मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

बुंदेलखंड में अकाल, घास की रोटी खा रहे लोग

योगेंद्र यादव

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में इस वर्ष का सूखा विकराल स्वरुप धारण करता drought effected-जा रहा है। फसलों के नुक्सान, पानी की कमी और रोज़गार के अवसरों की कमी का असर अब सीधे सीधे इंसान और पशुओं के खाने पर दिखाई पड़ने लगा है। इससे यह अंदेशा पैदा होता है कि इस क्षेत्र के सबसे ग़रीब परिवारों के लिए भुखमरी की नौबत आ सकती है। ग़ौरतलब है कि इस क्षेत्र में लगातार तीसरे साल सूखा पड़ रहा है और इस साल ओलावृष्टि/अतिवृष्टि से रवि की फसल भी नष्ट हो गयी थी। इस संकटमय स्थिति का मुकाबला करने के लिए सरकार और प्रसाशन को तुरंत कुछ आपात कदम उठाने होंगे, चूँकि अब तक ये जनता तक राहत पहुंचाने में असमर्थ रहे हैं।
यह निष्कर्ष स्वराज अभियान द्वारा बुंदेलखंड की सभी 27 तहसीलों के 108 गांवों में किये सर्वेक्षण से सामने आया है। इस सर्वे में कुल 1206 परिवारों (सबसे ग़रीब 399 सहित) का इंटरव्यू किया गया। दशहरा और दिवाली के बीच हुए इस सर्वे में स्वराज अभियान और बुंदेलखंड आपदा राहत मंच के कार्यकर्ताओं ने गांव गांव जाकर सूखे के असर का जायज़ा लिया। सर्वे का निर्देशन योगेन्द्र यादव ने संजय सिंह (परमार्थ औरई), ज़्याँ द्रेज़ (राँची) और रीतिका खेड़ा (दिल्ली) के सहयोग से किया। यह निष्कर्ष सर्वे में लोगों द्वारा दी गयी सूचना पर आधारित है। इसकी स्वतंत्र जांच नहीं की गयी है।
बुंदेलखंड में खरीफ की फसल लगभग बर्बाद हो गयी है। ज्वार, बाजरा, मूंग और सोयाबीन उगाने वाले 90% से अधिक परिवारों ने फसल बर्बादी की रपट दी। अरहर और उड़द में यह प्रतिशत कुछ कम था। केवल तिल की फसल ही कुछ बच पायी है। वहां भी 61% किसानों ने फसल बर्बादी का ज़िक्र किया। सूखे के चलते पीने के पानी का संकट बढ़ रहा है। दो तिहाई गांवों में पिछले साल की तुलना में घरेलू काम के पानी की कमी आई है, आधे के अधिक गांव में पानी पहले से अधिक प्रदूषित हुआ है। दो तिहाई गांव से पानी के ऊपर झगड़े की खबर है। पानी का मुख्य स्रोत हैण्ड-पम्प है, लेकिन सरकारी हैण्ड-पम्पों में एक तिहाई बेकार पड़े हैं।
सर्वेक्षण के सबसे चिंताजनक संकेत भुखमरी और कुपोषण से सम्बधित है। पिछले एक महीने के खान-पान के बारे में पूछने पर पता लगा कि एक औसत परिवार को महीने में सिर्फ़ 13 दिन सब्ज़ी खाने को मिली, परिवार में बच्चों या बड़ों को दूध सिर्फ़ 6 दिन नसीब हुआ और दाल सिर्फ 4 दिन। ग़रीब परिवारों में आधे से ज़्यादा ने पूरे महीने में एक बार भी दाल नहीं खायी थी और 69% ने दूध नहीं पिया था। ग़रीब परिवारों में 19% को पिछले माह कम से कम एक दिन भूखा सोना पड़ा।
सर्वे से उभर के आया कि कुपोषण और भुखमरी की यह स्थिति पिछले 8 महीनों में रबी की फसल खराब होने से बिगड़ी है। सिर्फ़ ग़रीब ही नहीं, लगभग सभी सामान्य परिवारों में भी दाल और दूध का
लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वराज अभियान के संयोजक हैं।
लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वराज अभियान के संयोजक हैं।
उपयोग घट गया है। यहां के 79% परिवारों ने पिछले कुछ महीनों में कभी ना कभी रोटी या चावल को सिर्फ़ नमक या चटनी के साथ खाने को मजबूर हुए हैं। 17% परिवारों ने घास की रोटी (फिकारा) खाने की बात कबूली। सर्वे के 108 में से 41 गांवों में इस होली के बाद से भुखमरी या कुपोषण से मौत की रपट भी आई, हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी। इस सर्वे में आसन्न संकट के कई और प्रमाण भी आये। एक तिहाई से अधिक परिवारों को खाना मांगना पड़ा, 22% बच्चों को स्कूल से वापिस लेना पड़ा, 27% को ज़मीन और 24% को जेवर बेचने या गिरवी रखने पड़े हैं।
जानवरों के लिए भुखमरी और अकाल की स्थिति आ चुकी है। बुंदेलखंड में दुधारू जानवरों को छोड़ने की “अन्ना” प्रथा में अचानक बढ़ोत्तरी आई है। सर्वे के 48% गांवों में भुखमरी से 10 या अधिक जानवरों के मरने की ख़बर मिली। वहां 36% गांवों में कम से 100 गाय-भैंस को चारे के अभाव में छोड़ दिया गया है। जानवरों के चारे में कमी की बात 77% परिवारों ने कही तो 88% परिवारों ने दूध कम होने की रपट की। मजबूरी में 40% परिवारों को अपना पशु बेचना पड़ा है और पशुधन की कीमत भी गिर गयी है।
इस संकट से निपटने के लिए सरकार और प्रसाशन को तुरंत कुछ बड़े कदम उठाने होंगे। इस संकट की घड़ी में मनरेगा योजना से कुछ लाभ नहीं हो पाया है। एक औसत ग़रीब परिवार को पिछले 8 महीनों में मनरेगा से 10 दिन की मज़दूरी भी नहीं मिली है। सरकारी राशन की स्थिति भी असंतोषजनक है। ग़रीब परिवारों में आधे से भी कम (केवल 42% के पास) बीपीएल या अंत्योदय कार्ड है।
स्वराज अभियान ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से मिलकर मांग की थी कि कुछ इमरजेंसी कदम उठाये जाएं। यह सर्वेक्षण बुंदेलखंड को लेकर हमारी उस चिंता को सही ठहराता है। सरकार ने इस सम्बन्ध में कई घोषणाएं की हैं। अब ज़रूरत है कि आम लोगों को अविलम्ब राहत पहुंचाई जाए।

