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मंगलवार, 7 अगस्त 2018

गाय पर एक निबंध

वर्तमान भारत में गाय एक धार्मिक और राजनीतिक पशु है. सभी जाति धर्म के लोग गाय पालते हैं. राजनीति गाय पालने के नाम पर उन्मादी भीड़ पालती है. हिंदू गाय की पूजा करते हैं. नेता गाय के नाम पर हत्या करने वालों की माला पहनाकर पूजा करते हैं. गाय दूध देने के काम आती है. गाय दंगा कराने और वोट लेने के भी काम आती है. इसलिए पार्टियों के प्रवक्ता चैनलों पर तेज तेज आवाज में गाय की जबानी पूजा खूब करते हैं.
हिंदुओं में मान्यता है कि मरते वक्त आदमी से गोदान करवा दिया जाए तो वह गाय की पूंछ पकड़कर संसार रूपी वैतरणी पार कर जाता है. भारत के नेताओं में मान्यता है कि गाय के नाम पर अगर जनता में उन्माद भर दिया जाए तो चुनाव रूपी वैतरणी को पार किया जा सकता है.
हमारे देश में आजकल गाय के बहाने लोगों की भीड़ किसी को भी पीट पीटकर मार देती है. भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जहां तमाम किसान और पशु व्यापारी मारे जा चुके हैं. मरने वाले को देशद्रोही अथवा हिंदूद्रोही कहा जाता है जबकि भीड़ का तो कोई चेहरा नहीं होता इसलिए किसे पकड़ा जाए इसका धर्मसंकट बना रहता है. भीड़ बनकर मारने वालों में से अगर कोई पकड़ा जाए तो सरकार उन्हें 'भगत सिंह' और 'निर्दोष बच्चे' कहती है. पकड़े गए लोग जब जेल से छूटते हैं तो सरकार के मंत्री हत्या करने वालों को माला पहनाकर उनका स्वागत करते हैं. देश के सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि ये खूनी खेल बंद करो, लेकिन आदेश के तुरंत बाद एक और इंसान को पीटकर मारा गया. फिर उसे घायल मरने के लिए छोड़ दिया गया और गाय को सुरक्षित गोशाला पहुंचा दिया गया.
बुद्धूबक्सा की दुनिया के एक कुख्यात देशद्रोही रवीश कुमार ने अपने प्रोग्राम में दिखाया है कि पुलिस और नेता मिलकर हत्या करने वालों की भरपूर सुरक्षा करते हैं. गोरक्षा के नाम हत्या करने वाले गिरोहों की ख्याति पूरी दुनिया में फैल चुकी है. इसके चलते हमारे भारत की पूरी दुनिया में लगातार चर्चा भी होती रहती है. लगातार चर्चा होना हमारे ताकतवर होते जाने का प्रत्यक्ष प्रमाण है.
गाय बेजुबान जानवर है. वह बोल नहीं सकती. इसलिए वह पूछ भी नहीं सकती कि मैं किस राज्य में माता हूं किस राज्य में खाया जाने वाला जानवर. पार्टी और सरकारें गोरक्षा का नारा लगाती हैं. वे कुछ राज्यों में गोकुशी पर प्रतिंबध लगा देते हैं. लेकिन गोवा के विधानसभा में कहते हैं कि राज्य में गोमांस की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी. वे पूर्वोत्तर के राज्यों में भी लोगों को गोमांस खिलाने का वादा करके चुनाव जीतते हैं. जिस तरह सभी पार्टियों के नेता चुनाव में देसी ठर्रा बंटवाते हैं, उसी तरह कहीं गोकशी बंद कराने का तो कहीं शुरू कराने का वादा करते हैं.
एक चैनल पर एक वक्रोक्तिपात्र नेताजी से दूसरे नेताजी ने पूछा कि सब राज्यों में गाय काटने पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा देते, आप झूठ का सहारा क्यों लेते हैं? वक्रोक्तिपात्र नेताजी जोर से चिल्लाते हुए कहने लगे कि तुम आतंकवादी हो, क्योंकि हमारे धर्म और आस्था पर सवाल उठाते हो. इस न्याय से यह साबित होता है कि जिस तरह गोकशी पर प्रतिबंध से आस्था जुड़ी है, उसी तरह गाय के काटे जाने से भी आस्था जुड़ी है. शायद इसीलिए सरकारों ने बूचड़खानों को लाइसेंस भी दे रखा है. सरकार ने गाय की हत्या को वैध और अवैध में बांट दिया है. इसलिए हम कह सकते हैं कि लाइसेंसी गोहत्या, गोहत्या न भवति.
मौलाना मदनी और ओवैसी नामक कुछ प्रचंड देशद्रोहियों ने मांग की थी कि गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देकर पूरे देश में गोहत्या पर प्रतिबंध लगा दिया जाए, लेकिन सरकारें चूंकि देश की सुरक्षा के लिए होती हैं इसलिए इन देशद्रोहियों पर कान नहीं दिया गया है.
अभी तक के अध्ययन में विद्वानों ने पाया है कि गोरक्षा के नाम पर हत्या वही लोग करते हैं जिन्होंने गाय को या तो इंटरनेट पर देखा है, या फिर सड़क पर आवारा घूमते और पालिथिन खाते देखा है. कोई भी गाय पालने वाले के पास हत्या करने का समय नहीं रहता. दो तीन गायों की परवरिश करने के लिए एक व्यक्ति को दिन के पांच छह घंटे मेहनत करनी होती है. जो किसान गाय पालते हैं, वे उससे प्रेम करते हैं. हिंदू परिवारों में लोग इस बात के लिए सतर्क रहते हैं कि गाय को बेचें भी तो किसी ऐसे के हाथ न पड़े जो गाय को कोई भी नुकसान पहुंचाए. वे खुद उसकी सेवा करते हैं, लेकिन उसकी सेवा के नाम पर किसी की जान नहीं लेते.
आजकल गाय पालने वाले किसानों का भी बुरा हाल है. सरकारी गोरक्षा के चक्कर में पशु मेले लगने बंद हो गए हैं. सरकारों ने कांजी हाउस भी बंद कर दिए हैं जहां आवारा पशु लाकर छोड़ दिए जाते थे. पशुओं की खरीद बिक्री भी बंद हो गई है. अब जो पशु किसान के काम नहीं आ सकते, वे उसे बेच सकते नहीं, इसलिए आवारा छोड़ देते हैं. फिर वे जानवर उन्हीं के खेतों में चरते हैं और फसलें तबाह कर देते हैं. हर इलाके में सैकड़ों की संख्या में आवारा गायें और सांड़ घूमते दिख रहे हैं. किसानों ने इन जानवरों से फसल की सुरक्षा के लिए खेतों में ब्लेड वाला तार लगा दिया है. इन ब्लेड खेत में घुसने का प्रयास करने पर गाय बुरी तरह घायल हो जाती है. कुछ दिन में उसका घाव सड़ जाता है, उसमें कीड़े पड़ जाते हैं. कभी वह बच जाती है, कभी कभी मर भी जाती है. घूमने वाले जानवरों में तमाम घायल जानवर आपको दिख जाएंगे.
कुछ राज्यों में सरकार ने गायों की सुरक्षा के नाम पर गोशालाएं खोली हैं. अब चूंकि किसानों का पूरा परिवार मिलकर गायों की देखभाल करता है. सरकार इतने लोग कहां से लाए. परिणामस्वरूप गोशाला में सैकड़ों की संख्या गाएं भूखों मर जाती हैं. हमारी दादी कहती थीं कि गाय बोल नहीं सकती. अगर उसे खाना पानी समय पर न दो तो पाप लगता है. फिर आदमी नरक में जाता है. गायों को गोशाला नामक नरक में रखने की योजना जिसने बनाई होगी उसे नरक में जाना पड़ेगा. सुना है कि नरक में जो लोग बड़ा पाप करके जाते हैं, उनको पकौड़े की तरह बड़े से कड़ाहे में तला जाता है. हमें नरक के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. हो सकता है कि यह नरक लोक की कोई रोजगार योजना हो जिसमें युवा पकौड़े तलते हों!
आदिकाल में गाय एक पशु मात्र थी. फिर संस्कृति के विकास के साथ लोग प्रकृति की पूजा करने लगे तो उपयोगी जानवरों की भी पूजा करने लगे. गोवंश धार्मिक पशु हो गया. फिर 21वीं सदी में राजनीति गाय के नाम पर लोगों की जान लेने लगी. अब गाय सियासी पशु बन चुका है. हमारे सियासतदां उन उन चीजों की रक्षा का नारा लगाते हैं जो भारतीय जनता की भावनाओं से जुड़ी है, मसलन— धर्म, संस्कृति, देश, मात्रभूमि, देशभक्ति आदि-इत्यादि-अनादि. भगवान राम और गाय माता इसी नारेबाज सियासत के चंगुल में फंस गए हैं. जब तक इसका कोई निदान नहीं होता तब तक हमें यह मानना चाहिए कि एक दिन कोई कृष्ण आएगा जो इन गायों को सियासत के चंगुल से बचाएगा और गाय के नाम पर लोगों को लड़ाने वालों को लाठी लाठी बजाएगा.

नोट: यूपीएससी के छात्र इस निंबंध को न रटें वरना नंबर के नाम पर अंडा मिलेगा. देशद्रोही लोग इसे रट लें, जहां भी सुनाएंगे, डंडा मिलेगा.

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

भगत सिंह का भय सच निकला

ऐसा कुछ नहीं घटा मेरे सामने 
कि कोई महिला प्रधानमंत्री की कॉलर पकड़कर पूछे- 
आज़ादी से क्या मिला?
और प्रधानमंत्री मुस्कराकर कहे-
प्रधानमंत्री की कॉलर पकड़ने की आज़ादी 


ऐसा भी नहीं हुआ कि भगत सिंह से प्रेरित बच्चों ने 
'दुर्गा' बन चुकीं प्रधानमंत्री को 
न घुसने दिया हो अपने प्रांगण में 
और उन्हें देशद्रोही भी नहीं कहा गया हो

हमारे समय में प्रधानमंत्री शोहदों का 'फॉलोवर' है 
हत्यारों को नेताओं का संरक्षण है 
एक विचारधारा है मजहबी उन्माद
इंसानों से घृणा को कहते हैं राष्ट्रवाद
विकास एक ब्लैक होल है जिसमें 
सवा अरब इंसानों को कुदाया जा रहा है 
नये भारत के सपने की खोह जाती है 
एक मंदिर के प्रांगण में 
जिसे उन्माद का सबसे पैना हथियार बना लिया गया है 
क़ानून ऐसी हंसिया है जिससे 
ताक़तवर चाहे दातून छीले 
चाहे तो काट ले किसान की गर्दन

क्या कल यही दर्ज होगा हमारे समय के बारे में?

तवारीख़ में कैसे दिखेंगे हम 
बर्बादी की पहली सीढ़ी के बारे में 
क्या दर्ज होगा किताबों में 
कोई बच्चा मुझसे पूछेगा- 
हिंदुस्तान में लिंचिंग कब शुरू हुई?
गाय के लिए पहला आदमी कौन मारा गया सरकारी निगहबानी में? 
या फिर 
हिंदुस्तान में पहली बार मुर्दे पर मुकदमा कब दर्ज हुआ?

तब क्या कहेगी मेरी लरजती बूढ़ी ज़बान 
क्या मैं अपनी आत्मा में एक कुटिल मुस्कान दबाकर 
नेहरू का नाम बताऊंगा?

अगर वह पूछ ले- 
यह नेहरू सौ साल बाद भी 
हर काम का ज़िम्मेदार कैसे हुआ 
तो क्या तवारीख़ 1955 में पैदा करेगी कोई काल्पनिक अख़लाक़ 
जिसे पाकिस्तानियों ने पीटकर मारा! 
तो क्या जैसे प्रधानसेवक ने तक्षशिला को बिहार में ला पटका, 
वैसे दादरी लाहौर में बताया जाया जाएगा, 
या सबकुछ कहा जायेगा वैसे ही 
जैसे घट रहा है!

एक बर्बर देश अचानक पैदा नहीं होता 
वह धीरे धीरे बनता है लोगों के दिमाग में 
फिर ज़मीन का वह टुकड़ा 
होता जाता है ख़ौफ़नाक 
जहां वे दिमाग चलते फिरते हैं

पहली बार ही कोई मंत्री पहनाता है हत्यारों को फूलों की माला 
पहली ही बार कोई नेता कहता है 
किसी बर्बर को भगत सिंह 
अखबार कहते हैं यह तो फ्रिंज एलिमेंट हैं 
और फ्रिंज बनाते जाते हैं मज़बूत मुख्यधारा

कितना अच्छा होता 
कि मैं 1905 में पैदा होता 
जब भगत सिंह को रही होती फांसी 
उसी दिन मेरे गांव में 
गोरों के नमक में सीझा कोई भूरा सिपाही 
मुझे भी गोली मार देता 
इंसानों के लिए कुर्बानी के दौर में 
अच्छी होती है एक गुमनाम मौत 
कम से कम यह न देखते हम
कि भगत सिंह और बिस्मिल के देश में पीट पीट कर मार दिया जाता है अखलाक़ों को 
फिर इसके बाद सरकार किसी निर्दोष के हत्यारों को
भगत सिंह का वारिस कहती हैं!

