मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

भक्तों के नाम खत

प्रिय भक्तों!
आप लोगों से इतनी गालियां खा चुका हूं कि अब आप सब पर गुस्सा आना बंद हो गया है. गीता और महात्मा गांधी की प्रेरणा से मेरा हृदय परिवर्तन हो गया है. मैं स्थि​तप्रज्ञ हो गया हूं. ऐसा इसलिए क्योंकि आप क्रोध के नहीं, आप प्रेम और दया के पात्र हैं. दरअसल, हमको पढ़े लिखे युवा भारत से उम्मीदें ज्यादा थीं. जिस देश का नायक भगत सिंह जैसा 23 साल का युवा हो, जो अपने आदर्शों और अपनी जनता के लिए जानबूझ कर फांसी चढ़ गया, उस देश के युवाओं से यह उम्मीद ज्यादा नहीं है कि वह हमेशा मानवीय मूल्यों और मानवता के पक्ष में खड़ा हो. यह उम्मीद ज्यादा नहीं है कि आपने जो सरकार चुनी है, यदि वह आपकी उम्मीदों पर पानी फेरकर सिर्फ पोलिटिकल स्टंट करती हो तो आप उस पर सवाल उठाकर दबाव बनाएं.

लेकिन अब भरोसा हो गया है कि इस देश का युवा फिलहाल सवाल उठाने वाले को गरियाता है. उसकी नजर में लोकतंत्र, न्याय, समता, सौहार्द, स्वतंत्रता, सेक्युलरिज्म, मुलायम सिंह और ओवैसी पर्यायवाची हैं. वह इन सबको समान भाव से गरियाता है. इसके उलट योगी, साक्षी, संगीत सोम, साध्वी आदि के लिए वह रख सकता है. यह साइकिल एक्सीडेंट की शक्ल में सभ्यता का ध्वंस है कि जिन मूल्यों के लिए लाखों जानें गंवाकर भी हमारा देश टिका रहा था, वे सब हमारे लिए गाली हो गए हैं.

एक डेढ़ साल गाली खाने का अनुभव यह रहा कि जब गालियां देते समय आप हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी, अवधी कुछ भी ठीक से लिख नहीं पाते तो आप पर गुस्सा होना मूर्खता है. अब इसके आगे क्या बचता है! आपसे लोकतंत्र, न्याय, समानता, सेक्युलरिज्म आदि विषयों पर अच्छी समझ की उम्मीद करना संपोले में रीढ़ की हड्डी तलाशना है.

वैसे आपको दुखी नहीं होना चाहिए क्योंकि बहुत बड़ी जनसंख्या ऐसी भी है जो कहने को पढ़ी लिखी है लेकिन उसका आईक्यू आपसे भी कम है. कोई अमेरिका से पढ़कर लौटे और योगी आदित्यनाथ का समर्थक हो जाए तो उसका आईक्यू आदित्यनाथ से भी बदतर है, इसमें कोई शक नहीं. आपके नायक यदि आपसे भी घटिया हैं तो आपको बिना शर्माए अपने आदर्शों पर पुनर्विचार ​कर लेना चाहिए.

तो आपके साथ वे पढ़े लिखे साधू सधुआइन छाप लोग भी दुखी और क्षुब्ध लेखकों को गरिया रहे हैं. लेखकों का कोई बयान पढ़ने की बजाय, उनसे बात करने की बजाय, उनका लिखा पढ़ा कुछ देखने की बजाय, वे विषवमन पर आमादा हैं. आरोप भी कैसे कैसे? अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश सुर्खियां पाने के लिए ऐसा कर रहे हैं. आप ही कहते हैं कि इनको कौन जानता है, इनके ऐसा करने से क्या फर्क पड़ता है, तो उनके पुरस्कार लौटाने से चर्चा भी कौन करेगा? तब उनके बहिष्कार से आपके अखंड आततायी निजाम का क्या उखड़ने वाला है? खैर...

मामला यह है कि इस देश को गुलामी की आदत नहीं गई है. एक आदमी अगर यह एहसास करा दे कि मैं तुम पर जुल्म करता रह सकता हूं और तुम मेरा कुछ नहीं उखाड़ सकते तो दंडवत हो जाना मोक्ष पा लेने जैसा है. असहमति के लिए विवेक और साहस चाहिए होता है. आपमें इनकी अनुपस्थिति आपकी शर्म का बायस नहीं है.

असली बात यही है कि आंख का पानी मर गया है और अब शर्म नहीं है. आपको तो एक भी लेखक नाम न मालूम होने की शर्म नहीं. उसने कब लिखना शुरू किया, क्या क्या लिखा, कब पुरस्कार मिला, आदि नहीं मालूम होने की भी शर्म नहीं. चौरासी हुआ था तो गुजरात और मुजफ्फरनगर भी होना चाहिए, ऐसे तर्क देने पर भी शर्म नहीं. हत्या और उन्माद की सियासत पर शर्म नहीं. धर्मांध होकर देश की विरासत पर गोबर कर देने पर भी शर्म नहीं. किसी को भी गरियाने पर भी शर्म नहीं. आपको ​किसी राजनीतिक हत्या पर शर्म नहीं. आपको हत्या के बाद हत्या को सरकारी ​तमगा मिलने की भी शर्म नहीं. और तो और, अपने मूर्ख होने पर भी शर्म नहीं.

आपको सिर्फ अपनी मूर्खता, अपने गोबरनुमा झूठ के पहाड़ और बर्बर नेतृत्व पर गर्व है. अच्छा है. ऐसी सोच का नेतृत्व आततायी ही हो सकता है. उसका असली प्रतिनिधि कोई धर्म और राजनीति के बीच लटका लंपट साधु संत ही हो सकता है. ऐसे देश का नेता कोई तड़ीपार ही हो सकता है. साठ साल के आजाद भारत के मुसलसल पतन पर आपको गर्व है, तो यह पतन और गर्व दोनों मुबारक! आपको सिर्फ कांग्रेस या भाजपा में से एक को श्रेष्ठ साबित करना है और उनकी निकृष्ट सियासी प्रतियोगिता में शामिल होने पर गर्व है तो आपको यह प्रतियोगिता मुबारक!

