मंगलवार, 20 सितंबर 2016

कसाई की दुकान पर बकरा नहीं पाला जा सकता : मुनव्वर राना

शायरी को महबूबा से मां की मुहब्बत तक ले आने वाले शायर मुनव्वर राना के तमाम परिजन बंटवारे के दौरान पाकिस्तान चले गए थे. उस बात का जिक्र आते ही वे भावुक हो जाते हैं. उनका ख्वाब है कि हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में कभी जंग न हो. जब उन पर हमले हों तो तीनों मिलकर लड़ें. वे तीनों देशों की एकता के हामी हैं, लेकिन तीनों देशों के एकीकरण को नामुमकिन मानते हैं. उनसे मेरी बातचीत का कुछ अंश-


भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश- तीनों मुल्कों के एकीकरण की बात बार-बार उठती है. एकीकरण पर आपका क्या नजरिया है?

Munawwar Rana 
देखिए, मुल्क भी घर की तरह होते हैं. जब घर में एक बार दीवारें उठ जाती हैं तो टूटती नहीं हैं. इसलिए ये नामुमकिन है कि तीनों मुल्क एक हो जाएंगे. यह बिल्कुल वैसा है कि तीनों भाई फिर से आकर एक घर में रहने लगें. अगर तीनों भाइयों में मोहब्बत बरकरार रहती है तो यह भी वैसे ही है जैसे तीनों एक जगह रहते हैं. तो ये ख्वाब देखने से कोई फायदा ही नहीं है क्योंकि रास्ते में इतनी अड़चनें हैं कि ये मुमकिन ही नहीं है. ये तो बिल्कुल वैसा ही है कि सूरज पूरब की जगह पश्चिम से निकल आए. लेकिन जरूरत इस बात की है कि जब ये तमाम यहूदी और ईसाई एक होकर दुनिया के तमाम फैसले करते हैं, बमबारी करके तमाम मुल्कों को बर्बाद करते हैं, दुनिया में पहले एड्स फैलाते हैं फिर उसकी दवाएं बेचते हैं, तो हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक होकर दुनिया का मुकाबला करने के लिए क्यों नहीं खड़े हो सकते?

मेरा विचार यह है कि 25 साल तक तीनों देशों में इस बात पर मुआयदा हो कि हममें जंग नहीं होगी, हममें छेड़छाड़ नहीं होगी. 25 साल में जो हम जंगी सामान खरीदते हैं, उनमें कटौती करके एजुकेशन और मेडिकल हब बनाएंगे. तो ये एक ऐसी शुरुआत हो सकती है कि तीनों मुल्कों में लोगों के दिल एक हो जाएं. क्योंकि अगर आप बर्लिन की मिसाल देते हैं तो दोनों के दिल एक थे. यहां दिल एक नहीं हैं. यहां सियासत ने इतनी नफरतें फैला रखी हैं, इतनी कहानियां बुन रखी हैं कि वहां खबर फैला दी गई कि हिंदू बहुत जालिम होता है, काट देगा. यहां वालों को ये बता दिया गया कि मुसलमान बहुत जालिम होता है, जाओगे तो छुरी लेकर बैठा रहता है, अल्ला हो अकबर कर देगा. जहां इतने फासले हों, इतनी कहानियां हों, जब तीनों मुल्क कहानियों पर चल रहे हों, तीनों मुल्क आज तक जब ये फैसला नहीं कर सके कि बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि दोनों एक ही मुल्क की चीजें हैं, उसके लिए लड़ रहे हैं. जितना कागज बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि पर खर्च कर दिया गया, उतने में हमारी एक पूरी पीढ़ी शिक्षित हो गई होती. बजाय यह करने के उस पर पैसा बर्बाद किया गया. ऐसे एशियाई मुल्कों को आप एक नहीं कर सकते. सिर्फ यही है कि चूंकि इनके पहनावे, इनकी बोली, इनका खान-पान, रहन-सहन, मिजाज सब एक है. ये सब एग्रेसिव हैं, जरा-से में गुस्सा हो जाएं, जरा-से में आपकी जूतियां उठा लें. जरा-से में लड़ने को तैयार हो जाएं, जरा से में गुलाब का फूल लेकर खड़े हो जाएं. ये तीनों के मिजाजों में शामिल हैं. इस लिहाज से तीनों आपस में रिश्तेदार हैं. तो रिश्तेदार अगर आपस में मिल जाएं तो यही बहुत है. ये जरूरी नहीं कि सब रिश्तेदार एक घर में आकर रहने लगें.

आजादी की लड़ाई के दौरान एक तरफ संघ और हिंदू महासभा थी और दूसरी तरफ मुस्लिम लीग थी. हिंदू संगठनों का वृहद भारत का अभियान तब से चल रहा है. दूसरी तरफ मुसलमानों के खिलाफ समय-समय पर द्वेषपूर्ण अभियान भी चलता रहता है. इस अंतर्विरोध के साथ एकीकरण कैसे संभव है?

देखिए, जब इतिहास में झूठ लिखा जाने लगे, इतिहास में लिखे झूठ पर फैसला किया जाने लगे, इतिहास में लिखे सच पर पर्दा डाला जाने लगे और अगर सड़कों के नाम मिटाए जाने लगे तो ऐसे में एकीकरण के बारे में कैसे सोचा जाए? इतिहास में लिखी इस बात को नहीं तलाश किया जा रहा है कि औरंगजेब के जमाने में ही हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा मुल्क था. उसके बाद हिंदुस्तान घटता ही गया. ये जितने म्यांमार, नेपाल, अफगानिस्तान और काबुल ये सब हमारे ही मुल्क में थे. हिंदुस्तान सबसे बड़ा मुल्क औरंगजेब के जमाने में था. उसने पूरी जिंदगी हिंदुस्तान को बड़ा और एक करने में गुजारी. तो उसकी इस बात से पर्दा डालने में लगे हैं. अब ये बताने में लगे हैं कि उसने अपने भाई को मार दिया. अगर उसने अपने भाई को मार दिया तो अशोक ने क्या किया था? कहने का मतलब कि जब इतिहास से खराब चीजें निकालकर आप फैसला करेंगे तो कैसे होगा? असल में, ये सब मसले जब तक सियासत से निकालकर बाहर नहीं लाएंगे, बात नहीं बनेगी. मैं कहता रहा हूं कि जब तक साहित्यकार, लेखक, कवि, कलाकार, पत्रकार- ये 25 से 30 प्रतिशत तक संसद में नहीं आते, तब तक देश के हालात सुधर नहीं सकते, चाहे ये देश हो या वो देश हो. क्योंकि यहां से जो जाते हैं, वे केवल छुट्टी में जाते हैं पाकिस्तान और चले आते हैं. हमारी तरह वो खुले में नहीं घूमते. तो ये कैसे मेल कर सकते हैं.

जब तक यह सोचने वाले लोग न हों, जिनका मिजाज एकता का हो, तब तक ऐसा नहीं हो सकता. आप देखिए कि कसाई की दुकान पर बकरा नहीं पाला जा सकता है. इनके मिजाज जो हैं, वो नफरत करने वाले हैं, चाहे इधर के हों या उधर के हों, चाहे मुसलमान हों, या हिंदू हों, इनके यहां मुहब्बत का तसव्वुर किया ही नहीं जा सकता. इनसे हमें जंग करनी पड़ेगी, लेकिन जैसी जंग हमारे महात्मा गांधी करते थे, अहिंसा के साथ.

जिस दौरान नरेंद्र मोदी पाकिस्तान गए, उसी दौरान राम माधव ने अल जजीरा चैनल को साक्षात्कार दिया कि तीनों मुल्क कानूनी रास्ते से भाईचारे के साथ एक हो जाएंगे. क्या ये एक राजनीतिक अभियान भर है या फिर इसका कोई और निहितार्थ है? क्या ऐसा हो सकता है?

अगर राम माधव के घर के चार लोग अलग-अलग रहने लगे हों तो उनसे कहिए पहले उनको एक कर लें, हम हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश को एक कर लेंगे. जो बात लॉजिक में नहीं आती है, उसको कैसे कर लेंगे आप? ये है कि चार घर हो जाएं, लेकिन चार दिल न हों. दिल न बंटें. हम तो कहते हैं कि हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में ये मुआयदा होना चाहिए, दिलों में ये मुहब्बत होनी चाहिए कि एक भाई पर हमला हो तो तीनों भाई मिलकर लड़ेंगे. ये फैसला सुना दें दुनिया को कि कोई जंग होगी तो तीनों मिलकर लड़ेंगे. आप देखेंगे कि पूरी दुनिया की रूह कांप जाएगी.

तीनों देशों की एकता की जो बातें आप कह रहे हैं, ये कैसे संभव है? क्या यूरोपीय संघ के तौर पर कोई संघ बन सकता है?

क्यों नहीं बन सकता? ये फर्जी मुठभेड़, फर्जी आतंकवादी, फर्जी बमबारी, ये खत्म हो जाए तो सब ठीक हो जाएगा. सब मिल जाएंगे आपस में. आप बॉर्डर पर जाकर देखें तो मिलिट्री चीखती है कि इतना सख्त पहरा है कि परिंदे पर नहीं मार सकते, लेकिन पाकिस्तान की चिड़ियां हजारों की तादाद में आकर हिंदुस्तान के दरख्तों पर बैठ जाती हैं. तो वहां सब एक हैं. कोई नफरत नहीं है. एक-दूसरे से मांग कर बीड़ी पीते हैं. एक-दूसरे से मांग कर सिगरेट पीते हैं. एक-दूसरे से मांग कर दवा खाते हैं. वहां सब मुहब्बत से एक साथ हैं. अचानक एक शोशा-सा उठता है और बात बिगड़ जाती है. लेकिन सरहदी जिंदगी बड़ी खतरनाक है. कब किसको कहां पकड़कर कहां इस्तेमाल कर लिया जाए. मुजरिम बना दिया जाए, जासूस बना दिया जाए, स्मगलर बना दिया जाए, पाकिस्तानी-हिंदुस्तानी बना दिया जाए. दोनों तरफ ये है. लेकिन ये सब करना बहुत आसान है. मेरा कहना है कि अगर 25 बरस तक ये मुआयदा हो जाए कि जंग नहीं होगी तो सब ठीक हो जाएगा.

ये एक शायर का ख्वाब है जो बहुत सुंदर लगता है. क्या अस​ल में ये संभव है?

मोदी साहब ने पिछले साल एक पहल की जो पाकिस्तान में उतर गए जहाज से, ये बड़ा काम था. इसे दुनिया किसी नजर से देखे, हम एक शायर की नजर से देखते हैं. एक इंसान की नजर से देखते हैं, एक बहादुर इंसान की नजर से देखते हैं कि अगर मोदी साहब उतरे तो इसे हिंदुस्तान की कमजोरी न समझा जाए. जिस तरह मोदी उतर सकते हैं, वैसे ही हमारी फौजें भी लाहौर में उतर सकती हैं. इसे हमारी कमजोरी न समझा जाए. लेकिन हम अगर हिंदुस्तानी हैं तो हम बड़े भाई की तरह हैं. बड़े भाई का नसीब ही ऐसा होता है कि उसे झुकना पड़ता है छोटे भाई को मनाने के लिए. मोदी इसलिए नहीं गए थे कि उनको कोई समझौता करना है वहां, झुकना है, वो तो सिर्फ उनकी मां के पैर छूने गए थे. हमने वहां सारी जिंदगी शायरी की है. हम इस रिश्ते के बारे में जानते हैं कि यह बहुत ही अजीबोगरीब रिश्ता है. हमने ये बात पहले भी कई बार कही है कि ‘कोई सरहद नहीं होती, कोई गलियारा नहीं होता, अगर मां बीच में होती तो बंटवारा नहीं होता’.
तो मैं ये कहता हूं कि अगर नेहरू और जिन्ना की मांएं भी बैठी होतीं 1947 में तो शायद हिंदुस्तान बंटता नहीं. तो अब भी अगर कोई बातचीत हो तो दोनों की मांओं को वहां मौजूद रहना चाहिए. आप देखिएगा कि इस मसले का हल निकलेगा और नफरतें बीच में पनप नहीं पाएंगी.

जब मुल्क बंटवारा हुआ, आप कितने बरस के थे. उस वक्त की कुछ बातें याद हैं?

तब हम दो बरस के थे. बंटवारे की कोई याद नहीं है. हां, मुहाजिरनामा हमारी किताब है. दरअसल, बंटवारा ऐसी कहानी है जिसको आज तक आपके माता-पिता आपको सुनाते हैं. उनके माता-पिता उनको सुनाते रहे. ये ऐसा गम है जो कभी पुराना हुआ ही नहीं. ये ऐसा गम है जो कभी मैला हुआ ही नहीं, ये हमेशा ताजा होता रहा.

बंटवारा होने के बाद आपके परिवार पर क्या असर हुआ? क्या पूरा परिवार यहीं रहा या परिवार भी बंट गया?

पाकिस्तान बना तो सबको तमाम ख्वाब दिखाए जाने लगे कि ये होगा, वो होगा. इस ख्वाब के साथ हमारी बुआएं सब चली गईं, क्योंकि उन सबके पति जाने को तैयार थे. हमारे दो चाचा चले गए. हमारी दादी चली गईं. वो दादा को भी ले गईं. पहली बार मैंने ये मुहावरा गलत होते देखा कि असल से ज्यादा सूद प्यारा होता है. क्योंकि दादी हमको बहुत चाहती थीं लेकिन हमें छोड़कर चली गईं. मेरे पिता जी नहीं गए. वो जिद्दी आदमी थे. उनसे पूछा गया कि क्या करोगे यहां हिंदुस्तान में तो बोले कि कोई काम नहीं मिलेगा तो हम अपने पूर्वजों की कब्रों की देखभाल करेंगे. लेकिन हम जाएंगे नहीं और मेरे पिता जी नहीं गए.
लेकिन पूरी जिंदगी के लिए ये जो जख्म था, जो उदासी थी, वो आज तक घरों में मौजूद है. बुआ उधर हैं, मौसी इधर हैं. खालू इधर हैं तो फूफा इधर हैं. दादी उधर हैं. मुझे तो सबसे बड़ा गम यही है कि रायबरेली के कब्रिस्तान में 600 बरस से हमारे बुजुर्गों की कब्रें बिछी हुई हैं. दो कब्रें उनमें कम पड़ती हैं, हमारी दादी की और हमारे दादा की. अगर हम कभी दुनिया के ताकतवर आदमी बन जाएं तो पाकिस्तान से उन कब्रों को नोचकर ले आएं और उनको रायबरेली की मिट्टी में बो दें. ताकि ये तरतीब जो बिगड़ गई है, वह पूरी हो जाए. जब हम लोग जाते हैं ईद-बकरीद पर कब्रों के पास, तो ये फौरन अंदाजा हो जाता है कि ये दो जगहें खाली रह गई हैं. यहां हमारे दादा और दादी को होना चाहिए था.

पाकिस्तान में रह रहे आपके परिजन, जिनको लेकर आप इतने भावुक हो जाते हैं, उनसे मिलने कभी पाकिस्तान गए आप?

हां, कई बार गया हूं. मुशायरों के हवाले से गया हूं. पहली बार 1990 में गया था. फिर 2006 से 08 तक लगातार गया. इसके बाद मैं बीमार हो गया. घुटनों का आॅपरेशन हुआ था. 2009 से 2013 तक इसी से परेशान रहा तो जाना नहीं हुआ. अबकी मैंने जाने का इरादा किया था, मुशायरा था, उन लोगों ने बुलाया था, लेकिन यहां सहिष्णुता और असहिष्णुता का मामला चल रहा था. हमने सोचा कि कुर्सियों पर जो नालायक लोग बैठे हैं, जब ये कह रहे हैं कि ये पता लगाना चाहिए कि अखलाक पाकिस्तान क्यों गया था, बजाय इसके कि अपने जुर्म पर निगाह डालें, अपने जुर्म पर शर्मिंदा हों, अपने गुनाह पर परेशान हों, ये कह रहे हैं कि अखलाक पाकिस्तान क्यों गया था. तो अगर मैं चला जाऊंगा तो ये फौरन बोल देंगे कि ये पाकिस्तान गया था, वहां से ये लेकर आया है वो लेकर आया है. मैंने कहा था टीवी पर बहस के दौरान कि 67 बरस में बिजली के तार तो जोड़ नहीं सके, लेकिन हमारे तार दाऊद इब्राहिम से जोड़ देते हैं.

असहिष्णुता की बहस में आप भागीदार रहे. उस पूरे प्रकरण पर क्या राय बनी आपकी?

दिक्कत ये है कि जब चिंतन को आप अपनी आलोचना समझने लगें तो इसका मतलब है कि आप पागल हो चुके हैं. आपका मेडिकल ​ट्रीटमेंट होना चाहिए. हमारी चिंता को आप आलोचना कह रहे हैं. हम ये कह रहे हैं कि इस देश में अगर सौ आदमी अचानक उठते हैं और एक आदमी को मार डालते हैं तो इसका मतलब है कि अगर इस एक्शन का रिएक्शन, रिएक्शन का फिर एक्शन होने लगा तो पूरा मुल्क गोधरा और गुजरात बनकर रह जाएगा. अगर ये बात मैंने कही तो मैंने बुरी बात कहां कही? ये मेरे चिंतन का विषय था, इसको आपने आलोचना कहा और फौरन कह दिया कि यहां-वहां से पैसा आ गया होगा, बिहार से ये मिल गया होगा, कांग्रेस से वो मिल गया होगा. ये कितने बेवकूफ लोग हैं कि ये सरस्वती पुत्रों को रिश्वतखोर अफसर समझते हैं. भगवान इनको सद्बुद्धि दे और क्या कहा जा सकता है?
(यह साक्षात्कार तहलका में अगस्त, 2016 में छप चुका है.)

