यह ज्ञान, सूचना और तकनीक का युग है. जिनका इनपर कब्जा है, वे दुनिया की अगुआई कर रहे हैं. जो इनसे
वंचित हैं वे विकासशील अथवा तीसरी दुनिया के देश हैं. अब तलवार से और संख्याबल से सत्ता नहीं मिलती. ऐसा मध्ययुग में होता था. दुनिया के सबसे युवा देश के करोड़ों बच्चों के हाथ में मोबाइल पकड़ाकर, मुफ्त में डेटा देकर उन्हें फर्जी खबरों और झूठी सूचनाओं के ब्लैकहोल में कुदा दिया गया है. दिन भर लोग बहस करते हैं कि नेहरू कितने हिंदू विरोधी थे, या गांधी कितने दुश्चरित्र.
मीडिया के नाक में नकेल यह तय करती है कि इस पीढ़ी में यह चर्चा न होने पाए कि दुनिया के विकसित देश कहां हैं और हम कहां हैं. इस देश के बच्चों को सिखाया जा रहा है कि बाबर-अकबर से लेकर गांधी-नेहरू तक आपके दुश्मन हैं. उनसे हिसाब बराबर करना है. युवाओं को यह तक नहीं सोचने दिया जा रहा है कि इन लोगों से बदला लेने के लिए हमको भी मरना पड़ेगा क्योंकि वे बहुत पहले मर चुके हैं.
जिस इतिहास से हमें सबक लेना था, हम उसकी गंदगी और दलदल में कूदने की प्रतियोगिता कर रहे हैं. हम मध्ययुगीन बर्बरता के कीचड़ में धंस जाने के लिए अतीत की ओर लौट पड़े हैं.
एक घटना पर गौर करें. चार बड़े लेखकों को उनके विचार और लेखन के कारण मार दिया गया. वे तर्कवादी, प्रगतिशील और आधुनिक विचारों के लोग थे. इसके विरोध में लेखक समुदाय ने विरोध किया और पुरस्कार लौटाए. उन्हें अवार्ड वापसी गैंग, आजादी गैंग, अफजलप्रेमी गैंग, पाकिस्तानी आदि कहा गया. अब जब सरकार की एजेंसियां कह रही हैं कि कट्टर हिंदू संगठन के लोगों ने इन्हें मारा. उनकी धरपकड़ हो रही, चार्जशीट लग रही, लेकिन सन्नाटा है. जो अवार्ड वापस करके विरोध करने को बड़े बड़े बुद्धिजीवियों का उपहास कर रहे थे, वे हिंदुओं के नाम पर इस आतंक की निंदा तक नहीं कर रहे हैं.
इससे साफ है कि आपको अपने लेखकों, दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों से नहीं, आपको धार्मिक कट्टरता और पाकिस्तान से बहुत प्रेम है. हर असहमति को पाकिस्तानी बताना आपको उसी की तरह बना रहा है. यह हिंदू जनता को तय करना है कि उन्हें अपनी हजारों साल पुरानी उदार संस्कृति चाहिए या हिंदुत्व नाम की कट्टर राजनीति. यह कुत्सित राजनीति हिंदुओं की विराट संस्कृति को तालिबान के समकक्ष लाकर खड़ा कर देगी. हिंदू धर्म में व्याप्त पाखंड और बुराइयों की आलोचना और सुधारों ने ही उसे बड़ा और उदार बनाया है. कट्टरता तुच्छ होती है, वह आपको संकुचित करेगी और दुनिया की निगाह में बर्बर साबित कर देगी.
