रविवार, 12 जून 2016

कैराना में फिर से हो रहा है षडयंत्र

मुजफ्फरनगर में जिस तरह एक वीडियो में हिंदू पीट कर मारे गए थे, बाद में जांच आयोग ने बताया कि वह वीडियो कराची का था. वो कारनामा संगीत सोम का था. उसी तरह संगीत सोम के राजनीतिक बिरादर हुकुम सिंह बता रहे हैं कि कैराना में हिंदू पलायन कर गए. कुछ विराट हिंदू लोग कह रहे हैं कि वहां कश्मीर बन गया है.
बताया जा रहा है कि दबंगों की दबंगई और उगाही के डर से लोग गांव छोड़ रहे हैं. अब यह कोई नहीं पूछ रहा है कि अगर इलाके में उगाही या रंगदारी हो रही है, जिसके डर से लोग पलायन कर रहे हैं तो प्रशासन क्या कर रहा है? गैंगेस्टर रंगदारी वसूल रहे हैं तो पुलिस और सांसद हुकुम सिंह क्या कर रहे हैं? गुंडों और रंगदारों के प्रति नरम कौन है? किसी सरकार और प्रशासन के रहते हुए रंगदार कैसे सक्रिय हैं? अगर इलाके में रंगदार और अपराधी सक्रिय हैं तो प्रशासन जवाबदेह है या मुस्लिम समुदाय जवाबदेह है? कितने रंगदार और अपराधी गिरफ्तार किए गए? यूपी में कोई सरकार है कि नहीं? कोई यूपी सरकार पर सवाल क्यों नहीं कर रहा है? सोशल मीडिया के वीर बालक लोग भी नहीं. यदि दिल्ली या मुंबई में कोई गैंगेस्टर लोगों को परेशान करता है तो उसके धार्मिक समुदाय से जवाब मांगा जाता है या प्रसाशन से?
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से उस पूरे इलाके में यह हो रहा है कि जहां हिंदू ज्यादा हैं, वहां से मुसलमान हट रहे हैं, जहां मुसलमान ज्यादा हैं, वहां से हिंदू हट रहे हैं. सिर्फ दंगे में 50 हजार लोग विस्थापित हुए. कई इलाके जहां पर दंगे नहीं हुए थे, वहां से भी मुसलमानों ने गांव खाली कर दिए. उसी तरह ज्यादा मुसलमान आबादी वाले इलाकों से हिंदू परिवार भी चले गए. मुसलमानों के मुकाबले यह संख्या बेहद कम है.
दूसरे, हुकुम सिंह जो हत्याओं की सूची जारी कर रहे हैं, उनमें से कई लोगों की हत्या 15—20 साल पहले हुई थी. तीसरे, यह कोई आतंकग्रस्त इलाका नहीं है और दंगे के आयोजकों में भाजपा नेता शामिल थे, जो कि आयोग की रिपोर्ट में दर्ज है.
रिहाई मंच ने वहां पड़ताल करके प्रेस रिलीज जारी कर कहा है, 'मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के आरोपी हुकुम सिंह ने जिन 21 हिंदुओं की हत्याओं की सूची जारी की है उनमें से एक भी सांप्रदायिक हिंसा या द्वेष के कारण नहीं मारे गए हैं और उनमें से कई लोगों की हत्याएं तो ढाई दशक पहले हुई थीं. पुलिस एवं स्थानीय लोगों के द्वारा सूची की जांच पड़ताल करने पर यह निकला कि इस सूची में दर्ज मदनलाल की हत्या 20 वर्ष पहले, सत्य प्रकाश जैन की 1991, जसवंत वर्मा की 20 साल पहले, श्रीचंद की 1991, सुबोध जैन की 2009, सुशील गर्ग की 2000, डा0 संजय गर्ग की 1998 में हत्याएं हुई थीं. इन सभी हत्याओं में आरोपी भी हिंदू समाज से ही थे. सीओ कैराना भूषण वर्मा से बात की तो उन्होंने भी भाजपा सांसद द्वारा जारी सूची को फर्जी और तोड़ा-मरोड़ा बताया. उन्होंने कहा कि थाना कैराना में पिछले डेढ़ साल में कोई भी सांप्रदायिक कारणों से हत्या नहीं हुई है और जो घटनाएं हुई भी हैं वो विशुद्ध आपराधिक प्रवृत्ति या आपसी रंजिस की रही हैं.'
भाजपा के पास चुनाव के लिए कोई मुद्दा नहीं है. वे निश्चित ही 2013 के दंगों को भुनाने के लिए माहौल बना रहे हैं. वे गांव गांव को पाकिस्तान बनाने पर तुले हैं, वरना पश्चिमी उत्तर प्रदेश कश्मीर घाटी नहीं है.


शनिवार, 11 जून 2016

पिछले 10-15 साल में एक तरह के अनवरत गुस्से से भरे, सतत रूप से क्रुद्ध समाज की रचना हुई है : पुरुषोत्तम अग्रवाल

आलोचक के तौर पर ख्यात पुरुषोत्तम अग्रवाल कवि भी हैं और कथाकार भी. कबीर पर लिखी उनकी किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की’ आलोचना के क्षेत्र में मील का पत्थर है. वे लगातार कविताएं लिखते हैं पर कविरूप में बहुत कम ही सामने आते हैं. उनकी कई कहानियां समय-समय पर प्रकाशित हुई हैं. कुछ समय पहले उनकी लिखी एक कहानी ‘नाकोहस’ ने खासी चर्चा और प्रशंसा बटोरी. कहानी का दायरा इतना व्यापक था कि बाद में उन्होंने इसे उपन्यास का रूप दिया. पुरुषोत्तम अग्रवाल से बातचीत.

आपके उपन्यास नाकोहस (नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट्स) की खूब चर्चा हुई. मौजूदा परिवेश में बात कहते ही आहत होती भावनाओं से व्याप्त डर और अराजक माहौल के चलते उपन्यास शायद ज्यादा प्रासंगिक हो गया है. आपका क्या अनुभव रहा?
यह सही है कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के चलते उपन्यास को उसी संदर्भ में पढ़ा गया, लेकिन उसमें और भी बहुत चीजें थीं जिस पर लोगों का ध्यान कम गया. उपन्यास में प्रेम है, जीवन है, अंतर्विरोध है तो दुख और भय भी है. 
उपन्यास बुद्धिजीवी समाज की विसंगतियों और विडंबनाओं पर भी चुटकियां लेता है. बुद्धिजीवी वर्ग का अंतर्विरोध बार-बार उसमें सामने आया है. उसमें एक प्रसंग है कि आजकल प्रगतिशील लोगों की थाली में भी दो-चार राष्ट्रवादी आइटम जरूर पाए जाते हैं. ऐसा नहीं है कि यह बुद्धिजीवियों के अधिकार और आत्माभिमान का ही घोषणा पत्र है. उपन्यास में बुद्धिजीवी का मतलब वो है जो किसी न किसी रूप में धरातल पर जाकर समाज से जुड़े. उपन्यास जहां से शुरू होता है, एक पात्र सुकेत की यादें जहां से शुरू होती हैं, वह सब आपको नेल्ली (असम) तक ले जाता है कि उत्तर-पूर्व आपकी सोच में भी कहीं नहीं है. किसी को पता तक नहीं है कि 1983 में नेल्ली में क्या हुआ था. नेल्ली के बाद 1984 का सिख विरोधी दंगा, हाशिमपुरा और मलियाना का संदर्भ है.
यह उपन्यास किसी समाज में बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका को रेखांकित करता है, समाज में टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट का जो आतंक है और पढ़ने-लिखने का मतलब वही समझ लिया जाता है, ये उस पर बात करता है. मैं मानता हूं कि यह उपन्यास आपको याद दिलाता है कि अगर आप साहित्य, संस्कृति, इतिहास आदि की उपेक्षा करेंगे और इन पर स्पष्ट बोलने वालों को लगभग गाली की तरह बुद्धिजीवी कहने लगेंगे तो अंतत: आप अपना ही नुकसान करेंगे. क्योंकि ऐसा समाज अनिवार्य रूप से नाकोहस की तरह है. जैसा कि नाकोहस का प्रवक्ता गिरगिट कहता है बुद्धिजीवियों के सम्मान का नाटक बहुत हो चुका. ये नहीं कि आप कुछ भी बकते रहें और हमारी भावनाएं आहत हों. उपन्यास तीनों चरित्रों की मानवीयता को भी रेखांकित करने की कोशिश करता है. उपन्यास तीन बुद्धिजीवियों का एक रात का अनुभव मात्र नहीं है.
आपकी पहचान मुख्य रूप से आलोचक की रही है फिर आपको उपन्यास लिखने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
मैं आलोचना लिखता रहा हूं लेकिन नियमित रूप से कविता भी लिखता हूं. ये बात और है कि उसे प्रकाशित नहीं कराता. यहां तक कि सुमन जी (अपनी पत्नी) को भी नहीं पढ़ाता. कभी मन हुआ तो ठीक-ठाक करके कहीं भेजा, वरना लिखकर रख लेता हूं. फिक्शन में मेरी रुचि शुरू से थी. कॉलेज के दिनों में दो-तीन कहानियां लिखी थीं, पुरस्कृत भी हुईं. बाद में आलोचना लिखने लगा. लोगों को लगने लगा कि ये आलोचना अच्छी लिखते हैं. चर्चा होने लगी. तत्काल की जो स्थितियां बन जाती हैं, वही पहचान बन जाती है. लेकिन परिवार और निजी मित्रों को मालूम है कि मैं 25 साल से ये धमकी देता रहा हूं कि मैं उपन्यास लिखूंगा. इसका कारण मैं ये मानता हूं कि कविता और तमाम दूसरी विधाओं के प्रति सम्मान के साथ, जीवन को उसकी समग्रता में अगर साहित्य की कोई विधा व्यक्त कर सकती है तो वह उपन्यास है.