मां को लिखे पत्र में 
भगत सिंह का भय सच निकला 
भूरा साहेब गोरे से ज़्यादा क्रूर निकला।


(15 जुलाई, 2018)

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

मोदी जी के पीएम बनने के बाद संघ के लोगों को चर्बी चढ़ गई है : जिग्नेश मेवाणी

गुजरात में मरी गाय की चमड़ी उतार रहे कुछ दलित युवकों की पिटाई के बाद हजारों की संख्या में दलित
समुदाय के लोग सड़कों पर उतरे. इस उभार के नेतृत्व के केंद्र में जो एक नाम उभर कर आया वह है जिग्नेश मेवाणी. युवकों पर हुए अत्याचार के बाद जिग्नेश सक्रिय हुए और दलित समुदाय के लोगों को इस बात की घोषणा के लिए राजी किया कि अब वे न तो मैला उठाएंगे, न ही मरे हुए पशुओं की चमड़ी उतारने का काम करेंगे. 1980 में मेहसाणा में जन्मे जिग्नेश के पिता क्लर्क थे. अंग्रेजी साहित्य से ग्रैजुएट जिग्नेश पत्रकार भी रह चुके हैं. वे विभिन्न मोर्चों पर सामाजिक कार्यों से जुड़े रहकर दलितों, मजदूरों व किसानों के मुद्दे उठाते रहे हैं. फिलहाल वे वकालत कर रहे हैं. वे गुजरात में आम आदमी पार्टी से भी जुड़े थे, लेकिन 21 अगस्त को उन्होंने इस्तीफा दे दिया. जिग्नेश एक तरफ तो कह रहे हैं कि उनका आंदोलन पूरी तरह सामाजिक है और वे पार्टी नहीं बनाएंगे, लेकिन वे यह भी बयान दे चुके हैं, ‘200 प्रतिशत मैं राजनीति में आऊंगा. लेकिन मैं आम आदमी पार्टी से इसलिए जुड़ा हूं ताकि दलित समुदाय के लिए जो करना चाहता हूं वह सब कर सकूं.’ दलित आंदोलन के बारे में उनकी रणनीतियों और मांगों को लेकर उनसे मेरी बातचीत...

हमारे समाज में गाय को आधार बनाकर छुआछूत की परंपरा पुरानी है. पर अब इसके बहाने दलितों को पीटा जा रहा है.

देखिए, और कोई पशु माता नहीं है तो गाय ही माता क्यों है? यह सबसे अहम सवाल है. गाय को पवित्र बनाकर लंबे अरसे से एक राजनीति चल रही है जिसको संघ परिवार कई दशकों से भुनाता आ रहा है. अब उसी का परिणाम गुजरात में देखा जा रहा है. दलितों का उत्पीड़न कांग्रेस के समय भी होता रहा है, लेकिन मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद संघ परिवार के लोगों को इस तरह चर्बी चढ़ी है कि वे बेखौफ महसूस कर रहे हैं. इन लोगों को दिनदहाड़े अपराध करते हुए कोई डर नहीं है, बल्कि वे खुद वीडियो बनाकर प्रसारित करते हैं क्योंकि इसकी गारंटी है कि पुलिस और प्रशासन उनको बचा लेगा. वे जानते हैं कि वे जो कर रहे हैं उसको प्रश्रय देने वाली राजनीति मौजूद है.

हमें ये मंजूर नहीं है. हम पदयात्रा लेकर निकले और 15 अगस्त को ऊना में सभा की. हमने नारा दिया है कि गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी जमीन दो. आप मरी गाय की चमड़ी उतारने पर हमारी चमड़ी उतार लेंगे? तो आप अपनी गाय से खेलते रहो. हमें न जिंदा गाय से मतलब है, न ही मरी गाय से. हमें जमीनों का आवंटन करो. हम रोजगार की ओर जाएंगे. जिस पेशे के लिए हमें अछूत घोषित किया गया, अब उसी के लिए हमारी चमड़ी उधेड़ रहे हो, यह कैसे चलेगा? जब तक हमारी सारी मांगें मानी नहीं जातीं, हम यह आंदोलन बंद नहीं करेंगे. हमें भारत के अन्य राज्यों और विदेशों से भी समर्थन मिल रहा है.

गोरक्षकों को लेकर प्रधानमंत्री ने बयान दिया, इसके बावजूद घटनाएं रुक नहीं रही हैं. आंध्र की घटना बयान के बाद की है.

ये जो गुंडे लोग हैं, गोरक्षा के नाम पर संगठन चलाते हैं, इन सबको बैन करना चाहिए. लेकिन इससे भी ज्यादा गाय के नाम पर राजनीति खत्म करने का मसला है.  वरना ये सब होता रहेगा. मोदी साहेब का जो बयान आया है उस पर मैं कहूंगा कि भाजपा और संघ परिवार के लोग बहुत गाय माता की दुम हिला रहे थे. अब जिस तरह हजारों की संख्या में दलित शक्ति सड़कों पर उतर आई, जिस तरह से यह आंदोलन फैल रहा है, कहीं न कहीं मोदी साहेब और भाजपा को लग रहा है कि गाय की दुम अब उनके गले का फंदा न बन जाए, तब उन्होंने मुंह खोला है.

क्या मांगें हैं आपकी?

हमारी मांग है कि जिस तरह से कुछ लोगों ने दलित समाज को आतंकित किया है, जब भी उनको बेल मिले तो उन्हें तड़ीपार किया जाए. वीडियो में जो लोग पहचाने गए हैं, उन्हें गिरफ्तार किया जाए. जो पुलिसकर्मी दोषी हैं उनके खिलाफ कार्रवाई हो.  सुरेंद्र नगर में सितंबर 2012 में दो बेगुनाह दलित लड़कों को एके-47 से भूनकर मारा गया था. उसमें तीन एफआईआर हुईं. दो मामलों में चार साल बाद भी चार्जशीट दाखिल नहीं हुई. आरोपी कांस्टेबल गिरफ्तार नहीं हुआ. उस मामले में कार्रवाई हो. गुजरात के सारे जिलों में कानूनी प्रावधान के मुताबिक स्पेशल कोर्ट गठित की जाएं. जो दलित मरे जानवरों का काम नहीं करना चाहते वे और जो भी भूमिहीन दलित हैं, उनको पांच-पांच एकड़ जमीन का आवंटन हो. पहले जो जमीनें बांटी गईं उन पर अभी तक दलितों को कब्जा नहीं मिला है. वह सुनिश्चित किया जाए. गुजरात में रिजर्वेशन एक्ट ही नहीं है. रिजर्वेशन पॉलिसी बने और लागू की जाए. शेड्यूल कास्ट और शेड्यूल ट्राइब्स सबप्लान है, उसके पैसे जनरल कामों में खर्च होते हैं. सरकार एंबुलेंस खरीदती है और कहती है कि एंबुलेंस से तो सब जाएंगे चाहे सवर्ण हों या पिछड़े-दलित हों. हमारी मांग है कि ऐसा कानून बनाया जाए कि उनके लिए आवंटित पैसा उन्हीं पर खर्च हो. इसके अलावा फॉरेस्ट ऐक्ट के तहत आदिवासी समुदाय की जो एक लाख 20 हजार एप्लीकेशन पेंडिंग हैं, उन सभी को क्लियर करें.

15 अगस्त की रैली से लौट रहे दलितों पर हमले की खबर सही है?

बिल्कुल सही है. 13 घंटे तक लगातार हमले हुए हैं. दिन के 12 बजे से लेकर रात 1 बजे तक फायरिंग होती रही. यह सोची-समझी साजिश के तहत हुआ. गोरक्षक गुंडे झाड़ियों में छिपकर हमले कर रहे थे. पहले जो लोग रैली में शामिल होने आ रहे थे, उनकी गाड़ियों के कांच तोड़े गए, मारा-पीटा गया, मोबाइल छीने गए. फिर जब लोग वापस जा रहे थे तब हर नाके पर लोगों को पीटा गया. गुंडों ने बस में घुसने की कोशिश की. कई अस्पतालों में लोग भर्ती हैं. हम पुलिस को लगातार सूचना दे रहे थे, पेट्रोलिंग करवाने की कह रहे थे. बार-बार कहा गया कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं. पुलिस को एहतियातन यह सब पहले ही करना था, लेकिन पुलिस ने हमले होने के बाद भी कुछ नहीं किया. एक तरफ मोदी जी कहते हैं कि गोरक्षा के नाम पर फर्जी लोग दुकान खोलकर बैठे हैं. दूसरी तरफ गोरक्षकों को पुलिस ने खुली छूट दे रखी है. कि वे जब चाहें तब दलितों को मारें.

क्या रैली के पहले से अंदाजा था कि दलितों पर हमले हो सकते हैं?

हां बिल्कुल, रैली से पहले भी हमले हुए. रैली में न आने के लिए लोगों को धमकाया गया. रास्ते में लोगों की गाड़ियों पर हमले हुए, मारपीट की गई. इस बारे में हमने पुलिस के सभी बड़े अधिकारियों को बताया, लेकिन पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया. उसके एक दिन पहले छोटी-सी बाइक रैली निकली थी. वहां भी गोरक्षक गुंडों ने हमला किया. दलित युवकों की पिटाई करने वाले 20 आरोपी एक ही गांव के हैं. वे भी हमले में शामिल रहे. इस पर भी एक्शन नहीं लिया गया. जिन युवकों को मरी गाय उठाने के लिए पीटा गया था, उनके परिजनों पर भी हमला होते-होते बचा. उन्हें करीब 7 घंटे थाने में बैठाए रखा गया. हमने पुलिस से पीड़ित परिवारों को सुरक्षा दिए जाने मांग की थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह सब हमारी रैली और आंदोलन को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है.

क्या इसे वैसी स्थिति माना जाए जैसी 2002 में थी ?

बिल्कुल, बिल्कुल. एकदम यही हो रहा है,  उससे भी ज्यादा. एक गांव है सामखेड़, वहां के लोगों ने दलितों को 13 तारीख को पीटा, 14 को पीटा, 15 को भी हमला किया. आज 16 तारीख है, वे लोग हमले कर रहे हैं, लेकिन गांव से एक भी गोरक्षक को पकड़ा नहीं गया है. हम असहाय महसूस कर रहे हैं.

आपने जो मसले उठाए थे, वे दलित समाज के बड़े मसले हैं जिन पर अभी तो कोई बातचीत शुरू ही नहीं हुई. उस पर ये हमले भी हो रहे हैं. जाहिर है कि चुनौती और बढ़ रही है. मुश्किलों को देखते हुए आगे की क्या रणनीति होगी?

हमने कॉल दी है कि हमारी जो दससूत्रीय मांगें हैं, उनमें से एक है जमीन का आवंटन. उस पर विचार करके जमीन आवंटन की प्रक्रिया शुरू करो. यदि नहीं करोगे तो हम 15 सितंबर को रेल रोको आंदोलन करेंगे. इसकी घोषणा हम एक तारीख को करेंगे.

आपके आंदोलन की लीडरशिप पर सवाल उठ रहे हैं कि इसका कोई संगठित नेतृत्व नहीं है. पार्टियों ने ये आंदोलन हाईजैक कर लिया है. लीडरशिप को लेकर कशमकश की बात कही जा रही है.

ऐसा हुआ कि हम लोगों की मर्जी के खिलाफ कुछ पॉलिटिकल एलिमेंट स्टेज पर गए. हमने उन्हें बार-बार कहा भी कि हमारी आयोजन टीम है तय करेगी कि स्टेज पर कौन बैठेगा. लेकिन इसके बावजूद जब वे लोग नहीं माने तो हमने अपना कार्यक्रम कर लिया. रोहित वेमुला की मां और कन्हैया ने अपना भाषण दिया. आनंद पटवर्धन ने उन गुजराती साहित्यकारों को 25 हजार का चेक दिया, जिन्होंने गुजरात सरकार का 25 हजार का अवॉर्ड वापस किया था. इसके बाद हम लोगों ने स्टेज छोड़ दिया कि जिसे जो करना है, करे. जहां तक लीडरशिप की बात है तो कोई भी आंदोलन खड़ा होता है तो दो-चार लोग तो ऐसे रहेंगे जो विरोध करेंगे. जिनको नहीं पसंद आएगा, वे विरोध में खड़े हो जाएंगे. पर हजारों की तादाद में लोग हमारे साथ हैं.

कन्हैया कुमार आपकी मर्जी से आए थे या वे भी जबरन पहुंचे?

यह ओपन कार्यक्रम था. कन्हैया कुमार भी आए. बाकी लोग भी आए. कन्हैया तो हमारे संघर्ष का साथी है, इसलिए हमने उसको बुलाया था और हमें उसके आने की खुशी भी है.

25 गांवों के दलितों के बहिष्कार की खबरें आ रही हैं. क्या ये सही हैं?

