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गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

जिसका सूरज नहीं डूबता था, वह गांधी के प्रति नफरत के गंदले में डूब गया

विंस्टन चर्चिल एक ऐसे साम्राज्य का शासक था जिसके बारे में कहते हैं कि उसका सूरज कभी नहीं डूबता था. लेकिन चर्चिल महात्मा गांधी से नफरत करता था. उसकी गांधी के प्रति यह नफरत भारतीयों के प्रति नफरत का प्रतिबिंब थी. उसने गांधी को हिकारत से “भूखा नंगा फकीर” कहा. कैबिनेट में उसके सीनियर रह चुके Leo Amery के मुताबिक, एक बार उसने भारतीयों को “पाशविक धर्म के अनुयायी पाशविक लोग” कहा था.

महात्मा गांधी ने जब भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की और 'करो या मरो' जैसा निर्णायक नारा दिया तो गांधी को हिंसा फैलाने के आरोप में जेल में डाल दिया गया.

इसके बाद चर्चिल ने Leo Amery को पत्र लिखा, “भारत सरकार के दस्तावेज खंगालो और गांधी के खिलाफ ऐसे सबूत एकत्र करो कि वह जापान के साथ मिलकर षडयंत्र कर रहा है.” Leo Amery ने जवाब दिया, “ऐसे कोई सबूत मौजूद नहीं है. सिवाय इसके कि दो जापानी बौद्ध भिक्षु एक बार उनके वर्धा आश्रम में आए थे.”

गांधी पर हिंसा फैलाने का आरोप झूठा था, जिसके विरोध में गांधी ने जेल में ही अनशन शुरू कर दिया. इस पर चर्चिल को संदेह था कि यह गांधी असल में अनशन नहीं करता, यह चोरी से कोई सप्लीमेंट लेता है. इसमें तथ्य नहीं था, यह उसकी नफरत थी.

उसने ​वायसराय लिनलिथगो को तार भेजा, “हमने सुना है कि गांधी अनशन के दौरान ग्लोकोज लेते हैं. क्या इसकी पुष्टि की जा सकती है?”

दो दिन बाद वायसराय का जवाब आया कि यह संभव नहीं है. “गांधी पिछले फास्ट के दौरान खुद सतर्क थे कि कहीं उनके पानी में ग्लोकोज न मिलाया हो. उनकी देखरेख करने वाले डॉक्टर ने उन्हें मनाने की कोशिश भी की लेकिन उन्होंने ग्लूकोज लेने से मना कर दिया.”

गांधी के अनशन को तीसरा हफ्ता शुरू हो गया. चर्चिल ने फिर तार भेजा कि “गांधी 15 दिन तक जिंदा कैसे है. यह एक फ्रॉड है, जिसका खुलासा होना चाहिए. कांग्रेस के हिंदू डॉक्टर चुपके से उसे ग्लूकोज दे रहे होंगे.”

वायसराय ने अपना घोड़ा खोल दिया लेकिन कोई सबूत नहीं मिला. वायसराय ने फिर ​चर्चिल को लिखा, 'यह आदमी दुनिया का सबसे बड़ा फ्रॉड है'. लेकिन हमें कोई सबूत नहीं मिला. चर्चिल का साम्राज्य साबित नहीं कर पाया कि गांधी का अनशन एक धोखा है.

जो ​चर्चिल कहता था कि गांधी से कोई बातचीत सिर्फ मेरी लाश की कीमत पर हो सकती है, वह गांधी को ज्यादा समय कैद में भी नहीं रख पाया. भारत आजाद हो गया.

1951 में चर्चिल की वॉर मेमोरी The Hinge of Fate प्रकाशित हुई. उन्होंने इसमें गांधी पर ग्लूकोज लेकर अनशन करने का आरोप फिर दोहराया. इस बार आजाद भारत ने उन्हें जवाब दिया कि ​चर्चिल की औकात नहीं है कि वे गांधी को पहचान पाएं.

चूंकि विंस्टन चर्चिल भारतीयों को तुच्छ समझता था, इसलिए गांधी और नेहरू जैसे नेताओं के प्रति उसकी नफरत वक्त बेवक्त बाहर आती रहती थी.

1945 में लंदन में संयुक्त राष्ट्र की असेंबली का पहला सत्र आयोजित हुआ. इंडियन डेलीगेशन की अगुआई कर रही थीं नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित. सत्र के दौरान चर्चिल उनके बगल बैठे थे. अचानक चर्चिल ने विजयलक्ष्मी पंडित से पूछा, 'क्या आपके पति को हमने नहीं मारा? सच में हमने नहीं मारा?'

विजयलक्ष्मी पंडित के पति रणजीत सीताराम पंडित की जेल में मौत हो गई थी. चर्चिल इसी बारे में बात कर रहा था. विजयलक्ष्मी पंडित सकपका गईं, लेकिन थोड़ा सोचकर बोलीं, 'नहीं, हर आदमी अपने निर्धारित वक्त तक जिंदा रहता है.'

हालांकि, इस जवाब के बाद दोनों में मित्रवत व्यवहार हुआ. बाद में चर्चिल ने विजयलक्ष्मी पंडित से कहा, 'तुम्हारे भाई जवाहर लाल ने मनुष्य के दो दुश्मनों पर विजय पा ली है, नफरत और डर, जो कि मनुष्य के बीच सर्वोच्च सभ्य दृष्टिकोण है और आज के माहौल से गायब है.'

इसके कुछ समय बाद नेहरू महारानी के राज्याभिषेक में शामिल होने लंदन गए. समारोह खत्म हुआ तो संयोग से वहां नेहरू और च​र्चिल ही बचे, बाकी लोग चले गए. चर्चिल नेहरू की तरफ घूमे और कहा, 'मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, यह अजीब नहीं है कि दो लोग जिन्होंने एक दूसरे से बेहद नफरत की हो, उन्हें इस तरह से एक साथ फेंक दिया जाए?'

नेहरू ने जवाब दिया, 'लेकिन मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, मैंने आपसे कभी नफरत नहीं की.'

चर्चिल ने फिर कहा, 'लेकिन मैंने की, मैंने की.'

फिर उसी शाम डिनर पर चर्चिल ने नेहरू के लिए कहा, 'यहां एक ऐसा आदमी बैठा है जिसने नफरत और डर को जीत लिया है.'

1945 में चर्चिल को ब्रिटेन की जनता से सत्ता से उखाड़ फेंका. 47 में भारत आजाद हो गया.

Judith Brown किताब Nehru: A Political Life कहती है कि आजादी के बाद 1948 में जब चर्चिल की नेहरू से मुलाकात हुई तो ​चर्चिल ने भारत की आजादी का विरोध करने के लिए नेहरू से माफी मांगी थी.

जब तक ​चर्चिल को समझ में आया कि भारत की आजादी की लड़ाई की अगुआई करने वाले गांधी और नेहरू क्या चीज हैं, तब तक देर हो चुकी थी.

भारत के लोगों और गांधी से नफरत करने वाला चर्चिल हार गया. नफरत से भरे एक पिद्दी के हाथों जान गंवा कर भी गांधी जीत गया. गांधी के हत्यारे को दुनिया हत्यारे के रूप में ही जानेगी. भारत गांधी के देश के रूप में जाना जाएगा.

इसलिए गांधी से नफरत करने वालों से अपील है कि गांधी से नफरत मत करो, हार जाओगे. गांधी के प्रति अपने अंदर नफरत भर तो लोगे, लेकिन गांधी के बराबर आत्मबल कहां से लाओगे?

भारत के राष्ट्रपिता को नमन!

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(संदर्भ: इतिहासकार रामचंद्र गुहा, बिपनचंद्र, प्रोफेसर विश्वनाथ टंडन, टेलीग्राफ)

शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

गांधी और भगत सिंह के नाम झूठ कौन फैला रहा है?


कुछ सालों से नई पीढ़ी के दिमाग में भरा गया है कि महात्मा गांधी चाहते तो भगत सिंह की फांसी रुक सकती थी लेकिन उन्होंने नहीं चाहा। सोशल मीडिया पर यह मूर्खता खूब चल रही है। जानबूझ कर गलत तथ्य देकर गांधी को भगत सिंह के खिलाफ खड़ा किया जाता है, जैसे पटेल को नेहरू के खिलाफ खड़ा किया जाता है। 


मजेदार है कि यह बात उस विचारधारा के लोग फैला रहे हैं जो उस समय भगत सिंह और उनके साथियों का मजाक उड़ा रहे थे। अपने मुखपत्र में इनका कहना था कि 'ताकतवर से लड़ना बुजदिली है, इसलिए अंग्रेजों से लड़ने की जगह उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। इसके लिए शम्सुल इस्लाम को पढ़ा जा सकता है जहां मुखपत्र और महान गुरुजी की लेखनी के उद्धरण मौजूद हैं।

अंग्रेजी हुक्मरानों को उस समय सफलता नहीं मिली थी, लेकिन सत्तर सालों बाद उनके षड्यंत्र की विषवेल फलफूल रही है। गांधी और भगत सिंह को एक दूसरे का दुश्मन बताया जा रहा है।

सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी किताब "भारत का स्वाधीनता संघर्ष" में लिखा है-"महात्मा जी ने भगत सिंह को फांसी से बचाने की पूरी कोशिश की। अंग्रेजों को गुप्तचर एजेंसियों से पता चला कि यदि भगत सिंह को फांसी दे दी जाये और उसके फलस्वरूप हिंसक आंदोलन उभरेगा, अहिंसक गांधी खुलकर हिंसक आंदोलन का पक्ष नहीं ले पाएंगे तो युवाओं में आक्रोश उभरेगा। वे कांग्रेस और गांधी से अलग हो जायेंगे। इसका असर भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को समाप्त कर देगा।"

पर शुक्र है उस समय भारतीय जनता ने अंग्रेजी साम्राज्यवादी चाल को विफल कर दिया। कुछ नवयुवकों ने आक्रोश में आकर काले झण्डों के साथ प्रदर्शन किया लेकिन उसके बाद ही हिंसक आंदोलन का अंत हो गया। महात्मा गांधी ने अफसोस के साथ कहा, मैंने सारे प्रयत्न किए लेकिन हम सफल नहीं हुए। जो विरोध कर रहे हैं उनको गुस्सा निकालने दीजिए। भगत ने देश की आजादी के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है। बलिदान का ऐसा उदाहरण कम मिलता है।

यह सच है कि अपने जीवन में पहली बार किसी व्यक्ति- भगत सिंह की सजा कम करने के लिए कहने वाले गांधी जी की बात यदि अंग्रेजी हुकूमत द्वारा मान ली गई होती तो इसका सबसे अधिक लाभ गांधी जी का होता, उनकी अहिंसा की विजय होती।

अंग्रेजों की यह साजिश थी कि ऐसी रणनीति बनाई जाये कि अवाम को ऐसा लगे महात्मा के अपील पर फांसी रुक जायेगी, महात्मा ने स्वयं वाइसराय से मिलकर लिखित रूप में अपील की कि भगतसिंह की फांसी रोक दी जाये।

लेकिन अचानक समय से पहले ही भगत सिंह को फांसी दे दी गई। करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन प्रारम्भ होने से पहले ही फांसी देने का एक मात्र मकसद था गांधी के प्रति नवयुवकों में विद्रोह पैदा करना।

भगत सिंह ने स्वयं फांसी के पूर्व अपने वकील से मिलने पर कहा था- मेरा बहुत बहुत आभार पंडित नेहरू और सुभाष बोस को कहियेगा, जिन्होंने हमारी फांसी रुकवाने के लिए इतने प्रयत्न किये।

इतना ही नहीं भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह जी जिन्होंने 23 मार्च को अपना पुत्र खोया था, 26 मार्च को कांग्रेस अधिवेशन में लोगों से अपील कर रहे थे- आप लोगों को अपने जेनरल महात्माजी का और सभी कांग्रेस नेताओं का साथ जरूर देना चाहिए। सिर्फ तभी आप देश की आजादी प्राप्त करेंगे।

इस पिता के उदगार के बाद पूरा पंडाल सिसकियों में डूब गया था। नेहरू, पटेल, मालवीय जी के आंखों से आंसू गिर रहे थे।

वैसे यह झूठ फैलाने वाले दंगापंथियों से एक सवाल है कि जब भगत सिंह को फांसी हो रही थी तब आरएसएस के कई बड़े नेता जैसे हेडगेवार, गोलवलकर, सावरकर, मुंजे आदि क्या कर रहे थे? भगत की फांसी रुकवाने के लिए इन लोगों ने क्या किया? जवाब ज़ाहिर तौर पर यही है कि कुछ नहीं। वे शाखा लगा रहे थे और जिन्ना के साथ हिन्दू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र का खेल रहे थे। जब पूरा देश भारत छोड़ो आंदोलन में लाठियां और गोलियां खा रहा था, तब जनसंघ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अंग्रेजों के लिए कैंप लगाकर सैनिकों की भर्ती कर रहे थे, ताकि हिंदुस्तान के युवा अंग्रेजों की फौज में भर्ती होकर अंग्रेजों की तरफ से विश्वयुद्ध में भाग ले सकें.

