मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

हिंदुस्तान किसानों का क़ब्रिस्तान क्यों बनता जा रहा है?

राज्य बनने के बाद तेलंगाना में 3000, मध्य प्रदेश में 21 दिन में 40, मराठवाड़ा में दो हफ़्ते में 42 और छत्तीसगढ़ में एक पखवाड़े में 12 किसानों ने आत्महत्या की है.

किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा बता पाना नामुमकिन है. हर रोज़ दर्जनों किसानों के आत्महत्या कर लेने की सूचनाएं आ रही हैं. हर दिन देश भर से इतनी सूचनाएं प्राप्त हो रही हैं कि यह किसी तबाही से कम नहीं है. इतनी आत्महत्या की सूचनाओं को लेखा-जोखा रख पाना नामुमकिन है.

पिछले कुछ दिनों में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान, पजांब और उत्तराखंड से दर्जनों किसानों के आत्महत्या करने की ख़बरें आई हैं. प्रदेश में जून महीने में ही आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 40 से ज़्यादा हो गई है. मीडिया रिपोर्ट्स के अलावा मध्य प्रदेश की विपक्षी पार्टी ने यह दावा किया है.

नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने दावा किया है कि जून महीने की शुरुआत से अब तक मध्य प्रदेश में 40 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. लेकिन राज्य सरकार किसानों के प्रति संवेदनहीन बनी हुई है.

राज्य के सीहोर, होशंगाबाद, रायसेन, धार, नीमच, छतरपुर, सागर, टीकमगढ़, रायसेन, बालाघाट, बडवानी, छिन्दवाडा, रतलाम, पन्ना, इंदौर, हरदा, देवास, खंडवा, शिवपुरी और विदिशा ज़िलों में किसानों की आत्महत्या की ख़बरें आईं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के गृह ज़िले सीहोर में छह किसानों ने आत्महत्या की है.

मध्य प्रदेश में क़र्ज़ में डूबे किसानों के आत्महत्या करने का सिलसिला थम नहीं रहा है. कई राज्यों के किसानों ने एक जून से दस जून तक आंदोलन किया था. इस दौरान छह जून को मध्य प्रदेश के मंदसौर में गोलीबारी में छह किसानों की मौत की घटना के बाद एक पखवाड़े के भीतर 26 किसानों ने आत्महत्या कर ली थी.

हर दिन दो से पांच आत्महत्याएं

मध्य प्रदेश में 29 जून को सीहोर और होशंगाबाद ज़िलों में दो किसानों ने ख़ुदकुशी कर ली. सीहोर के ईंटाखेड़ा गांव के मारिया आदिवासी (52) ने अपने खेत में पेड़ से फांसी लगाकर जान दे दी.

होशंगाबाद ज़िले में पिपरिया के सांडिया में गुलाब सिंह ने आत्महत्या कर ली. परिजनों के मुताबिक, उनकी 8 एकड़ जमीन पर 2 लाख का क़र्ज़ था, जिसे लगातार फसल ख़राब होने के चलते वे चुका पाने में असमर्थ थे.

28 जून को धार ज़िले में एक किसान मदनलाल ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली. मदनलाल के पुत्र मनोज का दावा है कि क़र्ज़ के चलते वे दबाव में थे, क्योंकि बैंक का क़र्ज़ चुकाने की हालत में नहीं थे. धार ज़िले में 27 और 28 जून के बीच दो किसानों ने आत्महत्या की है.

26 और 27 जून के बीच मध्य प्रदेश में क़र्ज़, सूदखोरों की प्रताड़ना और अन्य कारणों से परेशान होकर पांच और किसानों के आत्महत्या की ख़बर है.

27 जून को भरवेली, बालाघाट के रहने वाले एक किसान डालचंद ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली. डालचंद पर बैंक और सोसाइटी का तीन लाख का क़र्ज़ था. डालचंद के परिजनों ने उनकी मौत के बाद उनका शव सड़क पर रखकर प्रदर्शन किया.

डालचंद के परिजनों के मुताबिक, उन्होंने क़र्ज़ चुकाने की गरज से अपनी डेढ़ एकड़ ज़मीन बेची भी थी, फिर भी क़र्ज़ नहीं चुका पाए. उनके पास बैंक से लगातार फोन आ रहा था, सोसायटी ने उन्हें डिफाल्टर घोषित कर दिया था. इससे परेशान होकर डालचंद ने ख़ुदकुशी कर ली.

समाचार एजेंसी भाषा के मुताबिक, इंदौर ज़िले में क़र्ज़ के बोझ तले दबे 21 वर्षीय किसान ने सोमवार की रात कथित तौर पर ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली.

गांधी नगर पुलिस थाना के प्रभारी आरएस शक्तावत ने बताया कि जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर धरनावदा गांव में पवन केवट ने 26 जून देर रात कथित तौर पर ज़हर खा लिया. उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां जांच के बाद डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. उसकी तीन महीने पहले ही शादी हुई थी.

केवट या उसके पिता के नाम खेती की कोई ज़मीन नहीं है. हालांकि, उसने साल भर पहले एक व्यक्ति से बंटाई पर तीन बीघा ज़मीन लेकर इस पर खेती की थी. बंटाई का क़रार ख़त्म होने के बाद वह इन दिनों मज़दूरी कर रहा था.

पुलिस को शुरुआती जांच में पता चला कि केवट पर एक बैंक का कुछ क़र्ज़ था. पुलिस बैंक से इसकी जानकारी निकलवा रही है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के खंडवा जिले में हरसूद निवासी घिसिया खान (70) ने ईद की रात खेत के कुएं में कूदकर जान दे दी. मंगलवार को घिसिया का शव बरामद हुआ. उन्होंने एक ट्रैक्टर ख़रीदा था, जिसके लिए क़र्ज़ लिया था और क़र्ज़ नहीं चुका पा रहे थे.

प्रदेश के झाबुआ ज़िले के पारा चौकी के आदिवासी किसान जहू ने 26 जून को कीटनाशक पीकर जान दे दी. पुलिस का कहना है कि जहू के बेटे ने एक लड़की के साथ भागकर शादी की थी. पंचायत ने जहू को आदेश दिया था कि वह लड़की वालों को साढ़े चार लाख रुपये दहेज में दे. ज़मीन गिरवी रखने के बाद भी क़र्ज़ नहीं उतरा तो उन्होंने आत्महत्या कर ली.

देवास ज़िले की टोंकखुर्द तहसील के केसली गांव के रहने वाले किसान मनोहर सिंह ने भी ज़हर पीकर जान दे दी. उन पर पांच लाख रुपये का क़र्ज़ था.

रविवार को बुंदेलखंड क्षेत्र के टीकमगढ़ ज़िले में एक 65 वर्षीय किसान बारेलाल अहिरवार ने अपने खेत में पेड़ से लटक कर जान दे दी. हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, उनके बेटे चंद्रभान ने कहा कि उनके पिता ने स्थानीय सूदखोर से 45,000 का क़र्ज़ ले रखा था. लेकिन प्रशासन का कहना है कि अहिरवार मानसिक रूप से बीमार थे.

यह ध्यान रखने की बात है कि जितने किसानों ने आत्महत्या की है, हर मामले में मरने वाले किसानों के परिजन दावा कर रहे हैं कि उन्होंने क़र्ज़ के कारण ख़ुदकुशी की, जबकि लगभग हर मामले में प्रशासन का दावा इससे इतर है. प्रशासन लगातार यह मानने से इनकार करता रहा है कि किसान क़र्ज़ से ख़ुदकुशी कर रहे हैं.

पिछले हफ़्ते इसी क्षेत्र के पाली गांव के रघुवीर यादव ने अपने खेत में जाकर सल्फास खा लिया था और उनकी मौत हो गई थी. उनके पिता देशपत यादव के मुताबिक, उन पर दस लाख रुपये का क़र्ज़ था. लेकिन प्रशासन ने दावा किया कि रघुवीर ने पारिवारिक विवाद के चलते आत्महत्या की. स्थानीय लोगों का कहना है कि रघुवीर कॉन्ट्रैक्ट पर खेती करते थे और कई सालों से लगातार घाटे में चल रहे थे जिस कारण उन पर बहुत क़र्ज़ हो गया था.

पिछले 16 सालों में मध्य प्रदेश में 21,000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का कहना है कि इन आत्महत्याओं का कारण फसलों का बर्बाद होना, फसलों का उचित दाम न मिलना, क़र्ज़ न चुका पाना, क़र्ज़ चुकाने के लिए बैंकों और सूदखोरों का दबाव होना और कृषि से जुड़े अन्य कारण हैं.

उत्तर प्रदेश में झांसी के सीपरी बाजार थाना क्षेत्र के करारी गांव में एक किसान सीताराम (48) ने अपने खेत में फांसी लगा ली. 24 जून को उनका शव उनके खेत में एक पेड़ से लटका मिला. परिजनों ने बताया है कि कुछ दिन पहले सीताराम का ट्रैक्टर एक कार से टकरा गया था जिससे कार क्षतिग्रस्त हो गई थी. कार मालिक दंबगई करते हुए 20 हज़ार रुपये मांग रहे थे, लेकिन सीताराम के पास पैसे नहीं थे. दबंगों की धमकी से परेशान सीताराम ने आत्महत्या कर ली.

छत्तीसगढ़ में अंबिकापुर ज़िले के उलकिया गांव में सोमवार रात एक किसान फुलेश्वर पैकरा 40 ने फांसी लगा ली. उन्होंने खेती के लिए आदिम जाति सहकारी समिति से क़र्ज़ ले रखा था. पिछले कुछ दिन से वह क़र्ज़ जमा नहीं कर पाने के कारण मानसिक रूप से परेशान था. हालांकि, पुलिस ने क़र्ज़ के कारण आत्महत्या से इनकार किया है.

मराठवाड़ा में दो हफ़्ते में 42 किसानों ने आत्महत्या की

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में पिछले दो हफ़्ते में 42 किसानों ने आत्महत्या की है. औरंगाबाद डिवीजनल कमिश्नरेट, जो किसानों की आत्महत्या का लेखा-जोखा रखता है, के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, ‘इस साल जनवरी से 26 जून तक 445 किसानों ने आत्महत्या की है. एक जून से किसानों के आंदोलन के बाद महाराष्ट्र सरकार ने किसानों की क़र्ज़माफ़ी की घोषणा की थी. इसके बावजूद, महाराष्ट्र के आठ ज़िलों में किसानों ने आत्महत्या की. यहां पिछले दो हफ़्ते में 42 किसानों ने आत्महत्या कर ली. इसकी वजहें कृषि और क़र्ज़ से जुड़ी हैं.’

इस महीने 19 जून से 25 जून के बीच 19 किसानों ने आत्महत्या की. जबकि, 12 जनू से 18 जून के बीच 23 किसानों ने आत्महत्या की.

छत्तीसगढ़ में एक पखवाड़े में 12 किसानों ने दी जान

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में 27 जून को एक किसान फुलेश्वर पैकरा ने आत्महत्या कर ली. टाइम्स आॅफ इंडिया के मुताबिक, इसके साथ ही राज्य में एक पखवाड़े में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 11 हो गई है. विपक्षी दल कांग्रेस का कहना है कि राज्य में पिछले दस दिनों में 12 किसानों ने आत्महत्या कर ली है.

किसानों के प्रदर्शन के बाद धमतरी, राजनंदगांव, सरगुजा, दुर्ग, महासमुंद, कांकेर और कवर्धा जिलों में किसानों ने आत्महत्या की है.

पंजाब में भी 8 दिनों में एक दर्जन किसान आत्महत्याएं

किसानों का क़र्ज़ माफ़ करने की पंजाब सरकार की घोषणा के बाद से अब तक पंजाब में एक दर्जन किसानों ने आत्महत्या कर ली है. 19 जून को सरकार ने यह घोषणा की थी. इंडियन एक्सप्रेस अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक, 19 जून से 27 जून के बीच आठ दिनों के भीतर एक दर्जन किसानों ने ख़ुदकुशी कर ली. जितने किसानों ने ख़ुदकुशी की है उन सभी पर तीन से पांच लाख तक संस्थानिक या निजी क़र्ज़ था.