लेकिन मेरे भाई, कोई दुखी या क्षुब्द होना चाहता है तो उसे हो जाने दो. बड़ा एहसान होगा.

आपका
एक अदना सा अवसादग्रस्त

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

भारतीय राजनीति की बकरी कथा

एक पाकिस्तान पठाऊ देशभक्त हैं. वे बहुत दिनों तक लोगों को पाकिस्तान भेजने पर उतारू थे. लेकिन न कोई गया, न कोई जाने को तैयार हुआ. जिन लोगों को उनने धमकियाया था, उनको भेज भी नहीं पाए. तो फिर उन्होंने पाकिस्तान भेजने की धमकी देना बंद कर दिया. न कोई पाकिस्तान गया, न ले जाया गया. ठीक वैसे जैसे भव्य राम मंदिर बनना तो था, लेकिन न राम मंदिर बना, न बनाया गया. 25 साल तक उपद्रव जरूर मचाया गया.

कलयुग में समय जल्दी जल्दी बदलता है. अवतार भी जल्दी—जल्दी होते हैं. जितनी बार अपने गांव जाता हूं, किसी नये चौडगरे पर एक नये बाबा उग आते हैं. वे पिछले वाले से ताकतवर होते हैं. इसी तरह से अब सियासत में राम मंदिर से ताकतवर सियासी अवतार गाय का है. गांव के बाहर मुर्दहिया में अब डांगर छोड़ आना मौत को न्यौता देकर आना है. जहां कहीं गाय की टांगनुमा कोई आकृति दिखी, आस्था की विकृति फनफना उठती है. फिर जो आगे आया, वह अब मरा कि तब मरा.

एक दिन तो हद हो गई. मैं बस में था और फोन पर बतिया रहा था. मेरा दोस्त फोन की दूसरी तरफ था. उसने कहा, ससुरे तुम बहुत दुष्ट हो. हमने कहा, अच्छा! और तुम तो अल्ला मियां की गाय हो! मेरे भाई, मैं गाय, अल्ला, मोदी जी को दुख देने वाला पिल्ला और सारे मुहल्ला की कसम खाकर कहता हूं— मेरा किसी को आहत करने का कोई इरादा नहीं था. हमारे गांव में ऐसा बोल देते हैं, हमने भी बोल दिया. लेकिन मेरे मुंह से अल्ला मियां की गाय सुनते ही बगल खड़ा एक मुस्टंडा नाराज हो गया. कहने लगा— अबे देशद्रोही! तुझे पीटकर मार डालूंगा. मैंने पूछा— काहे भाई, हमने तुम्हारी भैंस खोल ली है क्या? और तुनक गया, बोला—पहले तो तुमने गाय को अल्ला से जोड़कर हिंदू द्रोह किया और अब मेरे घर से भैंस बरामद करने की बात कर रहे हो. तुम मेरा धर्म भ्रष्ट करने पर तुले हो. तुमको छोडूंगा नहीं.
बगल में एक चचा बैठे थे. चचा अपने रौब और दाब से लखनवी प्रतीत होते थे. चचा ने मुस्टंडे की मंशा भांप ली और उसके हस्तास्त्र का आक्षेप प्रक्षेप होने से पहले हस्तक्षेप कर दिया— अरे बबुआ काहे नाराज होते हो, वह बेचारा दढ़ियल खाली पीली खीस ही निपोर रहा है. अपने किसी मित्र मित्राणी से बतिया रहा है. तुम दालभात में मूसलचंद कहां से आ गए?
चचा की मूूंछें रौबदार थीं, डरना बनता था. इसलिए मुस्टंडा कुछ सहम कर बोला— देखो अंकल, इन्होंने गाय को अल्ला से जोड़ दिया है, इन्होंने हमारी भावना को आहत कर दिया है...आप मत बोलिए, यह मेरी आस्था का मामला है...

चचा ने बात काट दी और जोर से डपट कर बोले— अमां डरेबर, गाड़ी रोक. रोक... रोक... रोक...
सुन बचवा, तेरी भावना और आस्था को समेट और निकल इधर से. अब हमारी भावना आहत हो गई, तू बस पर चढ़ा क्यों? चल भाग जंगल निकल. तू यहां दिल्ली में मत रहा कर. लखनऊ तो दिखाई मत पड़ना...
लड़के ने अपने पांव प्रेम से अपने सर पर रखे और रफू हो गया.
चचा मुस्कराए— बौउचट पता नहीं कहां से आ गया... ई जीवधारी जंतु है. हमारे मुहल्ला पहुंच जाए तो खून खराबा करा दे. अरे ई सब तो हम लोग भी बोलते हैं! लखनऊ के हो न बच्चे! हम लोग अइसै बोलते चालते हैं तुम्हारे जइसा ही, अब ई ससुरा भावना और आस्था लेकर आ गया का जाने कहां से.
इतने में हमारा स्टैंड आ गया और हमने राहत की सांस ली, चचा को एक लखनवी मुस्कराहट पास की और उतर गया.
यह उस समय की बात है जब जम्बूदीप में आस्थाएं राजनीति की रखैल हो चुकी थीं. आस्थाओं को कोई धर्म का दलाल अपने तरीके से इस्तेमाल करके जा सकता था. समोसा चटनी, कपडे का रंग, गाय—गोरू, गोबर—मूत्र आदि इस दोहन के हथियार थे. देश में इस बात पर बहस गर्म थी कि किसकी रसोईं में क्या पकना चाहिए.