भगत सिंह को फांसी हुई तो आरएसएस के मुखपत्र में लेख लिखकर क्रांतिकारी नौजवानों को 'बुजदिल' कहकर उनको अपमानित करने का काम इन्होंने जरूर किया था।
कहते थे कि हम शाखाओं में देश पर मर मिटने वाले युवक तैयार करेंगे। लेकिन अंग्रेजों को लिखित में दे रखा था कि आरएसएस क्रांतिकारी आंदोलन से दूर रहेगा।

संघ शाखा लगाता रहा, लाठी भांजता रहा और तबतक भारत की जांबाज जनता ने देश आजाद करा लिया। जिन मुस्लिमों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को गोलवलकर हिंदुओं का दुश्मन बता रहे थे, वे सब मिलकर लड़े और देश आजाद हो गया।

अब जिन्होंने आज़ादी आंदोलन में नाखून तक न कटवाया, उल्टा राष्ट्रीय आंदोलन के साथ गद्दारी की, वे सबसे बड़े ठेकेदार बनकर सर्टिफिकेट बांटते फिर रहे हैं कि नेहरु ऐसे थे, गांधी ऐसे थे...

इनको इतिहास में जाकर सौ साल पुराना हिसाब इसीलिए करना है क्योंकि ये अपने अतीत से शर्मिंदा हैं। वरना इतिहास का सिर्फ इतना महत्व है कि उससे सबक लिया जाए। नेताओं की गलतियों से बड़ी है लाखों लोगों की कुर्बानी और उसका सम्मान! लेकिन लिंचतंत्र उसे भी अपमानित ही कर रहा है।

सौ साल पहले जो हुआ उसे आज सुधारा नहीं जा सकता, लेकिन नेहरू नेहरू करने में संघ परिवार को बहुत मजा आता है क्योंकि अपना बताने को कुछ है नहीं। इसलिए झूठ फैलाते रहते हैं।


शुक्रवार, 31 मई 2019

क्या नेहरू सरकार का पहला संविधान संशोधन प्रेस के खिलाफ था?

हमारे अजीज अरुण तिवारी ने तीन चार दिन पहले #नेहरूकीविरासत सीरीज में एक पोस्ट लिखी, एक पोस्ट लिखी कि 'भारत के गणतंत्र बन जाने के ठीक 18 महीने बाद पहला संविधान संशोधन प्रेस फ्रीडम को दबाने के लिए किया गया था. मद्रास की एक पत्रिका क्रॉस रोड्स नेहरू जी की नीतियों की आलोचना करती थी....सो उस समय की सरकार से बर्दाश्त नहीं हुआ. पत्रिका बैन कर दी गई थी. वामपंथी लेखक रोमेश थापर एडिटर हुआ करते थे.'

अगर ऐसा हुआ तो आजादी के तुरंत बाद ही बहुत बुरा हुआ था. लेकिन क्या सच में ऐसा ही हुआ था? आइए देखते हैं.

भीमा कोरेगांव की घटना के बाद, सितंबर, 2018 में पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई के संबंध में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, ‘जिनकी गिरफ्तारी हुई है वे पहले भी गिरफ्तार हो चुके हैं. आरोप गंभीर हैं. किसी सरकार को गिराने की साजिश रचना, हिंसा को बढ़ावा देने के लिए अपनी विचारधारा का सहारा लेना और सबसे बड़ी बात किसी देश को तोड़ने के लिए साजिश रचना, मैं समझता हूं इससे बड़ा अपराध कुछ और नहीं हो सकता...प्रेशर कुकर को हम दबाने की कोशिश नहीं करेंगे. लोकतंत्र में सबको बोलने की आजादी है. सबको चलने की आजादी है. सब कुछ करने की आजादी है. लेकिन किसी को भी देश को तोड़ने की इजाजत नही दी जा सकती है. हिंसा को बढ़ावा देने की आजादी नही दी जा सकती है.’
संविधान की कॉपी पर हस्ताक्षर करते हुए संविधान सभा के सदस्य.


यह एक उदाहरण है जिसे ध्यान में रखते हुए यह कह सकते हैं कि प्रेस की स्वतंत्रता हमेशा सत्ता से टकराती रही है. राजनाथ सिंह ने जो भी कहा, वह इससे पहले भी कई बार कहा जा चुका है. बोलने की आजादी पर सारे प्रतिबंध इन्हीं तर्कों के सहारे थोपे गए.

आजाद भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ पहला डंडा नेहरू मंत्रिमंडल ने चलाया, जिसमें सरदार पटेल और डॉक्टर अंबेडकर शामिल थे. इस डंडे का शिकार बने जनसंघ नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी, क्रासरोड साप्ताहिक के संपादक रोमेश थापर और आर्गेनाइजर के संपादक केआर मल्कानी.

आजादी के बाद मई, 1950 में सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला आया. यह दो केसों से संबंधित था. रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य और बृजभूषण बनाम दिल्ली राज्य. रोमेश थापर जानेमाने वामपंथी थे जो बंबई से 'क्रासरोड' नामक साप्ताहिक निकालते थे. वे इसके संपादक और प्रकाशक थे. थापर, नेहरू और उनकी नीतियों के घोर आलोचक थे. यह वही समय था जब मद्रास और केरल में वामपंथ तेजी से बढ़ रहा था. मद्रास सरकार ने मेंटेनेंस आफ पब्लिक आर्डर एक्ट 1949 के तहत इस पत्र के छपने और प्रसारित होने पर पाबंदी लगा दी. रोमेश थापर सुप्रीम कोर्ट चले गए.

दूसरा मामला दिल्ली से छपने वाले संघ के मुखपत्र आर्गेनाइजर का था. केआर मल्कानी इसके संपादक और बृजभूषण इसके प्रकाशक थे. दिल्ली के कमिश्नर ने भड़काने वाली फोटो और सामग्री छापने के आरोप में पंजाब पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1949 के तहत इस पर पाबंदी लगा दी. ध्यान रहे कि बंगाल और दिल्ली पंजाब सबसे ज्यादा दंगा प्रभावित इलाकों में थे.

दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक ही दिन फैसला दिया और कहा कि अनुच्छेद 19(2) में 'पब्लिक आर्डर' और 'पब्लिक सेफ्टी' जैसे पदों का जिक्र नहीं है इसलिए ये फैसले असंवैधानिक हैं.

जब यह फैसला आया, उसी दौरान भारत सरकार ने पाकिस्तान सरकार से एक समझौता किया. नेहरू और लियाकत अली के बीच समझौता हुआ कि दोनों सरकारें अपने यहां के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करेंगी. इसे नेहरू—लियाकत पैक्ट नाम दिया गया. इसमें ऐसी हर गतिविधियों पर पाबंदी लगाने का समझौता था, जिसके तहत दोनों देशों में युद्ध की स्थिति बने. मार्च, 1950 में नेहरू ने पटेल को पत्र लिखा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी लगातार अखंड भारत की बात कर रहे हैं जिससे परेशानी खड़ी हो रही है. पटेल ने जवाब में लिखा कि अब हम संविधान से बंधे हैं जो बोलने की आजादी देता है. हम कोई एक्शन नहीं ले सकते. समझौता साइन होने के बाद मुखर्जी ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और दोनों देशों में खुलकर युद्ध की बात करने लगे. पाकिस्तान ने इसपर प्रतिक्रिया दी. थापर नेहरू की विदेश नीति पर लगातार हमले कर रहे थे तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपने अखंड भारत के लिए प्रचार कर रहे थे.

इस मसले पर नेहरू और पटेल ने के पत्राचार में नेहरू ने लिखा कि मुख्य अभियुक्त श्यामा प्रसाद मुखर्जी और हिंदू महासभा हैं जो इस समझौते के क्रियान्वयन में बाधा बन रहे हैं. इस पर पटेल ने कहा कि दो मामलों में कोर्ट के निर्णय ने हमारे सभी संवैधानिक उपायों को हिलाकर रख दिया है. हमें जल्दी ही संविधान में संशोधन करना पड़ेगा.

जून, 1951 में संविधान में पहला संशोधन हुआ. तीन संशोधनों में से एक प्रेस और फ्री स्पीच को लेकर था. अनुच्छेद 19(2) जोड़कर अभिव्यक्ति की आजादी पर 'युक्तियुक्त निर्बंधन' यानी reasonable restrictions की बात जोड़ी गई. नेहरू का कहना था कि इससे मामला कोर्ट के पाले में चला जाएगा, लेकिन अंबेडकर ने कहा कि हमें बोलने की आजादी भी देनी है और सुरक्षा भी जरूरी है. इसलिए पाबंदी भी तार्किक होनी चाहिए. इसमें मोटा मोटी मानहानि, अभद्रता, कोर्ट की अवमानना, और राष्ट्र की सुरक्षा जैसे मसलों पर बोलने पर उचित पाबंदी की बात कही गई.

इस संशोधन के पक्ष में नेहरू ने कहा, किसी को बोलने की ऐसी आजादी नहीं दी जा सकती कि उसके बोलने के पश्चात दो देशों में युद्ध छिड़े और बर्बादी हो. हालांकि, मुखर्जी का कहना था कि देश का बंटवारा एक गलती थी. इसे बलप्रयोग से सुधार लेना चाहिए.

जस्टिस एपी शाह ने एमएन राय मेमोरियल लेक्चर में 2017 में कहा था, ''संविधान असेंबली के वाद-विवाद के दौरान दो बार इस बात का प्रयास किया गया कि अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगाने के लिए देशद्रोह को एक आधार बनाया जाए. परंतु असेंबली के अन्य सदस्यों के विरोध और उनको डर था कि देशद्रोह को फिर राजनीतिक असहमति को कुचलने के लिए प्रयोग किया जा सकता है, इसको संविधान के अनुच्छेद 19(2) से हटा दिया गया. वर्ष 1950 में संविधान बनाने वालों के इन एक्शन को खुद सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया. यह बातें सुप्रीम कोर्ट ने बृज भूषण एंड रोमेश थापर के केस में कही थी. इस फैसले के कारण ही संविधान में पहले संशोधन को बढ़ावा मिला और अनुच्छेद 19(2) को संशोधित किया गया. जिसके तहत 'अंडरमाईनिंग दाॅ सिक्योरटी आफ दाॅ स्टेट’ की जगह  'इन दाॅ इंटरेस्ट आफ पब्लिक आर्डर’ को शामिल किया गया. हालांकि संसद में बोलते समय नेहरू ने साफ किया कि जहां तक भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए की बात है तो मेरा मानना है कि यह धारा काफी आपत्तिजनक है और न तो इसका प्रैक्टिकल व न ही ऐतिहासिक तौर पर कोई स्थान होना चाहिए. अगर आप पसंद करे तो हम इस संबंध में निर्णय ले सकते हैं. जितना जल्दी हम इससे छुटकारा पा लेंगे, उतना अच्छा होगा.''

