेंबली में ऐसे विधायक आज भी हैं जो मूंछें तानकर चलते हैं, जिनसे लोग घबराते हैं. वे जेल में आते हैं हाजिरी लगाने के लिए.

हमारा जो मुख्य सवाल है वो ये है कि चाहे कैराना हो या मुजफ्फरनगर हो, या कहीं भी हो, कोई व्यक्ति उगाही करता है, लोगों को धमकाता है तो पहला काम ये होना चाहिए कि उस पर कार्रवाई हो. उस पर मुकदमा होना चाहिए. ये तो हुआ नहीं. बदमाश तो बेखौफ रहे.

नहीं, ये हुआ है. मैं स्पष्ट कर देता हूं. मुकीम का नाम आया. पहली बार मैंने जब इसका नाम सुना तो सहारनपुर में पेट्रोल पंप पर लूट की थी. पुलिस को जानकारी मिल गई. गाड़ी में बैठकर भागा और पुलिस ने उसका पीछा किया. थोड़ी देर के बाद जब इसकी गाड़ी मुड़ रही थी, एक बहादुर सिपाही ने उतरकर उसको पकड़ना चाहा. इस आदमी ने फुर्ती दिखाई और उसको गोली मार दी. उसकी गन वगैरह भी छीन ली जो आज तक मिली नहीं. आपने कहा उसको पकड़ा जाना चाहिए. उसने कैराना में तो कुछ लोग मारे ही, धीरे-धीरे अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाया. हरियाणा की पुलिस इसके पीछे पड़ गई. वह इसका एनकाउंटर करना चाहती थी. मेरा आरोप ये है कि पुलिस ने किसी नेता के कहने से, मैं नाम नहीं लूंगा, आप दबाव भी मत बनाइए, दबाव बनाकर इसके सरेंडर की नौटंकी की और इसे जेल भिजवा दिया ताकि ये सुरक्षित रहे. जेल में जाकर वह सुरक्षित हो गया और वसूली का काम और तेज कर दिया. मोबाइल पर वो फोन करता था और किसी की औकात नहीं थी कि उसका मोबाइल सुनने के बाद उसे रकम न पहुंचाए. उसने वसूली के लिए अपने एजेंट छोड़ रखे थे. बहुत दिन तक ये क्रम चला. मैंने खुद इस बात की कई बार शिकायत की कि वह तो जेल जाकर और खतरनाक हो गया. मेरे कहने पर उसे जेल से ट्रांसफर किया गया. लेकिन जहां ट्रांसफर किया गया, वहां से भी वही क्रम चलता रहा.

लेकिन आप सांसदों और विधायकों के कहने से भी अगर किसी अपराधी पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है तो यह तो बड़ी गंभीर स्थिति है.

केंद्र सरकार को इसका संज्ञान लेना चाहिए. हमारी लीडरशिप को इसकी जानकारी है. निर्णय उनको लेना है. हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद इसका जिक्र कर चुके हैं राष्ट्रीय कार्यकारिणी में. अब राष्ट्रीय नेतृत्व की जानकारी में तो सारी बात है ही.

प्रशासन की जांच में तो आपकी बात खारिज कर दी गई है?

देखिए, प्रशासन की जांच में वहीं सामने आएगा जो उनके लखनऊ वाले आका चाहेंगे. अगर आपको असली हालात देखना है तो मैं आपको एक नाम बताता हूं. उनका नाम है सूर्य प्रताप सिंह. वो मुजफ्फरनगर में जिलाधिकारी थे. कैराना तब मुजफ्फरनगर का हिस्सा होता था. उन्होंने स्टेटमेंट जारी किया है कि मैं जिलाधिकारी था मुजफ्फरनगर का और कैराना की हालत ऐसी है जहां पर रात में तो छोड़िए, दिन में भी पुलिस की घुसने की हिम्मत नहीं है. कैराना के हालात इतने खराब हैं जिसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. वे प्रिंसिपल सेक्रेटरी के पद से अभी रिटायर हुए हैं. अब ये जो दो-दो महीने पहले आए हुए मजिस्ट्रेट हैं, इनकी जांच वह होगी जो इनको कहा जाएगा. हमने असेंबली में भी ये मुद्दा उठाया था, उसके बाद कुछ अधिकारी हटाए गए और जो अधिकारी आए उन्होंने कुछ करके भी दिखाया. जब तक वो रहे तो किसी की हिम्मत नहीं हुई वसूली करने की. लेकिन उनको एक-डेढ़ महीने में हटा दिया गया. अब इससे अधिकारी का मनोबल टूटेगा कि नहीं? स्थिति बड़ी गंभीर है. ऐसा नहीं है कि मेरे मन में कुछ है क्योंकि चुनाव आ रहा है. मैं 2013 से बराबर कह रहा हूं कि कैराना की हालत बहुत खराब है. कभी-कभी कार्रवाई भी हुई लेकिन ऐसा नहीं हो पाया कि हालत ठीक हो जाए.

लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया में इस तरह प्रसारित हो गया है कि यह सांप्रदायिक मसला है. इसका असर देश के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ेगा.