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

मोदी जी के पीएम बनने के बाद संघ के लोगों को चर्बी चढ़ गई है : जिग्नेश मेवाणी

गुजरात में मरी गाय की चमड़ी उतार रहे कुछ दलित युवकों की पिटाई के बाद हजारों की संख्या में दलित
समुदाय के लोग सड़कों पर उतरे. इस उभार के नेतृत्व के केंद्र में जो एक नाम उभर कर आया वह है जिग्नेश मेवाणी. युवकों पर हुए अत्याचार के बाद जिग्नेश सक्रिय हुए और दलित समुदाय के लोगों को इस बात की घोषणा के लिए राजी किया कि अब वे न तो मैला उठाएंगे, न ही मरे हुए पशुओं की चमड़ी उतारने का काम करेंगे. 1980 में मेहसाणा में जन्मे जिग्नेश के पिता क्लर्क थे. अंग्रेजी साहित्य से ग्रैजुएट जिग्नेश पत्रकार भी रह चुके हैं. वे विभिन्न मोर्चों पर सामाजिक कार्यों से जुड़े रहकर दलितों, मजदूरों व किसानों के मुद्दे उठाते रहे हैं. फिलहाल वे वकालत कर रहे हैं. वे गुजरात में आम आदमी पार्टी से भी जुड़े थे, लेकिन 21 अगस्त को उन्होंने इस्तीफा दे दिया. जिग्नेश एक तरफ तो कह रहे हैं कि उनका आंदोलन पूरी तरह सामाजिक है और वे पार्टी नहीं बनाएंगे, लेकिन वे यह भी बयान दे चुके हैं, ‘200 प्रतिशत मैं राजनीति में आऊंगा. लेकिन मैं आम आदमी पार्टी से इसलिए जुड़ा हूं ताकि दलित समुदाय के लिए जो करना चाहता हूं वह सब कर सकूं.’ दलित आंदोलन के बारे में उनकी रणनीतियों और मांगों को लेकर उनसे मेरी बातचीत...

हमारे समाज में गाय को आधार बनाकर छुआछूत की परंपरा पुरानी है. पर अब इसके बहाने दलितों को पीटा जा रहा है.

देखिए, और कोई पशु माता नहीं है तो गाय ही माता क्यों है? यह सबसे अहम सवाल है. गाय को पवित्र बनाकर लंबे अरसे से एक राजनीति चल रही है जिसको संघ परिवार कई दशकों से भुनाता आ रहा है. अब उसी का परिणाम गुजरात में देखा जा रहा है. दलितों का उत्पीड़न कांग्रेस के समय भी होता रहा है, लेकिन मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद संघ परिवार के लोगों को इस तरह चर्बी चढ़ी है कि वे बेखौफ महसूस कर रहे हैं. इन लोगों को दिनदहाड़े अपराध करते हुए कोई डर नहीं है, बल्कि वे खुद वीडियो बनाकर प्रसारित करते हैं क्योंकि इसकी गारंटी है कि पुलिस और प्रशासन उनको बचा लेगा. वे जानते हैं कि वे जो कर रहे हैं उसको प्रश्रय देने वाली राजनीति मौजूद है.

हमें ये मंजूर नहीं है. हम पदयात्रा लेकर निकले और 15 अगस्त को ऊना में सभा की. हमने नारा दिया है कि गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी जमीन दो. आप मरी गाय की चमड़ी उतारने पर हमारी चमड़ी उतार लेंगे? तो आप अपनी गाय से खेलते रहो. हमें न जिंदा गाय से मतलब है, न ही मरी गाय से. हमें जमीनों का आवंटन करो. हम रोजगार की ओर जाएंगे. जिस पेशे के लिए हमें अछूत घोषित किया गया, अब उसी के लिए हमारी चमड़ी उधेड़ रहे हो, यह कैसे चलेगा? जब तक हमारी सारी मांगें मानी नहीं जातीं, हम यह आंदोलन बंद नहीं करेंगे. हमें भारत के अन्य राज्यों और विदेशों से भी समर्थन मिल रहा है.

गोरक्षकों को लेकर प्रधानमंत्री ने बयान दिया, इसके बावजूद घटनाएं रुक नहीं रही हैं. आंध्र की घटना बयान के बाद की है.

ये जो गुंडे लोग हैं, गोरक्षा के नाम पर संगठन चलाते हैं, इन सबको बैन करना चाहिए. लेकिन इससे भी ज्यादा गाय के नाम पर राजनीति खत्म करने का मसला है.  वरना ये सब होता रहेगा. मोदी साहेब का जो बयान आया है उस पर मैं कहूंगा कि भाजपा और संघ परिवार के लोग बहुत गाय माता की दुम हिला रहे थे. अब जिस तरह हजारों की संख्या में दलित शक्ति सड़कों पर उतर आई, जिस तरह से यह आंदोलन फैल रहा है, कहीं न कहीं मोदी साहेब और भाजपा को लग रहा है कि गाय की दुम अब उनके गले का फंदा न बन जाए, तब उन्होंने मुंह खोला है.

क्या मांगें हैं आपकी?

हमारी मांग है कि जिस तरह से कुछ लोगों ने दलित समाज को आतंकित किया है, जब भी उनको बेल मिले तो उन्हें तड़ीपार किया जाए. वीडियो में जो लोग पहचाने गए हैं, उन्हें गिरफ्तार किया जाए. जो पुलिसकर्मी दोषी हैं उनके खिलाफ कार्रवाई हो.  सुरेंद्र नगर में सितंबर 2012 में दो बेगुनाह दलित लड़कों को एके-47 से भूनकर मारा गया था. उसमें तीन एफआईआर हुईं. दो मामलों में चार साल बाद भी चार्जशीट दाखिल नहीं हुई. आरोपी कांस्टेबल गिरफ्तार नहीं हुआ. उस मामले में कार्रवाई हो. गुजरात के सारे जिलों में कानूनी प्रावधान के मुताबिक स्पेशल कोर्ट गठित की जाएं. जो दलित मरे जानवरों का काम नहीं करना चाहते वे और जो भी भूमिहीन दलित हैं, उनको पांच-पांच एकड़ जमीन का आवंटन हो. पहले जो जमीनें बांटी गईं उन पर अभी तक दलितों को कब्जा नहीं मिला है. वह सुनिश्चित किया जाए. गुजरात में रिजर्वेशन एक्ट ही नहीं है. रिजर्वेशन पॉलिसी बने और लागू की जाए. शेड्यूल कास्ट और शेड्यूल ट्राइब्स सबप्लान है, उसके पैसे जनरल कामों में खर्च होते हैं. सरकार एंबुलेंस खरीदती है और कहती है कि एंबुलेंस से तो सब जाएंगे चाहे सवर्ण हों या पिछड़े-दलित हों. हमारी मांग है कि ऐसा कानून बनाया जाए कि उनके लिए आवंटित पैसा उन्हीं पर खर्च हो. इसके अलावा फॉरेस्ट ऐक्ट के तहत आदिवासी समुदाय की जो एक लाख 20 हजार एप्लीकेशन पेंडिंग हैं, उन सभी को क्लियर करें.

15 अगस्त की रैली से लौट रहे दलितों पर हमले की खबर सही है?

बिल्कुल सही है. 13 घंटे तक लगातार हमले हुए हैं. दिन के 12 बजे से लेकर रात 1 बजे तक फायरिंग होती रही. यह सोची-समझी साजिश के तहत हुआ. गोरक्षक गुंडे झाड़ियों में छिपकर हमले कर रहे थे. पहले जो लोग रैली में शामिल होने आ रहे थे, उनकी गाड़ियों के कांच तोड़े गए, मारा-पीटा गया, मोबाइल छीने गए. फिर जब लोग वापस जा रहे थे तब हर नाके पर लोगों को पीटा गया. गुंडों ने बस में घुसने की कोशिश की. कई अस्पतालों में लोग भर्ती हैं. हम पुलिस को लगातार सूचना दे रहे थे, पेट्रोलिंग करवाने की कह रहे थे. बार-बार कहा गया कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं. पुलिस को एहतियातन यह सब पहले ही करना था, लेकिन पुलिस ने हमले होने के बाद भी कुछ नहीं किया. एक तरफ मोदी जी कहते हैं कि गोरक्षा के नाम पर फर्जी लोग दुकान खोलकर बैठे हैं. दूसरी तरफ गोरक्षकों को पुलिस ने खुली छूट दे रखी है. कि वे जब चाहें तब दलितों को मारें.

क्या रैली के पहले से अंदाजा था कि दलितों पर हमले हो सकते हैं?

हां बिल्कुल, रैली से पहले भी हमले हुए. रैली में न आने के लिए लोगों को धमकाया गया. रास्ते में लोगों की गाड़ियों पर हमले हुए, मारपीट की गई. इस बारे में हमने पुलिस के सभी बड़े अधिकारियों को बताया, लेकिन पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया. उसके एक दिन पहले छोटी-सी बाइक रैली निकली थी. वहां भी गोरक्षक गुंडों ने हमला किया. दलित युवकों की पिटाई करने वाले 20 आरोपी एक ही गांव के हैं. वे भी हमले में शामिल रहे. इस पर भी एक्शन नहीं लिया गया. जिन युवकों को मरी गाय उठाने के लिए पीटा गया था, उनके परिजनों पर भी हमला होते-होते बचा. उन्हें करीब 7 घंटे थाने में बैठाए रखा गया. हमने पुलिस से पीड़ित परिवारों को सुरक्षा दिए जाने मांग की थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह सब हमारी रैली और आंदोलन को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है.

क्या इसे वैसी स्थिति माना जाए जैसी 2002 में थी ?

बिल्कुल, बिल्कुल. एकदम यही हो रहा है,  उससे भी ज्यादा. एक गांव है सामखेड़, वहां के लोगों ने दलितों को 13 तारीख को पीटा, 14 को पीटा, 15 को भी हमला किया. आज 16 तारीख है, वे लोग हमले कर रहे हैं, लेकिन गांव से एक भी गोरक्षक को पकड़ा नहीं गया है. हम असहाय महसूस कर रहे हैं.

आपने जो मसले उठाए थे, वे दलित समाज के बड़े मसले हैं जिन पर अभी तो कोई बातचीत शुरू ही नहीं हुई. उस पर ये हमले भी हो रहे हैं. जाहिर है कि चुनौती और बढ़ रही है. मुश्किलों को देखते हुए आगे की क्या रणनीति होगी?

हमने कॉल दी है कि हमारी जो दससूत्रीय मांगें हैं, उनमें से एक है जमीन का आवंटन. उस पर विचार करके जमीन आवंटन की प्रक्रिया शुरू करो. यदि नहीं करोगे तो हम 15 सितंबर को रेल रोको आंदोलन करेंगे. इसकी घोषणा हम एक तारीख को करेंगे.

आपके आंदोलन की लीडरशिप पर सवाल उठ रहे हैं कि इसका कोई संगठित नेतृत्व नहीं है. पार्टियों ने ये आंदोलन हाईजैक कर लिया है. लीडरशिप को लेकर कशमकश की बात कही जा रही है.

ऐसा हुआ कि हम लोगों की मर्जी के खिलाफ कुछ पॉलिटिकल एलिमेंट स्टेज पर गए. हमने उन्हें बार-बार कहा भी कि हमारी आयोजन टीम है तय करेगी कि स्टेज पर कौन बैठेगा. लेकिन इसके बावजूद जब वे लोग नहीं माने तो हमने अपना कार्यक्रम कर लिया. रोहित वेमुला की मां और कन्हैया ने अपना भाषण दिया. आनंद पटवर्धन ने उन गुजराती साहित्यकारों को 25 हजार का चेक दिया, जिन्होंने गुजरात सरकार का 25 हजार का अवॉर्ड वापस किया था. इसके बाद हम लोगों ने स्टेज छोड़ दिया कि जिसे जो करना है, करे. जहां तक लीडरशिप की बात है तो कोई भी आंदोलन खड़ा होता है तो दो-चार लोग तो ऐसे रहेंगे जो विरोध करेंगे. जिनको नहीं पसंद आएगा, वे विरोध में खड़े हो जाएंगे. पर हजारों की तादाद में लोग हमारे साथ हैं.

कन्हैया कुमार आपकी मर्जी से आए थे या वे भी जबरन पहुंचे?

यह ओपन कार्यक्रम था. कन्हैया कुमार भी आए. बाकी लोग भी आए. कन्हैया तो हमारे संघर्ष का साथी है, इसलिए हमने उसको बुलाया था और हमें उसके आने की खुशी भी है.

25 गांवों के दलितों के बहिष्कार की खबरें आ रही हैं. क्या ये सही हैं?

बिल्कुल हो सकता है. अभी मुझे पक्की सूचना नहीं है. खबरें मिली हैं. मैं इसे अभी कंफर्म कर रहा हूं. अगर ये हो रहा है तो ये बहुत आश्चर्यजनक है. मुझे याद आता है कि बिल्कुल इसी तरह की घटना महाड़ सत्याग्रह के वक्त हुई थी. जब बाबा साहब दलितों के साथ निकले थे, तब उन पर सवर्णों ने हमला किया था. हम पर भी हमला किया गया. वह भी एक ऐतिहासिक घटना थी, यह भी एक ऐतिहासिक घटना है कि दलितों ने शपथ ली कि हम मरे हुए जानवर नहीं उठाएंगे. उस समय भी दलितों का बहिष्कार हुआ था, यहां भी वही हो रहा है.

आपका आंदोलन काफी बड़ा हो गया है. कहीं ये हाईजैक न हो जाए, सरकार या किसी पार्टी के लोग इसे दबा न दें, इसके लिए आपने क्या रणनीति बनाई है?

आने वाले दिनों में हम रेल रोको कॉल दे रहे हैं. इसमें देश भर से लोग आएंगे. अब गुजरात सरकार एक्सपोज होने वाली है. अगर वह दलितों को जमीन का आवंटन नहीं करती तो उसका असली चेहरा सामने आ जाएगा कि वे चाहते हैं कि हम मैला उठाएं या मरे हुए पशु उठाते रहें. आगे की रणनीति वही है, जो हमने कल मंच से कहा था कि आदिवासी समुदाय की जंगल समस्याओं से जुड़ी एक लाख 20 हजार एप्लीकेशन पेंडिंग हैं. गुजरात सरकार उसका भी निदान करे. हम आदिवासी समुदाय को अपने साथ जोड़ेंगे. हमने कहा था ‘गुजरात मॉडल मुर्दाबाद, दलित-मुस्लिम एकता जिंदाबाद’ तो मुस्लिम समुदाय के संगठन भी हमारे साथ आए हैं. हम अपने संघर्ष में किसानों और मजदूरों को जोड़ेंगे. जितने पीड़ित समुदाय हैं, हम सबको साथ लेंगे और जमकर मुकाबला होगा. जब तक मैं लीडरशिप में हूं, यह आंदोलन सिर्फ दलितों का नहीं रहेगा, बल्कि सभी वंचित समुदायों का होगा, दलित जिसका नेतृत्व करेंगे.

गुजरात में अलग-अलग पार्टियों में जो दलित नेता हैं उनका क्या स्टैंड है? क्या वे आपके समर्थन में आए हैं?

नहीं, वे चुपचाप बैठे हुए हैं. जैसे प्राइमरी के बच्चे होते हैं, टीचर उंगली उठाकर इशारा कर दे तो चुपचाप शांत हो जाते हैं, उनकी वही हालत है.

यह स्पष्ट कीजिए कि यह राजनीतिक आंदोलन है या सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन?

एक सौ प्रतिशत यह राजनीतिक होगा. हमारी जो मांग है वह राजनीतिक है. मैं यह पूछता हूं कि ग्लोबलाइजेशन की पॉलिटिकल इकोनॉमी में लोगों के पास रोटी क्यों नहीं है? यह राजनीति है. आजादी के इतने दशकों के बाद दलितों के पास जमीन का टुकड़ा क्यों नहीं है? ये राजनीति है. ये लोकसंघर्ष और आंदोलन की राजनीति है. वो राजनीति हम करेंगे. पार्टी पॉलिटिक्स हम नहीं करेंगे. हमारी समिति अराजनीतिक संघर्ष समिति है, ये बनी रहेगी.

दिल्ली में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन हुआ था. बाद में यह कहकर उन्होंने पार्टी बनाई कि अब इसके बगैर काम नहीं चल सकता. क्या आप भी इस आंदोलन के जरिए कोई पार्टी बनाएंगे?

ऐसी कोई संभावना नहीं है. हम इसे सामाजिक आंदोलन की तरह चलाएंगे. हजारों की तादाद में दलित उठ खड़े हुए हैं कि हम मरे हुए जानवर नहीं उठाएंगे. हमने बहुत बड़े परिवर्तन की नींव रखी है. डॉ. आंबेडकर के बाद इस तरह मृत पशु उठाने से इनकार करने की कोशिश नहीं हुई. हम इसे पूरे देश में ले जाएंगे.  हमने नारा दिया है कि ‘गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी जमीन दो’.

क्या इस आंदोलन के पहले भी आपकी सामाजिक या राजनीतिक सक्रियता रही है?

