बुधवार, 20 अप्रैल 2016

एक था चंदू

कन्हैया कुमार जेएनयू छात्रसंघ से निकले पहले नेता नहीं हैं, जिनमें कुछ लोग बेहतर राजनीतिक संभावनाएं देख रहे हैं. उनसे पहले इसी छात्रसंघ ने चंद्रशेखर जैसा युवा पैदा किया था, जिसे देश की अापराधिक राजनीति लील गई.




दुनिया में वामपंथ का सबसे मजबूत किला ढह चुका था. दुनिया तेजी से पूंजीवाद की ओर बढ़ रही थी.
उदारीकरण भारत की दहलीज लांघकर अपने को स्थापित कर चुका था. तमाम धुर वामपंथी आवाजें मार्क्सवाद के खात्मे की बात कह रही थीं. उसी दौर की बात है, जब जेएनयू कैंपस में एक युवा छात्रनेता अपने साथियाें से कह रहा था, ‘हम अगर कहीं जाएंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाजों की शक्ति होगी जिनको बचाने की बात हम सड़कों पर करते हैं. अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा होगी तो भगत सिंह जैसे शहीद होने की महत्वाकांक्षा होगी, न कि जेएनयू से इलेक्शन में गांठ जोड़कर चुनाव जीतने और हारने की महत्वाकांक्षा होगी.’ दबी हुई आवाजों को बचाने की अलख जगाने वाले इस युवक का नाम था चंद्रशेखर, जिसे उसके दोस्त प्यार से कॉमरेड चंदू कहा करते थे. जो लोग चंदू को नहीं जानते, उनके मन में सवाल उठेगा कि वे आजकल कहां हैं? जवाब है कि वे भगत सिंह की तरह अंग्रेजी साम्राज्यवाद से लड़ते हुए शहीद तो नहीं हुए, लेकिन लड़ते हुए मारे जाने की उनकी  महत्वाकांक्षा पूरी हो गई. वे अब हमारे बीच नहीं हैं.
जेएनयू में उठे विवाद और छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया की गिरफ्तारी के बाद उनको पूरा देश जान गया. उनके हर भाषण का वीडियो वायरल हो गया. तमाम लोगों ने कन्हैया में एक तेज-तर्रार नेता की छवि देखी. हालांकि, उसी अनुपात में उनकी आलाेचना भी हुई. कन्हैया की लोकप्रियता, उनका जज्बा, उनकी ऊर्जा चंद्रशेखर की याद दिलाती है. दोनों में बहुत असमानताओं के साथ समानता यह है कि दोनों में व्यवस्था से टकराने का माद्दा है. दोनों ही जेएनयू छात्रसंघ की पैदावार हैं. दोनों के सरोकार गरीबों, मजदूरों, दलितों और महिलाओं को संबोधित करते हैं. हां, कन्हैया और चंद्रशेखर में फर्क यह है कि कन्हैया की शुरुआत एक ऐसी गिरफ्तारी से हुई, जिसमें शुरुआती तौर उन्हें बढ़त मिलती दिख रही है. लेकिन चंद्रशेखर बिहार की जनता के लिए एक उम्मीद बनकर उनके बीच काम करने गए थे और बाहुबल की राजनीति ने उन्हें लील लिया.
20 सितंबर, 1964 को बिहार के सीवान जिले ​में जन्मे चंदू आठ बरस के थे जब उनके पिता का देहांत हो गया. सैनिक स्कूल तिलैया से इंटरमीडियट तक की शिक्षा के बाद वे एनडीए प्रशिक्षण के लिए चुने गए. लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा और दो साल बाद वापस आ गए. इसके बाद उनका वामपंथी राजनीति से जुड़ाव हुआ और एआईएसएफ के राज्य उपाध्यक्ष के पद तक पहुंचे. बाद में वे जेएनयू पहुंचे तो कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया लिबरेशन की छात्र इकाई आइसा के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू किया. एक छात्र नेता के रूप में वे बहुत तेजी से उभरे और लोकप्रिय हुए. 1993-94 में जेएनयू छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए और फिर लगातार दो बार अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद वे जमीनी स्तर पर काम करने के म​कसद से अपने गृह जिले सीवान गए, जहां उनका मुकाबला संगीन अपराधियों की खूनी राजनीति से होना था.
सीवान पहुंचकर चंदू ने ​बिहार के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन के खिलाफ उनके गढ़ में ही बिगुल फूंक दिया. उन्होंने बिहार की राजनीति में अपराध, बाहुबल, घोटालों और भ्रष्टाचार के मुद्दों को बहुत प्रमुखता से उठाया. जनता से उनको बेहतर प्रतिक्रिया मिल रही थी. चंदू भारत के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने का सपना देख रहे थे और इसकी शुरुआत भी कर दी थी. बिहार में जनसंहारों और घोटालों के विरोध में 2 अप्रैल, 1997 को बंद बुलाया गया था. ​इस बंद के लिए 31 मार्च शाम चार बजे जेपी चौक पर एक नुक्कड़ सभा को संबोधित करते हुए चंदू और उनके सहयोगी श्याम नारायण को गोलियों से भून दिया गया. इस गोलीबारी में एक ठेलेवाले भुटेले मियां भी मारे गए.
चंद्रशेखर की हत्या के बाद भाकपा माले ने आरोप लगाया, ‘अब तक हमारे कई नेताओं कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है. श्याम नारायण और चंद्रशेखर की हत्या में राजद सांसद शहाबुद्दीन का हाथ है. वही सूत्रधार हैं. जिस समय हत्या हुई, हमारे कार्यकर्ता वहां पर मौजूद थे, जिन्होंने हत्यारों को पहचाना. वे शहाबुद्दीन के साथ के लोग थे. हत्या की वजह राजनीतिक है. हमारी पार्टी ने पिछले चुनाव में शहाबुद्दीन को सशक्त चुनौती दी थी. हमने चुनाव में अपराध के खिलाफ एजेंडा तैयार किया था. शहाबुद्दीन अपराध शिरोमणि हैं. अपराध को एजेंडा बनाने के बाद हमारे कार्यकर्ताओं पर चुन-चुनकर हमला हो रहा है.’
भाकपा माले के नेता रमेश एस. कुशवाहा ने उस समय बयान दिया था, ‘शहाबुद्दीन एक पेशेवर अपराधी रहे हैं. इसके पहले बिहार के बुद्धिजीवी उनके खिलाफ एक शब्द नहीं बोलते थे. पत्रकार कलम चलाने से डरते थे. हम लोगों ने पहली बार अपराध को एजेंडा बनाया और उनके खिलाफ बोलना शुरू किया.’ यह सही है कि इसके पहले भी बिहार चुनाव में कई वामपंथी कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी थी. लोगों को वोट देने से रोकने के लिए अपराधी नेताओं के गुंडे झुंड में पहुंचकर गोलियां चलाते थे और विरोधी पार्टी के मतदाताओं को मतदान से रोकते थे.
हत्या के बाद देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए. चंद्रशेखर के गांव बिंदुसार में देश भर से हजारों छात्र पहुंचे और चंदू की मां के नेतृत्व में मार्च निकाला गया. इस सभा को संबोधित करते हुए चंदू की बूढ़ी मां कौशल्या देवी ने कहा था, ‘मेरा बेटा मर कर भी अमर है और सदा अमर रहेगा. मेरी झोपड़ी को झोपड़ी मत आंकना. इस झोपड़ी की बहुत कीमत है… मेरा बेटा मरा नहीं है. ये हजारों लाल मेरे बेटे हैं.’ चंदू के गांव से चलकर हजारों नौजवानों का जुलूस सीवान के जेपी चौक पहुंचा. बताते हैं कि इतना बड़ा जुलूस सीवान में शायद ही कभी निकला था. दिल्ली में छात्र और बुद्धिजीवियों ने भारी विरोध मार्च निकाला. यह प्रदर्शन पूरे देश में हुआ और शहाबुद्दीन और साधु यादव को सजा देने की मांग की गई. जेएनयू के छात्रों के विरोध मार्च पर पुलिसिया लाठीचार्ज में बड़ी संख्या में लड़के लड़कियां घायल हुए. चंदू की हत्या के बाद दो अप्रैल का बंद और व्यापक हो गया और करीब करीब हिंसक भी रहा. पूरे बिहार में जनता सड़क पर उतरी.
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने राहत राशि के रूप में एक लाख रुपये का चेक भेजा तो चंदू की मां ने यह कहकर लौटा दिया कि ‘बेटे की शहादत के एवज में मैं कोई भी राशि लेना अपमान समझती हूं… मैं उन्हें लानतें भेज रही हूं जिन्होंने मेरे बेटे की जान की कीमत लगाई. एक ऐसी मां के लिए, जिसका इतना बड़ा बेटा मार दिया गया हो और जो यह भी जानती हो कि उसका कातिल कौन है, एकमात्र काम हो सकता है, वह यह है कि कातिल को सजा मिले. मेरा मन तभी शांत होगा महोदय. मेरी एक ही कीमत है, एक ही मांग है कि अपने दुलारे शहाबुद्दीन को किले से बाहर करो या तो उसे फांसी दो या फिर लोगों को यह हक दो कि उसे गोली से उड़ा दें.’
तत्कालीन सरकार से मांग की गई कि शहाबुद्दीन की संसद सदस्यता खारिज की जाए और बिहार आवास पर प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर गोली चलाने वाले साधु यादव को गिरफ्तार किया जाए. प्रधानमंत्री गुजराल ने इन मांगों को अव्यवहारिक बताया. सांसद शहाबुद्दीन गिरफ्तार हुए, लेकिन उनके खिलाफ ठोस सबूत और गवाह नहीं मिले. वे जमानत पर छूट गए. अदालत में यह मामला 15 साल तक खिंचा. आखिरकार बाहुबली नेताओं से संबंध रखने वाले तीन शार्प-शूटरों को उम्रकैद की सजा मिली. शहाबुद्दीन को जेल तो हुई लेकिन अन्य मामलों में. उनके खिलाफ चंद्रशेखर हत्याकांड और अन्य कई मामलों में गवाहों पर इतना अधिक दबाव डाला गया कि कई गवाह घर छोड़कर भाग गए या फिर गवाही से पलट गए. उस दौर में बिहार में शहाबुद्दीन की तूती बोलती थी.
चंदू जब जेएनयूएसयू के उपाध्यक्ष थे, तभी प्रणय कृष्ण अध्यक्ष थे. प्रणय कहते हैं, ‘प्रतिलिपियों से भरी इस दुनिया में चंदू मौलिक होने की जिद के साथ अड़े रहे. हमारी दोस्त प्रथमा कहती थी, ‘वह रेयर आदमी हैं.’ 91-92 में जेएनयू में हमारी तिकड़ी बन गई थी. राजनीति, कविता, संगीत, आवेग और रहन-सहन- सभी में हम एक से थे. हमारा नारा था, ‘पोएट्री, पैशन एंड पाॅलिटिक्स.’ चंदू इस नारे के सबसे ज्यादा करीब थे. समय, परिस्थिति और मौत ने हम तीनों को अलग-अलग ठिकाने लगाया, लेकिन तब तक हम एक-दूसरे के भीतर जीने लगे थे. चंदू कुछ इस तरह जिये कि हमारी कसौटी बनते चले गए. बहुत कुछ स्वाभिमान, ईमान, हिम्मत, मौलिकता और कल्पना- जिसे हम जिंदगी की राह में खोते जाते हैं, चंदू उन सारी खोई चीजों को हमें वापस दिलाते रहे.’
भाकपा माले की नेता कविता कृष्णन कहती हैं, ‘चंद्रशेखर का मामला और अब कन्हैया का मामला, इन दोनों घटनाओें में काेई समानता तो नहीं है, लेकिन ये जेएनयू की भूमिका को जरूर दिखाती हैं. जेएनयू पर इस बार का हमला भाजपा का पहले से प्लान किया हुआ है. इसके पहले भी कोशिश होती रही है जेएनयू को निशाना बनाने की. इस बार उन्होंने इसे लॉन्च किया. चंद्रशेखर की जो हत्या हुई, उसमें कई लोगों की पहले से हत्या हो चुकी थी. चंद्रशेखर यह जानते थे कि वहां खतरा है लेकिन उन्होंने चुना कि मैं वहां का हूं और वहीं जाकर काम करूंगा. वे वहां गए और वहां राजद सांसद ने उनकी हत्या करवाई. दोनों का राजनीतिक संदर्भ है लेकिन दोनों में अंतर है.’
चंदू के व्यक्तित्व के बारे में वे कहती हैं, ‘जितने लोग चंद्रशेखर को जानते थे, वे जानते थे कि उनमें कुछ खास बात थी. वे कोई बहुत करिश्माई नेता नहीं थे. उनकी खास बात थी कि वे 24 घंटे लोगों के लिए समर्पित रहते थे. साधारण से साधारण छात्र कभी भी उनके पास जाकर मदद मांगता था और वे प्रस्तुत रहते थे. जनता के लिए उनमें वास्तविक प्रेम था. वे बहुत समर्पित रहते थे. यह समर्पण उनकी खास बात थी. उनके  सीवान जाने के बाद विरोधियों को पता था कि वे एक जननेता के रूप में उभर रहे हैं. इस खतरे से बचने के लिए उनकी हत्या कर दी गई.’
उनके अनन्य सहयोगी रहे प्रणय कृष्ण के पास उनके बारे में बहुत सारे किस्से हैं. वे बताते हैं, ‘दिल्ली के बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, छात्रों आैैर पत्रकारों के साथ उनका गहरा रिश्ता था. वे बड़े से बड़े बुद्धिजीवी से लेकर रिक्शावालों, डीटीसी के कर्मचारियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को समान रूप से अपनी राजनीति समझा ले जाते थे. महिलाओं में वे प्राय: लोकप्रिय थे क्योंकि जहां भी जाते खाना बनाने से लेकर, सफाई करने तक और बतरस में उनके साथ घुलमिल जाते. छोटे बच्चों के साथ उनका संवाद सीधा और गहरा था. हाॅस्टल में उनका कमरा अनेक ऐसे छात्रों और विद्रोह करने वालों, विरल संवेदनाओं वाले लोगों की आश्रयस्थली था जो कहीं और एेडजस्ट नहीं कर पाते थे. मेस बिल न चुका पाने के कारण छात्रसंघ का अध्यक्ष होने के बावजूद उनके कमरे में प्रशासन का ताला लग जाता. उनके लिए तो जेएनयू का हर कमरा खुला रहता, लेकिन अपने आश्रितों के लिए वे चिंतित रहते. एक बार मेस बिल जमा करने के लिए उन्हें 1600 रुपये इकट्ठा करके दिए गए. अगले दिन पता चला कि कमरा फिर भी नहीं खुला. चंदू ने बड़ी मासूमियत से बताया कि 800 रुपये उन्होंने किसी दूसरे लड़के को दे दिए क्योंकि उसे ज्यादा जरूरत थी.’
जेएनयू के छात्र आज जिस तरह देश भर के दलितों, महिलाओं, मजदूरों, छात्रों आदि के मुद्दे पर सक्रिय रूप में आंदोलन छेड़ते हैं, इसकी बुनियाद में चंदू का बहुत बड़ा योगदान है. जेएनयू में फीस न बढ़ने देने, आरक्षण लागू होने, विश्वविद्यालय के निजीकरण का विरोध करने जैसे मुद्दों पर उन्होंने निर्णायक लड़ाई लड़ी.
प्रणय कृष्ण बताते हैं, ‘जेएनयू छात्रसंघ को उन्होंने देश भर यहां तक कि देश से बाहर चलने वाले जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ दिया. चाहे बर्मा का लोकतंत्र बहाली आंदोलन हो, चाहे पूर्वोत्तर के राज्यों में जातीय हिंसा के खिलाफ बनी शांति कमेटियां हों, नर्मदा  बचाओे आंदोलन हो या टिहरी आंदोलन हो- चंद्रशेखर उन सारे आंदोलनों के अनिवार्य अंग थे. उन्होंने बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर-पूर्व प्रांत के सुदूर क्षेत्रों की यात्राएं भी की थीं. आजाद हिंदुस्तान के किसी एक छात्र नेता ने छात्र आंदोलन को ही सारे जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ने का इतना व्यापक कार्य अगर किया तो सिर्फ चंद्रशेखर ने. यह अतिशयोक्ति नहीं है.’
चंद्रशेखर के समय आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके वी. शंकर कहते हैं, ‘चंदू मास लीडर था. वह होता तो जनता का नेता होता. वह हमारा बहुत महत्वपूर्ण कॉमरेड था. जेएनयू में अध्यक्ष बनने के बावजूद उसने गांव जाकर काम करने को तवज्जो दी और वहां उसे खूब समर्थन मिल रहा था. चंदू की हत्या के बाद सीवान में हुई रैली ऐतिहासिक थी. वह बेहद पढ़ा लिखा, समझदार और जनता की आकांक्षाओं को समझने वाला नेता था, जिसे मार दिया गया.’
कन्हैया में जिन्हें युवा नेतृत्व की संभावना दिखती है, वे सही हैं. लेकिन चंद्रशेखर एक ज्यादा बड़ी उम्मीद का नाम था, जिसे यह देश संभाल नहीं पाया. चंदू में एक अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने की संभावनाएं भी मौजूद थीं. प्रणय अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘1995 में दक्षिणी कोरिया में आयोजित संयुक्त युवा सम्मेलन में वे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जब वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ राजनीतिक प्रस्ताव लाए तो उन्हें यह प्रस्ताव सदन के सामने नहीं रखने दिया गया. समय की कमी का बहाना बनाया गया. चंद्रेशेखर ने वहीं आॅस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और तीसरी दुनिया के देशों के अन्य प्रतिनिधियों का एक ब्लाॅक बनाया और सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया. इसके बाद वे कोरियाई एकीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे जबरदस्त कम्युनिस्ट छात्र आंदोलन के भूमिगत नेताओं से मिले और सियोल में बीस हजार छात्रों की एक रैली को संबोधित किया. यह एक खतरनाक काम था जिसे उन्होंने वापस डिपोर्ट कर दिए जाने का खतरा उठाकर भी अंजाम दिया.’
भाकपा माले नेता कविता कृष्णन का आरोप है कि ‘चंदू की हत्या के मुख्य आरोपियों को तो सजा नहीं हुई. वे कहती हैं,  ‘शूटरों को सजा हुई थी. लेकिन अब  ऐसा सुनने में आ रहा है कि उन्हें भी छोड़ने की कोशिश की जा रही है. हालांकि, हम लोग इसे लेकर सतर्क हैं. ऐसा होता है तो हम विरोध करेंगे.’
चंदू के बारे में एक मशहूर घटना है. 1993 में छात्रसंघ के चुनाव के दौरान छात्रों से संवाद में किसी ने उनसे पूछा, ‘क्या आप किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए चुनाव लड़ रहे हैं?’ इसके जवाब में उन्होंने कहा था, ‘हां, मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है- भगत सिंह की तरह जीवन, चे ग्वेरा की तरह मौत.’ उनके दोस्त गर्व से कहते हैं कि चंदू ने अपना वायदा पूरा किया.
(यह लेख तहलका में प्रकाशित हो चुका है.)

