सोमवार, 25 जुलाई 2016

सोशल मीडिया : यौन उत्पीड़न का नया अड्डा

कृष्णकांत
सोशल मीडिया उन महिलाओं के लिए भी बेहद डरावनी जगह है जो समाज में सशक्त मानी जाती हैं. अपनी बात रखने के एवज में उन्हें गंदी गालियों से नवाजा जाता है. साथ ही मार देने और बलात्कार कर देने तक की धमकियां दी जाती हैं.

सोशल मीडिया पर अक्सर किसी महिला पत्रकार या नेता को विरोधस्वरूप हजारों की संख्या में गालियां दी जाती हैं. बरखा दत्त, सागरिका घोष, राना अयूब, कविता कृष्णन, अलका लांबा, स्मृति ईरानी, अंगूरलता डेका, यशोदा बेन आदि महिलाएं इस अभद्रता की भुक्तभोगी हैं. जो लोग किसी की बात-विचार या व्यक्तित्व को नापसंद करते हैं तो वे लोग इसका विरोध गंदी गालियों या चरित्र-हनन के रूप में करते हैं. हाल ही में बरखा दत्त के नाम के साथ गाली जोड़कर ट्विटर पर हैशटैग ट्रेंड कराया गया और यह पहली बार नहीं था.
केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह के बयान से चर्चा में आया ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द का किसी भी महिला पत्रकार के लिए इस्तेमाल आम है. सागरिका घोष और उनकी बेटी का बलात्कार करने की धमकी दी गई. हाल ही में फेसबुक पर कविता कृष्णन ने कथित ‘फ्री सेक्स’ के बारे में विचार रखे तो उनके खिलाफ एक वरिष्ठ पत्रकार ने अभद्र टिप्पणी की. असम में नवनिर्वाचित भाजपा विधायक अंगूरलता डेका की फोटो शेयर करके अपमानजनक टिप्पणियां की गईं. अदाकारा अंगूरलता की इंटरनेट पर मौजूद उनकी एक्टिंग या मॉडलिंग से जुड़ी तस्वीरों को उनके चरित्र से जोड़कर पेश किया गया. राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली दमदार अभिनेत्री कंगना रनाैत भी सोशल मीडिया पर होने वाली अभद्रता का शिकार हुईं. ऋतिक रोशन के साथ विवाद, पासपोर्ट पर उम्र विवाद जैसी वजहों को लेकर कंगना पर विवाद छिड़ हुआ था. कुछ उनके पक्ष में लिख रहे थे, कुछ विपक्ष में. राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के बाद कंगना के खिलाफ ट्विटर पर कैरेक्टरलेस कंगना, फेक फेमिनिज्म जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे. 17 से 19 मई तक फेक फेमिनिस्ट कंगना हैशटैग ट्रेंड करता रहा. इसके बाद 19 मई को एक बार फिर क्वीन ऑफ लाइफ हैशटैग ट्रेंड हुआ.
इस बारे में कविता कृष्णन कहती हैं, ‘आॅनलाइन तो यह हो ही रहा है, लेकिन ऐसे भी नेता हैं जो मीडिया के जरिए सीधे तौर पर यही व्यवहार करते हैं. उदाहरण के तौर पर, फ्री सेक्स के नाम पर जेएनयू, जादवपुर विश्वविद्यालय और मेरे जैसे कार्यकर्ताओं को हजारों हजार गालियां पड़ती हैं. वही बात सुब्रमण्यम स्वामी टेलीविजन चैनल पर मुझसे कर लेते हैं. एंकर कुछ नहीं बोलते. बंगाल भाजपा नेता दिलीप घोष ने जादवपुर की लड़कियों को कहा कि आपके साथ तो कोई यौन उत्पीड़न करेगा ही क्योंकि आप बेहया हैं. वह यौन उत्पीड़न नहीं माना जाएगा. मैंने कहा कि यह फ्री सेक्स कोई चीज नहीं होती. या तो सेक्स है या तो बलात्कार है. फ्री है तो मर्जी से ही है. फ्रीडम से क्यों डर रहे हैं. लेकिन यह कहने के बाद भाजपा समर्थक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे कहा, आप आइए इंडिया गेट पर, आप फ्री सेक्स की पैरोकार हैं, आपके साथ फ्री सेक्स किया जाए. इश्यू तो यौन उत्पीड़न है, लेकिन इश्यू बना दिया गया फ्री सेक्स को, जिसके लिए गाली दी जा रही है. मैंने जिस इंडिया गेट पर महिलाओं के आंदोलन का नेतृत्व किया, जब मेरे साथ ऐसा कर रहे हैं तो आम महिलाओं के साथ क्या करते होंगे?’
किसी भी मसले पर महिलाओं के चरित्र हनन की कोशिश समाज में आम है. लेकिन कविता कृष्णन कहती हैं, ‘समाज तो जैसा है वैसा है ही, लेकिन चिंता की बात ये है कि जो राजनीतिक गोलबंदी के तहत हो रहा है उसे आप समाज के कंधे पर नहीं धकेल सकते. अगर ये प्लान के तहत हो रहा है तो उसका आयोजक कौन है? ऐसा करने वालों का आत्मविश्वास यहां से आ रहा है कि प्रियंका चतुर्वेदी को बलात्कार की धमकी मिलती है तो भाजपा की मंत्री (स्मृति ईरानी) कह देती हैं कि तुम लोग तो अभी-अभी असम में हारे हो. तुम क्या शिकायत करोगी? सत्ता में जो लोग बैठे हैं, वो गोलबंदी के तहत ऐसा करा रहे हैं तो यह गंभीर मामला है. केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली कह रहे हैं कि इसके साथ जीना होगा.’
हाल ही में केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने गृह मंत्रालय को एक पत्र लिखकर ऑनलाइन अभद्रता की शिकार होने वाली महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए कदम उठाने की बात कही है. मेनका गांधी ने कहा, ‘महिलाओं को कई बार इंटरनेट पर क्रूरता का सामना करना पड़ता है. पहले इंटरनेट प्रदाता हमसे इस बाबत बात करने को तैयार नहीं थे लेकिन बाद में उन्होंने संबंधित विस्तृत जानकारी देने की बात मान ली.’ गांधी ने गृह मंत्रालय से कहा है कि सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ होने वाले बर्ताव को लेकर संहिता बनाई जाए.
हालांकि, पत्रकार प्रणव राय को दिए एक इंटरव्यू में केंद्रीय वित्त और सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ‘आॅनलाइन गाली देने वालों का पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है. ऐसा लोग निजी स्तर पर करते हैं. मैं नहीं समझता इस पर किसी तरह की सेंसरशिप संभव है. मेरे ख्याल से हमें इसके साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए. हमें उनको नजरअंदाज करना सीखना है, हमें उनको बर्दाश्त करना सीखना है, हमारी रणनीति हमें निर्धारित करनी है.’
कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी को ट्विटर पर एक व्यक्ति ने कहा, ‘आपके साथ बलात्कार करके निर्भया की तरह क्रूरता से आपकी हत्या करनी चाहिए. आप राहुल गांधी की लिव इन पार्टनर क्यों नहीं बन जातीं…’ इस पर प्रियंका चतुर्वेदी ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को टैग करके कहा, ‘उनके पास तो जेड सिक्योरिटी है, लेकिन मैं बलात्कार और हत्या की धमकियां झेल रही हूं.’ इस पर स्मृति ईरानी और प्रियंका चतुर्वेदी में ट्विटर वॉर भी हुआ.
प्रियंका चतुर्वेदी कहती हैं, ‘यह ट्रेंड बढ़ता जा रहा है. लग रहा था कि 2014 के चुनाव के बाद कम होगा. जो पार्टी सत्ता में आने की कोशिश कर रही थी, सोशल मीडिया जैसे माध्यमों पर ज्यादातर लोग इनके समर्थक थे. लग रहा था कि शायद सरकार बनने के बाद यह खत्म होगा, लेकिन यह बढ़ता ही जा रहा है. सारा संवाद जो ट्विटर पर होता है, वही अब चैनल पर होने लगा है. इससे सोशल मीडिया के ट्रॉल्स को और प्रोत्साहन मिलता है. वे देखते हैं कि किसी तरह की अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने पर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है. केंद्रीय मंत्री आकर कह देते हैं कि हमें उनके साथ ही रहना है. इससे उनको और प्रोत्साहन मिलता है. यह ट्रेंड खत्म होते नहीं देख रही हूं. अगर सभी दल मिलकर राजनीति से ऊपर उठकर इसका निदान ढूंढ़ पाते हैं, अगर केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री यह कहते कि हमें देखना है कि क्यों इस तरह से भाषा का स्तर गिर रहा है, क्यों बहसें नहीं हो पा रही हैं, हम इस पर ध्यान देंगे. लेकिन उन्होंने इसे नकार दिया. तो मैं तो इसे उनके लिए प्रोत्साहन ही समझूंगी जो ऐसी हरकतें करते हैं.’
प्रियंका चतुर्वेदी कहती हैं, ‘हम तो 2014 से बोल रहे हैं कि भाषा का स्तर गिरता जा रहा है. महिलाओं पर अभद्र टिप्पणियां की जाती हैं. उनके साथ गाली-गलौज की जाती है. चरित्र हनन होता है. इस पर नियंत्रण जरूरी है. अब अगर सरकार निर्लज्ज-सी हो गई है, उनको लगता है कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है. हम इस मुद्दे को आगे भी उठाते रहेंगे. ऐसे प्लेटफाॅर्म पर भारत के संदर्भ में अलग से गाइडलाइन होनी चाहिए.’
सोशल मीडिया पर काफी अभद्रता और गाली-गलौज का सामना कर चुकीं आम आदमी पार्टी की नेता अलका लांबा कहती हैं, ‘यह ट्रेंड बहुत पुराना नहीं है. यह पिछले दो सालों से हो रहा है. इस बारे में मैंने साइबर क्राइम ब्रांच में करीब 40 एफआईआर करवाई हैं. मैंने स्क्रीन शॉट, फोटो सब दिए. इसे करीब दो साल होने जा रहा है, लेकिन साइबर क्राइम इस बारे में कार्रवाई करने में नाकाम रहा है. साइबर क्राइम ने हाथ खड़े कर दिए कि हम कुछ नहीं कर सकते. दो साल में चार्जशीट भी फाइल नहीं हुई. इससे लोगों के हौसले बढ़े हैं. कैसे ऐसे लोगों की पहचान की जो प्रधानमंत्री मोदी के लंच में शामिल हैं, उनसे हाथ मिलाते हुए फोटो है, वही लोग सोशल मीडिया पर गाली-गलौज कर रहे थे. उनकी पहचान होने के बाद भी भाजपा द्वारा उनके खिलाफ कार्रवाई न करना यह साबित करता है कि उन्हें खुली छूट दे दी गई है. हमारे फर्जी अकाउंट बनाकर भी ट्वीट किए गए. हमें बदनाम करने की कोशिश की गई. हमारे खिलाफ फैलाया गया कि मैं रैकेट चलाती हूं. ऐसे लोग हजारों की संख्या में हैं. सवाल उठता है कि अगर कोई व्यक्ति जिसकी पहचान हो जाती है, तब भी उस पर कार्रवाई क्यों नहीं होती.’
इंटरनेट पर इस तरह के तत्व मौजूद हैं और हर महिला ऐसे बुरे अनुभव झेल चुकी है. पत्रकार सर्वप्रिया सांगवान कहती हैं, ‘औरतों को टारगेट करना बहुत आसान होता है. मेरे लिए किसी ने इसी तरह कमेंट किया तो मेरे पिता ने मुझे ही टोका कि तुम क्यों लिखती हो. आप किसी पुरुष के चरित्र पर बात करते हो तो फर्क नहीं पड़ता, लेकिन औरत के चरित्र पर उंगली उठा दो तो वह चुप हो जाएगी, डर जाएगी. रवीश कुमार के साथ भी गाली-गलौज होती है तो उनकी मां या बहन को गाली दी जाती है, उनकी पत्नी के लिए अपशब्द इस्तेमाल किया जाता है. महिला पत्रकारों को गालियां मिलती हैं, उनकी पत्रकारिता पर सवाल नहीं होते, उनके चरित्र पर सवाल होते हैं. इसने दो शादी की, उसने तीन शादी की, वह शराब पीती है. जबकि राजनीति पर लिखने वाली लड़कियां बहुत कम हैं. क्योंकि राजनीति पर बात करना बहुत कठिन है. हमारी परवरिश ऐसी है, कंडीशनिंग ऐसी है कि हम पर इस तरह हमले होते हैं तो हम बस चुप हो जाते हैं. दूसरी बात, नेता चैनल पर बैठकर भी अभद्रता कर जाते हैं तो कुछ नहीं होता. ऐसे में छिपी हुई पहचान और फेक आईडी पर कार्रवाई होनी तो और भी मुश्किल है. सब लोग इसके खिलाफ बोलेंगे तो शायद इस पर रोक लगे.’
पत्रकार आशिमा का मानना है, ‘यह कोई अनोखी बात नहीं है. महान राजनेता बयान देते हैं कि हम हेमा मालिनी के गाल जैसी सड़क बनवाना चाहते हैं. हमारे समाज की संरचना में ये चीजें मौजूद हैं कि यह महिलाओं के प्रति अपमानजनक रवैया अपनाता है. हमें एक काउंटर समाज तैयार करना चाहिए. इसके खिलाफ भी लोग बोल रहे हैं. ऐसे लोग बढ़ेंगे तो यह व्यवहार कम होगा.’
साहित्यकार सुजाता तेवतिया कहती हैं, ‘आभासी दुनिया इसी दुनिया का हिस्सा है. स्त्री के लिए जितना विरोध और घृणा बाहर है उतनी ही यहां भी. फ्री सेक्स का ही मामला नहीं है औरत के लिए फ्री स्पीच और फ्री थिंकिंग को भी बर्दाश्त नहीं करता मर्दवादी समाज. स्त्री-देह पर प्रीमियम अपने आप साबित होता है जब आप सेक्स शब्द बोलते हुए भी स्त्री को बर्दाश्त नहीं कर सकते. भीड़ का हिस्सा होते ही कोई एक पत्थर उस औरत की तरफ मारने को उतावला है जो निडर, बेखौफ होकर अपनी बात सामने रख सकती है. विवेकशील और तार्किक होना स्त्री की बनावट के साथ नहीं जाता.’
सुजाता कहती हैं, ‘टेक्नीकली, यह हतोत्सहित करने का मामला है. स्पेस पर पहला दावा पुरुषवादी सत्ता अपना मानती है, आभासी स्पेस में भी स्त्री को औकात में रखने की कोशिशें होती हैं. भाषा पुराना हथियार रही है स्त्री के खिलाफ. वही स्त्री की भी ताकत है अब. भीड़ का हिस्सा होकर जितना आसान लगता है एक पत्थर औरत की तरफ फेंक देना वैसा है नहीं… सोशल मीडिया के पास अपनी तरह से निपटने के तरीके हैं. समाज आभासी ही सही… सिर्फ साक्षर नहीं पढ़ा-लिखा, यहां मौजूद है इसलिए ‘नेम एेंड शेम’ के जरिए, स्क्रीन शॉट्स लगाकर, स्त्री-विरोधी भाषाई व्यवहार के लिए पब्लिकली शर्मिंदा करना ज्यादा कारगर तरीके साबित होते हैं.’
स्त्रियां इन तरीकों से भले ही यौन हमलों से निपट लें, या बर्दाश्त कर लें, लेकिन फिलहाल सरकार या कोई राजनीतिक पार्टी इस असामाजिक प्रवृत्ति पर रोक लगाने की पहल करती नहीं दिख रही है. इंटरनेट पर सूचनाएं रोकी नहीं जा सकतीं, लेकिन क्या सामाजिक और भाषाई रूप से अभद्र, आक्रामक और महिला विरोधी होते जा रहे समाज पर भी नियंत्रण नामुमकिन है?