मैं ये नहीं कह रहा कि सिर्फ उपन्यास ऐसा करता है. लेकिन उसी तरह जैसे भाषा का सबसे सघन और सर्जनात्मक उपयोग कविता में हो सकता है- ऐसा कहकर मैं दूसरी विधा का अपमान नहीं कर रहा, सिर्फ कविता की विशेषता बता रहा हूं- उसी तरह चाहे समाज हो, आपका अंतर्मन, आपकी अस्तित्वगत वेदना या चाहे आपकी ऐतिहासिक चिंता, उसका जिस समग्रता में अनुसंधान उपन्यास करता है, कोई दूसरी विधा नहीं कर सकती. उपन्यास में कई आवाजें होती हैं. गोदान में केवल होरी की आवाज नहीं है. गोदान में राय साहब, बदमाश अफसरों, थानेदार, झिगुरी, पंडित यानी होरी के शोषकों की भी आवाजें हैं. वह उपन्यास जो अपने पसंदीदा चरित्र के अलावा किसी और चरित्र को बोलने ही न दे या लेखक सिर्फ अपनी मर्जी की बात कहलवाए, वह काफी घटिया उपन्यास होगा. अच्छा उपन्यास वह होता है जिसमें ऐसे भी चरित्र हों जिन्हें आप लेखक के साथ जोड़कर देख सकते हैं. इसे देखते हुए मैं पिछले 25 साल से उपन्यास लिखने की बात सोच रहा था. एक वृहद उपन्यास पर काम करना बाकी है.
जब मैंने नाकोहस कहानी लिखी, जो 2014 में छपी, उस पर जिस तरह का विवाद या बहस हुई, वह बहुत रोचक था. जिन लोगों से मैं अपेक्षा करता था कि उसकी निंदा करेंगे, उन्होंने तो की ही, लेकिन बहुत सारे लोगों ने आलोचना की. यह ठीक भी है. लेकिन कुछ लोगों ने कहा कि रघु नाम का पात्र ईसाई है, तो आप हिंदू नायकत्व का पीछा कर रहे हैं. या उसको हिंदू परंपरा की जानकारी है तो आप खुद हिंदू सांप्रदायिकता को शह दे रहे हैं. इस पर काउंटर भी किया गया. कहानी पर चर्चा दिलचस्प रही. इस पर मित्रों-परिजनों ने सलाह दी कि इसको उपन्यास में बदलिए. फिर मैंने इस पर सोचना शुरू किया उपन्यास के रूप में और लिखा.
जब कहानी छपी थी तो सवाल उठाए गए थे कि इसमें कहानीपन नहीं है. क्या कहेंगे आप?
मुझे कहानीपन की बात बिल्कुल समझ में नहीं आती. ठीक है कहानीपन एक बात है, लेकिन कहानीपन का कोई एक बुनियादी रूप नहीं है जिसके आधार पर आप एक कहानी को खारिज कर दें और एक को कहानी मान लें. अब मुझे नहीं पता कि कहानीपन या कथातत्व पर बात करते हुए ‘कुरु कुरु स्वाहा’ को उपन्यास माना जाएगा या नहीं. या ‘नौकर की कमीज’ को उपन्यास मानेंगे या नहीं. लेकिन ठीक है यह सवाल उठाने वालों की राय है.