(साभार:हिम न्यूजपोस्ट)

शनिवार, 21 नवंबर 2015

वंशवाद: भारतीय राजनीति का डीएनए

बिहार में लालू यादव के दो पुत्रों का विधानसभा में प्लेसमेंट हुआ तो सोशल मीडिया पर अभूतपूर्व शोर मच गया. खासकर भाजपा और उसके समर्थकों की ओर से कहा गया कि अब बिहार बर्बाद हो जाएगा. यह चिंता आज की नहीं है और बिल्कुल जायज है. बरसों से विशेषज्ञों द्वारा यह चिंता जताई जा रही है कि भारतीय राजनीति कुछ परिवारों की गिरवी हुई जा रही है. कांग्रेस पार्टी मूलत: वंशवाद की वाहक है, जहां आज भी राहुल से आगे उस पार्टी में कुछ दिखाई नहीं देता. वंशवाद के मसले पर भाजपा कांग्रेस पर सबसे ज्यादा हमले करती है तो यह देखना चाहिए कि क्या भाजपा वंशवाद से मुक्त है?

भाजपा के लोग अपने बारे में दावा करते हैं कि उनकी पा​र्टी में परिवारवाद नहीं है और वे बेहद लोकतांत्रिक हैं. उनकी पार्टी में रहते हुए कोई भी व्यक्ति सामान्य कार्यकर्ता से प्रधानमंत्री पद तक जा सकता है. लोकसभा चुनाव में मोदी ने कांग्रेस की वंशवाद की कमजोर नस पकड़ी और इस मसले पर कांग्रेस पर खूब जमकर हमले किए. लेकिन बिहार चुनाव में वंशवाद चुनावी मुद्दा नहीं रहा, जबकि पूरा चुनाव लालू बनाम मोदी लड़ा गया. क्या ऐसा इसलिए था कि राजग गठबंधन में कई चेहरे ऐसे थे जो परिवारिक पृष्ठभूमि के कारण चुनाव लड़ रहे थे?

लालू यादव के दो बेटों के मंत्रिमंडल में दाखिल होने के जितना हल्ला मचा तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सिर्फ लालू यादव के परिवार की शिक्षा या परिवारवादी राजनीति पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? किसी और नेता के बेटों के राजनीति में दाखिल होने पर इतने ही सवाल क्यों नहीं उठे?

भाजपा के वंशवाद का विरोध करने की जमीनी हकीकत यह है कि वह खुद भी वंशवाद की गिरफ्त में है और बाकी दलों को पीछे छोड़ती ऩजर आ रही है. मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी उसी कांग्रेसी परिवारवाद से निकले हैं, जिससे कांग्रेस के राहुल गांधी निकले हैं. यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा, कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह, राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, विजयाराजे सिंधिया की बेटियां वसुंधरा और यशोधरा, वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत, रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह, प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर, मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय हैं.

कांग्रेसी नेता भगवत झा आज़ाद के पुत्र कीर्ति आज़ाद भाजपा में ही हैं. लालू के बेटे तेजस्वी यादव की तरह वे भी क्रिकेटर से नेता बने. भाजपा के दिवंगत नेताओं के पुत्र-पुत्रियों को भी उनके रहते या बाद में राजनीति में उतारा गया है. मध्य प्रदेश में दिलीप सिंह भूरिया की पु​त्री निर्मला भूरिया, महाराष्ट्र में दिवंगत प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन, गोपीनाथ मुण्डे की पुत्रियां पंकजा मुण्डे और प्रीतम मुंडे को सक्रिय राजनीति में भागीदारी और पद मिले हैं. दिल्ली में साहिब सिंह वर्मा के सुपुत्र प्रवेश वर्मा भी सांसद हैं. भाजपा की ओर से दिवंगत नेताओं की पत्नियों को भी बिना किसी राजनीतिक अनुभव या योग्यता के चुनाव लड़ाया जा रहा है. सरदार सदाशिव राव महादिक की ​बेटी गायत्री राजे महादिक, जो दिवंगत तुकोजीराव की पत्नी हैं, इसका ताजा उदाहरण है.

जिस बिहार में लालू को परिवारवाद के लिए कोसा जा रहा है, उसी बिहार में भाजपा के तीन सांसद पुत्रों को टिकट दिया. डॉ. सी. पी. ठाकुर के पुत्र विवेक ठाकुर, अश्विनी चौबे के पुत्र अर्जित शाश्वत और हुकुमदेव नारायण यादव के पुत्र अशोक कुमार यादव  को बिहार विधानसभा में चुनाव में उतारा गया. चारा घोटाले में दोषी ठहराए जा चुके जगन्नाथ मिश्र के बेटे नितीश मिश्र भी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े.

भाजपा की सहयोगी पार्टी हम के प्रदेश अध्यक्ष शकुनी चौधरी के पुत्र राजेश चौधरी खगड़िया से चुनाव लड़े और 25 हजार मतों से हार गए. हम के मुखिया जीतनराम मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन कुटुंबा सुरक्षित सीट से चुनावी मैदान में थे, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार राजेश कुमार ने उन्हें पराजित कर दिया. हम के कद्दावर नेता नरेंद्र सिंह के पुत्र अजय प्रताप को भाजपा ने जमुई से प्रत्याशी बनाया था, वे चुनाव हार गए. उनके दूसरे पुत्र सुमित कुमार को चिराग पासवान के विरोध के कारण जमुई से टिकट नहीं मिला तो सुमित ने चकाई से निर्दलीय चुनाव लड़ा और वे भी हार गए. भाजपा की सहयोगी पार्टी लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के सुपुत्र चिराग पासवान सांसद हैं.

भाजपा की दूसरी सहयोगी पार्टी लोजपा की हालत से कौन परिचित नहीं है. राम विलास पासवान के भाई पशुपति कुमार पारस इसी चुनाव में अलौली से चुनाव लड़े और हारे. लोजपा सांसद रामचंद्र पासवान के पुत्र प्रिंस राज कल्याणपुर सीट से पहली बार चुनावी मैदान में थे, हालांकि जनता ने उन्हें भी नकार दिया. लोजपा ने खगड़िया से सांसद चौधरी महबूब अली कैसर के पुत्र मुहम्मद यूसुफ सलाउद्दीन को मैदान में उतारा और वे 37 हजार मतों के अंतर से चुनाव हार गए. जदयू के शिवानंद तिवारी के बेटे राहुल तिवारी शाहपुर से चुनाव लड़े और जीते.

हाल ही में मोदी के भाई के साले को गुजरात नगरीय निकाय चुनाव में टिकट दिया गया जिस पर काफी घमासान मचा था. इसी चुनाव में तमाम भाजपाई नेताओं के परिजनों को टिकट मिले थे, जिसे अन्य दलों ने चुनावी मुद्दा बनाया था.