यह आंकड़ा किसान संगठन ने जुटाया है. राज्य में जितने किसानों ने आत्महत्या की है उनमें से चार मानसा ज़िले से हैं. मानसा के जोगा गांव के बूटा सिंह (44) ने 27 जून को अपने खेत में पेस्टिसाइड पी लिया था. उन पर 8.50 लाख का क़र्ज़ था. पंजाब में जून के पहले हफ़्ते में दस किसानों के आत्महत्या करने की ख़बरें आई थीं.

राजस्थान के हाड़ौती संभाग में पांच ख़ुदकुशी

राजस्थान के हाड़ौती संभाग में इस जून में ही पांच किसानों ने आत्महत्या की है. राजस्थान पत्रिका की एक ख़बर में कहा गया है कि ‘हाड़ौती के किसानों के लिए जून 2017 यमराज बनकर आया. अब तक संभाग में पांच किसान आत्महत्या कर चुके हैं.’

इन आत्महत्याओं का कारण गिरता लहसुन का दाम है. ‘मौजूदा भाव में बुवाई का ख़र्च़ भी नहीं निकल रहा जिससे परेशान होकर किसान आत्महत्या कर रहे हैं.

अख़बार ने लिखा है, ‘हाड़ौती में 3 जून को लहसुन के कम भाव मिलने से सदमे में रोण निवासी सत्यनारायण मीणा की मौत हो गई. 21 जून को सकरावदा निवासी संजय मीणा ने क़र्ज़ से परेशान होकर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. 23 जून को सुनेल निवासी बगदीलाल राठौर ने भी क़र्ज़ के चलते ख़ुदकुशी कर ली. 24 जून को डग निवासी शेख़ हनीफ़ ने क़र्ज़ से परेशान होकर आत्महत्या कर ली. 27 जून को कोटा ज़िले के अयाना थाना क्षेत्र के श्रीपुरा निवासी मुरलीधर मीणा (32) ने लहसुन के कम दाम मिलने से आहत होकर जहर खाकर जान दे दी.’

तेलंगाना में भी तबाही

तेलंगाना राज्य बनने के बाद से अब तक वहां पर 3,000 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अलग राज्य बनने के बाद से तेलंगाना में अब तक 3,026 किसानों ने आत्महत्या कर ली है. एक एनजीओ के हवाले से इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014 में 792, 2015 में 1147 और 2016 में 784 किसानों ने आत्महत्या की. इस साल जनवरी से जून तक 294 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. दक्षिणी राज्यों में तेलंगाना में भी किसानों की ख़ुदकुशी जारी है. तेलंगाना के खम्मम और भद्राद्री कोठागुडम ज़िलों में ही पिछले तीन महीने में 22 किसानों ने आत्महत्या की है.

क्या है किसानों की मूल समस्या

क़रीब 70 प्रतिशत भारतीय कृषि पर निर्भर हैं. इनमें से 9 करोड़ परिवार सीधे तौर पर किसानी से जुड़े हैं. यह आबादी अपने ज़रूरी ख़र्च से कम आमदनी के कारण क़र्ज़ लेने पर मजबूर होती है. अंतत: क़र्ज़ का बोझ अंतत: उसकी जान ले लेता है.

इंडिया स्पेंड के आंकड़ों के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार में छपी एक ख़बर में कहा गया है कि क़रीब 70 प्रतिशत भारतीयों के 90 मिलियन यानी 9 करोड़ परिवार हर महीने अपनी कमाई से ज़्यादा ख़र्च करते हैं, इस कारण उन्हें क़र्ज़ लेना पड़ता है. देश भर में आधे से ज़्यादा किसानों की आत्महत्या का कारण क़र्ज़ ही है.

नेशनल सैंपल सर्वे का डाटा कहता है कि 6 करोड़ से ज्यादा परिवार ऐसे हैं जिनके पास एक एकड़ या उससे कम खेती की ज़मीन है. उनका जितना ख़र्च है उससे कम कमा पाते हैं.

यानी बढ़ती महंगाई, खेती में बढ़ती लागत, कम आमदनी, कृषि उपज का उचित मूल्य न मिलने और इसके फलस्वरूप क़र्ज़ बढ़ने से पूरे देश के मध्यम और सीमांत किसान मुसीबत में हैं. क़र्ज़ चुकाने को लेकर बैंक और सूदखोर इतना दबाव डालते हैं कि किसान पैसे न दे पाने की हालत में आत्महत्या कर रहे हैं.

किसान आत्महत्या के डरावने आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में कहा गया कि नरेंद्र मोदी के शासन काल में 2014-15 के दौरान किसानों के आत्महत्या करने की दर 42 प्रतिशत बढ़ गई है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, पिछले 22 सालों में देश भर में तकरीबन सवा तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. भारत के कई राज्यों में हज़ारों की संख्या में किसान क़र्ज़, फ़सल की लागत बढ़ने, उचित मूल्य न मिलने, फ़सल में घाटा होने, सिंचाई की सुविधा न होने और फ़सल बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं.

ब्यूरो के मुताबिक, 2015 में कृषि से जुड़े 12,602 किसानों ने आत्महत्या की. 2014 में यह संख्या 12,360 थी. इसके पहले 2013 में 11,772, 2012 में 13,754, 2011 में 14 हजार, 2010 में 15 हजार से अधिक, 2009 में 17 हजार से अधिक किसानों ने कृषि संकट, क़र्ज़, फ़सल ख़राब होने जैसे कारणों के चलते आत्महत्या कर ली.

2016 का आंकड़ा अभी जारी नहीं हुआ है. लेकिन जिस तरह से राज्यों से किसानों द्वारा आत्महत्या करने की ख़बरें आईं, उस आधार पर कहा जा सकता है कि 2016 और 17 के हालात और भयानक हैं.

पिछले कई बरसों महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा किसान आत्महत्या करते हैं. अकेले महाराष्ट्र में 1995 से लेकिन अब तक 60,000 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

महाराष्ट्र के बाद तेलंगाना दूसरे और कर्नाटक तीसरे नंबर पर है. देश में जितने किसान आत्महत्याएं करते हैं, उनमें से 94 प्रतिशत मात्र छह राज्यों में हैं. ये राज्य हैं- महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध प्रदेश और छत्तीसगढ़.

देश भर में ये सैकड़ों आत्महत्याएं देश के प्रशासन और किसानों को लेकर सरकारों की प्राथमिकता पर गंभीर सवाल खड़ा करती हैं. क्या भारत ऐसा देश बन गया है जहां किसान होना मौत की गारंटी है?

(यह स्टोरी 29/06/2017 को 'द वायर' वेबसाइट पर छप चुकी है.)

रविवार, 11 दिसंबर 2016

नोटबंदी के दौर में फकीरी के जलवे

मैं फकीरी के नाना रूपों के आकर्षण में आजकल त्रिशंकु हो गया हूं. एक तरफ संत कवि कबीर दूसरी तरफ विश्वगुरु बनते भारत के परधानसेवक जी. एक तरफ कबीर की फकीरी खींचती है, दूसरी तरफ परधानसेवक की. गालिब चचा ने ऐसे ही त्रिशंकु हुए मुझ जैसे आदमी के लिए लिखा होगा कि'ईमां मुझे रोके है जो खीचें है मुझे कुफ्र, काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे'.

इनमें से काबा और कलीसा यानी मस्जिद और मयखाना कौन है, यह तो पक्का पता नहीं है लेकिन यह पक्का पता है कि 'होता है शबो-रोज तमाशामेरे आगे.'

बात भटक रही है, इसे भटकने नहीं देना है. मैं मोदी जी को आदर्श फकीर मानकर उन पर कॉन्सन्ट्रेट करना चाह रहा हूं. लेकिन उनकी फकीरी काफीदिलचस्प है. 25 क्विंटल फूलों की महक वाली राजशी फकीरी अपन कबीर—फैन जुलाहों, गढ़रियों पर कहां फबेगी! मैं दोनों फकीरी के बीच मेंचकरायमान हो रहा हूं.

संत कवि कबीर का बड़ा मशहूर भजन है, 'मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में...' आजकल यह अप्रसांगिक हो गया है. न हम पर सूट कर रहा है, न हमारेदेशकाल पर. इस भजन की आगे की पंक्तियां मेरे लेख से निकलकर भागना चाहती हैं.

फकीर का भजन जैसे फूलों के आकर्षण में फंस गया है. वह बहराइच जाना चाहता है. आज बहराइच में मोदी जी की परिवर्तन महारैली है. परिवर्तनयह हुआ है कि देसी रैली में 25 क्विंटल विदेशी फूल आया है. थाईलैंड, दिल्ली, कलकत्ता और नवाबों के शहर लखनउ से.

यह फकीरी का ही प्रताप है कि जिस दिल्ली से चलकर नये नोट बहराइच, गोंडा, बस्ती, लखनउ, कलकत्ता, बेंगलूर नहीं पहुंच सके, उस दिल्ली केप्रशासक के लिए तमाम शहरों से महंगे फूल खुद ही चलकर बहराइच आ गए हैं. पूरे 25 क्विंटल फूल.

फूल क्या हैं! अमीरी का प्रदर्शन. अमीरी क्या है? विनाश का द्वार. फूलों की महक मनुष्य को साधना से विरत करती है! जब तक फूलों का शबाबबरकरार है, तब तक ही उसकी महक बरकरार है और तभी तक अमीरी. शबाब यानी जवानी क्षणभंगुर है, इसलिए महक भी क्षणभंगुर है. महकअमीरी का प्रतीक है. यानी अमीरी भी क्षणभंगुर है. यही साबित करने के लिए फकीर को 25 क्विंटल फूल जुटाने पड़े हैं. विदेश से फूल इसलिए आए हैंताकि किसी को यह भ्रम न रहे कि जम्बूदीप से बाहर कुछ शाश्वत है! उस फूल की महक भी क्षणभंगुर है. हमें फकीरी की साध्ना करनी है!

भारत आध्यात्म की ताकत पर टिका है. वह हर क्षणभंगुर तत्व को नकार देता है. उसने अमीरी को नकार दिया है. सारे लोगों की जेब से, खेत से,संदूक से, बंदूक से, तिजोरी से, छिछोरी से, नौकरी से, लॉटरी से जितना पैसा निकल सकता था, सब निकाल कर बैंकों में जमा करा दिया गया है.लोग फकीर बन—बनकर कतार में खड़े हो गए हैं एटीएम के सामने. एटीएम भी किस देवता से कम है! एटीएम देवता अगर किसी को दाम-दर्शन देरहे हैं तो समझिए कि उसे सशरीर वैकुंठ प्राप्त हुआ.

दूसरी तरफ सारे देश का धन बैंकों में एकत्र हो गया है. समझ लो कि लालची लोगों के लिए नरक का द्वार खुल गया है. लुटेरों और पापियों ने चोर इसेलूटना शुरू कर दिया. उन्हें पकड़कर सजाएं दी जा रही हैं. परधान जी ने कहा है कि आठ नवंबर के बाद सोर पापों का हिसाब होगा.

सारे पापी लंदन भेजे जाएंगे. विजय माल्या नामक पापी ने सैकड़ों करोड़ हड़पने का पाप किया था, वह  लंदन नामक नरक में सज़ा काट रहा है. इसीतरह सारे पापियों को सजा मिलेगी.

मगर फकीर कवि कबीर दास मेरा ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं-'जो सुख पावो राम भजन में, सो सुख नाही अमीरी में.' मैं कबीर दास कोभारत का बड़ा कवि मानते हुए भी उनमें संशोधन की गुस्ताखी करना चाह रहा हूं.

मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में...
जो सुख पावो नोटबंदी में,
सो सुख नाही करंसी में.
भला बुरा सब का सुन लीजै,
कर गुजरान इमरजेंसी में.
दिल्ली नगर में रहिनी हमारी,
रैली बहराइच झूंसी में.
दाल, भात से नरक मिलत है
मुक्ति मिलत है भूसी में.

इतिश्री फकीरी कथा.

सोमवार, 21 नवंबर 2016

क्या आपको भी उन्मादी भीड़ में तब्दील होने की जल्दी है?