इसके पहले मैंने डॉ. मुकुल सिन्हा के जनसंघर्ष मंच के साथ स्वयंसेवक के रूप में आठ साल तक काम किया है. वहां मैंने ट्रेड यूनियन के लिए भी काम किया. उसमें सफाई कर्मियों के सवाल उठाए. मजदूर अधिकार संगठनों के साथ जुड़ा रहा. कंस्ट्रक्शन वर्कर्स और ईंट भट्ठे के मजदूरों के साथ काम किया. निजी तौर पर मैंने दलितों की जमीनों के मुद्दे पर छह-सात साल काम किया है. जमीन सुधार मेरा प्रमुख एजेंडा है. चार साल तक पत्रकारिता भी की है. इसके अलावा मैं गुजरात में आम आदमी पार्टी का सदस्य भी हूं.
(यह इंटरव्यू तहलका हिंदी पत्रिका के अगस्त, 2016 के अंक में छप चुका है.)

गणतंत्र का गुड़गोबर

गाय के नाम पर हो रही राजनीति से समाज की अखंडता पर संकट आ गया है. देश में दलित से लेकर मुसलमानों को गोरक्षा के नाम पर हो रही गुंडागर्दी का सामना करना पड़ रहा है. गोरक्षा के नाम पर उपद्रव इतना ज्यादा हो गया है कि इसे रोकने के लिए प्रधानमंत्री को अपील करनी पड़ रही है.

कृष्णकांत 

भोलेपन के पर्याय के रूप में मशहूर बेचारी गाय को पता भी नहीं होगा कि देश की सड़कों पर उसकी सुरक्षा के बहाने उपद्रव हो रहे हैं, तो भारतीय संसद में बहस में भी हुई. गाय को यह भी नहीं पता होगा कि उसका नाम अब सियासी गलियारे में मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा जा चुका है. सियासत दो खेमों में बंट चुकी है. शहर-दर-शहर कचरा चबाती और गोशालाओं में हजारों की संख्या में मर चुकी गायों को यह भी नहीं मालूम होगा कि उनके नाम पर तमाम बेरोजगार राजनीतिक कार्यकर्ताओं की चांदी हो गई है. पार्टियों और संगठनों के थिंक टैंक गाय को अपने-अपने हिसाब से दुहने में लगे हैं तो ऐसे भी वैज्ञानिक अवतरित हो गए हैं जो गाय के मूत्र में सोना और गोबर में परमाणुरोधी तत्व खोज रहे हैं.

तमाम गुट, जिनको लगता है कि गाय की रक्षा करके वे हिंदू धर्म की रक्षा कर रहे हैं, उन्होंने चंदे और फंड जुटाकर गोशालाएं खोल ली हैं. कुछ तो गोरक्षा के लिए इतने बेचैन हैं कि रात भर जागकर सड़कों पर वाहनों की तलाशी लेते हैं और उनमें कोई मवेशी मिल जाएं तो ड्राइवर को पीटने से लेकर मार डालने तक की कार्रवाई को अंजाम दे सकते हैं. गोरक्षक स्वयंभू न्यायालय हैं. गोरक्षक आपको गोबर और गोमूत्र का पंचगव्य बनाकर खिला सकते हैं, जैसा उन्होंने फरीदाबाद में किया. वे आपको पीटकर मार सकते हैं, बांधकर कोड़े बरसा सकते हैं या पुलिस को सौंप सकते हैं.

गाय किसी खूंटे से हटने के बाद बूचड़खाने पहुंचेगी या शहरों-कस्बों की गलियों में पन्नियां चबाती फिरेगी, या रास्ते में उसके नाम पर दंगा हो जाएगा, यह समाज की आस्था पर निर्भर है. लेकिन भटकती गाय के नाम पर समाज को क्या दिशा मिलेगी, यह राजनीति तय करती है. अगर गाय कोई इंसानी प्रजाति होती, इंसान की तरह बोल सकती या सोच सकती तो नई सदी में सबसे प्रभावी आंदोलन गाय प्रजाति के लोग चलाते. बुद्धिजीवियों ने अब तक गाय-विमर्श पर लंबे-लंबे पर्चे लिखे होते. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है. शायद ही दुनिया में कोई ऐसा देश है जहां किसी जानवर के नाम पर हत्याएं होती हों. भारत वह अनोखा देश तो है ही, जानवरों में गाय को वह मुकाम हासिल है जो पूरे समाज में उथल-पुथल मचा सकता है. उसके साथ पहले धार्मिक आस्था जुड़ी थी, जिसे अब सियासत का साथ मिल गया है. जिन्हें सुरक्षा चाहिए उनकी हालत यह है कि रोजगार की तलाश में गांव के तमाम निम्न-मध्यमवर्गीय युवक शहर आकर यहां की झुग्गियों में भर जाते हैं तो गाएं शहर आकर दालान में चारा खाने की जगह सड़कों पर पॉलीथिन खाती हुई पाई जाती हैं.

आॅनर किलिंग के लिए कुख्यात हरियाणा में तो सरकार ने बाकायदा 24 घंटे की गोरक्षा हेल्पलाइन भी लॉन्च कर दी है. हरियाणा सरकार गोरक्षा के लिए पुलिस की स्पेशल टीम भेजने, सड़कों पर गोरक्षा के लिए चेक पोस्ट लगाने जैसे उपायों की घोषणा कर चुकी है. जिस देश में बीस सालों में कर्ज, भूख और गरीबी के चलते तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं और उन पर कोई सरकार चिंतित नहीं है, उसी देश में सत्ताधारी पार्टी के आनुषंगिक संगठन गाय की रक्षा के लिए अलग से मंत्रालय गठित करने की मांग कर रहे हैं. विश्व हिंदू परिषद की मांग है कि केंद्र सरकार गाय मंत्रालय का गठन करे. बताया जाता है कि इस मांग को संघ परिवार का समर्थन प्राप्त है.

अपने भाषणों में गांधी और बुद्ध के संदेशों के साथ ‘21वीं सदी में भारत को विश्वगुरु बनाने’ का सपना देखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैसा महसूस करते होंगे जब गोरक्षा के बहाने देश भर में दलितों की पिटाई की खबरें सुनते होंगे? क्या हमारी तरह वे भी सोचते होंगे कि विश्व की तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति बन चुके देश में अचानक ऐसा क्या हो गया कि समाज मध्ययुग में लौटकर मरे हुए पशुओं के लिए लड़ने लगा? मरी हुई गाय की खाल उतारकर बेचने के एवज में जिंदा आदमी की खाल उतारी जाने लगी है. जिनका यह पुश्तैनी पेशा रहा है, उस दलित समाज को अगर अपने इस पेशे के लिए भी पीटकर मारा जाने लगे तो भारतीय संविधान के आदर्शों का क्या होगा? एक ऐसा पेशा, जिसके लिए एक समुदाय को अछूत माना जाता रहा है, अब उसे वह अछूत काम करने पर भी जान का खतरा आ खड़ा हुआ है.

जब तक किसान गाय पालता था तब तक वह बस दूध देने वाला जानवर भर थी, जो हिंदू आस्था से भी जुड़ी है. लेकिन जबसे सरकारों ने गोशाला खोल ली है तबसे तमाम राजनीतिक बेरोजगारों की नई-नई दुकानें भी खुल गई हैं. अब गाय को लेकर नई तरह की उथल-पुथल देखने को मिल रही है. हाल ही में राजस्थान की हिंगोनिया गोशाला में पंद्रह दिन के भीतर एक हजार गायों के मरने की खबर आई. इसके बाद मचे सियासी हड़कंप के चलते मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने दो मंत्रियों को गोशाला निरीक्षण के लिए रवाना किया. एसीबी की टीम को गोशाला पहुंचाया गया, तो पता चला कि गोशाला में चार से पांच फुट का दलदल बन चुका है क्योंकि लंबे समय से वहां से गोबर नहीं उठाया गया है. अनुमान है कि इस दलदल में कम से कम 200 गायें दफन हो चुकी हैं. 20 बछड़े ऐसे पाए गए जिनकी मांओं का अता-पता नहीं था. सरकार इस गोशाला को 20 करोड़ रुपये सालाना देती है, लेकिन मजदूरों को कई महीने से तनख्वाह नहीं मिली थी, इसलिए वे हड़ताल पर चले गए.

दिल्ली के नजफगढ़ में ‘द पिंजरापोल सोसायटी गोशाला’ है. यह 119 साल पुरानी है जिसमें छह हजार गायें, बछड़े व सांड़ मौजूद हैं. इसके अध्यक्ष बलजीत सिंह डागर कहते हैं,  ‘गोरक्षा के नाम पर जो हो रहा है वह बिल्कुल ठीक नहीं है. गाय के नाम पर दंगा-फसाद पहले भी होता रहा है. हमारे यहां दलित जातियों के लोग पहले भी मरे हुए पशुओं की खाल उतारते थे. अब वही काम बड़े लोग कर रहे हैं. गरीबों को मारा जा रहा है लेकिन बड़ों को कोई कुछ बोल नहीं रहा है. इतने बड़े-बड़े कारखाने लगा दिए गए हैं, आजकल उन्हें बड़े लोग चलाते हैं. ये तो बेकार का झंझट कर रहे हैं. मरी हुई गाय से दलितों की रोजी-रोटी चलती थी. अब उसी के लिए उन पर अत्याचार हो रहा है. ये लोग सदियों से ये करते आए हैं.’

बलजीत सिंह बताते हैं, ‘हमारी गोशाला में जो गायें मर जाती हैं उन्हें एमसीडी वाले ले जाते हैं. गाजीपुर मंडी में बूचड़खाना है वहां ले जाकर उसकी खाल वगैरह उतारी जाती है. मसला ये है कि अब गोरक्षा के नाम पर यह होने लगा है कि कोई आदमी गाय लेकर जा रहा है तो उसे भी पीटा जा रहा है. हाल में कई हत्याएं हो गईं. उस पर भी मारपीट करते हैं. इसमें राजनीतिक पार्टियां और समाज के आवारा लोग भी शामिल हैं जो बेकार के झगड़े-फसाद करते रहते हैं. सरकार को पशु का चमड़ा उतारने का लाइसेंस देना चाहिए. दूसरे, जो आदमी गाय लेकर जा रहा है अगर उस पर शक भी है तो ढंग से जांच हो. कोई दूध पीने के लिए गाय लेकर जा रहा है तो उसकी पिटाई कर देना गलत है. कुछ लोग राजनीति करते हैं, वे चाहते हैं कि लोग आपस में लड़ें. इससे समाज में समस्या पैदा हो रही है.’

गुजरात के ऊना में 11 जुलाई को मरी हुई गाय की खाल उतारने पर सात दलित युवकों की बेरहमी से पिटाई
गई. ऊना के मोटा समाधियाला गांव में इन युवकों पर गोहत्या का आरोप लगाकर करीब 35 गोरक्षकों ने पहले उन्हें लोहे की रॉड से बुरी तरह पीटा, फिर ऊना शहर लाकर उनके हाथ बांधकर उन पर कोड़े बरसाए गए. सभी को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया. गोरक्षकों ने इस घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कराया. इस घटना से दलित समुदाय में जबरदस्त गुस्सा देखा गया. हजारों की तादाद में दलित सड़कों पर उतरे. राज्य में बंद आयोजित करके दोषियों को कड़ी सजा देने की मांग की गई. घटना के एक सप्ताह के भीतर विरोधस्वरूप करीब 30 युवकों ने आत्महत्या का प्रयास किया.

एक महीने बाद भी यह आंदोलन जारी है. दलित समुदाय में उपजे गुस्से ने गाय और गोरक्षा की राजनीति को मात देने के लिए कमर कस ली है. ऊना में 20 हजार दलितों ने एकत्र होकर कसम खाई कि वे भले ही भूख से मर जाएं लेकिन अब मरी गायों को उठाना और चमड़ी उतारना बंद कर देंगे. गुस्साए दलित समुदाय के लोगों ने मरी हुई गायों को जिला कलेक्ट्रेट पहुंचा दिया और कहा कि गाय जिसकी मां है वे स्वयं उसका अंतिम संस्कार करें. इस कार्रवाई से सियासी हलके में हड़कंप मच गया.

संसद से लेकर सात समंदर पार तक गोरक्षकों ने इतनी कुख्याति बटोरी कि प्रधानमंत्री को इस पर बयान देना पड़ा. प्रधानमंत्री ने कहा, ‘अगर आप गोली मारना चाहते हैं तो मुझे मार दीजिए, लेकिन मेरे दलित भाइयों पर हमला बंद करो.’ उन्होंने कहा, ‘70-80 फीसदी गोरक्षक फर्जी हैं. मैं हर किसी से कहना चाहता हूं कि इन फर्जी गोरक्षकों से सावधान रहें. इन मुट्ठी भर गोरक्षकों का गाय संरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि वे समाज में तनाव और टकराव पैदा करना चाहते हैं. गोरक्षा के नाम पर ये फर्जी गोभक्त देश की शांति और सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि असली गोरक्षक फर्जी गोरक्षकों का भंडाफोड़ करें. राज्य सरकारों को उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए… मुझे ऐसे असामाजिक तत्वों पर बड़ा क्रोध आता है जो रात में अपराध करते हैं और दिन में गोरक्षक होने का नाटक करते हैं.’ प्रधानमंत्री का यह भी कहना है कि दलितों की रक्षा करना और उनका सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए. तब सवाल उठा कि सिर्फ दलितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी क्यों? गायों के बहाने पिटते मुसलमानों की जिम्मेदारी कौन लेगा? कोई नागरिक, चाहे वह किसी जाति या धर्म से ताल्लुक रखता हो, अगर सरेआम उसे पीटा जाता है तो क्या भारतीय गणतंत्र की नागरिकता आहत नहीं होती? विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री के बयान को ‘राजनीतिक पाखंड’ बताया. उनका कहना है कि गोरक्षा के बहाने उपद्रव करने वाले लोग भाजपा के ‘वैचारिक हमसफर’ हैं.

गुजरात में दलित आंदोलन का नेतृत्व करने वालों में से एक जिग्नेश मेवाणी कहते हैं, ‘हम पदयात्रा लेकर निकले और 15 अगस्त को ऊना में सभा की. हमने नारा दिया है कि गाय की दुम आप रखो, हमें हमारी जमीन दो. आप मरी गाय की चमड़ी उतारने पर हमारी चमड़ी उतार लेंगे? तो आप अपनी गाय से खेलते रहो. हमें न जिंदा गाय से मतलब है, न ही मरी गाय से. हमें जमीनों का आवंटन करो. हम रोजगार की ओर जाएंगे. जिस पेशे के लिए हमें अछूत घोषित किया गया, अब उसी के लिए हमारी चमड़ी उधेड़ रहे हो, यह कैसे चलेगा? हमारी यात्रा ऊना पहुंचेगी. हम वहां पर प्रदर्शन करेंगे और जब तक हमारी सारी मांगें मानी नहीं जातीं, हम यह आंदोलन बंद नहीं करेंगे. हमें भारत के अन्य राज्यों और विदेशों से भी समर्थन मिल रहा है. आने वाले दिनों में यह आंदोलन और फैलेगा.’

जिस तरह गोरक्षा का उपद्रव पूरे देश में फैला था, उसी तरह यह प्रतिरोध भी देश के अन्य हिस्सों में देखने को मिला. सबसे दिलचस्प यह कि यह प्रतिरोध उस गुजरात से उठा जिसे ‘हिंदुत्व की प्रयोगशाला’ कहा जाता रहा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि इस ‘हिंदुत्व की प्रयोगशाला’ ने ही नरेंद्रभाई मोदी को पंद्रह साल लगातार गुजरात की गद्दी पर बैठाए रखा और उन्होंने ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का तमगा हासिल किया.

प्रधानमंत्री मोदी के गोरक्षकों के खिलाफ बयान पर जिग्नेश मेवाणी प्रतिक्रिया देते हैं, ‘भाजपा और संघ परिवार के लोग गाय माता की दुम बहुत हिला रहे थे. लेकिन जिस तरह हजारों की संख्या में दलित शक्ति सड़कों पर उतर आई, जिस तरह से यह आंदोलन फैल रहा है, कहीं न कहीं मोदी साहेब और भाजपा को लग रहा है कि गाय की दुम अब उनके गले का फंदा न बन जाए, तब जाकर उन्होंने मुंह खोला है.’

वरिष्ठ साहित्यकार कंवल भारती कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री को हमेशा भावुक बयान देने की आदत है. वे बेवकूफी भरे होते हैं. जैसे कि मुझे गोली मार दो. आप इतनी सुरक्षा में चलते हैं, आपको कोई गोली कैसे मार सकता है? इसे रोकने के लिए आरएसएस से कहना चाहिए कि आज के बाद ऐसी घटना नहीं होनी चाहिए. यह काम जनता नहीं कर रही है. इसके लिए हिंदूवादी संगठनों को रोकना चाहिए. अगर उनको देश को बदलना है, दलितों से मोहब्बत है तो आरएसएस से कहें कि दंगों की राजनीति बंद करो. लेकिन वे ऐसा कभी नहीं कहेंगे.’

प्रधानमंत्री के बयान और संसद में गोरक्षकों के असामाजिक कृत्य की निंदा के बाद भी आंध्र प्रदेश के गोदावरी जिले में मरी गाय की खाल उतार रहे दो दलितों की पिटाई की गई. गाय की करंट लगने से मौत हुई थी जिसके बाद गाय के मालिक ने खुद ही उसे दलितों को सौंप दिया था. वे गाय की खाल उतार रहे थे तभी वहां स्वयंभू गोरक्षक पहुंचे और दोनों की बुरी तरह पिटाई की. उनमें से एक को काफी गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया.