बिल्कुल हो सकता है. अभी मुझे पक्की सूचना नहीं है. खबरें मिली हैं. मैं इसे अभी कंफर्म कर रहा हूं. अगर ये हो रहा है तो ये बहुत आश्चर्यजनक है. मुझे याद आता है कि बिल्कुल इसी तरह की घटना महाड़ सत्याग्रह के वक्त हुई थी. जब बाबा साहब दलितों के साथ निकले थे, तब उन पर सवर्णों ने हमला किया था. हम पर भी हमला किया गया. वह भी एक ऐतिहासिक घटना थी, यह भी एक ऐतिहासिक घटना है कि दलितों ने शपथ ली कि हम मरे हुए जानवर नहीं उठाएंगे. उस समय भी दलितों का बहिष्कार हुआ था, यहां भी वही हो रहा है.

आपका आंदोलन काफी बड़ा हो गया है. कहीं ये हाईजैक न हो जाए, सरकार या किसी पार्टी के लोग इसे दबा न दें, इसके लिए आपने क्या रणनीति बनाई है?

आने वाले दिनों में हम रेल रोको कॉल दे रहे हैं. इसमें देश भर से लोग आएंगे. अब गुजरात सरकार एक्सपोज होने वाली है. अगर वह दलितों को जमीन का आवंटन नहीं करती तो उसका असली चेहरा सामने आ जाएगा कि वे चाहते हैं कि हम मैला उठाएं या मरे हुए पशु उठाते रहें. आगे की रणनीति वही है, जो हमने कल मंच से कहा था कि आदिवासी समुदाय की जंगल समस्याओं से जुड़ी एक लाख 20 हजार एप्लीकेशन पेंडिंग हैं. गुजरात सरकार उसका भी निदान करे. हम आदिवासी समुदाय को अपने साथ जोड़ेंगे. हमने कहा था ‘गुजरात मॉडल मुर्दाबाद, दलित-मुस्लिम एकता जिंदाबाद’ तो मुस्लिम समुदाय के संगठन भी हमारे साथ आए हैं. हम अपने संघर्ष में किसानों और मजदूरों को जोड़ेंगे. जितने पीड़ित समुदाय हैं, हम सबको साथ लेंगे और जमकर मुकाबला होगा. जब तक मैं लीडरशिप में हूं, यह आंदोलन सिर्फ दलितों का नहीं रहेगा, बल्कि सभी वंचित समुदायों का होगा, दलित जिसका नेतृत्व करेंगे.

गुजरात में अलग-अलग पार्टियों में जो दलित नेता हैं उनका क्या स्टैंड है? क्या वे आपके समर्थन में आए हैं?

नहीं, वे चुपचाप बैठे हुए हैं. जैसे प्राइमरी के बच्चे होते हैं, टीचर उंगली उठाकर इशारा कर दे तो चुपचाप शांत हो जाते हैं, उनकी वही हालत है.

यह स्पष्ट कीजिए कि यह राजनीतिक आंदोलन है या सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन?

एक सौ प्रतिशत यह राजनीतिक होगा. हमारी जो मांग है वह राजनीतिक है. मैं यह पूछता हूं कि ग्लोबलाइजेशन की पॉलिटिकल इकोनॉमी में लोगों के पास रोटी क्यों नहीं है? यह राजनीति है. आजादी के इतने दशकों के बाद दलितों के पास जमीन का टुकड़ा क्यों नहीं है? ये राजनीति है. ये लोकसंघर्ष और आंदोलन की राजनीति है. वो राजनीति हम करेंगे. पार्टी पॉलिटिक्स हम नहीं करेंगे. हमारी समिति अराजनीतिक संघर्ष समिति है, ये बनी रहेगी.

दिल्ली में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन हुआ था. बाद में यह कहकर उन्होंने पार्टी बनाई कि अब इसके बगैर काम नहीं चल सकता. क्या आप भी इस आंदोलन के जरिए कोई पार्टी बनाएंगे?

ऐसी कोई संभावना नहीं है. हम इसे सामाजिक आंदोलन की तरह चलाएंगे. हजारों की तादाद में दलित उठ खड़े हुए हैं कि हम मरे हुए जानवर नहीं उठाएंगे. हमने बहुत बड़े परिवर्तन की नींव रखी है. डॉ. आंबेडकर के बाद इस तरह मृत पशु उठाने से इनकार करने की कोशिश नहीं हुई. हम इसे पूरे देश में ले जाएंगे.  हमने नारा दिया है कि ‘गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी जमीन दो’.

क्या इस आंदोलन के पहले भी आपकी सामाजिक या राजनीतिक सक्रियता रही है?

इसके पहले मैंने डॉ. मुकुल सिन्हा के जनसंघर्ष मंच के साथ स्वयंसेवक के रूप में आठ साल तक काम किया है. वहां मैंने ट्रेड यूनियन के लिए भी काम किया. उसमें सफाई कर्मियों के सवाल उठाए. मजदूर अधिकार संगठनों के साथ जुड़ा रहा. कंस्ट्रक्शन वर्कर्स और ईंट भट्ठे के मजदूरों के साथ काम किया. निजी तौर पर मैंने दलितों की जमीनों के मुद्दे पर छह-सात साल काम किया है. जमीन सुधार मेरा प्रमुख एजेंडा है. चार साल तक पत्रकारिता भी की है. इसके अलावा मैं गुजरात में आम आदमी पार्टी का सदस्य भी हूं.
(यह इंटरव्यू तहलका हिंदी पत्रिका के अगस्त, 2016 के अंक में छप चुका है.)

गणतंत्र का गुड़गोबर

गाय के नाम पर हो रही राजनीति से समाज की अखंडता पर संकट आ गया है. देश में दलित से लेकर मुसलमानों को गोरक्षा के नाम पर हो रही गुंडागर्दी का सामना करना पड़ रहा है. गोरक्षा के नाम पर उपद्रव इतना ज्यादा हो गया है कि इसे रोकने के लिए प्रधानमंत्री को अपील करनी पड़ रही है.

कृष्णकांत 

भोलेपन के पर्याय के रूप में मशहूर बेचारी गाय को पता भी नहीं होगा कि देश की सड़कों पर उसकी सुरक्षा के बहाने उपद्रव हो रहे हैं, तो भारतीय संसद में बहस में भी हुई. गाय को यह भी नहीं पता होगा कि उसका नाम अब सियासी गलियारे में मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा जा चुका है. सियासत दो खेमों में बंट चुकी है. शहर-दर-शहर कचरा चबाती और गोशालाओं में हजारों की संख्या में मर चुकी गायों को यह भी नहीं मालूम होगा कि उनके नाम पर तमाम बेरोजगार राजनीतिक कार्यकर्ताओं की चांदी हो गई है. पार्टियों और संगठनों के थिंक टैंक गाय को अपने-अपने हिसाब से दुहने में लगे हैं तो ऐसे भी वैज्ञानिक अवतरित हो गए हैं जो गाय के मूत्र में सोना और गोबर में परमाणुरोधी तत्व खोज रहे हैं.

तमाम गुट, जिनको लगता है कि गाय की रक्षा करके वे हिंदू धर्म की रक्षा कर रहे हैं, उन्होंने चंदे और फंड जुटाकर गोशालाएं खोल ली हैं. कुछ तो गोरक्षा के लिए इतने बेचैन हैं कि रात भर जागकर सड़कों पर वाहनों की तलाशी लेते हैं और उनमें कोई मवेशी मिल जाएं तो ड्राइवर को पीटने से लेकर मार डालने तक की कार्रवाई को अंजाम दे सकते हैं. गोरक्षक स्वयंभू न्यायालय हैं. गोरक्षक आपको गोबर और गोमूत्र का पंचगव्य बनाकर खिला सकते हैं, जैसा उन्होंने फरीदाबाद में किया. वे आपको पीटकर मार सकते हैं, बांधकर कोड़े बरसा सकते हैं या पुलिस को सौंप सकते हैं.

गाय किसी खूंटे से हटने के बाद बूचड़खाने पहुंचेगी या शहरों-कस्बों की गलियों में पन्नियां चबाती फिरेगी, या रास्ते में उसके नाम पर दंगा हो जाएगा, यह समाज की आस्था पर निर्भर है. लेकिन भटकती गाय के नाम पर समाज को क्या दिशा मिलेगी, यह राजनीति तय करती है. अगर गाय कोई इंसानी प्रजाति होती, इंसान की तरह बोल सकती या सोच सकती तो नई सदी में सबसे प्रभावी आंदोलन गाय प्रजाति के लोग चलाते. बुद्धिजीवियों ने अब तक गाय-विमर्श पर लंबे-लंबे पर्चे लिखे होते. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है. शायद ही दुनिया में कोई ऐसा देश है जहां किसी जानवर के नाम पर हत्याएं होती हों. भारत वह अनोखा देश तो है ही, जानवरों में गाय को वह मुकाम हासिल है जो पूरे समाज में उथल-पुथल मचा सकता है. उसके साथ पहले धार्मिक आस्था जुड़ी थी, जिसे अब सियासत का साथ मिल गया है. जिन्हें सुरक्षा चाहिए उनकी हालत यह है कि रोजगार की तलाश में गांव के तमाम निम्न-मध्यमवर्गीय युवक शहर आकर यहां की झुग्गियों में भर जाते हैं तो गाएं शहर आकर दालान में चारा खाने की जगह सड़कों पर पॉलीथिन खाती हुई पाई जाती हैं.

आॅनर किलिंग के लिए कुख्यात हरियाणा में तो सरकार ने बाकायदा 24 घंटे की गोरक्षा हेल्पलाइन भी लॉन्च कर दी है. हरियाणा सरकार गोरक्षा के लिए पुलिस की स्पेशल टीम भेजने, सड़कों पर गोरक्षा के लिए चेक पोस्ट लगाने जैसे उपायों की घोषणा कर चुकी है. जिस देश में बीस सालों में कर्ज, भूख और गरीबी के चलते तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं और उन पर कोई सरकार चिंतित नहीं है, उसी देश में सत्ताधारी पार्टी के आनुषंगिक संगठन गाय की रक्षा के लिए अलग से मंत्रालय गठित करने की मांग कर रहे हैं. विश्व हिंदू परिषद की मांग है कि केंद्र सरकार गाय मंत्रालय का गठन करे. बताया जाता है कि इस मांग को संघ परिवार का समर्थन प्राप्त है.

अपने भाषणों में गांधी और बुद्ध के संदेशों के साथ ‘21वीं सदी में भारत को विश्वगुरु बनाने’ का सपना देखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैसा महसूस करते होंगे जब गोरक्षा के बहाने देश भर में दलितों की पिटाई की खबरें सुनते होंगे? क्या हमारी तरह वे भी सोचते होंगे कि विश्व की तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति बन चुके देश में अचानक ऐसा क्या हो गया कि समाज मध्ययुग में लौटकर मरे हुए पशुओं के लिए लड़ने लगा? मरी हुई गाय की खाल उतारकर बेचने के एवज में जिंदा आदमी की खाल उतारी जाने लगी है. जिनका यह पुश्तैनी पेशा रहा है, उस दलित समाज को अगर अपने इस पेशे के लिए भी पीटकर मारा जाने लगे तो भारतीय संविधान के आदर्शों का क्या होगा? एक ऐसा पेशा, जिसके लिए एक समुदाय को अछूत माना जाता रहा है, अब उसे वह अछूत काम करने पर भी जान का खतरा आ खड़ा हुआ है.

जब तक किसान गाय पालता था तब तक वह बस दूध देने वाला जानवर भर थी, जो हिंदू आस्था से भी जुड़ी है. लेकिन जबसे सरकारों ने गोशाला खोल ली है तबसे तमाम राजनीतिक बेरोजगारों की नई-नई दुकानें भी खुल गई हैं. अब गाय को लेकर नई तरह की उथल-पुथल देखने को मिल रही है. हाल ही में राजस्थान की हिंगोनिया गोशाला में पंद्रह दिन के भीतर एक हजार गायों के मरने की खबर आई. इसके बाद मचे सियासी हड़कंप के चलते मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने दो मंत्रियों को गोशाला निरीक्षण के लिए रवाना किया. एसीबी की टीम को गोशाला पहुंचाया गया, तो पता चला कि गोशाला में चार से पांच फुट का दलदल बन चुका है क्योंकि लंबे समय से वहां से गोबर नहीं उठाया गया है. अनुमान है कि इस दलदल में कम से कम 200 गायें दफन हो चुकी हैं. 20 बछड़े ऐसे पाए गए जिनकी मांओं का अता-पता नहीं था. सरकार इस गोशाला को 20 करोड़ रुपये सालाना देती है, लेकिन मजदूरों को कई महीने से तनख्वाह नहीं मिली थी, इसलिए वे हड़ताल पर चले गए.

दिल्ली के नजफगढ़ में ‘द पिंजरापोल सोसायटी गोशाला’ है. यह 119 साल पुरानी है जिसमें छह हजार गायें, बछड़े व सांड़ मौजूद हैं. इसके अध्यक्ष बलजीत सिंह डागर कहते हैं,  ‘गोरक्षा के नाम पर जो हो रहा है वह बिल्कुल ठीक नहीं है. गाय के नाम पर दंगा-फसाद पहले भी होता रहा है. हमारे यहां दलित जातियों के लोग पहले भी मरे हुए पशुओं की खाल उतारते थे. अब वही काम बड़े लोग कर रहे हैं. गरीबों को मारा जा रहा है लेकिन बड़ों को कोई कुछ बोल नहीं रहा है. इतने बड़े-बड़े कारखाने लगा दिए गए हैं, आजकल उन्हें बड़े लोग चलाते हैं. ये तो बेकार का झंझट कर रहे हैं. मरी हुई गाय से दलितों की रोजी-रोटी चलती थी. अब उसी के लिए उन पर अत्याचार हो रहा है. ये लोग सदियों से ये करते आए हैं.’