मेरी समझ के मुताबिक एक बुनियादी घटनाक्रम है, एक वैचारिक संघर्ष है, कोई कहानी इस वजह से कहानी नहीं रहती, ऐसा मैं नहीं मानता. जब उपन्यास के तौर पर मैंने इसको सोचा तब तक चीजें काफी साफ होने लगी थीं और समाज की जिस परेशानी से मैं गुजर रहा था, जिसे गोविंद निहलानी ने उपन्यास पर चर्चा करते हुए ‘डिस्टर्बिंग डिस्टोपिया’ कहा था, शायद उसकी कल्पना कर रहा था. डिस्टर्बिंग यानी जो बुरी तरह आपको परेशान करे या डरा दे, ये डर कम से कम मेरा निजी है. इस डर को एक फैंटेसी के रूप में रचा गया है. उपन्यास का पात्र टेलीविजन बंद करना चाह रहा है लेकिन वह बंद नहीं हो रहा है. वह रिमोट का बटन दबा रहा है, पीछे से पावर ऑफ कर रहा तब भी वह बंद नहीं हो रहा है. उसके कमरे की हर दीवार टेलीविजन स्क्रीन में बदल गई है. एक टेलीविजन तुम फोड़ भी दो तो भी फर्क नहीं पड़ेगा.
जेएनयू प्रसंग या अन्य हालिया प्रसंगों में भी कुछ टेलीविजन चैनल जिस तरह का माहौल बनाते हैं, उसमें जिन लोगों का नाम लेकर इंगित किया जाता है, आपको नहीं पता कि उनके साथ कब, कैसी अनहोनी घटित हो सकती है. क्या देश की राजधानी में यह एक अनोखी घटना नहीं है कि कोर्ट परिसर में एक लड़के पर जानलेवा हमला हो और पुलिस कुछ न कर पाए? बाद में भी कुछ नहीं हुआ. यह ‘लिंच मेंटालिटी’ है. आप लिंच मेंटालिटी (मारपीट या हत्या करने की मानसिकता) का निर्माण कर रहे हैं और यह उपन्यास यही याद दिलाता है.
उपन्यास में एक वाक्य आता है, ‘जिससे भय होता है उस पर करुणा नहीं होती.’ लोगों के मन में भय बैठाया जा रहा है कि यह आदमी देश के लिए खतरनाक है, समाज के लिए खतरनाक है, आपके परिवार, बहन, बेटी के लिए खतरनाक है. भले ही वह आदमी अपने आप में कितना निर्दोष हो. उसकी जान लेने में न आपको संकोच होगा, न कोई अपराधबोध. अगर आप सचमुच ऐसा समाज बनाना चाह रहे हैं, जिसमें किसी निर्दोष को भी मार देने में उसे संकोच न हो तो वह समाज कैसा होगा?
उपन्यास में जिस तकनीकी अतिक्रमण का जिक्र है कि टीवी चैनल बंद नहीं हो पा रहा, मोबाइल स्क्रीन मन की बात जान ले रहा है, यह लिखते समय आपके दिमाग में क्या था? व्यवस्था द्वारा किया जा रहा अतिक्रमण या संचार माध्यमों का पूंजीपन जो लोगों के जीवन में निर्बाध प्रवेश कर रहा है?
मैं सीधे कहूंगा कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था में ये दोनों चीजें लागू होती हैं. खुद में यह व्यवस्था भी और पूंजीवाद भी. लेकिन मैं यह मानता हूं कि अगर आपके जीवन में एकांत का कोई पल न बचे तो यह आपकी मनुष्यता के समाप्त होने की हालत है. जब आपके पास अपने भी साथ होने का थोड़ा-सा समय नहीं है, जब आप किसी से बात न कर रहे हों, फेसबुक पर किसी से दंगल न कर रहे हों, कुछ देर आप चुपचाप बैठें, संगीत सुन रहे हों, या कुछ भी करें. अपने साथ रहें. एकांत में दो चीजें होती हैं. एक तो शांत चित्त से सोचने का वक्त मिलता है. दूसरा, एकांत में आप अपनी कल्पनाओं और स्मृतियों को थोड़ा-सा व्यवस्थित होते देखते हैं. इन दोनों स्थितियों से आपको लगातार वंचित रखा जा रहा है. मनुष्य के एकांत का अतिक्रमण राजसत्ता तो कर ही रही है, लेकिन ये इस पूंजीवादी व्यवस्था या कहिए खास तरह के पूंजीवाद की बड़ी स्वाभाविक विशेषता है. उसकी हर जगह दखलंदाजी है. आपका कोई क्षण ऐसा नहीं है जो आपका अपना हो. वह एडवर्टाइजिंग कल्चर का हिस्सा है, जब आपके बेडरूम से लेकर आपका कमोड तक विज्ञापन और उत्पाद की जद में है. इसलिए जरूरी है कि वह आपकी हर चीज तक पहुंचे. इस क्रम में आपका जो भी एकांत है, जिससे आपका व्यक्तित्व परिभाषित होता है, वो
खत्म हो जाता है. ये मुझे बहुत भयावह स्थिति लगती है. मैं ऐसे परिवारों को जानता हूं जहां घर में चार कमरे हैं तो चार टीवी हैं. वेे साथ खाना नहीं खाते. सब अपने-अपने कमरे में टीवी देखते हुए खाना खाते हैं.
 नाकोहस की कल्पना कैसे की?
2003 या 2004 में आपको याद हो तो एक किताब छपी थी, ‘शिवाजी हिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया’. उसके लेखक थे अमेरिकी विद्वान जेम्स लेन. वे पुणे में भंडारकर इंस्टिट्यूट में रिसर्च के लिए आए थे. इस दौरान महाराष्ट्र में घूमते हुए उन्हें शिवाजी के बारे में कुछ बातें मालूम हुईं, जिन पर उन्होंने किताब लिख दी. किताब में सहयोग के लिए संस्थान का आभार प्रकट किया गया था. इस पर ‘संभाजी ब्रिगेड’ नामक एक संगठन ने संस्थान में घुसकर तोड़-फोड़ की. उस समय गोपीनाथ मुंडे जी ने बयान दिया कि हमारी भावनाएं तो जवाहरलाल नेहरू की किताब से भी आहत होती हैं.
तब मैंने एक लेख लिखा कि भावनाएं बहुत आहत हो रही हैं. भावनाएं आहत होकर कूदकर सड़क पर आ जाती हैं. इससे राष्ट्रीय संपदा का नुकसान होता है तो सरकार को चाहिए कि आहत भावनाओं और आक्रांत अस्मिताओं का एक आयोग बनाए, नेशनल कमीशन आॅफ हर्ट सेंटिमेंट्स (नाकोहस). तो ये विचार दस-बारह साल पुराना है. इसका पिछले आम चुनाव के परिणाम से कोई संबंध नहीं है. पिछले पांच-छह साल में जैसा माहौल देश में बनता चला गया है, उसमें सुधारवाद और प्रतिक्रियावाद में कोई भेद नहीं है. पुणे में जब यह वाकया हुआ तब वहां कांग्रेस की सरकार थी. जब सलमान रुश्दी को भारत नहीं आने दिया तब कांग्रेस की सरकार थी. एक गांव की पंचायत आदेश दे देती है कि अब गांव की लड़कियां मोबाइल फोन नहीं रखेंगी, किसी लड़की के पास मोबाइल पाया जाता है तो मार-मारकर उसकी हालत खराब कर दी जाती है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कह देते हैं कि समाज के मामले में सरकार क्या कर सकती है. इन लोगों ने सरकार की धारणा ही तब्दील कर दी है. इन लोगों को आधुनिक राजसत्ता का बोध ही नहीं है. आधुनिक राजसत्ता समाज को केवल व्यवस्थित ही नहीं करती, बल्कि समाज को बदलने की कोशिश करती है. कोई आधुनिक राजसत्ता यह नहीं कह सकती कि स्त्रियों या दलितों की क्या हालत है, इससे हमें कोई लेना-देना नहीं है, यह तो सामाजिक मसला है.
उदाहरण से समझिए कि समस्या कहां होती है. एक सज्जन ने घोषणा की कि वे कन्हैया को मार देंगे तो उनको माला पहनाई गई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक नेता जी ने घोषणा की कि वे सलमान रुश्दी को मारने वाले 51 लाख रुपये देंगे. बाद में वो बड़े-बड़े सेक्युलर नेताओं के साथ मंच पर दिखे. पिछले दस-बारह साल में जिस तरह की स्थितियां पैदा हुई हैं कि आहत भावनाओं का मामला एक तरह से किसी भी विमर्श की सर्वस्वीकार्य शर्त बन गया है. यानी विमर्श तब ही होगा अगर आपकी भावनाएं आहत हुई हैं.
आहत भावनाओं की राजनीति और 24 घंटे का मीडिया, इसने बहुत बुरी स्थिति पैदा की है. मैं इसे असहिष्णुता नहीं कहता, यह पर्याप्त शब्द नहीं है. पिछले 10-15 साल में एक तरह के अनवरत गुस्से से भरे, सतत रूप से क्रुद्ध समाज की रचना हुई है. इस दौरान समाज में क्रोध का विस्तार होता चला गया, समझदारी की कमी होती गई, भाषा में सपाटपन आता चला गया. मैंने जनवरी में फेसबुक पर शरारत के तौर पर लिखा, विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि इस बार गणतंत्र दिवस पर प्रधानमंत्री जी मुख्य अतिथि होंगे. (ठहाका लगाते हुए) कुछ लोगों को पसंद नहीं आया तो उन्होंने निंदा की, कुछ ने गालियां दीं. लेकिन एक सज्जन ने बाकायदा मुझे कोसा कि आप बड़े भारी प्रोफेसर बनते हैं, बुद्धिजीवी बनते हैं, इतना भी नहीं मालूम कि प्रधानमंत्री तो हर साल गणतंत्र दिवस पर होते ही हैं.
ये जो सतत रूप से क्रुद्ध समाज तैयार हुआ है, ये कैसे संभव हुआ?
इसका सबसे बड़ा कारक है निर्बाध उपभोक्तावाद. मैं यह नहीं मानता कि आप प्रकृति की ओर लौट जाएं, लेकिन एक अर्थशास्त्री मित्र कहते हैं कि ओपन इकोनॉमी एक सीमा तो है ही और वह है धरती पर उपलब्ध संसाधन. उससे ज्यादा ओपन तो नहीं हो सकती.
अर्थशास्त्री ब्रह्मदेव जी एक बात कहा करते थे कि अगर आपको अमेरिका और यूरोप के वर्तमान जीवन स्तर पर पूरी दुनिया को ले जाना है तो यह एक ही तरीके से संभव है कि आपके पास आठ पृथ्वियां हों और उन आठों का वैसा ही दोहन हो जैसा पिछले 400 साल में हुआ. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा संभव नहीं है. तो निर्बाध उपभोक्तावाद नहीं चल सकता. आप किसी एक सेक्टर के लिए बाकी को छोटा करेंगे. दिल्ली में आॅड इवेन करेंगे लेकिन आॅटोमोबाइल इंडस्ट्री पर लगाम नहीं लगाएंगे. एक परिवार में चार सदस्य हैं और बारह गाड़ियां हैं. आप निर्बाध उपभोग की स्थिति पैदा करेंगे तो जाहिर है कि समाज में अंतर्विरोध पैदा होगा.
तो एक तो इस अबाध, बेरोकटोक उपभोग की स्थिति ने समस्या पैदा की है. दूसरे, पूंजीवाद का सहज स्वभाव है कि यह मनुष्य को उपभोक्ता में बदलता है. यह उसके जिंदा रहने के लिए जरूरी है, इसलिए वह मनुष्य की मनुष्यता को कमतर करेगा. प्रतियोगिता को इस स्तर तक बढ़ाएगा कि वह गलाकाट प्रतिस्पर्धा में बदल जाएगी.
दूसरी समस्या है हमारे अपने समाज के संदर्भ में. हमारे लोकतंत्र का एक बुनियादी अंतर्विरोध दिनोंदिन बढ़ता चला जा रहा है कि एक स्तर पर हम लोकतंत्र हैं, चुनाव से सरकार चुनी जाती है, जनता का शासन है. लेकिन रोजमर्रा की प्रैक्टिस में सामाजिक न्याय और कानून के राज का क्या हाल है? आप निजी तौर पर हत्या करें तो आपको सजा हो जाएगी, लेकिन किसी समुदाय के प्रतिनिधि बनकर हत्या कर दें तो आपको कुछ नहीं होगा, बल्कि आपका अभिनंदन होगा. आप मुख्यमंत्री बन सकते हैं. ये हमारे अपने देश की समस्या है. एक तरह से कानून के राज की समाप्ति हो रही है. न्याय का बोध खत्म हो रहा है. तीसरी बात, पिछले 20 साल में नवउदारवादी व्यवस्था के आने के बाद आप महसूस करते हैं कि पहले एक मध्यवर्गीय आदमी यह मानकर चलता था कि व्यापक समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी है, जो कुछ उसे मिलता है वह एक व्यापक वितरण हिस्सा है. आजकल एक बड़ा मजबूत बोध विकसित हुआ है कि हम टैक्सपेयर हैं. टैक्सपेयर मनी, ये मुहावरा बहुत झल्लाहट पैदा करता है कि सब कुछ टैक्सपेयर मनी से हो रहा है.
हमारे समाज में नई तरह की समस्या यह पैदा हुई है कि सरकार मैनेजर की भूमिका में है, संसाधनों का केंद्रीकरण हो रहा है. अमेरिका में जो बात बार-बार कही जाती है कि 99 फीसदी संसाधनों पर एक फीसदी लोगों का कब्जा है, ऐसा अमेरिका नहीं चल सकता. ऐसे समाज में गुस्सा बढ़ता है जो हिंसा या सांप्रदायिकता या दूसरे खतरनाक रूप में सामने आता है.
जिन वजहों से ऐसा समाज बनता है, जाहिर है कि वह आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था है. क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्था है जिससे ऐसी स्थिति से बचा जा सके?
हां, बिल्कुल है. अार्थिक व्यवस्था से अगर आपका आशय है अर्थतंत्र तो उद्योग अनिवार्य है. अब लोग केवल प्रकृति के नहीं, बल्कि संस्कृति और प्रौद्योगिकी के नजदीक हैं. तो उद्योग होंगे, छोटे भी और बड़े भी. लोगों को वाकई अगर जीवन का एक स्तर चाहिए और विकास चाहिए तो उसके लिए एक जटिल समाज और अर्थतंत्र की जरूरत होगी. सवाल यह है कि उस अर्थतंत्र में संवेदनशीलता संभव है या नहीं. इसीलिए इस उपन्यास में बार-बार कहा गया है कि किसी भी तरह का अथॉरिटेरियन समाज, उसकी रंगत कुछ भी हो, उसका अस्तित्व नहीं हो सकता.
मोटे तौर पर आप कह सकते हैं सोशल डेमोक्रेसी या डेमोक्रेटिक सोशलिज्म. मैं निजी तौर पर मानता हूं कि नए तरह का नेहरू मॉडल हो सकता है जो अपने समय के अनुकूल हो, जो गलतियों से सीखा गया हो. मुझे अपने आपको नेहरूवादी कहने में कोई हिचक नहीं है. एक नवनिर्मित नेहरू मॉडल, एक मिश्रित अर्थव्यवस्था ही सबसे अनुकूल हो सकती है जिसका डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूशन का सपना हो, डेमोक्रेटिक प्रैक्टिसेज का सपना हो. देश आजाद हुआ तो लोगों ने नेहरू से कहा कि तरह-तरह की समस्याएं हैं, ये प्रेस फ्रीडम संपन्न और फैंसी देशों की लक्जरी है, इसको फ्री मत छोड़ो वरना गैरजिम्मेदार हो जाएगा और आपको परेशान करेगा. इस पर नेहरू ने कहा, मैं प्रतिबंधित प्रेस की जगह गैरजिम्मेदार मगर फ्री प्रेस को तवज्जो दूंगा. नेहरू ने गलतियां भी कीं, लेकिन उन्होंने देश की नींव रखी. विज्ञान, कला, साहित्य, सिनेमा, उद्योग हर चीज की नींव रखी.
आपने लिखा है-  ‘आज के दौर का लेखक भी उन बातों को दर्ज करने से दूर है जो सच तो है लेकिन कही नहीं जा रही है’, यह अपने समय और समाज पर गंभीर सवाल है. 
इसके पीछे एक वाक्य है एक इतिहासकार का, नाम याद नहीं, जो दिखता है उसे लिखना तो जरूरी है ही, लेकिन ज्यादा जरूरी है उसे लिखना जो दिखता नहीं है लेकिन जिसे लिखा जाना चाहिए. मुझे लगता है कि इतिहासकार हों, साहित्यकार, या समाजशास्त्री, सभी की मूल प्रतिक्रिया यही है कि चीजों को समग्र रूप में देख सकें और जो चीजें कही जानी चाहिए उसे कहा जाए. जैसे मिसाल के तौर पर, नाकोहस को लीजिए. असल में नाकोहस नाम की कोई संस्था तो है नहीं. लेकिन जो पूरा माहौल आपने बना दिया है कि आपसे बात करते समय मेरे मन में हल्की-सी चिंता यह है कि मेरे मुंह से कुछ ऐसा तो नहीं निकल रहा कि जिसकी वजह से कल मुझे पकड़कर ठोक दिया जाए कि हमारी भावनाएं आहत हुई हैं. क्या आज यह डर हमारे मन में नहीं है? यह बात मैं औपचारिक-अनौपचारिक, हर रूप में कहना चाहता हूं कि क्या ये सच नहीं है कि किसी भी चीज पर बात करते समय आज स्थिति ये हो गई है कि आप आसपास देख लेना चाहते हैं कि कोई ऐसा व्यक्ति तो नहीं सुन रहा जिससे खतरा हो. असहमति व्यक्त करने में डर लग रहा है. यह स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं है, जहां आपको अपनी आवाज से डर लगे. चैनलों की इसमें अहम भूमिका है. बुद्धिजीवियों को आप अपराधी घोषित करके, उन्हें राक्षस बताकर आप जो कर रहे हैं, वो कितना खतरनाक है यह बात कोई नहीं कहता. इसीलिए दुख है कि जो कहा जाना चाहिए वो बिल्कुल नहीं कहा जा रहा है. इसीलिए मैंने यह उपन्यास लिखा है. मुझे नहीं पता कि यह उपन्यास, उपन्यास की दृष्टि से कैसा है, लेकिन एक लेखक के तौर पर अनुभव करता हूं कि कहीं न कहीं लोगों ने उसे खुद से जुड़ा पाया है और वे सिर्फ इसलिए नहीं जुड़े रहे हैं कि वह डर का एक सपाट चित्र प्रस्तुत करता है, बल्कि इसलिए जुड़ाव महसूस करते हैं कि उपन्यास के उन तीन बुद्धिजीवी चरित्रों की मानवीयता, संवेदनशीलता, मन, उनके अंतर्विरोध ये सारी चीजें कहीं न कहीं लोगों से जुड़ती हैं. यह इसलिए भी कि जिस डर को उपन्यास फैंटेसी या कल्पना के रूप में रच रहा है, वह डर लोगों के मन में कहीं न कहीं मौजूद है.
इसी से जुड़ी एक और बात लेखकों की भूमिका को लेकर है कि पहले तीन बुद्धिजीवियों की हत्या, फिर कई को धमकी और हमले, जेएनयू व अन्य विश्वविद्यालयों की घटनाएं हुईं. ऐसे में क्या मानते हैं कि लेखक उस भूमिका में नहीं हैं जिसमें उन्हें होना चाहिए?
नहीं, ऐसा मैं नहीं मानता. लेखक की भूमिका यह नहीं है कि वह हर जगह सीधा हस्तक्षेप करेगा. कुल मिलाकर मुझे लगता है कि सभी भाषाओं के लेखकों ने अपनी बात कही. विरोधस्वरूप पुरस्कार भी लौटाए. जिन लेखकों ने पुरस्कार नहीं लौटाए, उनकी प्रतिबद्धता पर भी मैं संदेह नहीं करता. मिसाल के तौर पर राजेश जोशी और अरुण कमल ने नहीं लौटाया. काशीनाथ सिंह ने लौटाया, नामवर सिंह ने नहीं लौटाया, इससे नामवर सिंह और अरुण कमल कम लोकतांत्रिक नहीं हैं. न उनकी चिंताएं कम प्रामाणिक हैं. पिछले दो-तीन साल में बुद्धिजीवियों और लेखकों ने जैसी भूमिका निभाई है, वह उम्मीद की बड़ी किरण है. आप लेखक से ये उम्मीद मत कीजिए कि वह जाकर किसी पुलिस बंदोबस्त से टकराए, लाठी खाए और जेल जाए. लेखक का बतौर लेखक वह सब कहना मायने रखता है जो कहा जाना चाहिए.
(यह साक्षात्कार तहलका के 15 जून, 2016 के अंक में प्रकाशित हो चुका है.)

