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गुरुवार, 3 नवंबर 2016

‘लोगों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला हो रहा है, बहस इस पर होनी चाहिए राष्ट्रवाद पर नहीं’







प्रश्न है राज्य की राजनीतिक हिंसा का, जो एक खास तरह की राजनीतिक भाषा में व्यक्त हो रही है. लेकिन पूरी संसद बैठ गई राष्ट्रवाद पर बहस करने, जैसे कि राष्ट्रवाद पर कोई सेमिनार हो रहा हो. बाहर हमले हो रहे हैं, संसद में अकादमिक सेमिनार हो रहा जैसे कि इस बहस से यह मसला निपट जाएगा


अपूर्वानंद

किसी से आप पूछेंगे कि वह किसको मानता है राष्ट्रवाद तो वह नहीं बता पाएगा. कुछ धुंधली-सी अवधारणा है लोगों के दिमाग में कि मुल्क हमेशा खतरे में रहता है, सैनिक उसकी रक्षा करते हैं, वे मारे जाते हैं, और इधर बुद्धिजीवी हैं जो तरह-तरह से सवाल उठाते रहते हैं, जबकि इत्मिनान से तनख्वाहें ले रहे हैं और जनता के पैसे पर शानदार जगहों में बैठकर पढ़ रहे हैं, जबकि हमारे सैनिक सियाचीन में बर्फ में दबकर मर जाते हैं.

अगर आप लोगों से पूछें तो कुल मिलाकर आपको जवाब यही मिलेगा जो आजकल मिल रहा है. अब आप इस अवधारणा को तोड़ेंगे कैसे? इसको तोड़ना बहुत ही मुश्किल है. लोगों को यह समझाना कि जो लोग विश्वविद्यालयों में बैठकर पढ़ रहे हैं, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, या जो सवाल कर रहे हैं, वह सवाल करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. यह समझाना भी बहुत कठिन है कि छत्तीसगढ़ में भी जिन सैनिकों को लगा दिया जा रहा है उनको देश के ही खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है. क्योंकि उनको बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में इस्तेमाल किया जा रहा है. तो इसे कैसे समझाया जाएगा, यह एक प्रश्न है.

जिसको कहा जा रहा है कि राष्ट्रवाद क्या है, इसमें किसी को भी राष्ट्रद्रोही साबित करना बहुत आसान है. राष्ट्रवाद के घालमेल के चलते हिंदूवाद को आत्मसात करना बहुत आसान है. उसके प्रतीक चिह्न, उसके संकेत सारे ऐसे हैं जिसको आप हिंदू धर्म से जोड़कर देख सकते हैं. और एक तरह की प्रतिध्वनि है जो बहुत दिनों से लोगों के मन में चली आ रही है, अब जिसको खुलकर निकलने का मौका मिला है कि यह देश पूरी तरह से हिंदू क्यों नहीं है और क्यों नहीं इसे होने दिया जा रहा है. लंबे समय तक इसके लिए नेहरू को दोषी ठहराया गया, कि नेहरू क्योंकि आधा ईसाई थे, आधा मुसलमान थे, तो उनकी वजह से ऐसा नहीं हो पाया. वरना पटेल, राजेंद्र बाबू होते तो हिंदू राष्ट्र हो ही जाता. वह घृणा अभियान जारी है.

अब इस चीज को समझना अति आवश्यक है कि क्यों सबसे ज्यादा निशाने पर राहुल गांधी हैं. राहुल गांधी सोनिया के बेटे हैं और नेहरू से जुड़े हैं. तो वह जो पुरानी घृणा है उसे इटली से जोड़कर और ताजा किया जा सकता है. तो यह बहुत ही पेचीदा घालमेल किया गया है. अफवाहों और दूसरे तमाम माध्यमों से इसे इतना ज्यादा पकाया गया है, इसकी काट के बारे में बात करने की कभी कोई कोशिश नहीं की गई. हम लोग अगर बात करने लगेंगे समझदारी से तो उसकी तो जगह नहीं है. क्योंकि पूरा सामाजिक विचार-विमर्श है वह इस भाषा में ढल गया है.

दो-तीन चीजें जो बहुत ही असंगत मालूम पड़ती हैं, वो ये कि माओवादी कैसे राष्ट्रविरोधी हो गए? नक्सलवादी कैसे राष्ट्रविरोधी हो गए? यह प्रश्न किया जा सकता है! क्योंकि ये लोग तो सबसे गरीब लोगों के लिए लड़ रहे हैं. यह तो एक आंतरिक संघर्ष है. इनको राष्ट्रविरोधी बार-बार क्यों कहा जा रहा है? यह जो हो रहा है कि आप दोनों-तीनों चीजों का घालमेल कर रहे हैं, इससे कुछ बातें समझ में आती हैं. क्योंकि सशस्त्र माओवादियों का संघर्ष हमारे सैन्य बल से होता है. सैन्य बल राष्ट्र का सबसे बड़ा प्रतीक है. इसलिए आप माओवादियों को राष्ट्रविरोधी घोषित कर सकते हैं, बिना यह सोचे हुए कि ये सैन्य बल आदिवासियों के घर जला रहे हैं, उन पर हमला कर रहे हैं तो ये किनके हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं. ये बातें करेगा कौन?

विश्वविद्यालयों के खिलाफ घृणा का एक माहौल पहले से है. हमारे यहां एक एंटी इंटेलेक्चुअलिज्म है और एक हीनताबोध जो भाजपा-आरएसएस में है कि उनको कोई बौद्धिक मानता नहीं है. बौद्धिकता के विरुद्ध उनके मन में एक घृणा है. और बौद्धिकता मात्र को वामपंथी मान लिया गया है. यह बहुत मजेदार चीज है. लेकिन तब प्रताप भानु मेहता क्या ठहरेंगे? आंद्रे बेते क्या होंगे? पीएन मदान क्या होंगे? आशीष नंदी क्या होंगे? इसी बीच यह खबर आई जिसकी मैं आशीष नंदी से पुष्टि नहीं कर पाया. आशीष नंदी ने कहा है कि वे माफी मांगने को तैयार हैं. उन्होंने गुजरात को लेकर जो लेख वर्षों पहले लिखा था, उसके चलते उन पर देशद्रोह का मुकदमा है. यह मुकदमा उनके खिलाफ है और टाइम्स ऑफ इंडिया, अहमदाबाद के खिलाफ है, जिसने उनका लेख छापा था. यह लेख तो गुजरात सरकार की आलोचना थी. गुजरात जिस दिशा में जा रहा है, उसकी आलोचना थी. उस पर देशद्रोह का मुकदमा कैसे हो गया? वह चल रहा है और आशीष नंदी ने उस पर माफी मांगने की पेशकश की है. वे माफी मांग सकते हैं.

इससे समझा जा सकता है कि दरअसल बौद्धिकता पर हमला बहुत पहले से चल रहा था. गुजरात में वह प्रोजेक्ट पूरा हो गया. इसलिए आप कह सकते हैं अब गुजरात एक तरह का बैरेन लैंड है. अब आप देखें कि कैसे व्यवस्थित ढंग से वह हमला हो रहा है. जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय में अभी कुछ ही दिन पहले एक सेमिनार हुआ ‘कश्मीर में बहुलतावाद की संस्कृति’ विषय पर. अब यह सेमिनार कैसे राष्ट्रविरोधी है? लेकिन इस सेमिनार को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आपत्ति जताता है और उस आपत्ति के आधार पर कुलपति नोटिस जारी करते हैं. तो यह सब क्या हो रहा है?