बुधवार, 23 मार्च 2016

मैं नास्तिक क्यों हूँ?

भगत सिंह 

भगत सिंह ने जेल में रहते हुए यह लेख लिखा था जो 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार 'द पीपल' में प्रकाशित हुआ. भगत सिंह का यह लेख बेहद चर्चित रहा है जिसमें वे ईश्वर की उपस्थिति को लेकर तार्किक ढंग से सवाल खड़े करते हैं. भगत सिंह की नास्तिकता और उनकी ​क्रांतिकारिता का चरम उद्देश्य थी मानवता. जो भी बात मानवता की राह में रोड़ा बनकर खड़ी हुई, भगत सिंह उसे खारिज कर देते थे.  


एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी तथा सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता हूँ? मेरे कुछ दोस्त– शायद ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूँ– मेरे साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा आगे जा रहा हूँ और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे इस अविश्वास के लिये उकसाया है। मैं ऐसी कोई शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमज़ोरियों से बहुत ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं। कोई भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। यह कमज़ोरी मेरे अन्दर भी है। अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग है। अपने कामरेडो के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था। यहाँ तक कि मेरे दोस्त श्री बटुकेश्वर कुमार दत्त भी मुझे कभी-कभी ऐसा कहते थे। कई मौकों पर स्वेच्छाचारी कह मेरी निन्दा भी की गयी। कुछ दोस्तों को शिकायत है, और गम्भीर रूप से है कि मैं अनचाहे ही अपने विचार, उन पर थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। यह बात कुछ हद तक सही है। इससे मैं इनकार नहीं करता। इसे अहंकार कहा जा सकता है। जहाँ तक अन्य प्रचलित मतों के मुकाबले हमारे अपने मत का सवाल है। मुझे निश्चय ही अपने मत पर गर्व है। लेकिन यह व्यक्तिगत नहीं है। ऐसा हो सकता है कि यह केवल अपने विश्वास के प्रति न्यायोचित गर्व हो और इसको घमण्ड नहीं कहा जा सकता। घमण्ड तो स्वयं के प्रति अनुचित गर्व की अधिकता है। क्या यह अनुचित गर्व है, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया? अथवा इस विषय का खूब सावधानी से अध्ययन करने और उस पर खूब विचार करने के बाद मैंने ईश्वर पर अविश्वास किया?