शुक्रवार, 27 मई 2016

धर्मनिरपेक्ष भारत के नायक: जवाहरलाल नेहरू

मैं जवाहर लाल नेहरू के देहांत के 22 साल बाद पैदा हुआ. जाहिर तब तक उनका युग समाप्त हो चुका था. जब मैं बच्चा ​था, उस समय भारतीय राजनीति में मंडल के काउंटर में कमंडल आ गया था और भारतीय राजनीति खून—खराबा करते हुए मंदिर बनवाने दौड़ पड़ी थी. जब मैं पढ़ने लगा तब तब गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष, भगत सिंह के बारे में जाना, उनका लिखा पढ़ा और उनके बारे में पढ़ा. अब सोचता हूं काश उस युग में मैं भी पैदा हुआ होता, जिनकी खींची लकीरें अबतक की सबसे बढ़ी लकीरें हैं. यह लेख दो साल पहले लिखा था.

 
भारतीय इतिहासकारों ने जवाहरलाल नेहरू का मूल्यांकन करते समय उन्हें आधुनिक भारत का शिल्पी कहा है. नेहरू की भूमिका को लेकर तमाम विवादों के बावजूद उनके बारे में यह कहना कहीं से भी अतिशयोक्ति नहीं है. वे बीसवीं सदी के भारत के अग्रणी जनवादी, मानवीय मूल्यों को तरजीह देने वाले और महान द्रष्टा थे. अपने समय में नेहरू नागरिक स्वतंत्रताओं के जबर्दस्त हिमायती थे और इसे उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे, जितना की आर्थिक समानता या समाजवाद को. हिंदुस्तान का निर्माण इस विचारधारा की बुनियाद पर टिका है कि आधुनिक हिंदुस्तान अनेक धर्मों, जातियों और संप्रदायों के बुनियादी अधिकार सुनिश्चित करता है, हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र नहीं हैं. नेहरू इस विचार के अग्रणी लोगों में से थे, जिनके प्रयास से हिंदुस्तान एक उदार और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में स्थापित हो सका. वे प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्मान, आत्मा की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता, तार्किकता, मानवता आदि के न सिर्फ हिमायती थे, बल्कि इसके लिए संघर्ष भी किया. अपने व्यक्तित्व में नेहरू बेहद उदार दृष्टिकोण रखते थे, जिसे उन्होंने भारतीय जनमानस में उतारने की कोशिश की. 1954 में उन्होंने सभी मुख्यमंत्रियों को लिखा—'यदि भारत को सचमुच वैसा महान बनाना है जैसा कि हम सब लोग चाहते हैं तो उसे न तो अंदर से और न ही बाहर से अलग—थलग होना चाहिए. उसे उन सभी चीजों का त्याग करना पड़ेगा जो उनकी आत्मा का चिंतन या सामाजिक जीवन के विकास में बाधक बन सकती हैं.'
नेहरू के धुर आलोचक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे महान लोकतांत्रिक मूल्यों वाले नेता थे। नेहरू ने तमाम मुश्किलें उठाकर धर्मनिरपेक्ष ढांचे की नींव रखी और उसकी पूरी शक्ति से हिफाजत भी की। वे ऐसे नेता थे जिन्होंने संसद में अपनी आलोचना करने वालों की भी वो पीठ थपथपाया करते थे। नेहरू एक समतावादी, न्यायोचित और जनवादी समाज—समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे. नागरिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता नेहरू के उच्च राजनीतिक मूल्यों में सर्वोपरि रहे. गांधी और मार्क्स के विचारों के उनपर व्यापक असर था और इन विचारों के अनुरूप उन्होंने एक समाजवादी राष्ट्र की स्थापना के लिए आजीवन कोशिश करते रहे.
नागरिक स्वतंत्रताओं के हिमायती नेहरू ने मार्च 1940 में लिखा—'प्रेस की आजादी का मतलब यह नहीं होता कि जो चीजें हम छपी हुई देखना चाहें, सिर्फ उन्हीं की अनुमति दें, इस तरह की आजादी से तो कोई अत्याचारी भी सहमत हो जाएगा. नागरिक स्वतंत्रताओं और प्रेस की आजादी का मतलब है कि हम जो चीज न चाहें उनकी भी अनुमति दें, अपनी आलोचना बर्दाश्त करें.' नेहरू की ख्याति एक ऐसे नेता के रूप में है जो तीखी आलोचनाओं का भी सम्मान करने की हिमायत करते थे.
कराची कांग्रेस का 1931 में मौलिक अधिकारों पर पारित प्रस्ताव नेहरू ने ही तैयार किया था उसमें अभिव्यक्ति तथा प्रेस के द्वारा अपनी राय व्यक्त करने और संगठन बनाने के अधिकार सुनिश्चित किए गए.उन्हीं के प्रयासों से 1936 में इंडियन सिविल लिबर्टीज यूनियन की स्थापना हुई. यह एक गैर—दलीय असांप्रदायिक संगठन था जिसका मकसद नागरिक अधिकारों पर होने वाले हमलों के खिलाफ जनमत तैयार करना था. इस संगठन की स्थापना के अवसर पर नेहरू ने कहा था—'जब नागरिक अधिकारों का दमन होता है तो राष्ट्र की तेजस्विता समाप्त हो जाती है और वह कोई भी ठोस काम करने लायक नहीं रह जाता.' भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने धीरे—धीरे लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की एक ऐसी विचारधारा एवं संस्कृति विकसित करने में सफलता प्राप्त की.  असहमति के प्रति सम्मान भाव, अभिव्यक्ति की आजादी, बहुमत के शासन का सिद्धांत और अल्पसंख्यक मतों के बने रहने के अधिकार की मान्यता जिसका आधार बने. इसमें नेहरू का उल्लेखनीय योगदान रहा कि नागरिक अधिकारों की सुरक्षा वाले लोकतंत्र की सहमति बन सकी. गांधी जी भी नागरिकों के अधिकारों के प्रति पूर्णतया कटिबद्ध थे जो आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. गांधी जी ने 1922 के यंग इंडिया में लिखा था—'हम अपने लक्ष्य की तरफ एक कदम भी बढ़ सकें, इससे पहले स्वतंत्र अभिव्यक्ति ओर संगठन के अधिकार को हमें हासिल करना चाहिए. हमें इन अधिकारों की रक्षा जान देकर भी करनी चाहिए.' इन नायाब मूल्यों ने भारत को उदार लोकतंत्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका अदा की.
इतिहासकार विपिन चंद्र अपनी किताब 'भारत का स्वतंत्रता संघर्ष' में लिखते हैं कि 'समाजवादी भारत के विजन को लोकप्रिय बनाने में जवाहरलाल नेहरू ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.उनका कहना था कि राजनीतिक आजादी जनता की आर्थिक मुक्ति के बिना बेकार है. 1930 के पूरे दशक में वे तत्कालीन राष्ट्रवादी विचारधारा की अपर्याप्तता की ओर संकेत करते रहे और उसपर बुर्जुआ विचारों के वर्चस्व की आलोचना करते रहे. उनका जोर इस बात पर था राष्ट्रीय आंदोलन में एक नई, समाजवादी—बुनियादी रूप से मार्क्सवादी—विचारधारा को प्रमुख स्थान दिया जाए, ताकि लोग अपनी सामाजिक स्थिति का वैज्ञानिक अध्ययन कर सकें और कांग्रेस को समाजवादी विचारधारा का वाहक बना सकें. इस मामले में 30 का दशक काफी अनुकूल साबित हुआ.'
नेहरू जिस विचारधारा का नेतृत्व कर रहे थे वह जनवाद, कानून का शासन, व्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान, सामाजिक समता, बुद्धिपरकता और नैतिकता पर टिका हुआ था.  उन्होंने आजीवन एकीकृत धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण के लिए संघर्ष किया, जहां पर हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का मूलभूत अधिकार प्राप्त हो. यह नेहरू ही थे, जिन्होंने हिंदुत्ववादी ताकतों को कभी सर नहीं उठाने दिया और धर्मनिरपेक्ष भारतीय राष्ट्र के विचार को मजबूती से आगे बढ़ाया. कहते हैं कि एक बार वह दिल्ली में मुसलमानों के इलाके की ओर बढ़ते तलवार लपलपाते सिखों के एक जुलूस के आगे तनकर खड़े हो गए थे और उन्हें ऐसी डांट लगाई कि सभी ने हथियार फेंक दिए।
गांधीजी ने जो स्वराज, गांवों और आखिरी आदमी के विकास की बात की, नेहरू ने उसे आगे बढ़ाया। उन्होंने इस बात को समझा कि आम आदमी के बिना स्वाधीनता की बात अधूरी है। इसलिए उन्होंने भूमि सुधार, कामगारों, कलाकारों, किसानों की सुरक्षा की बात की। उन्होंने घोषणा की कि भारत को एक वैज्ञानिक नजरिए की जरूरत है, जबकि महात्मा गांधी पुराने को पुनजीर्वित करने की ओर झुके हुए थे, नेहरू भविष्यदृष्टा थे। वे भारत को वैज्ञानिक सोच वाला आधुनिक राष्ट्र बनाना चाहते थे.
इसके लिए उन्होंने जरूरी मूल्यों की न सिर्फ वकालत की बल्कि उसे अपने जीवन में भी उतारा. लेखक और विचारक पीसी जोशी ने एक बार एक संस्मरण सुनाया. '1945 की गमिर्यों की बात है. नेहरू जी अंतिम बार अल्मोड़ा जेल में कारावास में थे। जेल में दूध पहुंचाने वाला मेरा जानकार था। एक दिन उसने हमें बताया कि नेहरू जी आज रिहा होने वाले हैं। हम कुछ बच्चे कौतूहलवश उन्हें देखने जा पहुंचे। जेल के करीब पहुंचे तो देखा वह अकेले चले आ रहे हैं। तब तक शायद कांग्रेस के लोग उन्हें लेने नहीं पहुंच पाए थे। हम अभिभूत होकर उन्हें देख रहे थे। तभी वह हमारे पास आए और बोले- 'क्या देख रहे हो? वह सामने मंदिर देखो, कितना सुंदर है। बताओ किसने बनाया उसे, वह किस देवता का मंदिर है। नहीं जानते तुम? जानना चाहिए। देश यहीं से शुरू होता है।' फिर उनकी नजर सामने हिमालय की धवल चोटियों की ओर गई। वह फिर हमें कहने लगे- 'तुम लोग बहुत सौभाग्यशाली हो, हम तो कश्मीर में पैदा हुए, मगर वहां से कट गए। तुम कितनी सुंदर जगह रहते हो। लेकिन यहां लोग गरीब हैं। उनके लिए बड़े होकर कुछ करोगे या नहीं?'
नेहरू के पास हिंदुस्तान के लिए एक ग्लोबल विजन था। वे भारत को आधुनिक जगत से जोड़ना चाहते थे इसलिए हिंदुस्तान की वैश्विक भूमिका की वकालत की. जब दुनिया दो महाशक्तियों—अमेरिका और रूस— में बंटी हुई थी और ये दोनों शक्तियां अपना वर्चस्व बनाने पर लगी थीं, नेहरू ने हर वैश्विक दबाव का मुकाबला किया और नवस्वतंत्र भारत को विदेशी प्रभाव से मुक्त रखा. अमेरिका या रूस की ओर रुझान रखने की जगह उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अगुआई की. उन्होंने दुनिया के सामने प्राचीन भारत की छवि तोड़कर नए भारत की छवि रखी। गांधीजी नेहरू के बारे में कहा था- 'मेरे बाद तुम्हें मेरी आवाज नेहरू में सुनाई देगी।' आज जब राजनीतिक तौर पर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर देश को हिंदू और मुसलमान में बांटने की कोशिश की जा रही है, नेहरू नई पीढ़ी के लिए 'विविधता में एकता' के विचार के लिए लड़ने वाले नायक की हैसियत से इतिहास पुरुष के रूप में अनुकरणीय हैं.