मोदी जी ने लोकसभा चुनाव के बाद राज्यों के चुनाव में भी परिवारवाद को मुद्दा बनाया, लेकिन महाराष्ट्र और कश्मीर में भाजपा उसी परिवारवाद की नाव पर सवार होकर सत्ता के समंदर में सैर कर रही है. कश्मीर में मुफ्ती मुहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती की पार्टी उनकी सहयोगी है तो महाराष्ट्र में तीन पीढ़ियों वाली शिवसेना उनकी सहयोगी है.

पंजाब में भाजपा की सहयोगी पार्टी है अकादी दल, जिसके प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री हैं, बेटे को उन्होंने उपमुख्यमंत्री बना रखा है, उनकी बहु केंद्र में मंत्री हैं, दामाद को भी उन्होंने राज्यमंत्री बना रखा है और बेटे के साले को मंत्री पद नवा़जा है. देश में इतने मंत्री पद वाला दूसरा परिवार फिलहाल नहीं है, भले ही लालू पर हल्ला ज्यादा मचा हो.

भाजपा के पितामह अटल बिहारी वाजपेयी भी के दत्तक दमाद रंजन भट्टाचार्य का उनके कार्यकाल में पीएमओ में जो जलवा रह चुका है, वह किसे नहीं याद होगा. रंजन भट्टाचार्य अटल बिहारी वाजपेयी की मित्र राजकुमारी कौल के दामाद थे. अटल जी के समय में कहा जाता था कि राजग सरकार में असल सत्ता उन्हीं के हाथ में थी. लेकिन राजग सरकार के जाते ही वे भी गायब हो गए. बाद में उनका नाम नीरा राडिया टेप कांड में उछला. टेप में वे कहते सुने गए कि 'मुकेश भाई (मुकेश अंबानी) ने मुझसे कहा, कांग्रेस तो अपनी दुकान है.' ये बातचीत यूपीए-2 की सरकार में मंत्री तय करने के मामले में थी जिसमें वे नीरा राडिया को आश्वस्त कर रहे थे कि कांग्रेस में अपनी पैठ के चलते दयानिधि मारन को टेलीकॉम मंत्री नहीं बनने देंगे. सियासी गलियारे में उनकी हनक वंशवाद के बदौलत ही संभव हुई.

लोकतंत्र में राजनीति को कुछ परिवारों की पुश्तैनी धरोहर नहीं होना चाहिए. लेकिन इससे मुक्त होने की शुरुआत कौन करेगा? यूपी में मुलायम के परिवार 18 सदस्य हैं जो सांसद, मंत्री, विधायक अथवा अन्य पदों पर काबिज हैं. लालू इससे अलग नहीं हैं. अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाकर और अब अपने बेटो—​बेटियों को लाकर उन्होंने भी यह साबित किया. दिलचस्प है कि लालू—मुलायम आपस में समधी भी हैं.

वंशवाद भारतीय राजनीति में घुन की तरह लगा है. यह सवाल बेहद जरूरी है लेकिन यह सवाल अगर सबसे नहीं किए जाएंगे तो उस चुनिंदा शोर पर भी सवाल उठने चाहिए.

देश में कौन सी पार्टी है जिस पर आप संतोष जता सकते हैं? कम्युनिष्ट पार्टियों को छोड़ कर सभी पर्टियां व्यक्ति या परिवार केंद्रित हैं. भाजपा का मतलब आज सिर्फ नरेंद्र मोदी रह गया है और कांग्रेस का मतलब है सिर्फ गांधी परिवार. बाकी पार्टियों पर गौर करें—  राजद (लालू परिवार), सपा (मुलायम परिवार), अकाली दल (बादल परिवार) नेशनल काँफ्रेंस (अब्दुल्ला परिवार), लोकदल (चौटाला परिवार), एनसीपी (पवार परिवार), डीएमके (करुणानिधि परिवार), बसपा (मायावती) आम आदमी पार्टी (केजरीवाल), जेडी-यू (नीतीश कुमार), शिव सेना (उद्धव ठाकरे), एमएनएस (राज ठाकरे), एआईडीएमके (जयललिता) बीजू जनता दल (नवीन पटनायक) तेलगुदेशम (चन्द्र बाबू नाइडू) एआईएमएम (ओवैसी) टीसीआर (आरसी राव) तृणमूल काँग्रेस (ममता बनर्जी). इनमें से आप किसके परिवारवाद या व्यक्तिवाद के समर्थन में खड़े होंगे और क्यों? बाकी भाजपा जब वंशवाद का विरोध करती है तो बड़ा ही अश्लील लगता है. 

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

हत्याओं पर कौन उत्‍साहित है?

जनता के पैसे से चलने वाला दूरदर्शन मोहन भागवत को लाइव क्यों प्रसारित करता है? मोहन भागवत के प्रसारण में जनता का कौन सा हित है? वे मोहन भागवत जो मौजूदा भयावह हालात को लेकर इसी भाषण में कहते हैं कि बढ़ा चढ़ा कर पेश की गई छोटी-छोटी घटनाएं हिंदू संस्कृति को नुकसान नहीं पहुंचा सकतीं. छोटी छोटी घटनाएं होती रहती हैं लेकिन ये भारतीय संस्कृति, हिंदू संस्कृति को विकृत नहीं करतीं. उनकी निगाह में देश उत्साहित है. उनके विचार से लगातार दंगों, हत्याओं में भारतीय हिंदू संस्कृति का गौरवगान छिपा है.

दूरदर्शन ने लगातार दूसरी बार मोहन भागवत का भाषण क्यों प्रसारित किया? जनता का पैसा संघ के प्रचार पर क्यों खर्च होगा? पूरी सरकार मोहन भागवत के दरबार में नतमस्तक होकर हिसाब देने क्यों जाती है? जिन लोगों को सोनिया गांधी का सरकार पर नियंत्रण रखना बुरा लगता था, वे अब क्यों चुप हैं. सोनिया गांधी तो फिर भी चुनी हुई सांसद और पार्टी अध्यक्ष रहीं. मोहन भागवत कौन हैं? कोई ऐसा व्यक्ति जो जातीय और धार्मिक आधार पर संगठन चलाता है, वह लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार के ऊपर कैसे है? एक चुनी हुई सरकार के मोहन भागवत के आगे नतमस्तक होने का अर्थ है कि वह पूरे देश के बहुमत को ले जाकर एक ऐसे व्यक्ति और संगठन के सामने डाल देती है जिसका इस गणतंत्र और इस​की प्रक्रियाओं के साथ घात करने का इतिहास रहा है.