केंद्र में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से गोरक्षा का मुद्दा काफी गरमाया हुआ है. 17 अक्टूबर, 2015 को आईबीएन-7 चैनल ने एक रिपोर्ट की थी, जिसमें दिखाया गया कि कैसे स्वयंभू गोरक्षा दल के लोग गो-तस्करी में लोगों को पकड़ते हैं और खुद ही उन्हें सजा देते हैं. वे पकड़े हुए लोगों को मारकर अधमरा कर देते हैं. रिपोर्ट में दिखाया गया कि कैसे गोरक्षक कानून अपने हाथ में लेकर हथियार लहराते हैं. लाठी, डंडा, बंदूक, तलवारें और बुलेट प्रूफ जैकेट से लैस गोरक्षक बाकायदा अपने काम को सही ठहराते हैं. ऐसे गोरक्षा समूहों पर प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होने की स्थिति कानून व्यवस्था की स्थिति और राजनीतिक मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करती है.

यह भी दिलचस्प है कि 80 प्रतिशत गोरक्षकों को ‘फर्जी’ और ‘समरसता बिगाड़ने’ वाला तत्व बताने वाले नरेंद्र मोदी ही वह व्यक्ति हैं जो अपने चुनाव प्रचार के दौरान गोरक्षा पर जोर दे रहे थे. अप्रैल 2014 में बिहार और मध्य प्रदेश में अपनी रैलियों के दौरान उन्होंने कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की नीति पर सवाल उठाए थे कि केंद्र सरकार ‘पिंक रिवोल्यूशन’ लाना चाहती है जिसके तहत देश भर में गायों को काटा जा रहा है और गायों की तस्करी की जा रही है. भारत से निर्यात होने वाले मांस में ज्यादातर भैंस, बकरी, बैल और बछड़े का मांस होता है. लेकिन नरेंद्र मोदी उस समय सिर्फ गायों का जिक्र कर रहे थे कि बूचड़खानों में गोहत्या को बढ़ावा दिया जा रहा है. यह अलग बात है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मांस निर्यात पर प्रतिबंध तो नहीं लगा, उल्टा भारत विश्व का अग्रणी बीफ निर्यातक बन गया.

इसी बीच एनिमल वेलफेयर बोर्ड आॅफ इंडिया के बोर्ड मेंबर एनजी जयसिम्हा ने मोदी सरकार पर गोरक्षा के मामले में दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि सरकार गाय की रक्षा करने और तस्करी रोकने के लिए पहले से दी जाने वाली ग्रांट लगातार कम करती जा रही है. यूपीए सरकार ने 2011-12 में 2177.58 करोड़ रुपये की ग्रांट दी थी. 2012-13 में यह राशि घटकर 1606.43 करोड़ रुपये कर दी गई. अगले साल 1299.8 करोड़ रुपये और 2014-15 में 1200.74 करोड़ रुपये बोर्ड को दिए गए. 2015-16 में यह ग्रांट घटाकर 784.85 करोड़ रुपये कर दी गई.

गोरक्षा के नाम पर बढ़ रही गुंडागर्दी और उपद्रव को लेकर चौतरफा आलोचना झेलने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने तल्खी दिखाई तो गोरक्षक उनके ही खिलाफ आग उगलने लगे. सोशल मीडिया पर मौजूद कुछ गोरक्षकों ने भले ही गाय सिर्फ सोशल मीडिया पर देखी हो, लेकिन प्रधानमंत्री के बयान के बाद उन्होंने अपना गुस्सा जाहिर किया और प्रधानमंत्री पर सेकुलर होने का आरोप लगाया. राजस्थान गो सेवा समिति के प्रदेश अध्यक्ष दिनेश गिरी ने बयान दिया, ‘पीएम के इस बयान से गोरक्षकों का मनोबल टूट गया है और उनकी भावनाएं आहत हुई हैं. मोदी जी के बयान और हिंगोनिया गोशाला में गाय की मौत के बाद गोसेवा करने में भारी दिक्कतें हो रही हैं.’ उनके मुताबिक, यह समिति 22 अगस्त को बैठक करके आगे की रणनीति तय करेगी. अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दे डाली.

दूसरी ओर, गोरक्षा को प्रमुख एजेंडे में रखने वाले आरएसएस को भी गोरक्षकों के खिलाफ बयान जारी करना पड़ा. विशेषज्ञ इसे भाजपा और उसके मातृ संगठन आरएसएस की मजबूरी मान रहे हैं क्योंकि कुछ महीने पहले पार्टी और संगठन के कार्यकर्ताओं से लेकर नेता तक गोरक्षा के पक्ष में लामबंद थे. असहिष्णुता की बहस आगे बढ़कर ‘राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रद्रोह’ में परिवर्तित हुई तो केंद्रीय मंत्रीगण और वरिष्ठ नेता न्याय के लिए अदालत का मुंह देखने की जगह खुद ही मुंसिफ बन बैठे और भीड़ की कार्रवाई के पक्ष में भी स्पष्टीकरण देने लगे थे. लेकिन गुजरात में दलितों के सड़क पर उतरने और आंदोलन छेड़ देने का परिणाम यह हुआ कि सत्ताधारी दल और सरकार दोनों को आत्मरक्षात्मक मुद्रा अख्तियार करनी पड़ी. गोरक्षकों पर गुस्सा तब तक नहीं दिखाया गया जब तक वे गोहंता के रूप में मुसलमानों को चिह्नित करके उन पर हमला करते रहे. आरएसएस और भाजपा की प्रमुख चिंता दलितों या मुसलमानों पर हमले को लेकर है कि नहीं, यह रहस्य है, लेकिन उनकी यह चिंता जरूर होगी कि संघ परिवार जिस ‘विशाल हिंदू परिवार’ का सपना देखता है, दलितों पर हमलों के बाद वह बिखराव की ओर बढ़ने लगा है.

वरिष्ठ साहित्यकार व दलित मामलों के विशेषज्ञ कंवल भारती कहते हैं, ‘समस्या यह है कि निचली जातियों में जागरूकता के स्तर पर वह काम नहीं हो पा रहा है. इसलिए दलित-पिछड़ी जातियों और मुसलमानों को आपस में लड़ाना आसान है. वे सब गरीब लोग हैं, दिहाड़ी मजदूर हैं. वहीं दंगे के वक्त हिंदू-मुसलमान बन जाते हैं और दंगा करते हैं. एक तरफ दलित आबादी होती है, दूसरी तरफ मुसलमान होते हैं. लड़ाने वाले सुरक्षित दुर्ग में रहते हैं. वे कभी नहीं मारे जाते. दंगों का अपना अर्थशास्त्र है. आप देखिए कि जहां मुसलमान या दलित आर्थिक रूप से थोड़े संपन्न हुए वहां दंगा करवा दिया जाता है. उनकी कमर तोड़ दी जाती है. जैसे भागलपुर में हुआ, बनारस में हुआ. बुनकरों के घर सत्यानाश कर दिए. यही गुजरात में किया गया.’ इसी बात को आगे बढ़ाते हुए पत्रकार अरविंद शेष कहते हैं, ‘गाय कोई धार्मिकता का मामला है ही नहीं. यह देखना चाहिए कि मोदी सरकार के आने के बाद हिंदूवादी, यहां तक कि सरकार के स्तर पर, लोग गाय के चलते किसी को मारने को क्यों तैयार हो जा रहे हैं? ऊना में, हरियाणा में या दूसरी जगहों पर जो लोग हमले कर रहे हैं, वे सब के सब संघ से जुड़े नहीं हैं. एक आबोहवा बना दी गई है कि गाय हमारी माता है. अब वो किसी को भी मारेंगे. मुसलमान या हिंदू कोई भी हो. यह भस्मासुर पैदा करने जैसी स्थिति है.’

जिग्नेश मेवाणी कहते हैं, ‘आपको गुजरात की हालत बताता हूं कि साढ़े चार साल भाजपा वहां पर विकास के दावे करती है. लेकिन जब चुनाव आता है तो आरएसएस और उसके कैडर गाय का नारा लगाने लगते हैं और गाय से जुड़े वीडियो प्रसारित करने लगते हैं. मांस का लोथड़ा कहीं मिल जाए तो उसको सीधे गोमांस बता दिया जाता है और मुसलमानों पर आरोप लगा दिया जाता है. अब सवाल उठता है कि मांस का टुकड़ा बिना प्रयोगशाला में टेस्ट के कैसे पता चल जाता है कि किसका मांस है? गाय को पवित्र बनाने और उसके नाम पर उपद्रव करने की यह राजनीति लंबे समय से चल रही है, इसीलिए गोरक्षक इतना बेखौफ हैं. मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के पहले जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी गुजरात में यही होता रहा है. मुसलमानों को गौ माता के नाम पर बहुत प्रताड़ित किया गया है. वीडियो प्रसारित करके, पोस्टर लगाकर अभियान चलाए गए.’
अरविंद शेष कहते हैं, ‘यह बात ध्यान रखना चाहिए कि कोई दलित मरी हुई खाल उतारेगा, उसकी यह ड्यूटी भी ब्राह्मणवाद ने ही तय की. आज वह खाल उतारते हुए पाया जाता है तो उसकी हत्या भी आप ही करते हैं. अब जब उन्होंने खाल उतारने का काम करने से इनकार कर दिया है तब आपको चाहिए कि आप अपना इंतजाम करें.’

कंवल भारती भाजपा और संघ की राजनीति पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘जब जब आरएसएस-भाजपा सत्ता में आते हैं, वे यही करते हैं. वाजपेयी की सरकार थी तब ओडिशा में हिंदूवादियों ने ईसाई धर्मगुरु ग्राहम को जिंदा जला दिया था. इनका काम यही है. कभी लव जिहाद, कभी मंदिर-मस्जिद, कभी गोरक्षा के नाम पर लोगों को आपस में लड़ाते रहो. यह गोरक्षा खाए, पिए अघाए लोगों के दिमाग का फितूर है. इन्हें रोजी-रोटी की समस्या होती तो यही लोग ऐसे मुद्दे कभी उठाते ही नहीं. कोई काम नहीं है तो चलो गाय बचा लो. गरीब आदमी की हालत यह है कि वह मरी हुई गाय की खाल उतारकर अपनी जीविका चलाता है. अमीर अपनी राजनीति के लिए उसे पीटता है. यह सत्ता समर्थित अभियान है जिसके तहत कभी मुसलमान निशाना बनते हैं तो कभी दलित. इसके लिए उन्हें पैसे भी मिलते हैं और राजनीतिक समर्थन भी. चाहे ऊना की घटना हो, झज्जर की घटना हो या फिर देश के दूसरे हिस्सों में, पुलिस-प्रशासन सबको धता बताकर यह काम किया जा रहा है. क्योंकि जो राजनीति इसे समर्थन दे रही है वह यही चाहती है कि लोग आपस में लड़ते रहें तो दूसरे मसले पर बात न हो.’

अरविंद शेष कहते हैं, ‘मेरा स्पष्ट मानना है कि गाय का पूरा मसला संघ-भाजपा के लिए सिर्फ एक पर्दा है. पिछले दो सालों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार योजनाओं के स्तर पर स्थितियां खराब होती जा रही हैं. लोग अपना रोजगार कर सकें, जीवन चला सकें, इसके लिए हालात को लगातार मुश्किल बनाया जा रहा है. अंबानी-अडाणी के लिए कैसे रास्ते खोले जा रहे हैं, उस पर कहीं बहस नहीं है. वे सब बड़े मसले गाय की बहस में छिप जा रहे हैं. सारे महत्वपूर्ण मुद्दे जो नीतिगत फैसलों से जुड़े हैं, विदेशों से क्या समझौते हो रहे हैं, अमेरिका, इजराइल, ऑस्ट्रेलिया यहां लाकर क्या कचरा फेंक रहा है, जनता को इसकी कोई जानकारी नहीं है. जनता को यह जानकारी मिल रही है कि कहां गाय के लिए दंगा हुआ, किसने किसको मार दिया, गाय हमारी माता है, यही सब देश भर में चल रहा है.’

कांग्रेस नेता पीएल पुनिया आरोप लगाते हैं कि भाजपा और आरएसएस दलितों, पिछड़ों और आम जनता के सवालों से ध्यान हटाने के लिए यह सब दंगा-फसाद करते हैं. इसी बात को दूसरे शब्दों में अरविंद शेष बयान करते हैं, ‘गाय दरअसल एक पर्दा है जो सरकार को सवालों से बचाती है. शिक्षा बजट में कटौती, बालश्रम का नया कानून, दलित आदिवासी छात्रवृत्तियों को बंद करना, एक से डेढ़ लाख स्कूलों का बंद होना, आरक्षण खत्म करने की कोशिश करने जैसे जो बड़े सवाल हैं, वे सब गाय के नाम पर उठ ही नहीं रहे हैं. अकेले छत्तीसगढ़ में 25 हजार से ज्यादा स्कूल बंद हो गए. राजस्थान में 20 हजार स्कूल बंद हो गए. कुल मिलाकर डेढ़ लाख से ज्यादा स्कूल बंद हो गए हैं. कहीं मर्जर के नाम पर तो कहीं पीपीपी के नाम पर. सरकारी स्कूल में कौन बच्चे जाते हैं. वे गरीबों, दलितों और पिछड़े समुदाय के बच्चे हैं. वे सब के सब शिक्षा व्यवस्था से अपने आप बाहर हो जाएंगे. सरकार में बैठे लोग अलग-अलग फ्रंट पर अपने लोगों के जरिए सामाजिक मनोविज्ञान की दिशा तय करने में लगे हुए हैं.’

पुनिया कहते हैं, ‘आरएसएस, भाजपा जानबूझ कर देश को ऐसे मसलों में फंसाए रहना चाहती हैं. फालतू के मसलों में फंसी हुई जनता उनसे सवाल नहीं पूछ सकेगी कि वे सत्ता में आने के बाद क्या कर पाए हैं. जितने वादे किए थे चुनाव में, वे सब अधूरे हैं. भाजपा जनता का विकास करने की जगह लोगों को आपस में लड़ा रही है. उन्होंने खुद गोरक्षा का मुद्दा उठाया था. ऐसे तत्वों को बढ़ावा दिया गया. अब जब जनता आपस में लड़ रही है तब वे डैमेज कंट्रोल करने के लिए ऐसा बयान दे रहे हैं. ऐसे बयान का कोई फायदा नहीं है क्योंकि हमले तो प्रधानमंत्री के बयान के बाद भी हो रहे हैं. दरअसल, भाजपा की नीति यही है कि जनता को आपस में लड़ाया जाए ताकि वह उसी में उलझी रहे. भाजपा शासित राज्यों में ही दलितों और पिछड़ों का आरक्षण खत्म किया जा रहा है. दूसरी तरफ उन पर अत्याचार किया जा रहा है.’

इतिहासकार रोमिला थापर कहती हैं, ‘लोगों को मारा जाना किसी भी हालत में जायज नहीं है. इसे तो स्वीकार नहीं किया जा सकता कि कोई भी विवाद ऐसा हो कि किसी इंसान की जान ले ली जाए. बाकी गोरक्षा का बहुत लंबा-चौड़ा इतिहास है. गोहत्या रोकने की बात तो इतिहास में पुरानी है, लेकिन गोरक्षा आंदोलन बाकायदा 19वीं सदी में शुरू हुआ. अब जिसकी राजनीतिक विचारधारा में यह आइडिया इस्तेमाल हो सकता है, वे इस्तेमाल करेंगे. हम लोग सिर्फ कह सकते हैं कि ऐसा मत कीजिए क्योंकि यह इंसानियत की बात है कि गोरक्षा का नाम लेकर आप किसी को जान से मार दें, यह ठीक नहीं है. लेकिन जिन्हें इस्तेमाल करना है वे करेंगे. इसका अंजाम क्या हो रहा है, यह आप देख ही रहे हैं. एक तरफ मिथ बढ़ाया जा रहा है कि गाय ये थी, गाय वो थी, दूसरी तरफ लोगों को मारने के लिए गाय का बहाना बनाया जा रहा है.’

अरविंद कहते हैं, ‘दलितों के इस आंदोलन का बहुत दूरगामी परिणाम होगा. यह बहुत अच्छा हुआ है. सामाजिक चेतना का विकास होगा. एक पूरा समुदाय जो मरे हुए जानवरों के निपटान के जरिए ही बहुत ही निम्न दर्जे की जिंदगी जीता था, अब उसी को उसने छोड़ दिया है. यह ऐसा काम है जिसे अब तक नहीं करने वाला समुदाय कभी नहीं करेगा. उस पेशे को उस समुदाय की सामाजिक हैसियत से जोड़ दिया गया था. गुजरात के दलितों द्वारा इस काम से इनकार करने का परिणाम एक सामाजिक बदलाव के रूप में सामने आएगा.’