बुधवार, 25 मई 2016

सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ हो रही अभद्रता पर आग़ाज़ सांस्कृतिक मंच का बयान

महिला अधिकार कार्यकर्ता कविता कृष्णन के एक बयान के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह का तूफ़ान मचा हुआ है वह हमारे पितृसत्तात्मक समाज की लाइलाज़ हो चली बीमारी का घिनौना आईना है.यह एक ऐसा समाज है जिसमें सेक्स एक तरफ़ टैबू है तो दूसरी तरफ़ बलात्कार धीरे-धीरे अपवाद से नियम सी बनती जा रही कार्यवाही. जहाँ एक तरफ़ लोग यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते कहते नहीं अघाते वहीँ दूसरी तरफ़ माँ-बहन की गालियाँ भाषा का अभिन्न हिस्सा हैं. दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों के बीच महिला अधिकारों की बात करने वाली, साम्प्रदायिकता का विरोध करने वाली और आधुनिक जीवन मूल्यों का समर्थन करने वाली महिलाओं के लिए यही गालियाँ हैं और बलात्कार की धमकी. चाहे वह कांग्रेसी प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी हों या फिर वाम कार्यकर्ता कविता कृष्णन, सोशल मीडिया पर उन्हें यह सब सुनना पडा है, बार-बार सुनना पड़ा है. सबसे पहले हम अपने मंच की ओर से इन बहादुर महिलाओं और ऐसी तमाम दूसरी महिलाओं को सलाम पेश करते हैं और उनके संघर्ष में बिरादराना भागीदारी का अहद करते हैं.

फ्री सेक्स को लेकर कविता का बयान एकदम स्पष्ट था. उनकी माँ ने जिस बहादुरी से उस पर आई एक घटिया टिप्पणी का जवाब दिया, वह स्तुत्य है और महिला अधिकारों के संघर्ष की मज़बूत नींव की तरफ इशारा करता है जो चंद बददिमाग, बीमार और कुंठित लोगों के हमलों से झुकाने वाला नहीं. वहीँ इस पर ख़ुद को पत्रकार कहने वाले सुमंत भट्टाचार्य जैसे व्यक्ति का बयान उस कुत्सित पुरुषवादी सोच का परिचायक है जो सीधे मनु स्मृति से संचालित होता है. उस सोच का जो स्त्री को देह से इतर नहीं देखता, उस सोच का जो देवी और वैश्या की बाइनरी गढ़ता है. हम माननीय न्यायालय पर पूरा भरोसा करते हैं और हमें यक़ीन है कि कविता द्वारा दर्ज किये गए मुक़दमे के तहत इस व्यक्ति को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलेगी.

मुक्त स्त्री हमेशा से परम्परावादियों की आँखों में रेत की तरह चुभती है. वे इंद्र की पूजा करते हैं और अहिल्या को पत्थर बना देते हैं. उन्हें यह समझ नहीं आयेगा कि बलात्कारी इंद्र का छल से किया सेक्स किस तरह अन-फ्री सेक्स था. किस तरह राजाओं के हरम में क़ैद महिलाओं के साथ हुआ सेक्स 'अन-फ्री' सेक्स था. किस तरह धर्म के नाम पर हिन्दुस्तान से अरब तक में हुए बेमेल विवाहों के फलस्वरूप हुआ सेक्स 'अन फ्री' सेक्स था/है. स्त्री की योनि और कोख के नियंत्रण के लिए पितृसत्ता ने उसके साथ जो भयावह अत्याचार किये हैं, स्त्री मुक्ति आन्दोलन उसे हमेशा हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए वचनबद्ध है और हम एक वामपंथी के रूप में उसके इस संघर्ष में हमेशा साथ हैं, सहभागी हैं, कॉमरेड इन आर्म्स हैं. हम मानते हैं कि अपने लिए पार्टनर चुनने का अधिकार पुरुष ही नहीं स्त्री का भी मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार है. पूँजीवादी बाज़ार की अराजकता और उसकी कोख से पैदा हुआ सेक्स ट्रेड, पोर्न जिसका ज़रूरी हिस्सा है, फ्री सेक्स नहीं केवल सेक्स ट्रेड है, जहां देह बिकने और ख़रीदे जाने वाली कमोडिटी में तब्दील कर दी जाती है. मुक्त प्रेम केवल एक मुक्त समाज में संभव है, उसे समझने और उसका सम्मान करने के लिए सबसे मूलभूत ज़रुरत है - लोकतांत्रिक विचार. जहाँ विवाह दो व्यक्तियों के प्रेम और सहकार से सहजीवन आरम्भ करने की जगह दो परिवारों के धार्मिक-जातीय-आर्थिक संस्कारों के तहत किये गए अनुबंध हों और अपने होने के साथ हर हाल में जीवन भर चलते जाने के नियम से बंधे हों, वहां पुरुष और स्त्री के बीच बराबरी के सम्बन्ध असंभव हैं. इसलिए बराबरी की यह लड़ाई आज सभी धर्मों और धार्मिक संस्थाओं, मध्यकालीन नियमावलियों, पितृसत्तात्मक परम्पराओं और आर्थिक गैर बराबरी की लड़ाई है.

आग़ाज़ सांस्कृतिक मंच इस लड़ाई में भागीदार सभी संगठनों, फ़ोरमों और व्यक्तियों की आवाज़ में अपनी आवाज़ शामिल करता है.  

शनिवार, 21 मई 2016

मेरे देश की स्त्रियां

नारियों को पूजने वाले देश में
कैसी होती हैं स्त्रियां
मेरे महान देश की स्त्रियां
मेरे देश को कैसी लगती हैं
मैं झांकता हूं बारी-बारी
हर एक मन में, चाहता हूं देखना
पंद्रह बरस से अनशनरत एक स्त्री
नाक में नली, बिखरे बाल
आंखें भरीं, कातर निगाह
सालों से चीख रही है
मत करो अब मेरी बेटियों का बलात्कार
मत मारों मेरे बेटों को
मत बनाओ मेरी छाती पर हजारों गुमनाम कब्रें
मेरे देश को कैसी लगती है वह स्त्री?
कैसी लगती है वह स्त्री
जिसका शिकार खेलने गया पति कभी नहीं लौटा
घर से थाने, थाने से घर
दौड़ रही यंत्रवत, जैसे कोल्हू का बैल
पति को ढूंढते हुए एक दिन
रौंदा दिया गया उसका गर्भ सैनिक बूटों से
उस स्त्री की छत-विछत लाश
मेरे देश को कैसी लगती है?
भारत माता की झांकी निकाले युवकों को
कैसी लगती है वह स्त्री
थाने के बाहर बैठी पति की लाश लिए
चीखती है- न्याय दो
दुख के पहाड़ ढोने में भूल गई है
अपनी लुटी हुई अस्मिता पर चीखना
कैसी लगती होगी वह स्त्री
जो नुची हुई पड़ी है सड़क किनारे
या किसी पर रखी टंकी में
दिल्ली पहुंचकर उसकी चीख
बदल जाती है अश्लील सियासत में
कोई अगली स्त्री फिर गुजरती है उसी सड़क से
सड़कों से गुजरतीं सहमी स्त्रियां
मेरे देश को कैसी लगती हैं?
मैं पंद्रह बरस से अनशनरत स्त्री हूं
गुमनाम कब्र में दफन एक स्त्री का बेटा हूं
बलत्कृत हुई एक स्त्री का स्वत्व हूं
थाने के बाहर बैठी एक स्त्री के पति की लाश हूं
नोच दी गई एक स्त्री की मांसपेशी हूं
व्यस्त सड़क से गुजरती हुई सहमी स्त्री हूं
मैं स्त्रीरूप, मेरे देश को कैसा लगता हूं?

रविवार, 15 मई 2016

मुठभेड़ चाल

कभी कानून व्यवस्था के लिए खतरा बने कुख्यात अपराधियों से निपटने के लिए अंजाम दी जाने वाली मुठभेड़ की कार्रवाई गैर-कानूनी हत्याओं के एक ऐसे खेल में बदल गई है जो अधिकारियों के लिए पद, पैसा और प्रशंसा बटोरने का जरिया बन गई. क्या मुठभेड़ के नाम पर भारतीय कानून ऐसी हत्याओं की इजाजत देता है?