इस चलन के बाद एक दिन पाकिस्तान पठाऊ देशभक्त् की घरवापसी हुई और उन्होंने फिर से मुंह खोला तो खोल ही दिया. उन्होंने गाय और बकरी की मांस का सैंपल लिया, उस पर कलात्मक ढंग से आस्था और संस्कार को आरोपित किया और फिर उस पर बहन और पत्नी को आरोपित कर दिया. बवाल मच गया— गाय मां थी तो बहन कैसे हुई? गाय मां भी कैसे हो सकती है? मां गाय कैसे हो सकती है? गाय और बकरी दोनों जानवर हैं तो मां, बहन और पत्नी तीनों में से कोई भी बकरी या गाय क्यों हो जाएगी? जानवर को इज्जत देते देते मनुष्य को जानवर कैसे बनाया जा सकता है?
भक्तों ने कहा, नहीं, यह हो सकता है. यही होता है. जिस तरह आप बहन से संबंध नहीं बनाते है, लेकिन पत्नी से बनाते हैंं, उसी तरह आप बकरी को काट कर खा सकते हैं, लेकिन गाय को नहीं? नारीवादी बहनों ने पूछा— तो भैया, का हम गाय हैं? हमार लाइफ कौनों लाइफ नहीं है का? भक्तों ने कहा, मेरा वो मतलब नहीं था. मेरा मतलब आस्था से था. आप बुरा मत मानिए.
एक बहन मुंहजोर थी, अपने भगत हो चुके तर्क—मुब्तिला भाई को चप्पल लेकर दौड़ा लिया— 'भाग दाढ़ीजार यहां से, एक पे रहता नहीं है. कभी भावना पर आता है तो कभी आस्था पर. कमीना अपनी नौटंकी के चक्कर में हमको गाय बोल गया. दोबारा दिखा इधर तो हलाल करके छोडूंगी.' भक्त भागा तो भाग ही गया.
एक दूसरा भगत भाई भागा—भागा घर पहुंचा. पत्नी झाड़ू लगा रही थी. टीवी पर न्यूज देख कर आई थी. उसका बकरी बना दिया जाना उसे नागवार गुजरा था. भगत को देखा तो उधर मुंह कर लिया. सोचा कि झाड़ू से मारने पर दोष होता है. तब तक भाई बोला— आज फिर बवाल हो गया.
इतना सुनते ही पत्नी ने आव देखा न ताव, लेकर झाड़ू पिल पड़ी. भगत सनाका खा गया. बोला— यह क्या है? कोई संस्कार सीख कर नहीं आई बाप के घर से, पति पर हाथ छोड़ती है.
पत्नी जोर से चिल्लाई— तू बड़ा संस्कारी है, हमको टीवी पर बकरी बना के आया है. जा अपनी मां को गाय बना ले और बैल को बाप. हमको बकरी सकरी बोला तो कर दूंगी मुकदमा. अपने अम्मा के साथ जेल की रोटी तोड़ना. करमजला! मुंहझौंसा!
भगत भाई भागकर घर से बाहर आए और चारपाई पर गिरते हुए सोचा— साला बुरे फंसे. उधर टीवी पर वामियों ने धोया, इधर घर आकर कामिनी ने धोया. अब नहीं जाऊंगा.
आगे की बकरी कथा अभी जारी है.

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

किस्सा-ए-गोरक्षा उर्फ गाय पर चर्चा

आज सुबह सुबह गोरक्षा दल के एक सिपाही से गाली खाकर अपने एक भूतपूर्व मित्र की याद ताजा हो गई. एक महीने पहले की दुर्घटना है जब मेरा वह मित्र शहीद हो गया था.
हुआ यह कि दिल्ली चुनाव में धुलाई हो जाने के बाद संस्कारवान कुनबा कनफ्यूजनात्म अवस्था को प्राप्त हो गया. राम मंदिर में जो निवेश आडवाणी जी ने किया था, वह अब दुहने के काबिल नहीं बचा था. तो कुनबे को अचानक गाय की याद आ गई. गाय दुधारू जानवर तो है ही, सियासत में भी उसे दुहा जा सकता है, जहां दूध की जगह वोट निकलता है.
तो दिल्ली चुनाव के बाद और बिहार चुनाव के पहले उक्त मित्र भूतपूर्व हो गए, क्योंकि वे गोरक्षा के लिए शहादत को तैयार थे.
उनके शहादत की कहानी भी बड़ी मारू है. ऐसे ही एक दिन उनके गायात्मक भावुक उच्छवास के दौरान उनसे पूछ लिया कि मित्र आपने कभी गाय पाली है? कभी पूजा पतिंगा किया है या ऐसे ही भावुक हुए जा रहे हैं? वे तुनक कर बोले— तुम सब वामपंथी लोग देशद्रोही हो. मैंने कहा, हम वामपंथी कैसे हुए? और हम लोग कौन? मैं तो तुम्हारे साथ हूं और तुमको माइनस कर दिया जाए तो अकेला हूं.
तो बोले— तुम लोग मतलब रवीश कुमार वगैरह! तुम सब देशद्रोही हो. अब देशद्रोहियों का सफाया ही एकमात्र चारा है. मैं चकरायमान हो गया. गाय पर चर्चा के दौरान रवीश कुमार, देशद्रोह और सफाये का प्रवेश अवांछनीय था.
उसने आगे कहा, जो गाय नहीं पालता, वह भी दूध पीता है न! उसी तरह जो गाय नहीं पालता, उसे भी तो गाय की रक्षा करने का हक है! कभी गाय पाली नहीं है तो क्या हुआ, यूट्यूब पर तो देखी है! गाय हमारी माता है. गाय पर देवता रहते हैं.
मैंने माहौल सेंसेटिव देखा तो तुम से आप पर आ गया. मेरा मित्र आहतातुर हो गया था. मामला बढ़ने पर वह हत हो सकता था. इसलिए संभलकर मैंने पूछा— जो यूट्यूब वाली गाय आपकी माता है, वह जानवर है जो लावारिस अवस्था में घूमता पाया जाता है और कूड़ा भी खाता है! आप उसे ऐसे नारकीय हालत में कैसे छोड़ देते हैं? गाय पर देवता रहते हैं तो गाय को रस्सी से छांदकर, डंडे से मारकर दुहते हैं, उसके बच्चे यानी आपके भाई के हिस्से का दूध निकाल लेते हैं, उसे कुपोषित बना देते हैं, बच्चा मर जाता है तो इंजेक्शन लगाकर गाय को दुहते हैं. माता के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार होता है. उस पर वास करने वाले देवता भी लगता है सोमरस पीकर मगन रहते हैं. गाय की पीठ पर पड़ने वाला डंडा उनको भी तो लगता होगा. बेचारे क्रिया की प्रतिक्रया नहीं देते, वरना तीन चार हजार कपूतों को तो यूं ही निपटा देते.
दोस्त उखड़ गया. तुम लोग मुसलमानों के कोठे के दलाल हो. मुसलमान गाय खाता है. मुसलमान देशद्रोही है. तुम लोग उनका साथ देते हो. तुम लोग भी देशद्रोही हो. धर्म के नाम पर कलंक हो. मुसलमान आतंकवादी होता है. उसे सबक सिखाना होगा. जो गाय मारता है, उसको काट दिया जाएगा.
मेरी घिग्घी, जहां कहीं होती होगी, वहीं बंध गई. मैंने धीरे से पूछा— मेरे भाई, लेकिन जीव हत्या भी तो पाप है! और गाय पर रहने वाला देवताओं ने आपको कमांडो नियुक्त किया है क्या कि मेरी और गो माता की रक्षा करो? हमारा धरम कहता है कि ईश्वर की मर्जी से पत्ता भी नहीं हिलता. हो सकता है कि ईश्वर की मर्जी हो कि मुसलमान गोमांस खाता हो. उसको उसके कर्म का फल मिलेगा...
वह गुस्से में एकदम तपतपायमान अवस्था में पहुंच गया था, कांपते हुए वह बोला— एक मुल्ले ने अपनी बेटी को दुपट्टा नहीं लेने के लिए मार डाला. आईएसआईएस वाले सबको मार रहे हैं. हिंदुओं पर खतरा है...
उसके बात बदलने से मुझे लगा कि कुछ बात बनेगी. मैंने कहा, मेरे दोस्त, आईएसआईएस वाले मुसलमानों का ही रक्तपान कर रहे हैं, वह भी अरब में, तो हिंदुओं पर खतरा कैसे हो गया? और आप किसी इंसान को मारेंगे तो पाप लगेगा. फिर यमराज आपको ले जाएगा और खौलते तेल से भरे कड़ाहे में आपका पकौड़ा तल देगा. यार तुम तो समझदार आदमी हो. इहलोक को नरक बनाने से परलोक का कैसा संबंध है?
वह फुफकारीय अवस्था में फेचकुर छोड़ते हुए बोला— तुम पक्के वामपंथी हो, तुम देशद्रोही हो. तुम सबकी आत्मा रूस में बसती है. तुम सब भारत के लिए खतरा हो...
इस छोटी सी गाय पर चर्चा में रवीश, देशद्रोह, सफाये के बाद यूट्यूब, देवता, मुसलमान, आईएसआईएस, वामपंथ और रूस के अनधिकृत प्रवेश से मैं सनाका खा गया. सारे तर्क तेल लेने चले गए और मैं अपने घर चला गया.
इस तरह मेरा एक अभूतपूर्व मित्र भूतपूर्व हो गया.