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोधछात्र सुनील यादव कहते हैं, ‘वंदे मातरम, भारत माता की जय, गीता से होते हुए खतरनाक प्रतीकों की यह राजनीति गाय तक पहुंची है. गाय सबसे खतरनाक राजनीतिक प्रतीक थी जिससे मुस्लिम समाज के खिलाफ हिंदुओं की गोलबंदी हो सकती थी. इस दौर में दादरी का अखलाक इसी प्रतीकों की राजनीति का शिकार हुआ. ये हिंदुत्व और गाय के ठेकेदार कभी नहीं चाहते थे कि इन प्रतीकों की राजनीति में दलित शामिल हो जाएं. उन्हें तो हिंदुत्व के किसी भी प्रतीक के आधार पर मुस्लिमों का विरोध करना था जिससे नाराज और बिखरते हुए हिंदू समाज को एक साथ लाया जाए और अपना वर्चस्व कायम रहे. इसीलिए आप देखिए तत्काल रूप से हिंदुत्व के ठेकेदार ऊना के मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे और जब लगा कि पासा पलट गया है तो दलितों का हितैषी बनने की होड़-सी लग गई है. पर इस प्रसंग में मुस्लिमों को लेकर किसी का बयान नहीं आया. तो मामला साफ है इन तथाकथित हिंदुत्व के ठेकेदारों के लिए गाय एक राजनीतिक प्रतीक है न कि मां. इधर तमाम गोशालाओं में और गुजरात की सड़कों पर गायों की दुर्दशा देखकर इसे पुष्ट कर सकते हैं. सवाल सिर्फ एक है कि अपने वर्चस्व को बनाए रखने के इस खेल में उनके लिए सब हथियार हैं और सब शिकार भी.’

भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भी गोरक्षा और गाय के नाम पर सामाजिक व्यवहार और छुआछूत तय करने के रवैये से तंग आकर  बाबा साहब आंबेडकर ने अपने कई लेखों में धर्मग्रंथों के आधार पर यह साबित किया था कि प्राचीन काल में ब्राह्मण भी मांस, यहां तक कि गोमांस खाते थे. जब बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ, जिसकी सबसे बड़ी ताकत अहिंसा और जीव हत्या के निषेध में थी, तो उसके प्रतिकार में हिंदू धर्मगुरुओं और धर्मावलंबियों ने गोमांस का निषेध करके गाय को पवित्र जानवर घोषित किया.

कंवल भारती भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘प्राचीन काल में गाय का मांस खाना आम बात थी. तमाम ग्रंथों में गाय का मांस खाने की बात लिखी है. जब महात्मा बुद्ध ने यज्ञों और पशु बलियों का विरोध शुरू किया तो ब्राह्मणों ने पलटी मारी और खुद को अहिंसक बना लिया. यह बाबा साहेब ने बाकायदा अपनी किताब में लिखा है.’

‘राजनीति की बिसात पर गोमांस’ शीर्षक से अपने लेख में प्रो. राम पुनियानी लिखते हैं, ‘भाजपा और उसके संगी-साथियों के दावों के विपरीत स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में एक बड़ी सभा में भाषण देते हुए कहा था, ‘आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्राचीनकाल में विशेष समारोहों में जो गोमांस नहीं खाता था उसे अच्छा हिंदू नहीं माना जाता था. कई मौकों पर उसके लिए यह आवश्यक था कि वह बैल की बलि चढ़ाए और उसे खाए’(शेक्सपियर क्लब, पेसेडीना, कैलीर्फोनिया में 2 फरवरी, 1900 को ‘बौद्ध भारत’ विषय पर बोलते हुए) ‘ब्राह्मणों सहित सभी वैदिक आर्य, मछली, मांस और यहां तक कि गोमांस भी खाते थे. विशिष्ट अतिथियों को सम्मान देने के लिए भोजन में गोमांस परोसा जाता था. यद्यपि वैदिक आर्य गोमांस खाते थे तथापि दूध देने वाली गायों का वध नहीं किया जाता था. गाय को ‘अघन्य’ (जिसे मारा नहीं जाएगा) कहा जाता था परंतु अतिथि के लिए जो शब्द प्रयुक्त होता था वह था ‘गोघ्न’ (जिसके लिए गाय को मारा जाता है). केवल बैलों, दूध न देने वाली गायों और बछड़ों को मारा जाता था. (द कल्चरल हेरिटेज ऑफ इंडिया खंड-1, प्रकाशक रामकृष्ण मिशन, कलकत्ता, कुन्हन राजा का आलेख वैदिक कल्चर, पृष्ठ 217)

 जिग्नेश मेवाणी कहते हैं, ‘बाबा साहेब ने बाकायदा लिखा है कि गाय को पवित्र बनाने और अछूत समस्या का आपस में संबंध है. पूरे वैदिक काल में ब्राह्मण मांस खाते थे. गाय और घोड़े का मांस खाया जाता था. लेकिन आगे जाकर बौद्धों और ब्राह्मणों के बीच संघर्ष हुआ तो ब्राह्मणों ने अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिए गोमांस खाना बंद कर दिया. तब से लेकर यह गाय की राजनीति चली आ रही है.’

शोधछात्र सुनील कहते हैं, ‘हिंदू धर्म का मूल चरित्र ही दलित विरोधी है जैसा कि धर्मशास्त्र का इतिहास लिखते हुए तोकारेव ने कहा था कि ऊपर के तीन ही वर्णों के देवता थे और पूजा करने का अधिकार सिर्फ ऊपर के तीन वर्णों को ही था. शूद्रों को इससे बाहर रखा जाता था. हिंदू धर्म का पहला मुकाबला बौद्ध धर्म से हुआ. दमित और प्रताड़ित शूद्र बहुत तेजी से बुद्ध के पीछे होने लगे, तब ब्राह्मण धर्म अर्थात हिंदू धर्म ने अवतारों की कल्पना करते हुए धर्मशास्त्र के नियमों में ढील देते हुए अछूत जातियों को कुछ धार्मिक अधिकार दिए. लेकिन आज तक मंदिर प्रवेश या सामाजिक भेदभाव के तमाम मामलों में दलितों का भयानक अत्याचार जारी है. दलित का जीवन पशुओं से बदतर तब भी था और आज भी है.’

सुनील पूरे टकराव को वर्चस्व की राजनीति का नतीजा मानते हुए कहते हैं, ‘गाय का मामला पूरी तरह राजनीतिक है. वर्ण व्यवस्था के प्रकर्म में भयानक रूप से बंटे हिंदू समाज में दलित बहुत साजिश के साथ शामिल किए गए तो भी उन्हें हाशिये पर रख दिया गया. जब बार-बार हिंदू समुदाय के शोषित जातियों को लगता है कि हिंदू समाज में हमारा कोई अस्तित्व नहीं है तो वे अन्य धर्मों की तरफ ताक-झांक करने लगते हैं. तो सभी को हिंदू समाज में बनाए रखने के लिए सवर्ण हिंदुओं ने एक साजिश रची कि किसी तरह इस्लाम के प्रभुत्व का डर पैदा कर इन असंतुष्ट शोषित जातियों को अपने साथ बनाए रखा जाए. इसके बाद शुरू हुआ मुसलमानों के खिलाफ नफरत और जहर का दौर जिसमें उन प्रतीकों को चुना गया जिसके प्रयोग को लेकर मुस्लिम समाज में कुछ नाराजगी हो, विरोध हो.’

इतिहासकार प्रो. डीएन झा कहते हैं, ‘गोरक्षा अभियान 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ. दयानंद सरस्वती ने गोरक्षा समिति की स्थापना की थी. तबसे गाय को राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. धीरे-धीरे यह बढ़ता गया है. गाय को लेकर बीच-बीच में समस्या होती रही है. 1966 में विनोबा भावे के नेतृत्व में संसद का घेराव हुआ था, जिसपर बहुत बवाल हुआ था. बाद में यह अभियान कम हो गया. इधर कुछ दिनों से इसने फिर जोर पकड़ा है. सवाल ये है कि गाय को बचाइएगा तो दूसरे मवेशियों को क्याें छोड़ दीजिएगा? दूसरे, गाय के मरने के बाद उसे उठाने का काम या उसके निपटान का काम कौन करेगा? क्या तोगड़िया जी हटाएंगे? उसके लिए अब इन्हाेंने लोगों को मारना शुरू किया है. चलिए आप गाय को बचा लीजिए. लेकिन उसके मरने के बाद उसका क्या होगा?’                          

मंदिर में प्रवेश न देने, मरी गाय उठाने के लिए दलितों को अछूत घोषित कर देने या उसी काम के लिए उन्हें ‘सजा’ देने का क्रम अपनी ऐतिहासिकता में बेहद भयानक रहा है. प्रसिद्ध साहित्यकार और चिंतक प्रो. तुलसीराम ने अपनी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ में दलित जीवन का यथार्थ जिस तरह लिखते हैं, उसे पढ़कर समझा जा सकता है कि भारतीय समाज में दलितों की क्या हालत रही है. वे लिखते हैं, ‘उस समय एक परंपरा के अनुसार गांव का कोई भी हरवाहा अपने मालिक जमींदार के मरे पशु की खाल निकालकर उसे बेचने से बचे धन को अपने पास रख लेता था. ऐसे चमड़ों की कीमत प्रायः बीस रुपये होती थी… जब हमारे घर की कलोरी गाय मरी तो छह आदमी काड़ी पर ढोते हुए मुर्दहिया पर ले गए थे. मुन्नर चाचा कहने लगे थे कि उस छुट्टी में मैं चमड़ा छुड़ाना धीरे-धीरे सीख जाऊं ताकि भविष्य में इस चर्मकला में पारंगत हो सकूं… मैंने वैसा ही किया. इसके बाद मैं अनेकों बार इस तरह की चामछुड़ाई के अवसाद से पीड़ित रहा…’

दलित बस्ती की कारुणिक कथाओं के क्रम में वे आगे लिखते हैं, ‘इन्हीं गिद्ध प्रकरणों के दौरान गांव के जोखू पांडे का एक बैल मर गया. मुर्दहिया पर सारे कर्मकांड संपन्न हुए. जोखू के हरवाहे द्वारा चमड़ा छुड़ाए जाने के बाद उसी के घर की एक रमौती नामक महिला जो मुर्दहिया पर घास छील रही थी, उससे नहीं रहा गया.

वह डांगर के लालचवश खुर्पा लेकर गिद्धों से भिड़ गई और मरे हुए बैल का कलेजा काटकर घास से भरी टोकरी में छिपाकर ले आई. मेरे साथ अनेक दलित बच्चे यह नजारा देख रहे थे. सभी चिल्लाने लगे: ‘रमौती घरे डांगर ले जाति हौ.’ यह खबर चाचा चौधरी तक पहुंच गई. दो दिन बाद पंचायत बुलाई गई. रमौती के परिवार को कुजाति घोषित कर दिया गया और उसका सामाजिक बहिष्कार हो गया. यह बड़ा प्रचंड बहिष्कार था. बिरादरी में शामिल होने के लिए उन्हें सूअर-भात की दावत देनी पड़ी जिससे रमौती का परिवार भारी कर्ज में डूब गया.’

प्राचीन भारतीय समाज में पशुधन लोगों की प्रमुख संपत्ति रहा है. भूमिहीन और मजदूर तबके के लिए यह जीविका और पोषण का एकमात्र साधन रहा है. मरे हुए जानवरों जैसे गाय, भैंसें और अन्य पालतू जानवरों से भी लोग आपना पेट पालते थे. भारतीय समाज की आर्थिकी में भी गाय और गोवंश की अहम भूमिका रही है. गाय के पवित्र घोषित हो जाने का फायदा जिसे भी हुआ हो, लेकिन इससे उन लोगों के पोषण और जीविका पर प्रहार हुआ जिनके लिए पेट भरने का एकमात्र साधन जानवर था. मरे हुए मवेशियों को उठाकर अपनी जीविका चलाने वाला दलित समाज अपने उसी पेशे के लिए अछूत घोषित हुआ और अब उसी के लिए उसे प्रताड़ित किया जाना न सिर्फ मानवाधिकार का मसला है, बल्कि एक बड़े समुदाय की पहचान और गरिमापूर्ण जीवन पर प्रहार है. अब सवाल है कि क्या दलितों का आंदोलन उनके लिए भारतीय समाज में नए कपाट खोलेगा?
(यह लेख तहलका हिंदी पत्रिका के सितंबर, 2016 के अंक में 'आपबीती' कॉलम में छप चुका है.)

ऐसे होता है युवाओं का ‘टैलेंट हंट’

कृष्णकांत 
अपने गांव से 2003 में इलाहाबाद पहुंचा तो सोचा कि गाने और लिखने के अपने शौक को ही अपना पेशा बनाऊंगा. मेरे बड़े भाई पहले से वहां रहते थे. उनके सपोर्ट के बाद मैंने प्रयाग संगीत समिति में एडमिशन ले लिया और संगीत सीखने में लग गया. हालांकि, जब मेरे पिता जी को पता चला कि मैं संगीत सीख रहा हूं तो उनकी प्रतिक्रिया थी, ‘अब यही बचा है! पढ़ना-लिखना है नहीं, अब नाचना-गाना ही बचा है!’ इसके बावजूद मैंने संगीत सीखना जारी रखा.

लोगों की प्रतिक्रियाएं इतनी उत्साहजनक थीं कि मुझे लगता था कि मैं एक संपूर्ण कलाकार बन सकता हूं जो अच्छा संगीत रच सकता है, गाने लिख सकता है, साथ में गा भी सकता है. इस दौरान मैंने कई गाने लिखे और उनकी मौलिक धुन तैयार की. उन्हीं दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में एक सीनियर वसीम अकरम से मुलाकात हुई. एक दिन वसीम भाई ने अखबार में एक फिल्म बनाने वाली कंपनी का विज्ञापन देखा. उस विज्ञापन के मुताबिक कंपनी को स्क्रिप्ट राइटर, गीतकार, गायक, संगीतकार और एक्टर की बड़ी संख्या में जरूरत थी. कंपनी युवाओं को मौका देना चाहती थी. हम लोग उत्साहित हो गए. कंपनी ने इस ‘टैलेंट हंट’ के लिए प्रत्येक प्रतिभागी को 450 रुपये के साथ निश्चित तारीख को बुलाया था.

यह साल 2005 के दिसंबर की बात है जब इलाहाबाद में पढ़ने वाले छात्र को एक से डेढ़ हजार रुपये घर से मिलते थे. उन दिनों 450 रुपये की रकम बहुत बड़ी होती थी. सिविल लाइंस के एक होटल में प्रतिभागियों के चुनाव का कार्यक्रम रखा गया था. हम दोनों ने पैसे की जैसे-तैसे व्यवस्था की और वहां पहुंच गए. अपना रजिस्ट्रेशन कराया और अपनी बारी का इंतजार करने लगे.
करीब डेढ़ घंटे बाद मेरा नंबर आया. मुझे एक कमरे में ले जाया गया. कमरे की दीवार पर एक बड़ी-सी स्क्रीन लगी थी जिसमें चार चेहरे दिख रहे थे. स्क्रीन से आवाज आई, ‘आप क्या करेंगे?’ मैंने जवाब दिया, ‘मैं गाने लिखता हूं और गाता हूं.’ उन्होंने कहा, ‘अपना लिखा कोई गाना सुनाओ.’ मैंने अपना लिखा और कंपोज किया हुआ एक गाना उनको सुनाया. गाने का मुखड़ा और एक अंतरा खत्म होते ही स्क्रीन पर दिख रहे चार लोगों में से एक मोटा आदमी जोर से बोला, ‘ओके, वेलडन! हमने अपनी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी के लिए आपको गीतकार चुन लिया है. आप हमारे लिए गाने लिखेंगे.’ मैंने खुश होकर उन्हें थैंक यू बोला और उछलता हुआ बाहर आ गया. वसीम भाई को भी मेरी तरह गायक चुन लिया गया था. हमें बताया गया था कि वे हमें कॉल करेंगे. कुछ दिन तक हम दोनों के पांव जमीन पर नहीं थे.

असली खेला तो गुरु इसके बाद हुआ. एक महीना बीता लेकिन कॉल नहीं आई. अब हम लोग जमीन पर आने लगे थे. देखते-देखते दो महीने बीते. फिर तीन, चार, पांच महीने बीत गए. हम लोगों ने फोन पर संपर्क करना शुरू किया लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला. गर्मियों की छुट्टी में मैं इस ‘टैलेंट हंट’ कंपनी की खोज में लखनऊ गया. विज्ञापन में दिए पते पर पहुंचा तो पता चला कि कोई अरविंद गौड़ हैं जिन्होंने टैलेंट हंट के जरिए अपना सपना पूरा किया था. मैं अंतत: गौड़ साहब को खोजने में कामयाब हो गया. उन्होंने मुझे टाइम दिया और मिलने बुलाया. मिलते ही उन्होंने आश्वासन दिया कि काम चल रहा है. अभी हमने प्रेमचंद की कहानी पर एक फिल्म बनाई है. उसके बाद उस प्रोजेक्ट पर काम शुरू होगा. मेरी कल्पना ने फिर से उड़ान भरी और लगा कि अभी उम्मीद जिंदा है. उन्होंने मुझसे अपने कुछ और गाने वहां जमा करने को कहा जो कि मैंने कर दिए.

उसके बाद आज दस साल बीत गए हैं. उस तथाकथित कंपनी और उस  डायरेक्टर का कुछ अता-पता नहीं. वसीम भाई ने अपना गायक बनने का शौक एक भोजपुरी एलबम रिकॉर्ड करवाकर पूरा किया. हमने अपने गीत डायरी में बंद कर दिए, फिर अपनी पढ़ाई पूरी की और दोनों ही कलमघसीट पत्रकार बन गए. अगर उस कंपनी ने 500 उत्साहित बच्चों से 450 रुपये वसूले होंगे तो कुल मिलाकर सवा दो लाख का जुगाड़ हो गया होगा. पत्रकार बनने के बाद अब युवाओं को मूर्ख बनाने के इस तरह के तमाम किस्से हम सुनते रहते हैं और हर बार हमारे साथ हुई उस सिनेमाई ठगी पर हंसी भी आती है और गुस्सा भी.
(यह लेख तहलका हिंदी पत्रिका के सितंबर, 2016 के अंक में 'आपबीती' कॉलम में छप चुका है.)