सीबीआई कोर्ट ने 25 साल पहले पीलीभीत में हुए 10 सिखों के फर्जी एनकाउंटर में 47 पुलिसकर्मियों को दोषी पाया है. फर्जी एनकाउंटर तो हमारे देश में आम बात है, लेकिन बहुत कम मामले ऐसे हैं जिनमें फर्जी एनकाउंटर करने वाले पुलिसकर्मियों या सैन्यकर्मियों को सजा हुई हो. हो सकता है कि एनकाउंटर कभी ऐसे अपराधियों को ठिकाने लगाने का हथियार रहा हो जो कानून-व्यवस्था और जनता के लिए खतरा बने, लेकिन साथ-साथ यह विरोधियों को ठिकाने लगाने और राजनीतिक बदला लेने या अंडरवर्ल्ड के इशारे पर किसी को निपटाने का भी जरिया बना. बीहड़ों के डकैत और अंडरवर्ल्ड के लोग, जो कानून व्यवस्था के लिए मुसीबत बने हुए थे, उनके खात्मे से शुरू हुई पुलिस मुठभेड़ की कार्रवाई बहुत जल्द ही पुलिस अधिकारियों के लिए  पद-पैसे में बढ़ोतरी और प्रशंसा बटोरने का खेल बन गई. पिछले दो-तीन दशकों में कई ऐसे एनकाउंटर के मामले चर्चित हुए जो पहले पुलिस के दावे से अलग फर्जी एनकाउंटर या कहें पुलिस द्वारा की गई गैर-कानूनी हत्या साबित हुए.
उत्तर प्रदेश फर्जी एनकाउंटर के मामले में सबसे अव्वल है. अगस्त 2009 में लखनऊ में ह्यूमन राइट्स वॉच ने ‘ब्रोकेन सिस्टम, डिस्फंक्शनल एब्यूज ऐंड इम्प्यूनिटी इन इंडियन पुलिस’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की थी. रिपोर्ट की शुरुआत में एक पुलिस अधिकारी का कबूलनामा था, ‘इस हफ्ते मुझे एक एनकाउंटर करने को कहा गया है. मैं उसकी तलाश कर रहा हूं. मैं उसे मार डालूंगा. हो सकता है कि मुझे जेल भेज दिया जाए लेकिन यदि मैं ऐसा नहीं करता तो मेरी नौकरी चली जाएगी.’ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2010 से 2015 के बीच देश में सबसे ज्यादा फर्जी एनकाउंटर उत्तर प्रदेश में हुए. इस दौरान यूपी में लगभग 782 फर्जी एनकाउंटर की शिकायतें दर्ज कराई गईं. वहीं, दूसरे नंबर पर आंध्र प्रदेश रहा, जहां सिर्फ 87 फर्जी एनकाउंटर की शिकायतें आईं. आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी के मुताबिक, इन 782 मामलों में से 160 मामलों में यूपी सरकार ने पीड़ित परिवार को लगभग 9.47 करोड़ रुपये मुआवजा भी दिया. वहीं, इस दौरान पूरे देश में कुल 314 शिकायतों में मुआवजे दिए गए. यूपी और आंध्र प्रदेश के बाद तीसरा नंबर बिहार और चौथा असम का रहा. जहां इस दौरान बिहार में 73 फर्जी एनकाउंटर के मामले आए तो असम में 66 मामले दर्ज हुए. इसके अलावा जुलाई 2014 में गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने बताया था कि साल 2011 से 2014 के बीच 185 फर्जी मुठभेड़ के केस पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज हुए थे. इनमें सबसे ज्यादा यूपी में 42 केस और इसके बाद झारखंड में 19 केस दर्ज हुए हैं. आंकड़ों के मुताबिक, 2006 में भारत में मुठभेड़ों में हुई कुल 122 मौतों में से 82 अकेले उत्तर प्रदेश में हुईं. 2007 में यह संख्या 48 थी जो देश में हुई 95 मौतों के 50 फीसदी से भी ज्यादा थी. 2008 में जब देश भर में 103 लोग पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए तो उत्तर प्रदेश में यह संख्या 41 थी. 2009 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 83 लोगों को मुठभेड़ों में मारकर अपने ही पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए.
उत्तर प्रदेश के भदोही में 2005 में हुई एक फर्जी मुठभेड़ के केस में 28 पुलिसकर्मियों के विरुद्ध मामला दर्ज हुआ था. सीआईडी जांच में पाया गया कि 5000 रुपये के इनामी बदमाश विजय उर्फ लल्लू उर्फ बुद्धसेन को पुलिस ने मार गिराया था. पुलिस ने इसे मुठभेड़ दिखाया लेकिन बाद में इसे फर्जी पाया गया. जिन 28 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया, उनमें से पांच बाद में थाना प्रभारी भी बन गए.
पीलीभीत फर्जी एनकाउंटर मामले के पहले भी एनकाउंटर की कई ऐसी घटनाएं सामने आईं जो फर्जी साबित हुईं. दिसंबर 2015 में सीबीआई की विशेष अदालत ने मेरठ के दौराला के एक जंगल में फर्जी मुठभेड़ मामले में तीन सेवानिवृत्त अधिकारियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इस घटना में मेरठ कॉलेज की एक 20 साल की छात्रा स्मिता भादुड़ी की 14 जनवरी, 2000 को मेरठ के सिवाया गांव के पास फर्जी मुठभेड़ में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. अतिरिक्त जिला न्यायाधीश नवनीत कुमार ने सेवानिवृत्त पुलिस उपाधीक्षक अरुण कौशिक, कांस्टेबल भगवान सहाय और सुरेंद्र कुमार को हत्या का दोषी पाया था.
जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के माछिल सेक्टर में अप्रैल 2010 में एक फर्जी मुठभेड़ का मामला सामने आया था. इस मामले में सेना ने 2015 में एक कर्नल रैंक अधिकारी समेत छह जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. कर्नल दिनेश पठानिया, कैप्टन उपेंद्र, हवलदार देवेंद्र कुमार, लांस नायक लखमी, लांस नायक अरुण कुमार और राइफल मैन अब्बास हुसैन ने तीन आतंकियों को मारने का दावा किया था. मरने वालों की तस्वीर सामने आने के बाद काफी विवाद हुआ. मरने वालों के परिजनों ने दावा किया कि वे तीनों सामान्य नागरिक थे, जिनको फर्जी मुठभेड़ में मारा गया. उनकी पहचान  बारामूला जिले के नदीहाल इलाके के रहने वाले मोहम्मद शाफी, शहजाद अहमद और रियाज अहमद के रूप में की गई. इस घटना के बाद पूरी कश्मीर घाटी में अशांति फैल गई. बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए जिसमें 123 लोग मारे गए थे. पुलिस जांच में साबित हुआ कि तीनों नागरिकों को नौकरी का झांसा देकर सीमा पर ले जाया गया जहां उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया. इस मुठभेड़ का मकसद इनाम और प्रमोशन पाना था. सेना ने जनरल कोर्ट मार्शल का आदेश दिया तो छह जवान दोषी पाए गए.
अप्रैल 2015 में आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु सीमा पर तिरुपति के पास आंध्र प्रदेश के सेशाचलम के जंगल में एसटीएफ ने 20 लोगों को मार गिराया. एसटीएफ ने दावा किया कि ये सभी दुर्लभ लाल चंदन की लकड़ियों की तस्करी से जुड़े थे, लेकिन बाद में जो तस्वीरें और तथ्य सामने आए वे विरोधाभासी थे. मारे गए लोगों के परिजनों ने दावा किया कि वे सभी मजदूर थे जिनकी गलत तरीके से हत्या की गई. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इस एनकाउंटर पर सवाल उठाए थे. इसी दौरान अप्रैल 2015 में तेलंगाना के वारांगल जिले में पुलिस ने पांच ऐसे लोगों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया जो न्यायिक हिरासत में थे. पुलिस के मुताबिक वारंगल सेंट्रल जेल से हैदराबाद कोर्ट ले जाते समय कैदियों ने हथियार छीनने की कोशिश की और पुलिस कार्रवाई में मारे गए. इन पांचों पर एक स्थानीय आतंकी संगठन से जुड़े होने का आरोप था. जिस वक्त इन्हें मारा गया, सभी कैदियों के हाथ में हथकड़ियां लगी थीं. इस एनकाउंटर पर भी सवाल उठे थे.
भारत में पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा नक्सलियों, कुख्यात अपराधियों और बीहड़ के डकैतों को फर्जी मुठभेड़ों में मारे जाने का इतिहास काफी पुराना है. इसका चलन साठ के दशक में शुरू हुआ जब पुलिस ने बीहड़ों के डाकुओं के खिलाफ अभियान चलाए. सीधी मुठभेड़ में कुख्यात डाकुओं के मारे जाने के बाद आॅपरेशन को अंजाम देने वाले अधिकारी को राज्य सरकारों द्वारा पुरस्कार और पदोन्नति मिलती थी. बाद में सामने आया कि इन मुठभेड़ों में कुख्यात अपराधियों के अलावा कई निर्दोष लोग फर्जी तरीके से मारे गए. 20वीं सदी के आखिरी वर्षों में और नई सदी के पहले दशक में मानवाधिकार संगठनों ने इन मुठभेड़ों और गैर-कानूनी हत्याओं पर चिंताएं जाहिर करनी शुरू कीं. इसके पहले ये एनकाउंटर एक तरह से जायज माने जाते रहे. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का मानना है कि राज्यों में होने वाली फर्जी मुठभेड़ों में से ज्यादातर को पुलिस अंजाम देती है, सेना की ओर से ऐसी कार्रवाइयां कम सामने आती हैं.
मुंबई में 1990 के दशक में संगठित अपराध खत्म करने के लिए धड़ाधड़ एनकाउंटर हुए और ऐसे अधिकारियों को ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के तमगे से नवाजा गया. पुलिस का कहना था कि एनकाउंटर करके वह न्याय प्रक्रिया में तेजी ला रही है. जनवरी, 1982 में मान्या सुर्वे नामक कुख्यात गैंगस्टर को पुलिस ने वडाला इलाके में मार गिराया. इसे मुंबई पुलिस के पहले एनकाउंटर के रूप में दर्ज किया गया. इसके बाद 2003 तक मुंबई पुलिस ने करीब 1200 एनकाउंटर किए. मुंबई पुलिस के कई अधिकारी एनकाउंटर  स्पेशलिस्ट के तौर पर पहचाने गए. जैसे इंस्पेक्टर प्रदीप शर्मा के नाम 104 एनकाउंटर करने का तमगा है. उनका कहना था, ‘अपराधी गंदगी हैं और मैं सफाईकर्मी हूं.’ शर्मा को राम नारायण गुप्ता एनकाउंटर केस में 2009 में सस्पेंड किया गया था, बाद में 2013 में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया. इसी तरह सब इंस्पेक्टर दया नायक ने 83 एनकाउंटर किए, जिन पर ‘अब तक छप्पन’ फिल्म बनी थी. इंस्पेक्टर प्रफुल्ल भोंसले के नाम 77, इंस्पेक्टर रवींद्रनाथ अंग्रे के नाम 54, असिस्टेंट इंस्पेक्टर सचिन वाजे के नाम 63 और इंस्पेक्टर विजय सालस्कर के नाम 61 एनकाउंटर केस दर्ज हैं. इंस्पेक्टर विजय सालस्कर 2008 में मुंबई आतंकी हमले में मारे गए थे.
हालांकि बाद में न्याय की इस थ्योरी पर सवाल उठना शुरू हुआ. अदालतों ने इस पर नकारात्मक टिप्पणियां कीं. कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आईं कि पुलिसवालों ने अंडरवर्ल्ड से पैसे लेकर किसी व्यक्ति की फर्जी एनकाउंटर में हत्या की. एक मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि ‘पुलिस अब जनता की रक्षक न होकर एक पेशेवर कातिल बन चुकी है.’ महाराष्ट्र में 2006 में हुए लखन भैया फर्जी मुठभेड़ मामले में 11 पुलिसकर्मियों को मुंबई सत्र अदालत ने जुलाई 2013 में दोषी करार दिया था.
हाल के वर्षों में रणवीर फर्जी एनकाउंटर मामला काफी चर्चित रहा था. जुलाई 2009 में गाजियाबाद का रणवीर, जो एमबीए का छात्र था, अपने अपने एक दोस्त के साथ नौकरी के लिए इंटरव्यू देने व घूमने के लिए देहरादून गया था. उत्तराखंड पुलिस ने उसे बदमाश बताकर देहरादून स्थित लाडपुर के जंगल में एनकाउंटर में मार गिराया. उत्तराखंड सरकार ने एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मियों को सम्मानित भी किया. रणवीर के शरीर में 29 गोलियों के निशान पाए गए, जिनमें से 17 गोलियां करीब से मारी गई थीं. बहुत हंगामे के बाद में राज्य सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपते हुए इसे दिल्ली स्थानांतरित कर दिया. सीबीआई जांच में पाया गया कि यह एनकाउंटर फर्जी था. जून 2014 में दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 17 पुलिसकर्मियों को अपहरण, हत्या की साजिश और हत्या के जुर्म में उम्रकैद और एक पुलिसकर्मी को दो साल की सजा सुनाई.