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

गांधी के नाम पर भी झूठ?

राकेश सिन्हा नाम के एक व्यक्ति संघ विचारक के तौर पर टीवी चैनल पर आते हैं. बरखा दत्त के साथ डिबेट में कह रहे थे कि गांधी बूचड़खाने बंद करने के समर्थक थे. मनीष तिवारी ने गांधी का बयान पढ़कर सुनाया तो राकेश सिन्हा पूछ रहे थे कि ऐसा गांधी ने कहां पर कहा है? यह गलत बयान है. अब या तो उन्होंने गांधी को कभी नहीं पढ़ा या फिर राष्ट्रवाद की तरह गांधी का भी धूर्ततापूर्ण इस्तेमाल करना चाहते हैं. गांधी ने ऐसा कहा है और बार बार कहा है. गांधी ने धर्म को भले हमेशा ऊपर रखा हो, लेकिन गांधी ने कभी इंसान की हत्या की वकालत नहीं की, बल्कि यह कहा कि मैं गाय को मर जाने दूंगा लेकिन इंसान को बचाउंगा. राकेश सिन्हा को गांधी वांग्मय पढ़ना चाहिए और यह समझना चाहिए कि बाकी लोग जो गांधी के नाम का नारा नहीं लगाते, वे भी गांधी को पढ़ते हैं. उनको भी पढ़ना चाहिए और घृणापूर्ण विचारों का प्रसार नहीं करना चाहिए. ऐसा करना आइडिया आॅफ इंडिया के खिलाफ तो है ही, देश के संविधान के भी खिलाफ है. संघ परिवारी जनों को वेद पुराण और उपनिषद छोड़कर पहले संविधान पढ़ना चाहिए.
गांधी के गोरक्षा के बारे में विचार यहां दे रहा हूं. एक हिस्सा मेरे सपनों का भारत से है जो उन्होंने यंग ​इंडिया में लिखा था और दूसरा हिस्सा उनकी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज से है.

''मैं फिर से इस बात पर जोर देता हूं कि... कानून बनाकर गोवध बंद करने से गोरक्षा नहीं हो जाती. वह तो गोरक्षा के काम का छोटे से छोटा भाग है.... लोग ऐसा मानते दीखते हैं कि किसी भी बुराई के विरुद्ध कोई कानून बना कि तुरंत वह किसी झंझट के बिना मिट जाएगी. ऐसी भयंकर आत्म—वंचना और कोई नहीं हो सकती. किसी दुष्ट बुद्धि वाले अज्ञानी या छोटे से समाज के खिलाफ कानून बनाया जाता है और उसका असर भी होता है. लेकिन जिस कानून के विरुद्ध समझदार और संगठित लोकमत हो, या धर्म के बहाने छोटे से छोटे मंडल का भी विरोध हो, वह कानून सफल नहीं हो सकता.''
यंग इंडिया, 07.07.1927 से संग्रहीत, मेरे सपनों का भारत, पेज नंबर 137, प्रकाशक— नवजीवन ट्रस्ट