बलजीत सिंह बताते हैं, ‘हमारी गोशाला में जो गायें मर जाती हैं उन्हें एमसीडी वाले ले जाते हैं. गाजीपुर मंडी में बूचड़खाना है वहां ले जाकर उसकी खाल वगैरह उतारी जाती है. मसला ये है कि अब गोरक्षा के नाम पर यह होने लगा है कि कोई आदमी गाय लेकर जा रहा है तो उसे भी पीटा जा रहा है. हाल में कई हत्याएं हो गईं. उस पर भी मारपीट करते हैं. इसमें राजनीतिक पार्टियां और समाज के आवारा लोग भी शामिल हैं जो बेकार के झगड़े-फसाद करते रहते हैं. सरकार को पशु का चमड़ा उतारने का लाइसेंस देना चाहिए. दूसरे, जो आदमी गाय लेकर जा रहा है अगर उस पर शक भी है तो ढंग से जांच हो. कोई दूध पीने के लिए गाय लेकर जा रहा है तो उसकी पिटाई कर देना गलत है. कुछ लोग राजनीति करते हैं, वे चाहते हैं कि लोग आपस में लड़ें. इससे समाज में समस्या पैदा हो रही है.’

गुजरात के ऊना में 11 जुलाई को मरी हुई गाय की खाल उतारने पर सात दलित युवकों की बेरहमी से पिटाई
गई. ऊना के मोटा समाधियाला गांव में इन युवकों पर गोहत्या का आरोप लगाकर करीब 35 गोरक्षकों ने पहले उन्हें लोहे की रॉड से बुरी तरह पीटा, फिर ऊना शहर लाकर उनके हाथ बांधकर उन पर कोड़े बरसाए गए. सभी को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया. गोरक्षकों ने इस घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कराया. इस घटना से दलित समुदाय में जबरदस्त गुस्सा देखा गया. हजारों की तादाद में दलित सड़कों पर उतरे. राज्य में बंद आयोजित करके दोषियों को कड़ी सजा देने की मांग की गई. घटना के एक सप्ताह के भीतर विरोधस्वरूप करीब 30 युवकों ने आत्महत्या का प्रयास किया.

एक महीने बाद भी यह आंदोलन जारी है. दलित समुदाय में उपजे गुस्से ने गाय और गोरक्षा की राजनीति को मात देने के लिए कमर कस ली है. ऊना में 20 हजार दलितों ने एकत्र होकर कसम खाई कि वे भले ही भूख से मर जाएं लेकिन अब मरी गायों को उठाना और चमड़ी उतारना बंद कर देंगे. गुस्साए दलित समुदाय के लोगों ने मरी हुई गायों को जिला कलेक्ट्रेट पहुंचा दिया और कहा कि गाय जिसकी मां है वे स्वयं उसका अंतिम संस्कार करें. इस कार्रवाई से सियासी हलके में हड़कंप मच गया.

संसद से लेकर सात समंदर पार तक गोरक्षकों ने इतनी कुख्याति बटोरी कि प्रधानमंत्री को इस पर बयान देना पड़ा. प्रधानमंत्री ने कहा, ‘अगर आप गोली मारना चाहते हैं तो मुझे मार दीजिए, लेकिन मेरे दलित भाइयों पर हमला बंद करो.’ उन्होंने कहा, ‘70-80 फीसदी गोरक्षक फर्जी हैं. मैं हर किसी से कहना चाहता हूं कि इन फर्जी गोरक्षकों से सावधान रहें. इन मुट्ठी भर गोरक्षकों का गाय संरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि वे समाज में तनाव और टकराव पैदा करना चाहते हैं. गोरक्षा के नाम पर ये फर्जी गोभक्त देश की शांति और सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि असली गोरक्षक फर्जी गोरक्षकों का भंडाफोड़ करें. राज्य सरकारों को उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए… मुझे ऐसे असामाजिक तत्वों पर बड़ा क्रोध आता है जो रात में अपराध करते हैं और दिन में गोरक्षक होने का नाटक करते हैं.’ प्रधानमंत्री का यह भी कहना है कि दलितों की रक्षा करना और उनका सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए. तब सवाल उठा कि सिर्फ दलितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी क्यों? गायों के बहाने पिटते मुसलमानों की जिम्मेदारी कौन लेगा? कोई नागरिक, चाहे वह किसी जाति या धर्म से ताल्लुक रखता हो, अगर सरेआम उसे पीटा जाता है तो क्या भारतीय गणतंत्र की नागरिकता आहत नहीं होती? विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री के बयान को ‘राजनीतिक पाखंड’ बताया. उनका कहना है कि गोरक्षा के बहाने उपद्रव करने वाले लोग भाजपा के ‘वैचारिक हमसफर’ हैं.

गुजरात में दलित आंदोलन का नेतृत्व करने वालों में से एक जिग्नेश मेवाणी कहते हैं, ‘हम पदयात्रा लेकर निकले और 15 अगस्त को ऊना में सभा की. हमने नारा दिया है कि गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी जमीन दो. आप मरी गाय की चमड़ी उतारने पर हमारी चमड़ी उतार लेंगे? तो आप अपनी गाय से खेलते रहो. हमें न जिंदा गाय से मतलब है, न ही मरी गाय से. हमें जमीनों का आवंटन करो. हम रोजगार की ओर जाएंगे. जिस पेशे के लिए हमें अछूत घोषित किया गया, अब उसी के लिए हमारी चमड़ी उधेड़ रहे हो, यह कैसे चलेगा? हमारी यात्रा ऊना पहुंचेगी. हम वहां पर प्रदर्शन करेंगे और जब तक हमारी सारी मांगें मानी नहीं जातीं, हम यह आंदोलन बंद नहीं करेंगे. हमें भारत के अन्य राज्यों और विदेशों से भी समर्थन मिल रहा है. आने वाले दिनों में यह आंदोलन और फैलेगा.’

जिस तरह गोरक्षा का उपद्रव पूरे देश में फैला था, उसी तरह यह प्रतिरोध भी देश के अन्य हिस्सों में देखने को मिला. सबसे दिलचस्प यह कि यह प्रतिरोध उस गुजरात से उठा जिसे ‘हिंदुत्व की प्रयोगशाला’ कहा जाता रहा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि इस ‘हिंदुत्व की प्रयोगशाला’ ने ही नरेंद्रभाई मोदी को पंद्रह साल लगातार गुजरात की गद्दी पर बैठाए रखा और उन्होंने ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का तमगा हासिल किया.

प्रधानमंत्री मोदी के गोरक्षकों के खिलाफ बयान पर जिग्नेश मेवाणी प्रतिक्रिया देते हैं, ‘भाजपा और संघ परिवार के लोग गाय माता की दुम बहुत हिला रहे थे. लेकिन जिस तरह हजारों की संख्या में दलित शक्ति सड़कों पर उतर आई, जिस तरह से यह आंदोलन फैल रहा है, कहीं न कहीं मोदी साहेब और भाजपा को लग रहा है कि गाय की दुम अब उनके गले का फंदा न बन जाए, तब जाकर उन्होंने मुंह खोला है.’

वरिष्ठ साहित्यकार कंवल भारती कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री को हमेशा भावुक बयान देने की आदत है. वे बेवकूफी भरे होते हैं. जैसे कि मुझे गोली मार दो. आप इतनी सुरक्षा में चलते हैं, आपको कोई गोली कैसे मार सकता है? इसे रोकने के लिए आरएसएस से कहना चाहिए कि आज के बाद ऐसी घटना नहीं होनी चाहिए. यह काम जनता नहीं कर रही है. इसके लिए हिंदूवादी संगठनों को रोकना चाहिए. अगर उनको देश को बदलना है, दलितों से मोहब्बत है तो आरएसएस से कहें कि दंगों की राजनीति बंद करो. लेकिन वे ऐसा कभी नहीं कहेंगे.’

प्रधानमंत्री के बयान और संसद में गोरक्षकों के असामाजिक कृत्य की निंदा के बाद भी आंध्र प्रदेश के गोदावरी जिले में मरी गाय की खाल उतार रहे दो दलितों की पिटाई की गई. गाय की करंट लगने से मौत हुई थी जिसके बाद गाय के मालिक ने खुद ही उसे दलितों को सौंप दिया था. वे गाय की खाल उतार रहे थे तभी वहां स्वयंभू गोरक्षक पहुंचे और दोनों की बुरी तरह पिटाई की. उनमें से एक को काफी गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया.

केंद्र में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से गोरक्षा का मुद्दा काफी गरमाया हुआ है. 17 अक्टूबर, 2015 को आईबीएन-7 चैनल ने एक रिपोर्ट की थी, जिसमें दिखाया गया कि कैसे स्वयंभू गोरक्षा दल के लोग गो-तस्करी में लोगों को पकड़ते हैं और खुद ही उन्हें सजा देते हैं. वे पकड़े हुए लोगों को मारकर अधमरा कर देते हैं. रिपोर्ट में दिखाया गया कि कैसे गोरक्षक कानून अपने हाथ में लेकर हथियार लहराते हैं. लाठी, डंडा, बंदूक, तलवारें और बुलेट प्रूफ जैकेट से लैस गोरक्षक बाकायदा अपने काम को सही ठहराते हैं. ऐसे गोरक्षा समूहों पर प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होने की स्थिति कानून व्यवस्था की स्थिति और राजनीतिक मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करती है.

यह भी दिलचस्प है कि 80 प्रतिशत गोरक्षकों को ‘फर्जी’ और ‘समरसता बिगाड़ने’ वाला तत्व बताने वाले नरेंद्र मोदी ही वह व्यक्ति हैं जो अपने चुनाव प्रचार के दौरान गोरक्षा पर जोर दे रहे थे. अप्रैल 2014 में बिहार और मध्य प्रदेश में अपनी रैलियों के दौरान उन्होंने कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की नीति पर सवाल उठाए थे कि केंद्र सरकार ‘पिंक रिवोल्यूशन’ लाना चाहती है जिसके तहत देश भर में गायों को काटा जा रहा है और गायों की तस्करी की जा रही है. भारत से निर्यात होने वाले मांस में ज्यादातर भैंस, बकरी, बैल और बछड़े का मांस होता है. लेकिन नरेंद्र मोदी उस समय सिर्फ गायों का जिक्र कर रहे थे कि बूचड़खानों में गोहत्या को बढ़ावा दिया जा रहा है. यह अलग बात है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मांस निर्यात पर प्रतिबंध तो नहीं लगा, उल्टा भारत विश्व का अग्रणी बीफ निर्यातक बन गया.

इसी बीच एनिमल वेलफेयर बोर्ड आॅफ इंडिया के बोर्ड मेंबर एनजी जयसिम्हा ने मोदी सरकार पर गोरक्षा के मामले में दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि सरकार गाय की रक्षा करने और तस्करी रोकने के लिए पहले से दी जाने वाली ग्रांट लगातार कम करती जा रही है. यूपीए सरकार ने 2011-12 में 2177.58 करोड़ रुपये की ग्रांट दी थी. 2012-13 में यह राशि घटकर 1606.43 करोड़ रुपये कर दी गई. अगले साल 1299.8 करोड़ रुपये और 2014-15 में 1200.74 करोड़ रुपये बोर्ड को दिए गए. 2015-16 में यह ग्रांट घटाकर 784.85 करोड़ रुपये कर दी गई.

गोरक्षा के नाम पर बढ़ रही गुंडागर्दी और उपद्रव को लेकर चौतरफा आलोचना झेलने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने तल्खी दिखाई तो गोरक्षक उनके ही खिलाफ आग उगलने लगे. सोशल मीडिया पर मौजूद कुछ गोरक्षकों ने भले ही गाय सिर्फ सोशल मीडिया पर देखी हो, लेकिन प्रधानमंत्री के बयान के बाद उन्होंने अपना गुस्सा जाहिर किया और प्रधानमंत्री पर सेकुलर होने का आरोप लगाया. राजस्थान गो सेवा समिति के प्रदेश अध्यक्ष दिनेश गिरी ने बयान दिया, ‘पीएम के इस बयान से गोरक्षकों का मनोबल टूट गया है और उनकी भावनाएं आहत हुई हैं. मोदी जी के बयान और हिंगोनिया गोशाला में गाय की मौत के बाद गोसेवा करने में भारी दिक्कतें हो रही हैं.’ उनके मुताबिक, यह समिति 22 अगस्त को बैठक करके आगे की रणनीति तय करेगी. अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दे डाली.