भागवत को इस देश में उत्साह नजर आ रहा है. उस समय जब महाराष्ट्र से दिल्ली तक हर असहमति पर कालिख पोती जा रही है. कश्मीर फिर से दंगे की चपेट में है. लंपटों की फौज सबका खाना—पीना, गाना—बजाना अपने कब्जे में लेना चाहती है. जम्मू में धर्म पूछकर हत्या हो रही है. भाजपा शासित प्रदेशों में आधा दर्जन से ज्यादा घोटाले हुए हैं जो हजारों करोड़ के हैं. मध्य प्रदेश में व्यापमं 50 लोगों को लील गया है. यूपी तालिबान हुआ चाहता है. उसी समय मुलायम और मोदी एक दूसरे की तारीफ झोंक रहे हैं. पूरे देश में गुंडाराज—दंगाराज चल रहा है. अफवाह फैलाकर, घर में घुसकर अल्पसंख्यकों की हत्या की जा रही है. कोई गाय बैल लेकर जाता हुआ आदमी मारा जा सकता है. हरियाणा में दलित परिवार को जला दिया गया. दो बच्चे जिंदा जल गए. उसी दिन भागवत कह रहे हैं कि 'देश में बहुत उत्साह है!... छोटी छोटी घटनाएं भारतीय हिंदू संस्कृति का नुकसान नहीं कर सकतीं.' हर घटना पर सत्ता पक्ष की प्रतिक्रियाएं लाशों पर तांडव करने जैसी हैं.

पिछले दो साल के माहौल को लेकर जब लोगों में भय बैठ रहा है. तीन बड़े चिंतकों की हत्या हुई, दादरी की वीभत्स घटना घटी. कई जगह अफवाहों पर दंगे हुए. 40 से ज्यादा लेखक अपना पुरस्कार लौटा चुके हैं. तब सत्ता पक्ष से कोई भी व्यक्ति देश को यह आश्वासन नहीं दे सकता है कि यह घटनाएं रोकी जाएंगी और सबको सुरक्षा दी जाएगी. उल्टे चुने हुए नेता और सांसद संदेश दे रहे हैं कि गाय को नुकसान पहुंचाने वालों की हत्या कर दी जाएगी. क्या मोदी की केंद्र सरकार ने इस देश को गुंडों के हवाले कर दिया है? अब देश में किसी को दोषी ठहराने या सजा देने के लिए कानून नहीं, उन्मादी भीड़ का इस्तेमाल होगा?

मोहन भागवत उस संगठन के मुखिया हैं जिसकी दलितों, महिलाओं, लोकतंत्र, समरसता, बहुलता आदि से शत्रुता है. इसे गंभीरता से समझने की आवश्यकता है. संघ से ही निकले इस देश के मुखिया नरेंद्र मोदी का मानना है कि दलितों का सर पर मैला ढोना आध्यात्मिक काम है! मोहन भागवत का विचार है कि इस धरती पर रहने वाले सभी अनिवार्यत: हिंदू हैं. वे डेढ़ साल से हर किसी को हिंदुआने में लगे हैं. वे आरक्षण को खत्म करना चाहते हैं. उन्हें दलितों, महिलाओं, गैरहिंदुओं की स्वतंत्र अस्मिता ​बर्दाश्त नहीं है. संघ का मुखपत्र 'पांचजन्य' वेदों के हवाले से गाय के नाम पर इंसान की हत्या को जायज बताता है तो मोहन भागवत इसकी निंदा तक नहीं कर सकते. संघ कहता है कि पांचजन्य हमारा मुखपत्र ही नहीं है.

संघ सिर्फ झूठ, घृणा, उन्माद और वैमनस्य का व्यापारी संगठन है. वे हिंदुओं के हितैषी बनकर न सिर्फ हिंदुओं का, बल्कि देश का ऐसा नुकसान कर रहे हैं जिसकी भरपाई में सदियां लगेंगी. देश आजाद हुआ था, तब संघ को भारत का संविधान, तिरंगा आदि मंजूद नहीं था. उन्हें गांधी, नेहरू के साथ लोकतंत्र से परहेज था, इसलिए गांधी की हत्या कर दी. अंतत: उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में शामिल होकर धर्म की राजनीति शुरू की और अब केंद्र में पहुंच गए तो पूरे देश को तालिबानी रास्ते पर झोंक रहे हैं. वे लगातार हिंदू राष्ट्र बनाने की बात कहते हैं जो इस देश के संविधान और आइडिया आॅफ इंडिया पर हमला है. वे अपनी ही देशवासियों को आपस में लड़ा रहे हैं.

आप हर दिन की छोटी छोटी घटनाओं पर गौर करें. संघ भाजपा समर्थकों के पास हत्याओं के समर्थन में तर्क हैं. वे दो साल की बच्ची को जिंदा जलाने पर शर्मिंदा नहीं हैं. वे किसी को अफवाह के आधार पर मार देने पर शर्मिंदा नहीं हैं. वे बेशर्म तर्क पेश करते हैं. मोहन भागवत से लेकर मंत्री और गली के कार्यकर्ता तक. मोहन भागवत इन्हें मामूली घटनाएं बता हरे तो जनरल वीके सिंह कह रहे हैं कि कोई कुत्ते पर पत्थर फेंके तो सरकार क्या करे? वे मौतों का उपहास करना भरपूर जानते हैं. अखलाक से लेकर दो बच्चियों को जिंदा जलाए जाने तक.

लेकिन चूंकि जब ऐसे संगठन का केंद्रीय सत्ता पर कब्जा है तो वह संसाधनों पर कब्जा करेगा और उसका दुरुपयोग भी करेगा जो कि वह कर रहा है. असल मुद्दा यह है कि जनता को यह सब समझ में आए कि उसके साथ क्या हो रहा है. मोदी और संघ का जो लोग अंध समर्थन करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि इस देश को सदियों के संघर्ष के बाद मिली आजादी और साठ साल के लोकतंत्र पर कैसा खतरा है और किससे है?



मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

भक्तों के नाम खत

प्रिय भक्तों!
आप लोगों से इतनी गालियां खा चुका हूं कि अब आप सब पर गुस्सा आना बंद हो गया है. गीता और महात्मा गांधी की प्रेरणा से मेरा हृदय परिवर्तन हो गया है. मैं स्थि​तप्रज्ञ हो गया हूं. ऐसा इसलिए क्योंकि आप क्रोध के नहीं, आप प्रेम और दया के पात्र हैं. दरअसल, हमको पढ़े लिखे युवा भारत से उम्मीदें ज्यादा थीं. जिस देश का नायक भगत सिंह जैसा 23 साल का युवा हो, जो अपने आदर्शों और अपनी जनता के लिए जानबूझ कर फांसी चढ़ गया, उस देश के युवाओं से यह उम्मीद ज्यादा नहीं है कि वह हमेशा मानवीय मूल्यों और मानवता के पक्ष में खड़ा हो. यह उम्मीद ज्यादा नहीं है कि आपने जो सरकार चुनी है, यदि वह आपकी उम्मीदों पर पानी फेरकर सिर्फ पोलिटिकल स्टंट करती हो तो आप उस पर सवाल उठाकर दबाव बनाएं.