देशद्रोह की धारा अब तक बरकरार है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने समय समय पर उसकी व्याख्या की है.
खैर, क्या पहले संविधान संशोधन में बोलने की आजादी पर जो 'युक्तियुक्त निर्बंधन' जोड़ा गया, वह प्रेस पर हमला था? बेशक, सुप्रीम कोर्ट का रोमेश थापर और बृजभूषण केस का निर्णय नजीर बना और आज भी उसे अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में कोट किया जाता है. लेकिन संशोधन के साथ जोड़े गए युक्तियुक्त ​निर्बंधन को कोर्ट ने अपनी व्याख्या में गलत नहीं ठहराया, न ही कानूनविदों ने इसे गलत ठहराया. कानून में वैयक्तिक आजादी का महत्व है, लेकिन यह दुनिया भर में बहस का विषय बन चुका है कि क्या आजादी आत्यांतिक हो सकती है? या इस पर देश और समाज के हित में कुछ पाबंदियां जरूरी हैं? संशोधन के वक्त नेहरू, पटेल, अंबेडकर आदि सब सहमत थे कि राज्य के लिए समस्या उत्पन्न करने वाली आजादी से आजादी को ही खतरा है.
जैसे आज कश्मीर में अलगाववाद या नक्सलवाद के प्रसार को अभिव्यक्ति के नाम पर छूट नहीं मिल सकती, उसी तरह उस समय क्रासरोड और आरगेनाइजर के मामले में समझा गया.

यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारी आजादी, हमारा संविधान और हमारी व्यवस्था को 1947 से लेकर लंबे समय तक नकारने वाले यही दोनो थे, दक्षिणपंथी और वामपंथी. इन दोनों ने आजादी को झूठा कहकर उस पर हर संभव हमले किए और अब दोनों इस व्यवस्था के हिस्से हैं. ​एक पंक्ति में कोई बात कह देने मात्र से भ्रम फैलता है कि 'प्रेस पर पहली पाबंदी नेहरू ने लगाई थी'.

सूचना स्रोत: द हिंदू और स्क्रॉल के लेखों में कानूनविद अभिनव चंद्रचूड, लाइव लॉ में जस्टिस एपी शाह, एनडीटीवी, सीआईएस इंडिया में कानूनविद गौतम भाटिया, मीडिया चिंतन में माखनलाल चतुर्वेदी के कुलपति जगदीश उपासने.  

शनिवार, 11 अगस्त 2018

पिछले 70 साल में क्या हुआ?

पिछले 70 सालों में वह सब हुआ है, जिसकी आज के नेता कल्पना भी नहीं कर सकते.

अभी तक पूछा जा रहा था कि पिछले सत्तर सालों में क्या हुआ? अब पूछा जा रहा है कि पिछले चार सालों में क्या हुआ? पिछले चार सालों में जो हुआ है वह तो आप सभी जानते हैं. लेकिन पिछले सत्तर सालों में क्या हुआ, इस पर निगाह डालनी जरूरी है.

1947 में जब देश आजाद हुआ तब यह देश सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में था. दो देशों के बीच बड़ी संख्या में पलायन हो रहा था. पूरा देश छोटे छोटे रजवाड़ों में बंटा था. पाकिस्तान से साठ लाख शरणार्थी भारत आए थे, उनका पुनर्वास एक चुनौती थी. मुस्लिमों की सुरक्षा, हिंसा पर नियंत्रण, पाकिस्तान से युद्ध से बचाव, कम्युनिस्ट विद्रोह पर नियंत्रण, राजनीतिक स्थिरता, प्रशासनिक व्यवस्था का निर्माण, देश की सुरक्षा और स्थायित्व जैसी चुनौतियां थीं. 70 प्रतिशत जमीनों पर जमीदारों का कब्जा था. करीब करीब पूरा भारत अनपढ़ था. देश सूखा, महामारी, बीमारी, भुखमरी आर्थिक पिछड़ापन, गरीबी और सामाजिक विषमता से जूझ रहा था. अंग्रेजी विरासत में भारतीयों को एक खोखला और टूटा हुआ देश हम भारतीयों को सौंपा गया था.

1943 में बंगाल में सूखा के चलते करीब 30 लाख लोग मारे गए थे. देश की जीवन प्रत्याशा मात्र 32 साल थी. देश की जनता का अधिकांश हिस्सा दोनों वक्त खाना नहीं खा सकता था, दरिद्रता इस हद तक थी. विशाल समस्याओं के पहाड़ तो थे लेकिन नेहरू के अलावा तमाम महान नेताओं की फौज खड़ी थी. राष्ट्रीय आंदोलन की राष्ट्रवादी विरासत थी. सबने मिलकर इस देश को खड़ा किया.

इसके अलावा दो बड़ी चुनौतियां थीं. हिंदूवादी और संघ परिवारी तिरंगे की होली जला रहे थे, गांधी की हत्या करके मिठाइयां बांट रहे थे, आजादी को झूठा बता रहे थे, मनुस्मृति लागू करने की मांग कर रहे थे, तो दूसरी तरफ कम्युनिस्ट भी इस आजादी को नहीं मान रहे थे. फरवरी 1948 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आम क्रांति की घोषणा करते हुए उग्र आंदोलन शुरू कर दिया.

लेफ्ट विंग और राइट विंग में अंतर सिर्फ इतना था कि लेफ्ट विंग के लोग बढ़ चढ़ कर आजादी आंदोलन में शामिल थे, जबकि आरएसएस के हिंदूवादी शाखा लगा रहे थे. कांग्रेस में जो हिंदूवादी विचार के लोग थे, उनकी बात दीगर है.

तमाम समस्याओं के रहते हुए क्या हुआ?

इन समस्याओं से पूरा देश मिलकर लड़ा. देश की नींव की पहली ईंट के रूप में भारत का संविधान बना और लागू हुआ और भारतीय गणराज्य की स्थापना हुई. पांच सौ टुकड़ों में बंटे भूभाग का एकीकरण हुआ. सबके लिए एक समान कानून के शासन की स्थापना हुई. समता, बराबरी, शिक्षा, अभिव्यक्ति और जीवन के अधिकार सबके लिए सुरक्षित किए गए. राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया की स्थापना करते हुए राष्ट्रीय राजसत्ता को विकास एवं सामाजिक बदलाव के उपकरण के रूप में विकसित और सुरक्षित रखना सुनिश्चित किया गया.

भारतीयता की परिभाषा लिखी गई. एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना हुई. सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक क्रांति का आधार तैयार किया गया. कृषि, उद्योग, तकनीक, विज्ञान, यातायात, संचार और अर्थव्यवस्था का खाका तैयार हुआ. महिलाओं, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और वंचितों के लिए समान अधिकार की आधारशिला रखी गई. प्रेस की आजादी बहाल हुई. स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना हुई.

 देश में पांच आईआईटी की स्थापना हुई, आईआईएम बने. परमाणु उर्जा आयोग की स्थापना नेहरू के ही समय हो गई थी. एक देश के निर्माण की प्रक्रिया के साथ ही वह होमी भाभा के नेतृत्व में परमाणु उर्जा के बारे में भी सोच रहा था. एशिया का पहला परमाणु रिएक्टर 1956 में बंबई में काम करना शुरू कर चुका था. 1962 में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए इसरो की स्थापना की गई.

आजादी मिली तो देश में मात्र 18 विश्वविद्यालय थे. 1964 तक नेहरू सरकार ने 54 विश्वविद्यालय और 2500 कॉलेज खोले. आजादी के समय मात्र 16 प्रतिशत लोग साक्षर थे. आज कम से कम तीन राज्यों में सौ प्रतिशत शिक्षा दर है. शहरी विकास, ग्रामीण विकास, सामुदायिक विकास कार्यक्रम, पंचायती राज आदि की नींव रखी गई.

पिछले सत्तर सालों में वह वह हुआ, जिसके बारे में आप सिर्फ कल्पना कर सकते हैं और वह भी आपकी क्षमता से परे है. लगभग निरक्षर देश में महान नेताओं ने तय किया कि एक जनवादी और समान नागरिक अधिकारों पर आधारित समाज का निर्माण किया जाएगा और एक जनवादी राजनीतिक व्यवस्था के अंदर आर्थिक विकास होगा. अंबेडकर का नारा लगाना और इस बात को समझना दो अलग बाते हैं.

लोगों में लोकतांत्रिक चेतना विकसित करने के तमाम उपाय किए गए. लोगों में सुनहरे भविष्य की आकांक्षा जगाई गई. जातीय, धार्मिक और भाषाई टुकड़ों में बंटे देश को यथासंभव एकता के सूत्र में पिरोया गया. उद्योग, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, प्रशासन, कृषि, स्वास्थ्य, उत्पादन सबकी नींव रखी गई. 1951 में देश में कुल 18000 डॉक्टर थे. अधिकांश शहरों में रहते थे. अस्पतालों की संख्या मात्र 1900 थी. अधिकांश शहर भी बिना बिजली के थे. जलापूर्ति जैसा शब्द शायद किसी ने सुना हो.

लेकिन देश भर में बड़े बड़े बांध बनाए गए. विश्वविद्यालय खोले गए. उद्योगों की स्थापना हुई. वैज्ञानिक संस्थान खोले गए. सभी क्षेत्रों में तमाम संस्थाओं की स्थापना हुई. विदेश नीति की स्थापना हुई. भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन के अगुआ देशों में था. सरकारी नियंत्रण में बड़ी बड़ी कंपनियों की स्थापना हुई जिसे आज सरकार पूंजीपतियों को बेचने के लिए ललचा रही है. सिर्फ नेहरू ने अपने ही कार्यकाल में भारत को एक दरिद्र कुनबों के देश को एक विकासशील देश में तब्दील कर दिया था.

सत्तर सालों की बात जाने दें, सिर्फ नेहरू कार्यकाल में इतना हुआ कि उसके बाद वैसे विजन का कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ. कुछ हजार गांवों में बिजली पहुंचाने का गाना गाने के दौर में याद रखना चाहिए कि जिस नींव पर यह देश सुपर पावर बनने जा रहा है, उसकी नींव शुरुआती दस सालों में ही रख दी गई थी. पूरे भारत का निर्माण करने के लिए. बाद की पीढ़ी के नेताओं ने सिर्फ उस मजबूत नींव को दरकाने की ही कोशिश की, चाहे वह स्वनामधन्य दुर्गा बनीं इंदिरा गांधी हों, या विष्णु अवतार बने नरेंद्र मोदी.

समस्याएं इतनी थीं कि दुनिया भर के विद्वान कहते फिर रहे थे कि न तो आजादी, न ही लोकतंत्र भारत में लंबे समय तक रह पाएगा. देर सवेर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था ढह जाएगी. 1960 में अमेरिकी विद्वान पत्रकार सेलिग एस हैरिसन भविष्यवाणी कर रहे थे कि 'बाधाएं करीब करीब पूरी तरह आजादी के जीवित रहने के खिलाफ हैं और मुद्दा यह है कि वस्तुत: क्या कोई भारतीय राजसत्ता बिल्कुल जीवित रह पाएगी या नहीं? (आजादी के बाद भारत, बिपन चंद्र)

1967 में टाइम्स अखबार के संवाददाता नेविल मैक्सवेल ने लेखों की सीरीज लिखी 'इंडियाज डिसिंटिग्रेटिंग डेमोक्रेसी', इसमें उन्होंने कहा कि 'एक लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर भारत को विकसित करने का महान प्रयोग असफल हो गया है.' इसके बाद जब आपातकाल लगा तब भी यही बात कही गई कि भारत को लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का प्रयोग असफल हो गया है. लेकिन क्या आज कोई कह सकता है कि भारत लोकतांत्रिक देश नहीं है?