मैं यह समझने में पूरी तरह से असफल रहा हूँ कि अनुचित गर्व या वृथाभिमान किस तरह किसी व्यक्ति के ईश्वर में विश्वास करने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है? किसी वास्तव में महान व्यक्ति की महानता को मैं मान्यता न दूँ– यह तभी हो सकता है, जब मुझे भी थोड़ा ऐसा यश प्राप्त हो गया हो जिसके या तो मैं योग्य नहीं हूँ या मेरे अन्दर वे गुण नहीं हैं, जो इसके लिये आवश्यक हैं। यहाँ तक तो समझ में आता है। लेकिन यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति, जो ईश्वर में विश्वास रखता हो, सहसा अपने व्यक्तिगत अहंकार के कारण उसमें विश्वास करना बन्द कर दे? दो ही रास्ते सम्भव हैं। या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे। इन दोनो ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता। पहली अवस्था में तो वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के अस्तित्व को नकारता ही नहीं है। दूसरी अवस्था में भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है, जो पर्दे के पीछे से प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है। मैं तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से ही इनकार करता हूँ। यह अहंकार नहीं है, जिसने मुझे नास्तिकता के सिद्धान्त को ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया। मैं न तो एक प्रतिद्वन्द्वी हूँ, न ही एक अवतार और न ही स्वयं परमात्मा। इस अभियोग को अस्वीकार करने के लिये आइए तथ्यों पर गौर करें। मेरे इन दोस्तों के अनुसार, दिल्ली बम केस और लाहौर षडयन्त्र केस के दौरान मुझे जो अनावश्यक यश मिला, शायद उस कारण मैं वृथाभिमानी हो गया हूँ।
मेरा नास्तिकतावाद कोई अभी हाल की उत्पत्ति नहीं है। मैंने तो ईश्वर पर विश्वास करना तब छोड़ दिया था, जब मैं एक अप्रसिद्ध नौजवान था। कम से कम एक कालेज का विद्यार्थी तो ऐसे किसी अनुचित अहंकार को नहीं पाल-पोस सकता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाये। यद्यपि मैं कुछ अध्यापकों का चहेता था तथा कुछ अन्य को मैं अच्छा नहीं लगता था। पर मैं कभी भी बहुत मेहनती अथवा पढ़ाकू विद्यार्थी नहीं रहा। अहंकार जैसी भावना में फँसने का कोई मौका ही न मिल सका। मैं तो एक बहुत लज्जालु स्वभाव का लड़का था, जिसकी भविष्य के बारे में कुछ निराशावादी प्रकृति थी। मेरे बाबा, जिनके प्रभाव में मैं बड़ा हुआ, एक रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं। एक आर्य समाजी और कुछ भी हो, नास्तिक नहीं होता। अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने डी0 ए0 वी0 स्कूल, लाहौर में प्रवेश लिया और पूरे एक साल उसके छात्रावास में रहा। वहाँ सुबह और शाम की प्रार्थना के अतिरिक्त में घण्टों गायत्री मंत्र जपा करता था। उन दिनों मैं पूरा भक्त था। बाद में मैंने अपने पिता के साथ रहना शुरू किया। जहाँ तक धार्मिक रूढ़िवादिता का प्रश्न है, वह एक उदारवादी व्यक्ति हैं। उन्हीं की शिक्षा से मुझे स्वतन्त्रता के ध्येय के लिये अपने जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा मिली। किन्तु वे नास्तिक नहीं हैं। उनका ईश्वर में दृढ़ विश्वास है। वे मुझे प्रतिदिन पूजा-प्रार्थना के लिये प्रोत्साहित करते रहते थे। इस प्रकार से मेरा पालन-पोषण हुआ। असहयोग आन्दोलन के दिनों में राष्ट्रीय कालेज में प्रवेश लिया। यहाँ आकर ही मैंने सारी धार्मिक समस्याओं– यहाँ तक कि ईश्वर के अस्तित्व के बारे में उदारतापूर्वक सोचना, विचारना तथा उसकी आलोचना करना शुरू किया। पर अभी भी मैं पक्का आस्तिक था। उस समय तक मैं अपने लम्बे बाल रखता था। यद्यपि मुझे कभी-भी सिक्ख या अन्य धर्मों की पौराणिकता और सिद्धान्तों में विश्वास न हो सका था। किन्तु मेरी ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ निष्ठा थी। बाद में मैं क्रान्तिकारी पार्टी से जुड़ा। वहाँ जिस पहले नेता से मेरा सम्पर्क हुआ वे तो पक्का विश्वास न होते हुए भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का साहस ही नहीं कर सकते थे। ईश्वर के बारे में मेरे हठ पूर्वक पूछते रहने पर वे कहते, ‘'जब इच्छा हो, तब पूजा कर लिया करो।'’ यह नास्तिकता है, जिसमें साहस का अभाव है। दूसरे नेता, जिनके मैं सम्पर्क में आया, पक्के श्रद्धालु आदरणीय कामरेड शचीन्द्र नाथ सान्याल आजकल काकोरी षडयन्त्र केस के सिलसिले में आजीवन कारवास भोग रहे हैं। उनकी पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ ईश्वर की महिमा का ज़ोर-शोर से गान है। उन्होंने उसमें ईश्वर के ऊपर प्रशंसा के पुष्प रहस्यात्मक वेदान्त के कारण बरसाये हैं। 28 जनवरी, 1925 को पूरे भारत में जो ‘दि रिवोल्यूशनरी’ (क्रान्तिकारी) पर्चा बाँटा गया था, वह उन्हीं के बौद्धिक श्रम का परिणाम है। उसमें सर्वशक्तिमान और उसकी लीला एवं कार्यों की प्रशंसा की गयी है। मेरा ईश्वर के प्रति अविश्वास का भाव क्रान्तिकारी दल में भी प्रस्फुटित नहीं हुआ था। काकोरी के सभी चार शहीदों ने अपने अन्तिम दिन भजन-प्रार्थना में गुजारे थे। राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ एक रूढ़िवादी आर्य समाजी थे। समाजवाद तथा साम्यवाद में अपने वृहद अध्ययन के बावजूद राजेन लाहड़ी उपनिषद एवं गीता के श्लोकों के उच्चारण की अपनी अभिलाषा को दबा न सके। मैंने उन सब मे सिर्फ एक ही व्यक्ति को देखा, जो कभी प्रार्थना नहीं करता था और कहता था, ‘'दर्शन शास्त्र मनुष्य की दुर्बलता अथवा ज्ञान के सीमित होने के कारण उत्पन्न होता है। वह भी आजीवन निर्वासन की सजा भोग रहा है। परन्तु उसने भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की कभी हिम्मत नहीं की।
इस समय तक मैं केवल एक रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी था। अब तक हम दूसरों का अनुसरण करते थे। अब अपने कन्धों पर ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था। यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था। ‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी – विरोधियों द्वारा रखे गये तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिये अध्ययन करो। अपने मत के पक्ष में तर्क देने के लिये सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया। इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए। रोमांस की जगह गम्भीर विचारों ने ली ली। न और अधिक रहस्यवाद, न ही अन्धविश्वास। यथार्थवाद हमारा आधार बना। मुझे विश्वक्रान्ति के अनेक आदर्शों के बारे में पढ़ने का खूब मौका मिला। मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, कुछ साम्यवाद के पिता माक्र्स को, किन्तु अधिक लेनिन, त्रात्स्की, व अन्य लोगों को पढ़ा, जो अपने देश में सफलतापूर्वक क्रान्ति लाये थे। ये सभी नास्तिक थे। बाद में मुझे निरलम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मिली। इसमें रहस्यवादी नास्तिकता थी। 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि एक सर्वशक्तिमान परम आत्मा की बात, जिसने ब्रह्माण्ड का सृजन, दिग्दर्शन और संचालन किया, एक कोरी बकवास है। मैंने अपने इस अविश्वास को प्रदर्शित किया। मैंने इस विषय पर अपने दोस्तों से बहस की। मैं एक घोषित नास्तिक हो चुका था।
मई 1927 में मैं लाहौर में गिरफ़्तार हुआ। रेलवे पुलिस हवालात में मुझे एक महीना काटना पड़ा। पुलिस अफ़सरों ने मुझे बताया कि मैं लखनऊ में था, जब वहाँ काकोरी दल का मुकदमा चल रहा था, कि मैंने उन्हें छुड़ाने की किसी योजना पर बात की थी, कि उनकी सहमति पाने के बाद हमने कुछ बम प्राप्त किये थे, कि 1927 में दशहरा के अवसर पर उन बमों में से एक परीक्षण के लिये भीड़ पर फेंका गया, कि यदि मैं क्रान्तिकारी दल की गतिविधियों पर प्रकाश डालने वाला एक वक्तव्य दे दूँ, तो मुझे गिरफ़्तार नहीं किया जायेगा और इसके विपरीत मुझे अदालत में मुखबिर की तरह पेश किये बेगैर रिहा कर दिया जायेगा और इनाम दिया जायेगा। मैं इस प्रस्ताव पर हँसा। यह सब बेकार की बात थी। हम लोगों की भाँति विचार रखने वाले अपनी निर्दोष जनता पर बम नहीं फेंका करते। एक दिन सुबह सी0 आई0 डी0 के वरिष्ठ अधीक्षक श्री न्यूमन ने कहा कि यदि मैंने वैसा वक्तव्य नहीं दिया, तो मुझ पर काकोरी केस से सम्बन्धित विद्रोह छेड़ने के षडयन्त्र तथा दशहरा उपद्रव में क्रूर हत्याओं के लिये मुकदमा चलाने पर बाध्य होंगे और कि उनके पास मुझे सजा दिलाने व फाँसी पर लटकवाने के लिये उचित प्रमाण हैं। उसी दिन से कुछ पुलिस अफ़सरों ने मुझे नियम से दोनो समय ईश्वर की स्तुति करने के लिये फुसलाना शुरू किया। पर अब मैं एक नास्तिक था। मैं स्वयं के लिये यह बात तय करना चाहता था कि क्या शान्ति और आनन्द के दिनों में ही मैं नास्तिक होने का दम्भ भरता हूँ या ऐसे कठिन समय में भी मैं उन सिद्धान्तों पर अडिग रह सकता हूँ। बहुत सोचने के बाद मैंने निश्चय किया कि किसी भी तरह ईश्वर पर विश्वास तथा प्रार्थना मैं नहीं कर सकता। नहीं, मैंने एक क्षण के लिये भी नहीं की। यही असली परीक्षण था और मैं सफल रहा। अब मैं एक पक्का अविश्वासी था और तब से लगातार हूँ। इस परीक्षण पर खरा उतरना आसान काम न था। ‘विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है। यहाँ तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है। तूफ़ान और झंझावात के बीच अपने पाँवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन कर उड़ जाता है और मनुष्य अपने विश्वास को ठुकराने का साहस नहीं कर पाता। यदि ऐसा करता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार नहीं वरन् कोई अन्य शक्ति है। आज बिलकुल वैसी ही स्थिति है। निर्णय का पूरा-पूरा पता है। एक सप्ताह के अन्दर ही यह घोषित हो जायेगा कि मैं अपना जीवन एक ध्येय पर न्योछावर करने जा रहा हूँ। इस विचार के अतिरिक्त और क्या सान्त्वना हो सकती है? ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म पर राजा होने की आशा कर सकता है। एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की तथा अपने कष्टों और बलिदान के लिये पुरस्कार की कल्पना कर सकता है। किन्तु मैं क्या आशा करूँ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा – वह अन्तिम क्षण होगा। मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जायेगी। आगे कुछ न रहेगा। एक छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी – यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो। बिना किसी स्वार्थ के यहाँ या यहाँ के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतन्त्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था। जिस दिन हमें इस मनोवृत्ति के बहुत-से पुरुष और महिलाएँ मिल जायेंगे, जो अपने जीवन को मनुष्य की सेवा और पीड़ित मानवता के उद्धार के अतिरिक्त कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारम्भ होगा। वे शोषकों, उत्पीड़कों और अत्याचारियों को चुनौती देने के लिये उत्प्रेरित होंगे। इस लिये नहीं कि उन्हें राजा बनना है या कोई अन्य पुरस्कार प्राप्त करना है यहाँ या अगले जन्म में या मृत्योपरान्त स्वर्ग में। उन्हें तो मानवता की गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंकने और मुक्ति एवं शान्ति स्थापित करने के लिये इस मार्ग को अपनाना होगा। क्या वे उस रास्ते पर चलेंगे जो उनके अपने लिये ख़तरनाक किन्तु उनकी महान आत्मा के लिये एक मात्र कल्पनीय रास्ता है। क्या इस महान ध्येय के प्रति उनके गर्व को अहंकार कहकर उसका गलत अर्थ लगाया जायेगा? कौन इस प्रकार के घृणित विशेषण बोलने का साहस करेगा? या तो वह मूर्ख है या धूर्त। हमें चाहिए कि उसे क्षमा कर दें, क्योंकि वह उस हृदय में उद्वेलित उच्च विचारों, भावनाओं, आवेगों तथा उनकी गहराई को महसूस नहीं कर सकता। उसका हृदय मांस के एक टुकड़े की तरह मृत है। उसकी आँखों पर अन्य स्वार्थों के प्रेतों की छाया पड़ने से वे कमज़ोर हो गयी हैं। स्वयं पर भरोसा रखने के गुण को सदैव अहंकार की संज्ञा दी जा सकती है। यह दुखपूर्ण और कष्टप्रद है, पर चारा ही क्या है?
आलोचना और स्वतन्त्र विचार एक क्रान्तिकारी के दोनो अनिवार्य गुण हैं। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने किसी परम आत्मा के प्रति विश्वास बना लिया था। अतः कोई भी व्यक्ति जो उस विश्वास को सत्यता या उस परम आत्मा के अस्तित्व को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी, विश्वासघाती कहा जायेगा। यदि उसके तर्क इतने अकाट्य हैं कि उनका खण्डन वितर्क द्वारा नहीं हो सकता और उसकी आस्था इतनी प्रबल है कि उसे ईश्वर के प्रकोप से होने वाली विपत्तियों का भय दिखा कर दबाया नहीं जा सकता तो उसकी यह कह कर निन्दा की जायेगी कि वह वृथाभिमानी है। यह मेरा अहंकार नहीं था, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया। मेरे तर्क का तरीका संतोषप्रद सिद्ध होता है या नहीं इसका निर्णय मेरे पाठकों को करना है, मुझे नहीं। मैं जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास ने आज मेरा जीवन आसान और मेरा बोझ हलका कर दिया होता। उस पर मेरे अविश्वास ने सारे वातावरण को अत्यन्त शुष्क बना दिया है। थोड़ा-सा रहस्यवाद इसे कवित्वमय बना सकता है। किन्तु मेरे भाग्य को किसी उन्माद का सहारा नहीं चाहिए। मैं यथार्थवादी हूँ। मैं अन्तः प्रकृति पर विवेक की सहायता से विजय चाहता हूँ। इस ध्येय में मैं सदैव सफल नहीं हुआ हूँ। प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है। सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है। कोई भी मनुष्य, जिसमें तनिक भी विवेक शक्ति है, वह अपने वातावरण को तार्किक रूप से समझना चाहेगा। जहाँ सीधा प्रमाण नहीं है, वहाँ दर्शन शास्त्र का महत्व है। जब हमारे पूर्वजों ने फुरसत के समय विश्व के रहस्य को, इसके भूत, वर्तमान एवं भविष्य को, इसके क्यों और कहाँ से को समझने का प्रयास किया तो सीधे परिणामों के कठिन अभाव में हर व्यक्ति ने इन प्रश्नों को अपने ढ़ंग से हल किया। यही कारण है कि विभिन्न धार्मिक मतों में हमको इतना अन्तर मिलता है, जो कभी-कभी वैमनस्य तथा झगड़े का रूप ले लेता है। न केवल पूर्व और पश्चिम के दर्शनों में मतभेद है, बल्कि प्रत्येक गोलार्ध के अपने विभिन्न मतों में आपस में अन्तर है। पूर्व के धर्मों में, इस्लाम तथा हिन्दू धर्म में ज़रा भी अनुरूपता नहीं है। भारत में ही बौद्ध तथा जैन धर्म उस ब्राह्मणवाद से बहुत अलग है, जिसमें स्वयं आर्यसमाज व सनातन धर्म जैसे विरोधी मत पाये जाते हैं। पुराने समय का एक स्वतन्त्र विचारक चार्वाक है। उसने ईश्वर को पुराने समय में ही चुनौती दी थी। हर व्यक्ति अपने को सही मानता है। दुर्भाग्य की बात है कि बजाय पुराने विचारकों के अनुभवों तथा विचारों को भविष्य में अज्ञानता के विरुद्ध लड़ाई का आधार बनाने के हम आलसियों की तरह, जो हम सिद्ध हो चुके हैं, उनके कथन में अविचल एवं संशयहीन विश्वास की चीख पुकार करते रहते हैं और इस प्रकार मानवता के विकास को जड़ बनाने के दोषी हैं।