''मैं ख़ुद गाय को पूजता हूं यानी मान देता हूं. गाय हिंदुस्तान की रक्षा करने वाली है, क्योंकि उसकी संतान पर हिंदुस्तान का, जो खेती प्रधान देश है, आधार है. गाय कई तरह से उपयोगी जानवर है. वह उपयोगी जानवर है इसे मुसलमान भाई भी कबूल करेंगे. लेकिन जैसे मैं गाय को पूजता हूं, वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं. जैसे गाय उपयोगी है वैसे ही मनुष्य भी फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिंदू, उपयोगी है.
तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा? क्या मैं उसे मारूंगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान और गाय दोनों का दुश्मन हो जाऊंगा. इसलिए मैं कहूंगा कि गाय की रक्षा करने का एक ही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिए और उसे देश की ख़ातिर गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए.
अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं है. अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती है तो अपनी जान दे देनी चाहिए, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए. यही धार्मिक क़ानून है, ऐसा मैं तो मानता हूं.
हां और नहीं के बीच हमेशा बैर रहता है. अगर मैं वाद-विवाद करूंगा तो मुसलमान भी वाद विवाद करेगा. अगर मैं टेढ़ा बनूंगा, तो वह भी टेढ़ा बनेगा. अगर मैं बालिस्त भर नमूंगा तो वह हाथ भर नमेगा और अगर वह नहीं भी नमे तो मेरा नमना ग़लत नहीं कहलाएगा.
जब हमने ज़िद की तो गोकशी बढ़ी. मेरी राय है कि गोरक्षा प्रचारिणी सभा गोवध प्रचारिणी सभा मानी जानी चाहिए. ऐसी सभा का होना हमारे लिए बदनामी की बात है. जब गाय की रक्षा करना हम भूल गए तब ऐसी सभा की जरूरत पड़ी होगी.
मेरा भाई गाय को मारने दौड़े तो उसके साथ मैं कैसा बरताव करूंगा? उसे मारूंगा या उसके पैरों में पड़ूंगा? अगर आप कहें कि मुझे उसके पांव पड़ना चाहिए तो मुसलमान भाई के पांव भी पड़ना चाहिए. गाय को दुख देकर हिंदू गाय का वध करता है; इससे गाय को कौन छुड़ाता है? जो हिंदू गाय की औलाद को पैना भोंकता है; उस हिंदू को कौन समझाता है? इससे हमारे एक राष्ट्र होने में कोई रुकावट नहीं आई है.
अंत में, हिंदू अहिंसक और मुसलमान हिंसक है, यह बात अगर सही हो तो अहिंसा का धर्म क्या है? अहिंसक को आदमी की हिंसा करनी चाहिए, ऐसा कहीं लिखा नहीं है. अहिंसक के लिए तो राह सीधी है. उसे एक को बचाने के लिए दूसरे की हिंसा करनी ही नहीं चाहिए. उसे तो मात्र चरणवंदना करनी चाहिए. सिर्फ समझाने का काम करना चाहिए. इसी में उसका पुरुषार्थ है.''
हिंद स्वराज, पेज नंबर 32 से 34, प्रकाशक—नवजीवन ट्रस्ट 

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

सबसे बड़े बीफ निर्यातक का शाकाहार

भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक है. दूसरे नंबर पर ब्राजील, तीसरे पर आॅस्ट्रेलिया है. भारत अकेले दुनिया भर का 23 प्रतिशत बीफ निर्यात करता है. एक साल में यह निर्यात 20.8 प्रतिशत बढ़ा है. भारत, ब्राजील, आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका द्वारा 2015 में एक मिलियन मैट्रिक टन यानी एक अरब किलो बीफ निर्यात करने की योजना है. अकेले भारत और ब्राजील दुनिया के कुल बीफ निर्यात का 43 प्रतिशत सप्लाई करेंगे. पोर्क और पोल्ट्री के बाद बीफ तीसरे नंबर का मांसाहार है, जिसकी दुनिया भर में मांग है. भारत ने पिछले साल 2082 हजार मैट्रिक टन बीफ का निर्यात किया. भारत की छह प्रमुख गोश्त निर्यात करने वाली कंपनियों में से चार के प्रमुख हिंदू हैं. केंद्र में हिंदूवादी सरकार है जिसका मातृ संगठन आरएसएस गोहत्या के खिलाफ तलवारें खींचे खड़ा रहता है. जब एक व्यक्ति को घर से खींच कर इसलिए मार दिया जाता है कि उसके गोमांस खाने की अफवाह उड़ी थी, जब रांची को इसलिए दंगे की आग जला रही है कि किसी धर्मस्थल के सामने मांस का टुकड़ा मिला था, आपको इस शाकाहारी नारे वाली जन्नत की हकीकत मालूम होनी चाहिए.