इसी तरह अभी एक घटना लखनऊ में घटी जो बहुत ही हास्यास्पद थी. हालांकि वह घटना थोड़ी-बहुत मुझसे जुड़ी हुई है, लेकिन हास्यास्पद है. राजेश मिश्रा जो समाजशास्त्र के प्रोफेसर हैं, उन्होंने फेसबुक पर मेरा लेख शेयर किया जो इंडियन एक्सप्रेस में छपा था. उसके चलते उनका पुतला जलाया गया, विरोध-प्रदर्शन किया गया, क्लास नहीं चलने दी गई और कुलपति ने उनको कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. अब देखिए कि मूर्खता किस हद तक जा रही है. वह लेख उन्होंने लिखा भी नहीं है. वह लेख उन्होंने सिर्फ शेयर किया है. उस लेख में कोई हिंसा का आह्वान नहीं है. उन्होंने कोई हिंसा का आह्वान नहीं किया है. लेकिन उनके खिलाफ हिंसा होती है और उन्हीं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया जाता है. तो हम लोग धीरे-धीरे कहां जा रहे हैं, यह तो समझ में आता है.

राष्ट्रवाद चूंकि इतनी धुंधली अवधारणा है कि कई चीजें घुल-मिल जाती हैं जैसे देशभक्ति और राष्ट्रवाद. अवधारणा में तो दोनों दो हैं, लेकिन यहां दोनों एक हो गए. राष्ट्र और राज्य दोनों एक हो गए, जबकि दोनों दो हैं. आप विरोध कर रहे हैं राज्य का लेकिन उसको कहा जा रहा है कि आप राष्ट्र का विरोध कर रहे हैं. देश की अवधारणा तो अलग है न! अपनी भाषाओं में देखें तो हम देश जाते हैं, परदेस जाते हैं. बिहार वालों का चटकल मजदूरों का परदेस कोलकाता हो गया. देश उनका अपना छपरा है, सीवान है. अगर आप पारंपरिक रूप से देखें तो उनका देश और परदेस तो इसी देश में हो जाता है. लोग अपनी मिट्टी में मरने की बात करते हैं. वे यह थोड़े कहते हैं कि मैं भारत में मरूंगा. कोई व्यक्ति जो रह रहा है दिल्ली में उसकी इच्छा होती है कि वह जाकर दफन हो वहीं पर, जहां से वह आया है. उसको आग वहीं दी जाए. तो यह एक दूसरी चीज है जिसे आप अपनी मिट्टी से प्रेम कह सकते हैं. वह राष्ट्रवाद नहीं है. क्योंकि वह तो राष्ट्र है नहीं. अगर मान लिया वह राष्ट्रवादी है तो वह क्यों दिल्ली में ही नहीं मर जाना चाहता है? क्यों वह अपने गांव जाकर ही मरना चाहता है या वहीं की मिट्टी में मिल जाना चाहता है? इसको काफी प्रगतिशील कदम माना जाता है कि अगर मैं लिखकर मर जाऊं कि मेरा शव मेरे गांव न ले जाया जाए. अगर पूरे राष्ट्र की भूमि एक ही है तो यह लगाव, यह खिंचाव क्यों होता है? यह अंतर है, इसको लोगों को समझना चाहिए. लेकिन यहां तो सब घालमेल कर दिया गया.

इसके उलट, राष्ट्रवाद तो एकदम नई अवधारणा है. जो आपका देश है, वही आपका राष्ट्र नहीं है, छपरा के व्यक्ति का देश तो छपरा या वहां का एक गांव मढ़ौरा है, जहां से वह आया है, लेकिन राष्ट्र तो भारत है. उसको यह समझाया है कि मढ़ौरा के मुकाबले भारत का इकबाल बहुत-बहुत ज्यादा है और मढ़ौरा के हितों को भारत के हित पर कुर्बान किया जा सकता है. यह जो भारत है, उसकी देश की जो समझ थी, जो पारंपरिक समझ है, उसके मुकाबले तो यह नई समझ है. इसमें भौगोलिक समझ शामिल है. यह एक भौगोलिक देश है, जिसकी एक चौहद्दी है, जिसके दक्षिण में यह है, उत्तर में यह है, पश्चिम में यह है, यह सब तो उसको बताया गया है कि यह ऐसा है. वह खुद इसका अनुभव नहीं करता है. अगर आप कहें कि मेरे अनुभव की सीमा से बाहर की चीज है. मैं इसकी कल्पना करता हूं, मुझे हर रोज यह बताया जाता है.

स्कूल में हम लोगों को जो चीज सबसे पहले याद कराई जाती थी वह भारत की चौहद्दी है. यह क्यों बताया जाता था? क्योंकि यह हमारे दिमाग में बैठ जाए. वह भारत कोई अपने आप अनुभव होने वाली चीज नहीं थी. मेरी जो मानवीय अनुभव की सीमा है, उस मानवीय की सीमा में तो भारत ही है. भारत अंतत: एक कल्पना है जिसके बारे में मुझे रोज-रोज बताकर उस कल्पना को मेरे दिमाग में बिठाकर उसको यथार्थ बना दिया जाता है, जिसका एक तिरंगा है, एक राष्ट्रगान है वगैरह-वगैरह. भारत इन्हीं के माध्यम से मेरे मन में मूर्त भी होता है और जीवित भी होता है. यह सब जो हो रहा है, वह बहुत स्पष्ट है. बीएचयू से संदीप पांडेय को तो नक्सली कहकर ही निकाला गया. नक्सली होना ही राष्ट्रविरोधी हो गया. वामपंथी होना ही राष्ट्रविरोधी होना हो गया. यह तो तय हो गया है. अब इसके बारे में बहस नहीं हो सकती. कुछ चीजें स्थापित कर दी गई हैं जिनके बारे में अब बहस की गुंजाइश नहीं है. जैसे आप यह नारा भारत में लगा सकते हैं कि नक्सलवादियों भारत छोड़ो. कैसे लगा सकते हैं यह नारा? आरएसएस वालों भारत छोड़ो यह नारा नहीं लग सकता लेकिन नक्सलवादियों भारत छोड़ो यह नारा लग सकता है. नक्सलवाद की विचारधारा से हमें आपत्ति हो सकती है, उनके तरीके से हमें असहमति हो सकती है, लेकिन नक्सलवादी जो सबसे गरीब लोगों के लिए लड़ते हैं, उनको आप कहते हैं कि भारत छोड़ो. यह बहुत विचित्र है लेकिन यह स्थापित हो चुका है.

अब रहा दलितों का प्रश्न, तो आरएसएस का कहना यह है कि एकमात्र मैं हूं, और कोई नहीं है. गांधी का भी व्याख्याता मैं हूं. आंबेडकर का भी व्याख्याता मैं हूं. मैं किसी और को व्याख्याता होने की इजाजत नहीं देता. हैदराबाद के आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन को लेकर, रोहित वेमुला जिससे जुड़ा था, उसके बारे में वेंकैया नायडू का बयान क्या है? उन्होंने कहा कि वह सिर्फ नाम का आंबेडकरवादी है. वह दरअसल, वाम का मुखौटा है. यह बात वे पहले दिन से कह रहे हैं कि आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन का दलितों से कोई लेना-देना नहीं है, वह दरअसल रेडिकल लेफ्ट का मुखौटा है जो राष्ट्र-विरोधी है, क्योंकि उसने याकूब मेमन की फांसी का विरोध किया. वे यह साबित कर रहे हैं कि इसकी इजाजत दलितों को नहीं है कि वे कौन-सी राजनीति करें और कौन-सी भाषा बोलें, क्योंकि वह हम उनको बताएंगे.