लेकिन अब भरोसा हो गया है कि इस देश का युवा फिलहाल सवाल उठाने वाले को गरियाता है. उसकी नजर में लोकतंत्र, न्याय, समता, सौहार्द, स्वतंत्रता, सेक्युलरिज्म, मुलायम सिंह और ओवैसी पर्यायवाची हैं. वह इन सबको समान भाव से गरियाता है. इसके उलट योगी, साक्षी, संगीत सोम, साध्वी आदि के लिए वह रख सकता है. यह साइकिल एक्सीडेंट की शक्ल में सभ्यता का ध्वंस है कि जिन मूल्यों के लिए लाखों जानें गंवाकर भी हमारा देश टिका रहा था, वे सब हमारे लिए गाली हो गए हैं.

एक डेढ़ साल गाली खाने का अनुभव यह रहा कि जब गालियां देते समय आप हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी, अवधी कुछ भी ठीक से लिख नहीं पाते तो आप पर गुस्सा होना मूर्खता है. अब इसके आगे क्या बचता है! आपसे लोकतंत्र, न्याय, समानता, सेक्युलरिज्म आदि विषयों पर अच्छी समझ की उम्मीद करना संपोले में रीढ़ की हड्डी तलाशना है.

वैसे आपको दुखी नहीं होना चाहिए क्योंकि बहुत बड़ी जनसंख्या ऐसी भी है जो कहने को पढ़ी लिखी है लेकिन उसका आईक्यू आपसे भी कम है. कोई अमेरिका से पढ़कर लौटे और योगी आदित्यनाथ का समर्थक हो जाए तो उसका आईक्यू आदित्यनाथ से भी बदतर है, इसमें कोई शक नहीं. आपके नायक यदि आपसे भी घटिया हैं तो आपको बिना शर्माए अपने आदर्शों पर पुनर्विचार ​कर लेना चाहिए.

तो आपके साथ वे पढ़े लिखे साधू सधुआइन छाप लोग भी दुखी और क्षुब्ध लेखकों को गरिया रहे हैं. लेखकों का कोई बयान पढ़ने की बजाय, उनसे बात करने की बजाय, उनका लिखा पढ़ा कुछ देखने की बजाय, वे विषवमन पर आमादा हैं. आरोप भी कैसे कैसे? अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश सुर्खियां पाने के लिए ऐसा कर रहे हैं. आप ही कहते हैं कि इनको कौन जानता है, इनके ऐसा करने से क्या फर्क पड़ता है, तो उनके पुरस्कार लौटाने से चर्चा भी कौन करेगा? तब उनके बहिष्कार से आपके अखंड आततायी निजाम का क्या उखड़ने वाला है? खैर...

मामला यह है कि इस देश को गुलामी की आदत नहीं गई है. एक आदमी अगर यह एहसास करा दे कि मैं तुम पर जुल्म करता रह सकता हूं और तुम मेरा कुछ नहीं उखाड़ सकते तो दंडवत हो जाना मोक्ष पा लेने जैसा है. असहमति के लिए विवेक और साहस चाहिए होता है. आपमें इनकी अनुपस्थिति आपकी शर्म का बायस नहीं है.

असली बात यही है कि आंख का पानी मर गया है और अब शर्म नहीं है. आपको तो एक भी लेखक नाम न मालूम होने की शर्म नहीं. उसने कब लिखना शुरू किया, क्या क्या लिखा, कब पुरस्कार मिला, आदि नहीं मालूम होने की भी शर्म नहीं. चौरासी हुआ था तो गुजरात और मुजफ्फरनगर भी होना चाहिए, ऐसे तर्क देने पर भी शर्म नहीं. हत्या और उन्माद की सियासत पर शर्म नहीं. धर्मांध होकर देश की विरासत पर गोबर कर देने पर भी शर्म नहीं. किसी को भी गरियाने पर भी शर्म नहीं. आपको ​किसी राजनीतिक हत्या पर शर्म नहीं. आपको हत्या के बाद हत्या को सरकारी ​तमगा मिलने की भी शर्म नहीं. और तो और, अपने मूर्ख होने पर भी शर्म नहीं.

आपको सिर्फ अपनी मूर्खता, अपने गोबरनुमा झूठ के पहाड़ और बर्बर नेतृत्व पर गर्व है. अच्छा है. ऐसी सोच का नेतृत्व आततायी ही हो सकता है. उसका असली प्रतिनिधि कोई धर्म और राजनीति के बीच लटका लंपट साधु संत ही हो सकता है. ऐसे देश का नेता कोई तड़ीपार ही हो सकता है. साठ साल के आजाद भारत के मुसलसल पतन पर आपको गर्व है, तो यह पतन और गर्व दोनों मुबारक! आपको सिर्फ कांग्रेस या भाजपा में से एक को श्रेष्ठ साबित करना है और उनकी निकृष्ट सियासी प्रतियोगिता में शामिल होने पर गर्व है तो आपको यह प्रतियोगिता मुबारक!

लेकिन मेरे भाई, कोई दुखी या क्षुब्द होना चाहता है तो उसे हो जाने दो. बड़ा एहसान होगा.

आपका
एक अदना सा अवसादग्रस्त

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

भारतीय राजनीति की बकरी कथा

एक पाकिस्तान पठाऊ देशभक्त हैं. वे बहुत दिनों तक लोगों को पाकिस्तान भेजने पर उतारू थे. लेकिन न कोई गया, न कोई जाने को तैयार हुआ. जिन लोगों को उनने धमकियाया था, उनको भेज भी नहीं पाए. तो फिर उन्होंने पाकिस्तान भेजने की धमकी देना बंद कर दिया. न कोई पाकिस्तान गया, न ले जाया गया. ठीक वैसे जैसे भव्य राम मंदिर बनना तो था, लेकिन न राम मंदिर बना, न बनाया गया. 25 साल तक उपद्रव जरूर मचाया गया.