द हिंदू अखबार लिखता है कि यूएस डिपार्टमेंट आॅफ एग्रीकल्चर की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश है. हालांकि, यह ध्यान रखना चाहिए कि यूएस सरकार बीफ में भैंस का मांस भी शामिल करती है. यानी बीफ मतलब गाय, बैल और भैंस का मांस. इस आंकड़े के मुताबिक, भारत ने 2015 वित्त वर्ष में 2.4 मिलियन टन बीफ निर्यात किया, जबकि ब्राजील ने 2 मिलियन टन और आॅस्ट्रेलिया ने 1.5 मिलियन टन. यह तीनों देश मिलकर दुनिया का 58.7 प्रतिशत बीफ सप्लाई करते हैं.
आईबीएन 7 के मुताबिक, बीते चार साल में भारत में बीफ यानी गोवंश और भैंस के मीट की खपत में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. 2011 में बीफ की खपत 20.4 लाख टन थी, जो 2014 में बढ़कर 22.5 लाख टन हो गई है. भारत ने पिछले वर्ष 19.5 लाख टन बीफ का निर्यात किया. मार्च 2015 के आंकड़ों के हिसाब से, पिछले छह महीने में बीफ निर्यात में 15.58 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है.
2006 में कराए गए एक सर्वे के मुताबिक, भारत की 60 प्रतिशत आबादी मांसाहारी है. The Hindu’s analysis of data from the 2011-12 National Sample Survey के मुताबिक, चार प्रतिशत ग्रामीण और पांच प्रतिशत शहरी भारतीय बीफ खाते हैं.
महाराष्ट्र, ओडिशा, हरियाणा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, राजस्थान, पंजाब, पुड्डुचेरी, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, दिल्ली और बिहार में गौ-हत्या पर प्रतिबंध है. 8 राज्यों में आंशिक प्रतिबंध हैं, ये राज्य हैं- बिहार, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा और चार केंद्र शासित राज्यों, दमन और दीव, दादर और नागर हवेली, पांडिचेरी, अंडमान ओर निकोबार. दस राज्यों, केरल, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम और एक केंद्र शासित राज्य लक्षद्वीप में गो-हत्या पर कोई प्रतिबंध नहीं है. असम और पश्चिम बंगाल में 14 साल से अधिक उम्र की गाय, बैल व भैंस को मारकर उनका मांस खाने की इजाजत है लेकिन उसके लिए 'फिट फॉर स्लॉटर' की सर्टिफिकेट लेना जरूरी है.
नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बनने के लिए चुनाव प्रचार कर रहे थे तो मांस निर्यात पर बड़े चिंतित थे. अपनी एक चुनावी सभा में उन्होंने कहा था, ''...और इसलिए दिल्ली में बहती हुई सरकार का सपना है कि हम हिंदुस्तान में पिंक रेबोल्यूशन करेंगे और पूरे विश्व में मांस-मटन का एक्सपोर्ट का बिजनेस करेंगे और स्वंय इस वर्ष भारत सरकार ने घोषित किया है, पूरे विश्व में बीफ एक्सपोर्ट में हिंदुस्तान नंबर वन है. किन चीजों के लिए गर्व किया जा रहा है भाईयो और बहनों आपका कलेजा रो रहा या नहीं मुझे मालुम नहीं, मेरा कलेजा चीख-चीख कर पुकार रहा है.''
दादरी में गोमांस खाने की अफवाह पर तमाम लोगों की भीड़ ने अखलाक के घर में घुसकर उसकी हत्या कर दी. मंदिर मस्जिद के सामने मांस के टुकड़े मिलने पर रांची को दंगे की आग में झोंक दिया गया. दिल्ली चुनाव के करीब यहां भी ऐसे प्रयास हुए थे. तो क्या पिंक रिवोल्युशन पर प्रधानमंत्री का दिल इसीलिए रो रहा था कि गोमांस और गोहत्या पर तनाव फैले? मांस निर्यात तो वे लगातार बढ़ा रहे हैं, तो देश में बीफ खाने वालों पर इस कदर बवाल क्यों हो रहा है? महाराष्ट्र में जैन पर्व के दौरान शिवसेना का उपद्रव और जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट द्वारा प्रतिबंध लगाने पर भाजपा विधायक द्वारा बीफ पार्टी देने की घोषणा भी ध्यान में रखिए. फिर इसका मकसद साफ होता है कि मांसाहार और शाकाहार पर लोगों को एकदूसरे से लड़ाना ही प्रमुख लक्ष्य है. वरना सरकार सबसे पहले मांस निर्यात रोकती, जिसने बासमती चावल के निर्यात को पीछे छोड़ दिया.
जिस देश की सरकार दुनिया भर को सबसे ज्यादा बीफ खिला रही है, वहां पर एक आदमी के बारे में अफवाह फैलाई जाती है कि वह बीफ खाता है और उसे घर से खींचकर पीटपीट कर मार दिया जाता है. ऐसा करने वाले उस पार्टी और संगठन के समर्थक हैं, जिसकी केंद्र में सरकार है और वह दुनिया भर में सबसे ज्यादा बीफ निर्यात कर रही है. भाजपा के लिए गाय राममंदिर की कैटेगरी का एक मुद्दा है, जिसे वह भुनाना चाहती है. उसे मंदिर नहीं बनवाना था, लोगों को लड़ाना था तो 25 सालों तक लड़ाया. जब वह मुद्दा उतना उकसाने वाला नहीं रहा तो अब गाय मुद्दा है. भाजपा बीफ निर्यात का कीर्तिमान भी बनाएगी और देशवासियों को लड़ाएगी भी. मूर्ख हम और आप हैं.

अब आप तय कीजिए कि आप क्या चाहते हैं और आपकी सरकार क्या चाहती है? दोनों की चाहना से अलग यह भी ध्यान में रखिए कि किसी की खाने पीने की आदत या पसंद पर आप लगाम लगाने वाले आप कौन होते हैं? इस पर भी सोचिए कि एक आदमी की जान की कीमत ज्यादा है या एक जानवर की. जानवर के लिए जान लेने पर उतारू लोग जानवर से कितने कम हैं?