संबित पात्रा ने एक बहस में कहा कि आप दुर्गा के बारे में ऐसा नहीं बोल सकते. हमने कहा कि आप स्क्रिप्ट ताे नहीं देंगे न लिखकर कि हम क्या बोलें और क्या नहीं बोलें! आपकी दुर्गा महिषासुर मर्दिनी होगी. लेकिन जो महिषासुर का शहादत दिवस मनाएंगे, वह दुर्गा के लिए क्या बोलेंगे यह तो वे ही तय करेंगे. आप तो दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी बोले चले जा रहे हैं. आप तो यह ख्याल नहीं कर रहे हैं कि महिषासुर को देवता मानने वालों की भावना का क्या हो रहा है. उलटकर यह प्रश्न किया जाए कि उनकी भावनाओं का क्या हो रहा है. आप उनके शहादत दिवस में मत जाइए. आप अपना महिषासुर मर्दिनी दिवस मनाते रहिए. यह सब जो चल रहा है, इससे निपटना बहुत ही कठिन है. दो स्तर की लड़ाई हो गई है. एक लड़ाई है सांस्कृतिक और एक लड़ाई है राजनीतिक. अब यह पूरी लड़ाई सांस्कृतिक राजनीति में बदल गई है तो और भी कठिन हो गई है. अब देखिए कि यह कितना दिलचस्प है कि एक बहुत बड़ा तबका बिल्कुल खामोश बैठा है. वह है मुसलमानों का तबका. इस पूरी बहस में एक आवाज नहीं है. क्योंकि मान लिया गया है कि वे प्रासंगिक नहीं हैं. अब वे कैसे दावेदारी पेश करें इस भारतीय राष्ट्र पर? वे अपने को इस घोल में मिलाकर ही शामिल हो सकते हैं.

यह जो सांस्कृतिक राजनीति की लड़ाई है यह अभी और तीखी होने वाली है. इसकी तार्किक परिणति कुछ और भी हो सकती है इसके लिए लोगों को, पूरे भारत को तैयार रहना चाहिए, क्योंकि जिस दिशा में धकेल दिया गया है, उस दिशा में आप समाज के दूसरे तबकों को रोक नहीं सकते. तब वे अपनी भाषा में बात करेंगे. आज ऐसा लग रहा है कि वे चुप हैं, लेकिन वे क्यों चुप रहें और कब तक चुप रहें, कब तक अपमानित होते रहें? तो एक तो यह सांस्कृतिक स्तर की लड़ाई है. दूसरे, यह राजनीतिक स्तर की लड़ाई है, जिसमें भाजपा को काफी नुकसान होने वाला है दलितों और आदिवासियों की ओर से. यह तो बहुत स्पष्ट दिख रहा है. उन्होंने रोहित वेमुला और आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन को राष्ट्रविरोधी घोषित करने का जो दांव खेला है, वह उन्हें महंगा पड़ेगा. दलित और आदिवासी अब बेचारे नहीं हैं.

इस सबका रास्ता तो राजनीतिक संघर्ष है. लेकिन अभी जो दिख रहा है वह निराशाजनक है. अगर आज की बात करें तो. मेरी जो समझ है वह यह है कि जो कुछ चल रहा है वह बेहद अप्रसांगिक है. क्योंकि मसला क्या था? मसला राष्ट्रवाद तो है नहीं. मसला तो यह है कि राज्य ने अपनी हिंसा का प्रयोग गैर-आनुपातिक ढंग से किया. उसने आगे बढ़कर हैदराबाद और दिल्ली में छात्रों पर हिंसा का प्रयोग किया. प्रश्न है राज्य की राजनीतिक हिंसा का, जो एक खास तरह की राजनीति की भाषा में व्यक्त हो रही है. प्रश्न राष्ट्रवाद तो नहीं है, लेकिन पूरी संसद बैठ गई राष्ट्रवाद पर बहस करने, जैसे कि राष्ट्रवाद पर कोई सेमिनार हो रहा हो. बाहर हमले हो रहे हैं, लोगों को पीटा जा रहा है, लोगों को गलत ढंग से गिरफ्तार किया जा रहा है, बहस इस पर होनी चाहिए, न कि राष्ट्रवाद पर, लेकिन सब लोग वहां अकादमिक सेमिनार करने लगे. हर कोई राष्ट्रवाद की परिभाषा दे रहा है. जैसे कि इस बहस के खत्म होते ही यह मसला निपट जाएगा. आप जब संसद में बहस कर रहे हैं, उसी समय जम्मू में यह घटना हो गई, उसी समय लखनऊ में यह घटना हुई, उसी समय इलाहाबाद में प्रदर्शनकारियों पर हमला हो गया. मसला है कि लोगों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला हो रहा है. इस पर बहस होनी चाहिए थी. राजनाथ सिंह ने साफ झूठ बोला. वे झूठ बोलकर निकल कैसे गए और विपक्ष ने निकलने कैसे दिया? स्मृति ईरानी झूठ पर झूठ बोले जा रही हैं और निकलती जा रही हैं. अगर जवाबदेही तय करनी है तो विपक्ष इन मामलों में जवाबदेही तय करेगा, न कि राष्ट्रवाद पर बहस करने लगेगा.

मुझे दिख रहा है कि विपक्ष में फ्लोर मैनेजमेंट नहीं है, आपस में समन्वय भी नहीं है, और शायद स्पष्टता भी नहीं है. मसलन राहुल गांधी ने पहले दिन जेएनयू जाकर जो स्पष्टता दिखाई, या रोहित वेमुला मामले में, बाद में क्या कांग्रेस घबरा गई कि भाजपा उसे राष्ट्रवाद के मसले पर पीछे ले जाएगी? क्या कांग्रेस के जो ओल्ड गार्ड्स हैं, वे घबराए हुए हैं? जिन लोगों ने राजीव गांधी को सलाह दी होगी कि राम जन्मभूमि का ताला खुलवाया जाए, जिन्होंने बाबरी मस्जिद गिरने दी, क्या उसी तरह के लोग राहुल को पीछे खींचकर ले गए होंगे कि संसद में मत बोलिए. क्योंकि इससे तो कुछ भी पता नहीं चला कि दरअसल आप करना क्या चाहते हैं. मुझे लगता है कि विपक्ष की तैयारी नहीं है. विपक्ष से ज्यादा स्पष्टता और तैयारी छात्रों में थी, चाहे हैदराबाद के छात्र हों या जेएनयू के. यह सब काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. हम सब काफी लंबा खतरनाक समय झेलने को अभिशप्त हैं. यह सब पता नहीं कहां तक जाएगा.

माहौल यह है कि हम लोग आसानी से बात नहीं कर सकते. कक्षाओं में सहजता नहीं रह गई है. कोई भी चीज अब सहज नहीं रह गई है. माहौल पूरी तरह से तनावपूर्ण है और लोग कन्फ्यूज्ड हैं. मुझे लगता है कि भाजपा की रणनीति संभवत: यह थी कि लोगों के मन में बड़ा कन्फ्यूजन पैदा कर दो और टेम्प्रेचर लगातार ऊपर रखो. जितना टेम्प्रेचर ऊपर होगा, लोग सन्निपात की हालत में होंगे. समाज सन्निपात की अवस्था में होगा तो उसकी सोचने-समझने की शक्ति समाप्त हो जाएगी. उस समय आप कुछ भी कर सकते हैं. क्योंकि तब समाज की आत्म रक्षात्मक स्थिति भी समाप्त हो जाएगी. आप उस पर कब्जा कर लेंगे. स्थितियां बहुत खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं. यह लेख कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित है. यह लेख मार्च, 2016 में तहलका में छप चुका है.)

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

एक था चंदू

कन्हैया कुमार जेएनयू छात्रसंघ से निकले पहले नेता नहीं हैं, जिनमें कुछ लोग बेहतर राजनीतिक संभावनाएं देख रहे हैं. उनसे पहले इसी छात्रसंघ ने चंद्रशेखर जैसा युवा पैदा किया था, जिसे देश की अापराधिक राजनीति लील गई.