कलयुग में समय जल्दी जल्दी बदलता है. अवतार भी जल्दी—जल्दी होते हैं. जितनी बार अपने गांव जाता हूं, किसी नये चौडगरे पर एक नये बाबा उग आते हैं. वे पिछले वाले से ताकतवर होते हैं. इसी तरह से अब सियासत में राम मंदिर से ताकतवर सियासी अवतार गाय का है. गांव के बाहर मुर्दहिया में अब डांगर छोड़ आना मौत को न्यौता देकर आना है. जहां कहीं गाय की टांगनुमा कोई आकृति दिखी, आस्था की विकृति फनफना उठती है. फिर जो आगे आया, वह अब मरा कि तब मरा.

एक दिन तो हद हो गई. मैं बस में था और फोन पर बतिया रहा था. मेरा दोस्त फोन की दूसरी तरफ था. उसने कहा, ससुरे तुम बहुत दुष्ट हो. हमने कहा, अच्छा! और तुम तो अल्ला मियां की गाय हो! मेरे भाई, मैं गाय, अल्ला, मोदी जी को दुख देने वाला पिल्ला और सारे मुहल्ला की कसम खाकर कहता हूं— मेरा किसी को आहत करने का कोई इरादा नहीं था. हमारे गांव में ऐसा बोल देते हैं, हमने भी बोल दिया. लेकिन मेरे मुंह से अल्ला मियां की गाय सुनते ही बगल खड़ा एक मुस्टंडा नाराज हो गया. कहने लगा— अबे देशद्रोही! तुझे पीटकर मार डालूंगा. मैंने पूछा— काहे भाई, हमने तुम्हारी भैंस खोल ली है क्या? और तुनक गया, बोला—पहले तो तुमने गाय को अल्ला से जोड़कर हिंदू द्रोह किया और अब मेरे घर से भैंस बरामद करने की बात कर रहे हो. तुम मेरा धर्म भ्रष्ट करने पर तुले हो. तुमको छोडूंगा नहीं.
बगल में एक चचा बैठे थे. चचा अपने रौब और दाब से लखनवी प्रतीत होते थे. चचा ने मुस्टंडे की मंशा भांप ली और उसके हस्तास्त्र का आक्षेप प्रक्षेप होने से पहले हस्तक्षेप कर दिया— अरे बबुआ काहे नाराज होते हो, वह बेचारा दढ़ियल खाली पीली खीस ही निपोर रहा है. अपने किसी मित्र मित्राणी से बतिया रहा है. तुम दालभात में मूसलचंद कहां से आ गए?
चचा की मूूंछें रौबदार थीं, डरना बनता था. इसलिए मुस्टंडा कुछ सहम कर बोला— देखो अंकल, इन्होंने गाय को अल्ला से जोड़ दिया है, इन्होंने हमारी भावना को आहत कर दिया है...आप मत बोलिए, यह मेरी आस्था का मामला है...

चचा ने बात काट दी और जोर से डपट कर बोले— अमां डरेबर, गाड़ी रोक. रोक... रोक... रोक...
सुन बचवा, तेरी भावना और आस्था को समेट और निकल इधर से. अब हमारी भावना आहत हो गई, तू बस पर चढ़ा क्यों? चल भाग जंगल निकल. तू यहां दिल्ली में मत रहा कर. लखनऊ तो दिखाई मत पड़ना...
लड़के ने अपने पांव प्रेम से अपने सर पर रखे और रफू हो गया.
चचा मुस्कराए— बौउचट पता नहीं कहां से आ गया... ई जीवधारी जंतु है. हमारे मुहल्ला पहुंच जाए तो खून खराबा करा दे. अरे ई सब तो हम लोग भी बोलते हैं! लखनऊ के हो न बच्चे! हम लोग अइसै बोलते चालते हैं तुम्हारे जइसा ही, अब ई ससुरा भावना और आस्था लेकर आ गया का जाने कहां से.
इतने में हमारा स्टैंड आ गया और हमने राहत की सांस ली, चचा को एक लखनवी मुस्कराहट पास की और उतर गया.
यह उस समय की बात है जब जम्बूदीप में आस्थाएं राजनीति की रखैल हो चुकी थीं. आस्थाओं को कोई धर्म का दलाल अपने तरीके से इस्तेमाल करके जा सकता था. समोसा चटनी, कपडे का रंग, गाय—गोरू, गोबर—मूत्र आदि इस दोहन के हथियार थे. देश में इस बात पर बहस गर्म थी कि किसकी रसोईं में क्या पकना चाहिए.

इस चलन के बाद एक दिन पाकिस्तान पठाऊ देशभक्त् की घरवापसी हुई और उन्होंने फिर से मुंह खोला तो खोल ही दिया. उन्होंने गाय और बकरी की मांस का सैंपल लिया, उस पर कलात्मक ढंग से आस्था और संस्कार को आरोपित किया और फिर उस पर बहन और पत्नी को आरोपित कर दिया. बवाल मच गया— गाय मां थी तो बहन कैसे हुई? गाय मां भी कैसे हो सकती है? मां गाय कैसे हो सकती है? गाय और बकरी दोनों जानवर हैं तो मां, बहन और पत्नी तीनों में से कोई भी बकरी या गाय क्यों हो जाएगी? जानवर को इज्जत देते देते मनुष्य को जानवर कैसे बनाया जा सकता है?
भक्तों ने कहा, नहीं, यह हो सकता है. यही होता है. जिस तरह आप बहन से संबंध नहीं बनाते है, लेकिन पत्नी से बनाते हैंं, उसी तरह आप बकरी को काट कर खा सकते हैं, लेकिन गाय को नहीं? नारीवादी बहनों ने पूछा— तो भैया, का हम गाय हैं? हमार लाइफ कौनों लाइफ नहीं है का? भक्तों ने कहा, मेरा वो मतलब नहीं था. मेरा मतलब आस्था से था. आप बुरा मत मानिए.
एक बहन मुंहजोर थी, अपने भगत हो चुके तर्क—मुब्तिला भाई को चप्पल लेकर दौड़ा लिया— 'भाग दाढ़ीजार यहां से, एक पे रहता नहीं है. कभी भावना पर आता है तो कभी आस्था पर. कमीना अपनी नौटंकी के चक्कर में हमको गाय बोल गया. दोबारा दिखा इधर तो हलाल करके छोडूंगी.' भक्त भागा तो भाग ही गया.
एक दूसरा भगत भाई भागा—भागा घर पहुंचा. पत्नी झाड़ू लगा रही थी. टीवी पर न्यूज देख कर आई थी. उसका बकरी बना दिया जाना उसे नागवार गुजरा था. भगत को देखा तो उधर मुंह कर लिया. सोचा कि झाड़ू से मारने पर दोष होता है. तब तक भाई बोला— आज फिर बवाल हो गया.
इतना सुनते ही पत्नी ने आव देखा न ताव, लेकर झाड़ू पिल पड़ी. भगत सनाका खा गया. बोला— यह क्या है? कोई संस्कार सीख कर नहीं आई बाप के घर से, पति पर हाथ छोड़ती है.
पत्नी जोर से चिल्लाई— तू बड़ा संस्कारी है, हमको टीवी पर बकरी बना के आया है. जा अपनी मां को गाय बना ले और बैल को बाप. हमको बकरी सकरी बोला तो कर दूंगी मुकदमा. अपने अम्मा के साथ जेल की रोटी तोड़ना. करमजला! मुंहझौंसा!
भगत भाई भागकर घर से बाहर आए और चारपाई पर गिरते हुए सोचा— साला बुरे फंसे. उधर टीवी पर वामियों ने धोया, इधर घर आकर कामिनी ने धोया. अब नहीं जाऊंगा.
आगे की बकरी कथा अभी जारी है.

