सोमवार, 29 अगस्त 2011

बाबूजी की याद में

अक्सरहां ही कागज़ पर 
शब्द शब्द इक इक चुन चुन कर 
मैं जैसे गेहूं बोता हूं  
फसलों में जीवन भरता हूं 
हरी हरी गेहूं की दुद्धा बालियां 
महकती रहती हैं सांसों में 
और पसीने की कुछ बूदें
मिट्टी में घुलती रहती हैं... 

याद आता है बाबूजी 
कैसे खेतों में खटते थे 
थक जाते थे फिर भी 
हल के पीछे पीछे चलते थे 
भीगी देह गमकती थी 
मोती टप-टप-टप झरते थे 
जब फसलें हंसने लगती थीं  
हरियाई फसलों के बीच 
कई घंटों बैठे रहते थे 
वे कहते थे खेतों में 
रोटी की महक घुली रहती है 
खेतों में हो फसल भली तो 
तन में सांस बची रहती है 
सोचता हूं कि बाबूजी ने 
उसी खेत में जा करके
ख़ुदकुशी किस गरज की होगी? 

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