दुनिया में वामपंथ का सबसे मजबूत किला ढह चुका था. दुनिया तेजी से पूंजीवाद की ओर बढ़ रही थी.
उदारीकरण भारत की दहलीज लांघकर अपने को स्थापित कर चुका था. तमाम धुर वामपंथी आवाजें मार्क्सवाद के खात्मे की बात कह रही थीं. उसी दौर की बात है, जब जेएनयू कैंपस में एक युवा छात्रनेता अपने साथियाें से कह रहा था, ‘हम अगर कहीं जाएंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाजों की शक्ति होगी जिनको बचाने की बात हम सड़कों पर करते हैं. अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा होगी तो भगत सिंह जैसे शहीद होने की महत्वाकांक्षा होगी, न कि जेएनयू से इलेक्शन में गांठ जोड़कर चुनाव जीतने और हारने की महत्वाकांक्षा होगी.’ दबी हुई आवाजों को बचाने की अलख जगाने वाले इस युवक का नाम था चंद्रशेखर, जिसे उसके दोस्त प्यार से कॉमरेड चंदू कहा करते थे. जो लोग चंदू को नहीं जानते, उनके मन में सवाल उठेगा कि वे आजकल कहां हैं? जवाब है कि वे भगत सिंह की तरह अंग्रेजी साम्राज्यवाद से लड़ते हुए शहीद तो नहीं हुए, लेकिन लड़ते हुए मारे जाने की उनकी  महत्वाकांक्षा पूरी हो गई. वे अब हमारे बीच नहीं हैं.
जेएनयू में उठे विवाद और छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया की गिरफ्तारी के बाद उनको पूरा देश जान गया. उनके हर भाषण का वीडियो वायरल हो गया. तमाम लोगों ने कन्हैया में एक तेज-तर्रार नेता की छवि देखी. हालांकि, उसी अनुपात में उनकी आलाेचना भी हुई. कन्हैया की लोकप्रियता, उनका जज्बा, उनकी ऊर्जा चंद्रशेखर की याद दिलाती है. दोनों में बहुत असमानताओं के साथ समानता यह है कि दोनों में व्यवस्था से टकराने का माद्दा है. दोनों ही जेएनयू छात्रसंघ की पैदावार हैं. दोनों के सरोकार गरीबों, मजदूरों, दलितों और महिलाओं को संबोधित करते हैं. हां, कन्हैया और चंद्रशेखर में फर्क यह है कि कन्हैया की शुरुआत एक ऐसी गिरफ्तारी से हुई, जिसमें शुरुआती तौर उन्हें बढ़त मिलती दिख रही है. लेकिन चंद्रशेखर बिहार की जनता के लिए एक उम्मीद बनकर उनके बीच काम करने गए थे और बाहुबल की राजनीति ने उन्हें लील लिया.
20 सितंबर, 1964 को बिहार के सीवान जिले ​में जन्मे चंदू आठ बरस के थे जब उनके पिता का देहांत हो गया. सैनिक स्कूल तिलैया से इंटरमीडियट तक की शिक्षा के बाद वे एनडीए प्रशिक्षण के लिए चुने गए. लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा और दो साल बाद वापस आ गए. इसके बाद उनका वामपंथी राजनीति से जुड़ाव हुआ और एआईएसएफ के राज्य उपाध्यक्ष के पद तक पहुंचे. बाद में वे जेएनयू पहुंचे तो कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया लिबरेशन की छात्र इकाई आइसा के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू किया. एक छात्र नेता के रूप में वे बहुत तेजी से उभरे और लोकप्रिय हुए. 1993-94 में जेएनयू छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए और फिर लगातार दो बार अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद वे जमीनी स्तर पर काम करने के म​कसद से अपने गृह जिले सीवान गए, जहां उनका मुकाबला संगीन अपराधियों की खूनी राजनीति से होना था.
सीवान पहुंचकर चंदू ने ​बिहार के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन के खिलाफ उनके गढ़ में ही बिगुल फूंक दिया. उन्होंने बिहार की राजनीति में अपराध, बाहुबल, घोटालों और भ्रष्टाचार के मुद्दों को बहुत प्रमुखता से उठाया. जनता से उनको बेहतर प्रतिक्रिया मिल रही थी. चंदू भारत के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने का सपना देख रहे थे और इसकी शुरुआत भी कर दी थी. बिहार में जनसंहारों और घोटालों के विरोध में 2 अप्रैल, 1997 को बंद बुलाया गया था. ​इस बंद के लिए 31 मार्च शाम चार बजे जेपी चौक पर एक नुक्कड़ सभा को संबोधित करते हुए चंदू और उनके सहयोगी श्याम नारायण को गोलियों से भून दिया गया. इस गोलीबारी में एक ठेलेवाले भुटेले मियां भी मारे गए.
चंद्रशेखर की हत्या के बाद भाकपा माले ने आरोप लगाया, ‘अब तक हमारे कई नेताओं कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है. श्याम नारायण और चंद्रशेखर की हत्या में राजद सांसद शहाबुद्दीन का हाथ है. वही सूत्रधार हैं. जिस समय हत्या हुई, हमारे कार्यकर्ता वहां पर मौजूद थे, जिन्होंने हत्यारों को पहचाना. वे शहाबुद्दीन के साथ के लोग थे. हत्या की वजह राजनीतिक है. हमारी पार्टी ने पिछले चुनाव में शहाबुद्दीन को सशक्त चुनौती दी थी. हमने चुनाव में अपराध के खिलाफ एजेंडा तैयार किया था. शहाबुद्दीन अपराध शिरोमणि हैं. अपराध को एजेंडा बनाने के बाद हमारे कार्यकर्ताओं पर चुन-चुनकर हमला हो रहा है.’
भाकपा माले के नेता रमेश एस. कुशवाहा ने उस समय बयान दिया था, ‘शहाबुद्दीन एक पेशेवर अपराधी रहे हैं. इसके पहले बिहार के बुद्धिजीवी उनके खिलाफ एक शब्द नहीं बोलते थे. पत्रकार कलम चलाने से डरते थे. हम लोगों ने पहली बार अपराध को एजेंडा बनाया और उनके खिलाफ बोलना शुरू किया.’ यह सही है कि इसके पहले भी बिहार चुनाव में कई वामपंथी कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी थी. लोगों को वोट देने से रोकने के लिए अपराधी नेताओं के गुंडे झुंड में पहुंचकर गोलियां चलाते थे और विरोधी पार्टी के मतदाताओं को मतदान से रोकते थे.
हत्या के बाद देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए. चंद्रशेखर के गांव बिंदुसार में देश भर से हजारों छात्र पहुंचे और चंदू की मां के नेतृत्व में मार्च निकाला गया. इस सभा को संबोधित करते हुए चंदू की बूढ़ी मां कौशल्या देवी ने कहा था, ‘मेरा बेटा मर कर भी अमर है और सदा अमर रहेगा. मेरी झोपड़ी को झोपड़ी मत आंकना. इस झोपड़ी की बहुत कीमत है… मेरा बेटा मरा नहीं है. ये हजारों लाल मेरे बेटे हैं.’ चंदू के गांव से चलकर हजारों नौजवानों का जुलूस सीवान के जेपी चौक पहुंचा. बताते हैं कि इतना बड़ा जुलूस सीवान में शायद ही कभी निकला था. दिल्ली में छात्र और बुद्धिजीवियों ने भारी विरोध मार्च निकाला. यह प्रदर्शन पूरे देश में हुआ और शहाबुद्दीन और साधु यादव को सजा देने की मांग की गई. जेएनयू के छात्रों के विरोध मार्च पर पुलिसिया लाठीचार्ज में बड़ी संख्या में लड़के लड़कियां घायल हुए. चंदू की हत्या के बाद दो अप्रैल का बंद और व्यापक हो गया और करीब करीब हिंसक भी रहा. पूरे बिहार में जनता सड़क पर उतरी.
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने राहत राशि के रूप में एक लाख रुपये का चेक भेजा तो चंदू की मां ने यह कहकर लौटा दिया कि ‘बेटे की शहादत के एवज में मैं कोई भी राशि लेना अपमान समझती हूं… मैं उन्हें लानतें भेज रही हूं जिन्होंने मेरे बेटे की जान की कीमत लगाई. एक ऐसी मां के लिए, जिसका इतना बड़ा बेटा मार दिया गया हो और जो यह भी जानती हो कि उसका कातिल कौन है, एकमात्र काम हो सकता है, वह यह है कि कातिल को सजा मिले. मेरा मन तभी शांत होगा महोदय. मेरी एक ही कीमत है, एक ही मांग है कि अपने दुलारे शहाबुद्दीन को किले से बाहर करो या तो उसे फांसी दो या फिर लोगों को यह हक दो कि उसे गोली से उड़ा दें.’
तत्कालीन सरकार से मांग की गई कि शहाबुद्दीन की संसद सदस्यता खारिज की जाए और बिहार आवास पर प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर गोली चलाने वाले साधु यादव को गिरफ्तार किया जाए. प्रधानमंत्री गुजराल ने इन मांगों को अव्यवहारिक बताया. सांसद शहाबुद्दीन गिरफ्तार हुए, लेकिन उनके खिलाफ ठोस सबूत और गवाह नहीं मिले. वे जमानत पर छूट गए. अदालत में यह मामला 15 साल तक खिंचा. आखिरकार बाहुबली नेताओं से संबंध रखने वाले तीन शार्प-शूटरों को उम्रकैद की सजा मिली. शहाबुद्दीन को जेल तो हुई लेकिन अन्य मामलों में. उनके खिलाफ चंद्रशेखर हत्याकांड और अन्य कई मामलों में गवाहों पर इतना अधिक दबाव डाला गया कि कई गवाह घर छोड़कर भाग गए या फिर गवाही से पलट गए. उस दौर में बिहार में शहाबुद्दीन की तूती बोलती थी.