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

पगलाई भीड़ के समर्थन में भाजपा की सक्रियता

भाजपा और आरएसएस अराजकता का दूसरा नाम है. एक भी नेता नहीं है भाजपा में जो पगलाई भीड़ के दुष्कर्म की निंदा करे. वे हत्या को जायज ठहरा रहे हैं. वे गांधी से लेकर अखलाक तक, हर हत्या को जायज कहते आए हैं.
भाजपा सांसद तरुण विजय ने फरमाया है कि शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी सिर्फ हिंदुओं पर ही क्यों डाली जाती है? हमले के भुक्तभोगी होकर भी शांति बनाए रखें!! शायद वे यह कहना चाह रहे हैं कि जो अफवाह फैली वह अखलाक ने ही फैलाई थी और फिर खुद ही मर गया.
केंद्रीय मंत्री और गौतम बुद्ध नगर के सांसद महेश शर्मा ने दादरी में अखलाक की हत्या को 'दुर्घटना' बताया है. उनका कहना है कि इसे सांप्रदायिक रंग दिए बिना एक दुर्घटना के तौर पर लिया जाना चाहिए.
स्थानीय भाजपा नेता विचित्र तोमर का कहना है, 'पुलिस ने बेकसूर लोगों को गिरफ्तार किया है. हम उन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हैं जो बूचड़खानों से जुड़े हैं. इससे हिंदुओं की भावनाएं आहत होती हैं.'
पूर्व भाजपा विधायक नवाब सिंह नागर का कहना है कि उत्तेजना के कारण ऐसी घटना घट गई है. इस घटना में ​जिन युवाओं को गिरफ्तार किया गया है वे 'बेकसूर बच्चे' हैं. 'अगर गोवध और गाय का मांस खाना साबित हो जाता है तो शर्तिया तौर पर पीड़ित परिवार की गलती है. अगर उन्होंने गोमांस खाया है तो वे भी जिम्मेदार हैं. उन्हें यह सोचना चाहिए था कि इसकी प्रतिक्रिया क्या होगी. गोवध हिंदुओं की भावनाओं से जुड़ा हुआ है. स्वाभाविक है कि ऐसी घटनाओं से लोगों का गुस्सा भड़केगा और सांपद्रायिक तनाव फैलेगा. यह ठाकुरों का गांव है और उन्होंने बेहद उग्र तरीके से अपनी भावनाएं जाहिर की हैं।'
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भाजपा उपाध्यक्ष श्रीचंद शर्मा ने आरोपियों के बचाव में कहा, 'पीड़ित परिवार के घर से गौमांस मिला है, इसलिए आरोपियों पर हत्या का केस नहीं चलाया जाए. यदि यह मांग नहीं मानी गई तो महापंचायत बुलाई जाएगी. वह व्यक्ति मारपीट से नहीं मरा है, बल्कि उसकी मौत इस अफवाह के सदमे से हुई कि किसी ने उसके बेटे की हत्या कर दी है. जब कोई किसी की भावनाओं को आहत करता है तो इस तरह के संघर्ष होते हैं. हिंदू समाज के लोग गाय की पूजा करते हैं. ऐसे में यदि कोई गाय की हत्या करेगा तो क्या हमारा खून नहीं खोलेगा? हम लोग 11 अक्टूबर को महापंचायत की तैयारी कर रहे हैं. गांव गांव जाकर हम लोगों को लामबंद करेंगे.' मुजफ्फरनगर दंगे में भाजपा की भूमिका याद कीजिए.
पुलिस और आरोपियों को शंका था लेकिन भाजपा के जिलाध्यक्ष ठाकुर हरीश सिंह को पहले से पता है कि गोमांस था. उनका कहना है कि 'स्थानीय लोगों ने पुलिस को गोमांस का सैंपल दिया था लेकिन पुलिस ने गंभीरता से नहीं लिया. इसके बाद लोग उत्तेजित हो गए.' इस हत्या के बाद वह सैंपल कहां गया यह हरीश ही जानें.
भाजपा और संघ का हर नेता भीड़ के भड़कने को जायज कहते हुए हिंदू तालिबान का समर्थन कर रहा है. वे कानून की बात नहीं कर रहे हैं. वे धार्मिक भावनाओं के नतीजतन भड़की भावनाओं को जायज ठहरा रहे हैं. वे आगे भी इस मामले को बढ़ाने की धमकी दे रहे हैं. धर्म की सनक के नाम तैयार हो रही यह भीड़ आज बेगुनाह मुसलमानों को मारकर अपनी घृणा शांत करेगी. लेकिन धार्मिक घृणा यहीं नहीं रुकती. उसका रास्ता आईएसआईएस तक जाता है. कल को यही पागल भीड़ उस हर व्यक्ति को मारेगी जो उस भीड़ में शामिल होने से इनकार करेगा.
भाजपा और संघ से पूछना चाहिए कि वे अपने देश के कुछ नागरिकों को कुछ नागरिकों का दुश्मन साबित करने पर क्यों तुले हैं? 