जब हमने 21वीं सदी में कदम रखा तो पूरी दुनिया में भारत के महाशक्ति बनने का रास्ता साफ हो गया था. भारत के सुपर पॉवर बनने की चर्चा तब शुरू हो गई थी जब मनमोहन सिंह की अगुआई में भारत अमेरिका से परमाणु समझौता कर रहा था. जाहिर है कि सुपरपॉवर बनने की आधारशिला गाय, गोबर, दंगा और लिंचिंग नहीं हो सकती. नेहरू से लेकर अब तक के सारे प्रधानमंत्री गोरक्षा करते और गोमूत्र के ब्रांड एंबेस्डर बन जाते तब तो फिरंगियों की भविष्यवाणी के मुताबिक, सच में यह देश निपट गया होता.

यह कहना बहुत आसान है कि फलां काम आजादी के सत्तर साल बाद पहली बार हो रहा है. लेकिन ठहर कर यह सोचना चाहिए कि सत्तर साल पहले हर काम पहली ही बार हो रहा था. किसी देश की यात्रा कर आना कठिन काम हो सकता है लेकिन विदेशों में एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता लेना निश्चित रूप् से कठिन काम रहा होगा. सिक्किम या अरुणालच में पहली बार जहाज उतार देना मुश्किल काम है, लेकिन जहाज सेवा और उड्डयन की शुरुआत उससे भी कठिन रहा होगा. आधी रात को किसी सरकारी नीति का उत्सव मनाना कठिन हो सकता है, लेकिन नीतियां बनाकर लागू करने लायक देश और व्यवस्था बनाना निश्चित तौर पर इससे कठिन काम रहा होगा.

तो भारत में पैदा होने को लेकर शर्मिंदगी महसूस न करें. खासकर विदेश जाएं तो यह न कहें कि भारत में पैदा होकर शर्म आती थी. इस देश का इतिहास अपनी लाख खामियों, कमजोरियों और कमियों के साथ महान है और उम्मीद है कि आने वाला कल आज से बेहतर होगा!





रविवार, 22 जुलाई 2018

सरदार पटेल ने ‘हिंदू राज’ के विचार को ‘पागलपन’ कहा था

जिस समय नेहरू सांप्रदायिकता से लड़ते हुए लिख रहे थे कि ‘यदि इसे खुलकर खेलने दिया गया, तो सांप्रदायिकता भारत को तोड़ डालेगी.’ उसी समय सरदार पटेल 1948 में कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में घोषणा कर रहे थे ‘कांग्रेस और सरकार इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि भारत एक सच्चा धर्मनिरपेक्ष राज्य हो.’ 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात में देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को बेचारा बताकर वोट मांग रहे थे, तब मैं इतिहास की किताबें खंगाल रहा था कि क्या सच में सरदार पटेल की हालत वैसी ही थी जैसी वे बता रहे हैं?

क्या वास्तव में सरदार पटेल में उपेक्षित थे और उनके साथ बहुत अन्याय हुआ? दुनिया जानती है कि सरदार पटेल आजीवन कांग्रेसी रहे, न सिर्फ आजाद भारत की पहली सरकार में गृहमंत्री रहे, बल्कि राष्ट्र के निर्माताओं में शीर्ष पर विराजमान हैं. पटेल को देश की करीब 500 रियासतों को मिलाकर आधुनिक हिंदुस्तान के शिल्पी होने का गौरव प्राप्त है.

फिर क्या कारण है कि नेहरू, कांग्रेस, धर्मनिरपेक्षता, संसदीय लोकतंत्र, तिरंगा झंडा और संविधान के शासन का विरोध करने वाले लोग सरदार पटेल को अपना नेता कहना चाहते हैं? क्या सिर्फ इसलिए कि वामपंथी इतिहासकारों का एक धड़ा सरदार पटेल को कांग्रेस में मौजूद दक्षिणपंथी नेता बताता रहा?

आज सुभाषचंद्र बोस द्वारा राष्ट्रपिता की उपाधि हासिल करने वाले महात्मा गांधी के राष्ट्रपिता होने पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. आज जवाहरलाल नेहरू को देशविरोधी हितों का हिमायती बताया जा रहा है. लेकिन उसी समय गांधी नेहरू के अनन्य सहयोगी सरदार वल्लभभाई पटेल को नेहरू से अलग करके उन्हें हिंदुत्व की राजनीति का नायक बताया जा रहा है. ऐसे में सरदार पटेल पर विस्तार से चर्चा जरूरी है.

एक तरफ कट्टर हिंदूवादी तत्व गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का मंदिर बनवाने की बात करते हैं, दूसरी तरफ हिंदुत्व की राजनीति करने वाले लोग उन सरदार पटेल को अपना कहते घूम रहे हैं जिन्होंने गांधी की हत्या के बाद संघ परिवार पर प्रतिबंध लगाया था.

क्या वास्तव में सरदार पटेल आरएसएस और राजनीतिक हिंदुत्व के नायक हैं? क्या आरएसएस की हिंदू धर्म के नाम पर विभाजन की राजनीति और हिंदूराष्ट्र के सपने से पटेल का कोई तालमेल है? क्या संघ और भाजपा ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत के नाम पर उनके पास कुछ नहीं है और जब ज्यादा चर्चा होने लगती है तो इतिहास के पन्नों से वीर कहे जाने वाले वीडी सावरकर का माफीनामा निकलता है. ऐसा लगता है कि भाजपा और संघ के लोग आजादी की लड़ाई में शामिल न होने की शर्म से बचने के लिए सरदार पटेल पर दावा ठोंक रहे हैं.

जिस समय नेहरू सांप्रदायिकता से लड़ते हुए लिख रहे थे कि ‘यदि इसे खुलकर खेलने दिया गया, तो सांप्रदायिकता भारत को तोड़ डालेगी.’ उसी समय सरदार पटेल 1948 में कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में घोषणा कर रहे थे ‘कांग्रेस और सरकार इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि भारत एक सच्चा धर्मनिरपेक्ष राज्य हो.’ (आजादी के बाद का भारत, बिपन चंद्र)

जब नेहरू बार-बार दोहरा रहे थे कि ‘धर्मनिरपेक्ष राज्य के अतिरिक्त अन्य कोई राज्य सभ्य नहीं हो सकता’ तब पटेल नेहरू न सिर्फ पटेल के साथ खड़े थे बल्कि इसी विचार को दोहरा भी रहे थे. जब नेहरू कह रहे थे, ‘यदि कोई भी व्यक्ति धर्म के नाम पर किसी अन्य व्यक्ति पर प्रहार करने के लिए हाथ उठाने की कोशिश भी करेगा, तो मैं उससे अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक सरकार के प्रमुख और उससे बाहर दोनों ही हैसियतों से लडूंगा’ तब सांप्रदायिकता के विरुद्ध इस संघर्ष में नेहरू को पटेल, सी राजगोपालाचारी जैसे दोस्तों से संपूर्ण सहयोग प्राप्त था.

सरदार पटेल ने ‘फरवरी, 1949 में ‘हिंदू राज’ यानी हिंदू राष्ट्र की चर्चा को ‘एक पागलपन भरा विचार’ बताया. और 1950 में उन्होंने अपने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा, ‘हमारा एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है… यहां हर एक मुसलमान को यह महसूस करना चाहिए कि वह भारत का नागरिक है और भारतीय होने के नाते उसका समान अधिकार है. यदि हम उसे ऐसा महसूस नहीं करा सकते तो हम अपनी विरासत और अपने देश के लायक नहीं हैं.’ (आजादी के बाद का भारत, बिपन चंद्र)

महात्मा गांधी अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर सबसे ज्यादा सांप्रदायिकता से दुखी थे. जब महात्मा गांधी भारतीय राजनीति में आए तो एक सनातन और सार्वभौम मानवतावाद के साथ आए और देश को नेतृत्व प्रदान किया. लेकिन जब देश आजादी की आधी रात का जश्न मना रहा था तब महात्मा गांधी नितांत अकेले इस सांप्रदायिकता की आग में जल रहे बिहार और बंगाल में इस पर पानी डाल रहे थे.

बिपन चंद्र के मुताबिक, 1947 में अपने जन्मदिन पर एक शुभकामना संदेश के जवाब में महात्मा गांधी ने कहा कि ‘अब वे और जीने के इच्छुक नहीं हैं और वे उस सर्वशक्तिमान की मदद मागेंगे कि उन्हें जंगली बन गए इंसानों द्वारा, चाहे वे अपने को मुसलमान कहने की जुर्रत करें या हिंदू या कुछ और, कत्लेआम किए जाने का असहाय दर्शक बनाने के बजाए आंसू के इस दरिया से उठा ले जाए.’

उन्हें परमात्मा ने तो नहीं उठाया, लेकिन एक ‘जंगली बन गए इंसान’ नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी.

देश भर में दंगों की स्थिति देखकर जब पटेल और नेहरू भी विभाजन के बारे में सोचने को विवश हो गए थे, तब एक आदमी ऐसा था जिसने नोआखली, बिहार, कलकत्ता और दिल्ली के दंगाग्रस्त इलाकों में ‘अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था कि अहिंसा और हृदय परिवर्तन के जिन सिद्धांतों को उन्होंने जीवन भर माना है, वे झूठे नहीं हैं.’ (आधुनिक भारत, सुमित सरकार) उन्होंने नोआखली, बेलियाघाट, दिल्ली और पंजाब में अनशन करके हिंसा रोकने में सफलता हासिल की. जब यह सबसे आसान था कि गांधी सत्ता हथिया लेते, उसके प्रति तिरस्कार भाव से वे देश भर में संप्रदायवाद से लड़ रहे थे.

‘गांधी की हत्या पूना के ब्राह्मणों के एक गुट द्वारा रचे गए षडयंत्र का चरमोत्कर्ष था, जिसकी मूल प्रेरणा उन्हें वीडी सावरकर से मिली थी.’ (आधुनिक भारत, सुमित सरकार)

‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सांप्रदायिकता और हिंसात्मक विचारधारा को साफ-साफ देखते हुए और जिस प्रकार की नफरत यह गांधीजी और धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध फैला रहा था, उसे देखकर यह स्पष्ट हो गया था कि यही वे असली शक्तियां हैं जिन्होंने गांधी की हत्या की है. आरएसएस ने लोगों ने कई जगहों पर खुशियां मनाईं थीं. यह सब देखते हुए सरकार ने तुरंत ही आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया.’ (आजादी के बाद का भारत, बिपन चंद्र)

गांधी की हत्या के बाद गृह मंत्री सरदार पटेल को सूचना मिली कि ‘इस समाचार के आने के बाद कई जगहों पर आरएसएस से जुड़े हलकों में मिठाइयां बांटी गई थीं.’ 4 फरवरी को एक पत्राचार में भारत सरकार, जिसके गृह मंत्री पटेल थे, ने स्पष्टीकरण दिया था:

‘देश में सक्रिय नफ़रत और हिंसा की शक्तियों को, जो देश की आज़ादी को ख़तरे में डालने का काम कर रही हैं, जड़ से उखाड़ने के लिए… भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ग़ैरक़ानूनी घोषित करने का फ़ैसला किया है. देश के कई हिस्सों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कई व्यक्ति हिंसा, आगजनी, लूटपाट, डकैती, हत्या आदि की घटनाओं में शामिल रहे हैं और उन्होंने अवैध हथियार तथा गोला-बारूद जमा कर रखा है. वे ऐसे पर्चे बांटते पकड़े गए हैं, जिनमें लोगों को आतंकी तरीक़े से बंदूक आदि जमा करने को कहा जा रहा है…संघ की गतिविधियों से प्रभावित और प्रायोजित होनेवाले हिंसक पंथ ने कई लोगों को अपना शिकार बनाया है. उन्होंने गांधी जी, जिनका जीवन हमारे लिए अमूल्य था, को अपना सबसे नया शिकार बनाया है. इन परिस्थितियों में सरकार इस ज़िम्मेदारी से बंध गई है कि वह हिंसा को फिर से इतने ज़हरीले रूप में प्रकट होने से रोके. इस दिशा में पहले क़दम के तौर पर सरकार ने संघ को एक ग़ैरक़ानूनी संगठन घोषित करने का फ़ैसला किया है.’