कृष्णकांत

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती
सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना...
-पाश

किसी समाज के लिए इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता है कि लोग मुर्दा शांति से भर जाने के लिए बेकरार हों. समाज में सबकुछ सहन कर जाने लायक मुर्दनी छा जाना साधारण बात नहीं है. राममनोहर लोहिया कहते थे- 'जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं किया करतीं.लेकिन हमारा समय मनहूस समय है. यहां पर कौमों में ​जिंदा दिखने का कोई हौसला नजर नहीं आता.
दुनिया भर में बदलाव हमेशा युवाओं के कंधे पर सवार होकर आता है. हमारे यहां का युवा अपने कंधे पर कुछ भी उठाने को तैयार नहीं है. उसने राजनीतिक मसलों को धार्मिक भावनाओं का मसला बना लिया है और आस्था में अंधे होकर अपनी रीढ़ की हड्डी गवां दी है. इसलिए जब आप सरकार के किसी फैसले या किसी कार्रवाई सवाल करते हैं तो अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े आपको गद्दार कहता हैदलाल कहता हैदेशद्रोही कहता है या पाकिस्तान का एजेंट कहता है.
भोपाल एनकाउंटर को लेकर सोशल मीडिया पर वही युद्ध शुरू हो गया हैजो हर मामले में होता है. राष्ट्रवादी बनाम देशद्रोही. सेकुलर बनाम कम्युनल. हिंदुत्ववादी अपनी सांप्रदायिकता को ऐसे पेश करते हैं जैसे कि सांप्रदायिक होना बहुत गौरव की बात हो. चाहे लेखकों की हत्या का मसला रहा होदादरी कांड होफर्जी गोरक्षा होसर्जिकल स्ट्राइक हो या भोपाल में आठ कैदियों का एनकाउंटर.
हर सवाल पर आपको गद्दार और देशद्रोही कहने वाला युवा ऐसी दुनिया में है जहां पर सरकार पर सवाल उठाना पाप है. बिना सवाल और समीक्षा केबिना आलोचना और प्रतिपक्ष के कैसा समाज ​बनेगायह उसकी कल्पना में कहीं नहीं है.
एक गैर-कानूनी सरकारी कार्रवाई पर आप यह सोच कर सवाल उठाते हैं कि कानून का शासन ही लोकतंत्र की पहली शर्त है. लेकिन भीड़ में होते युवा इस आलोचना को अपने राजनीतिक हितों पर होने वाला हमला मानते हैं. वे लोकतंत्र में भागीदारी नहीं चाहते. वे भेड़चाल में दौड़ना चाहते हैं. वे अपने आगे चलने वाली भेड़ के पीछे-पीछे सर झुका कर बस चलते रहना चा​हते हैं. धर्म की चाशनी में डूबी उनकी राजनीतिक ट्रेनिंग ही ऐसी हो रही है कि वे राजनीति को आस्था की आंख से देखते हैं. जैसे प्रजा राजा में आस्था रखती हैजैसे प्रजा राजा के लिए जान देने पर उतारू हो जाएउसी तरह वे जान दे देने या ले लेने को तैयार हैं.
हमारे देश का युवा उन्मादी भीड़ में तब्दील हो रहा है. उसे इत्मीनान से सोचने से परहेज हैउसे सवाल करने से परहेज हैउसे देश और देश की व्य​वस्था ​पर विचार करने से परहेज है. उसे गाली देने की जल्दी है. उसे किसी को गद्दारदलालदेशद्रोहीपाकिस्तानी आदि कह देने की जल्दी है. उसे भारत माता का नारा लगाने की जल्दी है. उसे ​सवाल करती महिला को वेश्या कह देने की जल्दी है. उसे सजा देने की जल्दी है. उसे जज बनकर फैसला सुनाने की जल्दी है. उसे भीड़ में तब्दील होकर किसी को मार डालने की जल्दी है.
इन युवाओं की शिक्षाजागरूकता और स्वाभिमान की कंडीशनिंग कैसे हुई होगी कि वे लोकतंत्र की मूल भावनाओं को ही गाली देते हैं. वे देशभक्ति में इतने पागल हैं कि देशभक्ति का ड्रामा करने वालों का कोई भी कारनामा बर्दाश्त करने को तैयार हैं. वे देशभक्ति के इन ड्रामों के लिए देश के ही बुनियादी नियमों का उल्लंघन सहने को तैयार हैं. उन्हें इसमें कुछ भी बुरा या असहज करने वाला नहीं लगता.
कितना अच्छा होता कि हर एनकाउंटर को कोर्ट द्वारा ​फर्जी सिद्ध किए जाने से पहले हमारे देश का युवा सरकारों से पूछता कि पुलिस को गोली मारने का अधिकार किसने दियावे पूछते कि किसी अपराधी को दंड देने के लिए भीड़ को अधिकार किसने दियाकोई संगीन अपराधों में लिप्त है तो उसे कानून और अदालतें सजा देंगीया प्रमोशन का प्यासा अफसर उसे गोली मारकर दंड देगाकाश! हमारे देश के युवा यह पूछते कि अगर हम गैरकानूनी हत्याओं को सेलिब्रेट करेंगे तो तालिबान या आईएसआईएस से अलग एक प्रतिष्ठित लोकतंत्र कैसे बनेंगे
लोकतंत्र नागरिक भागीदारी का नाम हैजिसमें आप सत्ता से लगातार सवाल करके उसे निरंकुश होने से रोकते हैं. जब आप सरकारों के पक्ष में खड़े हो जाएं और सवाल करना बंद कर देंतब समझिए कि आप मुर्दा शांति से भर गए हैं. और जैसा कि पाश कहते हैंसबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जानातड़प का न होनासब कुछ सहन कर जाना...
हर नागरिक को यह सोचना ​चाहिए कि आप क्या होना चाहते हैंसवाल करता हुआलोकतंत्र को मजबूत करता हुआ एक जागरूक नागरिक या मुर्दा शांति भरा हुआ लोकतंत्र में जनसंख्या बढ़ाने वाला मात्र एक प्राणीक्या आपको भी उन्मादी भीड़ में तब्दील होने की जल्दी है?


रविवार, 6 नवंबर 2016

सैकड़ों शहादतें कैसे रुकेंगी? मीडिया पर प्रतिबंध लगा दो

सीमा पर आज फिर दो जवान शहीद हो गए. इस साल अब तक कुल 76 जवान शहीद हो चुके हैं. पिछले तीन महीनों में 42 भारतीय जवान शहीद हो चुके हैं. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कम से कम 100 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन हुआ है और 8 जवान शहीद हुए हैं.
1988 से सितंबर, 2016 तक कुल 6,250 भारतीय रक्षाकर्मी आतंकी वारदातों में शहीद हुए हैं. वहीं जवाबी कार्रवाई में कुल 23,084 आतंकियों को भारतीय जवानों ने मार गिराया. इन घटनाओं में करीब 15000 लोग मरे हैं.
56 इंची सीने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद दो साल के भीतर 156 जवान शहीद हुए हैं.
यदि ये आंकड़े सही हैं तो पिछले ढाई साल में करीब ढाई सौ जवान शहीद हो चुके हैं. सरकार को इस बारे में स्पष्ट आंकड़ा जारी करके बताना चाहिए कि अब तक कुछ कितने जवान शहीद हुए.
आतंकी वारदातों में मारे गए जवानों की सालाना औसत मृत्यु दर पर नजर डालें, तो यह आंकड़ा कांग्रेस की मनमोहन सरकार से जरा भी कम नहीं है.
मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाओं में वृद्धि हुई है. कश्मीर में आतंकी वारदात की संख्या वाजयेपी और मनमोहन सरकार की तुलना में मोदी सरकार के दौरान बढ़ी हैं.
5 जनवरी 2015 से 15 जनवरी 2016 के बीच आतंक सम्बंधी 146 घटनाएं हुईं, जिसमें 169 लोग मारे गए. इनमे 39 सुरक्षाकर्मी और 22 नागरिक भी शामिल हैं. इसी दौरान राज्य में सीमा पर फायरिंग की 181 घटनाएं हुईं हैं जिसमें 22 लोगों की मौतें हुईं जिनमें 8 सुरक्षाकर्मी और 75 अन्य लोग मारे गए.
मोदी सरकार कहती है कि हम मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं तब आप कूदने लगते हैं, लेकिन पहले भी मुंहतोड़ जवाब ही दिया जाता रहा है. 2008-09 में भी युद्ध होने की कगार पर मामला पहुंच गया था. पहले की सरकारों ने सीमा पर सैनिकों के हाथ में दही नहीं जमाया था. सीमा के भीतर भी और बाहर भी सेना वह सब करती रही है जो करने की उसे जरूरत महसूस हुई. मोदी सेना को भी लेकर चुनाव प्रचार करते हैं, पहले ऐसा नहीं होता था.
प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी कहते थे कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए 56 इंची सीना चाहिए. एक सैनिक के सिर के बदले 10 सिर लाने की बात भी कहते थे. हालांकि, एक प्रधानमंत्री के तौर पर यह बात अहमक किस्म की है. तारीफ तो तब होगी जब वार्ता और कूट​नीति के सहारे इन घटनाओं पर रोक लगाई जाए. वे यह दोनों काम नहीं कर सके. उन्होंने यह जरूर किया कि सेना को चुनावी मंडी में ले जाकर सरे बाजार दुकान सजा बैठे हैं.
मनमोहन थे, तब भी सैनिक मर रहे थे. मोदी हैं तब भी सैनिक मर रहे हैं. सीमा पर गोलियां तब भी चलती थीं, अब भी चलती हैं. अंतर बस इतना आया कि पाकिस्तान ही आतंकी भेजता है और वही जांच दल भी भेजता है. जज, ज्यूरी और जल्लाद सब वही है.
स्पष्ट खुफिया रिपोर्ट होने के बाद भी पठानकोट हमला नहीं रोका जा सका. इस हमले को ​लेकर नियुक्त जांच समिति ने सरकार और सुरक्षा एजेंसियों पर गंभीर सवाल उठाए, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई हुई हो, ऐसा हमें मालूम नहीं है.
अब अगर एक एनडीटीवी को प्रति​बंधित करने या रवीश कुमार को काला पानी भेज देने से हमारी सुरक्षा पुख्ता होती हो तो ऐसा जरूर करना चाहिए. या ऐसा करना चाहिए कि समूचे मीडिया को प्रतिबंधित कर देना चाहिए.
'अंधेर नगरी, चौपट राजा' में भारतेंदु ​हरिश्चंद्र इसका पटाक्षेप इस पंक्ति से करते हैं कि 'जहाँ न धर्म न बुद्धि नहिं, नीति न सुजन समाज, ते ऐसहि आपुहि नसे, जैसे चौपटराज'.

बाकी, बागों में बहार तो हइए है...



*(सारे आंकड़े मीडिया रिपोर्ट्स से)

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

‘लोगों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला हो रहा है, बहस इस पर होनी चाहिए राष्ट्रवाद पर नहीं’







प्रश्न है राज्य की राजनीतिक हिंसा का, जो एक खास तरह की राजनीतिक भाषा में व्यक्त हो रही है. लेकिन पूरी संसद बैठ गई राष्ट्रवाद पर बहस करने, जैसे कि राष्ट्रवाद पर कोई सेमिनार हो रहा हो. बाहर हमले हो रहे हैं, संसद में अकादमिक सेमिनार हो रहा जैसे कि इस बहस से यह मसला निपट जाएगा


अपूर्वानंद

किसी से आप पूछेंगे कि वह किसको मानता है राष्ट्रवाद तो वह नहीं बता पाएगा. कुछ धुंधली-सी अवधारणा है लोगों के दिमाग में कि मुल्क हमेशा खतरे में रहता है, सैनिक उसकी रक्षा करते हैं, वे मारे जाते हैं, और इधर बुद्धिजीवी हैं जो तरह-तरह से सवाल उठाते रहते हैं, जबकि इत्मिनान से तनख्वाहें ले रहे हैं और जनता के पैसे पर शानदार जगहों में बैठकर पढ़ रहे हैं, जबकि हमारे सैनिक सियाचीन में बर्फ में दबकर मर जाते हैं.

अगर आप लोगों से पूछें तो कुल मिलाकर आपको जवाब यही मिलेगा जो आजकल मिल रहा है. अब आप इस अवधारणा को तोड़ेंगे कैसे? इसको तोड़ना बहुत ही मुश्किल है. लोगों को यह समझाना कि जो लोग विश्वविद्यालयों में बैठकर पढ़ रहे हैं, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, या जो सवाल कर रहे हैं, वह सवाल करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. यह समझाना भी बहुत कठिन है कि छत्तीसगढ़ में भी जिन सैनिकों को लगा दिया जा रहा है उनको देश के ही खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है. क्योंकि उनको बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में इस्तेमाल किया जा रहा है. तो इसे कैसे समझाया जाएगा, यह एक प्रश्न है.