सिर्फ विश्वास और अन्ध विश्वास ख़तरनाक है। यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है। जो मनुष्य अपने को यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे समस्त प्राचीन रूढ़िगत विश्वासों को चुनौती देनी होगी। प्रचलित मतों को तर्क की कसौटी पर कसना होगा। यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके, तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेगा। तब नये दर्शन की स्थापना के लिये उनको पूरा धराशायी करकेे जगह साफ करना और पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग करके पुनर्निमाण करना। मैं प्राचीन विश्वासांे के ठोसपन पर प्रश्न करने के सम्बन्ध में आश्वस्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन परम आत्मा का, जो प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करता है, कोई अस्तित्व नहीं है। हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगतिशील आन्दोलन का ध्येय मनुष्य द्वारा अपनी सेवा के लिये प्रकृति पर विजय प्राप्त करना मानते हैं। इसको दिशा देने के पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है। यही हमारा दर्शन है। हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं।
यदि आपका विश्वास है कि एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बतायें कि उसने यह रचना क्यों की? कष्टों और संतापों से पूर्ण दुनिया – असंख्य दुखों के शाश्वत अनन्त गठबन्धनों से ग्रसित! एक भी व्यक्ति तो पूरी तरह संतृष्ट नही है। कृपया यह न कहें कि यही उसका नियम है। यदि वह किसी नियम से बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है। वह भी हमारी ही तरह नियमों का दास है। कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका मनोरंजन है। नीरो ने बस एक रोम जलाया था। उसने बहुत थोड़ी संख्या में लोगांें की हत्या की थी। उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने पूर्ण मनोरंजन के लिये। और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाये जाते हैं। पन्ने उसकी निन्दा के वाक्यों से काले पुते हैं, भत्र्सना करते हैं – नीरो एक हृदयहीन, निर्दयी, दुष्ट। एक चंगेज खाँ ने अपने आनन्द के लिये कुछ हजार जानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं। तब किस प्रकार तुम अपने ईश्वर को न्यायोचित ठहराते हो? उस शाश्वत नीरो को, जो हर दिन, हर घण्टे ओर हर मिनट असंख्य दुख देता रहा, और अभी भी दे रहा है। फिर तुम कैसे उसके दुष्कर्मों का पक्ष लेने की सोचते हो, जो चंगेज खाँ से प्रत्येक क्षण अधिक है? क्या यह सब बाद में इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और गलती करने वालों को दण्ड देने के लिये हो रहा है? ठीक है, ठीक है। तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे, जो हमारे शरीर पर घाव करने का साहस इसलिये करता है कि बाद में मुलायम और आरामदायक मलहम लगायेगा? ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापक कहाँ तक उचित करते थे कि एक भूखे ख़ूंख़्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि, यदि वह उससे जान बचा लेता है, तो उसकी खूब देखभाल की जायेगी? इसलिये मैं पूछता हूँ कि उस चेतन परम आत्मा ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों की रचना क्यों की? आनन्द लूटने के लिये? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?
तुम मुसलमानो और ईसाइयो! तुम तो पूर्वजन्म में विश्वास नहीं करते। तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है। मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने शब्द द्वारा विश्व के उत्पत्ति के लिये छः दिन तक क्यों परिश्रम किया? और प्रत्येक दिन वह क्यों कहता है कि सब ठीक है? बुलाओ उसे आज। उसे पिछला इतिहास दिखाओ। उसे आज की परिस्थितियों का अध्ययन करने दो। हम देखेंगे कि क्या वह कहने का साहस करता है कि सब ठीक है। कारावास की काल-कोठरियों से लेकर झोपड़ियों की बस्तियों तक भूख से तड़पते लाखों इन्सानों से लेकर उन शोषित मज़दूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक निरुत्साह से देख रहे हैं तथा उस मानवशक्ति की बर्बादी देख रहे हैं, जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा, और अधिक उत्पादन को ज़रूरतमन्द लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देना बेहतर समझने से लेकर राजाआंे के उन महलों तक जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है- उसको यह सब देखने दो और फिर कहे – सब कुछ ठीक है! क्यों और कहाँ से? यही मेरा प्रश्न है। तुम चुप हो। ठीक है, तो मैं आगे चलता हूँ।
और तुम हिन्दुओ, तुम कहते हो कि आज जो कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं और आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनन्द लूट रहे हैं। मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे। उन्होंने ऐसे सिद्धान्त गढ़े, जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफ़ी ताकत है। न्यायशास्त्र के अनुसार दण्ड को अपराधी पर पड़ने वाले असर के आधार पर केवल तीन कारणों से उचित ठहराया जा सकता है। वे हैं – प्रतिकार, भय तथा सुधार। आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धान्त की निन्दा की जाती है। भयभीत करने के सिद्धान्त का भी अन्त वहीं है। सुधार करने का सिद्धान्त ही केवल आवश्यक है और मानवता की प्रगति के लिये अनिवार्य है। इसका ध्येय अपराधी को योग्य और शान्तिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है। किन्तु यदि हम मनुष्यों को अपराधी मान भी लें, तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिये गये दण्ड की क्या प्रकृति है? तुम कहते हो वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है। तुम ऐसे 84 लाख दण्डों को गिनाते हो। मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर इनका सुधारक के रूप में क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो, जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गधा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं? अपने पुराणों से उदाहरण न दो। मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। और फिर क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है। गरीबी एक अभिशाप है। यह एक दण्ड है। मैं पूछता हूँ कि दण्ड प्रक्रिया की कहाँ तक प्रशंसा करें, जो अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे? क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था या उसको भी ये सारी बातें मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो, किसी गरीब या अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का क्या भाग्य होगा? चूँकि वह गरीब है, इसलिये पढ़ाई नहीं कर सकता। वह अपने साथियों से तिरस्कृत एवं परित्यक्त रहता है, जो ऊँची जाति में पैदा होने के कारण अपने को ऊँचा समझते हैं। उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं। यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोेगेगा? ईष्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दण्ड के बारे में क्या होगा, जिन्हें दम्भी ब्राह्मणों ने जानबूझ कर अज्ञानी बनाये रखा तथा जिनको तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों – वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा सहन करने की सजा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिये कौन ज़िम्मेदार होगा? और उनका प्रहार कौन सहेगा? मेरे प्रिय दोस्तों! ये सिद्धान्त विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं। ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं। अपटान सिंक्लेयर ने लिखा था कि मनुष्य को बस अमरत्व में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसकी सारी सम्पत्ति लूट लो। वह बगैर बड़बड़ाये इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा। धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबन्धन से ही जेल, फाँसी, कोड़े और ये सिद्धान्त उपजते हैं।
मैं पूछता हूँ तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को क्यों नहीं उस समय रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? यह तो वह बहुत आसानी से कर सकता है। उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं की लड़ने की उग्रता को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे बचाया? उसने अंग्रेजों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने की भावना क्यों नहीं पैदा की? वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर अपना व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार त्याग दें और इस प्रकार केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव समाज को पूँजीवादी बेड़ियों से मुक्त करें? आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं। मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह लागू करे। जहाँ तक सामान्य भलाई की बात है, लोग समाजवाद के गुणों को मानते हैं। वे इसके व्यावहारिक न होने का बहाना लेकर इसका विरोध करते हैं। परमात्मा को आने दो और वह चीज को सही तरीके से कर दे। अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिये नहीं है कि ईश्वर चाहता है बल्कि इसलिये कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं। वे हमको अपने प्रभुत्व में ईश्वर की मदद से नहीं रखे हैं, बल्कि बन्दूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे। यह हमारी उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निन्दनीय अपराध – एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचार पूर्ण शोषण – सफलतापूर्वक कर रहे हैं। कहाँ है ईश्वर? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? एक नीरो, एक चंगेज, उसका नाश हो!
क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति तथा मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बताता हूँ। चाल्र्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है। उसे पढ़ो। यह एक प्रकृति की घटना है। विभिन्न पदार्थों के, नीहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी। कब? इतिहास देखो। इसी प्रकार की घटना से जन्तु पैदा हुए और एक लम्बे दौर में मानव। डार्विन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो। और तदुपरान्त सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति के लगातार विरोध और उस पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा से हुआ। यह इस घटना की सम्भवतः सबसे सूक्ष्म व्याख्या है।
तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अन्धा या लंगड़ा पैदा होता है? क्या यह उसके पूर्वजन्म में किये गये कार्यों का फल नहीं है? जीवविज्ञान वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाल लिया है। अवश्य ही तुम एक और बचकाना प्रश्न पूछ सकते हो। यदि ईश्वर नहीं है, तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर सूक्ष्म तथा स्पष्ट है। जिस प्रकार वे प्रेतों तथा दुष्ट आत्माओं में विश्वास करने लगे। अन्तर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और दर्शन अत्यन्त विकसित। इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को है, जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे तथा उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे। सभी धर्म, समप्रदाय, पन्थ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं। राजा के विरुद्ध हर विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है।
मनुष्य की सीमाओं को पहचानने पर, उसकी दुर्बलता व दोष को समझने के बाद परीक्षा की घड़ियों में मनुष्य को बहादुरी से सामना करने के लिये उत्साहित करने, सभी ख़तरों को पुरुषत्व के साथ झेलने तथा सम्पन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिये ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना हुई। अपने व्यक्तिगत नियमों तथा अभिभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ा कर कल्पना एवं चित्रण किया गया। जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है, तो उसका उपयोग एक भय दिखाने वाले के रूप में किया जाता है। ताकि कोई मनुष्य समाज के लिये ख़तरा न बन जाये। जब उसके अभिभावक गुणों की व्याख्या होती ह,ै तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है। जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों द्वारा विश्वासघात तथा त्याग देने से अत्यन्त क्लेष में हो, तब उसे इस विचार से सान्त्वना मिल सकती हे कि एक सदा सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसको सहारा देगा तथा वह सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है। वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिये उपयोगी था। पीड़ा में पड़े मनुष्य के लिये ईश्वर की कल्पना उपयोगी होती है। समाज को इस विश्वास के विरुद्ध लड़ना होगा। मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करता है तथा यथार्थवादी बन जाता है, तब उसे श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पुरुषत्व के साथ सामना करना चाहिए, जिनमें परिस्थितियाँ उसे पटक सकती हैं। यही आज मेरी स्थिति है। यह मेरा अहंकार नहीं है, मेरे दोस्त! यह मेरे सोचने का तरीका है, जिसने मुझे नास्तिक बनाया है। ईश्वर में विश्वास और रोज़-ब-रोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ। मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा हे, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया। अतः मैं भी एक पुरुष की भाँति फाँसी के फन्दे की अन्तिम घड़ी तक सिर ऊँचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ।
हमें देखना है कि मैं कैसे निभा पाता हूँ। मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा। जब मैंने उसे नास्तिक होने की बात बतायी तो उसने कहा, ‘'अपने अन्तिम दिनों में तुम विश्वास करने लगोगे।'’ मैंने कहा, ‘'नहीं, प्यारे दोस्त, ऐसा नहीं होगा। मैं इसे अपने लिये अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझाता हूँ। स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूँगा।'’ पाठकों और दोस्तों, क्या यह अहंकार है? अगर है तो मैं स्वीकार करता हूँ।