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

किस्सा-ए-गोरक्षा उर्फ गाय पर चर्चा

आज सुबह सुबह गोरक्षा दल के एक सिपाही से गाली खाकर अपने एक भूतपूर्व मित्र की याद ताजा हो गई. एक महीने पहले की दुर्घटना है जब मेरा वह मित्र शहीद हो गया था.
हुआ यह कि दिल्ली चुनाव में धुलाई हो जाने के बाद संस्कारवान कुनबा कनफ्यूजनात्म अवस्था को प्राप्त हो गया. राम मंदिर में जो निवेश आडवाणी जी ने किया था, वह अब दुहने के काबिल नहीं बचा था. तो कुनबे को अचानक गाय की याद आ गई. गाय दुधारू जानवर तो है ही, सियासत में भी उसे दुहा जा सकता है, जहां दूध की जगह वोट निकलता है.
तो दिल्ली चुनाव के बाद और बिहार चुनाव के पहले उक्त मित्र भूतपूर्व हो गए, क्योंकि वे गोरक्षा के लिए शहादत को तैयार थे.
उनके शहादत की कहानी भी बड़ी मारू है. ऐसे ही एक दिन उनके गायात्मक भावुक उच्छवास के दौरान उनसे पूछ लिया कि मित्र आपने कभी गाय पाली है? कभी पूजा पतिंगा किया है या ऐसे ही भावुक हुए जा रहे हैं? वे तुनक कर बोले— तुम सब वामपंथी लोग देशद्रोही हो. मैंने कहा, हम वामपंथी कैसे हुए? और हम लोग कौन? मैं तो तुम्हारे साथ हूं और तुमको माइनस कर दिया जाए तो अकेला हूं.
तो बोले— तुम लोग मतलब रवीश कुमार वगैरह! तुम सब देशद्रोही हो. अब देशद्रोहियों का सफाया ही एकमात्र चारा है. मैं चकरायमान हो गया. गाय पर चर्चा के दौरान रवीश कुमार, देशद्रोह और सफाये का प्रवेश अवांछनीय था.
उसने आगे कहा, जो गाय नहीं पालता, वह भी दूध पीता है न! उसी तरह जो गाय नहीं पालता, उसे भी तो गाय की रक्षा करने का हक है! कभी गाय पाली नहीं है तो क्या हुआ, यूट्यूब पर तो देखी है! गाय हमारी माता है. गाय पर देवता रहते हैं.
मैंने माहौल सेंसेटिव देखा तो तुम से आप पर आ गया. मेरा मित्र आहतातुर हो गया था. मामला बढ़ने पर वह हत हो सकता था. इसलिए संभलकर मैंने पूछा— जो यूट्यूब वाली गाय आपकी माता है, वह जानवर है जो लावारिस अवस्था में घूमता पाया जाता है और कूड़ा भी खाता है! आप उसे ऐसे नारकीय हालत में कैसे छोड़ देते हैं? गाय पर देवता रहते हैं तो गाय को रस्सी से छांदकर, डंडे से मारकर दुहते हैं, उसके बच्चे यानी आपके भाई के हिस्से का दूध निकाल लेते हैं, उसे कुपोषित बना देते हैं, बच्चा मर जाता है तो इंजेक्शन लगाकर गाय को दुहते हैं. माता के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार होता है. उस पर वास करने वाले देवता भी लगता है सोमरस पीकर मगन रहते हैं. गाय की पीठ पर पड़ने वाला डंडा उनको भी तो लगता होगा. बेचारे क्रिया की प्रतिक्रया नहीं देते, वरना तीन चार हजार कपूतों को तो यूं ही निपटा देते.
दोस्त उखड़ गया. तुम लोग मुसलमानों के कोठे के दलाल हो. मुसलमान गाय खाता है. मुसलमान देशद्रोही है. तुम लोग उनका साथ देते हो. तुम लोग भी देशद्रोही हो. धर्म के नाम पर कलंक हो. मुसलमान आतंकवादी होता है. उसे सबक सिखाना होगा. जो गाय मारता है, उसको काट दिया जाएगा.
मेरी घिग्घी, जहां कहीं होती होगी, वहीं बंध गई. मैंने धीरे से पूछा— मेरे भाई, लेकिन जीव हत्या भी तो पाप है! और गाय पर रहने वाला देवताओं ने आपको कमांडो नियुक्त किया है क्या कि मेरी और गो माता की रक्षा करो? हमारा धरम कहता है कि ईश्वर की मर्जी से पत्ता भी नहीं हिलता. हो सकता है कि ईश्वर की मर्जी हो कि मुसलमान गोमांस खाता हो. उसको उसके कर्म का फल मिलेगा...
वह गुस्से में एकदम तपतपायमान अवस्था में पहुंच गया था, कांपते हुए वह बोला— एक मुल्ले ने अपनी बेटी को दुपट्टा नहीं लेने के लिए मार डाला. आईएसआईएस वाले सबको मार रहे हैं. हिंदुओं पर खतरा है...
उसके बात बदलने से मुझे लगा कि कुछ बात बनेगी. मैंने कहा, मेरे दोस्त, आईएसआईएस वाले मुसलमानों का ही रक्तपान कर रहे हैं, वह भी अरब में, तो हिंदुओं पर खतरा कैसे हो गया? और आप किसी इंसान को मारेंगे तो पाप लगेगा. फिर यमराज आपको ले जाएगा और खौलते तेल से भरे कड़ाहे में आपका पकौड़ा तल देगा. यार तुम तो समझदार आदमी हो. इहलोक को नरक बनाने से परलोक का कैसा संबंध है?
वह फुफकारीय अवस्था में फेचकुर छोड़ते हुए बोला— तुम पक्के वामपंथी हो, तुम देशद्रोही हो. तुम सबकी आत्मा रूस में बसती है. तुम सब भारत के लिए खतरा हो...
इस छोटी सी गाय पर चर्चा में रवीश, देशद्रोह, सफाये के बाद यूट्यूब, देवता, मुसलमान, आईएसआईएस, वामपंथ और रूस के अनधिकृत प्रवेश से मैं सनाका खा गया. सारे तर्क तेल लेने चले गए और मैं अपने घर चला गया.
इस तरह मेरा एक अभूतपूर्व मित्र भूतपूर्व हो गया.