राजस्थान पुलिस की एसओजी टीम ने अक्टूबर 2006 में एक संदिग्ध डकैत दारा सिंह को मार गिराया. पुलिस ने उस पर 25 हजार का इनाम रखा था. पुलिस ने दावा किया कि हत्या और स्मगलिंग के केस में बंद दारा सिंह ने हिरासत से भागने की कोशिश की तो एनकाउंटर में मारा गया. दारा सिंह की पत्नी सुशीला की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया. सीबीआई ने 2011 में जांच पूरी करके 16 लोगों के खिलाफ चार्जशीट तैयार की. इसमें तत्कालीन एडिशनल डीजीपी, एसपी, एडिशनल एसपी, सात सब इंस्पेक्टर और तीन कॉन्स्टेबल भी शामिल थे. इस केस की सुनवाई करते हुए जस्टिस मार्कंडेय काटजू और सीके प्रसाद की बेंच ने सभी आरोपियों की गिरफ्तारी का आदेश देते हुए कहा था, ‘पुलिस को कानून का संरक्षक माना जाता है और यह आशा की जाती है कि वह लोगों की जान की सुरक्षा करेगी, न कि उनकी जान ही ले लेगी. पुलिस द्वारा की जाने वाली फर्जी मुठभेड़ अमानवीय हत्या के अलावा कुछ नहीं है, जिसे रेयरेस्ट ऑफ द रेयर अपराध माना जाएगा. फर्जी मुठभेड़ों में संलिप्त पुलिसवालों को फांसी पर लटका देना चाहिए.’
गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान कई एनकाउंटर हुए जो विवादों में रहे. एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, 2002 से 2007 के बीच गुजरात में 31 फर्जी  एनकाउंटर हुए. फर्जी एनकाउंटर को लेकर गुजरात के कुल 32 पुलिस अधिकारी जेल गए, जिनमें से ज्यादातर अभी तक जेल में हैं. इन अधिकारियों में पांच आईपीएस अफसर भी शामिल हैं. हाल ही में गुजरात के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट, 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी डीजी वंजारा नौ साल बाद गुजरात पहुंचे तो उनका भव्य स्वागत किया गया. वे 2007 में गिरफ्तार किए गए थे. 2015 में जमानत मिली, लेकिन सीबीआई कोर्ट ने उनके गुजरात में प्रवेश पर रोक लगा रखी थी. बाद में कोर्ट ने यह रोक हटा ली. वंजारा 2002 से 2005 तक अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस थे. इस दौरान राज्य में करीब बीस लोगों का एनकाउंटर हुआ. बाद में जब सीबीआई जांच हुई तो पता चला कि इनमें से कई एनकाउंटर फर्जी थे. वंजारा के बारे में कहा जाता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत करीबी थे. 2007 में गुजरात सीआईडी ने उन्हें गिरफ्तार किया और जेल भेजा. उन पर सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौसर बी, तुलसीराम प्रजापति, सादिक जमाल, इशरत जहां समेत आठ लोगों की हत्या का आरोप है. इन सभी एनकाउंटरों के बाद गुजरात क्राइम ब्रांच ने दावा किया था कि ये सभी पाकिस्तानी आतंकी थे और गुजरात के मुख्यमंत्री को मारना चाहते थे, लेकिन बाद में कोर्ट के आदेश पर सीबीआई जांच में साबित हुआ कि ये सभी एनकाउंटर फर्जी थे.
इशरत जहां एनकाउंटर केस 15 जून, 2004 को अहमदाबाद में हुआ था. इसमें 19 वर्षीय इशरत के साथ जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लै, अमजद अली, अकबर अली राणा और जीशान जौहर मारे गए थे. इस मामले में पृथ्वीपाल पांडेय (पीपी पांडेय) व जीएल सिंघल समेत सात अधिकारियों को सीबीआई ने चार्जशीट में अभियुक्त बनाया था. बाद में जीएल सिंघल ने यह कहते हुए इस्तीफा भी दिया था कि सरकार उनका बचाव नहीं कर रही, जबकि उन्होंने क्राइम ब्रांच में रहते हुए जो भी किया, वह सब सरकार के दिशा-निर्देश पर किया.
पीपी पांडेय 1982 बैच के अधिकारी हैं जो 2003 में अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के मुखिया बने. उनकी अगुवाई में क्राइम ब्रांच ने 11 कथित आतंकियों को मुठभेड़ों में मार गिराया. इन मुठभेड़ों में कई के फर्जी होने के आरोप लगे. इनमें से इशरत जहां मुठभेड़ भी शामिल है. सीबीआई का दावा था कि पांडे ने इंटेलीजेंस ब्यूरो के अफसरों के साथ मिलकर इस कथित फर्जी मुठभेड़ की ‘साजिश’ रची. अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित किया. बाद में उन्होंने आत्मसमर्पण किया था. फरवरी 2016 में सीबीआई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद उन्हें फिर से बहाल करके अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) बनाया गया. अप्रैल में उन्हें गुजरात पुलिस का प्रभारी महानिदेशक बनाया गया.
हाल में पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई ने एक इंटरव्यू में कहा कि इशरत मामले में दूसरा हलफनामा गृह मंत्री पी चिदंबरम के कहने पर बदला गया था. इसी बीच गृह मंत्रालय के एक मौजूदा अधिकारी आरवीएस मणि ने आरोप लगाया कि इशरत मुठभेड़ के मामले में हलफनामा बदलवाने के लिए सतीश वर्मा ने उन पर दबाव बनाया और प्रताड़ित किया. गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी सतीश वर्मा इशरत जहां एनकाउंटर की जांच करने वाली कोर्ट की गठित उस एसआईटी के सदस्य थे. वर्मा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा, ‘ये पूरा आईबी नियंत्रित ऑपरेशन था. चार लोगों को पकड़ा गया. इनमें से दो के बारे में आईबी को जानकारी थी कि वे संभवत: लश्कर-ए-तैयबा के सदस्य थे. इन सभी पर आईबी और गुजरात पुलिस की नजर थी और फिर ये लोग कथित मुठभेड़ में मार दिए गए. ये पूरा ऑपरेशन बड़ा कामयाब था. लेकिन साथ ही फर्जी भी था.’
26 नवंबर, 2005 को सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस हुआ. सोहराबुद्दीन शेख पर हत्या, उगाही करने और अवैध हथियारों का धंधा चलाने जैसे 60 आपराधिक मामले चल रहे थे. 23 नवंबर को वह अपनी बीवी कौसर बी के साथ हैदराबाद से महाराष्ट्र जा रहा था तभी गुजरात एटीएस ने दोनों को उठा लिया. तीन दिन बाद पुलिस हिरासत में ही सोहराबुद्दीन का एनकाउंटर कर दिया गया. आरोप है कि कौसर बी को भी मारकर अधिकारी डीजी वंजारा के गांव में दफना दिया गया. इस घटना के करीब एक साल बाद सोहराबुद्दीन के सहयोगी तुलसी प्रजापति का भी एनकाउंटर हो गया. इस एनकाउंटर को लेकर भाजपा नेता और गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह पर आरोप लगे कि यह एनकाउंटर उनके कहने पर किया गया है. अमित शाह को जेल भी जाना पड़ा था. इन मुठभेड़ों में जेल जाने वाले वंजारा ने भी दावा किया था कि ‘गृहमंत्री अमित शाह ने कई लोगों के एनकाउंटर का आदेश दिया था.’ 2014 में विशेष कोर्ट ने अमित शाह के खिलाफ आरोप खारिज कर दिए.
सितंबर 2008 में दिल्ली के बाटला हाउस में पुलिस ने दो संदिग्ध आतंकियों को मारने का दावा किया. दो आतंकी पकड़े गए थे और एक भागने में सफल रहा था. इस मुठभेड़ में एक इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा भी मारे गए. जामा मस्जिद के शाही इमाम समेत मानवाधिकार संगठनों से इस एनकाउंटर को फर्जी बताया और जांच की मांग की. हालांकि, जांच के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अाैर अदालत ने फर्जी एनकाउंटर के आरोप को खाारिज कर दिया.
हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ में कई ऐसे मामले सामने आए जब पुलिस-नक्सल मुठभेड़ को लेकर सवाल उठे. पुलिस का दावा है कि उसने नक्सली मारे लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि पुलिस ग्रामीण आदिवासियों को नक्सली बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार रही है. कुछ दिनों पहले प्रदेश कांग्रेस ने जनाक्रोश रैली की जो इसी मसले पर थी. इस रैली में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल ने कहा, ‘चिड़िया मारने वाली बंदूक रखने वाले आदिवासियों को 5 से 10 लाख तक का इनामी नक्सली बताकर पुलिस झूठी मुठभेड़ में उन्हें मार रही है. पुलिस को नक्सलियों को मारना ही है तो पहले ऐसे आरोपियों के नाम और पहचान की सूची उजागर करे जो सभी थानों में सहज सुलभ हो. बस्तर में फर्जी मुठभेड़ का खेल खेलकर पुलिस झूठी वाहवाही ले रही है. बेकसूर आदिवासियों को या तो जेल में ठूंसा जा रहा है या मार दिया जाता है.’
उत्तर प्रदेश पुलिस में अतिरिक्त महानिदेशक रह चुके एसआर दारापुरी कहते हैं, ‘राजनीति में अपराधी तत्वों का बढ़ता प्रभाव कथित फर्जी मुठभेड़ों के पीछे एक बड़ा कारण है. जो राजनेता सत्ता में हैं, उनके लिए काम करने वाले अपराधियों को संरक्षण मिलता है जबकि उनके विरोधियों के लिए काम करने वाले अपराधियों को खत्म करने के लिए पुलिस को औजार बनाया जाता है. कई मामलों में पुलिस सत्तारूढ़ राजनेताओं को खुश करने के लिए, पदोन्नति और शौर्य पदकों के लिए भी ऐसी कार्रवाइयां करती है.’
जब अपराधियों को सजा देने के लिए पुलिस, कानून और अदालतें मौजूद हैं तो किसी को कानून से परे जाकर मारने की प्रक्रिया क्यों अपनाई जाती है, इसके जवाब में पूर्व अधिकारी प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘फर्जी एनकाउंटर के मामले इसलिए होते हैं कि सारा समाज चाहता है कि इस तरह के एनकाउंटर हों. आपको सुनकर अजीब लगेगा, लेकिन सारा समाज चाहता है. उसका कारण यह है कि समाज में कुछ ऐसे अराजक तत्व या जघन्य अपराधी हैं जिनको कानून नहीं पकड़ पाता है. अगर पकड़ता भी है तो जमानत हो जाती है. मुकदमे 20 साल चलते हैं. तब तक गवाह टूट जाते हैं. लोग कहते हैं कि इनको मारो और खत्म करो. नेता चुपचाप पुलिस के कान में कहता है कि मारो और खत्म करो. जनता भी कहती है कि वाह-वाह, जान छूटी. ऐसे बदमाश से छुट्टी मिली. मुख्य कारण तो यह है कि लोग चाहते हैं और खुलकर कोई नहीं कहता है. दूसरे, हमारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम इतना विलंब से काम करता है, कछुए की चाल चलता है कि इस तरह की कार्रवाई को सामाजिक मान्यता मिली हुई है. अब आप कह रहे हैं कि इसकी वजह से कई निर्दोष लोग मारे जाते हैं, यह भी सही है. जब आप इस तरह की छूट दीजिएगा तो जाहिर है कि पुलिस इसका दुरुपयोग करेगी और करती भी है.’
रिहाई मंच संगठन से जुड़े वकील मोहम्मद शोएब कहते हैं, ‘कानून फर्जी एनकाउंटर की इजाजत बिल्कुल नहीं देता है. पुलिस एनकाउंटर के मसले में किसी भी तरह से नियमों का पालन नहीं करती है. पुलिस को ऐसा कोई अधिकार ही नहीं है. हां, पुलिस को अगर अपनी जान का खतरा है तो वह किसी को मार सकती है. लेकिन जानबूझकर किसी को मारा जाए, तो यह कानूनन गलत है. जिस व्यक्ति से उनको जान का खतरा नहीं है, उसे भी मार देना गलत है. ज्यादातर एनकाउंटर में पुलिस लोगों को पहले से पकड़ती है, बाद में मार देती है और उसे दिखाती है कि यह एनकाउंटर में मारा गया. एनकाउंटर के बाद उस मसले की जांच तभी होती है जब कोई शिकायत आती है, वरना तो पुलिस के दावे को ही मान लिया जाता है. पुलिस कहती है कि फलां आदमी मुठभेड़ में मारा गया, और इसे ही सच मान लिया जाता है. फर्जी एनकाउंटर के बाद भी अगर कोई इस मसले को उठाता है तो उसे इतना डरा दिया जाता है कि वह चुपचाप बैठ जाए.’
प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘इसका एक ही उपाय है कि आपका क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम इतना प्रभावशाली हो कि जघन्य अपराध में भी एक आदमी को दो साल में सजा हो जाए. 20 साल न चले मुकदमा, इसका और कोई उपाय नहीं है. इसके लिए पुलिस सुधार चाहिए. न्यायिक व्यवस्था में सुधार चाहिए. जमानत के प्रावधानों में सुधार चाहिए. मामलों का जल्दी से निस्तारण हो. चार्जशीट 60 दिन में फाइल हो जाती है. दो साल में मामले का निस्तारण हो जाना चाहिए. अभी तो लोगों को सिस्टम में विश्वास ही नहीं है कि आदमी पकड़ा तो गया, लेकिन उसको सजा कहां होगी. शहाबुद्दीन ज्वलंत उदाहरण हैं. उन्होंने जेएनयू के प्रेसिडेंट चंद्रशेखर की हत्या करवा दी. अभी तक उन्हें कोई दंड नहीं मिला, उल्टा वे पार्टी की नेशनल एक्जिक्यूटिव के सदस्य हो गए. इसका मतलब उनको राजनीतिक संरक्षण हासिल है. न्यायिक तंत्र से सजा भी नहीं हो पाती है. ऐसे लोगों के लिए क्या उपाय है. हर कोई यही चाहेगा कि ऐसे लोग न रहें तो अच्छा है. समाज के पाप और व्यवस्था के निकम्मेपन की गठरी पुलिस अपने सर पर ढोती है.’
(तहलका, 30 अप्रैल, 2016 के अंक में प्रकाशित)