सरदार पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने का स्पष्टीकरण देते हुए गोलवलकर को सितंबर में एक पत्र लिखा:

‘आरएसएस के भाषण सांप्रदायिक उत्तेजना से भरे हुए होते हैं… देश को इस ज़हर का अंतिम नतीजा महात्मा गांधी की बेशक़ीमती ज़िंदगी की शहादत के तौर पर भुगतना पड़ा है. इस देश की सरकार और यहां के लोगों के मन में आरएसएस के प्रति रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं बची है. हक़ीक़त यह है कि उसका विरोध बढ़ता गया. जब आरएसएस के लोगों ने गांधी जी की हत्या पर ख़ुशी का इज़हार किया और मिठाइयां बाटीं, तो यह विरोध और तेज़ हो गया. इन परिस्थितियों में सरकार के पास आरएसएस पर कार्रवाई करने के अलावा और कोई चारा नहीं था.’

इसके अलावा 18 जुलाई, 1948 को पटेल ने हिंदू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक पत्र लिखा,

‘जहां तक आरएसएस और हिंदू महासभा की बात है, गांधी जी की हत्या का मामला अदालत में है और मुझे इसमें इन दोनों संगठनों की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहिए लेकिन हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं का, खासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर कांड संभव हो सका. मेरे दिमाग में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का एक अतिवादी भाग षडयंत्र में शामिल था. आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राज्य व्यवस्था के अस्तित्व के लिए खतरा थीं. हमें मिली रिपोर्ट बताती है कि प्रतिबंध के बावजूद गतिविधियां समाप्त नहीं हुई हैं. दरअसल समय बीतने के साथ आरएसएस की टोली उग्र हो रही है और विनाशकारी गतिविधियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही है.’

नेहरू आरएसएस को एक फासीवादी संगठन मानते थे. दिसंबर, 1947 में उन्होंने लिखा, ‘हमारे पास बहुत सारे साक्ष्य मौजूद हैं जिनसे दिखाया जा सकता है कि आरएसएस एक ऐसा संगठन है जिसका चरित्र निजी सेना की तरह है और जो निश्चित रूप से नाजी आधारों पर आगे बढ़ रही है, यहां तक कि उसके संगठन की तकनीकों का पालन भी कर रही है.’ (आजादी के बाद का भारत, बिपन चंद्र)

इस सबके बावजूद सरकार नागरिक स्वतंत्रता जैसे विचार को कमजोर नहीं करना चाहती थी. गांधी की हत्या के बावजूद सरकार दमनकारी नहीं होना चाहती थी. 29 जून, 1949 को नेहरू ने पटेल को लिखा था,

‘मौजूदा परिस्थितियों में ऐसे प्रतिबंध और गिरफ्तारियां जितनी कम हों उतना ही अच्छा है.’ आरएसएस ने सरदार पटेल की शर्तों को स्वीकार कर लिया तो जुलाई, 1949 में इस पर प्रतिबंध हटा लिया गया. ये शर्तें थीं: आरएसएस एक लिखित और प्रकाशित संविधान स्वीकार करेगा. अपने को सांस्कृतिक गतिविधियों तक सीमित रखेगा. राजनीति में कोई दखलंदाजी नहीं देगा. हिंसा और गोपनीयता का त्याग करेगा. भारतीय झंडा और संविधान के प्रति आस्था प्रकट करेगा और अपने को जनवादी आधारों पर संगठित करेगा. (आजादी के बाद का भारत, बिपन चंद्र)

जब प्रधानमंत्री सरदार पटेल का नारा लगा रहे हों और उनकी पार्टी के लोग ‘अखंड हिंदू राष्ट्र के लिए हथियार उठाने’ की घोषणा कर रहे हों, तब यह याद रखना जरूरी हो जाता है कि सभी कांग्रेसी नेताओं की निगाह में स्वतंत्र भारत की तस्वीर एक समान थी. ‘वे सभी तीव्र सामाजिक और आर्थिक रूपांतरण तथा समाज और राजनीति के जनवादीकरण के प्रति पूर्णत: समर्पित थे. राष्ट्रीय आंदोलन द्वारा दिए गए आधारभूत मूल्यों के प्रति उनकी एक मौलिक सहमति थी जिसके आधार पर स्वतंत्र भारत का निर्माण किया जाना था. नेहरू के साथ-साथ सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद और सी राजगोपालाचारी भी जनवाद, नागरिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्र आर्थिक विकास, साम्राज्यवाद विरोध, सामाजिक सुधार और गरीबी उन्मूलन की नीतियों के प्रति उतने ही समर्पित थे. नेहरू का इन नेताओं के साथ असली मतभेद समाजवाद और समाज के वर्गीय विश्लेषण को लेकर था.’ (आजादी के बाद का भारत, बिपन चंद्र)

इतिहासकार बिपन चंद्र का निष्कर्ष है कि ‘इस संदर्भ और अतीत को देखते हुए कहा जा सकता है कि प्रशंसकों और आलोचकों दोनों द्वारा पटेल को गलत समझा गया और गलत प्रस्तुत किया गया है. जहां दक्षिणपंथियों ने उनका इस्तेमाल नेहरू के दृष्टिकोणों और नीतियों पर आक्रमण करने लिए किया है, वहीं वामपंथियों ने उन्हें एकदम खलनायक की तरह चरम दक्षिणपंथी के सांचे में दिखाया है. हालांकि, ये दोनों गलत हैं. महत्वपूर्ण यह है कि नेहरू और अन्य नेता इस बात पर एकमत थे कि देश के विकास के लिए राष्ट्रीय आम सहमति का निर्माण आवश्यक था.’

क्या ऐसे सरदार पटेल को संघ और भाजपा के लोग अपना नायक बनाकर इस बात को पचा सकते हैं? क्या नरेंद्र मोदी सरदार पटेल को अपना नेता मानते हैं? यदि हां, तो फिर उन्हें पटेल की ‘धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्धता’ के प्रति निष्ठा दिखाते हुए कानून पर अमल करते हुए हिंदू राष्ट्र के लिए हथियार उठाने का आह्वान करने वाले  सिरफिरे विधायक पर या गाय के नाम पर हत्या करने वालों को माला पहनाने वाले मंत्री पर कार्रवाई करनी चाहिए.

साथ ही देश का प्रमुख होने के नाते नरेंद्र मोदी को यह आश्वासन देना चाहिए कि नेहरू और पटेल की जोड़ी ने हमें जो लोकतांत्रिक भारत अता किया है, हम और हमारी पार्टी उसका गला नहीं घोंटेंगे. राजस्थान में एक क्रूरतम हत्या के आरोपी के पक्ष में कट्टर हिंदुओं का कोर्ट पर धावा बोलना यह संकेत है कि भारत का लोकतंत्र और इसकी लोकतांत्रिक विरासत खतरे में है.

(यह लेख 17/12/2017 को 'द वायर' में छप चुका है.)


गुरुवार, 3 नवंबर 2016

‘लोगों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला हो रहा है, बहस इस पर होनी चाहिए राष्ट्रवाद पर नहीं’







प्रश्न है राज्य की राजनीतिक हिंसा का, जो एक खास तरह की राजनीतिक भाषा में व्यक्त हो रही है. लेकिन पूरी संसद बैठ गई राष्ट्रवाद पर बहस करने, जैसे कि राष्ट्रवाद पर कोई सेमिनार हो रहा हो. बाहर हमले हो रहे हैं, संसद में अकादमिक सेमिनार हो रहा जैसे कि इस बहस से यह मसला निपट जाएगा


अपूर्वानंद

किसी से आप पूछेंगे कि वह किसको मानता है राष्ट्रवाद तो वह नहीं बता पाएगा. कुछ धुंधली-सी अवधारणा है लोगों के दिमाग में कि मुल्क हमेशा खतरे में रहता है, सैनिक उसकी रक्षा करते हैं, वे मारे जाते हैं, और इधर बुद्धिजीवी हैं जो तरह-तरह से सवाल उठाते रहते हैं, जबकि इत्मिनान से तनख्वाहें ले रहे हैं और जनता के पैसे पर शानदार जगहों में बैठकर पढ़ रहे हैं, जबकि हमारे सैनिक सियाचीन में बर्फ में दबकर मर जाते हैं.

अगर आप लोगों से पूछें तो कुल मिलाकर आपको जवाब यही मिलेगा जो आजकल मिल रहा है. अब आप इस अवधारणा को तोड़ेंगे कैसे? इसको तोड़ना बहुत ही मुश्किल है. लोगों को यह समझाना कि जो लोग विश्वविद्यालयों में बैठकर पढ़ रहे हैं, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, या जो सवाल कर रहे हैं, वह सवाल करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. यह समझाना भी बहुत कठिन है कि छत्तीसगढ़ में भी जिन सैनिकों को लगा दिया जा रहा है उनको देश के ही खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है. क्योंकि उनको बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में इस्तेमाल किया जा रहा है. तो इसे कैसे समझाया जाएगा, यह एक प्रश्न है.

जिसको कहा जा रहा है कि राष्ट्रवाद क्या है, इसमें किसी को भी राष्ट्रद्रोही साबित करना बहुत आसान है. राष्ट्रवाद के घालमेल के चलते हिंदूवाद को आत्मसात करना बहुत आसान है. उसके प्रतीक चिह्न, उसके संकेत सारे ऐसे हैं जिसको आप हिंदू धर्म से जोड़कर देख सकते हैं. और एक तरह की प्रतिध्वनि है जो बहुत दिनों से लोगों के मन में चली आ रही है, अब जिसको खुलकर निकलने का मौका मिला है कि यह देश पूरी तरह से हिंदू क्यों नहीं है और क्यों नहीं इसे होने दिया जा रहा है. लंबे समय तक इसके लिए नेहरू को दोषी ठहराया गया, कि नेहरू क्योंकि आधा ईसाई थे, आधा मुसलमान थे, तो उनकी वजह से ऐसा नहीं हो पाया. वरना पटेल, राजेंद्र बाबू होते तो हिंदू राष्ट्र हो ही जाता. वह घृणा अभियान जारी है.

अब इस चीज को समझना अति आवश्यक है कि क्यों सबसे ज्यादा निशाने पर राहुल गांधी हैं. राहुल गांधी सोनिया के बेटे हैं और नेहरू से जुड़े हैं. तो वह जो पुरानी घृणा है उसे इटली से जोड़कर और ताजा किया जा सकता है. तो यह बहुत ही पेचीदा घालमेल किया गया है. अफवाहों और दूसरे तमाम माध्यमों से इसे इतना ज्यादा पकाया गया है, इसकी काट के बारे में बात करने की कभी कोई कोशिश नहीं की गई. हम लोग अगर बात करने लगेंगे समझदारी से तो उसकी तो जगह नहीं है. क्योंकि पूरा सामाजिक विचार-विमर्श है वह इस भाषा में ढल गया है.

