शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

मूर्ख ज़िंदा हैं तब तक शातिर राज करेगा

एक बहुत बड़े महापुरुष की शोक सभा में शामिल मंत्री का ठहाका टीवी पर देखकर घर से निकला ही था कि सुबह सुबह एक पहुंचे हुए बाबा जी मिल गए. सज धज कर, त्रिपुंड लगाकर, गेरुआ पहनकर तैयार होकर पवन वेग से चले जा रहे थे. हमने पूछा, बाबा जी एतना सबेरे सबेरे कहां? बाबा बोले- बच्चा जा रहा हूं दुनिया को बेवकूफ बनाकर व्यौपार करने का नुस्खा देखने. व्यौपार का नुस्खा सुनकर मुझ बेरोजगार के कान खड़े हो गए. हमने तनिक उत्साह से पूछा, बाबा क्या यह नुस्खा कहीं सिखाया जाता है? बाबा बोले, नहीं बच्चा, यह सिखाया दिखाया नहीं जाता. यह अमल में लाया जाता है. जैसे जादूगर हाथ की सफाई दिखाकर लोगों को करतब दिखाता है, वैसे सियासत के जादूगर भी हाथ की सफाई दिखाकर लोगों को करतब दिखाते हैं. मैं अधम संन्यासी वह करतब देखना चाहता हूं कि खून में व्यापार होने का दावा करने वाले सियासतदां किसी महापुरुष की तिजारत कैसे करते हैं?

यह तिजारत जैसा भारी भरकम शब्द मेरी समझ में नहीं आया. मैंने पूछा, बाबा अब यह महापुरुष की तिजारत क्या बला है? बाबा बोले, बच्चा तू तो एकदम नादान है. लगता है जी न्यूज नहीं देखता. इसलिए कम होशियार है. जब किसी गुजर चुके महापुरुष का यश, उसका नाम, उसका काम और यहां तक कि मृत्यु के बाद उसकी अस्थि भस्म तक को भुनाया जाए तो यह हुआ व्यौपार, मतलब तिजारत. मैं वही देखने जा रहा हूं कि अटल बिहारी वाजपेयी नामक हिंदू महापुरुष को मरणोपरांत कैसे सियासत के बाजार में उतारा गया!
मैंने सुबह ही 'हिंदू हृदय सम्राट' अखबार पढ़ा था. पढ़कर संतुष्ट हो गया था, सो उनसे पूछ बैठा, बाबा, लेकिन मरने के बाद अस्थियां गंगा में विसर्जित करने की परंपरा है. वही तो हो रहा है. इसमें गलत क्या है?
बाबा बोले, अरे मूढ़ बालक, अस्थियां गंगा में विसर्जित करने की परंपरा है. सरजू या यमुना में भी हो सकती हैं, लेकिन टेढ़िया नदी, सुरसुरी नदी, खुखरी नदी, मोतिया नदी और जो नदी मर चुकी है, जिसकी अपनी धारा ही नहीं बची है और शहर वालों के गुह से भरी है, उसमें अस्थि विसर्जन का भव्य आजोयन तो किसी विशेष प्रायोजन से ही होगा न? यह धार्मिक परंपरा तो नहीं है.
दूसरी बात बच्चा, अस्थि विसर्जन तो परिवार के लोग करते हैं. ठहाके लगाते मंत्री, मसखरी करते कार्यकर्ताओं, राजनीति करते नेता और सनाका खाती जनता को अस्थि विसर्जन करते देखना और परिवार वालों का सभा में उपेक्षित होकर लौट आने का रहस्य मैं समझना चाहता हूं.
मेरी जिज्ञासा ने उड़ान भरी— लेकिन बाबा अटल जी की पार्टी तो धर्म की रक्षक है. जबसे विकास हेरा गया है, राफेल घोटाला हो गया, नीरव और मेहुल स्मार्ट सिटी से एंटीगा हो गया, तब से वे लगातार कह रहे हैं धर्म खतरे में है. तो वे तो धर्मसम्मत काम ही करेंगे.
अस्थि विसर्जन में शामिल मंत्री के अंदाज में ही बाबा ने ठहाका लगाया और बोले, बस बच्चा, यही तो तुझे समझाना चाह रहा हूं. धर्म के खतरे में होने की बात धर्म का व्यौपार है और यह अस्थि विसर्जन कर्ता और उसके कर्म का व्यौपार है. धर्म को खतरा किससे है? मृत की व्यक्ति की अस्थियों को मोक्ष के लिए गंगा में न बहाकर सियासत के घिनौने कुंड में डाल देना ही असली अधर्म है.
बाबा ने बीन बजाते सपेरे की तरह सांस चढ़ाई और आगे बोले, बेटा मैं बूढ़ा हो गया हूं. मैंने जिन्ना से लेकर दिल्ली वाले खन्ना तक को देखा है. जब कोई कहे कि धर्म से खतरा है तो समझ लो कि खतरा उस व्यक्ति के रूप में हमारे सामने है. यही वह अधम प्राणी है जो हमारी आस्था को लंगी लगाएगा और अंत में हमें मूरख बनाकर हमारा फायदा उठाएगा. धर्म नश्वर नहीं है, धर्म आस्था संबंधी विचार है. धर्म के खतरे में होने की बात भौतिक फायदे का मायाजाल है. यह मायाजाल ही मैं समझना चाह रहा हूं, इसलिए विसर्जन समारोह में जा रहा हूं.
मैंने गीता के कम से कम दो तीन श्लोक पढ़ रखे थे. मैं अपने आप को बाबा से कम ज्ञानी कैसे समझता? मैंने अपना ज्ञान ठेलते हुए कहा, बाबा लेकिन मनुष्य तो परमात्मा का अंश है. आत्मा अमर. फिर कोई अधम मृत व्यक्ति की तिजारत कैसे कर सकता है?
बाबा एक कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए बोले, बच्चा, जब तक तुझ जैसे मूढ़ जिंदा हैं तब तक शातिर इस देश में राज करता रहेगा. अरे आत्मा अमर है, मानव की पकड़ से दूर है, लेकिन सियासत के दलदल में धंसा व्यक्ति सबसे क्रूर है. वह आत्मा को नहीं पकड़ पाएगा तो आत्मा से छूटा शरीर धर दबोचेगा. दबोचकर उसका जलसा मनाएगा, जुलूस निकालेगा. उसकी कला समझो, वह बालू से तेल निकालेगा. प्रकृति के महाविनाश में फंसे लाखों लोगों को मरने के लिए छोड़ देगा और देश का खजाना जलसे और नुमाइश के लिए खोल देगा.
बाबा ने सुरती निकाली, मलते हुए बोले, बच्चा आपने वह पंक्ति सुनी होगी कि जर्मन शासक कहते थे कि ​जनता को रोटी नहीं दे सकते तो सर्कस दो. अब सर्कस का तो जमाना न रहा, सो हुतात्माओं ने मृतात्मा को पकड़ कर सर्कस दिखाना शुरू कर दिया है. यह सर्कस महीनों चलेगा और तू भूखा, बेराजगार, बेकार ऐसे ही सर्कस के बारे में सरसरी जानकारी बटोरता घूमता रहेगा. जा जाकर सर्कस देख. मैं चला, मुझे अतिशत विलंब हो रहा है.
बाबा ने सुरती मलने का महाउपक्रम पूरा करते हुए ताल ठोंकी, गर्दा उड़ाया, सुरती मुंह में प्रक्षेपित की और मुझे छींकने के लिए छोड़कर छिटकते फुदकते हुए आगे बढ़ गए.

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