रविवार, 28 अगस्त 2016

धर्म और राजनीति का नाजायज रिश्ता

एक बहुत बड़े नेता जी और एक साधु बाबा में वार्ता हो रही थी. मुद्दा था कि हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति पर खतरे से कैसे निपटा जाए.
बाबा बोले- 'बच्चा! तुम लोग देश को संस्कार और धर्म के रास्ते से भटका रहे हो.'
नेता जी कुटिल मुस्की मारते हुए बोले- 'नहीं बाबा जी, आपको कोई भरम हो गया है. हम देश बचाने के साथ देश की संस्कृति और धर्म सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं. हम गोरक्षा कर रहे हैं. गाय माता के अंदर 33 करोड़ देवता हैं, गाय में धर्म है इसलिए हम धर्मरक्षा कर रहे हैं. धर्म की रक्षा के लिए पैसा चाहिए, इसलिए हम बूचड़खाना चला रहे हैं. दुनिया में सबसे ज्यादा मांस सप्लाई का हमारा रिकॉर्ड बन चुका है.'
बाबा ने खुश होते हुए अपनी भगवा झोली से चिलम निकाली और उंगली डालकर उसे साफ करने लगे. नेता जी ने आगे कहा- 'देखिए, हम संतुलन बनाने का भी प्रयास कर रहे हैं. हमारे नेता जी एक तरफ विकास का नारा लगवाते हैं, दूसरी तरफ हम गाय माता को बचाने के लिए दंगा करवा देते हैं. जनता में कोई गलत संदेश न जाए, इसलिए नेता जी से निंदा भी करवा देते हैं. देखिए अभी अभी उन्होंने बोला था कि 80 प्रतिशत गोरक्षक लोग लंपट है.'
'न न न न बच्चा... यहीं तो गड़बड़ हो गई.' बाबा ने अल्पविराम लिया, भगवा झोले की बगल वाली जेब से गांजा निकाला, निस्पृह भाव से चिलम के मुख-मंडल पर रखा और नेता जी को माचिस पकड़ा दी. नेता जी ने इशारा समझा और मुस्कराते हुए आग जलाई. बाबा के मुखारविंद से बम भोले की आवाज गूंजी और अगल-बगल सब धुआं-धुआं हो गया.
बाबा ने भट्ठे की चिमनी की तरह भभका छोड़ा और सांस खींच कर बोले- 'देखो बच्चा, जैसे आपने अभी मुस्कान के साथ चिलम में आग दी, बिना विचलित हुए, बिना धैर्य खोए, और परिणाम देखो. चिलम पूरी तरह अग्नि से भर गई. अब मैं इसे फूंक कर राख कर दूंगा. तुमको धर्म की रक्षा भी ऐसे ही करनी है. तुम्हारे नेता जी के भाषण में त्रुटि थी. गोरक्षकों को उकसाकर दो साल में सड़क पर लाया गया. यह तो सकारात्मक है, लेकिन उनको गुंडा और लंपट बता देने पर नब्बे साल के सपने पर पानी फिर गया. यह धर्मविरोधी तत्वों की जीत है.'
बाबा ने थोड़ा विराम लिया. पुन: चिलम मुखारविंद तक लाए, एक लंबा सुड़ुुक्का भरकर छोड़ा तो नेता जी और बाबा के बीच की दृश्यता कुछ देर के लिए शून्य हो गई. बाबा ने फिर से कहना शुरू किया- 'बच्चा, धर्म धैर्य की मांग करता है. धार्मिक का धैर्य खो देना धर्म के मार्ग से स्खलित हो जाना है. स्खलन पुरुष को पौरुष मार्ग से विचलित करता है. धर्म की सुरक्षा तब होगी जब पूरे मनोयोग से आग लगाई जाए और कितनी भी चीख पुकार मचे, उफ तक न किया जाए. उस आग में अपना हाथ सेंक रहे श्रद्धालुओं को सुरक्षा दी जाए. उनपर किसी तरह का हमला न किया जाए. तब जाकर धर्म की रक्षा हो सकेगी. अन्यथा धर्म का सत्यानाश समझना चाहिए. शास्त्रों में ऐसा कहा गया है.'
नेता जी ने उलूक की तरह अपना खल्वाट हिलाकर हामी भरी, आगे तक निकल आए पेट पर हाथ फेरा और डकार लेते हुए बोले- 'जी गुरुदेव... लेकिन बयान नहीं देने से विपक्ष हंगामा करता है. अमेरिका वाला राक्षस लोग सब आलेख छापकर निंदा कर देता है. वाशिंग मशीन नामक एक समाचार पत्र ने लिख डाला कि ई सब विश्वगुरु लोग तालिबान बन गया है. गुरुदेव हम लोगों का अंतर्राष्ट्रीय निंदा होने लगता है.'
बाबा ने चिलम का अंतिम कश खींचकर छोड़ा, धुआं इस बार और घना था. धुआं छंट जाने के बाद बोले- देखो, जैसे हम अपनी बात कहने के लिए इस चिलम से निकले धुएं के छंटने का इंतजार करते हैं, उसी तरह धैर्यपूर्वक आग लगाने के बाद मौन साध लेना चाहिए और धुआं छंटने का इंतजार करना चाहिए... याद रखो बच्चा, धर्म पति है और राजनीति पत्नी है. धर्म के द्वारा राजनीति पर अंकुश लगाना चाहिए. जिस तरह से पत्नी पर अंकुश रहे तो घर में शांति आती है, उसी तरह राजनीति पर धर्म के अंकुश से चराचर जगत में शांति आएगी...
बात पूरी होती, इसके पहले ही झाड़ियों से धूल झाड़ते हुए धर्मांधाधिराज, समस्त भक्त समुदाय के बापू श्री आसाराम प्रकट हुए. बाबा और नेता अवाक उनकी तरफ देखने लगे.
आसाराम ने छूटते ही कहा, 'राजन! यह पति-पत्नी वाला प्रसंग तो मैं पहले ही सिद्ध कर चुका हूं. मैंने दिखाया था कि धर्म, सत्ता और पैसे का नशा कैसे राजनीति और जनता को काबू में रखता है! मैंने यह भी साबित किया कि धर्मरूपी पति द्वारा तमाम पतियों की पत्नियों को पतनशील मार्ग दिखाकर खुद को पतितपावन बनाए रखा जा सकता है. परमपिता का नाम ले-लेकर पुरुषों को पशु और पत्नियों को पपेट बनाया जा सकता है. लेकिन सत्यानाश हो राजनीति का, ये कांग्रेस वाला सब नेता लोग हमको जेल में डलवा दिया. और ये आरएसएस वाला नेता लोग सब दूसरा धर्मपति खोज लाया, वह भी नंगा. यह हमारे विराट हिंदुत्व की हार है...'
आसाराम जी यही इतना बोल पाए थे कि वे भावुक हो गए और गला ऐसे रुंध गया जैसे मोहल्ले की कोई गली गोरक्षक-दंगाइयों से भर जाती है. बाबा और नेताजी दोनों भावुक हो गए और नेताजी अपने मोबाइल में सुब्रमण्यम स्वामी का नंबर खोजने लगे.

रविवार, 14 अगस्त 2016

एक गोभक्त से भेंट- हरिशंकर परसाई

एक शाम रेलवे स्टेशन पर एक स्वामीजी के दर्शन हो गए. ऊंचे, गोरे और तगड़े साधु थे. चेहरा लाल. गेरुए रेशमी
कपड़े पहने थे. पांवों में खड़ाऊं. हाथ में सुनहरी मूठ की छड़ी. साथ एक छोटे साइज का किशोर संन्यासी था. उसके हाथ में ट्रांजिस्टर था और वह गुरु को रफी के गाने के सुनवा रहा था.

मैंने पूछा- स्वामी जी, कहां जाना हो रहा है?

स्वामीजी बोले – दिल्ली जा रहे हैं, बच्चा!
मैंने कहा- स्वामीजी, मेरी काफी उम्र है, आप मुझे ‘बच्चा’ क्यों कहते हैं?

स्वामीजी हंसे. बोले – बच्चा, तुम संसारी लोग होटल में साठ साल के बूढ़े बैरे को ‘छोकरा’ कहते हो न! उसी तरह हम तुम संसारियों को बच्चा कहते हैं. यह विश्व एक विशाल भोजनालय है जिसमें हम खाने वाले हैं और तुम परोसने वाले हो. इसीलिए हम तुम्हें बच्चा कहते हैं. बुरा मत मानो. संबोधन मात्र है.

स्वामीजी बात से दिलचस्प लगे. मैं उनके पास बैठ गया. वे भी बेंच पर पालथी मारकर बैठ गए. सेवक को गाना बंद करने के लिए कहा.

कहने लगे- बच्चा, धर्मयुद्ध छिड़ गया. गोरक्षा-आंदोलन तीव्र हो गया है. दिल्ली में संसद के सामने सत्याग्रह करेंगे.

मैंने कहा- स्वामीजी, यह आंदोलन किस हेतु चलाया जा रहा है?
स्वामीजी ने कहा- तुम अज्ञानी मालूम होते हो, बच्चा! अरे गौ की रक्षा करना है. गौ हमारी माता है. उसका वध हो रहा है.

मैंने पूछा- वध कौन कर रहा है?

वे बोले- विधर्मी कसाई.

मैंने कहा- उन्हें वध के लिए गौ कौन बेचते हैं? वे आपके सधर्मी गोभक्त ही हैं न?

स्वामीजी ने कहा- सो तो है. पर वे क्या करें? एक तो गाय व्यर्थ खाती है, दूसरे बेचने से पैसे मिल जाते हैं.

मैंने कहा- यानी पैसे के लिए माता का जो वध करा दे, वही सच्चा गो-पूजक हुआ!

स्वामीजी मेरी तरफ देखने लगे. बोले- तर्क तो अच्छा कर लेते हो, बच्चा! पर यह तर्क की नहीं, भावना की बात है. इस समय जो हजारों गोभक्त आंदोलन कर रहे हैं, उनमें शायद ही कोई गौ पालता हो पर आंदोलन कर रहे हैं. यह भावना की बात है.

स्वामीजी से बातचीत का रास्ता खुल चुका था. उनसे जमकर बातें हुईं, जिसमें तत्व मंथन हुआ. जो तत्व प्रेमी हैं, उनके लाभार्थ वार्तालाप नीचे दे रहा हूं.

स्वामीजी और बच्चा की बातचीत

स्वामीजी, आप तो गाय का दूध ही पीते होंगे?

नहीं बच्चा, हम भैंस के दूध का सेवन करते हैं. गाय कम दूध देती है और वह पतला होता है. भैंस के दूध की बढ़िया गाढ़ी मलाई और रबड़ी बनती है.

तो क्या सभी गोभक्त भैंस का दूध पीते हैं?

हां, बच्चा, लगभग सभी.

तब तो भैंस की रक्षा हेतु आंदोलन करना चाहिए. भैंस का दूध पीते हैं, मगर माता गौ को कहते हैं. जिसका दूध पिया जाता है, वही तो माता कहलाएगी.

यानी भैंस को हम माता…नहीं बच्चा, तर्क ठीक है, पर भावना दूसरी है.

स्वामीजी, हर चुनाव के पहले गोभक्ति क्यों जोर पकड़ती है? इस मौसम में कोई खास बात है क्या?

बच्चा, जब चुनाव आता है, तब हमारे नेताओं को गोमाता सपने में दर्शन देती है. कहती है बेटा चुनाव आ रहा है. अब मेरी रक्षा का आंदोलन करो. देश की जनता अभी मूर्ख है. मेरी रक्षा का आंदोलन करके वोट ले लो. बच्चा, कुछ राजनीतिक दलों को गोमाता वोट दिलाती है, जैसे एक दल को बैल वोट दिलाते हैं. तो ये नेता एकदम आंदोलन छेड़ देते हैं और हम साधुओं को उसमें शामिल कर लेते हैं. हमें भी राजनीति में मजा आता है. बच्चा, तुम हमसे ही पूछ रहे हो. तुम तो कुछ बताओ, तुम कहां जा रहे हो?

स्वामीजी मैं ‘मनुष्य-रक्षा आंदोलन’ में जा रहा हूं.

यह क्या होता है, बच्चा?

स्वामीजी, जैसे गाय के बारे में मैं अज्ञानी हूं, वैसे ही मनुष्य के बारे में आप हैं.

पर मनुष्य को कौन मार रहा है?

इस देश के मनुष्य को सूखा मार रहा है, अकाल मार रहा है, महंगाई मार रही है. मनुष्य को मुनाफाखोर मार रहा है, काला-बाजारी मार रहा है. भ्रष्ट शासन-तंत्र मार रहा है. सरकार भी पुलिस की गोली से चाहे जहां मनुष्य को मार रही है. बिहार के लोग भूखे मर रहे हैं.

बिहार? बिहार शहर कहा है बच्चा?

बिहार एक प्रदेश है, राज्य है.
अपने जम्बूद्वीप में है न?

स्वामीजी, इसी देश में है, भारत में.

यानी आर्यावर्त में?

जी हां, ऐसा ही समझ लीजिए. स्वामीजी, आप भी मनुष्य-रक्षा आंदोलन में शामिल हो जाइए न!

नहीं बच्चा, हम धर्मात्मा आदमी हैं. हमसे यह नहीं होगा. एक तो मनुष्य हमारी दृष्टि में बहुत तुच्छ है. वे लोग ही तो हैं, जो कहते हैं, मंदिरों और मठों में लगी जायदाद को सरकार ले ले. बच्चा, तुम मनुष्य को मरने दो. गौ की रक्षा करो. कोई भी जीवधारी मनुष्य से श्रेष्ठ है. तुम देख नहीं रहे हो, गोरक्षा के जुलूस में जब झगड़ा होता है, तब मनुष्य ही मारे जाते हैं. एक बात और है, बच्चा! तुम्हारी बात से प्रतीत होता है कि मनुष्य-रक्षा के लिए मुनाफाखोर और काला-बाजारी से बुराई लेनी पड़ेगी. यह हमसे नहीं होगा. यही लोग तो गोरक्षा-आंदोलन के लिए धन देते हैं. हमारा मुंह धर्म ने बंद कर दिया है.

खैर, छोड़िए मनुष्य को. गोरक्षा के बारे में मेरी ज्ञान-वृद्धि कीजिए. एक बात बताइए, मान लीजिए आपके बरामदे में गेहूं सूख रहे हैं. तभी एक गोमाता आकर गेहूं खाने लगती है. आप क्या करेंगे?

बच्चा? हम उसे डंडा मारकर भगा देंगे.

पर स्वामीजी, वह गोमाता है न. पूज्य है. बेटे के गेहूं खाने आई है. आप हाथ जोड़कर स्वागत क्यों नहीं करते कि आ माता, मैं कृतार्थ हो गया. सब गेहूं खा जा.

बच्चा, तुम हमें मूर्ख समझते हो?

नहीं, मैं आपको गोभक्त समझता था.

सो तो हम हैं, पर इतने मूर्ख भी नहीं हैं कि गाय को गेहूं खा जाने दें.

पर स्वामीजी, यह कैसी पूजा है कि गाय हड्डी का ढांचा लिए हुए मुहल्ले में कागज और कपड़े खाती फिरती है और जगह जगह पिटती है!

बच्चा, यह कोई अचरज की बात नहीं है. हमारे यहां जिसकी पूजा की जाती है उसकी दुर्दशा कर डालते हैं. यही सच्ची पूजा है. नारी को भी हमने पूज्य माना और उसकी जैसी दुर्दशा की सो तुम जानते ही हो.

स्वामीजी, दूसरे देशों में लोग गाय की पूजा नहीं करते, पर उसे अच्छी तरह रखते हैं और अब वह खूब दूध देती है.

बच्चा, दूसरे देशों की बात छोड़ो. हम उनसे बहुत ऊंचे हैं. देवता इसीलिए सिर्फ हमारे यहां अवतार लेते हैं. दूसरे देशों में गाय दूध के उपयोग के लिए होती है, हमारे यहां वह दंगा करने, आंदोलन करने के लिए होती है. हमारी गाय और गायों से भिन्न है.

स्वामीजी, और सब समस्याएं छोड़कर आप लोग इसी एक काम में क्यों लग गए हैं?

इसी से सब हो जाएगा, बच्चा! अगर गोरक्षा का कानून बन जाए, तो यह देश अपने-आप समृद्ध हो जाएगा. फिर बादल समय पर पानी बरसाएंगे, भूमि खूब अन्न देगी और कारखाने बिना चले भी उत्पादन करेंगे. धर्म का प्रताप तुम नहीं जानते. अभी जो देश की दुर्दशा है, वह गौ के अनादर का परिणाम है.

स्वामीजी, पश्चिम के देश गौ की पूजा नहीं करते, फिर भी समृद्ध हैं?

उनका भगवान दूसरा है बच्चा. उनका भगवान इस बात का ख्याल नहीं करता.

और रूस जैसे समाजवादी देश भी गाय को नहीं पूजते, पर समृद्ध हैं?

उनका तो भगवान ही नहीं बच्चा. उन्हें दोष नहीं लगता.

यानी भगवान रखना भी एक झंझट ही है. वह हर बात का दंड देने लगता है.

तर्क ठीक है, बच्चा, पर भावना गलत है.