दो-तीन चीजें जो बहुत ही असंगत मालूम पड़ती हैं, वो ये कि माओवादी कैसे राष्ट्रविरोधी हो गए? नक्सलवादी कैसे राष्ट्रविरोधी हो गए? यह प्रश्न किया जा सकता है! क्योंकि ये लोग तो सबसे गरीब लोगों के लिए लड़ रहे हैं. यह तो एक आंतरिक संघर्ष है. इनको राष्ट्रविरोधी बार-बार क्यों कहा जा रहा है? यह जो हो रहा है कि आप दोनों-तीनों चीजों का घालमेल कर रहे हैं, इससे कुछ बातें समझ में आती हैं. क्योंकि सशस्त्र माओवादियों का संघर्ष हमारे सैन्य बल से होता है. सैन्य बल राष्ट्र का सबसे बड़ा प्रतीक है. इसलिए आप माओवादियों को राष्ट्रविरोधी घोषित कर सकते हैं, बिना यह सोचे हुए कि ये सैन्य बल आदिवासियों के घर जला रहे हैं, उन पर हमला कर रहे हैं तो ये किनके हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं. ये बातें करेगा कौन?

विश्वविद्यालयों के खिलाफ घृणा का एक माहौल पहले से है. हमारे यहां एक एंटी इंटेलेक्चुअलिज्म है और एक हीनताबोध जो भाजपा-आरएसएस में है कि उनको कोई बौद्धिक मानता नहीं है. बौद्धिकता के विरुद्ध उनके मन में एक घृणा है. और बौद्धिकता मात्र को वामपंथी मान लिया गया है. यह बहुत मजेदार चीज है. लेकिन तब प्रताप भानु मेहता क्या ठहरेंगे? आंद्रे बेते क्या होंगे? पीएन मदान क्या होंगे? आशीष नंदी क्या होंगे? इसी बीच यह खबर आई जिसकी मैं आशीष नंदी से पुष्टि नहीं कर पाया. आशीष नंदी ने कहा है कि वे माफी मांगने को तैयार हैं. उन्होंने गुजरात को लेकर जो लेख वर्षों पहले लिखा था, उसके चलते उन पर देशद्रोह का मुकदमा है. यह मुकदमा उनके खिलाफ है और टाइम्स ऑफ इंडिया, अहमदाबाद के खिलाफ है, जिसने उनका लेख छापा था. यह लेख तो गुजरात सरकार की आलोचना थी. गुजरात जिस दिशा में जा रहा है, उसकी आलोचना थी. उस पर देशद्रोह का मुकदमा कैसे हो गया? वह चल रहा है और आशीष नंदी ने उस पर माफी मांगने की पेशकश की है. वे माफी मांग सकते हैं.

इससे समझा जा सकता है कि दरअसल बौद्धिकता पर हमला बहुत पहले से चल रहा था. गुजरात में वह प्रोजेक्ट पूरा हो गया. इसलिए आप कह सकते हैं अब गुजरात एक तरह का बैरेन लैंड है. अब आप देखें कि कैसे व्यवस्थित ढंग से वह हमला हो रहा है. जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय में अभी कुछ ही दिन पहले एक सेमिनार हुआ ‘कश्मीर में बहुलतावाद की संस्कृति’ विषय पर. अब यह सेमिनार कैसे राष्ट्रविरोधी है? लेकिन इस सेमिनार को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आपत्ति जताता है और उस आपत्ति के आधार पर कुलपति नोटिस जारी करते हैं. तो यह सब क्या हो रहा है?

इसी तरह अभी एक घटना लखनऊ में घटी जो बहुत ही हास्यास्पद थी. हालांकि वह घटना थोड़ी-बहुत मुझसे जुड़ी हुई है, लेकिन हास्यास्पद है. राजेश मिश्रा जो समाजशास्त्र के प्रोफेसर हैं, उन्होंने फेसबुक पर मेरा लेख शेयर किया जो इंडियन एक्सप्रेस में छपा था. उसके चलते उनका पुतला जलाया गया, विरोध-प्रदर्शन किया गया, क्लास नहीं चलने दी गई और कुलपति ने उनको कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. अब देखिए कि मूर्खता किस हद तक जा रही है. वह लेख उन्होंने लिखा भी नहीं है. वह लेख उन्होंने सिर्फ शेयर किया है. उस लेख में कोई हिंसा का आह्वान नहीं है. उन्होंने कोई हिंसा का आह्वान नहीं किया है. लेकिन उनके खिलाफ हिंसा होती है और उन्हीं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया जाता है. तो हम लोग धीरे-धीरे कहां जा रहे हैं, यह तो समझ में आता है.

राष्ट्रवाद चूंकि इतनी धुंधली अवधारणा है कि कई चीजें घुल-मिल जाती हैं जैसे देशभक्ति और राष्ट्रवाद. अवधारणा में तो दोनों दो हैं, लेकिन यहां दोनों एक हो गए. राष्ट्र और राज्य दोनों एक हो गए, जबकि दोनों दो हैं. आप विरोध कर रहे हैं राज्य का लेकिन उसको कहा जा रहा है कि आप राष्ट्र का विरोध कर रहे हैं. देश की अवधारणा तो अलग है न! अपनी भाषाओं में देखें तो हम देश जाते हैं, परदेस जाते हैं. बिहार वालों का चटकल मजदूरों का परदेस कोलकाता हो गया. देश उनका अपना छपरा है, सीवान है. अगर आप पारंपरिक रूप से देखें तो उनका देश और परदेस तो इसी देश में हो जाता है. लोग अपनी मिट्टी में मरने की बात करते हैं. वे यह थोड़े कहते हैं कि मैं भारत में मरूंगा. कोई व्यक्ति जो रह रहा है दिल्ली में उसकी इच्छा होती है कि वह जाकर दफन हो वहीं पर, जहां से वह आया है. उसको आग वहीं दी जाए. तो यह एक दूसरी चीज है जिसे आप अपनी मिट्टी से प्रेम कह सकते हैं. वह राष्ट्रवाद नहीं है. क्योंकि वह तो राष्ट्र है नहीं. अगर मान लिया वह राष्ट्रवादी है तो वह क्यों दिल्ली में ही नहीं मर जाना चाहता है? क्यों वह अपने गांव जाकर ही मरना चाहता है या वहीं की मिट्टी में मिल जाना चाहता है? इसको काफी प्रगतिशील कदम माना जाता है कि अगर मैं लिखकर मर जाऊं कि मेरा शव मेरे गांव न ले जाया जाए. अगर पूरे राष्ट्र की भूमि एक ही है तो यह लगाव, यह खिंचाव क्यों होता है? यह अंतर है, इसको लोगों को समझना चाहिए. लेकिन यहां तो सब घालमेल कर दिया गया.

इसके उलट, राष्ट्रवाद तो एकदम नई अवधारणा है. जो आपका देश है, वही आपका राष्ट्र नहीं है, छपरा के व्यक्ति का देश तो छपरा या वहां का एक गांव मढ़ौरा है, जहां से वह आया है, लेकिन राष्ट्र तो भारत है. उसको यह समझाया है कि मढ़ौरा के मुकाबले भारत का इकबाल बहुत-बहुत ज्यादा है और मढ़ौरा के हितों को भारत के हित पर कुर्बान किया जा सकता है. यह जो भारत है, उसकी देश की जो समझ थी, जो पारंपरिक समझ है, उसके मुकाबले तो यह नई समझ है. इसमें भौगोलिक समझ शामिल है. यह एक भौगोलिक देश है, जिसकी एक चौहद्दी है, जिसके दक्षिण में यह है, उत्तर में यह है, पश्चिम में यह है, यह सब तो उसको बताया गया है कि यह ऐसा है. वह खुद इसका अनुभव नहीं करता है. अगर आप कहें कि मेरे अनुभव की सीमा से बाहर की चीज है. मैं इसकी कल्पना करता हूं, मुझे हर रोज यह बताया जाता है.

स्कूल में हम लोगों को जो चीज सबसे पहले याद कराई जाती थी वह भारत की चौहद्दी है. यह क्यों बताया जाता था? क्योंकि यह हमारे दिमाग में बैठ जाए. वह भारत कोई अपने आप अनुभव होने वाली चीज नहीं थी. मेरी जो मानवीय अनुभव की सीमा है, उस मानवीय की सीमा में तो भारत ही है. भारत अंतत: एक कल्पना है जिसके बारे में मुझे रोज-रोज बताकर उस कल्पना को मेरे दिमाग में बिठाकर उसको यथार्थ बना दिया जाता है, जिसका एक तिरंगा है, एक राष्ट्रगान है वगैरह-वगैरह. भारत इन्हीं के माध्यम से मेरे मन में मूर्त भी होता है और जीवित भी होता है. यह सब जो हो रहा है, वह बहुत स्पष्ट है. बीएचयू से संदीप पांडेय को तो नक्सली कहकर ही निकाला गया. नक्सली होना ही राष्ट्रविरोधी हो गया. वामपंथी होना ही राष्ट्रविरोधी होना हो गया. यह तो तय हो गया है. अब इसके बारे में बहस नहीं हो सकती. कुछ चीजें स्थापित कर दी गई हैं जिनके बारे में अब बहस की गुंजाइश नहीं है. जैसे आप यह नारा भारत में लगा सकते हैं कि नक्सलवादियों भारत छोड़ो. कैसे लगा सकते हैं यह नारा? आरएसएस वालों भारत छोड़ो यह नारा नहीं लग सकता लेकिन नक्सलवादियों भारत छोड़ो यह नारा लग सकता है. नक्सलवाद की विचारधारा से हमें आपत्ति हो सकती है, उनके तरीके से हमें असहमति हो सकती है, लेकिन नक्सलवादी जो सबसे गरीब लोगों के लिए लड़ते हैं, उनको आप कहते हैं कि भारत छोड़ो. यह बहुत विचित्र है लेकिन यह स्थापित हो चुका है.

अब रहा दलितों का प्रश्न, तो आरएसएस का कहना यह है कि एकमात्र मैं हूं, और कोई नहीं है. गांधी का भी व्याख्याता मैं हूं. आंबेडकर का भी व्याख्याता मैं हूं. मैं किसी और को व्याख्याता होने की इजाजत नहीं देता. हैदराबाद के आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन को लेकर, रोहित वेमुला जिससे जुड़ा था, उसके बारे में वेंकैया नायडू का बयान क्या है? उन्होंने कहा कि वह सिर्फ नाम का आंबेडकरवादी है. वह दरअसल, वाम का मुखौटा है. यह बात वे पहले दिन से कह रहे हैं कि आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन का दलितों से कोई लेना-देना नहीं है, वह दरअसल रेडिकल लेफ्ट का मुखौटा है जो राष्ट्र-विरोधी है, क्योंकि उसने याकूब मेमन की फांसी का विरोध किया. वे यह साबित कर रहे हैं कि इसकी इजाजत दलितों को नहीं है कि वे कौन-सी राजनीति करें और कौन-सी भाषा बोलें, क्योंकि वह हम उनको बताएंगे.