चंदू जब जेएनयूएसयू के उपाध्यक्ष थे, तभी प्रणय कृष्ण अध्यक्ष थे. प्रणय कहते हैं, ‘प्रतिलिपियों से भरी इस दुनिया में चंदू मौलिक होने की जिद के साथ अड़े रहे. हमारी दोस्त प्रथमा कहती थी, ‘वह रेयर आदमी हैं.’ 91-92 में जेएनयू में हमारी तिकड़ी बन गई थी. राजनीति, कविता, संगीत, आवेग और रहन-सहन- सभी में हम एक से थे. हमारा नारा था, ‘पोएट्री, पैशन एंड पाॅलिटिक्स.’ चंदू इस नारे के सबसे ज्यादा करीब थे. समय, परिस्थिति और मौत ने हम तीनों को अलग-अलग ठिकाने लगाया, लेकिन तब तक हम एक-दूसरे के भीतर जीने लगे थे. चंदू कुछ इस तरह जिये कि हमारी कसौटी बनते चले गए. बहुत कुछ स्वाभिमान, ईमान, हिम्मत, मौलिकता और कल्पना- जिसे हम जिंदगी की राह में खोते जाते हैं, चंदू उन सारी खोई चीजों को हमें वापस दिलाते रहे.’
भाकपा माले की नेता कविता कृष्णन कहती हैं, ‘चंद्रशेखर का मामला और अब कन्हैया का मामला, इन दोनों घटनाओें में काेई समानता तो नहीं है, लेकिन ये जेएनयू की भूमिका को जरूर दिखाती हैं. जेएनयू पर इस बार का हमला भाजपा का पहले से प्लान किया हुआ है. इसके पहले भी कोशिश होती रही है जेएनयू को निशाना बनाने की. इस बार उन्होंने इसे लॉन्च किया. चंद्रशेखर की जो हत्या हुई, उसमें कई लोगों की पहले से हत्या हो चुकी थी. चंद्रशेखर यह जानते थे कि वहां खतरा है लेकिन उन्होंने चुना कि मैं वहां का हूं और वहीं जाकर काम करूंगा. वे वहां गए और वहां राजद सांसद ने उनकी हत्या करवाई. दोनों का राजनीतिक संदर्भ है लेकिन दोनों में अंतर है.’
चंदू के व्यक्तित्व के बारे में वे कहती हैं, ‘जितने लोग चंद्रशेखर को जानते थे, वे जानते थे कि उनमें कुछ खास बात थी. वे कोई बहुत करिश्माई नेता नहीं थे. उनकी खास बात थी कि वे 24 घंटे लोगों के लिए समर्पित रहते थे. साधारण से साधारण छात्र कभी भी उनके पास जाकर मदद मांगता था और वे प्रस्तुत रहते थे. जनता के लिए उनमें वास्तविक प्रेम था. वे बहुत समर्पित रहते थे. यह समर्पण उनकी खास बात थी. उनके  सीवान जाने के बाद विरोधियों को पता था कि वे एक जननेता के रूप में उभर रहे हैं. इस खतरे से बचने के लिए उनकी हत्या कर दी गई.’
उनके अनन्य सहयोगी रहे प्रणय कृष्ण के पास उनके बारे में बहुत सारे किस्से हैं. वे बताते हैं, ‘दिल्ली के बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, छात्रों आैैर पत्रकारों के साथ उनका गहरा रिश्ता था. वे बड़े से बड़े बुद्धिजीवी से लेकर रिक्शावालों, डीटीसी के कर्मचारियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को समान रूप से अपनी राजनीति समझा ले जाते थे. महिलाओं में वे प्राय: लोकप्रिय थे क्योंकि जहां भी जाते खाना बनाने से लेकर, सफाई करने तक और बतरस में उनके साथ घुलमिल जाते. छोटे बच्चों के साथ उनका संवाद सीधा और गहरा था. हाॅस्टल में उनका कमरा अनेक ऐसे छात्रों और विद्रोह करने वालों, विरल संवेदनाओं वाले लोगों की आश्रयस्थली था जो कहीं और एेडजस्ट नहीं कर पाते थे. मेस बिल न चुका पाने के कारण छात्रसंघ का अध्यक्ष होने के बावजूद उनके कमरे में प्रशासन का ताला लग जाता. उनके लिए तो जेएनयू का हर कमरा खुला रहता, लेकिन अपने आश्रितों के लिए वे चिंतित रहते. एक बार मेस बिल जमा करने के लिए उन्हें 1600 रुपये इकट्ठा करके दिए गए. अगले दिन पता चला कि कमरा फिर भी नहीं खुला. चंदू ने बड़ी मासूमियत से बताया कि 800 रुपये उन्होंने किसी दूसरे लड़के को दे दिए क्योंकि उसे ज्यादा जरूरत थी.’
जेएनयू के छात्र आज जिस तरह देश भर के दलितों, महिलाओं, मजदूरों, छात्रों आदि के मुद्दे पर सक्रिय रूप में आंदोलन छेड़ते हैं, इसकी बुनियाद में चंदू का बहुत बड़ा योगदान है. जेएनयू में फीस न बढ़ने देने, आरक्षण लागू होने, विश्वविद्यालय के निजीकरण का विरोध करने जैसे मुद्दों पर उन्होंने निर्णायक लड़ाई लड़ी.
प्रणय कृष्ण बताते हैं, ‘जेएनयू छात्रसंघ को उन्होंने देश भर यहां तक कि देश से बाहर चलने वाले जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ दिया. चाहे बर्मा का लोकतंत्र बहाली आंदोलन हो, चाहे पूर्वोत्तर के राज्यों में जातीय हिंसा के खिलाफ बनी शांति कमेटियां हों, नर्मदा  बचाओे आंदोलन हो या टिहरी आंदोलन हो- चंद्रशेखर उन सारे आंदोलनों के अनिवार्य अंग थे. उन्होंने बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर-पूर्व प्रांत के सुदूर क्षेत्रों की यात्राएं भी की थीं. आजाद हिंदुस्तान के किसी एक छात्र नेता ने छात्र आंदोलन को ही सारे जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ने का इतना व्यापक कार्य अगर किया तो सिर्फ चंद्रशेखर ने. यह अतिशयोक्ति नहीं है.’
चंद्रशेखर के समय आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके वी. शंकर कहते हैं, ‘चंदू मास लीडर था. वह होता तो जनता का नेता होता. वह हमारा बहुत महत्वपूर्ण कॉमरेड था. जेएनयू में अध्यक्ष बनने के बावजूद उसने गांव जाकर काम करने को तवज्जो दी और वहां उसे खूब समर्थन मिल रहा था. चंदू की हत्या के बाद सीवान में हुई रैली ऐतिहासिक थी. वह बेहद पढ़ा लिखा, समझदार और जनता की आकांक्षाओं को समझने वाला नेता था, जिसे मार दिया गया.’
कन्हैया में जिन्हें युवा नेतृत्व की संभावना दिखती है, वे सही हैं. लेकिन चंद्रशेखर एक ज्यादा बड़ी उम्मीद का नाम था, जिसे यह देश संभाल नहीं पाया. चंदू में एक अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने की संभावनाएं भी मौजूद थीं. प्रणय अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘1995 में दक्षिणी कोरिया में आयोजित संयुक्त युवा सम्मेलन में वे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जब वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ राजनीतिक प्रस्ताव लाए तो उन्हें यह प्रस्ताव सदन के सामने नहीं रखने दिया गया. समय की कमी का बहाना बनाया गया. चंद्रेशेखर ने वहीं आॅस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और तीसरी दुनिया के देशों के अन्य प्रतिनिधियों का एक ब्लाॅक बनाया और सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया. इसके बाद वे कोरियाई एकीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे जबरदस्त कम्युनिस्ट छात्र आंदोलन के भूमिगत नेताओं से मिले और सियोल में बीस हजार छात्रों की एक रैली को संबोधित किया. यह एक खतरनाक काम था जिसे उन्होंने वापस डिपोर्ट कर दिए जाने का खतरा उठाकर भी अंजाम दिया.’
भाकपा माले नेता कविता कृष्णन का आरोप है कि ‘चंदू की हत्या के मुख्य आरोपियों को तो सजा नहीं हुई. वे कहती हैं,  ‘शूटरों को सजा हुई थी. लेकिन अब  ऐसा सुनने में आ रहा है कि उन्हें भी छोड़ने की कोशिश की जा रही है. हालांकि, हम लोग इसे लेकर सतर्क हैं. ऐसा होता है तो हम विरोध करेंगे.’
चंदू के बारे में एक मशहूर घटना है. 1993 में छात्रसंघ के चुनाव के दौरान छात्रों से संवाद में किसी ने उनसे पूछा, ‘क्या आप किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए चुनाव लड़ रहे हैं?’ इसके जवाब में उन्होंने कहा था, ‘हां, मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है- भगत सिंह की तरह जीवन, चे ग्वेरा की तरह मौत.’ उनके दोस्त गर्व से कहते हैं कि चंदू ने अपना वायदा पूरा किया.
(यह लेख तहलका में प्रकाशित हो चुका है.)