स्वामीजी, जहां तक मैं जानता हूं, जनता के मन में इस समय गोरक्षा नहीं है, महंगाई और आर्थिक शोषण है. जनता महंगाई के खिलाफ आंदोलन करती है. वह वेतन और महंगाई-भत्ता बढ़वाने के लिए हड़ताल करती है. जनता आर्थिक न्याय के लिए लड़ रही है और इधर आप गोरक्षा-आंदोलन लेकर बैठ गए हैं. इसमें तुक क्या है?

बच्चा, इसमें तुक है. देखो, जनता जब आर्थिक न्याय की मांग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह खतरनाक हो जाती है. जनता कहती है हमारी मांग है महंगाई बंद हो, मुनाफाखोरी बंद हो, वेतन बढ़े, शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी मांग गोरक्षा है. बच्चा, आर्थिक क्रांति की तरफ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूंटे से बांध देते हैं. यह आंदोलन जनता को उलझाए रखने के लिए है.

स्वामीजी, किसकी तरफ से आप जनता को इस तरह उलझाए रखते हैं?

जनता की मांग का जिन पर असर पड़ेगा, उसकी तरफ से. यही धर्म है. एक दृष्टांत देते हैं. एक दिन हजारों भूखे लोग व्यवसायी के

गोदाम में भरे अन्न को लूटने के लिए निकल पड़े. व्यवसायी हमारे पास आया. कहने लगा स्वामीजी, कुछ करिए. ये लोग तो मेरी सारी जमा-पूंजी लूट लेंगे. आप ही बचा सकते हैं. आप जो कहेंगे, सेवा करेंगे. बस बच्चा, हम उठे, हाथ में एक हड्डी ली और मंदिर के चबूतरे पर खड़े हो गए. जब वे हजारों भूखे गोदाम लूटने का नारा लगाते आए, तो मैंने उन्हें हड्डी दिखाई और जोर से कहा किसी ने भगवान के मंदिर को भ्रष्ट कर दिया. वह हड्डी किसी पापी ने मंदिर में डाल दी. विधर्मी हमारे मंदिर को अपवित्र करते हैं., हमारे धर्म को नष्ट करते हैं. हमें शर्म आनी चाहिए. मैं इसी क्षण से यहां उपवास करता हूं. मेरा उपवास तभी टूटेगा, जब मंदिर की फिर से पुताई होगी और हवन करके उसे पुनः पवित्र किया जाएगा. बस बच्चा, वह जनता आपस में ही लड़ने लगी. मैंने उनका नारा बदल दिया. जब वे लड़ चुके, तब मैंने कहा- धन्य है इस देश की धर्मपरायण जनता! धन्य है अनाज के व्यापारी सेठ अमुकजी! उन्होंने मंदिर की शुद्धि का सारा खर्च देने को कहा है. बच्चा जिसका गोदाम लूटने वे भूखे जा रहे थे, उसकी जय बोलने लगे. बच्चा, यह है धर्म का प्रताप. अगर इस जनता को गोरक्षा-आंदोलन में न लगाएंगे तो यह बैंकों के राष्ट्रीयकरण का आंदोलन करेगी, तनख्वाह बढ़वाने का आंदोलन करेगी, मुनाफाखोरी के खिलाफ आंदोलन करेगी. उसे बीच में उलझाए रखना धर्म है, बच्चा.

स्वामीजी, आपने मेरी बहुत ज्ञान-वृद्धि की. एक बात और बताइए. कई राज्यों में गोरक्षा के लिए कानून है. बाकी में लागू हो जाएगा. तब यह आंदोलन भी समाप्त हो जाएगा. आगे आप किस बात पर आंदोलन करेंगे.

अरे बच्चा, आंदोलन के लिए बहुत विषय हैं. सिंह दुर्गा का वाहन है. उसे सरकसवाले पिंजरे में बंद करके रखते हैं और उससे खेल कराते हैं. यह अधर्म है. सब सरकसवालों के खिलाफ आंदोलन करके, देश के सारे सरकस बंद करवा देंगे. फिर भगवान का एक अवतार मत्स्यावतार भी है. मछली भगवान का प्रतीक है. हम मछुओं के खिलाफ आंदोलन छेड़ देंगे. सरकार का मत्स्यपालन विभाग (फिशरीज महकमा) बंद करवाएंगे.

स्वामीजी, उल्लू लक्ष्मी का वाहन है. उसके लिए भी तो कुछ करना चाहिए.

यह सब उसी के लिए तो कर रहे हैं, बच्चा! इस देश में उल्लू को कोई कष्ट नहीं है. वह मजे में है.

इतने में गाड़ी आ गई. स्वामीजी उसमें बैठकर चले गए. बच्चा वहीं रह गया.

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

क्या समान नागरिक संहिता के लिए देश तैयार है?

संविधान सभा में काफी विचार-विमर्श के बाद संविधान के नीति निदेशक तत्वों में यह प्रावधान किया गया था कि राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लाने का प्रयास करेगा. समान नागरिक संहिता का मुद्दा हमेशा चर्चा में तो खूब रहा, चुनावी घोषणा पत्रों में भी शामिल हुआ, लेकिन इसका अब तक कोई प्रारूप तक मौजूद नहीं है. अब नरेंद्र मोदी सरकार ने इस विषय पर लॉ कमीशन से रिपोर्ट सौंपने को कहा है, लेकिन क्या समान नागरिक संहिता के लिए देश तैयार है?