जिसको कहा जा रहा है कि राष्ट्रवाद क्या है, इसमें किसी को भी राष्ट्रद्रोही साबित करना बहुत आसान है. राष्ट्रवाद के घालमेल के चलते हिंदूवाद को आत्मसात करना बहुत आसान है. उसके प्रतीक चिह्न, उसके संकेत सारे ऐसे हैं जिसको आप हिंदू धर्म से जोड़कर देख सकते हैं. और एक तरह की प्रतिध्वनि है जो बहुत दिनों से लोगों के मन में चली आ रही है, अब जिसको खुलकर निकलने का मौका मिला है कि यह देश पूरी तरह से हिंदू क्यों नहीं है और क्यों नहीं इसे होने दिया जा रहा है. लंबे समय तक इसके लिए नेहरू को दोषी ठहराया गया, कि नेहरू क्योंकि आधा ईसाई थे, आधा मुसलमान थे, तो उनकी वजह से ऐसा नहीं हो पाया. वरना पटेल, राजेंद्र बाबू होते तो हिंदू राष्ट्र हो ही जाता. वह घृणा अभियान जारी है.

अब इस चीज को समझना अति आवश्यक है कि क्यों सबसे ज्यादा निशाने पर राहुल गांधी हैं. राहुल गांधी सोनिया के बेटे हैं और नेहरू से जुड़े हैं. तो वह जो पुरानी घृणा है उसे इटली से जोड़कर और ताजा किया जा सकता है. तो यह बहुत ही पेचीदा घालमेल किया गया है. अफवाहों और दूसरे तमाम माध्यमों से इसे इतना ज्यादा पकाया गया है, इसकी काट के बारे में बात करने की कभी कोई कोशिश नहीं की गई. हम लोग अगर बात करने लगेंगे समझदारी से तो उसकी तो जगह नहीं है. क्योंकि पूरा सामाजिक विचार-विमर्श है वह इस भाषा में ढल गया है.

दो-तीन चीजें जो बहुत ही असंगत मालूम पड़ती हैं, वो ये कि माओवादी कैसे राष्ट्रविरोधी हो गए? नक्सलवादी कैसे राष्ट्रविरोधी हो गए? यह प्रश्न किया जा सकता है! क्योंकि ये लोग तो सबसे गरीब लोगों के लिए लड़ रहे हैं. यह तो एक आंतरिक संघर्ष है. इनको राष्ट्रविरोधी बार-बार क्यों कहा जा रहा है? यह जो हो रहा है कि आप दोनों-तीनों चीजों का घालमेल कर रहे हैं, इससे कुछ बातें समझ में आती हैं. क्योंकि सशस्त्र माओवादियों का संघर्ष हमारे सैन्य बल से होता है. सैन्य बल राष्ट्र का सबसे बड़ा प्रतीक है. इसलिए आप माओवादियों को राष्ट्रविरोधी घोषित कर सकते हैं, बिना यह सोचे हुए कि ये सैन्य बल आदिवासियों के घर जला रहे हैं, उन पर हमला कर रहे हैं तो ये किनके हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं. ये बातें करेगा कौन?

विश्वविद्यालयों के खिलाफ घृणा का एक माहौल पहले से है. हमारे यहां एक एंटी इंटेलेक्चुअलिज्म है और एक हीनताबोध जो भाजपा-आरएसएस में है कि उनको कोई बौद्धिक मानता नहीं है. बौद्धिकता के विरुद्ध उनके मन में एक घृणा है. और बौद्धिकता मात्र को वामपंथी मान लिया गया है. यह बहुत मजेदार चीज है. लेकिन तब प्रताप भानु मेहता क्या ठहरेंगे? आंद्रे बेते क्या होंगे? पीएन मदान क्या होंगे? आशीष नंदी क्या होंगे? इसी बीच यह खबर आई जिसकी मैं आशीष नंदी से पुष्टि नहीं कर पाया. आशीष नंदी ने कहा है कि वे माफी मांगने को तैयार हैं. उन्होंने गुजरात को लेकर जो लेख वर्षों पहले लिखा था, उसके चलते उन पर देशद्रोह का मुकदमा है. यह मुकदमा उनके खिलाफ है और टाइम्स ऑफ इंडिया, अहमदाबाद के खिलाफ है, जिसने उनका लेख छापा था. यह लेख तो गुजरात सरकार की आलोचना थी. गुजरात जिस दिशा में जा रहा है, उसकी आलोचना थी. उस पर देशद्रोह का मुकदमा कैसे हो गया? वह चल रहा है और आशीष नंदी ने उस पर माफी मांगने की पेशकश की है. वे माफी मांग सकते हैं.

इससे समझा जा सकता है कि दरअसल बौद्धिकता पर हमला बहुत पहले से चल रहा था. गुजरात में वह प्रोजेक्ट पूरा हो गया. इसलिए आप कह सकते हैं अब गुजरात एक तरह का बैरेन लैंड है. अब आप देखें कि कैसे व्यवस्थित ढंग से वह हमला हो रहा है. जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय में अभी कुछ ही दिन पहले एक सेमिनार हुआ ‘कश्मीर में बहुलतावाद की संस्कृति’ विषय पर. अब यह सेमिनार कैसे राष्ट्रविरोधी है? लेकिन इस सेमिनार को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आपत्ति जताता है और उस आपत्ति के आधार पर कुलपति नोटिस जारी करते हैं. तो यह सब क्या हो रहा है?

इसी तरह अभी एक घटना लखनऊ में घटी जो बहुत ही हास्यास्पद थी. हालांकि वह घटना थोड़ी-बहुत मुझसे जुड़ी हुई है, लेकिन हास्यास्पद है. राजेश मिश्रा जो समाजशास्त्र के प्रोफेसर हैं, उन्होंने फेसबुक पर मेरा लेख शेयर किया जो इंडियन एक्सप्रेस में छपा था. उसके चलते उनका पुतला जलाया गया, विरोध-प्रदर्शन किया गया, क्लास नहीं चलने दी गई और कुलपति ने उनको कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. अब देखिए कि मूर्खता किस हद तक जा रही है. वह लेख उन्होंने लिखा भी नहीं है. वह लेख उन्होंने सिर्फ शेयर किया है. उस लेख में कोई हिंसा का आह्वान नहीं है. उन्होंने कोई हिंसा का आह्वान नहीं किया है. लेकिन उनके खिलाफ हिंसा होती है और उन्हीं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया जाता है. तो हम लोग धीरे-धीरे कहां जा रहे हैं, यह तो समझ में आता है.

राष्ट्रवाद चूंकि इतनी धुंधली अवधारणा है कि कई चीजें घुल-मिल जाती हैं जैसे देशभक्ति और राष्ट्रवाद. अवधारणा में तो दोनों दो हैं, लेकिन यहां दोनों एक हो गए. राष्ट्र और राज्य दोनों एक हो गए, जबकि दोनों दो हैं. आप विरोध कर रहे हैं राज्य का लेकिन उसको कहा जा रहा है कि आप राष्ट्र का विरोध कर रहे हैं. देश की अवधारणा तो अलग है न! अपनी भाषाओं में देखें तो हम देश जाते हैं, परदेस जाते हैं. बिहार वालों का चटकल मजदूरों का परदेस कोलकाता हो गया. देश उनका अपना छपरा है, सीवान है. अगर आप पारंपरिक रूप से देखें तो उनका देश और परदेस तो इसी देश में हो जाता है. लोग अपनी मिट्टी में मरने की बात करते हैं. वे यह थोड़े कहते हैं कि मैं भारत में मरूंगा. कोई व्यक्ति जो रह रहा है दिल्ली में उसकी इच्छा होती है कि वह जाकर दफन हो वहीं पर, जहां से वह आया है. उसको आग वहीं दी जाए. तो यह एक दूसरी चीज है जिसे आप अपनी मिट्टी से प्रेम कह सकते हैं. वह राष्ट्रवाद नहीं है. क्योंकि वह तो राष्ट्र है नहीं. अगर मान लिया वह राष्ट्रवादी है तो वह क्यों दिल्ली में ही नहीं मर जाना चाहता है? क्यों वह अपने गांव जाकर ही मरना चाहता है या वहीं की मिट्टी में मिल जाना चाहता है? इसको काफी प्रगतिशील कदम माना जाता है कि अगर मैं लिखकर मर जाऊं कि मेरा शव मेरे गांव न ले जाया जाए. अगर पूरे राष्ट्र की भूमि एक ही है तो यह लगाव, यह खिंचाव क्यों होता है? यह अंतर है, इसको लोगों को समझना चाहिए. लेकिन यहां तो सब घालमेल कर दिया गया.

इसके उलट, राष्ट्रवाद तो एकदम नई अवधारणा है. जो आपका देश है, वही आपका राष्ट्र नहीं है, छपरा के व्यक्ति का देश तो छपरा या वहां का एक गांव मढ़ौरा है, जहां से वह आया है, लेकिन राष्ट्र तो भारत है. उसको यह समझाया है कि मढ़ौरा के मुकाबले भारत का इकबाल बहुत-बहुत ज्यादा है और मढ़ौरा के हितों को भारत के हित पर कुर्बान किया जा सकता है. यह जो भारत है, उसकी देश की जो समझ थी, जो पारंपरिक समझ है, उसके मुकाबले तो यह नई समझ है. इसमें भौगोलिक समझ शामिल है. यह एक भौगोलिक देश है, जिसकी एक चौहद्दी है, जिसके दक्षिण में यह है, उत्तर में यह है, पश्चिम में यह है, यह सब तो उसको बताया गया है कि यह ऐसा है. वह खुद इसका अनुभव नहीं करता है. अगर आप कहें कि मेरे अनुभव की सीमा से बाहर की चीज है. मैं इसकी कल्पना करता हूं, मुझे हर रोज यह बताया जाता है.

स्कूल में हम लोगों को जो चीज सबसे पहले याद कराई जाती थी वह भारत की चौहद्दी है. यह क्यों बताया जाता था? क्योंकि यह हमारे दिमाग में बैठ जाए. वह भारत कोई अपने आप अनुभव होने वाली चीज नहीं थी. मेरी जो मानवीय अनुभव की सीमा है, उस मानवीय की सीमा में तो भारत ही है. भारत अंतत: एक कल्पना है जिसके बारे में मुझे रोज-रोज बताकर उस कल्पना को मेरे दिमाग में बिठाकर उसको यथार्थ बना दिया जाता है, जिसका एक तिरंगा है, एक राष्ट्रगान है वगैरह-वगैरह. भारत इन्हीं के माध्यम से मेरे मन में मूर्त भी होता है और जीवित भी होता है. यह सब जो हो रहा है, वह बहुत स्पष्ट है. बीएचयू से संदीप पांडेय को तो नक्सली कहकर ही निकाला गया. नक्सली होना ही राष्ट्रविरोधी हो गया. वामपंथी होना ही राष्ट्रविरोधी होना हो गया. यह तो तय हो गया है. अब इसके बारे में बहस नहीं हो सकती. कुछ चीजें स्थापित कर दी गई हैं जिनके बारे में अब बहस की गुंजाइश नहीं है. जैसे आप यह नारा भारत में लगा सकते हैं कि नक्सलवादियों भारत छोड़ो. कैसे लगा सकते हैं यह नारा? आरएसएस वालों भारत छोड़ो यह नारा नहीं लग सकता लेकिन नक्सलवादियों भारत छोड़ो यह नारा लग सकता है. नक्सलवाद की विचारधारा से हमें आपत्ति हो सकती है, उनके तरीके से हमें असहमति हो सकती है, लेकिन नक्सलवादी जो सबसे गरीब लोगों के लिए लड़ते हैं, उनको आप कहते हैं कि भारत छोड़ो. यह बहुत विचित्र है लेकिन यह स्थापित हो चुका है.

अब रहा दलितों का प्रश्न, तो आरएसएस का कहना यह है कि एकमात्र मैं हूं, और कोई नहीं है. गांधी का भी व्याख्याता मैं हूं. आंबेडकर का भी व्याख्याता मैं हूं. मैं किसी और को व्याख्याता होने की इजाजत नहीं देता. हैदराबाद के आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन को लेकर, रोहित वेमुला जिससे जुड़ा था, उसके बारे में वेंकैया नायडू का बयान क्या है? उन्होंने कहा कि वह सिर्फ नाम का आंबेडकरवादी है. वह दरअसल, वाम का मुखौटा है. यह बात वे पहले दिन से कह रहे हैं कि आंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन का दलितों से कोई लेना-देना नहीं है, वह दरअसल रेडिकल लेफ्ट का मुखौटा है जो राष्ट्र-विरोधी है, क्योंकि उसने याकूब मेमन की फांसी का विरोध किया. वे यह साबित कर रहे हैं कि इसकी इजाजत दलितों को नहीं है कि वे कौन-सी राजनीति करें और कौन-सी भाषा बोलें, क्योंकि वह हम उनको बताएंगे.