(यह स्टोरी जून, 2016 में तहलका में प्रकाशित हो चुकी है.)

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

दिल्ली का कश्मीर की जनता से कोई संवाद ही नहीं हो रहा: दिलीप पडगांवकर

कश्मीर में 2010 में जैसे हालात बने थे, अब परिस्थिति उससे ज्यादा कठिन और ज्यादा विकट हो गई है. ऐसा इसलिए हुआ है कि 2008-09 और 10 में जो घटनाएं हुई थीं, उससे न मनमोहन सरकार ने, न ही मोदी सरकार ने कोई सबक सीखा. सितंबर, 2010 में हमारी वार्ताकार समिति ने जब काम शुरू किया था, हमें एक साल के अंदर रिपोर्ट देनी थी. हम जम्मू और कश्मीर के हर जिले में गए थे. हम करीब 700 डेलीगेशन से मिलेे यानी छह हजार से ज्यादा लोग. सिर्फ हुर्रियत से हमारी बात नहीं हुई. जहां-जहां हम जाते थे, उसकी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को देते थे. पुलिस अफसरों और सीआरपीएफ के लोगों से भी हमारी बातचीत हुई थी.

इसके बाद हमने सबसे पहली जो रिपोर्ट दी थी, उसमें कहा था कि जन प्रदर्शन को रोकने के लिए न अधिकारियों की सुनवाई का तरीका सही है, न प्रदर्शन रोकने की उनकी कार्रवाई पर्याप्त है, इसके लिए कुछ कीजिए. उसके बाद थोड़ी-बहुत कार्रवाई हुई थी, लेकिन जिस तरह से अब (बुरहान वानी प्रकरण के बाद) लोग मारे गए हैं, मुझे नहीं लगता कि वहां उस सिफारिश पर अमल हुआ है. शुरुआत यहां से है कि कैसे आप जन प्रदर्शन को हैंडल करते हैं. दूसरे, जन प्रदर्शन में भी अब काफी परिवर्तन आया है. पहले सिर्फ पत्थरबाज थे, लेकिन अब प्रदर्शनकारी सुरक्षा बलों के सामने औरतों और बच्चों को भेजते हैं. उनकी हत्या करते हैं, उन पर अटैक करते हैं. पहली बार हमने देखा है कि पुलिस स्टेशन और कई सुरक्षा संस्थानों पर हमले हुए हैं. प्रदर्शन में ये बदलाव आया है. मिलिटेंसी में तो काफी बड़ा परिवर्तन आया है. एक तो ये जो 18 से 23-24 साल वाला आयुवर्ग है, ये बच्चे मध्यम वर्ग से आते हैं, स्कूलों में और कॉलेजों में पढ़ते हैं. प्रोफेशनल बनना चाहते थे. ये सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय हैं, जो कि पहले नहीं था. और ये बहुत अतिवादी हुए हैं. ये जो तीन-चार फैक्टर नजर आ रहे हैं, उसका विश्लेषण ठीक से हुआ है या नहीं हुआ है. लेकिन मैं समझता हूं कि 2010 में जो स्थिति थी, अब उससे ज्यादा उलझाव आ गया है.

पहले आतंकियों के समर्थन में थोड़े-बहुत गांववाले आते थे, लेकिन अभी जिस संख्या में लोग आ रहे हैं, पचास हजार से दो लाख बताया जा रहा है. एक रिपोर्ट आई है कि सिर्फ सात हजार लोग थे. आंकड़ों के बारे में मैं सुनिश्चित नहीं हूं, लेकिन अचानक इतनी बड़ी तादाद में किसी आतंकी के अंतिम संस्कार में जिस तरह लोग आ रहे हैं, यह भी एक नया फैक्टर है.