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

पत्रकारिता का अंधयुग

अब सवाल लेफ्ट राइट के समर्थन का नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा कर पाना ही बहुत बड़ी चुनौती है. जो बात मैं दो ढाई साल से अलग-अलग न्यूज रूम में महसूस कर रहा हूं, जीन्यूज के पत्रकार विश्वदीपक ने उसका चरम देखा. क्योंकि जीन्यूज ने राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा और मालदार ठेका ले रखा है. जेएनयू की घटना के बाद दो दिन का मीडियाई उन्माद डराने वाला था. लेकिन पत्रकारों की पिटाई के बाद हालात ​बदल गए. फिर पत्रकारों ने सच तलाशना शुरू कर दिया. इस डरावनी घटना ने कई बड़े बड़े नामधारियों की कलई खोल दी. खैर, जीन्यूज से इस्तीफा देने वाले विश्वदीपक का यह इस्तीफा मौजूदा पत्रकारिता का का दस्तावेज है.


प्रिय जी न्यूज,
एक साल 4 महीने और 4 दिन बाद अब वक्त आ गया है कि मैं अब आपसे अलग हो जाऊं. हालांकि ऐसा पहले करना चाहिए था लेकिन अब भी नहीं किया तो खुद को कभी माफ़ नहीं कर सकूंगा.
आगे जो मैं कहने जा रहा हूं वो किसी भावावेश, गुस्से या खीझ का नतीज़ा नहीं है, बल्कि एक सुचिंतित बयान है. मैं पत्रकार होने से साथ-साथ उसी देश का एक नागरिक भी हूं जिसके नाम अंध ‘राष्ट्रवाद’ का ज़हर फैलाया जा रहा है और इस देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है. मेरा नागरिक दायित्व और पेशेवर जिम्मेदारी कहती है कि मैं इस ज़हर को फैलने से रोकूं. मैं जानता हूं कि मेरी कोशिश नाव के सहारे समुद्र पार करने जैसी है लेकिन फिर भी मैं शुरुआत करना चहता हूं. इसी सोच के तहत JNUSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार के बहाने शुरू किए गए अंध राष्ट्रवादी अभियान और उसे बढ़ाने में हमारी भूमिका के विरोध में मैं अपने पद से इस्तीफा देता हूं. मैं चाहता हूं इसे बिना किसी वैयक्तिक द्वेष के स्वीकार किया जाए.
असल में बात व्यक्तिगत है भी नहीं. बात पेशेवर जिम्मेदारी की है. सामाजिक दायित्वबोध की है और आखिर में देशप्रेम की भी है. मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इन तीनों पैमानों पर एक संस्थान के तौर पर तुम, तुमसे जुड़े होने के नाते एक पत्रकार के तौर पर मैं, पिछले एक साल में कई बार फेल हुए.
मई 2014 के बाद से जब से श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से कमोबेश देश के हर न्यूज़ रूम का सांप्रदायीकरण (Communalization) हुआ है लेकिन हमारे यहां स्थितियां और भी भयावह हैं. माफी चाहता हूं इस भारी भरकम शब्द के इस्तेमाल के लिए लेकिन इसके अलावा कोई और दूसरा शब्द नहीं है. आखिर ऐसा क्यों होता है कि ख़बरों को मोदी एंगल से जोड़कर लिखवाया जाता है? ये सोचकर खबरें लिखवाई जाती हैं कि इससे मोदी सरकार के एजेंडे को कितना गति मिलेगी?
हमें गहराई से संदेह होने लगा है कि हम पत्रकार हैं. ऐसा लगता है जैसे हम सरकार के प्रवक्ता हैं या सुपारी किलर हैं? मोदी हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं, मेरे भी है; लेकिन एक पत्रकार के तौर इतनी मोदी भक्ति अब हजम नहीं हो रही है. मेरा ज़मीर मेरे खिलाफ बग़ावत करने लगा है. ऐसा लगता है जैसे मैं बीमार पड़ गया हूं.
हर खबर के पीछे एजेंडा, हर न्यूज़ शो के पीछे मोदी सरकार को महान बताने की कोशिश, हर बहस के पीछे मोदी विरोधियों को शूट करने का प्रयास? अटैक, युद्ध से कमतर कोई शब्द हमें मंजूर नहीं. क्या है ये सब? कभी ठहरकर सोचता हूं तो लगता है कि पागल हो गया हूं.
आखिर हमें इतना दीन हीन, अनैतिक और गिरा हुआ क्यों बना दिया गया? देश के सर्वोच्च मीडिया संस्थान से पढ़ाई करने और आजतक से लेकर बीबीसी और डॉयचे वेले, जर्मनी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद मेरी पत्रकारीय जमापूंजी यही है कि लोग मुझे ‘छी न्यूज़ पत्रकार’ कहने लगे हैं. हमारे ईमान (Integrity) की धज्जियां उड़ चुकी हैं. इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
कितनी बातें कहूं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ लगातार मुहिम चलाई गई और आज भी चलाई जा रही है. आखिर क्यों? बिजली-पानी, शिक्षा और ऑड-इवेन जैसी जनता को राहत देने वाली बुनियादी नीतियों पर भी सवाल उठाए गए. केजरीवाल से असहमति का और उनकी आलोचना का पूरा हक है लेकिन केजरीवाल की सुपारी किलिंग का हक एक पत्रकार के तौर पर नहीं है. केजरीवाल के खिलाफ की गई निगेटिव स्टोरी की अगर लिस्ट बनाने लगूंगा तो कई पन्ने भर जाएंगे. मैं जानना चाहता हूं कि पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत ‘तटस्थता’ का और दर्शकों के प्रति ईमानदारी का कुछ तो मूल्य है, कि नहीं?
दलित स्कॉलर रोहित वेमुला की आत्महत्या के मुद्दे पर ऐसा ही हुआ. पहले हमने उसे दलित स्कॉलर लिखा फिर दलित छात्र लिखने लगे. चलो ठीक है लेकिन कम से कम खबर तो ढंग से लिखते. रोहित वेमुला को आत्महत्या तक धकेलने के पीछे ABVP नेता और बीजेपी के बंडारू दत्तात्रेय की भूमिका गंभीरतम सवालों के घेरे में है (सब कुछ स्पष्ट है) लेकिन एक मीडिया हाउस के तौर हमारा काम मुद्दे को कमजोर (dilute) करने और उन्हें बचाने वाले की भूमिका का निर्वहन करना था.
मुझे याद है जब असहिष्णुता के मुद्दे पर उदय प्रकाश समेत देश के सभी भाषाओं के नामचीन लेखकों ने अकादमी पुरस्कार लौटाने शुरू किए तो हमने उन्हीं पर सवाल करने शुरू कर दिए. अगर सिर्फ उदय प्रकाश की ही बात करें तो लाखों लोग उन्हें पढ़ते हैं. हम जिस भाषा को बोलते हैं, जिसमें रोजगार करते हैं उसकी शान हैं वो. उनकी रचनाओं में हमारा जीवन, हमारे स्वप्न, संघर्ष झलकते हैं लेकिन हम ये सिद्ध करने में लगे रहे कि ये सब प्रायोजित था. तकलीफ हुई थी तब भी, लेकिन बर्दाश्त कर गया था.
लेकिन कब तक करूं और क्यों?
मुझे ठीक से नींद नहीं आ रही है. बेचैन हूं मैं. शायद ये अपराध बोध का नतीजा है. किसी शख्स की जिंदगी में जो सबसे बड़ा कलंक लग सकता है वो है- देशद्रोह. लेकिन सवाल ये है कि एक पत्रकार के तौर पर हमें क्या हक है कि किसी को देशद्रोही की डिग्री बांटने का? ये काम तो न्यायालय का है न?