आचार्य रामपलट दास: जोगीरा सा रा रा रा

आचार्य रामपलट दास जी फागुन लगते ही फगुआ जाते हैं और लगभग पूरे फागुन कमाल करते हैं. होली नियराते ही इस बार भी वे फगुआ गए हैं और उनकी फेसबुक वॉल जोगीरा से भरी है. उनकी इन दो—दो पंक्तिओं की कविता में बहुत ताकतवर ढंग से तंज किया जाता है. कविता की यह ताकत बहुत विद्वतापूर्ण कविताओं में नदारद रहती है. उनकी वॉल से टीपकर यहां पर कुछ पंक्तियां आपसे साझा कर रहा हूं. 


कै रुपया में भइंस बिकाए, कै रुपया में गाय
कै रुपया थैली में लेके, बिका विधायक जाय जोगीरा सा रा रा रा
एक लाख में भैंस बिकाए, हज्जारों में गाय
पांच करोड़ी थैली खातिर, बिका विधायक जाय जोगीरा सा रा रा रा
भइंस बिकाई दानापुर में, बछिया गंगापार
देवभूमि में बिके विधायक, चित्त पड़ी सरकार जोगीरा सा रा रा रा
नारा सुनके जेल दिखावे , लेख लिखे पर रार
मौन सभा पर लाठी भाँजे, डरी हुई सरकार जोगीरा सा रा रा रा
कौन मिठाई चमचम चमके, कौन बिके बाज़ार
कौन मिठाई माछी भिनके , नाम केकर सरकार जोगीरा सा रा रा रा रा
संघ मिठाई चमचम चमके, राष्ट्र बिके बाज़ार
तर्क मिठाई माछी भिनके, हाफ़ पैन्ट सरकार जोगीरा सा रा रा रा रा
उचक उचक कर भौंचक देखें, पल्टू लम्बरदार
मोम के पुतले जैसा दिक्खे , ईश्वर का उपहार जोगीरा सा रा रा रा
पेट नपा छाती नपी नप गए नाक और कान
अमर भए की चाह में नपे पन्त परधान जोगीरा सा रा रा रा
मीरपूर में मीर कहाए, ढाका अफ़लातून
नागपूर में नानी मर गी, उतर गयी पतलून जोगीरा सा रा रा
एक कुआं में चार कबुत्तर, चारों मांगे नून
निक्कर की इनटॉलरेन्स को, ढंकी रखे पतलून जोगीरा सा रा रा रा
दुनिया बदली देश बदल ग्या, बदले कइ कानून
देखा-देखी बदल रही है , निक्कर से पतलून जोगीरा सा रा रा रा
बाबा मांगे मुंह बा बा के , चेला दांत चियार
श्री श्री मांगे नाच नाच के, झुकी खड़ी सरकार जोगीरा सा रा रा रा रा
पूँछ पटक कर कुक्कुर खाए, चाट-चाट बिल्लार
सफाचट्ट कर माल्या खाया, खोज रही सरकार जोगीरा सा रा रा रा
स्वर्ग बिक चुका मोक्ष बिक चुका बिका अध्यात्म का अंजन
श्री श्री बेचें तेल केश का रामदेव जी मंजन जोगीरा सा रा रा रा
कौने खेत में गोहूँ उपजे, कवन खेत में धान
कौन खेत में लड़े लड़ाई , के होला बलिदान जोगीरा सा रा रा रा
दोमट खेत में गोहूँ उपजे, मटियारे में धान
लोन चुकावत सब कुछ हारे, जाए कहाँ किसान जोगीरा सा रा रा रा
केकर बाटे कोठी कटरा , के सींचेला लान
के नुक्कड़ पर रोज बिकाला, केकर सस्ती जान जोगीरा सा रा रा रा
नेताजी क कोठी कटरा, अफ़सर सींचें लॉन
हर नुक्कड़ मजदूर बिकाला, फाँसी चढ़े किसान जोगीरा सा रा रा रा
मूस मोटाई लोढ़ा होई , काटी सबकर कान
घाटी वाली गद्दी ख़ातिर , घुसुर गइल सब ग्यान ... जोगीरा सा रा रा रा
कवन डाल से उड़ल चिरइया, कवन डाल पर जाय
कवन डाल से दाना चुन के , कवन राग में गाय ... जोगीरा सा रा रा रा
संघ भवन से उड़ल चिरइया , मठ-महन्थ पर जाय
अम्बनियन से चन्दा ले के , राष्ट्र राष्ट्र चिल्लाय ... जोगीरा सा रा रा रा

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देशभक्तों का महान संगठन?


प्रभाष जोशी 

(अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है.)

….अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के लिए वंदेमातरम् का गाना अनिवार्य करने की मांग संघ परिवारियों की ही रही है. ये वही लोग हैं जिनने उस स्वतंत्रता संग्राम को ही स्वैच्छिक माना है जिसमें से वंदेमातरम् निकला है. अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है. लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि राष्ट्रभक्ति का कोई प्रतीक स्वैच्छिक हो. तो फिर आज़ादी की लड़ाई के निर्णायक ”भारत छोड़ो आंदोलन” के दौरान वे खुद क्या कर रहे थे? उनने खुद ही कहा है- ”मैं संघ में लगभग उन्हीं दिनों गया जब भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ा था क्योंकि मैं मानता था कि कॉग्रेस के तौर-तरीक़ों से तो भारत आज़ाद नहीं होगा. और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत थी.” संघ का रवैया यह था कि जब तक हम पहले देश के लिए अपनी जान क़ुरबान कर देने वाले लोगों का मज़बूत संगठन नहीं बना लेते, भारत स्वतंत्र नहीं हो सकता. लालकृष्ण आडवाणी भारत छोड़ो आंदोलन को छोड़कर करांची में आरम-दक्ष करते देश पर क़ुरबान हो सकने वाले लोगों का संगठन बनाते रहे. पांच साल बाद देश आज़ाद हो गया. इस आज़ादी में उनके संगठन संघ- के कितने स्वयंसेवकों ने जान की क़ुरबानी दी? ज़रा बताएं.

एक और बड़े देशभक्त स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी हैं. वे भी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बच्चे नहीं संघ कार्य करते स्वयंसेवक ही थे. एक बार बटेश्वर में आज़ादी के लिए लड़ते लोगों की संगत में पड़ गए. उधम हुआ. पुलिस ने पकड़ा तो उत्पात करने वाले सेनानियों के नाम बताकर छूट गए. आज़ादी आने तक उनने भी देश पर क़ुरबान होने वाले लोगों का संगठन बनाया जिन्हें क़ुरबान होने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि वे भी आज़ादी के आंदोलन को राष्ट्रभक्ति के लिए स्वैच्छिक समझते थे.

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने को देशभक्तों का महान संगठन कहे और देश पर जान न्योछावर करने वालों की सूची बनाए तो यह बड़े मज़ाक का विषय है. सन् १९२५ में संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार को बड़ा क्रांतिकारी और देशभक्त बताया जाता है. वे डॉक्टरी की पढ़ाई करने १९१० में नागपुर से कोलकाता गए जो कि क्रांतिकारियों का गढ़ था. हेडगेवार वहां छह साल रहे. संघवालों का दावा है कि कोलकाता पहुंचते ही उन्हें अनुशीलन समिति की सबसे विश्वसनीय मंडली में ले लिया गया और मध्यप्रांत के क्रांतिकारियों को हथियार और गोला-बारूद पहुंचाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी. लेकिन ना तो कोलकाता के क्रांतिकारियों की गतिविधियों के साहित्य में उनका नाम आता है न तब के पुलिस रेकॉर्ड में. (इतिहासकारों का छोड़े क्योंकि यहां इतिहासकारों का उल्लेख करने पर कुछ को उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने का अवसर मिल सकता है) खैर, हेडगेवार ने वहां कोई महत्व का काम नहीं किया ना ही उन्हें वहां कोई अहमियत मिली. वे ना तो कोई क्रांतिकारी काम करते देखे गए और ना ही पुलिस ने उन्हें पकड़ा. १९१६ में वे वापस नागपुर आ गए.

लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद वे कॉग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों में काम करते रहे. गांधीजी के अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लेकर ख़िलाफ़त आंदोलन के वे आलोचक हो गए. वे पकड़े भी गए और सन् १९२२ में जेल से छूटे. नागपुर में सन् १९२३ के दंगों में उनने डॉक्टर मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया. अगले साल सावरकर का ”हिन्दुत्व” निकला जिसकी एक पांडुलिपी उनके पास भी थी. सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए ही हेडगेवार ने सन् १९२५ में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. तब से वे निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन और राजनीति में रहे लेकिन संघ को इन सबसे अलग रखा. सारा देश जब नमक सत्याग्रह और सिविल नाफ़रमानी आंदोलन में कूद पड़ा तो हेडगेवार भी उसमें आए लेकिन राष्टीय स्वयंसेवक संघ की कमान परांजपे को सौंप गए. वे स्वयंसेवकों को उनकी निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने देते थे लेकिन संघ को उनने न सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में लगाया न अहिंसक असहयोग आंदोलनों में लगने दिया. संघ ऐसे समर्पित लोगों के चरित्र निर्माण का कार्य कर रहा था जो देश के लिए क़ुरबान हो जाएंगे. सावरकर ने तब चिढ़कर बयान दिया था, ”संघ के स्वयंसेवक के समाधि लेख में लिखा होगा- वह जन्मा, संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया.”

हेडगेवार तो फिर भी क्रांतिकारियों और अहिंसक असहयोग आंदोलनकारियों में रहे दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर तो ऐसे हिन्दू राष्ट्रनिष्ठ थे कि राष्ट्रीय आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश विरोध से उनने संघ और स्वयंसेवकों को बिल्कुल अलग कर लिया. वाल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले ने संघ पर जो पुस्तक द ब्रदरहुड इन सेफ़्रॉन- लिखी है उसमें कहा है, ”गोलवलकर मानते थे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाने का कोई बहाना अंग्रेज़ों को न दिया जाए.” अंग्रेज़ों ने जब ग़ैरसरकारी संगठनों में वर्दी पहनने और सैनिक कवायद पर पाबंदी लगाई तो संघ ने इसे तत्काल स्वीकार किया. २९ अप्रैल १९४३ को गोलवलकर ने संघ के वरिष्ठ लोगों के एक दस्तीपत्र भेजा. इसमें संघ की सैनिक शाखा बंद करने का आदेश था. दस्तीपत्र की भाषा से पता चलता है कि संघ पर पाबंदी की उन्हें कितनी चिंता थी- ”हमने सैनिक कवायद और वर्दी पहनने पर पाबंदी जैसे सरकारी आदेश मानकर ऐसी सब गतिविधियां छोड़ दी हैं ताकि हमारा काम क़ानून के दायरे में रहे जैसा कि क़ानून को मानने वाले हर संगठन को करना चाहिए. ऐसा हमने इस उम्मीद में किया कि हालात सुधर जाएंगे और हम फिर ये प्रशिक्षण देने लगेंगे. लेकिन अब हम तय कर रहे हैं कि वक़्त के बदलने का इंतज़ार किए बिना ये गतिविधियां और ये विभाग समाप्त ही कर दें.” (ये वो दौर था जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी अपने तरीक़े से संघर्ष कर रहे थे) पारंपरिक अर्थों में गोलवलकर क्रांतिकारी नहीं थे. अंग्रेज़ों ने इसे ठीक से समझ लिया था.

सन् १९४३ में संघ की गतिविधियों पर तैयार की गई एक सरकारी रपट में गृह विभाग ने निष्कर्ष निकाला था कि संघ से विधि और व्यवस्था को कोई आसन्न संकट नहीं है. १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में हुई हिंसा पर टिप्पणी करते हुए मुंबई के गृह विभाग ने कहा था, ”संघ ने बड़ी सावधानी से अपने को क़ानूनी दायरे में रखा है. खासकर अगस्त १९४२ में जो हिंसक उपद्रव हुए हैं उनमें संघ ने बिल्कुल भाग नहीं लिया है.” हेडगेवार सन् १९२५ से १९४० तक सरसंघचालक रहे और उनके बाद आज़ादी मिलने तक गोलवलकर रहे. इन बाईस वर्षों में आज़ादी के आंदोलन में संघ ने कोई योगदान या सहयोग नहीं किया. संघ परिवारियों के लिए संघ कार्य ही राष्ट्र सेवा और राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा काम था. संघ का कार्य क्या है? हिन्दू राष्ट्र के लिए मर मिटने वाले स्वयंसेवकों का संगठन बनाना. इन स्वयंसेवकों का चरित्र निर्माण करना. उनमें ऱाष्ट्रभक्ति को ही जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति मानने की परम आस्था बैठाना. १९४७ में जब देश आज़ाद हुआ तो देश में कोई सात हज़ार शाखाओं में छह से सात लाख स्वयंसेवक भाग ले रहे थे. आप पूछ सकते हैं कि इन एकनिष्ठ देशभक्त स्वयंसेवकों ने आज़ादी के आंदोलन में क्या किया? अगर ये सशस्त्र क्रांति में विश्वास करते थे तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इनने कितने सशस्त्र उपद्रव किए, कितने अंग्रेज़ों को मारा और उनके कितने संस्थानों को नष्ट किया. कितने स्वयंसेवक अंग्रेज़ों की गोलियों से मरे और कितने वंदेमातरम् कहकर फांसी पर झूल गए? हिन्दुत्ववादियों के हाथ से एक निहत्था अहिंसक गांधी ही मारा गया.

संघ और इन स्वयंसेवकों के लिए आज़ादी के आंदोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के लिए संगठन बनाना और स्वयंसेवक तैयार करना था. संगठन को अंग्रेज़ों की पाबंदी से बचाना था. इनके लिए स्वतंत्र भारत राष्ट्र अंग्रेज़ों से आज़ाद कराया गया भारत नहीं था. इनका हिन्दू राष्ट्र तो कोई पांच हज़ार साल से ही बना हुआ है. उसे पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेज़ों से मुक्त कराना है. मुसलमान हिन्दू राष्ट्र के दुश्मन नंबर एक और अंग्रेज़ नंबर दो थे. सिर्फ़ अंग्रेज़ों को बाहर करने से इनका हिन्दू राष्ट्र आज़ाद नहीं होता. मुसलमानों को भी या तो बाहर करना होगा या उन्हें हिन्दू संस्कृति को मानना होगा. इसलिए अब उनका नारा है- वंदे मातरम् गाना होगा, नहीं तो यहां से जाना होगा. सवाल यह है कि जब आज़ादी का आंदोलन- संघ परिवारियों के लिए स्वैच्छिक था तो स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत में वंदेमातरम् गाना स्वैच्छिक क्यों नहीं हो सकता? भारत ने हिन्दू राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया है. यह भारत संघियों का हिन्दू राष्ट्र नहीं है. वंदेमातरम् राष्ट्रगीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं.

(साभार- जनसत्ता. प्रभाष जोशी का यह लेख 10 मार्च, 2008 को जनसत्ता में छपा था.)

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

देशभक्ति का नंगा नाच

देश अपनी भक्ति को लेकर इतना शर्मिंदा कभी नहीं था. मुसीबतें थीं, अपार थीं, हम ​सब मिलकर लड़ते रहे, संघर्ष करते रहे और आगे बढ़ते रहे. अब हम पीछे लौटने लगे हैं. जो चीजें अब तक गैर—लोकतांत्रिक मानी जा चुकी हैं, उन्हें अब लोकतंत्र का लबादा ओढ़ाया जा रहा है.
नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद शुरू हुआ राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रद्रोह, धर्म और धर्मद्रोह का खेल जेएनयू के बहाने चरम पर पहुंच गया. जेएनयू प्रकरण पर सत्ता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का खौफनाक गठबंधन सामने आया जो अब हर उस चीज को राष्ट्रविरोधी घोषित करने पर तुला है जो उससे असहमत है. कुछ बानगी देखें:
हिंदुत्व बचाने की पूरी जिम्मेदारी अपने नाजुक कंधों पर संभाल रहीं विहिप नेता साध्वी प्राची ने कहा, ‘जेएनयू को हाफिद सईद ने फंडिंग की है और उसी के सहयोग से यूनिवर्सिटी में सम्मेलन हुआ है. राहुल गांधी राष्ट्रवाद की परिभाषा बताएं, देश उनसे जानना चाहता है. डी. राजा आतंकी गतिविधियों में शामिल है, उसे भी गिरफ्तार किया जाना चाहिए.’
भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने कहा, 'राष्ट्र का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और जेएनयू के ‘देशद्रोह’ के आरोपियों के खिलाफ आजीवन कारवास की जगह फांसी मिलनी चाहिए या गोली मार देनी चाहिए.'
मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा, 'क्या पाकिस्तान जिंदाबाद करने वाले देशद्रोहियों की जबान नहीं काट देनी चाहिए?'
​हरियाणा हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के पूर्व ओएसडी जवाहर यादव ने कहा, ‘जेएनयू में जो महिलाएं राष्‍ट्रविरोधी नारे लगा रही थीं, उनके लिए मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि आप लोगों से तो वेश्‍या भी बेहतर हैं, जो अपना शरीर बेचती हैं, लेकिन देश नहीं।’
सीपीआई कार्यकर्ता की पिटाई करने वाले विधायक ओपी शर्मा ने कहा, ‘अगर बंदूक होती तो मैं गोली भी मार देता.’
यह सारे बयान किन्हीं अनपढ़ उचक्कों के नहीं हैं. ये सारे लोग चुनकर आए हैं और विभिन्न सदनों की शोभा बढ़ा रहे हैं. शायद ये अच्छे दिनों के परिणाम हैं जिनका आपसे वादा किया गया था.
जेएनयू में आपत्तिजनक नारेबाजी की खबर सही थी या गलत, नहीं मालूम. लेकिन राष्ट्रभक्ति का उन्माद फैलाने के मकसद से जीन्यूज ने एक फर्जी वीडियो चलाया था. उस आधार पर अनर्ब गोस्वामी और दीपक चौरसिया भी राष्ट्रभक्त साबित होने की दौड़ में शामिल हो गए और चीखने लगे. वे जेएनयू वालों से प्रमाण पत्र मांगने लगे. गृह मंत्रालय अपनी पूरी मशीनरी के साथ इस खेल में शामिल हो गया. जब आरोप साबित नहीं हो सके तो सबने पल्टी मार ली. संघ, बजरंग दल या एबीवीपी का एक उच्छृंखल आदमी और केंद्रीय गृह मंत्रालय एक कतार में पाए गए.
कन्हैया या दूसरा कोई छात्र दोषी तो साबित नहीं हुआ, लेकिन समाज में पर्याप्त जहर घुल चुका है. उन्माद में आए लोग अपने विरोधी से देशभक्ति का प्रमाण पत्र मांग रहे हैं. जेएनयू के आसपास के लोग अपने घरों से जेएनयू को छात्रों को निकाल रहे हैं. अब जेएनयू के छात्र ​मात्र किरायेदार छात्र नहीं हैं. अब वे पाकिस्तान के एजेंट से कम नहीं हैं.
दूसरी ओर एबीवीपी देश भर के विश्वविद्यालयों में देशभक्ति की डिटेक्टर मशीन लगाकर तैनात हो गई है. एबीवीपी के आरोपों को आधार बनाकर बीएचयू से संदीप पांडेय को नक्सली और देशद्रोही कहकर निकाल दिया गया. बीएचयू के वीसी गिरीश त्रिपाठी संघ के प्रचारक हैं.
बीएचयू में ही एक परिचर्चा में शामिल होने गए कवि व चिंतक बद्रीनारायण के साथ एबीवीपी के लोगों ने अभद्रता की.
इलाहाबाद विवि में एबीवीपी ने वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन को परिसर में घुसने न​हीं दिया. उन्हें छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह लोकतंत्र और फ्रीडम आॅफ स्पीच ​विषय पर परिचर्चा के लिए बुलाया था.
21 फरवरी को ग्वालियर में दलित मुद्दे पर एक सेमिनार में शामिल होने गए प्रो. विवेक कुमार के कार्यक्रम में एबीवीपी ने पथराव किया. माहौल तनावपूर्ण है.
रोहित वेमुला प्रकरण में एबीवीपी से लेकर केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और स्मृति ईरानी की भूमिका रही.
क्या यह सब देशभक्ति के नाम पर हो रहा है? किसी को भी गोली मार देने की धमकी देना, कोर्ट में विधायक का कानून हाथ में लेना, चिंतकों के साथ अभद्रता, मारपीट करना यह सब कौन सी देशभक्ति है? हत्या करने, जबान काट लेने, गोली मार देने की बात करना क्या देशभक्ति है? अपने 70वें साल में प्रवेश करने से पहले यह लोकतंत्र अचानक इतना डरावना किसने बना दिया? आपसे तो कहा गया था कि अच्छे दिन आएंगे?