बुरे को बुरा कहने वाले को धर्मद्रोही मत कहिए. कबीर कह गए हैं कि 'निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय'. आपके निंदक या आलोचक आपके विरोधी नहीं हैं. जो धर्म के नाम पर आपको गोलबंद करना चाहते हैं, जो धर्म के नाम राष्ट्र बनाने और दीगर धर्मों से आपको घृणा सिखाते हैं, वे अंतत: गोलबंद करके आपको कट्टरता के कुएं में धकेल देंगे, जहां से निकलने में आपको सदियां लगेंगी. आपको यही सोचने से रोका जा रहा है इसीलिए ऐसे लोग तैयार किए गए हैं जो तर्क और ज्ञान की बातें करने वाले का उपहास करें, उसकी हत्या कर दें और उन्माद का माहौल बनाएं.
भारत विश्वगुरु रहा होगा तो इतना कमअक्ल नहीं रहा होगा कि जबानी फेंके और आदमी की गर्दन पर हाथी का सिर ट्रांसप्लांट करवा दे. विश्व के इतिहास में उदार संस्कृतियों ने हमेशा विकास किया है और आज भी यह सत्य है.
पूंजीवाद का अगुआ वामपंथ का धुर विरोधी अमेरिका अपने वामपंथी विचारक को नोबल जैसे पुरस्कार दिलाता है, उनके नाम पर विभाग बनवाता है. उनसे अपनी नीतियों यहां तक कि युद्ध नीतियों की आलोचना करवाता है. वह दुनिया का सबसे ताकतवर देश है.
हमारे देश में तर्कवादी, प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच के लोगों की हत्या कर दी जाती है, उन्हें पाकिस्तानी और देशद्रोही कहा जाता है. मंत्री से लेकर चैनलिए तक उनका मजाक उड़ाते हैं. हम किसी को लिखने के लिए उसे जेल में डाल देते हैं, बोलने के लिए किसी की नौकरी ले लेते हैं. हम तीसरी दुनिया के विकासशील देशों में हैं जो मानव विकास सूचकांक में हमेशा नीचे से फर्स्ट आता है. अपनी इस हरकत के बावजूद हम विश्वगुरु बनने का दावा ठोंक रहे हैं.
बहुसंख्यकवाद और भीड़ की राजनीति करके हमें यह सोचने से रोका जा रहा है कि सड़कों पर तकरीर करने और तलवार भांजने का युग चला गया है. अब तकरीर कर रही लाखों की आबादी को इजराइल जैसे छोटे देश एक बटन दबाकर उड़ा देते हैं. जब दुनिया ब्रम्हांड के रहस्य खोज रही है, हमारा शासक हमसे कह रहा है कि नाली पर भगोना उलटकर चाय बना लो. आदमी की गर्दन पर हाथी का सिर ट्रांसप्लांट कर दो. वेदों से विमान निकाल लो. फूलों से विमान बना लो.
चाहे निजी जीवन हो, चाहे सामाजिक, क्या यह सच नहीं है कि हम अपने को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मान कर अपने साथ अन्याय करेंगे? स्वाभिमान और गौरव एक जरूरी चीज है, जो हर नागरिक में होनी चाहिए, लेकिन इतिहास के गर्त में कूद जाना और सबसे महान होने का नारा लगाना ऐतिहासिक मूर्खता से अधिक कुछ नहीं है. हमें मालूम है कि हमने अपनी बैलगाड़ी में टायर भी तब लगाया जब अंग्रेज हमें लूटकर रेलगाड़ियों में भरकर ब्रिटेन ले जा रहे थे. इतिहास किसी से नफरत करने के लिए नहीं होता. इतिहास हमेशा सबक सीखने के लिए होता है.
बड़ी संख्या में हमारे युवाओं को भीड़ में तब्दील कर दिया गया है. वे न्यायालय से बाहर शक के आधार पर लोगों की हत्याएं कर रहे हैं. ऐसे सैकड़ों केस हो चुके हैं. दोषी लोगों को केंद्रीय मंत्री माला पहनाकर उनका स्वागत कर रहे हैं. हमें यह सोचने से रोका जा रहा है कि 50-60 साल की आजादी की लड़ाई और लाखों की कुर्बानी के बाद मिले लोकतंत्र को हम भीड़ बनकर नष्ट कर रहे हैं. हमें लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक, उदार, और प्रगतिशील सोच से दूर किया जा रहा है ताकि हम भेड़ का ऐसा झुंड बन जाएं जिन्हें कोई एक सत्ता का लालची अपने इशारा पर चराता फिरे.