कश्मीर में हालात सुधरने की जगह और बिगड़ रहे हैं, क्योंकि अभी तक जो अप्रोच रही है दिल्ली की, वह डबल अप्रोच है. हमने कहा था कि एक तो आतंकवाद को खत्म करने के लिए जितना फोर्स इस्तेमाल कर सकते हो, करो. बॉर्डर पर पाकिस्तान के जो हमले हैं उस पर जल्दी से रोक लगाओ. दूसरा, मिलिटेंसी को जल्दी से जल्दी पूरे स्टेट से हटाने का प्रयास करो. यह एक पक्ष होगा. तीसरा, विकास पर फोकस करो. ये त्रिपक्षीय कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन उसके साथ ही साथ जो भावनात्मक जुड़ाव वाले राजनीतिक मुद्दे हैं, उन पर अगर ध्यान नहीं दिया तो इस तरह के मसले खड़े होते रहेंगे. थोड़ी शांति हो जाएगी तो दोबारा कहीं न कहीं और विरोध फूट पड़ेगा. यह भी देखना चाहिए.

हमने रिपोर्ट में भी कहा था कि सबसे गंभीर परिस्थिति घाटी में है, लेकिन अगर आपको सचमुच संपूर्णता में स्थिति देखनी है तो लद्दाख और जम्मू के लोगों की भी काफी आकांक्षाएं हैं, उसकी ओर भी ध्यान देना चाहिए. यह गौर करने लायक है कि पंडितों के बारे में सालों से कहा जा रहा है कि उनके लिए कुछ करो, किसी सरकार ने थोड़ा-बहुत आवंटन बढ़ा दिया, किसी ने ये कर दिया, किसी ने वो कर दिया, लेकिन असली बात ये है कि पंडितों को भी नजरअंदाज किया गया है. सिर्फ पंडित ही नहीं, वहां से काफी सिख परिवार भी बाहर निकल गए हैं, कई मुस्लिम परिवार भी निकल गए हैं. आप जितना नजरअंदाज करोगे, वह उत्प्रेरक का काम करेगा. उसकी राजनीतिक प्रतिक्रिया होगी. अगर इस पर आप ध्यान नहीं देंगे तो इस तरह की समस्या तो होगी ही.
हमारे यहां जिस तरह से लोग उग्रवाद की ओर बढ़े हैं, जिस तरह से इनके वैश्विक संपर्क सामने आ रहे हैं, पूरे मुस्लिम जगत से उग्रवादी तत्व उभर कर आ रहे हैं, इनके क्या संपर्क हैं, इन बातों का क्या असर होगा? बांग्लादेश में तो आप देख ही रहे हैं. हमारे यहां भी अलग-अलग हिस्सों में स्लीपर सेल की बात हो रही है. मैं समझता हूं कि आज मोदी जिस परिस्थिति का सामना कर रहे हैं, वह उस परिस्थिति से ज्यादा गंभीर है जिसका सामना मनमोहन ने किया था.

कश्मीर की असली समस्याएं दो हैं. यह बंटवारे की विरासत है. पाकिस्तान कभी नहीं मानेगा कि एक मुस्लिम बहुल राज्य भारत का हिस्सा हो सकता है. दूसरा, कोई रास्ता नहीं है कि भारत की कोई भी सरकार स्थिति में बदलाव के लिए यथास्थिति बनी रहने देना चाहेगी. यह हो ही नहीं सकता. तो मूलत: ये समस्या है. वहां पहुंच बनाने की जरूरत है. आज (14 जुलाई को) छह दिन हो चुके हैं लेकिन कोई विधायक अपने क्षेत्र में जाकर लोगों से बात नहीं कर रहा. कोई राजनीतिक दल वहां नहीं जा रहा है. सिविल सोसाइटी, बिजनेस कम्युनिटी, छात्रों का समूह कोई वहां जा ही नहीं रहा है. राजनीतिक संस्थाओं का लोगों के साथ जुड़ाव होना चाहिए, लेकिन वो नहीं हो रहा है. दिल्ली में और कश्मीर में भी, वहां के लोगों से क्या जुड़ाव है, उनसे क्या संवाद हो रहा है, किसी को पता नहीं है. वहां स्थिति मुश्किल है यह सब मानते हैं, लेकिन आप कहीं से शुरुआत तो कीजिए.

कश्मीर पर सिर्फ हमारी रिपोर्ट नहीं थी. मनमोहन सिंह ने छह और वर्किंग ग्रुप बनाए थे. उनकी रिपोर्ट है सरकार के पास और उनमें बड़े-बड़े लोग थे. सी रंगराजन, एमएम अंसारी जैसे लोगों की भी रिपोर्ट है. लेकिन उन रिपोर्टों पर कोई कार्यान्वयन नहीं हुआ. मुझे पता नहीं है कि उन्हें किसी ने देखा भी है कि नहीं. एक नेता का मुझे फोन आया कि आपकी रिपोर्ट कहां मिलेगी. हमने कहा आप ही के मंत्रालय में मिल जाएगी. आप वहां पर देखिए. बहुत सारी रिपोर्टें इंटरनेट पर भी हैं. मेरी पूरी रिपोर्ट पीडीएफ फॉर्म में इंटरनेट पर पड़ी हुई है.

असली स्थिति तो यह है. हम सबने जो सिफारिशें की थीं, उन पर कुछ भी नहीं हुआ. पी चिदंबरम ने मुझसे कहा था कि इस रिपोर्ट पर कैबिनेट में बात की जाएगी, उसके बाद वह रिपोर्ट संसद में पेश की जाएगी. सभी पार्टियां उस पर बहस करेंगी. हमने उनसे कहा था कि भाई सिफारिशें हमारी हैं लेकिन आपको जो बातें उनमें से ठीक लगें, वह ले लीजिए. जो अच्छा न लगे, उसे हटा दीजिएगा. न उस रिपोर्ट पर कोई बात हुई, न वह संसद में पेश ही की गई. अब कश्मीर के अलगाववादी और आतंकवादी कह रहे हैं कि हमें पता है कि आपको क्यों नियुक्त किया गया था. सरकार का मकसद सिर्फ मसला टालना था, इसलिए आपको नियुक्त किया गया था. मेरी धारणा यह है कि अगर आपने कुछ किया ही नहीं तो उनका आरोप सच हो जाता है. मैं नहीं मानता कि यह सच है, लेकिन उनकी राय ऐसी बनी है, वह भी एक तथ्य है.

(लेखक जम्मू कश्मीर पर मनमोहन सरकार द्वारा 2010 में नियुक्त वार्ताकार समिति के सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

रविवार, 12 जून 2016

चमचे

चमचे न हों अगर शाह के तो शाही बेजान
चमचागिरी चमक जाए तो गधा होत बलवान
चमचों ने मिलजुल कागज के महल खड़े करवाए
चमचों ने ही बड़े-बड़ों के तख्त ताज उड़वाए
चमचों से है भरा हुआ इस भारत का इतिहास
चमचे न हों अगर तो हर दिन कौन करे बकवास
चमचे कुशल, छुपा लेते हैं राजा की करतूतें
मौका पाएं तो चलवा दें गली-गली बंदूकें
राजा पहने सूट नौलखा रानी पहने हार
चमचों का जयकारा गूंजा, बहुत खूब सरकार
होड़ लगी चमचा बनने की, बड़े-बड़े टकसाल
घूम रहे हैं शाह गली में, धरे रूप विकराल
ले चटकारा बड़े चाव से, धर कांधे पर गमछा
चंदू चाचा चमक के बोले हम राजा कै चमचा
चमचों का आयोग बना चमचों का बना संगठन
चेहरा दिखता है आका का, आगे रक्खें दर्पन
भले सांच पर आंच लगे या बजर परे मिट जाए
कहां सांच की पैरोकारी, खोपड़ी कौन खपाए
चमचागिरी दिलाती है जब पद, पैसा, सम्मान
उच्च सुरक्षा भी मिलती है, बख्तरबंद जवान
राष्ट्रवाद की घुट्टी पीकर कलाकार मुस्काया
कला बेच कर राजभवन में ठुमका एक लगाया
कलमकार बोला अचार डालूं क्या आजादी का?
मुझे मुनाफा मिलता है गैरत की बर्बादी का!
पत्रकार ने पत्र बेचकर ले ली चकमक कार
पीठ ठोंक कर राजा बोला, पूंछ हिलाओ यार
उसके बाद हुआ खेला, चहुं धरम करम गरमाये
चमचों ने, चंगू-मंगू ने, मिल दंगे करवाये
मंत्राणी को पत्र भेजकर कहिन वजीरे-आला
जहां-जहां अध्ययन होता हो, अब जड़वा दो ताला
कैम्पसों में बंद किताबें अपनी किस्मत रोएं
नेता और नेतानी मिलकर घर-घर नफरत बोएं
चमचों ने ताली मारी, मुंह बाया, भरा ठहाका
तुम भी आओ साथ हमारे, मजा करोगे काका

हिंदुओं के पलायन व हत्या की हुकूम सिंह की सूची फर्जी . रिहाई मंच

ढाई दशक पहले मारे गए लोगों को डाल दिया सूची मेंए हत्यारोपी अधिकतर हिंदू ही
भाजपा हिंदुओं पर उत्पीड़न का माहौल बनाकार कर रही है दंगे की तैयारी
शिवसेना के सांसदों की तरह यूपी पुलिस द्वारा रोजेदार का उत्पीड़न शर्मनाक . रिहाई मंच 

लखनऊ 11 जून 2016। रिहाई मंच ने भाजपा सांसद हुकुम सिंह द्वारा कैराना के 21 हिंदुओं की हत्याओं और 241 हिंदू परिवारों के पलायन की सूची को फर्जी करार देते हुए भगवा गिरोह द्वारा फिर से पश्चिमी यूपी को सांप्रदायिकता की आग में झोकने की साजिश करार दिया है। मंच ने गोरखपुर के रोजदार मुस्लिम व्यक्ति की पुलिस द्वारा बेरहमी से पिटाई व पेशाब पिलाने की धमकी को अखिलेश यादव की सांप्रदायिक पुलिस के चेहरे का ताजा उदाहरण बताया है।