दूसरी ओर, गोरक्षा को प्रमुख एजेंडे में रखने वाले आरएसएस को भी गोरक्षकों के खिलाफ बयान जारी करना पड़ा. विशेषज्ञ इसे भाजपा और उसके मातृ संगठन आरएसएस की मजबूरी मान रहे हैं क्योंकि कुछ महीने पहले पार्टी और संगठन के कार्यकर्ताओं से लेकर नेता तक गोरक्षा के पक्ष में लामबंद थे. असहिष्णुता की बहस आगे बढ़कर ‘राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रद्रोह’ में परिवर्तित हुई तो केंद्रीय मंत्रीगण और वरिष्ठ नेता न्याय के लिए अदालत का मुंह देखने की जगह खुद ही मुंसिफ बन बैठे और भीड़ की कार्रवाई के पक्ष में भी स्पष्टीकरण देने लगे थे. लेकिन गुजरात में दलितों के सड़क पर उतरने और आंदोलन छेड़ देने का परिणाम यह हुआ कि सत्ताधारी दल और सरकार दोनों को आत्मरक्षात्मक मुद्रा अख्तियार करनी पड़ी. गोरक्षकों पर गुस्सा तब तक नहीं दिखाया गया जब तक वे गोहंता के रूप में मुसलमानों को चिह्नित करके उन पर हमला करते रहे. आरएसएस और भाजपा की प्रमुख चिंता दलितों या मुसलमानों पर हमले को लेकर है कि नहीं, यह रहस्य है, लेकिन उनकी यह चिंता जरूर होगी कि संघ परिवार जिस ‘विशाल हिंदू परिवार’ का सपना देखता है, दलितों पर हमलों के बाद वह बिखराव की ओर बढ़ने लगा है.

वरिष्ठ साहित्यकार व दलित मामलों के विशेषज्ञ कंवल भारती कहते हैं, ‘समस्या यह है कि निचली जातियों में जागरूकता के स्तर पर वह काम नहीं हो पा रहा है. इसलिए दलित-पिछड़ी जातियों और मुसलमानों को आपस में लड़ाना आसान है. वे सब गरीब लोग हैं, दिहाड़ी मजदूर हैं. वहीं दंगे के वक्त हिंदू-मुसलमान बन जाते हैं और दंगा करते हैं. एक तरफ दलित आबादी होती है, दूसरी तरफ मुसलमान होते हैं. लड़ाने वाले सुरक्षित दुर्ग में रहते हैं. वे कभी नहीं मारे जाते. दंगों का अपना अर्थशास्त्र है. आप देखिए कि जहां मुसलमान या दलित आर्थिक रूप से थोड़े संपन्न हुए वहां दंगा करवा दिया जाता है. उनकी कमर तोड़ दी जाती है. जैसे भागलपुर में हुआ, बनारस में हुआ. बुनकरों के घर सत्यानाश कर दिए. यही गुजरात में किया गया.’ इसी बात को आगे बढ़ाते हुए पत्रकार अरविंद शेष कहते हैं, ‘गाय कोई धार्मिकता का मामला है ही नहीं. यह देखना चाहिए कि मोदी सरकार के आने के बाद हिंदूवादी, यहां तक कि सरकार के स्तर पर, लोग गाय के चलते किसी को मारने को क्यों तैयार हो जा रहे हैं? ऊना में, हरियाणा में या दूसरी जगहों पर जो लोग हमले कर रहे हैं, वे सब के सब संघ से जुड़े नहीं हैं. एक आबोहवा बना दी गई है कि गाय हमारी माता है. अब वो किसी को भी मारेंगे. मुसलमान या हिंदू कोई भी हो. यह भस्मासुर पैदा करने जैसी स्थिति है.’

जिग्नेश मेवाणी कहते हैं, ‘आपको गुजरात की हालत बताता हूं कि साढ़े चार साल भाजपा वहां पर विकास के दावे करती है. लेकिन जब चुनाव आता है तो आरएसएस और उसके कैडर गाय का नारा लगाने लगते हैं और गाय से जुड़े वीडियो प्रसारित करने लगते हैं. मांस का लोथड़ा कहीं मिल जाए तो उसको सीधे गोमांस बता दिया जाता है और मुसलमानों पर आरोप लगा दिया जाता है. अब सवाल उठता है कि मांस का टुकड़ा बिना प्रयोगशाला में टेस्ट के कैसे पता चल जाता है कि किसका मांस है? गाय को पवित्र बनाने और उसके नाम पर उपद्रव करने की यह राजनीति लंबे समय से चल रही है, इसीलिए गोरक्षक इतना बेखौफ हैं. मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के पहले जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी गुजरात में यही होता रहा है. मुसलमानों को गौ माता के नाम पर बहुत प्रताड़ित किया गया है. वीडियो प्रसारित करके, पोस्टर लगाकर अभियान चलाए गए.’
अरविंद शेष कहते हैं, ‘यह बात ध्यान रखना चाहिए कि कोई दलित मरी हुई खाल उतारेगा, उसकी यह ड्यूटी भी ब्राह्मणवाद ने ही तय की. आज वह खाल उतारते हुए पाया जाता है तो उसकी हत्या भी आप ही करते हैं. अब जब उन्होंने खाल उतारने का काम करने से इनकार कर दिया है तब आपको चाहिए कि आप अपना इंतजाम करें.’

कंवल भारती भाजपा और संघ की राजनीति पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘जब जब आरएसएस-भाजपा सत्ता में आते हैं, वे यही करते हैं. वाजपेयी की सरकार थी तब ओडिशा में हिंदूवादियों ने ईसाई धर्मगुरु ग्राहम को जिंदा जला दिया था. इनका काम यही है. कभी लव जिहाद, कभी मंदिर-मस्जिद, कभी गोरक्षा के नाम पर लोगों को आपस में लड़ाते रहो. यह गोरक्षा खाए, पिए अघाए लोगों के दिमाग का फितूर है. इन्हें रोजी-रोटी की समस्या होती तो यही लोग ऐसे मुद्दे कभी उठाते ही नहीं. कोई काम नहीं है तो चलो गाय बचा लो. गरीब आदमी की हालत यह है कि वह मरी हुई गाय की खाल उतारकर अपनी जीविका चलाता है. अमीर अपनी राजनीति के लिए उसे पीटता है. यह सत्ता समर्थित अभियान है जिसके तहत कभी मुसलमान निशाना बनते हैं तो कभी दलित. इसके लिए उन्हें पैसे भी मिलते हैं और राजनीतिक समर्थन भी. चाहे ऊना की घटना हो, झज्जर की घटना हो या फिर देश के दूसरे हिस्सों में, पुलिस-प्रशासन सबको धता बताकर यह काम किया जा रहा है. क्योंकि जो राजनीति इसे समर्थन दे रही है वह यही चाहती है कि लोग आपस में लड़ते रहें तो दूसरे मसले पर बात न हो.’

अरविंद शेष कहते हैं, ‘मेरा स्पष्ट मानना है कि गाय का पूरा मसला संघ-भाजपा के लिए सिर्फ एक पर्दा है. पिछले दो सालों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार योजनाओं के स्तर पर स्थितियां खराब होती जा रही हैं. लोग अपना रोजगार कर सकें, जीवन चला सकें, इसके लिए हालात को लगातार मुश्किल बनाया जा रहा है. अंबानी-अडाणी के लिए कैसे रास्ते खोले जा रहे हैं, उस पर कहीं बहस नहीं है. वे सब बड़े मसले गाय की बहस में छिप जा रहे हैं. सारे महत्वपूर्ण मुद्दे जो नीतिगत फैसलों से जुड़े हैं, विदेशों से क्या समझौते हो रहे हैं, अमेरिका, इजराइल, ऑस्ट्रेलिया यहां लाकर क्या कचरा फेंक रहा है, जनता को इसकी कोई जानकारी नहीं है. जनता को यह जानकारी मिल रही है कि कहां गाय के लिए दंगा हुआ, किसने किसको मार दिया, गाय हमारी माता है, यही सब देश भर में चल रहा है.’

कांग्रेस नेता पीएल पुनिया आरोप लगाते हैं कि भाजपा और आरएसएस दलितों, पिछड़ों और आम जनता के सवालों से ध्यान हटाने के लिए यह सब दंगा-फसाद करते हैं. इसी बात को दूसरे शब्दों में अरविंद शेष बयान करते हैं, ‘गाय दरअसल एक पर्दा है जो सरकार को सवालों से बचाती है. शिक्षा बजट में कटौती, बालश्रम का नया कानून, दलित आदिवासी छात्रवृत्तियों को बंद करना, एक से डेढ़ लाख स्कूलों का बंद होना, आरक्षण खत्म करने की कोशिश करने जैसे जो बड़े सवाल हैं, वे सब गाय के नाम पर उठ ही नहीं रहे हैं. अकेले छत्तीसगढ़ में 25 हजार से ज्यादा स्कूल बंद हो गए. राजस्थान में 20 हजार स्कूल बंद हो गए. कुल मिलाकर डेढ़ लाख से ज्यादा स्कूल बंद हो गए हैं. कहीं मर्जर के नाम पर तो कहीं पीपीपी के नाम पर. सरकारी स्कूल में कौन बच्चे जाते हैं. वे गरीबों, दलितों और पिछड़े समुदाय के बच्चे हैं. वे सब के सब शिक्षा व्यवस्था से अपने आप बाहर हो जाएंगे. सरकार में बैठे लोग अलग-अलग फ्रंट पर अपने लोगों के जरिए सामाजिक मनोविज्ञान की दिशा तय करने में लगे हुए हैं.’

पुनिया कहते हैं, ‘आरएसएस, भाजपा जानबूझ कर देश को ऐसे मसलों में फंसाए रहना चाहती हैं. फालतू के मसलों में फंसी हुई जनता उनसे सवाल नहीं पूछ सकेगी कि वे सत्ता में आने के बाद क्या कर पाए हैं. जितने वादे किए थे चुनाव में, वे सब अधूरे हैं. भाजपा जनता का विकास करने की जगह लोगों को आपस में लड़ा रही है. उन्होंने खुद गोरक्षा का मुद्दा उठाया था. ऐसे तत्वों को बढ़ावा दिया गया. अब जब जनता आपस में लड़ रही है तब वे डैमेज कंट्रोल करने के लिए ऐसा बयान दे रहे हैं. ऐसे बयान का कोई फायदा नहीं है क्योंकि हमले तो प्रधानमंत्री के बयान के बाद भी हो रहे हैं. दरअसल, भाजपा की नीति यही है कि जनता को आपस में लड़ाया जाए ताकि वह उसी में उलझी रहे. भाजपा शासित राज्यों में ही दलितों और पिछड़ों का आरक्षण खत्म किया जा रहा है. दूसरी तरफ उन पर अत्याचार किया जा रहा है.’

इतिहासकार रोमिला थापर कहती हैं, ‘लोगों को मारा जाना किसी भी हालत में जायज नहीं है. इसे तो स्वीकार नहीं किया जा सकता कि कोई भी विवाद ऐसा हो कि किसी इंसान की जान ले ली जाए. बाकी गोरक्षा का बहुत लंबा-चौड़ा इतिहास है. गोहत्या रोकने की बात तो इतिहास में पुरानी है, लेकिन गोरक्षा आंदोलन बाकायदा 19वीं सदी में शुरू हुआ. अब जिसकी राजनीतिक विचारधारा में यह आइडिया इस्तेमाल हो सकता है, वे इस्तेमाल करेंगे. हम लोग सिर्फ कह सकते हैं कि ऐसा मत कीजिए क्योंकि यह इंसानियत की बात है कि गोरक्षा का नाम लेकर आप किसी को जान से मार दें, यह ठीक नहीं है. लेकिन जिन्हें इस्तेमाल करना है वे करेंगे. इसका अंजाम क्या हो रहा है, यह आप देख ही रहे हैं. एक तरफ मिथ बढ़ाया जा रहा है कि गाय ये थी, गाय वो थी, दूसरी तरफ लोगों को मारने के लिए गाय का बहाना बनाया जा रहा है.’

अरविंद कहते हैं, ‘दलितों के इस आंदोलन का बहुत दूरगामी परिणाम होगा. यह बहुत अच्छा हुआ है. सामाजिक चेतना का विकास होगा. एक पूरा समुदाय जो मरे हुए जानवरों के निपटान के जरिए ही बहुत ही निम्न दर्जे की जिंदगी जीता था, अब उसी को उसने छोड़ दिया है. यह ऐसा काम है जिसे अब तक नहीं करने वाला समुदाय कभी नहीं करेगा. उस पेशे को उस समुदाय की सामाजिक हैसियत से जोड़ दिया गया था. गुजरात के दलितों द्वारा इस काम से इनकार करने का परिणाम एक सामाजिक बदलाव के रूप में सामने आएगा.’

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोधछात्र सुनील यादव कहते हैं, ‘वंदे मातरम, भारत माता की जय, गीता से होते हुए खतरनाक प्रतीकों की यह राजनीति गाय तक पहुंची है. गाय सबसे खतरनाक राजनीतिक प्रतीक थी जिससे मुस्लिम समाज के खिलाफ हिंदुओं की गोलबंदी हो सकती थी. इस दौर में दादरी का अखलाक इसी प्रतीकों की राजनीति का शिकार हुआ. ये हिंदुत्व और गाय के ठेकेदार कभी नहीं चाहते थे कि इन प्रतीकों की राजनीति में दलित शामिल हो जाएं. उन्हें तो हिंदुत्व के किसी भी प्रतीक के आधार पर मुस्लिमों का विरोध करना था जिससे नाराज और बिखरते हुए हिंदू समाज को एक साथ लाया जाए और अपना वर्चस्व कायम रहे. इसीलिए आप देखिए तत्काल रूप से हिंदुत्व के ठेकेदार ऊना के मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे और जब लगा कि पासा पलट गया है तो दलितों का हितैषी बनने की होड़-सी लग गई है. पर इस प्रसंग में मुस्लिमों को लेकर किसी का बयान नहीं आया. तो मामला साफ है इन तथाकथित हिंदुत्व के ठेकेदारों के लिए गाय एक राजनीतिक प्रतीक है न कि मां. इधर तमाम गोशालाओं में और गुजरात की सड़कों पर गायों की दुर्दशा देखकर इसे पुष्ट कर सकते हैं. सवाल सिर्फ एक है कि अपने वर्चस्व को बनाए रखने के इस खेल में उनके लिए सब हथियार हैं और सब शिकार भी.’

भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भी गोरक्षा और गाय के नाम पर सामाजिक व्यवहार और छुआछूत तय करने के रवैये से तंग आकर  बाबा साहब आंबेडकर ने अपने कई लेखों में धर्मग्रंथों के आधार पर यह साबित किया था कि प्राचीन काल में ब्राह्मण भी मांस, यहां तक कि गोमांस खाते थे. जब बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ, जिसकी सबसे बड़ी ताकत अहिंसा और जीव हत्या के निषेध में थी, तो उसके प्रतिकार में हिंदू धर्मगुरुओं और धर्मावलंबियों ने गोमांस का निषेध करके गाय को पवित्र जानवर घोषित किया.

कंवल भारती भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘प्राचीन काल में गाय का मांस खाना आम बात थी. तमाम ग्रंथों में गाय का मांस खाने की बात लिखी है. जब महात्मा बुद्ध ने यज्ञों और पशु बलियों का विरोध शुरू किया तो ब्राह्मणों ने पलटी मारी और खुद को अहिंसक बना लिया. यह बाबा साहेब ने बाकायदा अपनी किताब में लिखा है.’

‘राजनीति की बिसात पर गोमांस’ शीर्षक से अपने लेख में प्रो. राम पुनियानी लिखते हैं, ‘भाजपा और उसके संगी-साथियों के दावों के विपरीत स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में एक बड़ी सभा में भाषण देते हुए कहा था, ‘आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्राचीनकाल में विशेष समारोहों में जो गोमांस नहीं खाता था उसे अच्छा हिंदू नहीं माना जाता था. कई मौकों पर उसके लिए यह आवश्यक था कि वह बैल की बलि चढ़ाए और उसे खाए’(शेक्सपियर क्लब, पेसेडीना, कैलीर्फोनिया में 2 फरवरी, 1900 को ‘बौद्ध भारत’ विषय पर बोलते हुए) ‘ब्राह्मणों सहित सभी वैदिक आर्य, मछली, मांस और यहां तक कि गोमांस भी खाते थे. विशिष्ट अतिथियों को सम्मान देने के लिए भोजन में गोमांस परोसा जाता था. यद्यपि वैदिक आर्य गोमांस खाते थे तथापि दूध देने वाली गायों का वध नहीं किया जाता था. गाय को ‘अघन्य’ (जिसे मारा नहीं जाएगा) कहा जाता था परंतु अतिथि के लिए जो शब्द प्रयुक्त होता था वह था ‘गोघ्न’ (जिसके लिए गाय को मारा जाता है). केवल बैलों, दूध न देने वाली गायों और बछड़ों को मारा जाता था. (द कल्चरल हेरिटेज ऑफ इंडिया खंड-1, प्रकाशक रामकृष्ण मिशन, कलकत्ता, कुन्हन राजा का आलेख वैदिक कल्चर, पृष्ठ 217)

 जिग्नेश मेवाणी कहते हैं, ‘बाबा साहेब ने बाकायदा लिखा है कि गाय को पवित्र बनाने और अछूत समस्या का आपस में संबंध है. पूरे वैदिक काल में ब्राह्मण मांस खाते थे. गाय और घोड़े का मांस खाया जाता था. लेकिन आगे जाकर बौद्धों और ब्राह्मणों के बीच संघर्ष हुआ तो ब्राह्मणों ने अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिए गोमांस खाना बंद कर दिया. तब से लेकर यह गाय की राजनीति चली आ रही है.’

शोधछात्र सुनील कहते हैं, ‘हिंदू धर्म का मूल चरित्र ही दलित विरोधी है जैसा कि धर्मशास्त्र का इतिहास लिखते हुए तोकारेव ने कहा था कि ऊपर के तीन ही वर्णों के देवता थे और पूजा करने का अधिकार सिर्फ ऊपर के तीन वर्णों को ही था. शूद्रों को इससे बाहर रखा जाता था. हिंदू धर्म का पहला मुकाबला बौद्ध धर्म से हुआ. दमित और प्रताड़ित शूद्र बहुत तेजी से बुद्ध के पीछे होने लगे, तब ब्राह्मण धर्म अर्थात हिंदू धर्म ने अवतारों की कल्पना करते हुए धर्मशास्त्र के नियमों में ढील देते हुए अछूत जातियों को कुछ धार्मिक अधिकार दिए. लेकिन आज तक मंदिर प्रवेश या सामाजिक भेदभाव के तमाम मामलों में दलितों का भयानक अत्याचार जारी है. दलित का जीवन पशुओं से बदतर तब भी था और आज भी है.’

सुनील पूरे टकराव को वर्चस्व की राजनीति का नतीजा मानते हुए कहते हैं, ‘गाय का मामला पूरी तरह राजनीतिक है. वर्ण व्यवस्था के प्रकर्म में भयानक रूप से बंटे हिंदू समाज में दलित बहुत साजिश के साथ शामिल किए गए तो भी उन्हें हाशिये पर रख दिया गया. जब बार-बार हिंदू समुदाय के शोषित जातियों को लगता है कि हिंदू समाज में हमारा कोई अस्तित्व नहीं है तो वे अन्य धर्मों की तरफ ताक-झांक करने लगते हैं. तो सभी को हिंदू समाज में बनाए रखने के लिए सवर्ण हिंदुओं ने एक साजिश रची कि किसी तरह इस्लाम के प्रभुत्व का डर पैदा कर इन असंतुष्ट शोषित जातियों को अपने साथ बनाए रखा जाए. इसके बाद शुरू हुआ मुसलमानों के खिलाफ नफरत और जहर का दौर जिसमें उन प्रतीकों को चुना गया जिसके प्रयोग को लेकर मुस्लिम समाज में कुछ नाराजगी हो, विरोध हो.’

इतिहासकार प्रो. डीएन झा कहते हैं, ‘गोरक्षा अभियान 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ. दयानंद सरस्वती ने गोरक्षा समिति की स्थापना की थी. तबसे गाय को राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. धीरे-धीरे यह बढ़ता गया है. गाय को लेकर बीच-बीच में समस्या होती रही है. 1966 में विनोबा भावे के नेतृत्व में संसद का घेराव हुआ था, जिसपर बहुत बवाल हुआ था. बाद में यह अभियान कम हो गया. इधर कुछ दिनों से इसने फिर जोर पकड़ा है. सवाल ये है कि गाय को बचाइएगा तो दूसरे मवेशियों को क्याें छोड़ दीजिएगा? दूसरे, गाय के मरने के बाद उसे उठाने का काम या उसके निपटान का काम कौन करेगा? क्या तोगड़िया जी हटाएंगे? उसके लिए अब इन्हाेंने लोगों को मारना शुरू किया है. चलिए आप गाय को बचा लीजिए. लेकिन उसके मरने के बाद उसका क्या होगा?’                          

मंदिर में प्रवेश न देने, मरी गाय उठाने के लिए दलितों को अछूत घोषित कर देने या उसी काम के लिए उन्हें ‘सजा’ देने का क्रम अपनी ऐतिहासिकता में बेहद भयानक रहा है. प्रसिद्ध साहित्यकार और चिंतक प्रो. तुलसीराम ने अपनी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ में दलित जीवन का यथार्थ जिस तरह लिखते हैं, उसे पढ़कर समझा जा सकता है कि भारतीय समाज में दलितों की क्या हालत रही है. वे लिखते हैं, ‘उस समय एक परंपरा के अनुसार गांव का कोई भी हरवाहा अपने मालिक जमींदार के मरे पशु की खाल निकालकर उसे बेचने से बचे धन को अपने पास रख लेता था. ऐसे चमड़ों की कीमत प्रायः बीस रुपये होती थी… जब हमारे घर की कलोरी गाय मरी तो छह आदमी काड़ी पर ढोते हुए मुर्दहिया पर ले गए थे. मुन्नर चाचा कहने लगे थे कि उस छुट्टी में मैं चमड़ा छुड़ाना धीरे-धीरे सीख जाऊं ताकि भविष्य में इस चर्मकला में पारंगत हो सकूं… मैंने वैसा ही किया. इसके बाद मैं अनेकों बार इस तरह की चामछुड़ाई के अवसाद से पीड़ित रहा…’

दलित बस्ती की कारुणिक कथाओं के क्रम में वे आगे लिखते हैं, ‘इन्हीं गिद्ध प्रकरणों के दौरान गांव के जोखू पांडे का एक बैल मर गया. मुर्दहिया पर सारे कर्मकांड संपन्न हुए. जोखू के हरवाहे द्वारा चमड़ा छुड़ाए जाने के बाद उसी के घर की एक रमौती नामक महिला जो मुर्दहिया पर घास छील रही थी, उससे नहीं रहा गया.

वह डांगर के लालचवश खुर्पा लेकर गिद्धों से भिड़ गई और मरे हुए बैल का कलेजा काटकर घास से भरी टोकरी में छिपाकर ले आई. मेरे साथ अनेक दलित बच्चे यह नजारा देख रहे थे. सभी चिल्लाने लगे: ‘रमौती घरे डांगर ले जाति हौ.’ यह खबर चाचा चौधरी तक पहुंच गई. दो दिन बाद पंचायत बुलाई गई. रमौती के परिवार को कुजाति घोषित कर दिया गया और उसका सामाजिक बहिष्कार हो गया. यह बड़ा प्रचंड बहिष्कार था. बिरादरी में शामिल होने के लिए उन्हें सूअर-भात की दावत देनी पड़ी जिससे रमौती का परिवार भारी कर्ज में डूब गया.’

प्राचीन भारतीय समाज में पशुधन लोगों की प्रमुख संपत्ति रहा है. भूमिहीन और मजदूर तबके के लिए यह जीविका और पोषण का एकमात्र साधन रहा है. मरे हुए जानवरों जैसे गाय, भैंसें और अन्य पालतू जानवरों से भी लोग आपना पेट पालते थे. भारतीय समाज की आर्थिकी में भी गाय और गोवंश की अहम भूमिका रही है. गाय के पवित्र घोषित हो जाने का फायदा जिसे भी हुआ हो, लेकिन इससे उन लोगों के पोषण और जीविका पर प्रहार हुआ जिनके लिए पेट भरने का एकमात्र साधन जानवर था. मरे हुए मवेशियों को उठाकर अपनी जीविका चलाने वाला दलित समाज अपने उसी पेशे के लिए अछूत घोषित हुआ और अब उसी के लिए उसे प्रताड़ित किया जाना न सिर्फ मानवाधिकार का मसला है, बल्कि एक बड़े समुदाय की पहचान और गरिमापूर्ण जीवन पर प्रहार है. अब सवाल है कि क्या दलितों का आंदोलन उनके लिए भारतीय समाज में नए कपाट खोलेगा?
(यह लेख तहलका हिंदी पत्रिका के सितंबर, 2016 के अंक में 'आपबीती' कॉलम में छप चुका है.)

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

भारतीय राजनीति की बकरी कथा

एक पाकिस्तान पठाऊ देशभक्त हैं. वे बहुत दिनों तक लोगों को पाकिस्तान भेजने पर उतारू थे. लेकिन न कोई गया, न कोई जाने को तैयार हुआ. जिन लोगों को उनने धमकियाया था, उनको भेज भी नहीं पाए. तो फिर उन्होंने पाकिस्तान भेजने की धमकी देना बंद कर दिया. न कोई पाकिस्तान गया, न ले जाया गया. ठीक वैसे जैसे भव्य राम मंदिर बनना तो था, लेकिन न राम मंदिर बना, न बनाया गया. 25 साल तक उपद्रव जरूर मचाया गया.

कलयुग में समय जल्दी जल्दी बदलता है. अवतार भी जल्दी—जल्दी होते हैं. जितनी बार अपने गांव जाता हूं, किसी नये चौडगरे पर एक नये बाबा उग आते हैं. वे पिछले वाले से ताकतवर होते हैं. इसी तरह से अब सियासत में राम मंदिर से ताकतवर सियासी अवतार गाय का है. गांव के बाहर मुर्दहिया में अब डांगर छोड़ आना मौत को न्यौता देकर आना है. जहां कहीं गाय की टांगनुमा कोई आकृति दिखी, आस्था की विकृति फनफना उठती है. फिर जो आगे आया, वह अब मरा कि तब मरा.