संबित पात्रा ने एक बहस में कहा कि आप दुर्गा के बारे में ऐसा नहीं बोल सकते. हमने कहा कि आप स्क्रिप्ट ताे नहीं देंगे न लिखकर कि हम क्या बोलें और क्या नहीं बोलें! आपकी दुर्गा महिषासुर मर्दिनी होगी. लेकिन जो महिषासुर का शहादत दिवस मनाएंगे, वह दुर्गा के लिए क्या बोलेंगे यह तो वे ही तय करेंगे. आप तो दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी बोले चले जा रहे हैं. आप तो यह ख्याल नहीं कर रहे हैं कि महिषासुर को देवता मानने वालों की भावना का क्या हो रहा है. उलटकर यह प्रश्न किया जाए कि उनकी भावनाओं का क्या हो रहा है. आप उनके शहादत दिवस में मत जाइए. आप अपना महिषासुर मर्दिनी दिवस मनाते रहिए. यह सब जो चल रहा है, इससे निपटना बहुत ही कठिन है. दो स्तर की लड़ाई हो गई है. एक लड़ाई है सांस्कृतिक और एक लड़ाई है राजनीतिक. अब यह पूरी लड़ाई सांस्कृतिक राजनीति में बदल गई है तो और भी कठिन हो गई है. अब देखिए कि यह कितना दिलचस्प है कि एक बहुत बड़ा तबका बिल्कुल खामोश बैठा है. वह है मुसलमानों का तबका. इस पूरी बहस में एक आवाज नहीं है. क्योंकि मान लिया गया है कि वे प्रासंगिक नहीं हैं. अब वे कैसे दावेदारी पेश करें इस भारतीय राष्ट्र पर? वे अपने को इस घोल में मिलाकर ही शामिल हो सकते हैं.

यह जो सांस्कृतिक राजनीति की लड़ाई है यह अभी और तीखी होने वाली है. इसकी तार्किक परिणति कुछ और भी हो सकती है इसके लिए लोगों को, पूरे भारत को तैयार रहना चाहिए, क्योंकि जिस दिशा में धकेल दिया गया है, उस दिशा में आप समाज के दूसरे तबकों को रोक नहीं सकते. तब वे अपनी भाषा में बात करेंगे. आज ऐसा लग रहा है कि वे चुप हैं, लेकिन वे क्यों चुप रहें और कब तक चुप रहें, कब तक अपमानित होते रहें? तो एक तो यह सांस्कृतिक स्तर की लड़ाई है. दूसरे, यह राजनीतिक स्तर की लड़ाई है, जिसमें भाजपा को काफी नुकसान होने वाला है दलितों और आदिवासियों की ओर से. यह तो बहुत स्पष्ट दिख रहा है. उन्होंने रोहित वेमुला और आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन को राष्ट्रविरोधी घोषित करने का जो दांव खेला है, वह उन्हें महंगा पड़ेगा. दलित और आदिवासी अब बेचारे नहीं हैं.

इस सबका रास्ता तो राजनीतिक संघर्ष है. लेकिन अभी जो दिख रहा है वह निराशाजनक है. अगर आज की बात करें तो. मेरी जो समझ है वह यह है कि जो कुछ चल रहा है वह बेहद अप्रसांगिक है. क्योंकि मसला क्या था? मसला राष्ट्रवाद तो है नहीं. मसला तो यह है कि राज्य ने अपनी हिंसा का प्रयोग गैर-आनुपातिक ढंग से किया. उसने आगे बढ़कर हैदराबाद और दिल्ली में छात्रों पर हिंसा का प्रयोग किया. प्रश्न है राज्य की राजनीतिक हिंसा का, जो एक खास तरह की राजनीति की भाषा में व्यक्त हो रही है. प्रश्न राष्ट्रवाद तो नहीं है, लेकिन पूरी संसद बैठ गई राष्ट्रवाद पर बहस करने, जैसे कि राष्ट्रवाद पर कोई सेमिनार हो रहा हो. बाहर हमले हो रहे हैं, लोगों को पीटा जा रहा है, लोगों को गलत ढंग से गिरफ्तार किया जा रहा है, बहस इस पर होनी चाहिए, न कि राष्ट्रवाद पर, लेकिन सब लोग वहां अकादमिक सेमिनार करने लगे. हर कोई राष्ट्रवाद की परिभाषा दे रहा है. जैसे कि इस बहस के खत्म होते ही यह मसला निपट जाएगा. आप जब संसद में बहस कर रहे हैं, उसी समय जम्मू में यह घटना हो गई, उसी समय लखनऊ में यह घटना हुई, उसी समय इलाहाबाद में प्रदर्शनकारियों पर हमला हो गया. मसला है कि लोगों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला हो रहा है. इस पर बहस होनी चाहिए थी. राजनाथ सिंह ने साफ झूठ बोला. वे झूठ बोलकर निकल कैसे गए और विपक्ष ने निकलने कैसे दिया? स्मृति ईरानी झूठ पर झूठ बोले जा रही हैं और निकलती जा रही हैं. अगर जवाबदेही तय करनी है तो विपक्ष इन मामलों में जवाबदेही तय करेगा, न कि राष्ट्रवाद पर बहस करने लगेगा.

मुझे दिख रहा है कि विपक्ष में फ्लोर मैनेजमेंट नहीं है, आपस में समन्वय भी नहीं है, और शायद स्पष्टता भी नहीं है. मसलन राहुल गांधी ने पहले दिन जेएनयू जाकर जो स्पष्टता दिखाई, या रोहित वेमुला मामले में, बाद में क्या कांग्रेस घबरा गई कि भाजपा उसे राष्ट्रवाद के मसले पर पीछे ले जाएगी? क्या कांग्रेस के जो ओल्ड गार्ड्स हैं, वे घबराए हुए हैं? जिन लोगों ने राजीव गांधी को सलाह दी होगी कि राम जन्मभूमि का ताला खुलवाया जाए, जिन्होंने बाबरी मस्जिद गिरने दी, क्या उसी तरह के लोग राहुल को पीछे खींचकर ले गए होंगे कि संसद में मत बोलिए. क्योंकि इससे तो कुछ भी पता नहीं चला कि दरअसल आप करना क्या चाहते हैं. मुझे लगता है कि विपक्ष की तैयारी नहीं है. विपक्ष से ज्यादा स्पष्टता और तैयारी छात्रों में थी, चाहे हैदराबाद के छात्र हों या जेएनयू के. यह सब काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. हम सब काफी लंबा खतरनाक समय झेलने को अभिशप्त हैं. यह सब पता नहीं कहां तक जाएगा.

माहौल यह है कि हम लोग आसानी से बात नहीं कर सकते. कक्षाओं में सहजता नहीं रह गई है. कोई भी चीज अब सहज नहीं रह गई है. माहौल पूरी तरह से तनावपूर्ण है और लोग कन्फ्यूज्ड हैं. मुझे लगता है कि भाजपा की रणनीति संभवत: यह थी कि लोगों के मन में बड़ा कन्फ्यूजन पैदा कर दो और टेम्प्रेचर लगातार ऊपर रखो. जितना टेम्प्रेचर ऊपर होगा, लोग सन्निपात की हालत में होंगे. समाज सन्निपात की अवस्था में होगा तो उसकी सोचने-समझने की शक्ति समाप्त हो जाएगी. उस समय आप कुछ भी कर सकते हैं. क्योंकि तब समाज की आत्म रक्षात्मक स्थिति भी समाप्त हो जाएगी. आप उस पर कब्जा कर लेंगे. स्थितियां बहुत खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं. यह लेख कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित है. यह लेख मार्च, 2016 में तहलका में छप चुका है.)

शुक्रवार, 27 मई 2016

धर्मनिरपेक्ष भारत के नायक: जवाहरलाल नेहरू

मैं जवाहर लाल नेहरू के देहांत के 22 साल बाद पैदा हुआ. जाहिर तब तक उनका युग समाप्त हो चुका था. जब मैं बच्चा ​था, उस समय भारतीय राजनीति में मंडल के काउंटर में कमंडल आ गया था और भारतीय राजनीति खून—खराबा करते हुए मंदिर बनवाने दौड़ पड़ी थी. जब मैं पढ़ने लगा तब तब गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष, भगत सिंह के बारे में जाना, उनका लिखा पढ़ा और उनके बारे में पढ़ा. अब सोचता हूं काश उस युग में मैं भी पैदा हुआ होता, जिनकी खींची लकीरें अबतक की सबसे बढ़ी लकीरें हैं. यह लेख दो साल पहले लिखा था.