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के महासचिव राजीव यादव ने कहा कि मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के आरोपी हुकुम सिंह ने जिन 21 हिंदुओं की हत्याओं की सूची जारी की है उनमें से एक भी सांप्रदायिक हिंसा या द्वेष के कारण नहीं मारे गए हैं और उनमें से कईयों की तो ढाई दशक पहले हत्याएं हुई थीं। उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी द्वारा इस सूची की की गई तथ्यान्वेषण के आधार पर बताया कि इस सूची में दर्ज मदनलाल की हत्या 20 वर्ष पहलेए सत्य प्रकाश जैन की 1991ए जसवंत वर्मा की 20 साल पहलेए श्रीचंद की 1991ए सुबोध जैन की 2009ए सुशील गर्ग की 2000ए डा0 संजय गर्ग की 1998 में हत्याएं हुई थीं। इन सभी हत्याओं में आरोपी भी हिंदू समाज से थे। रिहाई मंच महासचिव ने कहा कि रिहाई मंच कार्यालय सचिव ने जब इस बाबत सीओ कैराना भूषण वर्मा से बात की तो उन्होंने भी भाजपा सांसद द्वारा जारी सूची को फर्जी और तोड़ा.मरोड़ा बताया। उन्होंने कहा कि थाना कैराना में पिछले डेढ़ साल में कोई भी सांप्रदायिक कारणों से हत्या नहीं हुई है और जो घटनाएं हुई भी हैं वो विशुद्ध आपराधिक प्रवृत्ति की रही हैं।

रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि पूरी दुनिया में भारत की बदनामी का कारण बने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ित मुसलमानों की हजारों फरियादें मानवाधिकार आयोग के दफ्तर में धूल फाक रही हैं। जिसपर आजतक आयोग ने किसी को भी तलब नहीं किया। लेकिन हिंन्दुत्ववादी निजाम आते ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सांप्रदायिक हिंसा के आरोपियों द्वारा प्रस्तुत फर्जी सूचियों पर संज्ञान लेने लगा है। उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सचमुच अपनी भूमिका में होता तो हुकुम सिंह जैसे तत्व खुद जेल में होते जिनकी मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा में स्पष्ट भूमिका साबित करने वाले तमाम मांगपत्र मानवाधिकार आयोग के सामने पड़े हैं। शाहनवाज आलम ने आरोप लगाया कि हुकुम सिंह जैसे तत्व आज सूबे को फिर से सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंकने के लिए इसलिए उतारू हैं कि अखिलेश यादव सरकार ने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।

आजमगढ़ रिहाई मंच प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने कहा कि गोरखपुर के गगहा थाने के ग्राम गजपुर निवासी परवेज आलम को जिस तरह से सूदखोरों के दबाव में पुलिस ने बुरी तरह पीटा और पानी मांगने पर थानेदार आरएन दूबे ने उसे पेशाब पिलाने की धमकी दी वह प्रदेश सरकार के मुस्लिम विरोधी चेहरे का ताजा उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जिसतरह से शिवसेना के सांसद रोजेदार मुसलमानों के साथ सांप्रदायिक उत्पीड़न करते हैं वही व्यवहार अखिलेश यादव की पुलिस कर रही है। मसीहुद्दीन संजरी ने दोषी पुलिस कर्मी को तत्तकाल निलंबित कर जेल भेजने की मांग की है।

द्वारा जारी.
शाहनवाज आलम
;प्रवक्ता रिहाई मंच
09415254919

कैराना में फिर से हो रहा है षडयंत्र

मुजफ्फरनगर में जिस तरह एक वीडियो में हिंदू पीट कर मारे गए थे, बाद में जांच आयोग ने बताया कि वह वीडियो कराची का था. वो कारनामा संगीत सोम का था. उसी तरह संगीत सोम के राजनीतिक बिरादर हुकुम सिंह बता रहे हैं कि कैराना में हिंदू पलायन कर गए. कुछ विराट हिंदू लोग कह रहे हैं कि वहां कश्मीर बन गया है.
बताया जा रहा है कि दबंगों की दबंगई और उगाही के डर से लोग गांव छोड़ रहे हैं. अब यह कोई नहीं पूछ रहा है कि अगर इलाके में उगाही या रंगदारी हो रही है, जिसके डर से लोग पलायन कर रहे हैं तो प्रशासन क्या कर रहा है? गैंगेस्टर रंगदारी वसूल रहे हैं तो पुलिस और सांसद हुकुम सिंह क्या कर रहे हैं? गुंडों और रंगदारों के प्रति नरम कौन है? किसी सरकार और प्रशासन के रहते हुए रंगदार कैसे सक्रिय हैं? अगर इलाके में रंगदार और अपराधी सक्रिय हैं तो प्रशासन जवाबदेह है या मुस्लिम समुदाय जवाबदेह है? कितने रंगदार और अपराधी गिरफ्तार किए गए? यूपी में कोई सरकार है कि नहीं? कोई यूपी सरकार पर सवाल क्यों नहीं कर रहा है? सोशल मीडिया के वीर बालक लोग भी नहीं. यदि दिल्ली या मुंबई में कोई गैंगेस्टर लोगों को परेशान करता है तो उसके धार्मिक समुदाय से जवाब मांगा जाता है या प्रसाशन से?
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से उस पूरे इलाके में यह हो रहा है कि जहां हिंदू ज्यादा हैं, वहां से मुसलमान हट रहे हैं, जहां मुसलमान ज्यादा हैं, वहां से हिंदू हट रहे हैं. सिर्फ दंगे में 50 हजार लोग विस्थापित हुए. कई इलाके जहां पर दंगे नहीं हुए थे, वहां से भी मुसलमानों ने गांव खाली कर दिए. उसी तरह ज्यादा मुसलमान आबादी वाले इलाकों से हिंदू परिवार भी चले गए. मुसलमानों के मुकाबले यह संख्या बेहद कम है.
दूसरे, हुकुम सिंह जो हत्याओं की सूची जारी कर रहे हैं, उनमें से कई लोगों की हत्या 15—20 साल पहले हुई थी. तीसरे, यह कोई आतंकग्रस्त इलाका नहीं है और दंगे के आयोजकों में भाजपा नेता शामिल थे, जो कि आयोग की रिपोर्ट में दर्ज है.
रिहाई मंच ने वहां पड़ताल करके प्रेस रिलीज जारी कर कहा है, 'मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के आरोपी हुकुम सिंह ने जिन 21 हिंदुओं की हत्याओं की सूची जारी की है उनमें से एक भी सांप्रदायिक हिंसा या द्वेष के कारण नहीं मारे गए हैं और उनमें से कई लोगों की हत्याएं तो ढाई दशक पहले हुई थीं. पुलिस एवं स्थानीय लोगों के द्वारा सूची की जांच पड़ताल करने पर यह निकला कि इस सूची में दर्ज मदनलाल की हत्या 20 वर्ष पहले, सत्य प्रकाश जैन की 1991, जसवंत वर्मा की 20 साल पहले, श्रीचंद की 1991, सुबोध जैन की 2009, सुशील गर्ग की 2000, डा0 संजय गर्ग की 1998 में हत्याएं हुई थीं. इन सभी हत्याओं में आरोपी भी हिंदू समाज से ही थे. सीओ कैराना भूषण वर्मा से बात की तो उन्होंने भी भाजपा सांसद द्वारा जारी सूची को फर्जी और तोड़ा-मरोड़ा बताया. उन्होंने कहा कि थाना कैराना में पिछले डेढ़ साल में कोई भी सांप्रदायिक कारणों से हत्या नहीं हुई है और जो घटनाएं हुई भी हैं वो विशुद्ध आपराधिक प्रवृत्ति या आपसी रंजिस की रही हैं.'
भाजपा के पास चुनाव के लिए कोई मुद्दा नहीं है. वे निश्चित ही 2013 के दंगों को भुनाने के लिए माहौल बना रहे हैं. वे गांव गांव को पाकिस्तान बनाने पर तुले हैं, वरना पश्चिमी उत्तर प्रदेश कश्मीर घाटी नहीं है.


शनिवार, 11 जून 2016

पिछले 10-15 साल में एक तरह के अनवरत गुस्से से भरे, सतत रूप से क्रुद्ध समाज की रचना हुई है : पुरुषोत्तम अग्रवाल

आलोचक के तौर पर ख्यात पुरुषोत्तम अग्रवाल कवि भी हैं और कथाकार भी. कबीर पर लिखी उनकी किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की’ आलोचना के क्षेत्र में मील का पत्थर है. वे लगातार कविताएं लिखते हैं पर कविरूप में बहुत कम ही सामने आते हैं. उनकी कई कहानियां समय-समय पर प्रकाशित हुई हैं. कुछ समय पहले उनकी लिखी एक कहानी ‘नाकोहस’ ने खासी चर्चा और प्रशंसा बटोरी. कहानी का दायरा इतना व्यापक था कि बाद में उन्होंने इसे उपन्यास का रूप दिया. पुरुषोत्तम अग्रवाल से बातचीत.