पत्रकारिता का अंधयुग

अब सवाल लेफ्ट राइट के समर्थन का नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा कर पाना ही बहुत बड़ी चुनौती है. जो बात मैं दो ढाई साल से अलग-अलग न्यूज रूम में महसूस कर रहा हूं, जीन्यूज के पत्रकार विश्वदीपक ने उसका चरम देखा. क्योंकि जीन्यूज ने राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा और मालदार ठेका ले रखा है. जेएनयू की घटना के बाद दो दिन का मीडियाई उन्माद डराने वाला था. लेकिन पत्रकारों की पिटाई के बाद हालात ​बदल गए. फिर पत्रकारों ने सच तलाशना शुरू कर दिया. इस डरावनी घटना ने कई बड़े बड़े नामधारियों की कलई खोल दी. खैर, जीन्यूज से इस्तीफा देने वाले विश्वदीपक का यह इस्तीफा मौजूदा पत्रकारिता का का दस्तावेज है.


प्रिय जी न्यूज,
एक साल 4 महीने और 4 दिन बाद अब वक्त आ गया है कि मैं अब आपसे अलग हो जाऊं. हालांकि ऐसा पहले करना चाहिए था लेकिन अब भी नहीं किया तो खुद को कभी माफ़ नहीं कर सकूंगा.
आगे जो मैं कहने जा रहा हूं वो किसी भावावेश, गुस्से या खीझ का नतीज़ा नहीं है, बल्कि एक सुचिंतित बयान है. मैं पत्रकार होने से साथ-साथ उसी देश का एक नागरिक भी हूं जिसके नाम अंध ‘राष्ट्रवाद’ का ज़हर फैलाया जा रहा है और इस देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है. मेरा नागरिक दायित्व और पेशेवर जिम्मेदारी कहती है कि मैं इस ज़हर को फैलने से रोकूं. मैं जानता हूं कि मेरी कोशिश नाव के सहारे समुद्र पार करने जैसी है लेकिन फिर भी मैं शुरुआत करना चहता हूं. इसी सोच के तहत JNUSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार के बहाने शुरू किए गए अंध राष्ट्रवादी अभियान और उसे बढ़ाने में हमारी भूमिका के विरोध में मैं अपने पद से इस्तीफा देता हूं. मैं चाहता हूं इसे बिना किसी वैयक्तिक द्वेष के स्वीकार किया जाए.
असल में बात व्यक्तिगत है भी नहीं. बात पेशेवर जिम्मेदारी की है. सामाजिक दायित्वबोध की है और आखिर में देशप्रेम की भी है. मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इन तीनों पैमानों पर एक संस्थान के तौर पर तुम, तुमसे जुड़े होने के नाते एक पत्रकार के तौर पर मैं, पिछले एक साल में कई बार फेल हुए.
मई 2014 के बाद से जब से श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से कमोबेश देश के हर न्यूज़ रूम का सांप्रदायीकरण (Communalization) हुआ है लेकिन हमारे यहां स्थितियां और भी भयावह हैं. माफी चाहता हूं इस भारी भरकम शब्द के इस्तेमाल के लिए लेकिन इसके अलावा कोई और दूसरा शब्द नहीं है. आखिर ऐसा क्यों होता है कि ख़बरों को मोदी एंगल से जोड़कर लिखवाया जाता है? ये सोचकर खबरें लिखवाई जाती हैं कि इससे मोदी सरकार के एजेंडे को कितना गति मिलेगी?
हमें गहराई से संदेह होने लगा है कि हम पत्रकार हैं. ऐसा लगता है जैसे हम सरकार के प्रवक्ता हैं या सुपारी किलर हैं? मोदी हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं, मेरे भी है; लेकिन एक पत्रकार के तौर इतनी मोदी भक्ति अब हजम नहीं हो रही है. मेरा ज़मीर मेरे खिलाफ बग़ावत करने लगा है. ऐसा लगता है जैसे मैं बीमार पड़ गया हूं.
हर खबर के पीछे एजेंडा, हर न्यूज़ शो के पीछे मोदी सरकार को महान बताने की कोशिश, हर बहस के पीछे मोदी विरोधियों को शूट करने का प्रयास? अटैक, युद्ध से कमतर कोई शब्द हमें मंजूर नहीं. क्या है ये सब? कभी ठहरकर सोचता हूं तो लगता है कि पागल हो गया हूं.
आखिर हमें इतना दीन हीन, अनैतिक और गिरा हुआ क्यों बना दिया गया? देश के सर्वोच्च मीडिया संस्थान से पढ़ाई करने और आजतक से लेकर बीबीसी और डॉयचे वेले, जर्मनी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद मेरी पत्रकारीय जमापूंजी यही है कि लोग मुझे ‘छी न्यूज़ पत्रकार’ कहने लगे हैं. हमारे ईमान (Integrity) की धज्जियां उड़ चुकी हैं. इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
कितनी बातें कहूं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ लगातार मुहिम चलाई गई और आज भी चलाई जा रही है. आखिर क्यों? बिजली-पानी, शिक्षा और ऑड-इवेन जैसी जनता को राहत देने वाली बुनियादी नीतियों पर भी सवाल उठाए गए. केजरीवाल से असहमति का और उनकी आलोचना का पूरा हक है लेकिन केजरीवाल की सुपारी किलिंग का हक एक पत्रकार के तौर पर नहीं है. केजरीवाल के खिलाफ की गई निगेटिव स्टोरी की अगर लिस्ट बनाने लगूंगा तो कई पन्ने भर जाएंगे. मैं जानना चाहता हूं कि पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत ‘तटस्थता’ का और दर्शकों के प्रति ईमानदारी का कुछ तो मूल्य है, कि नहीं?
दलित स्कॉलर रोहित वेमुला की आत्महत्या के मुद्दे पर ऐसा ही हुआ. पहले हमने उसे दलित स्कॉलर लिखा फिर दलित छात्र लिखने लगे. चलो ठीक है लेकिन कम से कम खबर तो ढंग से लिखते. रोहित वेमुला को आत्महत्या तक धकेलने के पीछे ABVP नेता और बीजेपी के बंडारू दत्तात्रेय की भूमिका गंभीरतम सवालों के घेरे में है (सब कुछ स्पष्ट है) लेकिन एक मीडिया हाउस के तौर हमारा काम मुद्दे को कमजोर (dilute) करने और उन्हें बचाने वाले की भूमिका का निर्वहन करना था.
मुझे याद है जब असहिष्णुता के मुद्दे पर उदय प्रकाश समेत देश के सभी भाषाओं के नामचीन लेखकों ने अकादमी पुरस्कार लौटाने शुरू किए तो हमने उन्हीं पर सवाल करने शुरू कर दिए. अगर सिर्फ उदय प्रकाश की ही बात करें तो लाखों लोग उन्हें पढ़ते हैं. हम जिस भाषा को बोलते हैं, जिसमें रोजगार करते हैं उसकी शान हैं वो. उनकी रचनाओं में हमारा जीवन, हमारे स्वप्न, संघर्ष झलकते हैं लेकिन हम ये सिद्ध करने में लगे रहे कि ये सब प्रायोजित था. तकलीफ हुई थी तब भी, लेकिन बर्दाश्त कर गया था.
लेकिन कब तक करूं और क्यों?
मुझे ठीक से नींद नहीं आ रही है. बेचैन हूं मैं. शायद ये अपराध बोध का नतीजा है. किसी शख्स की जिंदगी में जो सबसे बड़ा कलंक लग सकता है वो है- देशद्रोह. लेकिन सवाल ये है कि एक पत्रकार के तौर पर हमें क्या हक है कि किसी को देशद्रोही की डिग्री बांटने का? ये काम तो न्यायालय का है न?
कन्हैया समेत जेएनयू के कई छात्रों को हमने ने लोगों की नजर में ‘देशद्रोही’ बना दिया. अगर कल को इनमें से किसी की हत्या हो जाती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? हमने सिर्फ किसी की हत्या और कुछ परिवारों को बरबाद करने की स्थिति पैदा नहीं की है बल्कि दंगा फैलाने और गृहयुद्ध की नौबत तैयार कर दी है. कौन सा देशप्रेम है ये? आखिर कौन सी पत्रकारिता है ये?
क्या हम बीजेपी या आरएसएस के मुखपत्र हैं कि वो जो बोलेंगे वहीं कहेंगे? जिस वीडियो में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा था ही नहीं उसे हमने बार-बार हमने उन्माद फैलाने के लिए चलाया. अंधेरे में आ रही कुछ आवाज़ों को हमने कैसे मान लिया की ये कन्हैया या उसके साथियों की ही है? ‘भारतीय कोर्ट ज़िंदाबाद’ को पूर्वाग्रहों के चलते ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ सुन लिया और सरकार की लाइन पर काम करते हुए कुछ लोगों का करियर, उनकी उम्मीदें और परिवार को तबाही की कगार तक पहुंचा दिया. अच्छा होता कि हम एजेंसीज को जांच करने देते और उनके नतीजों का इंतज़ार करते.
लोग उमर खालिद की बहन को रेप करने और उस पर एसिड अटैक की धमकी दे रहे हैं. उसे गद्दार की बहन कह रहे हैं. सोचिए ज़रा अगर ऐसा हुआ तो क्या इसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी? कन्हैया ने एक बार नहीं हज़ार बार कहा कि वो देश विरोधी नारों का समर्थन नहीं करता लेकिन उसकी एक नहीं सुनी गई, क्योंकि हमने जो उम्माद फैलाया था वो NDA सरकार की लाइन पर था. क्या हमने कन्हैया के घर को ध्यान से देखा है? कन्हैया का घर, ‘घर’ नहीं इस देश के किसानों और आम आदमी की विवशता का दर्दनाक प्रतीक है. उन उम्मीदों का कब्रिस्तान है जो इस देश में हर पल दफ्न हो रही हैं. लेकिन हम अंधे हो चुके हैं!
मुझे तकलीफ हो रही है इस बारे में बात करते हुए लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि मेरे इलाके में भी बहुत से घर ऐसे हैं. भारत का ग्रामीण जीवन इतना ही बदरंग है.उन टूटी हुई दीवारों और पहले से ही कमजोर हो चुकी जिंदगियों में हमने राष्ट्रवादी ज़हर का इंजेक्शन लगाया है, बिना ये सोचे हुए कि इसका अंजाम क्या हो सकता है! अगर कन्हैया के लकवाग्रस्त पिता की मौत सदमें से हो जाए तो क्या हम जिम्मेदार नहीं होंगे? ‘The Indian Express’ ने अगर स्टोरी नहीं की होती तो इस देश को पता नहीं चलता कि वंचितों के हक में कन्हैया को बोलने की प्रेरणा कहां से मिलती है!
रामा नागा और दूसरों का हाल भी ऐसा ही है. बहुत मामूली पृष्ठभूमि और गरीबी से संघर्ष करते हुए ये लड़के जेएनयू में मिल रही सब्सिडी की वजह से पढ़ लिख पाते हैं. आगे बढ़ने का हौसला देख पाते हैं. लेकिन टीआरपी की बाज़ारू अभीप्सा और हमारे बिके हुए विवेक ने इनके करियर को लगभग तबाह ही कर दिया है.
हो सकता है कि हम इनकी राजनीति से असहमत हों या इनके विचार उग्र हों लेकिन ये देशद्रोही कैसे हो गए? कोर्ट का काम हम कैसे कर सकते हैं? क्या ये महज इत्तफाक है कि दिल्ली पुलिस ने अपनी FIR में ज़ी न्यूज का संदर्भ दिया है? ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली पुलिस से हमारी सांठगांठ है? बताइए कि हम क्या जवाब दे लोगों को?
आखिर जेएनयू से या जेएनयू के छात्रों से क्या दुश्मनी है हमारी? मेरा मानना है कि आधुनिक जीवन मूल्यों, लोकतंत्र, विविधता और विरोधी विचारों के सह अस्तित्व का अगर कोई सबसे खूबसूरत बगीचा है देश में तो वो जेएनयू है लेकिन इसे गैरकानूनी और देशद्रोह का अड्डा बताया जा रहा है.
मैं ये जानना चाहता हूं कि जेएनयू गैर कानूनी है या बीजेपी का वो विधायक जो कोर्ट में घुसकर लेफ्ट कार्यकर्ता को पीट रहा था? विधायक और उसके समर्थक सड़क पर गिरे हुए CPI के कार्यकर्ता अमीक जमेई को बूटों तले रौंद रहे थे लेकिन पास में खड़ी पुलिस तमाशा देख रही थी. स्क्रीन पर पिटाई की तस्वीरें चल रही थीं और हम लिख रहे थे – ओपी शर्मा पर पिटाई का आरोप. मैंने पूछा कि आरोप क्यों? कहा गया ‘ऊपर’ से कहा गया है? हमारा ‘ऊपर’ इतना नीचे कैसे हो सकता है? मोदी तक तो फिर भी समझ में आता है लेकिन अब ओपी शर्मा जैसे बीजेपी के नेताओं और ABVP के कार्यकर्ताओं को भी स्टोरी लिखते समय अब हम बचाने लगे हैं.
घिन आने लगी है मुझे अपने अस्तित्व से. अपनी पत्रकरिता से और अपनी विवशता से. क्या मैंने इसलिए दूसरे सब कामों को छोड़कर पत्रकार बनने का फैसला बनने का फैसला किया था. शायद नहीं.
अब मेरे सामने दो ही रास्ते हैं या तो मैं पत्रकारिता छोड़ूं या फिर इन परिस्थितियों से खुद को अलग करूं. मैं दूसरा रास्ता चुन रहा हूं. मैंने कोई फैसला नहीं सुनाया है बस कुछ सवाल किए हैं जो मेरे पेशे से और मेरी पहचान से जुड़े हैं. छोटी ही सही लेकिन मेरी भी जवाबदेही है. दूसरों के लिए कम, खुद के लिए ज्यादा. मुझे पक्के तौर पर अहसास है कि अब दूसरी जगहों में भी नौकरी नहीं मिलेगी. मैं ये भी समझता हूं कि अगर मैं लगा रहूंगा तो दो साल के अंदर लाख के दायरे में पहुंच जाऊंगा. मेरी सैलरी अच्छी है लेकिन ये सुविधा बहुत सी दूसरी कुर्बानियां ले रही है, जो मैं नहीं देना चाहता. साधारण मध्यवर्गीय परिवार से आने की वजह से ये जानता हूं कि बिना तनख्वाह के दिक्कतें भी बहुत होंगी लेकिन फिर भी मैं अपनी आत्मा की आवाज (consciousness) को दबाना नहीं चाहता.
मैं एक बार फिर से कह रहा हूं कि मुझे किसी से कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है. ये सांस्थानिक और संपादकीय नीति से जुडे हुए मामलों की बात है. उम्मीद है इसे इसी तरह समझा जाएगा.
यह कहना भी जरूरी समझता हूं कि अगर एक मीडिया हाउस को अपने दक्षिणपंथी रुझान और रुचि को जाहिर करने का, बखान करने का हक है तो एक व्यक्ति के तौर पर हम जैसे लोगों को भी अपनी पॉलिटिकल लाइन के बारे में बात करने का पूरा अधिकार है. पत्रकार के तौर पर तटस्थता का पालन करना मेरी पेशेवर जिम्मेदारी है लेकिन एक व्यक्ति के तौर पर और एक जागरूक नागरिक के तौर पर मेरा रास्ता उस लेफ्ट का है जो पार्टी द्फ्तर से ज्यादा हमारी ज़िंदगी में पाया जाता है. यही मेरी पहचान है.
और अंत में एक साल तक चलने वाली खींचतान के लिए शुक्रिया. इस खींचतान की वजह से ज़ी न्यूज़ मेरे कुछ अच्छे दोस्त बन सके.
सादर-सप्रेम,
विश्वदीपक