मैं बता रहा हूं आपको. मैं अपनी बात ही बता सकता हूं. यह पहले दिन से ही शुरू हो गया था और यह तो होना ही था. बहरहाल, रिपोर्ट रोचक तो तभी बनेगी जब उसमें पैबंद लगाए जाएंगे. हेरफेर किया जाएगा. अगर मेरा सीधा बयान ये हो कि अपराधियों ने अपराध कर दिए और लोग चले गए तो मेरे ख्याल से आधे कॉलम की, चौथाई कॉलम की न्यूज बनकर खत्म हो जाएगी. इसलिए उसे रंग दिया गया सांप्रदायिकता का. मैं पहले दिन से ही कह रहा हूं कि यह सांप्रदायिक मामला नहीं है. ये खाली अपराधियों का मामला है. यह संयोग की बात है कि जितने इसमें पीड़ित हैं वे सारे हिंदू हैं और जो क्राइम करने वाले हैं वे मुस्लिम हैं, लेकिन वे मुस्लिम नाम से हैं. वे मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि नहीं हैं. ये गुंडे-बदमाश, जिन्होंने जीना हराम कर दिया, वे समाज के प्रतिनिधि कैसे हो सकते हैं? मैं पहले दिन से कह रहा हूं लेकिन इस बात में आनंद तो नहीं आने का. जब तक ये न कहूं कि हिंदू मामला है. मैंने जो  बयान पहले दिन दिया था, अपने स्टैंड पर कायम हूं. एक इंच इधर से उधर नहीं होऊंगा.

तो इसे सांप्रदायिक रंग किसने दिया?

अपने आप हो गया सांप्रदायिक रंग. (लोग) जो पढ़ेंगे, देखेंगे कहीं. लोग क्या देखते हैं, टेलीविजन. लोग पढ़ते क्या हैं, अखबार. वे मेरी रिपोर्ट थोड़े पढ़ते हैं.

लेकिन रिपोर्ट तो उसी आधार पर बनती है जो आप बोलते हैं.

आधार… आधार जितना है वह तथ्यात्मक है. ये आदमी है पीड़ित और ये है अपराधी. मैंने इतना बता दिया. ये तथ्य हैं. लेकिन वह आकर्षक न्यूज नहीं है. फिर वो मुझसे सवाल करेंगे कि आप तो सारी घटना का सांप्रदायिकीकरण कर रहे हैं क्योंकि चुनाव आने वाले हैं. आपके राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा है कि हम मुद्दा बनाएंगे. उन्होंने जो कहा है वो ये कहा है कि कैराना और मथुरा में जो कानून व्यवस्था चौपट हुई है, उसको मुद्दा बनाएंगे. मथुरा में तो कोई सांप्रदायिकता नहीं थी न. लेकिन बात आगे तभी बढ़ेगी जब कहा जाएगा कि भाजपा ये कर रही है, वो कर रही है. भाजपा इसको भुनाना चाहती है.

मैं पूछता हूं कि जितने आप लोगों ने वेरीफाई कर लिए होंगे, दस परिवार भी किए होंगे, मेरा सवाल बस इतना है कि क्या उन दस परिवारों को वापस लाने का प्रयास किया और ये आश्वासन दिया कि हम आपको सुरक्षा देंगे? उस तरफ तो एक कदम नहीं बढ़ा. मेरी लिस्ट को कैसे छोटा करें, सारा प्रयास इस पर है.

क्या जिस इलाके में दंगा हो चुका है, हजारों लोग विस्थापित हो चुके हैं, ऐसे संवेदनशील इलाके में ऐसा मसला उठाते हुए सावधानी नहीं रखनी चाहिए?

अब इससे ज्यादा सावधानी क्या हो सकती है कि मैं पहले दिन से कह रहा हूं कि यह सांप्रदायिक मसला नहीं है? जो बात आपने कही, ये मेरे दिमाग में भी थी. मैंने बोलना यहीं से शुरू किया कि यह सांप्रदायिक मसला नहीं है. अभी तक सिर्फ एक मसला पता चला है जहां मुस्लिम परिवार से रंगदारी मांगी गई थी और उनको जाना पड़ा. बाकी कोई मुस्लिम परिवार नहीं गया. वहां पर ऐसा भी हो रहा है कि सारा जिला प्रशासन लगाकर फर्जी आदमी खड़े करके उनसे कहलवाया जा रहा है कि मैं तो यहीं हूं जी. मैं तो कहीं गया नहीं. मैं वहां पर सांसद हूं, लेकिन मैं वहां पर सरकार नहीं हूं. मैं किस-किसको झूठा साबित करूंगा. मैं तो बस ये उम्मीद कर रहा हूं कि सुरक्षा की व्यवस्था कर दीजिए. लेकिन यहां तो चुनाव का मामला है, कोई कुछ कह रहा है कोई कुछ. चल रहा है, ऐसे ही चलता रहेगा.

मैं ये जानना चाहता हूं कि आपके संसदीय क्षेत्र में अगर इस तरह अपराध बढ़ता है, प्रशासनिक समस्या आती है तो किस हद तक आप जा सकते हैं, कितना हस्तक्षेप कर सकते हैं?

पूरा हस्तक्षेप, जिस हद तक जाना उचित हो, उस हद तक जाऊंगा.

तो ये अभी तक कैसे चलता रहा कि लंबे समय से वहां गुंडे उगाही करते रहे?

हम उठाते रहे बात को. कुछ गंभीर घटनाएं भी हुईं जब महिलाओं को घर से खींचकर बलात्कार किया गया. गैंगरेप के बाद मर्डर किया गया. तब कोई विकल्प नहीं रह गया था सिवाय इस बात के कि खड़े हो जाओ, एक्सपोज करो. जो होगा देखा जाएगा.

ये तो प्रशासनिक स्तर पर कोशिश करके आपको रुकवाना चाहिए था. आपने प्रयास किया, प्रशासन ने प्रयास किया लेकिन वह सब तो रुका नहीं और लोग वहां से जा रहे हैं.

प्रशासनिक स्तर पर सहयोग भी हमेशा देता हूं, खड़ा करने की कोशिश भी करता हूं लेकिन जब इतने कमजोर अधिकारी आ जाएंगे कि बदमाशों को सरेंडर कराएंगे तो क्या होगा.
(यह इंटरव्यू तहलका में 30 June, 2016 के अंक में छप चुका है.)

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एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...