आपके उपन्यास नाकोहस (नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स) की खूब चर्चा हुई. मौजूदा परिवेश में बात कहते ही आहत होती भावनाओं से व्याप्त डर और अराजक माहौल के चलते उपन्यास शायद ज्यादा प्रासंगिक हो गया है. आपका क्या अनुभव रहा?
यह सही है कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के चलते उपन्यास को उसी संदर्भ में पढ़ा गया, लेकिन उसमें और भी बहुत चीजें थीं जिस पर लोगों का ध्यान कम गया. उपन्यास में प्रेम है, जीवन है, अंतर्विरोध है तो दुख और भय भी है. 
उपन्यास बुद्धिजीवी समाज की विसंगतियों और विडंबनाओं पर भी चुटकियां लेता है. बुद्धिजीवी वर्ग का अंतर्विरोध बार-बार उसमें सामने आया है. उसमें एक प्रसंग है कि आजकल प्रगतिशील लोगों की थाली में भी दो-चार राष्ट्रवादी आइटम जरूर पाए जाते हैं. ऐसा नहीं है कि यह बुद्धिजीवियों के अधिकार और आत्माभिमान का ही घोषणा पत्र है. उपन्यास में बुद्धिजीवी का मतलब वो है जो किसी न किसी रूप में धरातल पर जाकर समाज से जुड़े. उपन्यास जहां से शुरू होता है, एक पात्र सुकेत की यादें जहां से शुरू होती हैं, वह सब आपको नेल्ली (असम) तक ले जाता है कि उत्तर-पूर्व आपकी सोच में भी कहीं नहीं है. किसी को पता तक नहीं है कि 1983 में नेल्ली में क्या हुआ था. नेल्ली के बाद 1984 का सिख विरोधी दंगा, हाशिमपुरा और मलियाना का संदर्भ है.
यह उपन्यास किसी समाज में बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका को रेखांकित करता है, समाज में टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट का जो आतंक है और पढ़ने-लिखने का मतलब वही समझ लिया जाता है, ये उस पर बात करता है. मैं मानता हूं कि यह उपन्यास आपको याद दिलाता है कि अगर आप साहित्य, संस्कृति, इतिहास आदि की उपेक्षा करेंगे और इन पर स्पष्ट बोलने वालों को लगभग गाली की तरह बुद्धिजीवी कहने लगेंगे तो अंतत: आप अपना ही नुकसान करेंगे. क्योंकि ऐसा समाज अनिवार्य रूप से नाकोहस की तरह है. जैसा कि नाकोहस का प्रवक्ता गिरगिट कहता है बुद्धिजीवियों के सम्मान का नाटक बहुत हो चुका. ये नहीं कि आप कुछ भी बकते रहें और हमारी भावनाएं आहत हों. उपन्यास तीनों चरित्रों की मानवीयता को भी रेखांकित करने की कोशिश करता है. उपन्यास तीन बुद्धिजीवियों का एक रात का अनुभव मात्र नहीं है.
आपकी पहचान मुख्य रूप से आलोचक की रही है फिर आपको उपन्यास लिखने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
मैं आलोचना लिखता रहा हूं लेकिन नियमित रूप से कविता भी लिखता हूं. ये बात और है कि उसे प्रकाशित नहीं कराता. यहां तक कि सुमन जी (अपनी पत्नी) को भी नहीं पढ़ाता. कभी मन हुआ तो ठीक-ठाक करके कहीं भेजा, वरना लिखकर रख लेता हूं. फिक्शन में मेरी रुचि शुरू से थी. कॉलेज के दिनों में दो-तीन कहानियां लिखी थीं, पुरस्कृत भी हुईं. बाद में आलोचना लिखने लगा. लोगों को लगने लगा कि ये आलोचना अच्छी लिखते हैं. चर्चा होने लगी. तत्काल की जो स्थितियां बन जाती हैं, वही पहचान बन जाती है. लेकिन परिवार और निजी मित्रों को मालूम है कि मैं 25 साल से ये धमकी देता रहा हूं कि मैं उपन्यास लिखूंगा. इसका कारण मैं ये मानता हूं कि कविता और तमाम दूसरी विधाओं के प्रति सम्मान के साथ, जीवन को उसकी समग्रता में अगर साहित्य की कोई विधा व्यक्त कर सकती है तो वह उपन्यास है.

मैं ये नहीं कह रहा कि सिर्फ उपन्यास ऐसा करता है. लेकिन उसी तरह जैसे भाषा का सबसे सघन और सर्जनात्मक उपयोग कविता में हो सकता है- ऐसा कहकर मैं दूसरी विधा का अपमान नहीं कर रहा, सिर्फ कविता की विशेषता बता रहा हूं- उसी तरह चाहे समाज हो, आपका अंतर्मन, आपकी अस्तित्वगत वेदना या चाहे आपकी ऐतिहासिक चिंता, उसका जिस समग्रता में अनुसंधान उपन्यास करता है, कोई दूसरी विधा नहीं कर सकती. उपन्यास में कई आवाजें होती हैं. गोदान में केवल होरी की आवाज नहीं है. गोदान में राय साहब, बदमाश अफसरों, थानेदार, झिगुरी, पंडित यानी होरी के शोषकों की भी आवाजें हैं. वह उपन्यास जो अपने पसंदीदा चरित्र के अलावा किसी और चरित्र को बोलने ही न दे या लेखक सिर्फ अपनी मर्जी की बात कहलवाए, वह काफी घटिया उपन्यास होगा. अच्छा उपन्यास वह होता है जिसमें ऐसे भी चरित्र हों जिन्हें आप लेखक के साथ जोड़कर देख सकते हैं. इसे देखते हुए मैं पिछले 25 साल से उपन्यास लिखने की बात सोच रहा था. एक वृहद उपन्यास पर काम करना बाकी है.
जब मैंने नाकोहस कहानी लिखी, जो 2014 में छपी, उस पर जिस तरह का विवाद या बहस हुई, वह बहुत रोचक था. जिन लोगों से मैं अपेक्षा करता था कि उसकी निंदा करेंगे, उन्होंने तो की ही, लेकिन बहुत सारे लोगों ने आलोचना की. यह ठीक भी है. लेकिन कुछ लोगों ने कहा कि रघु नाम का पात्र ईसाई है, तो आप हिंदू नायकत्व का पीछा कर रहे हैं. या उसको हिंदू परंपरा की जानकारी है तो आप खुद हिंदू सांप्रदायिकता को शह दे रहे हैं. इस पर काउंटर भी किया गया. कहानी पर चर्चा दिलचस्प रही. इस पर मित्रों-परिजनों ने सलाह दी कि इसको उपन्यास में बदलिए. फिर मैंने इस पर सोचना शुरू किया उपन्यास के रूप में और लिखा.
जब कहानी छपी थी तो सवाल उठाए गए थे कि इसमें कहानीपन नहीं है. क्या कहेंगे आप?
मुझे कहानीपन की बात बिल्कुल समझ में नहीं आती. ठीक है कहानीपन एक बात है, लेकिन कहानीपन का कोई एक बुनियादी रूप नहीं है जिसके आधार पर आप एक कहानी को खारिज कर दें और एक को कहानी मान लें. अब मुझे नहीं पता कि कहानीपन या कथातत्व पर बात करते हुए ‘कुरु कुरु स्वाहा’ को उपन्यास माना जाएगा या नहीं. या ‘नौकर की कमीज’ को उपन्यास मानेंगे या नहीं. लेकिन ठीक है यह सवाल उठाने वालों की राय है.