 
भारतीय इतिहासकारों ने जवाहरलाल नेहरू का मूल्यांकन करते समय उन्हें आधुनिक भारत का शिल्पी कहा है. नेहरू की भूमिका को लेकर तमाम विवादों के बावजूद उनके बारे में यह कहना कहीं से भी अतिशयोक्ति नहीं है. वे बीसवीं सदी के भारत के अग्रणी जनवादी, मानवीय मूल्यों को तरजीह देने वाले और महान द्रष्टा थे. अपने समय में नेहरू नागरिक स्वतंत्रताओं के जबर्दस्त हिमायती थे और इसे उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे, जितना की आर्थिक समानता या समाजवाद को. हिंदुस्तान का निर्माण इस विचारधारा की बुनियाद पर टिका है कि आधुनिक हिंदुस्तान अनेक धर्मों, जातियों और संप्रदायों के बुनियादी अधिकार सुनिश्चित करता है, हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र नहीं हैं. नेहरू इस विचार के अग्रणी लोगों में से थे, जिनके प्रयास से हिंदुस्तान एक उदार और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में स्थापित हो सका. वे प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्मान, आत्मा की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, तार्किकता, मानवता आदि के न सिर्फ हिमायती थे, बल्कि इसके लिए संघर्ष भी किया. अपने व्यक्तित्व में नेहरू बेहद उदार दृष्टिकोण रखते थे, जिसे उन्होंने भारतीय जनमानस में उतारने की कोशिश की. 1954 में उन्होंने सभी मुख्यमंत्रियों को लिखा—'यदि भारत को सचमुच वैसा महान बनाना है जैसा कि हम सब लोग चाहते हैं तो उसे न तो अंदर से और न ही बाहर से अलग—थलग होना चाहिए. उसे उन सभी चीजों का त्याग करना पड़ेगा जो उनकी आत्मा का चिंतन या सामाजिक जीवन के विकास में बाधक बन सकती हैं.'
नेहरू के धुर आलोचक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे महान लोकतांत्रिक मूल्यों वाले नेता थे। नेहरू ने तमाम मुश्किलें उठाकर धर्मनिरपेक्ष ढांचे की नींव रखी और उसकी पूरी शक्ति से हिफाजत भी की। वे ऐसे नेता थे जिन्होंने संसद में अपनी आलोचना करने वालों की भी वो पीठ थपथपाया करते थे। नेहरू एक समतावादी, न्यायोचित और जनवादी समाज—समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे. नागरिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता नेहरू के उच्च राजनीतिक मूल्यों में सर्वोपरि रहे. गांधी और मार्क्स के विचारों के उनपर व्यापक असर था और इन विचारों के अनुरूप उन्होंने एक समाजवादी राष्ट्र की स्थापना के लिए आजीवन कोशिश करते रहे.
नागरिक स्वतंत्रताओं के हिमायती नेहरू ने मार्च 1940 में लिखा—'प्रेस की आजादी का मतलब यह नहीं होता कि जो चीजें हम छपी हुई देखना चाहें, सिर्फ उन्हीं की अनुमति दें, इस तरह की आजादी से तो कोई अत्याचारी भी सहमत हो जाएगा. नागरिक स्वतंत्रताओं और प्रेस की आजादी का मतलब है कि हम जो चीज न चाहें उनकी भी अनुमति दें, अपनी आलोचना बर्दाश्त करें.' नेहरू की ख्याति एक ऐसे नेता के रूप में है जो तीखी आलोचनाओं का भी सम्मान करने की हिमायत करते थे.
कराची कांग्रेस का 1931 में मौलिक अधिकारों पर पारित प्रस्ताव नेहरू ने ही तैयार किया था उसमें अभिव्यक्ति तथा प्रेस के द्वारा अपनी राय व्यक्त करने और संगठन बनाने के अधिकार सुनिश्चित किए गए.उन्हीं के प्रयासों से 1936 में इंडियन सिविल लिबर्टीज यूनियन की स्थापना हुई. यह एक गैर—दलीय असांप्रदायिक संगठन था जिसका मकसद नागरिक अधिकारों पर होने वाले हमलों के खिलाफ जनमत तैयार करना था. इस संगठन की स्थापना के अवसर पर नेहरू ने कहा था—'जब नागरिक अधिकारों का दमन होता है तो राष्ट्र की तेजस्विता समाप्त हो जाती है और वह कोई भी ठोस काम करने लायक नहीं रह जाता.' भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने धीरे—धीरे लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की एक ऐसी विचारधारा एवं संस्कृति विकसित करने में सफलता प्राप्त की.  असहमति के प्रति सम्मान भाव, अभिव्यक्ति की आजादी, बहुमत के शासन का सिद्धांत और अल्पसंख्यक मतों के बने रहने के अधिकार की मान्यता जिसका आधार बने. इसमें नेहरू का उल्लेखनीय योगदान रहा कि नागरिक अधिकारों की सुरक्षा वाले लोकतंत्र की सहमति बन सकी. गांधी जी भी नागरिकों के अधिकारों के प्रति पूर्णतया कटिबद्ध थे जो आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. गांधी जी ने 1922 के यंग इंडिया में लिखा था—'हम अपने लक्ष्य की तरफ एक कदम भी बढ़ सकें, इससे पहले स्वतंत्र अभिव्यक्ति ओर संगठन के अधिकार को हमें हासिल करना चाहिए. हमें इन अधिकारों की रक्षा जान देकर भी करनी चाहिए.' इन नायाब मूल्यों ने भारत को उदार लोकतंत्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका अदा की.
इतिहासकार विपिन चंद्र अपनी किताब 'भारत का स्वतंत्रता संघर्ष' में लिखते हैं कि 'समाजवादी भारत के विजन को लोकप्रिय बनाने में जवाहरलाल नेहरू ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.उनका कहना था कि राजनीतिक आजादी जनता की आर्थिक मुक्ति के बिना बेकार है. 1930 के पूरे दशक में वे तत्कालीन राष्ट्रवादी विचारधारा की अपर्याप्तता की ओर संकेत करते रहे और उसपर बुर्जुआ विचारों के वर्चस्व की आलोचना करते रहे. उनका जोर इस बात पर था राष्ट्रीय आंदोलन में एक नई, समाजवादी—बुनियादी रूप से मार्क्सवादी—विचारधारा को प्रमुख स्थान दिया जाए, ताकि लोग अपनी सामाजिक स्थिति का वैज्ञानिक अध्ययन कर सकें और कांग्रेस को समाजवादी विचारधारा का वाहक बना सकें. इस मामले में 30 का दशक काफी अनुकूल साबित हुआ.'
नेहरू जिस विचारधारा का नेतृत्व कर रहे थे वह जनवाद, कानून का शासन, व्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान, सामाजिक समता, बुद्धिपरकता और नैतिकता पर टिका हुआ था.  उन्होंने आजीवन एकीकृत धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण के लिए संघर्ष किया, जहां पर हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का मूलभूत अधिकार प्राप्त हो. यह नेहरू ही थे, जिन्होंने हिंदुत्ववादी ताकतों को कभी सर नहीं उठाने दिया और धर्मनिरपेक्ष भारतीय राष्ट्र के विचार को मजबूती से आगे बढ़ाया. कहते हैं कि एक बार वह दिल्ली में मुसलमानों के इलाके की ओर बढ़ते तलवार लपलपाते सिखों के एक जुलूस के आगे तनकर खड़े हो गए थे और उन्हें ऐसी डांट लगाई कि सभी ने हथियार फेंक दिए।
गांधीजी ने जो स्वराज, गांवों और आखिरी आदमी के विकास की बात की, नेहरू ने उसे आगे बढ़ाया। उन्होंने इस बात को समझा कि आम आदमी के बिना स्वाधीनता की बात अधूरी है। इसलिए उन्होंने भूमि सुधार, कामगारों, कलाकारों, किसानों की सुरक्षा की बात की। उन्होंने घोषणा की कि भारत को एक वैज्ञानिक नजरिए की जरूरत है, जबकि महात्मा गांधी पुराने को पुनजीर्वित करने की ओर झुके हुए थे, नेहरू भविष्यदृष्टा थे। वे भारत को वैज्ञानिक सोच वाला आधुनिक राष्ट्र बनाना चाहते थे.
इसके लिए उन्होंने जरूरी मूल्यों की न सिर्फ वकालत की बल्कि उसे अपने जीवन में भी उतारा. लेखक और विचारक पीसी जोशी ने एक बार एक संस्मरण सुनाया. '1945 की गमिर्यों की बात है. नेहरू जी अंतिम बार अल्मोड़ा जेल में कारावास में थे। जेल में दूध पहुंचाने वाला मेरा जानकार था। एक दिन उसने हमें बताया कि नेहरू जी आज रिहा होने वाले हैं। हम कुछ बच्चे कौतूहलवश उन्हें देखने जा पहुंचे। जेल के करीब पहुंचे तो देखा वह अकेले चले आ रहे हैं। तब तक शायद कांग्रेस के लोग उन्हें लेने नहीं पहुंच पाए थे। हम अभिभूत होकर उन्हें देख रहे थे। तभी वह हमारे पास आए और बोले- 'क्या देख रहे हो? वह सामने मंदिर देखो, कितना सुंदर है। बताओ किसने बनाया उसे, वह किस देवता का मंदिर है। नहीं जानते तुम? जानना चाहिए। देश यहीं से शुरू होता है।' फिर उनकी नजर सामने हिमालय की धवल चोटियों की ओर गई। वह फिर हमें कहने लगे- 'तुम लोग बहुत सौभाग्यशाली हो, हम तो कश्मीर में पैदा हुए, मगर वहां से कट गए। तुम कितनी सुंदर जगह रहते हो। लेकिन यहां लोग गरीब हैं। उनके लिए बड़े होकर कुछ करोगे या नहीं?'
नेहरू के पास हिंदुस्तान के लिए एक ग्लोबल विजन था। वे भारत को आधुनिक जगत से जोड़ना चाहते थे इसलिए हिंदुस्तान की वैश्विक भूमिका की वकालत की. जब दुनिया दो महाशक्तियों—अमेरिका और रूस— में बंटी हुई थी और ये दोनों शक्तियां अपना वर्चस्व बनाने पर लगी थीं, नेहरू ने हर वैश्विक दबाव का मुकाबला किया और नवस्वतंत्र भारत को विदेशी प्रभाव से मुक्त रखा. अमेरिका या रूस की ओर रुझान रखने की जगह उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुआई की. उन्होंने दुनिया के सामने प्राचीन भारत की छवि तोड़कर नए भारत की छवि रखी। गांधीजी नेहरू के बारे में कहा था- 'मेरे बाद तुम्हें मेरी आवाज नेहरू में सुनाई देगी।' आज जब राजनीतिक तौर पर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर देश को हिंदू और मुसलमान में बांटने की कोशिश की जा रही है, नेहरू नई पीढ़ी के लिए 'विविधता में एकता' के विचार के लिए लड़ने वाले नायक की हैसियत से इतिहास पुरुष के रूप में अनुकरणीय हैं.

शनिवार, 23 जनवरी 2016

विरासत के विरुद्ध फूहड़ अभियान

पिछले कुछ महीनों में राष्‍ट्रवादी फैक्‍ट्री के फूहड़ सिपाहियों ने जवाहर लाल नेहरू के कुछ पत्र जारी किए. हाल में सुभाष चंद्र बोस के बहाने नेहरू पर फिर अनाप शनाप कोशिश की गई. होता यह है कि भाई लोग फोटोशॉप पर एक पुराना पत्र तैयार करते हैं कि यह नेहरू का है. लेकिन हर बार पकड़े जाते हैं.
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ कथित नेहरू का पत्र
जिसमें एक दर्जन से ज्‍यादा गलतियां हैं. 
नेहरू बुरा प्रधानमंत्री हो सकता है, लेकिन वह भारत का निर्माता है. नेहरू नीतिगत गलतियां कर सकता है, भारत में संसदीय परंपरा की पहली ईंट रखने वाला व्‍यक्ति है. नेहरू को हम नापसंद कर सकते हैं, लेकिन वह योग्‍य अौर पढ़ा लिखा था. राजनीति के शीर्ष पर होकर भी उसने कई अमूल्‍य किताबें लिखीं. नेहरू की कोई एक किताब मूल्‍य के स्‍तर पर राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के नब्‍बे साल के साहित्‍य से श्रेष्‍ठ साबित होती हैं. क्‍योंकि विविधता, लोकतंत्र, उदारता, बराबरी आदि मूल्‍यों की वाहक हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने भी एक किताब लिखी है जिसमें वे कहते हैं कि मैला ढोने वालों को ऐसा करके आध्‍यात्मिक सुख मिलता है.
हो सकता है कि नेहरू मूर्ख भी रहे हों, लेकिन उन्‍होंने तक्षशिला को बिहार में कभी नहीं ला पटका, न ही पूरे देश को झूठ के समन्‍दर में डुबाने की कोशिश की और न ही अपने भाषणों के कारण प्रधानमंत्री रहते हुए चुटकुला बने.
मध्‍यम मार्ग पर चलने वाला एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत बनाने में सबसे बड़ा योगदान नेहरू का है. नेहरू और गांधी बुरे नेता हो सकते हैं, लेकिन उनके भारत में सबके लिए जगह थी, उनकी नजर में न कोई कुत्‍ता था, न कोई कुत्‍ते का बच्‍चा.
ऐसे व्‍यक्ति को वे लोग बदनाम करना चाहते हैं जो जवाहरलाल की स्‍पेलिंग नहीं जानते. दुखद है कि वे ऐसी फिजूल की चर्चाओं में लोगों को उलझाए रखना चाहते हैं.
सही चीज के लिए लडि़ए. अपनी फ्रस्‍ट्रेशन इस तरह निकालने की कोशिश में आप पकड़े जाते हैं और आपकी फ्रस्‍ट्रेशन और ज्‍यादा बढ़ जाती है.
यदि नेहरू, गांधी, कांग्रेस, सुभाष सबको नकार दिया जाए तब सवाल उठेगा कि संघ ने क्‍या किया?
संघ के हिस्‍से में तीन उपलब्धियां हैं:
1. सावरकर का जेल में अंग्रेजों से माफी मांग कर छूट जाना और फिर पूरे आजादी आंदोलन में संघ का किसी तरह के संघर्ष से दूर रहना.
2. अपनी घृणास्‍पद मानसिकता को मूर्तरूप देते हुए गांधी की हत्‍या
3. आजादी के बाद भी देश को हिंदू-मुसलमान में बांटने की लगातार कोशिश. यह कमंडल से होते हुए गाय तक पहुंच चुकी है.
संघ जितना बड़ा और ताकतवर संगठन है, उसका देश के इतिहास में सबसे बड़ा योगदान हो सकता था. आजादी की लड़ाई में उनकी सारी ऊर्जा बर्बाद हुई, लेकिन उन्होंने उससे कोई सबक नहीं लिया. हिंदू—मुसलमान दो अलग देश हैं, यह द्विराष्ट्र सिद्धांत इतना खतरनाक साबित हुआ कि सरकारी आंकड़ों में दस लाख लोगों का खून बहा. देश के दो टुकड़े हुए, फिर धर्म के आधार पर बना पाकिस्तान ध्वस्त हो गया. संघ परिवारी अब भी धर्म के आधार पर देश बनाने की खब्त से बाहर आने को तैयार नहीं हैं.
नेहरू, गांधी, सुभाष और पटेल जैसे बड़े नेताओं के आगे संघ पूरा संगठन बहुत बौना और निष्प्रभावी हैं. उन्हें इन कुत्सित को​शिशों से उबर जाना चाहिए. 

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...