हाल ही में केंद्र सरकार ने विधि आयोग को पत्र लिखकर समान नागरिक संहिता (यूनीफाॅर्म/कॉमन सिविल कोड) यानी सभी के लिए एक जैसे कानून पर सुझाव मांगा है. अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार से अपना रुख साफ करने को कहा था. इसके बाद सरकार ने पहली बार विधि आयोग को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर रिपोर्ट देने को कहा था. कुछ दिन पहले सरकार ने विधि आयोग को दोबारा पत्र लिखकर इस मसले की याद दिलाई जिसके बाद यह मसला चर्चा में है.
भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री का पद संभालने के बाद कहा, ‘समान नागरिक संहिता की दिशा में कदम बढ़ाने से पूर्व व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत है. इस दिशा में आगे बढ़ने से पहले सभी हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया जाएगा. इस मसले पर विधि आयोग विचार कर रहा है. संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता का आदेश देता है.’
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि सरकार पूरे देश में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगी. हालांकि, यह अब तक लागू नहीं हो पाया है. समान नागरिक संहिता का मसला धार्मिक पेचीदगियों की वजह से हमेशा संवेदनशील रहा है, इसलिए सरकारों ने इस पर कभी कोई ठोस पहलकदमी नहीं की, हालांकि इस पर गाहे-बगाहे चर्चाएं जरूर होती रही हैं. समान नागरिक संहिता का मुद्दा भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में भी था. केंद्र में सत्ता मिलने के कुछ समय बाद भाजपा के ही सांसद योगी आदित्यनाथ ने सरकार से समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग की थी.
हाल ही में इस मुद्दे को उठाने के बाद भाजपा पर यह आरोप भी लगा कि उत्तर प्रदेश में चुनाव के मद्देनजर उसने इस मुद्दे को छेड़ा है क्योंकि भाजपा की राजनीतिक विचारधारा से जुड़े जो मुद्दे हैं उनमें राम मंदिर, कश्मीर में अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता प्रमुख हैं. हालांकि भाजपा ने इस आरोप से इनकार किया और इस शुरुआत को समान नागरिक संहिता को वजूद में लाने की सामान्य प्रक्रिया बताया.
बीते अक्टूबर में ईसाई समुदाय के एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी कि देश में समान नागरिक संहिता लागू की जाए. याचिका में कहा गया था कि ईसाई दंपति को तलाक लेने के लिए दो वर्ष तक अलग रहने का कानून है जबकि हिंदू व अन्य कानूनों में स्थिति अलग है. इसी सिलसिले में समान नागरिक संहिता की बात उठी थी जिस पर कोर्ट ने केंद्र से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा था. दिसंबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने भी समान नागरिक संहिता को लेकर याचिका दायर की थी. इसमें कहा गया था, ‘समान नागरिक संहिता आधुनिक और प्रगतिशील राष्ट्र का प्रतीक है. इसे लागू करने का मतलब होगा कि देश धर्म-जाति आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करता. देश में आर्थिक प्रगति जरूर हुई है लेकिन सामाजिक रूप से कोई तरक्की नहीं हुई है.’ समान नागरिक संहिता के पक्षधर तबके की दलील है, ‘एक धर्मनिरपेक्ष गणतांत्रिक देश में प्रत्येक व्यक्ति के लिए कानूनी व्यवस्थाएं समान होनी चाहिए.’
इस तरह की ज्यादातर याचिकाएं खारिज करते हुए कोर्ट का बार-बार यह तर्क रहा है कि चूंकि कानून बनाना सरकार का काम है इसलिए कोर्ट इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती, न ही वह सरकार को कानून बनाने का आदेश दे सकती है. लेकिन यदि कोई पीड़ित सुप्रीम कोर्ट जाता है तो कोर्ट को उस पर सुनवाई करनी पड़ती है. पिछले एक साल में ईसाई तलाक कानून और मुस्लिम तीन तलाक कानून के खिलाफ कई मसले सुप्रीम कोर्ट में आए हैं.
सरकार की तरफ से विधि आयोग को पत्र लिखे जाने के बाद कई मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर विचार करना शुरू कर दिया है. इस मसले से जुड़े फैसलों में कोर्ट की टिप्पणियां, दस्तावेज वगैरह जुटाए जा रहे हैं. इस मसले पर आयोग वेबसाइट के जरिए व अन्य माध्यमों से जनता से राय लेकर व्यापक विचार-विमर्श के बाद सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा.
समान नागरिक संहिता की वकालत करने वालों की राय है कि देश में सभी नागरिकों के लिए एक जैसा नागरिक कानून होना चाहिए, भले ही वे किसी भी धर्म से संबंध रखते हों. लेकिन धर्मावलंबी व धर्मगुरु इससे सहमत नहीं हैं. समाज का एक तबका ऐसा भी है जो विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मसलों को भी धर्म से जोड़कर देखता है. दूसरी ओर, समान नागरिक संहिता न होने की वजह से महिलाओं के बीच आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. राजनीतिक दल समान कानून बनाने या समान नागरिक संहिता के पक्षधर तो रहे हैं, लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के चलते किसी भी सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की.
सवाल यह है कि क्या सरकार इस मसले पर आगे बढ़ेगी या हमेशा की तरह यह मुद्दा सिर्फ चुनावी चाल की तरह बार-बार चला जाता रहेगा? इसके साथ और भी कई अहम सवाल इस मसले से जुड़े हैं. दरअसल, कुछ समुदायों के अपने पर्सनल कानून हैं जिन्हें वे न सिर्फ धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते हैं, बल्कि वे इसे अपना संवैधानिक अधिकार मानते हैं. इसके चलते समान नागरिक संहिता का कड़ा विरोध भी हो सकता है.
सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) ने इस मुद्दे पर सर्वे कराया था. इस सर्वे में 57 फीसदी लोगों ने विवाह, तलाक, संपत्ति, गोद लेने और भरण-पोषण जैसे मामलों में समुदायों के लिए पृथक कानून के पक्ष में राय जाहिर की. केवल 23 फीसदी लोग समान नागरिक संहिता के पक्ष में थे. 20 फीसदी लोगों ने कोई राय ही नहीं रखी. 55 फीसदी हिंदुओं ने संपत्ति और विवाह के मामले में समुदायों के अपने कानून रहने देने के पक्ष में राय दी, जबकि ऐसे मुस्लिम 65 फीसदी थे. अन्य अल्पसंख्यक समुदायों (ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन) ने सर्वे में इससे मिलती-जुलती या इससे थोड़ी ज्यादा संख्या में समान नागरिक संहिता का समर्थन किया. अल्पसंख्यक समुदायों का बहुमत मौजूदा व्यवस्था कायम रखने के पक्ष में है. सीएसडीएस का निष्कर्ष था कि शिक्षित वर्ग में भी समान नागरिक संहिता से असहमति रखने वालों का बहुमत है. शिक्षित तबके में समान नागरिक संहिता के पक्ष और विपक्ष में जोरदार दलीलें दी गईं, लेकिन झुकाव इस ओर रहा कि विभिन्न समुदायों के निजी मामले अपने-अपने कानूनों से ही संचालित होने चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता पर समय-समय पर न सिर्फ टिप्पणियां की हैं, बल्कि सरकार को इस दिशा में बढ़ने के निर्देश भी दिए हैं. फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रकरण की सुनवाई करते हुए कहा था कि यह बहुत ही आवश्यक है कि सिविल कानूनों से धर्म को बाहर किया जाए. 11 मई, 1995 को एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता को अनिवार्य रूप से लागू किए जाने पर जोर दिया था. कोर्ट का कहना था कि इससे एक ओर जहां पीड़ित महिलाओं की सुरक्षा हो सकेगी वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय एकता बढ़ाने के लिए भी यह आवश्यक है. कोर्ट ने उस वक्त यहां तक कहा, ‘इस तरह के किसी समुदाय के निजी कानून स्वायत्तता नहीं, बल्कि अत्याचार के प्रतीक हैं. भारतीय नेताओं ने द्विराष्ट्र अथवा तीन राष्ट्रों के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया. भारत एक राष्ट्र है और कोई समुदाय मजहब के आधार पर स्वतंत्र अस्तित्व का दावा नहीं कर सकता.’ कोर्ट ने इस संबंध में कानून मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह जिम्मेदार अधिकारी द्वारा शपथ पत्र प्रस्तुत करके बताए कि समान नागरिक संहिता के लिए न्यायालय के आदेश के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने क्या प्रयास किए. हालांकि, यह बात दीगर है कि आज तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई.
संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप कहते हैं, ‘विचार तो पिछले 70 साल से चल रहा है. विचार करने में कोई कठिनाई नहीं है. लेकिन मेरा निजी विचार है कि कानून लागू करने के लिए राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को भी ध्यान में रखा जाए, वैधानिक परिप्रेक्ष्य को भी ध्यान में रखा जाए तो होना यह चाहिए कि इसकी मांग उस समुदाय के अंदर से उठनी चाहिए और इसको लैंगिक न्याय के रूप में लिया जाना चाहिए. और समान नागरिक संहिता का मतलब ये नहीं है कि किसी के ऊपर हिंदू कोड बिल लागू किया जा रहा है. समान नागरिक संहिता में यह भी हो सकता है कि मुस्लिम लॉ की जो भी अच्छी बातें हों, वे सब उसमें शामिल हों. क्रिश्चियन लॉ की अच्छी बातें हैं, वे भी शामिल हों. यूनीफॉर्म सिविल कोड क्या है, अभी तो कुछ पता ही नहीं है. अभी उसका कोई प्रारूप ही नहीं है.’
वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय कहते हैं, ‘समान नागरिक संहिता तो चल ही रही है. लोगों को यह भ्रम है कि कॉमन सिविल कोड है ही नहीं. कॉमन सिविल कोड पहले से है और उससे 123 करोड़ लोग गवर्न हो रहे हैं. कुछ जो पुराने भ्रम बने हुए हैं उसमें से एक कॉमन सिविल कोड भी है. लेकिन दो-तीन बातें ऐसी हैं जिसको हमारी सरकारें या विभिन्न समुदाय हल नहीं कर पाए हैं. इसलिए कॉमन सिविल कोड की बात चलती रहती है. उनमें से एक मसला ये है कि विवाह का कानून कैसा हो. विवाह अगर टूटता है तो तीन तलाक के माध्यम से हो या कानून के माध्यम से. इसी तरह संपत्ति के वारिस का मामला है. ये दो-तीन बातें ऐसी हैं जिनके बारे में अभी कॉमन सिविल कोड लागू होना है और ये बहुत विवादास्पद है. कई बार सरकारें इस पर पहल नहीं करतीं. अब नई स्थिति यह है कि मामला विधि आयोग को भेजा गया है, लेकिन पहले भी विधि आयोग की रिपोर्ट आती रही है. अब फिर से मामला लॉ कमीशन के सुपुर्द किया गया है.
कमीशन की जो रिपोर्ट आएगी, उस पर बातचीत होगी और संसद में यह सवाल उठेगा.’
समान नागरिक संहिता लागू हो या न हो, इसके जवाब में पूर्व मंत्री व नेता आरिफ मोहम्मद खान कहते हैं, ‘यह प्रश्न ही नामुनासिब है क्योंकि खुद हमारा संविधान अपने अनुच्छेद 44 के द्वारा राज्य के ऊपर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह भारत के समस्त नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा. असल में सवाल यह होना चाहिए कि संविधान लागू होने से लेकर आज तक हमारी सरकारों ने इस दिशा में क्या कदम उठाए हैं. वास्तविकता यह है कि समान सिविल संहिता तो छोड़िए, हमने तो क्रिमिनल संहिता को भी समान नहीं रहने दिया. शाह बानो केस में क्रिमिनल संहिता के सेक्शन 125 के तहत निर्णय हुआ था. हमने उसको भी संसद के एक कानून द्वारा निरस्त किया और इस तरह भारतीय महिलाओं के एक वर्ग को उस अधिकार से वंचित कर दिया जो उन्हें क्रिमिनल संहिता के द्वारा मिला हुआ था.’
सुभाष कश्यप भी राजनीतिकरण की बात को स्वीकार करते हुए कहते हैं, ‘इसे लागू करने में कोई तकनीकी मुश्किल नहीं है, बल्कि राजनीतिक मुश्किल है. इस मुद्दे का राजनीतिकरण हुआ है. संविधान राज्य को निर्देश देता है कि समान नागरिक संहिता लागू की जाए. लेकिन क्यों नहीं लाया जा सका है, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर एक-दो सवाल किए. यह अभी तक नहीं लाया गया, इसके कारण राजनीतिक हैं, वोटबैंक पॉलिटिक्स है. जिन समुदायों के पर्सनल कानून हैं, वे समुदाय नाराज न हो जाएं, इसलिए इसे नहीं लाया जा रहा है.’
कानून की समानता का महत्व बताते हुए राम बहादुर रायकहते हैं, ‘फिलहाल हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि सभी का अपना नियम-कानून है. सब अपनी-अपनी रीति और परंपरा से संचालित हैं. इस क्षेत्र में एक समानांतर व्यवस्था चल रही है. बाकी क्षेत्र में ऐसा नहीं है. जैसे मान लिया कि कोई व्यक्ति अपराध करता है तो यह नहीं देखा जाता कि वह किस समुदाय का है. कॉमन सिविल कोड मौजूद है वहां. अगर हम आपकी मानहानि करते हैं तो आप इस आधार पर मुकदमा करते हैं कि हमने आपकी मानहानि की. इस आधार पर नहीं करते कि मैं हिंदू हूं या मुसलमान हूं. दो-तीन बातें हैं जिनका निराकरण हो जाएगा तो यह मसला सुलझ जाएगा.’
अगर मौजूदा व्यवस्था ही बनी रहे, समुदायों के पर्सनल कानून ही लागू रहें तो इसके क्या नुकसान हैं? इसके जवाब में राम बहादुर राय कहते हैं, ‘आप कैसे इस चीज को देखते हैं, इस पर निर्भर करता है. कौन व्यक्ति इसको किस रूप में देखता है, यह महत्वपूर्ण है. हमारे एक मित्र हैं, जिनका मैं बहुत आदर करता हूं. लेकिन उनका मानना है कि खाप पंचायत बहुत आदर्श व्यवस्था है. अब खाप अगर आदर्श व्यवस्था है तो खाप जो फैसला करेगी, उस समुदाय पर वही लागू होगा. किंतु अब सवाल यह है कि जो भारतीय अपराध संहिता है वह लागू होगी या खाप की व्यवस्था लागू होगी. यहां पर टकराव आता है. दूसरा उदाहरण है ट्राइबल इलाकों की पंचायतें. कोई अपराध वगैरह होता है तो वे बैठते हैं और कई-कई दिन तक उस पर बात करते हैं. वहीं खाना-पीना होता है, वहीं पर सोना होता है. वे उस पर सर्वानुमति से फैसला लेते हैं. मेरा ख्याल है कि विनोबा जी ने सर्वोदय में जो सर्वानुमति चलाई, उसकी प्रेरणा यहीं से मिली होगी. अब कोई सरकार अगर वहां सर्वानुमति से राय लेती है कि कोई कानून लागू नहीं होगा और कोई अपराध होता है तब क्या होगा? अरुणाचल प्रदेश में 1980-82 तक कोई जेल नहीं थी. अब वहां पर जेलें हैं. जो लोग इस मुद्दे को उठाते हैं उसके पीछे दो तरह की अवधारणा है. पहली अवधारणा यह है कि हमारे संविधान का जो केंद्रीय बिंदु है, जो मुख्य पात्र है, वह नागरिक है. खाप, पंचायत या दूसरी व्यवस्था मान्य नहीं है. ये व्यवस्थाएं तभी तक चल सकती हैं, जब तक उनका कानून से कोई टकराव न हो. जहां टकराव होता है तो यह मांग उठती है कि भाई सबके लिए एक कानून लागू क्यों नहीं करते. दूसरा, अगर नागरिक के स्तर पर भेदभाव होता है तो सवाल उठता है कि एक को आप कानून से संचालित करना चाहते हैं, दूसरे को आप उसकी मर्जी के कानून से संचालित करते हैं.’
इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका डालने वाले अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘देखिए, मुझे लगता है कि अनुच्छेद 44 हमारे संविधान की आत्मा है. कुछ ऐसे अनुच्छेद हैं, जैसे अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समता की बात करता है और अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की. अगर हम मूल अधिकार में देखें तो ये दोनों मूल अधिकारों की आत्मा हैं. ऐसे ही अगर हम नीति निदेशक तत्वों में जाकर देखें तो अनुच्छेद 44 यानी यूनीफॉर्म सिविल कोड उसकी आत्मा है. हमारे संविधान निर्माताओं ने ‘वन नेशन, वन कांस्टीट्यूशन’ का सपना देखा था और ‘वन नेशन, वन कांस्टीट्यूशन’ में अगर यूनीफॉर्म सिविल कोड नहीं लागू होता और पर्सनल लॉ चलते हैं, तो मुझे लगता है कि हम सिर्फ संविधान का ही अपमान नहीं कर रहे, बल्कि संविधान बनाने वाले बाबा साहेब आंबेडकर, पंडित नेहरू, रफी अहमद किदवई, मौलाना कलाम और तमाम सारे लोगों का अपमान कर रहे हैं. वोटबैंक पॉलिटिक्स के चक्कर में ये अभी तक लागू नहीं किया गया. तमाम लोगों से मेरा एक सवाल है कि अगर बाबा साहेब आंबेडकर, नेहरू, किदवई और तमाम संविधान निर्माता सेक्युलर थे तो उन्हीं का बनाया अनुच्छेद 44 कैसे कम्युनल हो जाएगा. यह बहुत बेसिक बात है. आजादी के बाद संविधान बनाया गया था. उन लोगों को यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि हमारी आने वाली पीढ़ी वोट के चक्कर में क्या-क्या कर देगी. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. वोट की राजनीति ने हमारा बहुत नुकसान किया है.’
समान नागरिक संहिता पर ऐतिहासिक मतभेदों और विवादों का जिक्र करते हुए रामबहादुर राय बताते हैं कि जवाहरलाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद में जो विवाद था वह इसी बात पर था. राजेंद्र प्रसाद यह नहीं चाहते थे कि हिंदू कोड बिल केवल हिंदुओं के लिए लागू हो. अगर आप हिंदू कोड बिल बना रहे हैं तो मुस्लिम कोड बिल भी बनाइए. और हिंदू कोड बिल, मुस्लिम कोड बिल की क्या जरूरत है, कॉमन कोड क्यों नहीं हो सकता? ये 1954-55 से चला आ रहा विवाद है. वे कहते हैं, ‘इसका व्यापक पक्ष जो है वह दूसरा है. वह इससे संबंधित है कि हमने अभी भी भारत के लोगों के लिए, जिसमें हिंदू-मुसलमान-ईसाई-पारसी का सवाल नहीं है, इस पर विचार ही नहीं किया है कि भारतीय नागरिक के लिए किन्हीं परिस्थितियों में कैसा कानून होना चाहिए. जहां कोई अड़चन आती है, वहां मौजूद कानूनों में ही हेरफेर करके काम चला लेते हैं. यह व्यापक प्रश्न है, जिस पर विचार होना चाहिए.’
समान नागरिक संहिता का महत्व और पर्सनल कानून की निरर्थकता बताते हुए अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘दुनिया के बहुत सारे इस्लामिक देशों में यूनीफॉर्म सिविल कोड है. अपने भारत में गोवा में लागू है और वहां चल रहा है. वहां हर समुदाय के लिए एक कॉमन लॉ है. जो लोग इसका विरोध करते हैं, वे महिला और गरीब विरोधी हैं. पर्सनल लॉ महिलाओं को दबाने का स्पेस है. यूनीफॉर्म सिविल कोड आएगा तो महिलाओं के शोषण पर लगाम लग जाएगी. सिर्फ महिलाओं नहीं, कई बार पुरुषों का भी शोषण होता है, वह भी रुकेगा. मेरा अपना मानना है कि हर एक पर्सनल लॉ, हिंदू हो या इस्लामिक या ईसाई, सबमें कुछ-कुछ अच्छी चीजें हैं. उन सबकी बेहतर चीजों को निकालकर एक कॉमन ड्राफ्ट बनाना चाहिए. उस ड्राफ्ट को संसद में ले आना चाहिए फिर उस पर चर्चा हो. अभी दिक्कत ये है कि इसका कोई प्रारूप नहीं है.’
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी इस मसले पर अपनी राय रखते हैं, ‘हम तो उन लोगों में हैं जिन्होंने मुल्क में सेक्युलर दस्तूर को बनवाया है. वह दस्तूर जिसके तहत अपने मजहब पर आजादी के साथ अमल करते हुए मुल्क की तरक्की के लिए, मुल्क को आगे बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए. हमने मजहबी अकलियत को अपनी मजहबी निशानी के साथ दस्तूर में जिंदा रखवाया है. हमारा किरदार है वो. हम सबने गांधी-नेहरू के साथ मिलकर उस दस्तूर को बनवाया है कि जिसमें मुल्क को आगे बढ़ाने में हर आदमी, चाहे वो किसी भी मजहब का हो, मददगार बने और अपने मजहब पर कायम रहने का उसे मुकम्मल हक हो. मुल्क 70 साल से उन्हीं दस्तूरों पर चल रहा है. हम उसके मुखालिफ कैसे हो सकते हैं. हम तो जम्हूरियत और सेक्युलरिज्म की ताईद ही इस वजह से करते हैं कि मुल्क के अंदर तमाम अकलियत को जोड़कर रखने का एक ही रास्ता है और वह है सेक्युलरिज्म. सेक्युलरिज्म ही देश को और मजबूत कर सकता है. तमाम सारी अकलियत को अगर उनके मजहब से काटकर रखा जाएगा तो ये तो झगड़ा पैदा करेगा. हम उसकी ताईद नहीं करते. हम ये मानते हैं कि अपने-अपने मजहब पर अमल करते हुए तमाम लोग मुल्क की आजादी और तरक्की के लिए काम करें. यही अमन और प्यार-मोहब्बत का रास्ता है.’
दूसरी ओर अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘हमारा संविधान शुरू से सेक्युलर रहा है. लेकिन जब इसमें सेक्युलरिज्म शब्द भी जोड़ दिया गया, फिर तो ये पर्सनल हो ही नहीं सकता. किसी कीमत पर नहीं. क्योंकि सेक्युलरिज्म और पर्सनल लॉ एक नदी के दो छोर हैं. साथ-साथ नहीं चल सकते. या तो आपका देश सेक्युलर हो सकता है, या तो धार्मिक हो सकता है. अगर धार्मिक होगा तो पर्सनल लॉ चलेगा. अगर सेक्युलर है तो आपके पास कॉमन सिविल कोड ही रास्ता है.’ वे आगे कहते हैं, ‘यूनीफॉर्म सिविल कोड लागू होने से ऐसा नहीं होगा कि हिंदुओं को निकाह करना पड़ेगा और मुसलमानों को सात फेरे लेने पड़ेंगे. ऐसा नहीं होगा कि हिंदुओं को दफनाना पड़ेगा और मुसलमानों को जलाना पड़ेगा. ये उसमें कहीं आड़े नहीं आता. सुप्रीम कोर्ट के बहुत सारे फैसले हैं. जस्टिस खरे का है, जस्टिस चंद्रचूड़ का है. बड़ी-बड़ी पीठों के फैसले हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार ये वस्तुत: सेक्युलरिज्म का पार्ट हैं, ये पर्सनल कानून या आस्था से नहीं चल सकते. ऐसा नहीं हो सकता कि एक महिला तलाक ले तो उसे दस रुपये मिलें और दूसरी महिला तलाक ले तो उसे एक पैसा न मिले. ऐसा नहीं चल सकता.’
महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर कहती हैं, ‘मुझे ये समझ में नहीं आ रहा है कि सरकार इसमें इतनी दिलचस्पी क्यों ले रही है कि कॉमन सिविल कोड पर अभी ही चर्चा हो और ये लागू हो. अभी बहुत सारी योजनाएं हैं जिनका चुनाव के टाइम ऐलान किया गया था. सरकार का जो लक्ष्य है 2017 का, सबका साथ सबका विकास, शिक्षा, हेल्थ और तमाम मुद्दे हैं, सरकार उन पर काम करे. जो लोग कॉमन सिविल कोड को किसी खास मकसद से लाना चाहते हैं, वे चुनाव को नजर में रखकर इसे उछाल रहे हैं, तो मेरी यही गुजारिश है मुस्लिम समाज मुस्लिम कानून और मजहब के हिसाब से ही काम करेगा. हम महिलाएं अदालत में अपने कानून को मजबूती से लागू करने की लड़ाई लड़ रही हैं.’
समान नागरिक संहिता की चर्चा में सबसे तीखा विरोध मुस्लिम समुदाय की ओर से उठता है. संविधान सभा में बाबा साहेब आंबेडकर का इस मुद्दे पर भाषण भी मुसलमानों पर ही केंद्रित है. अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘जो तथाकथित धर्मगुरु लोग विरोध करते हैं, उन्हें मालूम है कि यह महिलाओं के पक्ष में है. लेकिन ये लोग अपनी दुकान चलाने के लिए विरोध करते हैं. इससे तो धर्म का फायदा है. इस्लाम की जो बेसिक थीम पैगंबर साहेब ने दी थी, वह बराबर की थी. इस्लाम की बेसिक थीम बराबरी है कि हमारे यहां जाति, लिंग आदि का कोई भेद नहीं होगा. अगर बेसिक कॉन्सेप्ट बराबरी है तो कोई भी पर्सनल लॉ जो आर्टिकल 14 का उल्लंघन करे वह तो होना ही नहीं चाहिए. सबसे बेसिक कानून अनुच्छेद 14 और 21 है. जो लोग बाकी अनुच्छेदों की बातें करते हैं, 13, 25, 29 या 30, ये सब 14 के बाद आते हैं. यह एक आॅर्डर में है. बेसिक कानून 14 है. कानून के समक्ष बराबरी बेसिक है. ऐसा नहीं हो सकता है कि शादी के वक्त आप पूछें कि मंजूर है कि नहीं और तलाक देते वक्त नहीं पूछें कि मंजूर है कि नहीं. इसमें सबसे ज्यादा जरूरी है कि पहले कानून का ड्राफ्ट आ जाए. ड्राफ्ट आ जाएगा तो जितने विवाद हैं, वे ज्यादातर अपने आप हल हो जाएंगे.’
शाइस्ता अंबर यह तो मानती हैं कि मुस्लिम समाज में बहुत-से सुधारों की जरूरत है, लेकिन वे इस बात की हिमायती हैं कि इनका निदान इस्लामी कानून और कुरान के मद्देनजर ही होना चाहिए. बातचीत में वे कहती हैं कि इस्लामी कानून अपने आप में मुकम्मल हैं. वे मानती हैं कि मुसलमान औरतों को न्याय कुरान की बुनियाद पर मिलना चाहिए. उन्होंने बताया कि हमने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक सिफारिश भेजी थी कि जिस तरह हिंदू कोड बिल है, उसी तरह एक मुस्लिम कोड बिल बनाया जाए. वे कहती हैं, ‘हम कॉमन सिविल कोड स्वीकार तब करें जब हमारे मुस्लिम पर्सनल कानून में कुछ गलत हो. जब पर्सनल लॉ में कोई कानून गलत है ही नहीं, पहले से ही सारे अधिकार मिले हुए हैं तो हमें कॉमन सिविल कोड की जरूरत ही नहीं है. हमारा विश्वास ऐसे कानून में है जो कॉमन सिविल कोड से ज्यादा मुकम्मल है.’
चूंकि भाजपा कश्मीर में धारा 370, राम मंदिर और यूनीफॉर्म सिविल कोड को मुद्दा बनाती रही है, इसलिए इस मामले में और भी भ्रम की स्थितियां बनी हैं. भाजपा की हिंदूवादी विचारधारा के कारण मुस्लिम समुदाय में यह संदेश गया है कि यह भाजपा का हिंदूवादी एजेंडा है. मौलाना अरशद मदनी कहते हैं, ‘हम समझ रहे हैं, हो सकता है कि मेरी यह बात किसी को बुरी लगे लेकिन वो जो एक आवाज उठी थी सबको घर वापस लाओ, अब तक वो आवाज जनता के बीच थी, अब सरकार उस आवाज के दरख्त को पालने के लिए पानी दे रही है और ये दूसरे रास्ते से उसी की तरफ लेकर चलना चाहते हैं. हमें तो ये मंजूर नहीं है. हम तो मरना और जीना इस्लाम और मजहब के साथ ही बावस्ता रखना चाहते हैं. हम इसकी ताईद नहीं करेंगे. हमारा अपना स्टैंड है और वह बहुत मजबूत है. हमारा इसमें कोई समर्थन और विरोध नहीं है. हम बस इतना जानते हैं कि हर आदमी मुल्क को आगे बढ़ाए और अपने मजहब पर कायम रहते हुए बढ़ाए.’
अब तक यूनीफॉर्म सिविल कोड लागू न होने के लिए वोटबैंक राजनीति को जिम्मेदार ठहराते हुए अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘वोट के लालच ने देश का बहुत नुकसान किया है. राइट टू एजुकेशन को मूलाधिकार बनाकर 21 ए में रखा गया. लेकिन उसमें भी विसंगतियां हैं. हमारे देश में तीन चीजें बहुत जरूरी हैं. यूनीफॉर्म एजुकेशन, यूनीफॉर्म हेल्थकेयर और यूनीफॉर्म सिविल कोड हो. अगर देश की एकता और अखंडता को बनाए रखना है तो ये तीन चीजें बहुत जरूरी हैं.’
(यह स्टोरी तहलका हिंदी पत्रिका में 31 जुलाई 2016 के अंक में प्रकाशित है.)

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...