वंचित हैं वे विकासशील अथवा तीसरी दुनिया के देश हैं. अब तलवार से और संख्याबल से सत्ता नहीं मिलती. ऐसा मध्ययुग में होता था. दुनिया के सबसे युवा देश के करोड़ों बच्चों के हाथ में मोबाइल पकड़ाकर, मुफ्त में डेटा देकर उन्हें फर्जी खबरों और झूठी सूचनाओं के ब्लैकहोल में कुदा दिया गया है. दिन भर लोग बहस करते हैं कि नेहरू कितने हिंदू विरोधी थे, या गांधी कितने दुश्चरित्र.
मीडिया के नाक में नकेल यह तय करती है कि इस पीढ़ी में यह चर्चा न होने पाए कि दुनिया के विकसित देश कहां हैं और हम कहां हैं. इस देश के बच्चों को सिखाया जा रहा है कि बाबर-अकबर से लेकर गांधी-नेहरू तक आपके दुश्मन हैं. उनसे हिसाब बराबर करना है. युवाओं को यह तक नहीं सोचने दिया जा रहा है कि इन लोगों से बदला लेने के लिए हमको भी मरना पड़ेगा क्योंकि वे बहुत पहले मर चुके हैं.
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एक घटना पर गौर करें. चार बड़े लेखकों को उनके विचार और लेखन के कारण मार दिया गया. वे तर्कवादी, प्रगतिशील और आधुनिक विचारों के लोग थे. इसके विरोध में लेखक समुदाय ने विरोध किया और पुरस्कार लौटाए. उन्हें अवार्ड वापसी गैंग, आजादी गैंग, अफजलप्रेमी गैंग, पाकिस्तानी आदि कहा गया. अब जब सरकार की एजेंसियां कह रही हैं कि कट्टर हिंदू संगठन के लोगों ने इन्हें मारा. उनकी धरपकड़ हो रही, चार्जशीट लग रही, लेकिन सन्नाटा है. जो अवार्ड वापस करके विरोध करने को बड़े बड़े बुद्धिजीवियों का उपहास कर रहे थे, वे हिंदुओं के नाम पर इस आतंक की निंदा तक नहीं कर रहे हैं.
इससे साफ है कि आपको अपने लेखकों, दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों से नहीं, आपको धार्मिक कट्टरता और पाकिस्तान से बहुत प्रेम है. हर असहमति को पाकिस्तानी बताना आपको उसी की तरह बना रहा है. यह हिंदू जनता को तय करना है कि उन्हें अपनी हजारों साल पुरानी उदार संस्कृति चाहिए या हिंदुत्व नाम की कट्टर राजनीति. यह कुत्सित राजनीति हिंदुओं की विराट संस्कृति को तालिबान के समकक्ष लाकर खड़ा कर देगी. हिंदू धर्म में व्याप्त पाखंड और बुराइयों की आलोचना और सुधारों ने ही उसे बड़ा और उदार बनाया है. कट्टरता तुच्छ होती है, वह आपको संकुचित करेगी और दुनिया की निगाह में बर्बर साबित कर देगी.
बुरे को बुरा कहने वाले को धर्मद्रोही मत कहिए. कबीर कह गए हैं कि 'निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय'. आपके निंदक या आलोचक आपके विरोधी नहीं हैं. जो धर्म के नाम पर आपको गोलबंद करना चाहते हैं, जो धर्म के नाम राष्ट्र बनाने और दीगर धर्मों से आपको घृणा सिखाते हैं, वे अंतत: गोलबंद करके आपको कट्टरता के कुएं में धकेल देंगे, जहां से निकलने में आपको सदियां लगेंगी. आपको यही सोचने से रोका जा रहा है इसीलिए ऐसे लोग तैयार किए गए हैं जो तर्क और ज्ञान की बातें करने वाले का उपहास करें, उसकी हत्या कर दें और उन्माद का माहौल बनाएं.