संबित पात्रा ने एक बहस में कहा कि आप दुर्गा के बारे में ऐसा नहीं बोल सकते. हमने कहा कि आप स्क्रिप्ट ताे नहीं देंगे न लिखकर कि हम क्या बोलें और क्या नहीं बोलें! आपकी दुर्गा महिषासुर मर्दिनी होगी. लेकिन जो महिषासुर का शहादत दिवस मनाएंगे, वह दुर्गा के लिए क्या बोलेंगे यह तो वे ही तय करेंगे. आप तो दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी बोले चले जा रहे हैं. आप तो यह ख्याल नहीं कर रहे हैं कि महिषासुर को देवता मानने वालों की भावना का क्या हो रहा है. उलटकर यह प्रश्न किया जाए कि उनकी भावनाओं का क्या हो रहा है. आप उनके शहादत दिवस में मत जाइए. आप अपना महिषासुर मर्दिनी दिवस मनाते रहिए. यह सब जो चल रहा है, इससे निपटना बहुत ही कठिन है. दो स्तर की लड़ाई हो गई है. एक लड़ाई है सांस्कृतिक और एक लड़ाई है राजनीतिक. अब यह पूरी लड़ाई सांस्कृतिक राजनीति में बदल गई है तो और भी कठिन हो गई है. अब देखिए कि यह कितना दिलचस्प है कि एक बहुत बड़ा तबका बिल्कुल खामोश बैठा है. वह है मुसलमानों का तबका. इस पूरी बहस में एक आवाज नहीं है. क्योंकि मान लिया गया है कि वे प्रासंगिक नहीं हैं. अब वे कैसे दावेदारी पेश करें इस भारतीय राष्ट्र पर? वे अपने को इस घोल में मिलाकर ही शामिल हो सकते हैं.

यह जो सांस्कृतिक राजनीति की लड़ाई है यह अभी और तीखी होने वाली है. इसकी तार्किक परिणति कुछ और भी हो सकती है इसके लिए लोगों को, पूरे भारत को तैयार रहना चाहिए, क्योंकि जिस दिशा में धकेल दिया गया है, उस दिशा में आप समाज के दूसरे तबकों को रोक नहीं सकते. तब वे अपनी भाषा में बात करेंगे. आज ऐसा लग रहा है कि वे चुप हैं, लेकिन वे क्यों चुप रहें और कब तक चुप रहें, कब तक अपमानित होते रहें? तो एक तो यह सांस्कृतिक स्तर की लड़ाई है. दूसरे, यह राजनीतिक स्तर की लड़ाई है, जिसमें भाजपा को काफी नुकसान होने वाला है दलितों और आदिवासियों की ओर से. यह तो बहुत स्पष्ट दिख रहा है. उन्होंने रोहित वेमुला और आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन को राष्ट्रविरोधी घोषित करने का जो दांव खेला है, वह उन्हें महंगा पड़ेगा. दलित और आदिवासी अब बेचारे नहीं हैं.

इस सबका रास्ता तो राजनीतिक संघर्ष है. लेकिन अभी जो दिख रहा है वह निराशाजनक है. अगर आज की बात करें तो. मेरी जो समझ है वह यह है कि जो कुछ चल रहा है वह बेहद अप्रसांगिक है. क्योंकि मसला क्या था? मसला राष्ट्रवाद तो है नहीं. मसला तो यह है कि राज्य ने अपनी हिंसा का प्रयोग गैर-आनुपातिक ढंग से किया. उसने आगे बढ़कर हैदराबाद और दिल्ली में छात्रों पर हिंसा का प्रयोग किया. प्रश्न है राज्य की राजनीतिक हिंसा का, जो एक खास तरह की राजनीति की भाषा में व्यक्त हो रही है. प्रश्न राष्ट्रवाद तो नहीं है, लेकिन पूरी संसद बैठ गई राष्ट्रवाद पर बहस करने, जैसे कि राष्ट्रवाद पर कोई सेमिनार हो रहा हो. बाहर हमले हो रहे हैं, लोगों को पीटा जा रहा है, लोगों को गलत ढंग से गिरफ्तार किया जा रहा है, बहस इस पर होनी चाहिए, न कि राष्ट्रवाद पर, लेकिन सब लोग वहां अकादमिक सेमिनार करने लगे. हर कोई राष्ट्रवाद की परिभाषा दे रहा है. जैसे कि इस बहस के खत्म होते ही यह मसला निपट जाएगा. आप जब संसद में बहस कर रहे हैं, उसी समय जम्मू में यह घटना हो गई, उसी समय लखनऊ में यह घटना हुई, उसी समय इलाहाबाद में प्रदर्शनकारियों पर हमला हो गया. मसला है कि लोगों की स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर हमला हो रहा है. इस पर बहस होनी चाहिए थी. राजनाथ सिंह ने साफ झूठ बोला. वे झूठ बोलकर निकल कैसे गए और विपक्ष ने निकलने कैसे दिया? स्मृति ईरानी झूठ पर झूठ बोले जा रही हैं और निकलती जा रही हैं. अगर जवाबदेही तय करनी है तो विपक्ष इन मामलों में जवाबदेही तय करेगा, न कि राष्ट्रवाद पर बहस करने लगेगा.

मुझे दिख रहा है कि विपक्ष में फ्लोर मैनेजमेंट नहीं है, आपस में समन्वय भी नहीं है, और शायद स्पष्टता भी नहीं है. मसलन राहुल गांधी ने पहले दिन जेएनयू जाकर जो स्पष्टता दिखाई, या रोहित वेमुला मामले में, बाद में क्या कांग्रेस घबरा गई कि भाजपा उसे राष्ट्रवाद के मसले पर पीछे ले जाएगी? क्या कांग्रेस के जो ओल्ड गार्ड्स हैं, वे घबराए हुए हैं? जिन लोगों ने राजीव गांधी को सलाह दी होगी कि राम जन्मभूमि का ताला खुलवाया जाए, जिन्होंने बाबरी मस्जिद गिरने दी, क्या उसी तरह के लोग राहुल को पीछे खींचकर ले गए होंगे कि संसद में मत बोलिए. क्योंकि इससे तो कुछ भी पता नहीं चला कि दरअसल आप करना क्या चाहते हैं. मुझे लगता है कि विपक्ष की तैयारी नहीं है. विपक्ष से ज्यादा स्पष्टता और तैयारी छात्रों में थी, चाहे हैदराबाद के छात्र हों या जेएनयू के. यह सब काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. हम सब काफी लंबा खतरनाक समय झेलने को अभिशप्त हैं. यह सब पता नहीं कहां तक जाएगा.

माहौल यह है कि हम लोग आसानी से बात नहीं कर सकते. कक्षाओं में सहजता नहीं रह गई है. कोई भी चीज अब सहज नहीं रह गई है. माहौल पूरी तरह से तनावपूर्ण है और लोग कन्फ्यूज्ड हैं. मुझे लगता है कि भाजपा की रणनीति संभवत: यह थी कि लोगों के मन में बड़ा कन्फ्यूजन पैदा कर दो और टेम्प्रेचर लगातार ऊपर रखो. जितना टेम्प्रेचर ऊपर होगा, लोग सन्निपात की हालत में होंगे. समाज सन्निपात की अवस्था में होगा तो उसकी सोचने-समझने की शक्ति समाप्त हो जाएगी. उस समय आप कुछ भी कर सकते हैं. क्योंकि तब समाज की आत्म रक्षात्मक स्थिति भी समाप्त हो जाएगी. आप उस पर कब्जा कर लेंगे. स्थितियां बहुत खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं. यह लेख कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित है. यह लेख मार्च, 2016 में तहलका में छप चुका है.)

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

क्या मध्य प्रदेश पुलिस का एनकाउंटर फर्जी है?

मध्य प्रदेश में हुआ 8 लोगों का एनकाउंटर प्रथमदृष्टया फर्जी है. पुलिस की मुठभेड़ कहानी पर तमाम सवाल उठ रहे हैं.
जब कैदी जेल में थे, निहत्थे थे, सुरक्षा के अंदर थे, तब वे आराम से जेल में सेंध लगाते हैं और एकमात्र पुलिसकर्मी की हत्या करके भागने में सफल हो जाते हैं. पुलिस उन्हें भागने से नहीं रोक पाई, लेकिन एनकाउंटर तुरंत कर दिया, सफलतापूर्वक. वह भी सभी आठ कैदियों का.
ये वे कैदी हैं जो 2013 में खंडवा जेल से भी फरार हुए थे. दोबारा उन्हीं लोगों की सुरक्षा में सिर्फ एक गार्ड रखा गया था?
भागे हुए कैदियों के पास हथियार, जींस, टीशर्ट आदि चीजें कहां से आईं? सेंट्रल जेल में कैसी व्यवस्था थी कि कैदी सुरक्षाकर्मी को मारकर चलते बने और उन्हें रोकने वाला नहीं था?
कैदियों ने सेंध लगाई और सिर्फ सिमी के तथाकथित आतंकी भागे जो कि मुसलमान थे. बाकी सब कैदी  क्या वहां पर कल्पवास करने गए हैं? 8 लोग भाग रहे थे, सुरक्षाकर्मी मारा जा चुका था, लेकिन अन्य कैदियों ने भागने की क्यों नहीं सोची? क्या बाकी का हृदयपरिवर्तन हो गया था कि उन्होंने जेल में ही रहने का फैसला किया?
राज्य सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि सिमी के आरोपियों के पास गन नहीं थी. आइजी साब कह रहे हैं कि आरोपियों ने पुलिस पर फायरिंग की और जवाबी कार्रवाई यानी एनकाउंटर में मारे गए. ऐसा कैसे हुआ कि एक ही घटना के दो वर्जन हैं?
मध्य प्रदेश के पत्रकार प्रवीन दुबे ने अपनी फेसबुक वॉल पर एक लंबी पोस्ट लिखी है— ''शिवराज जी...इस सिमी के कथित आतंकवादियों के एनकाउंटर पर कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है....मैं खुद मौके पर मौजूद था..सबसे पहले 5 किलोमीटर पैदल चलकर उस पहाड़ी पर पहुंचा, जहां उनकी लाशें थीं...आपके वीर जवानों ने ऐसे मारा कि अस्पताल तक पहुँचने लायक़ भी नहीं छोड़ा...न...न आपके भक्त मुझे देशद्रोही ठहराएं, उससे पहले मैं स्पष्ट कर दूँ...मैं उनका पक्ष नहीं ले रहा....उन्हें शहीद या निर्दोष भी नहीं मान रहा हूँ लेकिन सर इनको जिंदा क्यों नहीं पकड़ा गया..? मेरी एटीएस चीफ संजीव शमी से वहीं मौके पर बात हुई और मैंने पूछा कि क्यों सरेंडर कराने के बजाय सीधे मार दिया..? उनका जवाब था कि वे भागने की कोशिश कर रहे थे और काबू में नहीं आ रहे थे, जबकि पहाड़ी के जिस छोर पर उनकी बॉडी मिली, वहां से वो एक कदम भी आगे जाते तो सैकड़ों फीट नीचे गिरकर भी मर सकते थे..मैंने खुद अपनी एक जोड़ी नंगी आँखों से आपकी फ़ोर्स को इनके मारे जाने के बाद हवाई फायर करते देखा, ताकि खाली कारतूस के खोखे कहानी के किरदार बन सकें.. उनको जिंदा पकड़ना तो आसान था फिर भी उन्हें सीधा मार दिया...और तो और जिसके शरीर में थोड़ी सी भी जुंबिश दिखी उसे फिर गोली मारी गई...एकाध को तो जिंदा पकड लेते....उनसे मोटिव तो पूछा जाना चाहिए कि वो जेल से कौन सी बड़ी वारदात को अंजाम देने के लिए भागे थे..?अब आपकी पुलिस कुछ भी कहानी गढ़ लेगी कि प्रधानमन्त्री निवास में बड़े हमले के लिए निकले थे या ओबामा के प्लेन को हाइजैक करने वाले थे, तो हमें मानना ही पड़ेगा क्यूंकि आठों तो मर गए... शिवराज जी सर्जिकल स्ट्राइक यदि आंतरिक सुरक्षा का भी फैशन बन गया तो मुश्किल होगी...फिर कहूँगा कि एकाध को जिंदा रखना था भले ही इत्तू सा...सिर्फ उसके बयान होने तक....चलिए कोई बात नहीं...मार दिया..मार दिया लेकिन इसके पीछे की कहानी ज़रूर अच्छी सुनाइयेगा, जब वक़्त मिले...कसम से दादी के गुज़रने के बाद कोई अच्छी कहानी सुने हुए सालों हो गए....आपका भक्त''
इन सवालों के बीच मीडिया अन्य मसलों की तरह इस मामले मे भी तमाशा कर रहा है. जो लोग एनकाउंटर में मारे गए, वे शायद आतंकवाद की कई घटनाओं के आरोपी थे. पुलिस अपने बयान में उन्हें आरोपी कह रही है. मुख्यमंत्री शिवराज चौहान आतंकवादी कह रहे हैं.
समाचार एजेंसी ANI उन्हें सिमी आतंकवादी लिख रही है. PTI सिमी एक्टीविस्ट लिख रही है. बीबीसी इन्हें सिमी कार्यकर्ता और कैदी लिख रहा है. पंजाब केसरी लिखता है 'सिमी के आठ खुंखार आतंकवादी'. भास्कर पर भी यही कॉपी है. दोनों में 'खुंखार' शब्द लिखा है. एक मूर्ख ने पहले कॉपी तैयार की है. दूसरे ने चांप दिया है. दोनों खबर का एंगल एक है. दैनिक जागरण, आजतक, जनसत्ता और ​हिंदुस्तान आदि के लिए वे लोग आतंकवादी थे.
नवभारत टाइम्स एक खबर में संदिग्ध आतंकवादी लिख रहा है. दूसरे में आतंकवादी लिख रहा है. लेकिन इसी खबर में कार्यकर्ता भी लिख रहा है. नवभारत टाइम्स यह भी लिख रहा है कि आतंकियों पर 5-5 लाख का इनाम घोषित किया गया है. पता नहीं जिंदा थे तब किया गया था या मुर्दों पर इनाम रखा गया है. एनडीटीवी इन्हें कैदी, सिमी के सदस्य, सिर्मी कार्यकर्ता और आतंकी सब ​लिख रहा है.
किसी आतंकवादी से किसी को कैसी सहानुभूति? वह बम दगाएगा तो हम आप में से कोई भी मर सकता है. लेकिन जब सैकड़ों युवकों को कोर्ट ने सालों बाद निर्दोष छोड़ा हो, उनके खिलाफ बिना सबूत के उनके जीवन बर्बाद किए गए हों, तब मीडिया विचाराधीन कैदियों को इतने आत्मविश्वास से आतंकवादी कैसे कह रहा है?
तो सार यह है कि बिना कानून और अदालत से दोष सिद्ध हुए भी मीडिया आपको किसी काल्पनिक या संदेहास्पद अपराध का अपराधी घोषित कर सकता है. जिस तरह अंडरट्रायल कैदी को पागल हो चुका भारतीय मीडिया आतंकवादी लिखता है, उसी तरह पागल हो चुकी सरकारें एनकाउंटर करवाती हैं.
15-20 साल जेल में सड़कर फिर कोर्ट से निर्दोष साबित हुए युवकों की कहानियां आपने नहीं सुनी हैं? सैकड़ों का जीवन बर्बाद किया जा चुका है.
हालांकि, यह जांच का विषय है कि एनकाउंटर फर्जी है या सही. लेकिन यदि नौ लोगों का एनकाउंटर हो सकता है तो कल को आपका भी हो सकता है. हर फर्जी एनकाउंटर भारतीय संविधान और कानून का भी एनकाउंटर है.

