कैराना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कैराना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 12 जून 2016

हिंदुओं के पलायन व हत्या की हुकूम सिंह की सूची फर्जी . रिहाई मंच

ढाई दशक पहले मारे गए लोगों को डाल दिया सूची मेंए हत्यारोपी अधिकतर हिंदू ही
भाजपा हिंदुओं पर उत्पीड़न का माहौल बनाकार कर रही है दंगे की तैयारी
शिवसेना के सांसदों की तरह यूपी पुलिस द्वारा रोजेदार का उत्पीड़न शर्मनाक . रिहाई मंच 

लखनऊ 11 जून 2016। रिहाई मंच ने भाजपा सांसद हुकुम सिंह द्वारा कैराना के 21 हिंदुओं की हत्याओं और 241 हिंदू परिवारों के पलायन की सूची को फर्जी करार देते हुए भगवा गिरोह द्वारा फिर से पश्चिमी यूपी को सांप्रदायिकता की आग में झोकने की साजिश करार दिया है। मंच ने गोरखपुर के रोजदार मुस्लिम व्यक्ति की पुलिस द्वारा बेरहमी से पिटाई व पेशाब पिलाने की धमकी को अखिलेश यादव की सांप्रदायिक पुलिस के चेहरे का ताजा उदाहरण बताया है।

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के महासचिव राजीव यादव ने कहा कि मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के आरोपी हुकुम सिंह ने जिन 21 हिंदुओं की हत्याओं की सूची जारी की है उनमें से एक भी सांप्रदायिक हिंसा या द्वेष के कारण नहीं मारे गए हैं और उनमें से कईयों की तो ढाई दशक पहले हत्याएं हुई थीं। उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी द्वारा इस सूची की की गई तथ्यान्वेषण के आधार पर बताया कि इस सूची में दर्ज मदनलाल की हत्या 20 वर्ष पहलेए सत्य प्रकाश जैन की 1991ए जसवंत वर्मा की 20 साल पहलेए श्रीचंद की 1991ए सुबोध जैन की 2009ए सुशील गर्ग की 2000ए डा0 संजय गर्ग की 1998 में हत्याएं हुई थीं। इन सभी हत्याओं में आरोपी भी हिंदू समाज से थे। रिहाई मंच महासचिव ने कहा कि रिहाई मंच कार्यालय सचिव ने जब इस बाबत सीओ कैराना भूषण वर्मा से बात की तो उन्होंने भी भाजपा सांसद द्वारा जारी सूची को फर्जी और तोड़ा.मरोड़ा बताया। उन्होंने कहा कि थाना कैराना में पिछले डेढ़ साल में कोई भी सांप्रदायिक कारणों से हत्या नहीं हुई है और जो घटनाएं हुई भी हैं वो विशुद्ध आपराधिक प्रवृत्ति की रही हैं।

रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि पूरी दुनिया में भारत की बदनामी का कारण बने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ित मुसलमानों की हजारों फरियादें मानवाधिकार आयोग के दफ्तर में धूल फाक रही हैं। जिसपर आजतक आयोग ने किसी को भी तलब नहीं किया। लेकिन हिंन्दुत्ववादी निजाम आते ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सांप्रदायिक हिंसा के आरोपियों द्वारा प्रस्तुत फर्जी सूचियों पर संज्ञान लेने लगा है। उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सचमुच अपनी भूमिका में होता तो हुकुम सिंह जैसे तत्व खुद जेल में होते जिनकी मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा में स्पष्ट भूमिका साबित करने वाले तमाम मांगपत्र मानवाधिकार आयोग के सामने पड़े हैं। शाहनवाज आलम ने आरोप लगाया कि हुकुम सिंह जैसे तत्व आज सूबे को फिर से सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंकने के लिए इसलिए उतारू हैं कि अखिलेश यादव सरकार ने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।

आजमगढ़ रिहाई मंच प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने कहा कि गोरखपुर के गगहा थाने के ग्राम गजपुर निवासी परवेज आलम को जिस तरह से सूदखोरों के दबाव में पुलिस ने बुरी तरह पीटा और पानी मांगने पर थानेदार आरएन दूबे ने उसे पेशाब पिलाने की धमकी दी वह प्रदेश सरकार के मुस्लिम विरोधी चेहरे का ताजा उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जिसतरह से शिवसेना के सांसद रोजेदार मुसलमानों के साथ सांप्रदायिक उत्पीड़न करते हैं वही व्यवहार अखिलेश यादव की पुलिस कर रही है। मसीहुद्दीन संजरी ने दोषी पुलिस कर्मी को तत्तकाल निलंबित कर जेल भेजने की मांग की है।