भारत विश्वगुरु रहा होगा तो इतना कमअक्ल नहीं रहा होगा कि जबानी फेंके और आदमी की गर्दन पर हाथी का सिर ट्रांसप्लांट करवा दे. विश्व के इतिहास में उदार संस्कृतियों ने हमेशा विकास किया है और आज भी यह सत्य है.
पूंजीवाद का अगुआ वामपंथ का धुर विरोधी अमेरिका अपने वामपंथी विचारक को नोबल जैसे पुरस्कार दिलाता है, उनके नाम पर विभाग बनवाता है. उनसे अपनी नीतियों यहां तक कि युद्ध नीतियों की आलोचना करवाता है. वह दुनिया का सबसे ताकतवर देश है.
हमारे देश में तर्कवादी, प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच के लोगों की हत्या कर दी जाती है, उन्हें पाकिस्तानी और देशद्रोही कहा जाता है. मंत्री से लेकर चैनलिए तक उनका मजाक उड़ाते हैं. हम किसी को लिखने के लिए उसे जेल में डाल देते हैं, बोलने के लिए किसी की नौकरी ले लेते हैं. हम तीसरी दुनिया के विकासशील देशों में हैं जो मानव विकास सूचकांक में हमेशा नीचे से फर्स्ट आता है. अपनी इस हरकत के बावजूद हम विश्वगुरु बनने का दावा ठोंक रहे हैं.
बहुसंख्यकवाद और भीड़ की राजनीति करके हमें यह सोचने से रोका जा रहा है कि सड़कों पर तकरीर करने और तलवार भांजने का युग चला गया है. अब तकरीर कर रही लाखों की आबादी को इजराइल जैसे छोटे देश एक बटन दबाकर उड़ा देते हैं. जब दुनिया ब्रम्हांड के रहस्य खोज रही है, हमारा शासक हमसे कह रहा है कि नाली पर भगोना उलटकर चाय बना लो. आदमी की गर्दन पर हाथी का सिर ट्रांसप्लांट कर दो. वेदों से विमान निकाल लो. फूलों से विमान बना लो.
चाहे निजी जीवन हो, चाहे सामाजिक, क्या यह सच नहीं है कि हम अपने को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मान कर अपने साथ अन्याय करेंगे? स्वाभिमान और गौरव एक जरूरी चीज है, जो हर नागरिक में होनी चाहिए, लेकिन इतिहास के गर्त में कूद जाना और सबसे महान होने का नारा लगाना ऐतिहासिक मूर्खता से अधिक कुछ नहीं है. हमें मालूम है कि हमने अपनी बैलगाड़ी में टायर भी तब लगाया जब अंग्रेज हमें लूटकर रेलगाड़ियों में भरकर ब्रिटेन ले जा रहे थे. इतिहास किसी से नफरत करने के लिए नहीं होता. इतिहास हमेशा सबक सीखने के लिए होता है.
बड़ी संख्या में हमारे युवाओं को भीड़ में तब्दील कर दिया गया है. वे न्यायालय से बाहर शक के आधार पर लोगों की हत्याएं कर रहे हैं. ऐसे सैकड़ों केस हो चुके हैं. दोषी लोगों को केंद्रीय मंत्री माला पहनाकर उनका स्वागत कर रहे हैं. हमें यह सोचने से रोका जा रहा है कि 50-60 साल की आजादी की लड़ाई और लाखों की कुर्बानी के बाद मिले लोकतंत्र को हम भीड़ बनकर नष्ट कर रहे हैं. हमें लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक, उदार, और प्रगतिशील सोच से दूर किया जा रहा है ताकि हम भेड़ का ऐसा झुंड बन जाएं जिन्हें कोई एक सत्ता का लालची अपने इशारा पर चराता फिरे.

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