एक दिन तो हद हो गई. मैं बस में था और फोन पर बतिया रहा था. मेरा दोस्त फोन की दूसरी तरफ था. उसने कहा, ससुरे तुम बहुत दुष्ट हो. हमने कहा, अच्छा! और तुम तो अल्ला मियां की गाय हो! मेरे भाई, मैं गाय, अल्ला, मोदी जी को दुख देने वाला पिल्ला और सारे मुहल्ला की कसम खाकर कहता हूं— मेरा किसी को आहत करने का कोई इरादा नहीं था. हमारे गांव में ऐसा बोल देते हैं, हमने भी बोल दिया. लेकिन मेरे मुंह से अल्ला मियां की गाय सुनते ही बगल खड़ा एक मुस्टंडा नाराज हो गया. कहने लगा— अबे देशद्रोही! तुझे पीटकर मार डालूंगा. मैंने पूछा— काहे भाई, हमने तुम्हारी भैंस खोल ली है क्या? और तुनक गया, बोला—पहले तो तुमने गाय को अल्ला से जोड़कर हिंदू द्रोह किया और अब मेरे घर से भैंस बरामद करने की बात कर रहे हो. तुम मेरा धर्म भ्रष्ट करने पर तुले हो. तुमको छोडूंगा नहीं.
बगल में एक चचा बैठे थे. चचा अपने रौब और दाब से लखनवी प्रतीत होते थे. चचा ने मुस्टंडे की मंशा भांप ली और उसके हस्तास्त्र का आक्षेप प्रक्षेप होने से पहले हस्तक्षेप कर दिया— अरे बबुआ काहे नाराज होते हो, वह बेचारा दढ़ियल खाली पीली खीस ही निपोर रहा है. अपने किसी मित्र मित्राणी से बतिया रहा है. तुम दालभात में मूसलचंद कहां से आ गए?
चचा की मूूंछें रौबदार थीं, डरना बनता था. इसलिए मुस्टंडा कुछ सहम कर बोला— देखो अंकल, इन्होंने गाय को अल्ला से जोड़ दिया है, इन्होंने हमारी भावना को आहत कर दिया है...आप मत बोलिए, यह मेरी आस्था का मामला है...

चचा ने बात काट दी और जोर से डपट कर बोले— अमां डरेबर, गाड़ी रोक. रोक... रोक... रोक...
सुन बचवा, तेरी भावना और आस्था को समेट और निकल इधर से. अब हमारी भावना आहत हो गई, तू बस पर चढ़ा क्यों? चल भाग जंगल निकल. तू यहां दिल्ली में मत रहा कर. लखनऊ तो दिखाई मत पड़ना...
लड़के ने अपने पांव प्रेम से अपने सर पर रखे और रफू हो गया.
चचा मुस्कराए— बौउचट पता नहीं कहां से आ गया... ई जीवधारी जंतु है. हमारे मुहल्ला पहुंच जाए तो खून खराबा करा दे. अरे ई सब तो हम लोग भी बोलते हैं! लखनऊ के हो न बच्चे! हम लोग अइसै बोलते चालते हैं तुम्हारे जइसा ही, अब ई ससुरा भावना और आस्था लेकर आ गया का जाने कहां से.
इतने में हमारा स्टैंड आ गया और हमने राहत की सांस ली, चचा को एक लखनवी मुस्कराहट पास की और उतर गया.
यह उस समय की बात है जब जम्बूदीप में आस्थाएं राजनीति की रखैल हो चुकी थीं. आस्थाओं को कोई धर्म का दलाल अपने तरीके से इस्तेमाल करके जा सकता था. समोसा चटनी, कपडे का रंग, गाय—गोरू, गोबर—मूत्र आदि इस दोहन के हथियार थे. देश में इस बात पर बहस गर्म थी कि किसकी रसोईं में क्या पकना चाहिए.

इस चलन के बाद एक दिन पाकिस्तान पठाऊ देशभक्त् की घरवापसी हुई और उन्होंने फिर से मुंह खोला तो खोल ही दिया. उन्होंने गाय और बकरी की मांस का सैंपल लिया, उस पर कलात्मक ढंग से आस्था और संस्कार को आरोपित किया और फिर उस पर बहन और पत्नी को आरोपित कर दिया. बवाल मच गया— गाय मां थी तो बहन कैसे हुई? गाय मां भी कैसे हो सकती है? मां गाय कैसे हो सकती है? गाय और बकरी दोनों जानवर हैं तो मां, बहन और पत्नी तीनों में से कोई भी बकरी या गाय क्यों हो जाएगी? जानवर को इज्जत देते देते मनुष्य को जानवर कैसे बनाया जा सकता है?
भक्तों ने कहा, नहीं, यह हो सकता है. यही होता है. जिस तरह आप बहन से संबंध नहीं बनाते है, लेकिन पत्नी से बनाते हैंं, उसी तरह आप बकरी को काट कर खा सकते हैं, लेकिन गाय को नहीं? नारीवादी बहनों ने पूछा— तो भैया, का हम गाय हैं? हमार लाइफ कौनों लाइफ नहीं है का? भक्तों ने कहा, मेरा वो मतलब नहीं था. मेरा मतलब आस्था से था. आप बुरा मत मानिए.
एक बहन मुंहजोर थी, अपने भगत हो चुके तर्क—मुब्तिला भाई को चप्पल लेकर दौड़ा लिया— 'भाग दाढ़ीजार यहां से, एक पे रहता नहीं है. कभी भावना पर आता है तो कभी आस्था पर. कमीना अपनी नौटंकी के चक्कर में हमको गाय बोल गया. दोबारा दिखा इधर तो हलाल करके छोडूंगी.' भक्त भागा तो भाग ही गया.
एक दूसरा भगत भाई भागा—भागा घर पहुंचा. पत्नी झाड़ू लगा रही थी. टीवी पर न्यूज देख कर आई थी. उसका बकरी बना दिया जाना उसे नागवार गुजरा था. भगत को देखा तो उधर मुंह कर लिया. सोचा कि झाड़ू से मारने पर दोष होता है. तब तक भाई बोला— आज फिर बवाल हो गया.
इतना सुनते ही पत्नी ने आव देखा न ताव, लेकर झाड़ू पिल पड़ी. भगत सनाका खा गया. बोला— यह क्या है? कोई संस्कार सीख कर नहीं आई बाप के घर से, पति पर हाथ छोड़ती है.
पत्नी जोर से चिल्लाई— तू बड़ा संस्कारी है, हमको टीवी पर बकरी बना के आया है. जा अपनी मां को गाय बना ले और बैल को बाप. हमको बकरी सकरी बोला तो कर दूंगी मुकदमा. अपने अम्मा के साथ जेल की रोटी तोड़ना. करमजला! मुंहझौंसा!
भगत भाई भागकर घर से बाहर आए और चारपाई पर गिरते हुए सोचा— साला बुरे फंसे. उधर टीवी पर वामियों ने धोया, इधर घर आकर कामिनी ने धोया. अब नहीं जाऊंगा.
आगे की बकरी कथा अभी जारी है.

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

किस्सा-ए-गोरक्षा उर्फ गाय पर चर्चा

आज सुबह सुबह गोरक्षा दल के एक सिपाही से गाली खाकर अपने एक भूतपूर्व मित्र की याद ताजा हो गई. एक महीने पहले की दुर्घटना है जब मेरा वह मित्र शहीद हो गया था.
हुआ यह कि दिल्ली चुनाव में धुलाई हो जाने के बाद संस्कारवान कुनबा कनफ्यूजनात्म अवस्था को प्राप्त हो गया. राम मंदिर में जो निवेश आडवाणी जी ने किया था, वह अब दुहने के काबिल नहीं बचा था. तो कुनबे को अचानक गाय की याद आ गई. गाय दुधारू जानवर तो है ही, सियासत में भी उसे दुहा जा सकता है, जहां दूध की जगह वोट निकलता है.
तो दिल्ली चुनाव के बाद और बिहार चुनाव के पहले उक्त मित्र भूतपूर्व हो गए, क्योंकि वे गोरक्षा के लिए शहादत को तैयार थे.
उनके शहादत की कहानी भी बड़ी मारू है. ऐसे ही एक दिन उनके गायात्मक भावुक उच्छवास के दौरान उनसे पूछ लिया कि मित्र आपने कभी गाय पाली है? कभी पूजा पतिंगा किया है या ऐसे ही भावुक हुए जा रहे हैं? वे तुनक कर बोले— तुम सब वामपंथी लोग देशद्रोही हो. मैंने कहा, हम वामपंथी कैसे हुए? और हम लोग कौन? मैं तो तुम्हारे साथ हूं और तुमको माइनस कर दिया जाए तो अकेला हूं.
तो बोले— तुम लोग मतलब रवीश कुमार वगैरह! तुम सब देशद्रोही हो. अब देशद्रोहियों का सफाया ही एकमात्र चारा है. मैं चकरायमान हो गया. गाय पर चर्चा के दौरान रवीश कुमार, देशद्रोह और सफाये का प्रवेश अवांछनीय था.
उसने आगे कहा, जो गाय नहीं पालता, वह भी दूध पीता है न! उसी तरह जो गाय नहीं पालता, उसे भी तो गाय की रक्षा करने का हक है! कभी गाय पाली नहीं है तो क्या हुआ, यूट्यूब पर तो देखी है! गाय हमारी माता है. गाय पर देवता रहते हैं.
मैंने माहौल सेंसेटिव देखा तो तुम से आप पर आ गया. मेरा मित्र आहतातुर हो गया था. मामला बढ़ने पर वह हत हो सकता था. इसलिए संभलकर मैंने पूछा— जो यूट्यूब वाली गाय आपकी माता है, वह जानवर है जो लावारिस अवस्था में घूमता पाया जाता है और कूड़ा भी खाता है! आप उसे ऐसे नारकीय हालत में कैसे छोड़ देते हैं? गाय पर देवता रहते हैं तो गाय को रस्सी से छांदकर, डंडे से मारकर दुहते हैं, उसके बच्चे यानी आपके भाई के हिस्से का दूध निकाल लेते हैं, उसे कुपोषित बना देते हैं, बच्चा मर जाता है तो इंजेक्शन लगाकर गाय को दुहते हैं. माता के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार होता है. उस पर वास करने वाले देवता भी लगता है सोमरस पीकर मगन रहते हैं. गाय की पीठ पर पड़ने वाला डंडा उनको भी तो लगता होगा. बेचारे क्रिया की प्रतिक्रया नहीं देते, वरना तीन चार हजार कपूतों को तो यूं ही निपटा देते.
दोस्त उखड़ गया. तुम लोग मुसलमानों के कोठे के दलाल हो. मुसलमान गाय खाता है. मुसलमान देशद्रोही है. तुम लोग उनका साथ देते हो. तुम लोग भी देशद्रोही हो. धर्म के नाम पर कलंक हो. मुसलमान आतंकवादी होता है. उसे सबक सिखाना होगा. जो गाय मारता है, उसको काट दिया जाएगा.
मेरी घिग्घी, जहां कहीं होती होगी, वहीं बंध गई. मैंने धीरे से पूछा— मेरे भाई, लेकिन जीव हत्या भी तो पाप है! और गाय पर रहने वाला देवताओं ने आपको कमांडो नियुक्त किया है क्या कि मेरी और गो माता की रक्षा करो? हमारा धरम कहता है कि ईश्वर की मर्जी से पत्ता भी नहीं हिलता. हो सकता है कि ईश्वर की मर्जी हो कि मुसलमान गोमांस खाता हो. उसको उसके कर्म का फल मिलेगा...
वह गुस्से में एकदम तपतपायमान अवस्था में पहुंच गया था, कांपते हुए वह बोला— एक मुल्ले ने अपनी बेटी को दुपट्टा नहीं लेने के लिए मार डाला. आईएसआईएस वाले सबको मार रहे हैं. हिंदुओं पर खतरा है...
उसके बात बदलने से मुझे लगा कि कुछ बात बनेगी. मैंने कहा, मेरे दोस्त, आईएसआईएस वाले मुसलमानों का ही रक्तपान कर रहे हैं, वह भी अरब में, तो हिंदुओं पर खतरा कैसे हो गया? और आप किसी इंसान को मारेंगे तो पाप लगेगा. फिर यमराज आपको ले जाएगा और खौलते तेल से भरे कड़ाहे में आपका पकौड़ा तल देगा. यार तुम तो समझदार आदमी हो. इहलोक को नरक बनाने से परलोक का कैसा संबंध है?
वह फुफकारीय अवस्था में फेचकुर छोड़ते हुए बोला— तुम पक्के वामपंथी हो, तुम देशद्रोही हो. तुम सबकी आत्मा रूस में बसती है. तुम सब भारत के लिए खतरा हो...
इस छोटी सी गाय पर चर्चा में रवीश, देशद्रोह, सफाये के बाद यूट्यूब, देवता, मुसलमान, आईएसआईएस, वामपंथ और रूस के अनधिकृत प्रवेश से मैं सनाका खा गया. सारे तर्क तेल लेने चले गए और मैं अपने घर चला गया.
इस तरह मेरा एक अभूतपूर्व मित्र भूतपूर्व हो गया.

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

गांधी के नाम पर भी झूठ?