मेरी समझ के मुताबिक एक बुनियादी घटनाक्रम है, एक वैचारिक संघर्ष है, कोई कहानी इस वजह से कहानी नहीं रहती, ऐसा मैं नहीं मानता. जब उपन्यास के तौर पर मैंने इसको सोचा तब तक चीजें काफी साफ होने लगी थीं और समाज की जिस परेशानी से मैं गुजर रहा था, जिसे गोविंद निहलानी ने उपन्यास पर चर्चा करते हुए ‘डिस्टर्बिंग डिस्टोपिया’ कहा था, शायद उसकी कल्पना कर रहा था. डिस्टर्बिंग यानी जो बुरी तरह आपको परेशान करे या डरा दे, ये डर कम से कम मेरा निजी है. इस डर को एक फैंटेसी के रूप में रचा गया है. उपन्यास का पात्र टेलीविजन बंद करना चाह रहा है लेकिन वह बंद नहीं हो रहा है. वह रिमोट का बटन दबा रहा है, पीछे से पावर ऑफ कर रहा तब भी वह बंद नहीं हो रहा है. उसके कमरे की हर दीवार टेलीविजन स्क्रीन में बदल गई है. एक टेलीविजन तुम फोड़ भी दो तो भी फर्क नहीं पड़ेगा.
जेएनयू प्रसंग या अन्य हालिया प्रसंगों में भी कुछ टेलीविजन चैनल जिस तरह का माहौल बनाते हैं, उसमें जिन लोगों का नाम लेकर इंगित किया जाता है, आपको नहीं पता कि उनके साथ कब, कैसी अनहोनी घटित हो सकती है. क्या देश की राजधानी में यह एक अनोखी घटना नहीं है कि कोर्ट परिसर में एक लड़के पर जानलेवा हमला हो और पुलिस कुछ न कर पाए? बाद में भी कुछ नहीं हुआ. यह ‘लिंच मेंटालिटी’ है. आप लिंच मेंटालिटी (मारपीट या हत्या करने की मानसिकता) का निर्माण कर रहे हैं और यह उपन्यास यही याद दिलाता है.
उपन्यास में एक वाक्य आता है, ‘जिससे भय होता है उस पर करुणा नहीं होती.’ लोगों के मन में भय बैठाया जा रहा है कि यह आदमी देश के लिए खतरनाक है, समाज के लिए खतरनाक है, आपके परिवार, बहन, बेटी के लिए खतरनाक है. भले ही वह आदमी अपने आप में कितना निर्दोष हो. उसकी जान लेने में न आपको संकोच होगा, न कोई अपराधबोध. अगर आप सचमुच ऐसा समाज बनाना चाह रहे हैं, जिसमें किसी निर्दोष को भी मार देने में उसे संकोच न हो तो वह समाज कैसा होगा?
उपन्यास में जिस तकनीकी अतिक्रमण का जिक्र है कि टीवी चैनल बंद नहीं हो पा रहा, मोबाइल स्क्रीन मन की बात जान ले रहा है, यह लिखते समय आपके दिमाग में क्या था? व्यवस्था द्वारा किया जा रहा अतिक्रमण या संचार माध्यमों का पूंजीपन जो लोगों के जीवन में निर्बाध प्रवेश कर रहा है?
मैं सीधे कहूंगा कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था में ये दोनों चीजें लागू होती हैं. खुद में यह व्यवस्था भी और पूंजीवाद भी. लेकिन मैं यह मानता हूं कि अगर आपके जीवन में एकांत का कोई पल न बचे तो यह आपकी मनुष्यता के समाप्त होने की हालत है. जब आपके पास अपने भी साथ होने का थोड़ा-सा समय नहीं है, जब आप किसी से बात न कर रहे हों, फेसबुक पर किसी से दंगल न कर रहे हों, कुछ देर आप चुपचाप बैठें, संगीत सुन रहे हों, या कुछ भी करें. अपने साथ रहें. एकांत में दो चीजें होती हैं. एक तो शांत चित्त से सोचने का वक्त मिलता है. दूसरा, एकांत में आप अपनी कल्पनाओं और स्मृतियों को थोड़ा-सा व्यवस्थित होते देखते हैं. इन दोनों स्थितियों से आपको लगातार वंचित रखा जा रहा है. मनुष्य के एकांत का अतिक्रमण राजसत्ता तो कर ही रही है, लेकिन ये इस पूंजीवादी व्यवस्था या कहिए खास तरह के पूंजीवाद की बड़ी स्वाभाविक विशेषता है. उसकी हर जगह दखलंदाजी है. आपका कोई क्षण ऐसा नहीं है जो आपका अपना हो. वह एडवर्टाइजिंग कल्चर का हिस्सा है, जब आपके बेडरूम से लेकर आपका कमोड तक विज्ञापन और उत्पाद की जद में है. इसलिए जरूरी है कि वह आपकी हर चीज तक पहुंचे. इस क्रम में आपका जो भी एकांत है, जिससे आपका व्यक्तित्व परिभाषित होता है, वो
खत्म हो जाता है. ये मुझे बहुत भयावह स्थिति लगती है. मैं ऐसे परिवारों को जानता हूं जहां घर में चार कमरे हैं तो चार टीवी हैं. वेे साथ खाना नहीं खाते. सब अपने-अपने कमरे में टीवी देखते हुए खाना खाते हैं.
 नाकोहस की कल्पना कैसे की?
2003 या 2004 में आपको याद हो तो एक किताब छपी थी, ‘शिवाजी हिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया’. उसके लेखक थे अमेरिकी विद्वान जेम्स लेन. वे पुणे में भंडारकर इंस्टिट्यूट में रिसर्च के लिए आए थे. इस दौरान महाराष्ट्र में घूमते हुए उन्हें शिवाजी के बारे में कुछ बातें मालूम हुईं, जिन पर उन्होंने किताब लिख दी. किताब में सहयोग के लिए संस्थान का आभार प्रकट किया गया था. इस पर ‘संभाजी ब्रिगेड’ नामक एक संगठन ने संस्थान में घुसकर तोड़-फोड़ की. उस समय गोपीनाथ मुंडे जी ने बयान दिया कि हमारी भावनाएं तो जवाहरलाल नेहरू की किताब से भी आहत होती हैं.
तब मैंने एक लेख लिखा कि भावनाएं बहुत आहत हो रही हैं. भावनाएं आहत होकर कूदकर सड़क पर आ जाती हैं. इससे राष्ट्रीय संपदा का नुकसान होता है तो सरकार को चाहिए कि आहत भावनाओं और आक्रांत अस्मिताओं का एक आयोग बनाए, नेशनल कमीशन आॅफ हर्ट सेंटिमेंट्स (नाकोहस). तो ये विचार दस-बारह साल पुराना है. इसका पिछले आम चुनाव के परिणाम से कोई संबंध नहीं है. पिछले पांच-छह साल में जैसा माहौल देश में बनता चला गया है, उसमें सुधारवाद और प्रतिक्रियावाद में कोई भेद नहीं है. पुणे में जब यह वाकया हुआ तब वहां कांग्रेस की सरकार थी. जब सलमान रुश्दी को भारत नहीं आने दिया तब कांग्रेस की सरकार थी. एक गांव की पंचायत आदेश दे देती है कि अब गांव की लड़कियां मोबाइल फोन नहीं रखेंगी, किसी लड़की के पास मोबाइल पाया जाता है तो मार-मारकर उसकी हालत खराब कर दी जाती है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कह देते हैं कि समाज के मामले में सरकार क्या कर सकती है. इन लोगों ने सरकार की धारणा ही तब्दील कर दी है. इन लोगों को आधुनिक राजसत्ता का बोध ही नहीं है. आधुनिक राजसत्ता समाज को केवल व्यवस्थित ही नहीं करती, बल्कि समाज को बदलने की कोशिश करती है. कोई आधुनिक राजसत्ता यह नहीं कह सकती कि स्त्रियों या दलितों की क्या हालत है, इससे हमें कोई लेना-देना नहीं है, यह तो सामाजिक मसला है.
उदाहरण से समझिए कि समस्या कहां होती है. एक सज्जन ने घोषणा की कि वे कन्हैया को मार देंगे तो उनको माला पहनाई गई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक नेता जी ने घोषणा की कि वे सलमान रुश्दी को मारने वाले 51 लाख रुपये देंगे. बाद में वो बड़े-बड़े सेक्युलर नेताओं के साथ मंच पर दिखे. पिछले दस-बारह साल में जिस तरह की स्थितियां पैदा हुई हैं कि आहत भावनाओं का मामला एक तरह से किसी भी विमर्श की सर्वस्वीकार्य शर्त बन गया है. यानी विमर्श तब ही होगा अगर आपकी भावनाएं आहत हुई हैं.
आहत भावनाओं की राजनीति और 24 घंटे का मीडिया, इसने बहुत बुरी स्थिति पैदा की है. मैं इसे असहिष्णुता नहीं कहता, यह पर्याप्त शब्द नहीं है. पिछले 10-15 साल में एक तरह के अनवरत गुस्से से भरे, सतत रूप से क्रुद्ध समाज की रचना हुई है. इस दौरान समाज में क्रोध का विस्तार होता चला गया, समझदारी की कमी होती गई, भाषा में सपाटपन आता चला गया. मैंने जनवरी में फेसबुक पर शरारत के तौर पर लिखा, विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि इस बार गणतंत्र दिवस पर प्रधानमंत्री जी मुख्य अतिथि होंगे. (ठहाका लगाते हुए) कुछ लोगों को पसंद नहीं आया तो उन्होंने निंदा की, कुछ ने गालियां दीं. लेकिन एक सज्जन ने बाकायदा मुझे कोसा कि आप बड़े भारी प्रोफेसर बनते हैं, बुद्धिजीवी बनते हैं, इतना भी नहीं मालूम कि प्रधानमंत्री तो हर साल गणतंत्र दिवस पर होते ही हैं.
ये जो सतत रूप से क्रुद्ध समाज तैयार हुआ है, ये कैसे संभव हुआ?
इसका सबसे बड़ा कारक है निर्बाध उपभोक्तावाद. मैं यह नहीं मानता कि आप प्रकृति की ओर लौट जाएं, लेकिन एक अर्थशास्त्री मित्र कहते हैं कि ओपन इकोनॉमी एक सीमा तो है ही और वह है धरती पर उपलब्ध संसाधन. उससे ज्यादा ओपन तो नहीं हो सकती.