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

इस सिस्टम में बोलना मना है

महाराष्ट्र और पश्‍चिम बंगाल के बाद अब उत्तर प्रदेश सरकार सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर आने वाली नागरिक टिप्पणियों से घबरा गई है. यह फिजूल की घबराहट ऐसी बौखलाहट में बदल गई कि एक दलित चिंतक कंवल भारती को सरकार की आलोचना में पोस्ट डालने पर गिरफ्तार कर लिया गया और अब उन पर रासुका लगाने तक की धमकी दी जा रही है. लेखक ने ऐसा क्या कह दिया कि गिरफ्तारी की नौबत आ गई, यह जानने के बाद कोई भी सिर्फ हैरान हो सकता है, क्योंकि लेखक को जिस-जिस टिप्पणी के लिए गिरफ्तार किया गया, उसमें सरकार की मात्र आलोचना भर थी. इस तरह की कार्रवाई का यह पहला मामला नहीं है. इसके पहले पश्‍चिम बंगाल में ममता बनर्जी का कार्टून बनाकर मित्र को ईमेल भेजने वाले जाधवपुर विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र और उनके मित्र को जेल भेज दिया गया था. शिवसेना के पूर्व प्रमुख बाल ठाकरे की मौत के बाद मुंबई ठप हो जाने को लेकर एक युवती ने फेसबुक पर टिप्पणी की, तो उसे और उस पोस्ट को लाइक करने वाली एक अन्य युवती को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. इसी तरह युवा कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को उनके कार्टूनों के आधार पर देशद्रोह के आरोप में जेल भेजा गया और उनकी वेबसाइट को बंद कर दिया गया.
इन सभी मामलों को देखकर तो यही लगता है कि इस लोकतांत्रिक मूल्यों वाले देश में सरकारें नागरिकों के मूलभूत अधिकार-बोलने की आजादी का गला घोंटने को लेकर प्रतियोगिता कर रही हैं. सहज जिज्ञासा हो सकती है कि इन टिप्पणियों में ऐसा क्या था कि सरकारें ऐसी कार्रवाई करने को मजबूर हुईं? इसका जवाब है कि उपर्युक्त सभी मामले कोर्ट में टिक नहीं सके, क्योंकि इन सभी टिप्पणियों में प्रशासन या सरकार की सामान्य आलोचना भर थी, जिसे लेकर ऐसी असहिष्णु कार्रवाइयां की गईं. आज जब दुनिया भर में सोशल साइटों और विभिन्न इंटरनेट माध्यमों पर नागरिक सक्रियताएं ब़ढ रही हैं, लोग जागरूक हो रहे हैं, वे खुलकर सार्वजनिक मंचों से सरकारों की आलोचना करने लगे हैं, क्या इससे भारत में सत्ता पर काबिज लोग भयभीत हैं? इस तरह के हर मामले में प्रशासन की जबरदस्त फजीहत हुई, लेकिन यह सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है. उस पर तुर्रा यह कि समय-समय पर सोशल मीडिया पर लगाम लगाने की बातें सरकारी महकमों में उठती रहती हैं. हालांकि, यह तब है, जब आज ज्यादातर नेता, मंत्री, यहां तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय के भी आधिकारिक बयान ट्विटर पर जारी किए जाते हैं. हम सभी को यह पता है कि हम जिस तकनीकी युग में प्रवेश कर चुके हैं, वहां इंटरनेट और सोशल मीडिया पर नागरिकों की सक्रियता को अब रोका नहीं जा सकता. बावजूद इसके, सरकारें ऐसी हिमाकत भरी हरकतें कर रही हैं.
दलित चिंतक और लेखक कंवल भारती ने फेसबुक पर लिखा था-आरक्षण और दुर्गा शक्ति नागपाल, इन दोनों ही मुद्दों पर अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार पूरी तरह फेल हो गई है. अखिलेश, शिवपाल यादव, आजम खान और मुलायम सिंह इन मुद्दों पर अपनी या अपनी सरकार की पीठ कितनी ही ठोंक लें, लेकिन जो हकीकत ये देख नहीं पा रहे हैं, (क्योंकि जनता से पूरी तरह कट गए हैं) वह यह है कि जनता में उनकी थू-थू हो रही है और लोकतंत्र के लिए जनता उन्हें नकारा समझ रही है. अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और बेलगाम मंत्री इंसान से हैवान बन गए हैं. ये अपने पतन की पटकथा खुद लिख रहे हैं. सत्ता के मद में अंधे हो गए इन लोगों को समझाने का मतलब है भैंस के आगे बीन बजाना.
उनकी दूसरी टिप्पणी थी-आपको तो यह ही नहीं पता कि रामपुर में रमजान सालों पुराना मदरसा बुलडोजर चलवाकर गिरा दिया गया और संचालक को विरोध करने पर जेल भेज दिया गया, जो अभी भी जेल में ही है. अखिलेश सरकार ने रामपुर में तो किसी भी अधिकारी को निलंबित नहीं किया. ऐसा इसलिए, क्योंकि रामपुर में आजम खान का राज चलता है, अखिलेश का नहीं. इन टिप्पणियों को लेकर किए गए एफआइआर में दूसरी टिप्पणी के अंतिम में एक अतिरिक्त वाक्य है-आजम खान रामपुर में कुछ भी कर सकते हैं, क्योंकि यह उनका क्षेत्र है और उन्हें खुदा भी नहीं रोक सकता है. इसे लेकर आजम खान के सचिव फसाहत अली खान ने रामपुर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई कि कंवल भारती ने रमजान माह में, आजम खान को खुदा भी नहीं रोक सकता, ऐसा कहकर खुदा की तौहीन की है. उनकी इस टिप्पणी से सांप्रदायिक सौहार्द बिग़ड सकता है. कंवल भारती पर दो वर्गों में वैमनस्य फैलाने के आरोप में धारा-153 ए और धार्मिक भावनाओं का अपमान करने के आरोप में धारा-295 ए लगाई गई. पुलिस ने छह अगस्त की सुबह उन्हें उनके घर से गिरफ्तार कर लिया. हालांकि उन्हें जब कोर्ट पेश किया गया, तो कोर्ट ने उन्हें जमानत देते हुए कहा कि फेसबुक पर टिप्पणी करना कोई अपराध नहीं है.
इस मसले पर लेखकों-कलाकारों के संगठन जन संस्कृति मंच की ओर से कहा गया कि भारती ने फेसबुक पर जो कुछ लिखा, उसे देखकर इस आरोप के फर्जीपन को समझा जा सकता है. जिस प्रदेश में दलितों पर भयावह अत्याचारों के खिलाफ प्राथमिकी तक दर्ज कराना दूभर हो, वहां जिस तत्परता के साथ भारती जैसे जुझारू दलित चिंतक के खिलाफ झूठे आरोप दर्ज कर कार्रवाई की गई. हाल के दिनों में, सोशल मीडिया पर टिप्पणी को लेकर कार्रवाई करने के कई मामले सामने आए हैं. सरकारें मानवाधिकार हनन और अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने में एक-दूसरे से हा़ेड ले रही हैं. उत्तर प्रदेश सरकार कंवल भारती से माफी मांगे और उन पर दर्ज मुकदमा वापस ले. अन्य संगठनों ने भी आंदोलन की धमकी देते हुए कंवल भारती के खिलाफ दर्ज मुकदमा वापस लेने की मांग की है.
इसके पहले मुंबई में युवतियों और असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी के मामले में भी कोर्ट ने गिरफ्तारी के आधार को ही बेबुनियाद बताकर उन्हें जमानत दी थी. इन दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने तल्ख प्रतिक्रिया दी थी. युवतियों की गिरफ्तारी पर काटजू ने मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को लिखा-हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं, न कि किसी तानाशाही व्यवस्था में. हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है. युवतियों ने मुंबई बंद का विरोध किया था, जो कोई अपराध नहीं है, बल्कि जिसने अपराध नहीं किया, उसे गिरफ्तार करना धारा 341 और 342 के तहत अपराध है. जिन पुलिसकर्मियों व अधिकारियों ने दोनों युवतियों की गिरफ्तारी की है, उन्हें निलंबित कर उनपर मुकदमा दर्ज होना चाहिए. युवतियों आईटी एक्ट की धारा 66-ए के तहत गिरफ्तार किया गया था. इसके दुरुपयोग पर सवाल उठाती एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई इसके बाद सरकार ने दिशा-निर्देश जारी किया कि ग्रामीण क्षेत्र में पुलिस उपायुक्त और महानगरों में पुलिस महानिरीक्षक से नीचे रैंक के अधिकारी इस धारा के तहत गिरफ्तारी का आदेश नहीं दे सकते.
भारतीय राजनीति की इस तरह की गैर सोची-समझी कार्रवाइयों को लेकर आम नागरिक को यह जिज्ञासा हो सकती है कि यदि सरकार के कामकाज की मर्यादित आलोचना पर भी जेल हो सकती है, तो लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी का क्या अर्थ है? यदि सत्ता में बैठे लोग कानून का मखौल उ़डाते हुए इस तरह की हरकतों को अंजाम देंगे, तो कानून का लागू किया जाना कौन सुनिश्‍चित करेगा?
(यह रिपोर्ट सितंबर, 2013 में चौथी दुनिया साप्ताहिक में छपी थी.)

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...