मुठभेड़ चाल


कभी कानून व्यवस्था के लिए खतरा बने कुख्यात अपराधियों से निपटने के लिए अंजाम दी जाने वाली मुठभेड़ की कार्रवाई गैर-कानूनी हत्याओं के एक ऐसे खेल में बदल गई है जो अधिकारियों के लिए पद, पैसा और प्रशंसा बटोरने का जरिया बन गई. क्या मुठभेड़ के नाम पर भारतीय कानून ऐसी हत्याओं की इजाजत देता है?

कृष्णकांत 

सीबीआई कोर्ट ने 25 साल पहले पीलीभीत में हुए 10 सिखों के फर्जी एनकाउंटर में 47 पुलिसकर्मियों को दोषी पाया है. पच्चीस साल पहले पीलीभीत में पुलिस ने दस सिख युवकों को आतंकी बताकर मार डाला था. सीबीआई जांच हुई तो पता चला वे आतंकी नहीं, तीर्थयात्री थे जो सिख तीर्थस्थलों की यात्रा करके वापस घर लौट रहे थे. हाल ही में सीबीआई अदालत ने मुठभेड़ को फर्जी ठहराया और 47 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई. अदालत के अनुसार पुलिस ने प्रमोशन के लालच में इस वारदात को अंजाम दिया था.

फर्जी एनकाउंटर तो हमारे देश में आम बात है, लेकिन बहुत कम मामले ऐसे हैं जिनमें फर्जी एनकाउंटर करने वाले पुलिसकर्मियों या सैन्यकर्मियों को सजा हुई हो. हो सकता है कि एनकाउंटर कभी ऐसे अपराधियों को ठिकाने लगाने का हथियार रहा हो जो कानून-व्यवस्था और जनता के लिए खतरा बने, लेकिन साथ-साथ यह विरोधियों को ठिकाने लगाने और राजनीतिक बदला लेने या अंडरवर्ल्ड के इशारे पर किसी को निपटाने का भी जरिया बना. बीहड़ों के डकैत और अंडरवर्ल्ड के लोग, जो कानून व्यवस्था के लिए मुसीबत बने हुए थे, उनके खात्मे से शुरू हुई पुलिस मुठभेड़ की कार्रवाई बहुत जल्द ही पुलिस अधिकारियों के लिए  पद-पैसे में बढ़ोतरी और प्रशंसा बटोरने का खेल बन गई. पिछले दो-तीन दशकों में कई ऐसे एनकाउंटर के मामले चर्चित हुए जो पहले पुलिस के दावे से अलग फर्जी एनकाउंटर या कहें पुलिस द्वारा की गई गैर-कानूनी हत्या साबित हुए.
इशरत जहां एनकाउंटर, जिसे बाद में हुई जांच में फर्जी पाया गया था

उत्तर प्रदेश फर्जी एनकाउंटर के मामले में सबसे अव्वल है. अगस्त 2009 में लखनऊ में ह्यूमन राइट्स वॉच ने ‘ब्रोकेन सिस्टम, डिस्फंक्शनल एब्यूज ऐंड इम्प्यूनिटी इन इंडियन पुलिस’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की थी. रिपोर्ट की शुरुआत में एक पुलिस अधिकारी का कबूलनामा था, ‘इस हफ्ते मुझे एक एनकाउंटर करने को कहा गया है. मैं उसकी तलाश कर रहा हूं. मैं उसे मार डालूंगा. हो सकता है कि मुझे जेल भेज दिया जाए लेकिन यदि मैं ऐसा नहीं करता तो मेरी नौकरी चली जाएगी.’ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2010 से 2015 के बीच देश में सबसे ज्यादा फर्जी एनकाउंटर उत्तर प्रदेश में हुए. इस दौरान यूपी में लगभग 782 फर्जी एनकाउंटर की शिकायतें दर्ज कराई गईं. वहीं, दूसरे नंबर पर आंध्र प्रदेश रहा, जहां सिर्फ 87 फर्जी एनकाउंटर की शिकायतें आईं.

आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी के मुताबिक, इन 782 मामलों में से 160 मामलों में यूपी सरकार ने पीड़ित परिवार को लगभग 9.47 करोड़ रुपये मुआवजा भी दिया. वहीं, इस दौरान पूरे देश में कुल 314 शिकायतों में मुआवजे दिए गए. यूपी और आंध्र प्रदेश के बाद तीसरा नंबर बिहार और चौथा असम का रहा. जहां इस दौरान बिहार में 73 फर्जी एनकाउंटर के मामले आए तो असम में 66 मामले दर्ज हुए. इसके अलावा जुलाई 2014 में गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने बताया था कि साल 2011 से 2014 के बीच 185 फर्जी मुठभेड़ के केस पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज हुए थे. इनमें सबसे ज्यादा यूपी में 42 केस और इसके बाद झारखंड में 19 केस दर्ज हुए हैं. आंकड़ों के मुताबिक, 2006 में भारत में मुठभेड़ों में हुई कुल 122 मौतों में से 82 अकेले उत्तर प्रदेश में हुईं. 2007 में यह संख्या 48 थी जो देश में हुई 95 मौतों के 50 फीसदी से भी ज्यादा थी. 2008 में जब देश भर में 103 लोग पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए तो उत्तर प्रदेश में यह संख्या 41 थी. 2009 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 83 लोगों को मुठभेड़ों में मारकर अपने ही पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए.

उत्तर प्रदेश के भदोही में 2005 में हुई एक फर्जी मुठभेड़ के केस में 28 पुलिसकर्मियों के विरुद्ध मामला दर्ज हुआ था. सीआईडी जांच में पाया गया कि 5000 रुपये के इनामी बदमाश विजय उर्फ लल्लू उर्फ बुद्धसेन को पुलिस ने मार गिराया था. पुलिस ने इसे मुठभेड़ दिखाया लेकिन बाद में इसे फर्जी पाया गया. जिन 28 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया, उनमें से पांच बाद में थाना प्रभारी भी बन गए.

पीलीभीत फर्जी एनकाउंटर मामले के पहले भी एनकाउंटर की कई ऐसी घटनाएं सामने आईं जो फर्जी साबित हुईं. दिसंबर 2015 में सीबीआई की विशेष अदालत ने मेरठ के दौराला के एक जंगल में फर्जी मुठभेड़ मामले में तीन सेवानिवृत्त अधिकारियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इस घटना में मेरठ कॉलेज की एक 20 साल की छात्रा स्मिता भादुड़ी की 14 जनवरी, 2000 को मेरठ के सिवाया गांव के पास फर्जी मुठभेड़ में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. अतिरिक्त जिला न्यायाधीश नवनीत कुमार ने सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक अरुण कौशिक, कांस्टेबल भगवान सहाय और सुरेंद्र कुमार को हत्या का दोषी पाया था.

जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के माछिल सेक्टर में अप्रैल 2010 में एक फर्जी मुठभेड़ का मामला सामने आया था. इस मामले में सेना ने 2015 में एक कर्नल रैंक अधिकारी समेत छह जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. कर्नल दिनेश पठानिया, कैप्टन उपेंद्र, हवलदार देवेंद्र कुमार, लांस नायक लखमी, लांस नायक अरुण कुमार और राइफल मैन अब्बास हुसैन ने तीन आतंकियों को मारने का दावा किया था. मरने वालों की तस्वीर सामने आने के बाद काफी विवाद हुआ. मरने वालों के परिजनों ने दावा किया कि वे तीनों सामान्य नागरिक थे, जिनको फर्जी मुठभेड़ में मारा गया. उनकी पहचान  बारामूला जिले के नदीहाल इलाके के रहने वाले मोहम्मद शाफी, शहजाद अहमद और रियाज अहमद के रूप में की गई. इस घटना के बाद पूरी कश्मीर घाटी में अशांति फैल गई. बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए जिसमें 123 लोग मारे गए थे. पुलिस जांच में साबित हुआ कि तीनों नागरिकों को नौकरी का झांसा देकर सीमा पर ले जाया गया जहां उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया. इस मुठभेड़ का मकसद इनाम और प्रमोशन पाना था. सेना ने जनरल कोर्ट मार्शल का आदेश दिया तो छह जवान दोषी पाए गए.