द्वारा जारी.
शाहनवाज आलम
;प्रवक्ता रिहाई मंच
09415254919

कैराना में फिर से हो रहा है षडयंत्र

मुजफ्फरनगर में जिस तरह एक वीडियो में हिंदू पीट कर मारे गए थे, बाद में जांच आयोग ने बताया कि वह वीडियो कराची का था. वो कारनामा संगीत सोम का था. उसी तरह संगीत सोम के राजनीतिक बिरादर हुकुम सिंह बता रहे हैं कि कैराना में हिंदू पलायन कर गए. कुछ विराट हिंदू लोग कह रहे हैं कि वहां कश्मीर बन गया है.
बताया जा रहा है कि दबंगों की दबंगई और उगाही के डर से लोग गांव छोड़ रहे हैं. अब यह कोई नहीं पूछ रहा है कि अगर इलाके में उगाही या रंगदारी हो रही है, जिसके डर से लोग पलायन कर रहे हैं तो प्रशासन क्या कर रहा है? गैंगेस्टर रंगदारी वसूल रहे हैं तो पुलिस और सांसद हुकुम सिंह क्या कर रहे हैं? गुंडों और रंगदारों के प्रति नरम कौन है? किसी सरकार और प्रशासन के रहते हुए रंगदार कैसे सक्रिय हैं? अगर इलाके में रंगदार और अपराधी सक्रिय हैं तो प्रशासन जवाबदेह है या मुस्लिम समुदाय जवाबदेह है? कितने रंगदार और अपराधी गिरफ्तार किए गए? यूपी में कोई सरकार है कि नहीं? कोई यूपी सरकार पर सवाल क्यों नहीं कर रहा है? सोशल मीडिया के वीर बालक लोग भी नहीं. यदि दिल्ली या मुंबई में कोई गैंगेस्टर लोगों को परेशान करता है तो उसके धार्मिक समुदाय से जवाब मांगा जाता है या प्रसाशन से?
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से उस पूरे इलाके में यह हो रहा है कि जहां हिंदू ज्यादा हैं, वहां से मुसलमान हट रहे हैं, जहां मुसलमान ज्यादा हैं, वहां से हिंदू हट रहे हैं. सिर्फ दंगे में 50 हजार लोग विस्थापित हुए. कई इलाके जहां पर दंगे नहीं हुए थे, वहां से भी मुसलमानों ने गांव खाली कर दिए. उसी तरह ज्यादा मुसलमान आबादी वाले इलाकों से हिंदू परिवार भी चले गए. मुसलमानों के मुकाबले यह संख्या बेहद कम है.
दूसरे, हुकुम सिंह जो हत्याओं की सूची जारी कर रहे हैं, उनमें से कई लोगों की हत्या 15—20 साल पहले हुई थी. तीसरे, यह कोई आतंकग्रस्त इलाका नहीं है और दंगे के आयोजकों में भाजपा नेता शामिल थे, जो कि आयोग की रिपोर्ट में दर्ज है.
रिहाई मंच ने वहां पड़ताल करके प्रेस रिलीज जारी कर कहा है, 'मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के आरोपी हुकुम सिंह ने जिन 21 हिंदुओं की हत्याओं की सूची जारी की है उनमें से एक भी सांप्रदायिक हिंसा या द्वेष के कारण नहीं मारे गए हैं और उनमें से कई लोगों की हत्याएं तो ढाई दशक पहले हुई थीं. पुलिस एवं स्थानीय लोगों के द्वारा सूची की जांच पड़ताल करने पर यह निकला कि इस सूची में दर्ज मदनलाल की हत्या 20 वर्ष पहले, सत्य प्रकाश जैन की 1991, जसवंत वर्मा की 20 साल पहले, श्रीचंद की 1991, सुबोध जैन की 2009, सुशील गर्ग की 2000, डा0 संजय गर्ग की 1998 में हत्याएं हुई थीं. इन सभी हत्याओं में आरोपी भी हिंदू समाज से ही थे. सीओ कैराना भूषण वर्मा से बात की तो उन्होंने भी भाजपा सांसद द्वारा जारी सूची को फर्जी और तोड़ा-मरोड़ा बताया. उन्होंने कहा कि थाना कैराना में पिछले डेढ़ साल में कोई भी सांप्रदायिक कारणों से हत्या नहीं हुई है और जो घटनाएं हुई भी हैं वो विशुद्ध आपराधिक प्रवृत्ति या आपसी रंजिस की रही हैं.'
भाजपा के पास चुनाव के लिए कोई मुद्दा नहीं है. वे निश्चित ही 2013 के दंगों को भुनाने के लिए माहौल बना रहे हैं. वे गांव गांव को पाकिस्तान बनाने पर तुले हैं, वरना पश्चिमी उत्तर प्रदेश कश्मीर घाटी नहीं है.


क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...