कन्हैया समेत जेएनयू के कई छात्रों को हमने ने लोगों की नजर में ‘देशद्रोही’ बना दिया. अगर कल को इनमें से किसी की हत्या हो जाती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? हमने सिर्फ किसी की हत्या और कुछ परिवारों को बरबाद करने की स्थिति पैदा नहीं की है बल्कि दंगा फैलाने और गृहयुद्ध की नौबत तैयार कर दी है. कौन सा देशप्रेम है ये? आखिर कौन सी पत्रकारिता है ये?
क्या हम बीजेपी या आरएसएस के मुखपत्र हैं कि वो जो बोलेंगे वहीं कहेंगे? जिस वीडियो में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा था ही नहीं उसे हमने बार-बार हमने उन्माद फैलाने के लिए चलाया. अंधेरे में आ रही कुछ आवाज़ों को हमने कैसे मान लिया की ये कन्हैया या उसके साथियों की ही है? ‘भारतीय कोर्ट ज़िंदाबाद’ को पूर्वाग्रहों के चलते ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ सुन लिया और सरकार की लाइन पर काम करते हुए कुछ लोगों का करियर, उनकी उम्मीदें और परिवार को तबाही की कगार तक पहुंचा दिया. अच्छा होता कि हम एजेंसीज को जांच करने देते और उनके नतीजों का इंतज़ार करते.
लोग उमर खालिद की बहन को रेप करने और उस पर एसिड अटैक की धमकी दे रहे हैं. उसे गद्दार की बहन कह रहे हैं. सोचिए ज़रा अगर ऐसा हुआ तो क्या इसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी? कन्हैया ने एक बार नहीं हज़ार बार कहा कि वो देश विरोधी नारों का समर्थन नहीं करता लेकिन उसकी एक नहीं सुनी गई, क्योंकि हमने जो उम्माद फैलाया था वो NDA सरकार की लाइन पर था. क्या हमने कन्हैया के घर को ध्यान से देखा है? कन्हैया का घर, ‘घर’ नहीं इस देश के किसानों और आम आदमी की विवशता का दर्दनाक प्रतीक है. उन उम्मीदों का कब्रिस्तान है जो इस देश में हर पल दफ्न हो रही हैं. लेकिन हम अंधे हो चुके हैं!
मुझे तकलीफ हो रही है इस बारे में बात करते हुए लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि मेरे इलाके में भी बहुत से घर ऐसे हैं. भारत का ग्रामीण जीवन इतना ही बदरंग है.उन टूटी हुई दीवारों और पहले से ही कमजोर हो चुकी जिंदगियों में हमने राष्ट्रवादी ज़हर का इंजेक्शन लगाया है, बिना ये सोचे हुए कि इसका अंजाम क्या हो सकता है! अगर कन्हैया के लकवाग्रस्त पिता की मौत सदमें से हो जाए तो क्या हम जिम्मेदार नहीं होंगे? ‘The Indian Express’ ने अगर स्टोरी नहीं की होती तो इस देश को पता नहीं चलता कि वंचितों के हक में कन्हैया को बोलने की प्रेरणा कहां से मिलती है!
रामा नागा और दूसरों का हाल भी ऐसा ही है. बहुत मामूली पृष्ठभूमि और गरीबी से संघर्ष करते हुए ये लड़के जेएनयू में मिल रही सब्सिडी की वजह से पढ़ लिख पाते हैं. आगे बढ़ने का हौसला देख पाते हैं. लेकिन टीआरपी की बाज़ारू अभीप्सा और हमारे बिके हुए विवेक ने इनके करियर को लगभग तबाह ही कर दिया है.
हो सकता है कि हम इनकी राजनीति से असहमत हों या इनके विचार उग्र हों लेकिन ये देशद्रोही कैसे हो गए? कोर्ट का काम हम कैसे कर सकते हैं? क्या ये महज इत्तफाक है कि दिल्ली पुलिस ने अपनी FIR में ज़ी न्यूज का संदर्भ दिया है? ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली पुलिस से हमारी सांठगांठ है? बताइए कि हम क्या जवाब दे लोगों को?
आखिर जेएनयू से या जेएनयू के छात्रों से क्या दुश्मनी है हमारी? मेरा मानना है कि आधुनिक जीवन मूल्यों, लोकतंत्र, विविधता और विरोधी विचारों के सह अस्तित्व का अगर कोई सबसे खूबसूरत बगीचा है देश में तो वो जेएनयू है लेकिन इसे गैरकानूनी और देशद्रोह का अड्डा बताया जा रहा है.
मैं ये जानना चाहता हूं कि जेएनयू गैर कानूनी है या बीजेपी का वो विधायक जो कोर्ट में घुसकर लेफ्ट कार्यकर्ता को पीट रहा था? विधायक और उसके समर्थक सड़क पर गिरे हुए CPI के कार्यकर्ता अमीक जमेई को बूटों तले रौंद रहे थे लेकिन पास में खड़ी पुलिस तमाशा देख रही थी. स्क्रीन पर पिटाई की तस्वीरें चल रही थीं और हम लिख रहे थे – ओपी शर्मा पर पिटाई का आरोप. मैंने पूछा कि आरोप क्यों? कहा गया ‘ऊपर’ से कहा गया है? हमारा ‘ऊपर’ इतना नीचे कैसे हो सकता है? मोदी तक तो फिर भी समझ में आता है लेकिन अब ओपी शर्मा जैसे बीजेपी के नेताओं और ABVP के कार्यकर्ताओं को भी स्टोरी लिखते समय अब हम बचाने लगे हैं.
घिन आने लगी है मुझे अपने अस्तित्व से. अपनी पत्रकरिता से और अपनी विवशता से. क्या मैंने इसलिए दूसरे सब कामों को छोड़कर पत्रकार बनने का फैसला बनने का फैसला किया था. शायद नहीं.
अब मेरे सामने दो ही रास्ते हैं या तो मैं पत्रकारिता छोड़ूं या फिर इन परिस्थितियों से खुद को अलग करूं. मैं दूसरा रास्ता चुन रहा हूं. मैंने कोई फैसला नहीं सुनाया है बस कुछ सवाल किए हैं जो मेरे पेशे से और मेरी पहचान से जुड़े हैं. छोटी ही सही लेकिन मेरी भी जवाबदेही है. दूसरों के लिए कम, खुद के लिए ज्यादा. मुझे पक्के तौर पर अहसास है कि अब दूसरी जगहों में भी नौकरी नहीं मिलेगी. मैं ये भी समझता हूं कि अगर मैं लगा रहूंगा तो दो साल के अंदर लाख के दायरे में पहुंच जाऊंगा. मेरी सैलरी अच्छी है लेकिन ये सुविधा बहुत सी दूसरी कुर्बानियां ले रही है, जो मैं नहीं देना चाहता. साधारण मध्यवर्गीय परिवार से आने की वजह से ये जानता हूं कि बिना तनख्वाह के दिक्कतें भी बहुत होंगी लेकिन फिर भी मैं अपनी आत्मा की आवाज (consciousness) को दबाना नहीं चाहता.
मैं एक बार फिर से कह रहा हूं कि मुझे किसी से कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है. ये सांस्थानिक और संपादकीय नीति से जुडे हुए मामलों की बात है. उम्मीद है इसे इसी तरह समझा जाएगा.
यह कहना भी जरूरी समझता हूं कि अगर एक मीडिया हाउस को अपने दक्षिणपंथी रुझान और रुचि को जाहिर करने का, बखान करने का हक है तो एक व्यक्ति के तौर पर हम जैसे लोगों को भी अपनी पॉलिटिकल लाइन के बारे में बात करने का पूरा अधिकार है. पत्रकार के तौर पर तटस्थता का पालन करना मेरी पेशेवर जिम्मेदारी है लेकिन एक व्यक्ति के तौर पर और एक जागरूक नागरिक के तौर पर मेरा रास्ता उस लेफ्ट का है जो पार्टी द्फ्तर से ज्यादा हमारी ज़िंदगी में पाया जाता है. यही मेरी पहचान है.
और अंत में एक साल तक चलने वाली खींचतान के लिए शुक्रिया. इस खींचतान की वजह से ज़ी न्यूज़ मेरे कुछ अच्छे दोस्त बन सके.
सादर-सप्रेम,
विश्वदीपक