पत्रकारों की स्वामिभक्ति और उनकी हत्याएं

मीडिया में अब संपादक नहीं हैं. कुछ एक संस्थानों को छोड़ दें तो संपादक का पद ही खत्म हो गया है. मैं अपने सात साल के कॅरियर में दो-एक ही ऐसे लोगों को जानता हूं जो संपादकीय कुर्सी पर बैठकर अपने सहकर्मियों का साथ देते हैं. ज्यादातर मीडिया घरानों में सीईओ नाम का कॉरपोरेट दलाल बैठा है. पत्रकार फील्ड में रिपोर्टिंग करते हुए कहीं फंस जाए तो ये उसका साथ देने की जगह कह देते हैं कि यह हमारा नहीं है. पत्रकार अपना खून पसीना बहाए अखबार के लिए और उसके मरने पर अखबार या चैनल उसे अपना कहने से इनकार कर देते हैं. इसके बावजूद पत्रकार कभी संस्थानों पर सवाल नहीं उठाते क्योंकि उन्हें किसी भी सूरत में नौकरी प्रिय है.
छत्तीसगढ़ में सबसे बुरे हालात हैं. जीन्यूज, प्रभात खबर, नवभारत, भास्कर और दूसरे संस्थान अपने पत्रकारों को फंसने पर या तो पहचानने से इनकार कर चुके हैं, या फिर उनको नौकरी से हटा चुके हैं. छत्तीसगढ़ सरकार ने दर्जनों पत्रकारों पर फर्जी मुकदमें दर्ज कर चुकी है. चार पत्रकार जेल के अंदर हैं. छह फरार हैं. 2012 से अब तक वहां छह पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. वहां जो भी पत्रकार कॉरपोरेट या सरकार पर सवाल करता है, उसे पुलिस अधिकारी धमकाते हैं, फर्जी मामले बनाकर जेल में ठूंस देते हैं.
हाल में बिहार, झारखंड, यूपी में पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. सरकारें चाहती हैं कि पत्रकार उनके पीआर के रूप में काम करे. नेता चाहते हैं कि पत्रकार उनके गुर्गे के रूप में काम करे. हर पार्टी अपना सुधीर चौधरी चाहती है. पत्रकारों ने पार्टियों को ऐसा करने दिया है. एक दो अपवाद छोड़कर कोई मीडिया संस्थान अपने पत्रकार को स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने देना चाहता. पत्रकार यूनियन बनाने से कतराते हैं. वे वैसे ही काम करते हैं जैसा उनका मालिक चाहता है. उनकी स्वामिभक्ति उनकी मौतों में तब्दील हो रही है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. पत्रकार संगठित नहीं होते. वे खुद अपने साथियों की जड़ें खोदने में लगे रहते हैं.
पत्रकारों को यह नहीं दिखता कि देश भर में वकीलों या डॉक्टरों के साथ शोषण या अन्याय की संस्थानिक हरकतें संभव नहीं है. एक वकील या डॉक्टर को कोई छू दे तो उनका बार काउंसिल और मेडिकल काउंसिल खटिया खड़ी कर देता है. पत्रकार अपनी स्वानवृत्ति के कारण लात खा रहे हैं. मार्केंडेय काटजू ने कहा, मीडिया का रेग्युलेशन होना चाहिए, इससे सुरक्षा और जवाबदेही दोनों सुनिश्चित होती, पर पत्रकारों ने ही मालिकों की तरफ से उनका मुंह नोच लिया था. यह कहने के लिए मुझे माफ करें कि आप मर रहे हैं क्योंकि आप पहले से ही मुर्दा हैं.
यहां की जनता भी अनोखी है. आप देखिए कि नागरिक स्वतंत्रताओं पर सरकारें कितने भी हमले करें, जनता को परेशानी नहीं होती. जनता सरकार की तरफ से गाली गलौज करती है, वह सरकार पर सवाल नहीं उठाती. गुलामी का यह चरम दौर है. एक पत्रकार बिहार में मारा गया, तो लोग कहते हैं कि वहां जंगलराज आ गया. झारखंड के बारे लोग ऐसा नहीं कह रहे. यूपी में एक पत्रकार को जिंदा जला दिया गया था. छत्तीसगढ़ में 6 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है, चार जेल में बंद हैं. दर्जनों पर या तो मुकदमा है. उसे कोई जंगलराज क्यों नहीं कहता? लोग हर एक घटना के बाद यह साबित करने में लग जाते हैं कि बिहार में जंगलराज है. यह सही है कि बिहार सबसे बेहतर प्रशासन वाला प्रदेश नहीं है. लेकिन अगर छत्तीसगढ़ में कोई जंगलराज नहीं मानता, अगर झारखंड में कोई जंगलराज नहीं मानता, तो बिहार में हर घटना के बाद जंगलराज कैसे आ जाता है? अगर हजारों करोड़ के तीन घोटाले और करीब 60 हत्या करवाने वाले मध्यप्रदेश में जंगलराज नहीं है तो बिहार में कैसे जंगलराज हो गया? क्या अपराध के मामले में बिहार सर्वोच्च पायदान पर है? क्या जंगलराज की बात इसलिए कही जाती है कि बिहार की सत्ता में लालू हैं और जंगलराज का जुमला उनसे चिपका हुआ है? बिहार की यह प्रोफाइलिंग किस आधार पर की जाती है?
जनता अब जनता नहीं है. वह राजनीतिक दलों की कार्यकर्ता भर है. यहां किसी की भी मौत का सिर्फ राजनीतिक महत्व है. 

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...