पीलीभीत फर्जी एनकाउंटर मामले के पहले भी एनकाउंटर की कई ऐसी घटनाएं सामने आईं जो फर्जी साबित हुईं. दिसंबर 2015 में सीबीआई की विशेष अदालत ने मेरठ के दौराला के एक जंगल में फर्जी मुठभेड़ मामले में तीन सेवानिवृत्त अधिकारियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इस घटना में मेरठ कॉलेज की एक 20 साल की छात्रा स्मिता भादुड़ी की 14 जनवरी, 2000 को मेरठ के सिवाया गांव के पास फर्जी मुठभेड़ में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. अतिरिक्त जिला न्यायाधीश नवनीत कुमार ने सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक अरुण कौशिक, कांस्टेबल भगवान सहाय और सुरेंद्र कुमार को हत्या का दोषी पाया था.

जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के माछिल सेक्टर में अप्रैल 2010 में एक फर्जी मुठभेड़ का मामला सामने आया था. इस मामले में सेना ने 2015 में एक कर्नल रैंक अधिकारी समेत छह जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. कर्नल दिनेश पठानिया, कैप्टन उपेंद्र, हवलदार देवेंद्र कुमार, लांस नायक लखमी, लांस नायक अरुण कुमार और राइफल मैन अब्बास हुसैन ने तीन आतंकियों को मारने का दावा किया था. मरने वालों की तस्वीर सामने आने के बाद काफी विवाद हुआ. मरने वालों के परिजनों ने दावा किया कि वे तीनों सामान्य नागरिक थे, जिनको फर्जी मुठभेड़ में मारा गया. उनकी पहचान  बारामूला जिले के नदीहाल इलाके के रहने वाले मोहम्मद शाफी, शहजाद अहमद और रियाज अहमद के रूप में की गई. इस घटना के बाद पूरी कश्मीर घाटी में अशांति फैल गई. बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए जिसमें 123 लोग मारे गए थे. पुलिस जांच में साबित हुआ कि तीनों नागरिकों को नौकरी का झांसा देकर सीमा पर ले जाया गया जहां उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया. इस मुठभेड़ का मकसद इनाम और प्रमोशन पाना था. सेना ने जनरल कोर्ट मार्शल का आदेश दिया तो छह जवान दोषी पाए गए.

पीलीभीत फर्जी एनकाउंटर मामले के पहले भी एनकाउंटर की कई ऐसी घटनाएं सामने आईं जो फर्जी साबित हुईं. दिसंबर 2015 में सीबीआई की विशेष अदालत ने मेरठ के दौराला के एक जंगल में फर्जी मुठभेड़ मामले में तीन सेवानिवृत्त अधिकारियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इस घटना में मेरठ कॉलेज की एक 20 साल की छात्रा स्मिता भादुड़ी की 14 जनवरी, 2000 को मेरठ के सिवाया गांव के पास फर्जी मुठभेड़ में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. अतिरिक्त जिला न्यायाधीश नवनीत कुमार ने सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक अरुण कौशिक, कांस्टेबल भगवान सहाय और सुरेंद्र कुमार को हत्या का दोषी पाया था.

जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के माछिल सेक्टर में अप्रैल 2010 में एक फर्जी मुठभेड़ का मामला सामने आया था. इस मामले में सेना ने 2015 में एक कर्नल रैंक अधिकारी समेत छह जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. कर्नल दिनेश पठानिया, कैप्टन उपेंद्र, हवलदार देवेंद्र कुमार, लांस नायक लखमी, लांस नायक अरुण कुमार और राइफल मैन अब्बास हुसैन ने तीन आतंकियों को मारने का दावा किया था. मरने वालों की तस्वीर सामने आने के बाद काफी विवाद हुआ. मरने वालों के परिजनों ने दावा किया कि वे तीनों सामान्य नागरिक थे, जिनको फर्जी मुठभेड़ में मारा गया. उनकी पहचान  बारामूला जिले के नदीहाल इलाके के रहने वाले मोहम्मद शाफी, शहजाद अहमद और रियाज अहमद के रूप में की गई. इस घटना के बाद पूरी कश्मीर घाटी में अशांति फैल गई. बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए जिसमें 123 लोग मारे गए थे. पुलिस जांच में साबित हुआ कि तीनों नागरिकों को नौकरी का झांसा देकर सीमा पर ले जाया गया जहां उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया. इस मुठभेड़ का मकसद इनाम और प्रमोशन पाना था. सेना ने जनरल कोर्ट मार्शल का आदेश दिया तो छह जवान दोषी पाए गए.

अप्रैल 2015 में आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु सीमा पर तिरुपति के पास आंध्र प्रदेश के सेशाचलम के जंगल में एसटीएफ ने 20 लोगों को मार गिराया. एसटीएफ ने दावा किया कि ये सभी दुर्लभ लाल चंदन की लकड़ियों की तस्करी से जुड़े थे, लेकिन बाद में जो तस्वीरें और तथ्य सामने आए वे विरोधाभासी थे. मारे गए लोगों के परिजनों ने दावा किया कि वे सभी मजदूर थे जिनकी गलत तरीके से हत्या की गई. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इस एनकाउंटर पर सवाल उठाए थे. इसी दौरान अप्रैल 2015 में तेलंगाना के वारांगल जिले में पुलिस ने पांच ऐसे लोगों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया जो न्यायिक हिरासत में थे. पुलिस के मुताबिक वारंगल सेंट्रल जेल से हैदराबाद कोर्ट ले जाते समय कैदियों ने हथियार छीनने की कोशिश की और पुलिस कार्रवाई में मारे गए. इन पांचों पर एक स्थानीय आतंकी संगठन से जुड़े होने का आरोप था. जिस वक्त इन्हें मारा गया, सभी कैदियों के हाथ में हथकड़ियां लगी थीं. इस एनकाउंटर पर भी सवाल उठे थे.

भारत में पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा नक्सलियों, कुख्यात अपराधियों और बीहड़ के डकैतों को फर्जी मुठभेड़ों में मारे जाने का इतिहास काफी पुराना है. इसका चलन साठ के दशक में शुरू हुआ जब पुलिस ने बीहड़ों के डाकुओं के खिलाफ अभियान चलाए. सीधी मुठभेड़ में कुख्यात डाकुओं के मारे जाने के बाद आॅपरेशन को अंजाम देने वाले अधिकारी को राज्य सरकारों द्वारा पुरस्कार और पदोन्नति मिलती थी. बाद में सामने आया कि इन मुठभेड़ों में कुख्यात अपराधियों के अलावा कई निर्दोष लोग फर्जी तरीके से मारे गए. 20वीं सदी के आखिरी वर्षों में और नई सदी के पहले दशक में मानवाधिकार संगठनों ने इन मुठभेड़ों और गैर-कानूनी हत्याओं पर चिंताएं जाहिर करनी शुरू कीं. इसके पहले ये एनकाउंटर एक तरह से जायज माने जाते रहे. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का मानना है कि राज्यों में होने वाली फर्जी मुठभेड़ों में से ज्यादातर को पुलिस अंजाम देती है, सेना की ओर से ऐसी कार्रवाइयां कम सामने आती हैं.

मुंबई में 1990 के दशक में संगठित अपराध खत्म करने के लिए धड़ाधड़ एनकाउंटर हुए और ऐसे अधिकारियों को ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के तमगे से नवाजा गया. पुलिस का कहना था कि एनकाउंटर करके वह न्याय प्रक्रिया में तेजी ला रही है. जनवरी, 1982 में मान्या सुर्वे नामक कुख्यात गैंगस्टर को पुलिस ने वडाला इलाके में मार गिराया. इसे मुंबई पुलिस के पहले एनकाउंटर के रूप में दर्ज किया गया. इसके बाद 2003 तक मुंबई पुलिस ने करीब 1200 एनकाउंटर किए. मुंबई पुलिस के कई अधिकारी एनकाउंटर  स्पेशलिस्ट के तौर पर पहचाने गए. जैसे इंस्पेक्टर प्रदीप शर्मा के नाम 104 एनकाउंटर करने का तमगा है. उनका कहना था, ‘अपराधी गंदगी हैं और मैं सफाईकर्मी हूं.’ शर्मा को राम नारायण गुप्ता एनकाउंटर केस में 2009 में सस्पेंड किया गया था, बाद में 2013 में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया. इसी तरह सब इंस्पेक्टर दया नायक ने 83 एनकाउंटर किए, जिन पर ‘अब तक छप्पन’ फिल्म बनी थी. इंस्पेक्टर प्रफुल्ल भोंसले के नाम 77, इंस्पेक्टर रवींद्रनाथ अंग्रे के नाम 54, असिस्टेंट इंस्पेक्टर सचिन वाजे के नाम 63 और इंस्पेक्टर विजय सालस्कर के नाम 61 एनकाउंटर केस दर्ज हैं. इंस्पेक्टर विजय सालस्कर 2008 में मुंबई आतंकी हमले में मारे गए थे.

हालांकि बाद में न्याय की इस थ्योरी पर सवाल उठना शुरू हुआ. अदालतों ने इस पर नकारात्मक टिप्पणियां कीं. कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आईं कि पुलिसवालों ने अंडरवर्ल्ड से पैसे लेकर किसी व्यक्ति की फर्जी एनकाउंटर में हत्या की. एक मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि ‘पुलिस अब जनता की रक्षक न होकर एक पेशेवर कातिल बन चुकी है.’ महाराष्ट्र में 2006 में हुए लखन भैया फर्जी मुठभेड़ मामले में 11 पुलिसकर्मियों को मुंबई सत्र अदालत ने जुलाई 2013 में दोषी करार दिया था.

हाल के वर्षों में रणवीर फर्जी एनकाउंटर मामला काफी चर्चित रहा था. जुलाई 2009 में गाजियाबाद का रणवीर, जो एमबीए का छात्र था, अपने अपने एक दोस्त के साथ नौकरी के लिए इंटरव्यू देने व घूमने के लिए देहरादून गया था. उत्तराखंड पुलिस ने उसे बदमाश बताकर देहरादून स्थित लाडपुर के जंगल में एनकाउंटर में मार गिराया. उत्तराखंड सरकार ने एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मियों को सम्मानित भी किया. रणवीर के शरीर में 29 गोलियों के निशान पाए गए, जिनमें से 17 गोलियां करीब से मारी गई थीं. बहुत हंगामे के बाद में राज्य सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपते हुए इसे दिल्ली स्थानांतरित कर दिया. सीबीआई जांच में पाया गया कि यह एनकाउंटर फर्जी था. जून 2014 में दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 17 पुलिसकर्मियों को अपहरण, हत्या की साजिश और हत्या के जुर्म में उम्रकैद और एक पुलिसकर्मी को दो साल की सजा सुनाई.

राजस्थान पुलिस की एसओजी टीम ने अक्टूबर 2006 में एक संदिग्ध डकैत दारा सिंह को मार गिराया. पुलिस ने उस पर 25 हजार का इनाम रखा था. पुलिस ने दावा किया कि हत्या और स्मगलिंग के केस में बंद दारा सिंह ने हिरासत से भागने की कोशिश की तो एनकाउंटर में मारा गया. दारा सिंह की पत्नी सुशीला की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया. सीबीआई ने 2011 में जांच पूरी करके 16 लोगों के खिलाफ चार्जशीट तैयार की. इसमें तत्कालीन एडिशनल डीजीपी, एसपी, एडिशनल एसपी, सात सब इंस्पेक्टर और तीन कॉन्स्टेबल भी शामिल थे. इस केस की सुनवाई करते हुए जस्टिस मार्कंडेय काटजू और सीके प्रसाद की बेंच ने सभी आरोपियों की गिरफ्तारी का आदेश देते हुए कहा था, ‘पुलिस को कानून का संरक्षक माना जाता है और यह आशा की जाती है कि वह लोगों की जान की सुरक्षा करेगी, न कि उनकी जान ही ले लेगी. पुलिस द्वारा की जाने वाली फर्जी मुठभेड़ अमानवीय हत्या के अलावा कुछ नहीं है, जिसे रेयरेस्ट ऑफ द रेयर अपराध माना जाएगा. फर्जी मुठभेड़ों में संलिप्त पुलिसवालों को फांसी पर लटका देना चाहिए.’

गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान कई एनकाउंटर हुए जो विवादों में रहे. एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, 2002 से 2007 के बीच गुजरात में 31 फर्जी  एनकाउंटर हुए. फर्जी एनकाउंटर को लेकर गुजरात के कुल 32 पुलिस अधिकारी जेल गए, जिनमें से ज्यादातर अभी तक जेल में हैं. इन अधिकारियों में पांच आईपीएस अफसर भी शामिल हैं. हाल ही में गुजरात के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट, 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी डीजी वंजारा नौ साल बाद गुजरात पहुंचे तो उनका भव्य स्वागत किया गया. वे 2007 में गिरफ्तार किए गए थे. 2015 में जमानत मिली, लेकिन सीबीआई कोर्ट ने उनके गुजरात में प्रवेश पर रोक लगा रखी थी. बाद में कोर्ट ने यह रोक हटा ली.