अर्थशास्त्री ब्रह्मदेव जी एक बात कहा करते थे कि अगर आपको अमेरिका और यूरोप के वर्तमान जीवन स्तर पर पूरी दुनिया को ले जाना है तो यह एक ही तरीके से संभव है कि आपके पास आठ पृथ्वियां हों और उन आठों का वैसा ही दोहन हो जैसा पिछले 400 साल में हुआ. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा संभव नहीं है. तो निर्बाध उपभोक्तावाद नहीं चल सकता. आप किसी एक सेक्टर के लिए बाकी को छोटा करेंगे. दिल्ली में आॅड इवेन करेंगे लेकिन आॅटोमोबाइल इंडस्ट्री पर लगाम नहीं लगाएंगे. एक परिवार में चार सदस्य हैं और बारह गाड़ियां हैं. आप निर्बाध उपभोग की स्थिति पैदा करेंगे तो जाहिर है कि समाज में अंतर्विरोध पैदा होगा.
तो एक तो इस अबाध, बेरोकटोक उपभोग की स्थिति ने समस्या पैदा की है. दूसरे, पूंजीवाद का सहज स्वभाव है कि यह मनुष्य को उपभोक्ता में बदलता है. यह उसके जिंदा रहने के लिए जरूरी है, इसलिए वह मनुष्य की मनुष्यता को कमतर करेगा. प्रतियोगिता को इस स्तर तक बढ़ाएगा कि वह गलाकाट प्रतिस्पर्धा में बदल जाएगी.
दूसरी समस्या है हमारे अपने समाज के संदर्भ में. हमारे लोकतंत्र का एक बुनियादी अंतर्विरोध दिनोंदिन बढ़ता चला जा रहा है कि एक स्तर पर हम लोकतंत्र हैं, चुनाव से सरकार चुनी जाती है, जनता का शासन है. लेकिन रोजमर्रा की प्रैक्टिस में सामाजिक न्याय और कानून के राज का क्या हाल है? आप निजी तौर पर हत्या करें तो आपको सजा हो जाएगी, लेकिन किसी समुदाय के प्रतिनिधि बनकर हत्या कर दें तो आपको कुछ नहीं होगा, बल्कि आपका अभिनंदन होगा. आप मुख्यमंत्री बन सकते हैं. ये हमारे अपने देश की समस्या है. एक तरह से कानून के राज की समाप्ति हो रही है. न्याय का बोध खत्म हो रहा है. तीसरी बात, पिछले 20 साल में नवउदारवादी व्यवस्था के आने के बाद आप महसूस करते हैं कि पहले एक मध्यवर्गीय आदमी यह मानकर चलता था कि व्यापक समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी है, जो कुछ उसे मिलता है वह एक व्यापक वितरण हिस्सा है. आजकल एक बड़ा मजबूत बोध विकसित हुआ है कि हम टैक्सपेयर हैं. टैक्सपेयर मनी, ये मुहावरा बहुत झल्लाहट पैदा करता है कि सब कुछ टैक्सपेयर मनी से हो रहा है.
हमारे समाज में नई तरह की समस्या यह पैदा हुई है कि सरकार मैनेजर की भूमिका में है, संसाधनों का केंद्रीकरण हो रहा है. अमेरिका में जो बात बार-बार कही जाती है कि 99 फीसदी संसाधनों पर एक फीसदी लोगों का कब्जा है, ऐसा अमेरिका नहीं चल सकता. ऐसे समाज में गुस्सा बढ़ता है जो हिंसा या सांप्रदायिकता या दूसरे खतरनाक रूप में सामने आता है.
जिन वजहों से ऐसा समाज बनता है, जाहिर है कि वह आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था है. क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्था है जिससे ऐसी स्थिति से बचा जा सके?
हां, बिल्कुल है. अार्थिक व्यवस्था से अगर आपका आशय है अर्थतंत्र तो उद्योग अनिवार्य है. अब लोग केवल प्रकृति के नहीं, बल्कि संस्कृति और प्रौद्योगिकी के नजदीक हैं. तो उद्योग होंगे, छोटे भी और बड़े भी. लोगों को वाकई अगर जीवन का एक स्तर चाहिए और विकास चाहिए तो उसके लिए एक जटिल समाज और अर्थतंत्र की जरूरत होगी. सवाल यह है कि उस अर्थतंत्र में संवेदनशीलता संभव है या नहीं. इसीलिए इस उपन्यास में बार-बार कहा गया है कि किसी भी तरह का अथॉरिटेरियन समाज, उसकी रंगत कुछ भी हो, उसका अस्तित्व नहीं हो सकता.
मोटे तौर पर आप कह सकते हैं सोशल डेमोक्रेसी या डेमोक्रेटिक सोशलिज्म. मैं निजी तौर पर मानता हूं कि नए तरह का नेहरू मॉडल हो सकता है जो अपने समय के अनुकूल हो, जो गलतियों से सीखा गया हो. मुझे अपने आपको नेहरूवादी कहने में कोई हिचक नहीं है. एक नवनिर्मित नेहरू मॉडल, एक मिश्रित अर्थव्यवस्था ही सबसे अनुकूल हो सकती है जिसका डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूशन का सपना हो, डेमोक्रेटिक प्रैक्टिसेज का सपना हो. देश आजाद हुआ तो लोगों ने नेहरू से कहा कि तरह-तरह की समस्याएं हैं, ये प्रेस फ्रीडम संपन्न और फैंसी देशों की लक्जरी है, इसको फ्री मत छोड़ो वरना गैरजिम्मेदार हो जाएगा और आपको परेशान करेगा. इस पर नेहरू ने कहा, मैं प्रतिबंधित प्रेस की जगह गैरजिम्मेदार मगर फ्री प्रेस को तवज्जो दूंगा. नेहरू ने गलतियां भी कीं, लेकिन उन्होंने देश की नींव रखी. विज्ञान, कला, साहित्य, सिनेमा, उद्योग हर चीज की नींव रखी.
आपने लिखा है-  ‘आज के दौर का लेखक भी उन बातों को दर्ज करने से दूर है जो सच तो है लेकिन कही नहीं जा रही है’, यह अपने समय और समाज पर गंभीर सवाल है. 
इसके पीछे एक वाक्य है एक इतिहासकार का, नाम याद नहीं, जो दिखता है उसे लिखना तो जरूरी है ही, लेकिन ज्यादा जरूरी है उसे लिखना जो दिखता नहीं है लेकिन जिसे लिखा जाना चाहिए. मुझे लगता है कि इतिहासकार हों, साहित्यकार, या समाजशास्त्री, सभी की मूल प्रतिक्रिया यही है कि चीजों को समग्र रूप में देख सकें और जो चीजें कही जानी चाहिए उसे कहा जाए. जैसे मिसाल के तौर पर, नाकोहस को लीजिए. असल में नाकोहस नाम की कोई संस्था तो है नहीं. लेकिन जो पूरा माहौल आपने बना दिया है कि आपसे बात करते समय मेरे मन में हल्की-सी चिंता यह है कि मेरे मुंह से कुछ ऐसा तो नहीं निकल रहा कि जिसकी वजह से कल मुझे पकड़कर ठोक दिया जाए कि हमारी भावनाएं आहत हुई हैं. क्या आज यह डर हमारे मन में नहीं है? यह बात मैं औपचारिक-अनौपचारिक, हर रूप में कहना चाहता हूं कि क्या ये सच नहीं है कि किसी भी चीज पर बात करते समय आज स्थिति ये हो गई है कि आप आसपास देख लेना चाहते हैं कि कोई ऐसा व्यक्ति तो नहीं सुन रहा जिससे खतरा हो. असहमति व्यक्त करने में डर लग रहा है. यह स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं है, जहां आपको अपनी आवाज से डर लगे. चैनलों की इसमें अहम भूमिका है. बुद्धिजीवियों को आप अपराधी घोषित करके, उन्हें राक्षस बताकर आप जो कर रहे हैं, वो कितना खतरनाक है यह बात कोई नहीं कहता. इसीलिए दुख है कि जो कहा जाना चाहिए वो बिल्कुल नहीं कहा जा रहा है. इसीलिए मैंने यह उपन्यास लिखा है. मुझे नहीं पता कि यह उपन्यास, उपन्यास की दृष्टि से कैसा है, लेकिन एक लेखक के तौर पर अनुभव करता हूं कि कहीं न कहीं लोगों ने उसे खुद से जुड़ा पाया है और वे सिर्फ इसलिए नहीं जुड़े रहे हैं कि वह डर का एक सपाट चित्र प्रस्तुत करता है, बल्कि इसलिए जुड़ाव महसूस करते हैं कि उपन्यास के उन तीन बुद्धिजीवी चरित्रों की मानवीयता, संवेदनशीलता, मन, उनके अंतर्विरोध ये सारी चीजें कहीं न कहीं लोगों से जुड़ती हैं. यह इसलिए भी कि जिस डर को उपन्यास फैंटेसी या कल्पना के रूप में रच रहा है, वह डर लोगों के मन में कहीं न कहीं मौजूद है.
इसी से जुड़ी एक और बात लेखकों की भूमिका को लेकर है कि पहले तीन बुद्धिजीवियों की हत्या, फिर कई को धमकी और हमले, जेएनयू व अन्य विश्वविद्यालयों की घटनाएं हुईं. ऐसे में क्या मानते हैं कि लेखक उस भूमिका में नहीं हैं जिसमें उन्हें होना चाहिए?
नहीं, ऐसा मैं नहीं मानता. लेखक की भूमिका यह नहीं है कि वह हर जगह सीधा हस्तक्षेप करेगा. कुल मिलाकर मुझे लगता है कि सभी भाषाओं के लेखकों ने अपनी बात कही. विरोधस्वरूप पुरस्कार भी लौटाए. जिन लेखकों ने पुरस्कार नहीं लौटाए, उनकी प्रतिबद्धता पर भी मैं संदेह नहीं करता. मिसाल के तौर पर राजेश जोशी और अरुण कमल ने नहीं लौटाया. काशीनाथ सिंह ने लौटाया, नामवर सिंह ने नहीं लौटाया, इससे नामवर सिंह और अरुण कमल कम लोकतांत्रिक नहीं हैं. न उनकी चिंताएं कम प्रामाणिक हैं. पिछले दो-तीन साल में बुद्धिजीवियों और लेखकों ने जैसी भूमिका निभाई है, वह उम्मीद की बड़ी किरण है. आप लेखक से ये उम्मीद मत कीजिए कि वह जाकर किसी पुलिस बंदोबस्त से टकराए, लाठी खाए और जेल जाए. लेखक का बतौर लेखक वह सब कहना मायने रखता है जो कहा जाना चाहिए.
(यह साक्षात्कार तहलका के 15 जून, 2016 के अंक में प्रकाशित हो चुका है.)