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

मीडिया की स्वामिभक्ति

हिंदुस्तान की यह पहली सरकार है जो जबर्दस्त बहुमत में है और छोटे छोटे बच्चों से भिड़ी है. पुलिस और छुटभैये नेता त​क तो ठीक था, लेकिन गृहमंत्री भी इस प्रहसन में कूद पड़े. दो ही दिन में अब जब सारा मामला फुस्स हो गया, आईबी ने सब आरोपों को नकार दिया, दिल्ली पुलिस ने सबूत होने से इनकार कर दिया, तब क्या देश की बहुमत की सरकार देश माफी मांगेगी? क्या राष्ट्रवाद इतना उच्छृंखल हो गया है कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी के बच्चों से भिड़कर फुस्स हो जाता है?
हिंदुस्तान में पहली बार है कि मीडिया जनता की ओर नहीं, सत्ताधारी दल के साथ खड़ा है. सत्ताधारी दल की छात्र इकाई को विरोधी संगठन को नीचा दिखाना था, उसने प्रोपेगेंडा किया जो चार दिन में फुस्स हो गया. यह राजनीतिक मसला था, लेकिन मीडिया ने अपनी क्या छवि पेश की? बिना पुख्ता जानकारी लिए मीडिया ने जेएनयू और वहां के छात्रों को देशद्रोही कह दिया और जब कहीं से कुछ नहीं मिला तो सबने कन्हैया समेत पूरे जऐनयू को क्लीनचिट भी दे दी. क्या मीडिया अपने इस गैरजिम्मेदाराना व्यवहार पर जनता से माफी मांगेगा? पार्टी के पक्ष में जनता को गलत जानकारी देना क्या गैरकानूनी और गैरलोकतांत्रिक हरकत नहीं है?
देशभक्ति का असली यूटर्न यह रहा कि चैनलों के लिए पहले दो दिन पूरा जेएनयू देशद्रोही हो गया था. चौधरी, गोस्वामी और चौरसिया सब प्रमाणपत्र मांग रहे थे. जब एबीवीपी के राष्ट्रभक्तों ने कोर्ट में मीडियाकरों को कूट दिया तो कानून याद आया. इसके पहले कानून याद नहीं आया था, न ही दायित्व. मैं चैनल में बैठा हूं तो मैं फैसले कैसे सुना सकता हूं, भले ही वह मेरे विरोधी दल के बारे में हो. मेरा पेशा और मेरे विचार दोनों अलग चीजें हैं.
लेकिन जी न्यूज के सुधीर चौधरी ने तो कसम खाई है कि अगर मुनाफे का सौदा हो तो वे  मीडिया को मिले लोकतांत्रिक अधिकार, उसके फर्ज और अपना जमीर बेच देंगे. उन्होंने उमा खुराना प्रकरण एक महिला को फर्जी स्टिंग के बदनाम किया. मामला झूठा निकला, चैनल ने प्रतिबंध झेला. फिर वे सौ करोड़ की उगाही में जेल
गये और लौटे तो राष्ट्रवाद की दुकान खोलकर बैठ गये. वे प्रोपेगेंडा करके जेड सीक्योरिटी लेकर बैठे हैं और ज्ञान झाड़ रहे हैं कि जेएनयू पर देश का पैसा बर्बाद हो रहा है. इन्हें जेड सीक्योरिटी किसलिए मिली हुई है? मोदी गुणगान के लिए देश का पैसा इसकी सुरक्षा पर क्यों खर्च किया जा रहा है? मीडिया चैनल के नाम पर मुखपत्र चलाने वाला यह आदमी इस देश के किस काम है, सिवाय इसके कि लोगों को गुमराह करे?
फिर सुधीर चौधरी चूंकि निजी तौर पर कूटे नहीं गए, तो अभी भी वे राष्ट्रवाद के फूहड़तम शिखर पर विराजमान है. बाकी मीडिया का दिमाग कुछ ठिकाने आ गया है. किसी को देशद्रोही घोषित करने की जल्दी मीडिया को क्यों है?
अब जब मीडिया चैनल, सुरक्षा एजेंसियां और दिल्ली पुलिस सबने वह सारे दावे नकार दिए हैं तो क्या मीडिया माफी मांगेगा. नहीं, क्योंकि जवाबदेही जैसी कोई चीज होती तो यह हुआ ही न होता.
मैं किसी पार्टी को पसंद नहीं करता, लेकिन उसके खिलाफ बिना सबूत के झूठी खबर नहीं फैला सकता. चाहे संघ हो, भाजपा हो, कांग्रेस हो या वामपंथी दल.
मीडिया लोगों के आगे भाजपा का राजनीतिक उत्पाद राष्ट्रवाद परोस रहा है. यह मियादी राष्ट्रवाद चार दिन में ढह गया, लेकिन भारत राष्ट्र अक्षुण्ण है. देशप्रेम और राष्ट्रवादी देशप्रेम का अंतर जनता को कौन बताएगा? मीडिया भाजपा के राजनीतिक हिंदुत्व को हिंदू धर्म के रूप में जनता से सामने पेश कर रहा है, परिमाणस्वरूप वह उन्मादी भीड़ द्वारा लतियाया जा रहा है.
मीडिया जनता को यह नहीं बताता कि अगर देशभक्ति का ठेका पाकिस्तान पुरुष गिरिराज सिंह, असंसदीय सांसद साक्षी महाराज, संत समाज के अंडरवर्ल्ड योगी आदित्यनाथ, अदालत को ताक पर रखने वाले ओपी शर्मा, तड़ीपार अमित शाह, और साध्वी प्राची को दिया जाएगा तो नतीजा पटियाला कोर्ट के सामने हुई अराजकता के रूप में सामने आएगा.
पार्टी और मीडिया दोनों मिलकर बौराएंगे तो अपने साथ साथ देश की कब्र ही खोदेंगे.

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...