वंजारा 2002 से 2005 तक अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस थे. इस दौरान राज्य में करीब बीस लोगों का एनकाउंटर हुआ. बाद में जब सीबीआई जांच हुई तो पता चला कि इनमें से कई एनकाउंटर फर्जी थे. वंजारा के बारे में कहा जाता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत करीबी थे. 2007 में गुजरात सीआईडी ने उन्हें गिरफ्तार किया और जेल भेजा. उन पर सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौसर बी, तुलसीराम प्रजापति, सादिक जमाल, इशरत जहां समेत आठ लोगों की हत्या का आरोप है. इन सभी एनकाउंटरों के बाद गुजरात क्राइम ब्रांच ने दावा किया था कि ये सभी पाकिस्तानी आतंकी थे और गुजरात के मुख्यमंत्री को मारना चाहते थे, लेकिन बाद में कोर्ट के आदेश पर सीबीआई जांच में साबित हुआ कि ये सभी एनकाउंटर फर्जी थे.

इशरत जहां एनकाउंटर केस 15 जून, 2004 को अहमदाबाद में हुआ था. इसमें 19 वर्षीय इशरत के साथ जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लै, अमजद अली, अकबर अली राणा और जीशान जौहर मारे गए थे. इस मामले में पृथ्वीपाल पांडेय (पीपी पांडेय) व जीएल सिंघल समेत सात अधिकारियों को सीबीआई ने चार्जशीट में अभियुक्त बनाया था. बाद में जीएल सिंघल ने यह कहते हुए इस्तीफा भी दिया था कि सरकार उनका बचाव नहीं कर रही, जबकि उन्होंने क्राइम ब्रांच में रहते हुए जो भी किया, वह सब सरकार के दिशा-निर्देश पर किया.

पीपी पांडेय 1982 बैच के अधिकारी हैं जो 2003 में अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के मुखिया बने. उनकी अगुवाई में क्राइम ब्रांच ने 11 कथित आतंकियों को मुठभेड़ों में मार गिराया. इन मुठभेड़ों में कई के फर्जी होने के आरोप लगे. इनमें से इशरत जहां मुठभेड़ भी शामिल है. सीबीआई का दावा था कि पांडे ने इंटेलीजेंस ब्यूरो के अफसरों के साथ मिलकर इस कथित फर्जी मुठभेड़ की ‘साजिश’ रची. अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित किया. बाद में उन्होंने आत्मसमर्पण किया था. फरवरी 2016 में सीबीआई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद उन्हें फिर से बहाल करके अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) बनाया गया. अप्रैल में उन्हें गुजरात पुलिस का प्रभारी महानिदेशक बनाया गया.

हाल में पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई ने एक इंटरव्यू में कहा कि इशरत मामले में दूसरा हलफनामा गृह मंत्री पी चिदंबरम के कहने पर बदला गया था. इसी बीच गृह मंत्रालय के एक मौजूदा अधिकारी आरवीएस मणि ने आरोप लगाया कि इशरत मुठभेड़ के मामले में हलफनामा बदलवाने के लिए सतीश वर्मा ने उन पर दबाव बनाया और प्रताड़ित किया. गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी सतीश वर्मा इशरत जहां एनकाउंटर की जांच करने वाली कोर्ट की गठित उस एसआईटी के सदस्य थे. वर्मा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा, ‘ये पूरा आईबी नियंत्रित ऑपरेशन था. चार लोगों को पकड़ा गया. इनमें से दो के बारे में आईबी को जानकारी थी कि वे संभवत: लश्कर-ए-तैयबा के सदस्य थे. इन सभी पर आईबी और गुजरात पुलिस की नजर थी और फिर ये लोग कथित मुठभेड़ में मार दिए गए. ये पूरा ऑपरेशन बड़ा कामयाब था. लेकिन साथ ही फर्जी भी था.’

26 नवंबर, 2005 को सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस हुआ. सोहराबुद्दीन शेख पर हत्या, उगाही करने और अवैध हथियारों का धंधा चलाने जैसे 60 आपराधिक मामले चल रहे थे. 23 नवंबर को वह अपनी बीवी कौसर बी के साथ हैदराबाद से महाराष्ट्र जा रहा था तभी गुजरात एटीएस ने दोनों को उठा लिया. तीन दिन बाद पुलिस हिरासत में ही सोहराबुद्दीन का एनकाउंटर कर दिया गया. आरोप है कि कौसर बी को भी मारकर अधिकारी डीजी वंजारा के गांव में दफना दिया गया. इस घटना के करीब एक साल बाद सोहराबुद्दीन के सहयोगी तुलसी प्रजापति का भी एनकाउंटर हो गया. इस एनकाउंटर को लेकर भाजपा नेता और गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह पर आरोप लगे कि यह एनकाउंटर उनके कहने पर किया गया है. अमित शाह को जेल भी जाना पड़ा था. इन मुठभेड़ों में जेल जाने वाले वंजारा ने भी दावा किया था कि ‘गृहमंत्री अमित शाह ने कई लोगों के एनकाउंटर का आदेश दिया था.’ 2014 में विशेष कोर्ट ने अमित शाह के खिलाफ आरोप खारिज कर दिए.

सितंबर 2008 में दिल्ली के बाटला हाउस में पुलिस ने दो संदिग्ध आतंकियों को मारने का दावा किया. दो आतंकी पकड़े गए थे और एक भागने में सफल रहा था. इस मुठभेड़ में एक इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा भी मारे गए. जामा मस्जिद के शाही इमाम समेत मानवाधिकार संगठनों से इस एनकाउंटर को फर्जी बताया और जांच की मांग की. हालांकि, जांच के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अाैर अदालत ने फर्जी एनकाउंटर के आरोप को खाारिज कर दिया.

हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ में कई ऐसे मामले सामने आए जब पुलिस-नक्सल मुठभेड़ को लेकर सवाल उठे. पुलिस का दावा है कि उसने नक्सली मारे लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि पुलिस ग्रामीण आदिवासियों को नक्सली बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार रही है. कुछ दिनों पहले प्रदेश कांग्रेस ने जनाक्रोश रैली की जो इसी मसले पर थी. इस रैली में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल ने कहा, ‘चिड़िया मारने वाली बंदूक रखने वाले आदिवासियों को 5 से 10 लाख तक का इनामी नक्सली बताकर पुलिस झूठी मुठभेड़ में उन्हें मार रही है. पुलिस को नक्सलियों को मारना ही है तो पहले ऐसे आरोपियों के नाम और पहचान की सूची उजागर करे जो सभी थानों में सहज सुलभ हो. बस्तर में फर्जी मुठभेड़ का खेल खेलकर पुलिस झूठी वाहवाही ले रही है. बेकसूर आदिवासियों को या तो जेल में ठूंसा जा रहा है या मार दिया जाता है.’

उत्तर प्रदेश पुलिस में अतिरिक्त महानिदेशक रह चुके एसआर दारापुरी कहते हैं, ‘राजनीति में अपराधी तत्वों का बढ़ता प्रभाव कथित फर्जी मुठभेड़ों के पीछे एक बड़ा कारण है. जो राजनेता सत्ता में हैं, उनके लिए काम करने वाले अपराधियों को संरक्षण मिलता है जबकि उनके विरोधियों के लिए काम करने वाले अपराधियों को खत्म करने के लिए पुलिस को औजार बनाया जाता है. कई मामलों में पुलिस सत्तारूढ़ राजनेताओं को खुश करने के लिए, पदोन्नति और शौर्य पदकों के लिए भी ऐसी कार्रवाइयां करती है.’

जब अपराधियों को सजा देने के लिए पुलिस, कानून और अदालतें मौजूद हैं तो किसी को कानून से परे जाकर मारने की प्रक्रिया क्यों अपनाई जाती है, इसके जवाब में पूर्व अधिकारी प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘फर्जी एनकाउंटर के मामले इसलिए होते हैं कि सारा समाज चाहता है कि इस तरह के एनकाउंटर हों. आपको सुनकर अजीब लगेगा, लेकिन सारा समाज चाहता है. उसका कारण यह है कि समाज में कुछ ऐसे अराजक तत्व या जघन्य अपराधी हैं जिनको कानून नहीं पकड़ पाता है. अगर पकड़ता भी है तो जमानत हो जाती है. मुकदमे 20 साल चलते हैं. तब तक गवाह टूट जाते हैं. लोग कहते हैं कि इनको मारो और खत्म करो. नेता चुपचाप पुलिस के कान में कहता है कि मारो और खत्म करो. जनता भी कहती है कि वाह-वाह, जान छूटी. ऐसे बदमाश से छुट्टी मिली. मुख्य कारण तो यह है कि लोग चाहते हैं और खुलकर कोई नहीं कहता है. दूसरे, हमारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम इतना विलंब से काम करता है, कछुए की चाल चलता है कि इस तरह की कार्रवाई को सामाजिक मान्यता मिली हुई है. अब आप कह रहे हैं कि इसकी वजह से कई निर्दोष लोग मारे जाते हैं, यह भी सही है. जब आप इस तरह की छूट दीजिएगा तो जाहिर है कि पुलिस इसका दुरुपयोग करेगी और करती भी है.’

रिहाई मंच संगठन से जुड़े वकील मोहम्मद शोएब कहते हैं, ‘कानून फर्जी एनकाउंटर की इजाजत बिल्कुल नहीं देता है. पुलिस एनकाउंटर के मसले में किसी भी तरह से नियमों का पालन नहीं करती है. पुलिस को ऐसा कोई अधिकार ही नहीं है. हां, पुलिस को अगर अपनी जान का खतरा है तो वह किसी को मार सकती है. लेकिन जानबूझकर किसी को मारा जाए, तो यह कानूनन गलत है. जिस व्यक्ति से उनको जान का खतरा नहीं है, उसे भी मार देना गलत है. ज्यादातर एनकाउंटर में पुलिस लोगों को पहले से पकड़ती है, बाद में मार देती है और उसे दिखाती है कि यह एनकाउंटर में मारा गया. एनकाउंटर के बाद उस मसले की जांच तभी होती है जब कोई शिकायत आती है, वरना तो पुलिस के दावे को ही मान लिया जाता है. पुलिस कहती है कि फलां आदमी मुठभेड़ में मारा गया, और इसे ही सच मान लिया जाता है. फर्जी एनकाउंटर के बाद भी अगर कोई इस मसले को उठाता है तो उसे इतना डरा दिया जाता है कि वह चुपचाप बैठ जाए.’

प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘इसका एक ही उपाय है कि आपका क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम इतना प्रभावशाली हो कि जघन्य अपराध में भी एक आदमी को दो साल में सजा हो जाए. 20 साल न चले मुकदमा, इसका और कोई उपाय नहीं है. इसके लिए पुलिस सुधार चाहिए. न्यायिक व्यवस्था में सुधार चाहिए. जमानत के प्रावधानों में सुधार चाहिए. मामलों का जल्दी से निस्तारण हो. चार्जशीट 60 दिन में फाइल हो जाती है. दो साल में मामले का निस्तारण हो जाना चाहिए. अभी तो लोगों को सिस्टम में विश्वास ही नहीं है कि आदमी पकड़ा तो गया, लेकिन उसको सजा कहां होगी. शहाबुद्दीन ज्वलंत उदाहरण हैं. उन्होंने जेएनयू के प्रेसिडेंट चंद्रशेखर की हत्या करवा दी. अभी तक उन्हें कोई दंड नहीं मिला, उल्टा वे पार्टी की नेशनल एक्जिक्यूटिव के सदस्य हो गए. इसका मतलब उनको राजनीतिक संरक्षण हासिल है. न्यायिक तंत्र से सजा भी नहीं हो पाती है. ऐसे लोगों के लिए क्या उपाय है. हर कोई यही चाहेगा कि ऐसे लोग न रहें तो अच्छा है. समाज के पाप और व्यवस्था के निकम्मेपन की गठरी पुलिस अपने सर पर ढोती है.’
(यह लेख अप्रैल, 2016 में तहलका हिंदी में प्रकाशित हो चुका है.)


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