शुक्रवार, 27 मई 2016

धर्मनिरपेक्ष भारत के नायक: जवाहरलाल नेहरू

मैं जवाहर लाल नेहरू के देहांत के 22 साल बाद पैदा हुआ. जाहिर तब तक उनका युग समाप्त हो चुका था. जब मैं बच्चा ​था, उस समय भारतीय राजनीति में मंडल के काउंटर में कमंडल आ गया था और भारतीय राजनीति खून—खराबा करते हुए मंदिर बनवाने दौड़ पड़ी थी. जब मैं पढ़ने लगा तब तब गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष, भगत सिंह के बारे में जाना, उनका लिखा पढ़ा और उनके बारे में पढ़ा. अब सोचता हूं काश उस युग में मैं भी पैदा हुआ होता, जिनकी खींची लकीरें अबतक की सबसे बढ़ी लकीरें हैं. यह लेख दो साल पहले लिखा था.

 
भारतीय इतिहासकारों ने जवाहरलाल नेहरू का मूल्यांकन करते समय उन्हें आधुनिक भारत का शिल्पी कहा है. नेहरू की भूमिका को लेकर तमाम विवादों के बावजूद उनके बारे में यह कहना कहीं से भी अतिशयोक्ति नहीं है. वे बीसवीं सदी के भारत के अग्रणी जनवादी, मानवीय मूल्यों को तरजीह देने वाले और महान द्रष्टा थे. अपने समय में नेहरू नागरिक स्वतंत्रताओं के जबर्दस्त हिमायती थे और इसे उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे, जितना की आर्थिक समानता या समाजवाद को. हिंदुस्तान का निर्माण इस विचारधारा की बुनियाद पर टिका है कि आधुनिक हिंदुस्तान अनेक धर्मों, जातियों और संप्रदायों के बुनियादी अधिकार सुनिश्चित करता है, हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र नहीं हैं. नेहरू इस विचार के अग्रणी लोगों में से थे, जिनके प्रयास से हिंदुस्तान एक उदार और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में स्थापित हो सका. वे प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्मान, आत्मा की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, तार्किकता, मानवता आदि के न सिर्फ हिमायती थे, बल्कि इसके लिए संघर्ष भी किया. अपने व्यक्तित्व में नेहरू बेहद उदार दृष्टिकोण रखते थे, जिसे उन्होंने भारतीय जनमानस में उतारने की कोशिश की. 1954 में उन्होंने सभी मुख्यमंत्रियों को लिखा—'यदि भारत को सचमुच वैसा महान बनाना है जैसा कि हम सब लोग चाहते हैं तो उसे न तो अंदर से और न ही बाहर से अलग—थलग होना चाहिए. उसे उन सभी चीजों का त्याग करना पड़ेगा जो उनकी आत्मा का चिंतन या सामाजिक जीवन के विकास में बाधक बन सकती हैं.'
नेहरू के धुर आलोचक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे महान लोकतांत्रिक मूल्यों वाले नेता थे। नेहरू ने तमाम मुश्किलें उठाकर धर्मनिरपेक्ष ढांचे की नींव रखी और उसकी पूरी शक्ति से हिफाजत भी की। वे ऐसे नेता थे जिन्होंने संसद में अपनी आलोचना करने वालों की भी वो पीठ थपथपाया करते थे। नेहरू एक समतावादी, न्यायोचित और जनवादी समाज—समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे. नागरिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता नेहरू के उच्च राजनीतिक मूल्यों में सर्वोपरि रहे. गांधी और मार्क्स के विचारों के उनपर व्यापक असर था और इन विचारों के अनुरूप उन्होंने एक समाजवादी राष्ट्र की स्थापना के लिए आजीवन कोशिश करते रहे.
नागरिक स्वतंत्रताओं के हिमायती नेहरू ने मार्च 1940 में लिखा—'प्रेस की आजादी का मतलब यह नहीं होता कि जो चीजें हम छपी हुई देखना चाहें, सिर्फ उन्हीं की अनुमति दें, इस तरह की आजादी से तो कोई अत्याचारी भी सहमत हो जाएगा. नागरिक स्वतंत्रताओं और प्रेस की आजादी का मतलब है कि हम जो चीज न चाहें उनकी भी अनुमति दें, अपनी आलोचना बर्दाश्त करें.' नेहरू की ख्याति एक ऐसे नेता के रूप में है जो तीखी आलोचनाओं का भी सम्मान करने की हिमायत करते थे.
कराची कांग्रेस का 1931 में मौलिक अधिकारों पर पारित प्रस्ताव नेहरू ने ही तैयार किया था उसमें अभिव्यक्ति तथा प्रेस के द्वारा अपनी राय व्यक्त करने और संगठन बनाने के अधिकार सुनिश्चित किए गए.उन्हीं के प्रयासों से 1936 में इंडियन सिविल लिबर्टीज यूनियन की स्थापना हुई. यह एक गैर—दलीय असांप्रदायिक संगठन था जिसका मकसद नागरिक अधिकारों पर होने वाले हमलों के खिलाफ जनमत तैयार करना था. इस संगठन की स्थापना के अवसर पर नेहरू ने कहा था—'जब नागरिक अधिकारों का दमन होता है तो राष्ट्र की तेजस्विता समाप्त हो जाती है और वह कोई भी ठोस काम करने लायक नहीं रह जाता.' भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने धीरे—धीरे लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की एक ऐसी विचारधारा एवं संस्कृति विकसित करने में सफलता प्राप्त की.  असहमति के प्रति सम्मान भाव, अभिव्यक्ति की आजादी, बहुमत के शासन का सिद्धांत और अल्पसंख्यक मतों के बने रहने के अधिकार की मान्यता जिसका आधार बने. इसमें नेहरू का उल्लेखनीय योगदान रहा कि नागरिक अधिकारों की सुरक्षा वाले लोकतंत्र की सहमति बन सकी. गांधी जी भी नागरिकों के अधिकारों के प्रति पूर्णतया कटिबद्ध थे जो आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. गांधी जी ने 1922 के यंग इंडिया में लिखा था—'हम अपने लक्ष्य की तरफ एक कदम भी बढ़ सकें, इससे पहले स्वतंत्र अभिव्यक्ति ओर संगठन के अधिकार को हमें हासिल करना चाहिए. हमें इन अधिकारों की रक्षा जान देकर भी करनी चाहिए.' इन नायाब मूल्यों ने भारत को उदार लोकतंत्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका अदा की.
इतिहासकार विपिन चंद्र अपनी किताब 'भारत का स्वतंत्रता संघर्ष' में लिखते हैं कि 'समाजवादी भारत के विजन को लोकप्रिय बनाने में जवाहरलाल नेहरू ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.उनका कहना था कि राजनीतिक आजादी जनता की आर्थिक मुक्ति के बिना बेकार है. 1930 के पूरे दशक में वे तत्कालीन राष्ट्रवादी विचारधारा की अपर्याप्तता की ओर संकेत करते रहे और उसपर बुर्जुआ विचारों के वर्चस्व की आलोचना करते रहे. उनका जोर इस बात पर था राष्ट्रीय आंदोलन में एक नई, समाजवादी—बुनियादी रूप से मार्क्सवादी—विचारधारा को प्रमुख स्थान दिया जाए, ताकि लोग अपनी सामाजिक स्थिति का वैज्ञानिक अध्ययन कर सकें और कांग्रेस को समाजवादी विचारधारा का वाहक बना सकें. इस मामले में 30 का दशक काफी अनुकूल साबित हुआ.'
नेहरू जिस विचारधारा का नेतृत्व कर रहे थे वह जनवाद, कानून का शासन, व्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान, सामाजिक समता, बुद्धिपरकता और नैतिकता पर टिका हुआ था.  उन्होंने आजीवन एकीकृत धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण के लिए संघर्ष किया, जहां पर हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का मूलभूत अधिकार प्राप्त हो. यह नेहरू ही थे, जिन्होंने हिंदुत्ववादी ताकतों को कभी सर नहीं उठाने दिया और धर्मनिरपेक्ष भारतीय राष्ट्र के विचार को मजबूती से आगे बढ़ाया. कहते हैं कि एक बार वह दिल्ली में मुसलमानों के इलाके की ओर बढ़ते तलवार लपलपाते सिखों के एक जुलूस के आगे तनकर खड़े हो गए थे और उन्हें ऐसी डांट लगाई कि सभी ने हथियार फेंक दिए।
गांधीजी ने जो स्वराज, गांवों और आखिरी आदमी के विकास की बात की, नेहरू ने उसे आगे बढ़ाया। उन्होंने इस बात को समझा कि आम आदमी के बिना स्वाधीनता की बात अधूरी है। इसलिए उन्होंने भूमि सुधार, कामगारों, कलाकारों, किसानों की सुरक्षा की बात की। उन्होंने घोषणा की कि भारत को एक वैज्ञानिक नजरिए की जरूरत है, जबकि महात्मा गांधी पुराने को पुनजीर्वित करने की ओर झुके हुए थे, नेहरू भविष्यदृष्टा थे। वे भारत को वैज्ञानिक सोच वाला आधुनिक राष्ट्र बनाना चाहते थे.
इसके लिए उन्होंने जरूरी मूल्यों की न सिर्फ वकालत की बल्कि उसे अपने जीवन में भी उतारा. लेखक और विचारक पीसी जोशी ने एक बार एक संस्मरण सुनाया. '1945 की गमिर्यों की बात है. नेहरू जी अंतिम बार अल्मोड़ा जेल में कारावास में थे। जेल में दूध पहुंचाने वाला मेरा जानकार था। एक दिन उसने हमें बताया कि नेहरू जी आज रिहा होने वाले हैं। हम कुछ बच्चे कौतूहलवश उन्हें देखने जा पहुंचे। जेल के करीब पहुंचे तो देखा वह अकेले चले आ रहे हैं। तब तक शायद कांग्रेस के लोग उन्हें लेने नहीं पहुंच पाए थे। हम अभिभूत होकर उन्हें देख रहे थे। तभी वह हमारे पास आए और बोले- 'क्या देख रहे हो? वह सामने मंदिर देखो, कितना सुंदर है। बताओ किसने बनाया उसे, वह किस देवता का मंदिर है। नहीं जानते तुम? जानना चाहिए। देश यहीं से शुरू होता है।' फिर उनकी नजर सामने हिमालय की धवल चोटियों की ओर गई। वह फिर हमें कहने लगे- 'तुम लोग बहुत सौभाग्यशाली हो, हम तो कश्मीर में पैदा हुए, मगर वहां से कट गए। तुम कितनी सुंदर जगह रहते हो। लेकिन यहां लोग गरीब हैं। उनके लिए बड़े होकर कुछ करोगे या नहीं?'
नेहरू के पास हिंदुस्तान के लिए एक ग्लोबल विजन था। वे भारत को आधुनिक जगत से जोड़ना चाहते थे इसलिए हिंदुस्तान की वैश्विक भूमिका की वकालत की. जब दुनिया दो महाशक्तियों—अमेरिका और रूस— में बंटी हुई थी और ये दोनों शक्तियां अपना वर्चस्व बनाने पर लगी थीं, नेहरू ने हर वैश्विक दबाव का मुकाबला किया और नवस्वतंत्र भारत को विदेशी प्रभाव से मुक्त रखा. अमेरिका या रूस की ओर रुझान रखने की जगह उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुआई की. उन्होंने दुनिया के सामने प्राचीन भारत की छवि तोड़कर नए भारत की छवि रखी। गांधीजी नेहरू के बारे में कहा था- 'मेरे बाद तुम्हें मेरी आवाज नेहरू में सुनाई देगी।' आज जब राजनीतिक तौर पर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर देश को हिंदू और मुसलमान में बांटने की कोशिश की जा रही है, नेहरू नई पीढ़ी के लिए 'विविधता में एकता' के विचार के लिए लड़ने वाले नायक की हैसियत से इतिहास पुरुष के रूप में अनुकरणीय हैं.

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