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

गांधी के नाम पर भी झूठ?

राकेश सिन्हा नाम के एक व्यक्ति संघ विचारक के तौर पर टीवी चैनल पर आते हैं. बरखा दत्त के साथ डिबेट में कह रहे थे कि गांधी बूचड़खाने बंद करने के समर्थक थे. मनीष तिवारी ने गांधी का बयान पढ़कर सुनाया तो राकेश सिन्हा पूछ रहे थे कि ऐसा गांधी ने कहां पर कहा है? यह गलत बयान है. अब या तो उन्होंने गांधी को कभी नहीं पढ़ा या फिर राष्ट्रवाद की तरह गांधी का भी धूर्ततापूर्ण इस्तेमाल करना चाहते हैं. गांधी ने ऐसा कहा है और बार बार कहा है. गांधी ने धर्म को भले हमेशा ऊपर रखा हो, लेकिन गांधी ने कभी इंसान की हत्या की वकालत नहीं की, बल्कि यह कहा कि मैं गाय को मर जाने दूंगा लेकिन इंसान को बचाउंगा. राकेश सिन्हा को गांधी वांग्मय पढ़ना चाहिए और यह समझना चाहिए कि बाकी लोग जो गांधी के नाम का नारा नहीं लगाते, वे भी गांधी को पढ़ते हैं. उनको भी पढ़ना चाहिए और घृणापूर्ण विचारों का प्रसार नहीं करना चाहिए. ऐसा करना आइडिया आॅफ इंडिया के खिलाफ तो है ही, देश के संविधान के भी खिलाफ है. संघ परिवारी जनों को वेद पुराण और उपनिषद छोड़कर पहले संविधान पढ़ना चाहिए.
गांधी के गोरक्षा के बारे में विचार यहां दे रहा हूं. एक हिस्सा मेरे सपनों का भारत से है जो उन्होंने यंग ​इंडिया में लिखा था और दूसरा हिस्सा उनकी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज से है.

''मैं फिर से इस बात पर जोर देता हूं कि... कानून बनाकर गोवध बंद करने से गोरक्षा नहीं हो जाती. वह तो गोरक्षा के काम का छोटे से छोटा भाग है.... लोग ऐसा मानते दीखते हैं कि किसी भी बुराई के विरुद्ध कोई कानून बना कि तुरंत वह किसी झंझट के बिना मिट जाएगी. ऐसी भयंकर आत्म—वंचना और कोई नहीं हो सकती. किसी दुष्ट बुद्धि वाले अज्ञानी या छोटे से समाज के खिलाफ कानून बनाया जाता है और उसका असर भी होता है. लेकिन जिस कानून के विरुद्ध समझदार और संगठित लोकमत हो, या धर्म के बहाने छोटे से छोटे मंडल का भी विरोध हो, वह कानून सफल नहीं हो सकता.''
यंग इंडिया, 07.07.1927 से संग्रहीत, मेरे सपनों का भारत, पेज नंबर 137, प्रकाशक— नवजीवन ट्रस्ट


''मैं ख़ुद गाय को पूजता हूं यानी मान देता हूं. गाय हिंदुस्तान की रक्षा करने वाली है, क्योंकि उसकी संतान पर हिंदुस्तान का, जो खेती प्रधान देश है, आधार है. गाय कई तरह से उपयोगी जानवर है. वह उपयोगी जानवर है इसे मुसलमान भाई भी कबूल करेंगे. लेकिन जैसे मैं गाय को पूजता हूं, वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं. जैसे गाय उपयोगी है वैसे ही मनुष्य भी फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिंदू, उपयोगी है.
तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा? क्या मैं उसे मारूंगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान और गाय दोनों का दुश्मन हो जाऊंगा. इसलिए मैं कहूंगा कि गाय की रक्षा करने का एक ही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिए और उसे देश की ख़ातिर गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए.
अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं है. अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती है तो अपनी जान दे देनी चाहिए, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए. यही धार्मिक क़ानून है, ऐसा मैं तो मानता हूं.
हां और नहीं के बीच हमेशा बैर रहता है. अगर मैं वाद-विवाद करूंगा तो मुसलमान भी वाद विवाद करेगा. अगर मैं टेढ़ा बनूंगा, तो वह भी टेढ़ा बनेगा. अगर मैं बालिस्त भर नमूंगा तो वह हाथ भर नमेगा और अगर वह नहीं भी नमे तो मेरा नमना ग़लत नहीं कहलाएगा.
जब हमने ज़िद की तो गोकशी बढ़ी. मेरी राय है कि गोरक्षा प्रचारिणी सभा गोवध प्रचारिणी सभा मानी जानी चाहिए. ऐसी सभा का होना हमारे लिए बदनामी की बात है. जब गाय की रक्षा करना हम भूल गए तब ऐसी सभा की जरूरत पड़ी होगी.
मेरा भाई गाय को मारने दौड़े तो उसके साथ मैं कैसा बरताव करूंगा? उसे मारूंगा या उसके पैरों में पड़ूंगा? अगर आप कहें कि मुझे उसके पांव पड़ना चाहिए तो मुसलमान भाई के पांव भी पड़ना चाहिए. गाय को दुख देकर हिंदू गाय का वध करता है; इससे गाय को कौन छुड़ाता है? जो हिंदू गाय की औलाद को पैना भोंकता है; उस हिंदू को कौन समझाता है? इससे हमारे एक राष्ट्र होने में कोई रुकावट नहीं आई है.
अंत में, हिंदू अहिंसक और मुसलमान हिंसक है, यह बात अगर सही हो तो अहिंसा का धर्म क्या है? अहिंसक को आदमी की हिंसा करनी चाहिए, ऐसा कहीं लिखा नहीं है. अहिंसक के लिए तो राह सीधी है. उसे एक को बचाने के लिए दूसरे की हिंसा करनी ही नहीं चाहिए. उसे तो मात्र चरणवंदना करनी चाहिए. सिर्फ समझाने का काम करना चाहिए. इसी में उसका पुरुषार्थ है.''
हिंद स्वराज, पेज नंबर 32 से 34, प्रकाशक—नवजीवन ट्रस्ट 

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...