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

मीडिया की स्वामिभक्ति

हिंदुस्तान की यह पहली सरकार है जो जबर्दस्त बहुमत में है और छोटे छोटे बच्चों से भिड़ी है. पुलिस और छुटभैये नेता त​क तो ठीक था, लेकिन गृहमंत्री भी इस प्रहसन में कूद पड़े. दो ही दिन में अब जब सारा मामला फुस्स हो गया, आईबी ने सब आरोपों को नकार दिया, दिल्ली पुलिस ने सबूत होने से इनकार कर दिया, तब क्या देश की बहुमत की सरकार देश माफी मांगेगी? क्या राष्ट्रवाद इतना उच्छृंखल हो गया है कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी के बच्चों से भिड़कर फुस्स हो जाता है?
हिंदुस्तान में पहली बार है कि मीडिया जनता की ओर नहीं, सत्ताधारी दल के साथ खड़ा है. सत्ताधारी दल की छात्र इकाई को विरोधी संगठन को नीचा दिखाना था, उसने प्रोपेगेंडा किया जो चार दिन में फुस्स हो गया. यह राजनीतिक मसला था, लेकिन मीडिया ने अपनी क्या छवि पेश की? बिना पुख्ता जानकारी लिए मीडिया ने जेएनयू और वहां के छात्रों को देशद्रोही कह दिया और जब कहीं से कुछ नहीं मिला तो सबने कन्हैया समेत पूरे जऐनयू को क्लीनचिट भी दे दी. क्या मीडिया अपने इस गैरजिम्मेदाराना व्यवहार पर जनता से माफी मांगेगा? पार्टी के पक्ष में जनता को गलत जानकारी देना क्या गैरकानूनी और गैरलोकतांत्रिक हरकत नहीं है?
देशभक्ति का असली यूटर्न यह रहा कि चैनलों के लिए पहले दो दिन पूरा जेएनयू देशद्रोही हो गया था. चौधरी, गोस्वामी और चौरसिया सब प्रमाणपत्र मांग रहे थे. जब एबीवीपी के राष्ट्रभक्तों ने कोर्ट में मीडियाकरों को कूट दिया तो कानून याद आया. इसके पहले कानून याद नहीं आया था, न ही दायित्व. मैं चैनल में बैठा हूं तो मैं फैसले कैसे सुना सकता हूं, भले ही वह मेरे विरोधी दल के बारे में हो. मेरा पेशा और मेरे विचार दोनों अलग चीजें हैं.
लेकिन जी न्यूज के सुधीर चौधरी ने तो कसम खाई है कि अगर मुनाफे का सौदा हो तो वे  मीडिया को मिले लोकतांत्रिक अधिकार, उसके फर्ज और अपना जमीर बेच देंगे. उन्होंने उमा खुराना प्रकरण एक महिला को फर्जी स्टिंग के बदनाम किया. मामला झूठा निकला, चैनल ने प्रतिबंध झेला. फिर वे सौ करोड़ की उगाही में जेल
गये और लौटे तो राष्ट्रवाद की दुकान खोलकर बैठ गये. वे प्रोपेगेंडा करके जेड सीक्योरिटी लेकर बैठे हैं और ज्ञान झाड़ रहे हैं कि जेएनयू पर देश का पैसा बर्बाद हो रहा है. इन्हें जेड सीक्योरिटी किसलिए मिली हुई है? मोदी गुणगान के लिए देश का पैसा इसकी सुरक्षा पर क्यों खर्च किया जा रहा है? मीडिया चैनल के नाम पर मुखपत्र चलाने वाला यह आदमी इस देश के किस काम है, सिवाय इसके कि लोगों को गुमराह करे?
फिर सुधीर चौधरी चूंकि निजी तौर पर कूटे नहीं गए, तो अभी भी वे राष्ट्रवाद के फूहड़तम शिखर पर विराजमान है. बाकी मीडिया का दिमाग कुछ ठिकाने आ गया है. किसी को देशद्रोही घोषित करने की जल्दी मीडिया को क्यों है?
अब जब मीडिया चैनल, सुरक्षा एजेंसियां और दिल्ली पुलिस सबने वह सारे दावे नकार दिए हैं तो क्या मीडिया माफी मांगेगा. नहीं, क्योंकि जवाबदेही जैसी कोई चीज होती तो यह हुआ ही न होता.
मैं किसी पार्टी को पसंद नहीं करता, लेकिन उसके खिलाफ बिना सबूत के झूठी खबर नहीं फैला सकता. चाहे संघ हो, भाजपा हो, कांग्रेस हो या वामपंथी दल.
मीडिया लोगों के आगे भाजपा का राजनीतिक उत्पाद राष्ट्रवाद परोस रहा है. यह मियादी राष्ट्रवाद चार दिन में ढह गया, लेकिन भारत राष्ट्र अक्षुण्ण है. देशप्रेम और राष्ट्रवादी देशप्रेम का अंतर जनता को कौन बताएगा? मीडिया भाजपा के राजनीतिक हिंदुत्व को हिंदू धर्म के रूप में जनता से सामने पेश कर रहा है, परिमाणस्वरूप वह उन्मादी भीड़ द्वारा लतियाया जा रहा है.
मीडिया जनता को यह नहीं बताता कि अगर देशभक्ति का ठेका पाकिस्तान पुरुष गिरिराज सिंह, असंसदीय सांसद साक्षी महाराज, संत समाज के अंडरवर्ल्ड योगी आदित्यनाथ, अदालत को ताक पर रखने वाले ओपी शर्मा, तड़ीपार अमित शाह, और साध्वी प्राची को दिया जाएगा तो नतीजा पटियाला कोर्ट के सामने हुई अराजकता के रूप में सामने आएगा.
पार्टी और मीडिया दोनों मिलकर बौराएंगे तो अपने साथ साथ देश की कब्र ही खोदेंगे.

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...