राकेश सिन्हा नाम के एक व्यक्ति संघ विचारक के तौर पर टीवी चैनल पर आते हैं. बरखा दत्त के साथ डिबेट में कह रहे थे कि गांधी बूचड़खाने बंद करने के समर्थक थे. मनीष तिवारी ने गांधी का बयान पढ़कर सुनाया तो राकेश सिन्हा पूछ रहे थे कि ऐसा गांधी ने कहां पर कहा है? यह गलत बयान है. अब या तो उन्होंने गांधी को कभी नहीं पढ़ा या फिर राष्ट्रवाद की तरह गांधी का भी धूर्ततापूर्ण इस्तेमाल करना चाहते हैं. गांधी ने ऐसा कहा है और बार बार कहा है. गांधी ने धर्म को भले हमेशा ऊपर रखा हो, लेकिन गांधी ने कभी इंसान की हत्या की वकालत नहीं की, बल्कि यह कहा कि मैं गाय को मर जाने दूंगा लेकिन इंसान को बचाउंगा. राकेश सिन्हा को गांधी वांग्मय पढ़ना चाहिए और यह समझना चाहिए कि बाकी लोग जो गांधी के नाम का नारा नहीं लगाते, वे भी गांधी को पढ़ते हैं. उनको भी पढ़ना चाहिए और घृणापूर्ण विचारों का प्रसार नहीं करना चाहिए. ऐसा करना आइडिया आॅफ इंडिया के खिलाफ तो है ही, देश के संविधान के भी खिलाफ है. संघ परिवारी जनों को वेद पुराण और उपनिषद छोड़कर पहले संविधान पढ़ना चाहिए.
गांधी के गोरक्षा के बारे में विचार यहां दे रहा हूं. एक हिस्सा मेरे सपनों का भारत से है जो उन्होंने यंग ​इंडिया में लिखा था और दूसरा हिस्सा उनकी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज से है.

''मैं फिर से इस बात पर जोर देता हूं कि... कानून बनाकर गोवध बंद करने से गोरक्षा नहीं हो जाती. वह तो गोरक्षा के काम का छोटे से छोटा भाग है.... लोग ऐसा मानते दीखते हैं कि किसी भी बुराई के विरुद्ध कोई कानून बना कि तुरंत वह किसी झंझट के बिना मिट जाएगी. ऐसी भयंकर आत्म—वंचना और कोई नहीं हो सकती. किसी दुष्ट बुद्धि वाले अज्ञानी या छोटे से समाज के खिलाफ कानून बनाया जाता है और उसका असर भी होता है. लेकिन जिस कानून के विरुद्ध समझदार और संगठित लोकमत हो, या धर्म के बहाने छोटे से छोटे मंडल का भी विरोध हो, वह कानून सफल नहीं हो सकता.''
यंग इंडिया, 07.07.1927 से संग्रहीत, मेरे सपनों का भारत, पेज नंबर 137, प्रकाशक— नवजीवन ट्रस्ट


''मैं ख़ुद गाय को पूजता हूं यानी मान देता हूं. गाय हिंदुस्तान की रक्षा करने वाली है, क्योंकि उसकी संतान पर हिंदुस्तान का, जो खेती प्रधान देश है, आधार है. गाय कई तरह से उपयोगी जानवर है. वह उपयोगी जानवर है इसे मुसलमान भाई भी कबूल करेंगे. लेकिन जैसे मैं गाय को पूजता हूं, वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं. जैसे गाय उपयोगी है वैसे ही मनुष्य भी फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिंदू, उपयोगी है.
तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा? क्या मैं उसे मारूंगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान और गाय दोनों का दुश्मन हो जाऊंगा. इसलिए मैं कहूंगा कि गाय की रक्षा करने का एक ही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिए और उसे देश की ख़ातिर गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए.
अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं है. अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती है तो अपनी जान दे देनी चाहिए, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए. यही धार्मिक क़ानून है, ऐसा मैं तो मानता हूं.
हां और नहीं के बीच हमेशा बैर रहता है. अगर मैं वाद-विवाद करूंगा तो मुसलमान भी वाद विवाद करेगा. अगर मैं टेढ़ा बनूंगा, तो वह भी टेढ़ा बनेगा. अगर मैं बालिस्त भर नमूंगा तो वह हाथ भर नमेगा और अगर वह नहीं भी नमे तो मेरा नमना ग़लत नहीं कहलाएगा.
जब हमने ज़िद की तो गोकशी बढ़ी. मेरी राय है कि गोरक्षा प्रचारिणी सभा गोवध प्रचारिणी सभा मानी जानी चाहिए. ऐसी सभा का होना हमारे लिए बदनामी की बात है. जब गाय की रक्षा करना हम भूल गए तब ऐसी सभा की जरूरत पड़ी होगी.
मेरा भाई गाय को मारने दौड़े तो उसके साथ मैं कैसा बरताव करूंगा? उसे मारूंगा या उसके पैरों में पड़ूंगा? अगर आप कहें कि मुझे उसके पांव पड़ना चाहिए तो मुसलमान भाई के पांव भी पड़ना चाहिए. गाय को दुख देकर हिंदू गाय का वध करता है; इससे गाय को कौन छुड़ाता है? जो हिंदू गाय की औलाद को पैना भोंकता है; उस हिंदू को कौन समझाता है? इससे हमारे एक राष्ट्र होने में कोई रुकावट नहीं आई है.
अंत में, हिंदू अहिंसक और मुसलमान हिंसक है, यह बात अगर सही हो तो अहिंसा का धर्म क्या है? अहिंसक को आदमी की हिंसा करनी चाहिए, ऐसा कहीं लिखा नहीं है. अहिंसक के लिए तो राह सीधी है. उसे एक को बचाने के लिए दूसरे की हिंसा करनी ही नहीं चाहिए. उसे तो मात्र चरणवंदना करनी चाहिए. सिर्फ समझाने का काम करना चाहिए. इसी में उसका पुरुषार्थ है.''
हिंद स्वराज, पेज नंबर 32 से 34, प्रकाशक—नवजीवन ट्रस्ट 

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

सबसे बड़े बीफ निर्यातक का शाकाहार

भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक है. दूसरे नंबर पर ब्राजील, तीसरे पर आॅस्ट्रेलिया है. भारत अकेले दुनिया भर का 23 प्रतिशत बीफ निर्यात करता है. एक साल में यह निर्यात 20.8 प्रतिशत बढ़ा है. भारत, ब्राजील, आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका द्वारा 2015 में एक मिलियन मैट्रिक टन यानी एक अरब किलो बीफ निर्यात करने की योजना है. अकेले भारत और ब्राजील दुनिया के कुल बीफ निर्यात का 43 प्रतिशत सप्लाई करेंगे. पोर्क और पोल्ट्री के बाद बीफ तीसरे नंबर का मांसाहार है, जिसकी दुनिया भर में मांग है. भारत ने पिछले साल 2082 हजार मैट्रिक टन बीफ का निर्यात किया. भारत की छह प्रमुख गोश्त निर्यात करने वाली कंपनियों में से चार के प्रमुख हिंदू हैं. केंद्र में हिंदूवादी सरकार है जिसका मातृ संगठन आरएसएस गोहत्या के खिलाफ तलवारें खींचे खड़ा रहता है. जब एक व्यक्ति को घर से खींच कर इसलिए मार दिया जाता है कि उसके गोमांस खाने की अफवाह उड़ी थी, जब रांची को इसलिए दंगे की आग जला रही है कि किसी धर्मस्थल के सामने मांस का टुकड़ा मिला था, आपको इस शाकाहारी नारे वाली जन्नत की हकीकत मालूम होनी चाहिए.

द हिंदू अखबार लिखता है कि यूएस डिपार्टमेंट आॅफ एग्रीकल्चर की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश है. हालांकि, यह ध्यान रखना चाहिए कि यूएस सरकार बीफ में भैंस का मांस भी शामिल करती है. यानी बीफ मतलब गाय, बैल और भैंस का मांस. इस आंकड़े के मुताबिक, भारत ने 2015 वित्त वर्ष में 2.4 मिलियन टन बीफ निर्यात किया, जबकि ब्राजील ने 2 मिलियन टन और आॅस्ट्रेलिया ने 1.5 मिलियन टन. यह तीनों देश मिलकर दुनिया का 58.7 प्रतिशत बीफ सप्लाई करते हैं.
आईबीएन 7 के मुताबिक, बीते चार साल में भारत में बीफ यानी गोवंश और भैंस के मीट की खपत में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. 2011 में बीफ की खपत 20.4 लाख टन थी, जो 2014 में बढ़कर 22.5 लाख टन हो गई है. भारत ने पिछले वर्ष 19.5 लाख टन बीफ का निर्यात किया. मार्च 2015 के आंकड़ों के हिसाब से, पिछले छह महीने में बीफ निर्यात में 15.58 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है.
2006 में कराए गए एक सर्वे के मुताबिक, भारत की 60 प्रतिशत आबादी मांसाहारी है. The Hindu’s analysis of data from the 2011-12 National Sample Survey के मुताबिक, चार प्रतिशत ग्रामीण और पांच प्रतिशत शहरी भारतीय बीफ खाते हैं.
महाराष्ट्र, ओडिशा, हरियाणा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, राजस्थान, पंजाब, पुड्डुचेरी, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, दिल्ली और बिहार में गौ-हत्या पर प्रतिबंध है. 8 राज्यों में आंशिक प्रतिबंध हैं, ये राज्य हैं- बिहार, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा और चार केंद्र शासित राज्यों, दमन और दीव, दादर और नागर हवेली, पांडिचेरी, अंडमान ओर निकोबार. दस राज्यों, केरल, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम और एक केंद्र शासित राज्य लक्षद्वीप में गो-हत्या पर कोई प्रतिबंध नहीं है. असम और पश्चिम बंगाल में 14 साल से अधिक उम्र की गाय, बैल व भैंस को मारकर उनका मांस खाने की इजाजत है लेकिन उसके लिए 'फिट फॉर स्लॉटर' की सर्टिफिकेट लेना जरूरी है.
नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बनने के लिए चुनाव प्रचार कर रहे थे तो मांस निर्यात पर बड़े चिंतित थे. अपनी एक चुनावी सभा में उन्होंने कहा था, ''...और इसलिए दिल्ली में बहती हुई सरकार का सपना है कि हम हिंदुस्तान में पिंक रेबोल्यूशन करेंगे और पूरे विश्व में मांस-मटन का एक्सपोर्ट का बिजनेस करेंगे और स्वंय इस वर्ष भारत सरकार ने घोषित किया है, पूरे विश्व में बीफ एक्सपोर्ट में हिंदुस्तान नंबर वन है. किन चीजों के लिए गर्व किया जा रहा है भाईयो और बहनों आपका कलेजा रो रहा या नहीं मुझे मालुम नहीं, मेरा कलेजा चीख-चीख कर पुकार रहा है.''
दादरी में गोमांस खाने की अफवाह पर तमाम लोगों की भीड़ ने अखलाक के घर में घुसकर उसकी हत्या कर दी. मंदिर मस्जिद के सामने मांस के टुकड़े मिलने पर रांची को दंगे की आग में झोंक दिया गया. दिल्ली चुनाव के करीब यहां भी ऐसे प्रयास हुए थे. तो क्या पिंक रिवोल्युशन पर प्रधानमंत्री का दिल इसीलिए रो रहा था कि गोमांस और गोहत्या पर तनाव फैले? मांस निर्यात तो वे लगातार बढ़ा रहे हैं, तो देश में बीफ खाने वालों पर इस कदर बवाल क्यों हो रहा है? महाराष्ट्र में जैन पर्व के दौरान शिवसेना का उपद्रव और जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट द्वारा प्रतिबंध लगाने पर भाजपा विधायक द्वारा बीफ पार्टी देने की घोषणा भी ध्यान में रखिए. फिर इसका मकसद साफ होता है कि मांसाहार और शाकाहार पर लोगों को एकदूसरे से लड़ाना ही प्रमुख लक्ष्य है. वरना सरकार सबसे पहले मांस निर्यात रोकती, जिसने बासमती चावल के निर्यात को पीछे छोड़ दिया.
जिस देश की सरकार दुनिया भर को सबसे ज्यादा बीफ खिला रही है, वहां पर एक आदमी के बारे में अफवाह फैलाई जाती है कि वह बीफ खाता है और उसे घर से खींचकर पीटपीट कर मार दिया जाता है. ऐसा करने वाले उस पार्टी और संगठन के समर्थक हैं, जिसकी केंद्र में सरकार है और वह दुनिया भर में सबसे ज्यादा बीफ निर्यात कर रही है. भाजपा के लिए गाय राममंदिर की कैटेगरी का एक मुद्दा है, जिसे वह भुनाना चाहती है. उसे मंदिर नहीं बनवाना था, लोगों को लड़ाना था तो 25 सालों तक लड़ाया. जब वह मुद्दा उतना उकसाने वाला नहीं रहा तो अब गाय मुद्दा है. भाजपा बीफ निर्यात का कीर्तिमान भी बनाएगी और देशवासियों को लड़ाएगी भी. मूर्ख हम और आप हैं.

अब आप तय कीजिए कि आप क्या चाहते हैं और आपकी सरकार क्या चाहती है? दोनों की चाहना से अलग यह भी ध्यान में रखिए कि किसी की खाने पीने की आदत या पसंद पर आप लगाम लगाने वाले आप कौन होते हैं? इस पर भी सोचिए कि एक आदमी की जान की कीमत ज्यादा है या एक जानवर की. जानवर के लिए जान लेने पर उतारू लोग जानवर से कितने कम हैं?

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...