गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

जिसका सूरज नहीं डूबता था, वह गांधी के प्रति नफरत के गंदले में डूब गया

विंस्टन चर्चिल एक ऐसे साम्राज्य का शासक था जिसके बारे में कहते हैं कि उसका सूरज कभी नहीं डूबता था. लेकिन चर्चिल महात्मा गांधी से नफरत करता था. उसकी गांधी के प्रति यह नफरत भारतीयों के प्रति नफरत का प्रतिबिंब थी. उसने गांधी को हिकारत से “भूखा नंगा फकीर” कहा. कैबिनेट में उसके सीनियर रह चुके Leo Amery के मुताबिक, एक बार उसने भारतीयों को “पाशविक धर्म के अनुयायी पाशविक लोग” कहा था.

महात्मा गांधी ने जब भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की और 'करो या मरो' जैसा निर्णायक नारा दिया तो गांधी को हिंसा फैलाने के आरोप में जेल में डाल दिया गया.

इसके बाद चर्चिल ने Leo Amery को पत्र लिखा, “भारत सरकार के दस्तावेज खंगालो और गांधी के खिलाफ ऐसे सबूत एकत्र करो कि वह जापान के साथ मिलकर षडयंत्र कर रहा है.” Leo Amery ने जवाब दिया, “ऐसे कोई सबूत मौजूद नहीं है. सिवाय इसके कि दो जापानी बौद्ध भिक्षु एक बार उनके वर्धा आश्रम में आए थे.”

गांधी पर हिंसा फैलाने का आरोप झूठा था, जिसके विरोध में गांधी ने जेल में ही अनशन शुरू कर दिया. इस पर चर्चिल को संदेह था कि यह गांधी असल में अनशन नहीं करता, यह चोरी से कोई सप्लीमेंट लेता है. इसमें तथ्य नहीं था, यह उसकी नफरत थी.

उसने ​वायसराय लिनलिथगो को तार भेजा, “हमने सुना है कि गांधी अनशन के दौरान ग्लोकोज लेते हैं. क्या इसकी पुष्टि की जा सकती है?”

दो दिन बाद वायसराय का जवाब आया कि यह संभव नहीं है. “गांधी पिछले फास्ट के दौरान खुद सतर्क थे कि कहीं उनके पानी में ग्लोकोज न मिलाया हो. उनकी देखरेख करने वाले डॉक्टर ने उन्हें मनाने की कोशिश भी की लेकिन उन्होंने ग्लूकोज लेने से मना कर दिया.”

गांधी के अनशन को तीसरा हफ्ता शुरू हो गया. चर्चिल ने फिर तार भेजा कि “गांधी 15 दिन तक जिंदा कैसे है. यह एक फ्रॉड है, जिसका खुलासा होना चाहिए. कांग्रेस के हिंदू डॉक्टर चुपके से उसे ग्लूकोज दे रहे होंगे.”

वायसराय ने अपना घोड़ा खोल दिया लेकिन कोई सबूत नहीं मिला. वायसराय ने फिर ​चर्चिल को लिखा, 'यह आदमी दुनिया का सबसे बड़ा फ्रॉड है'. लेकिन हमें कोई सबूत नहीं मिला. चर्चिल का साम्राज्य साबित नहीं कर पाया कि गांधी का अनशन एक धोखा है.

जो ​चर्चिल कहता था कि गांधी से कोई बातचीत सिर्फ मेरी लाश की कीमत पर हो सकती है, वह गांधी को ज्यादा समय कैद में भी नहीं रख पाया. भारत आजाद हो गया.

1951 में चर्चिल की वॉर मेमोरी The Hinge of Fate प्रकाशित हुई. उन्होंने इसमें गांधी पर ग्लूकोज लेकर अनशन करने का आरोप फिर दोहराया. इस बार आजाद भारत ने उन्हें जवाब दिया कि ​चर्चिल की औकात नहीं है कि वे गांधी को पहचान पाएं.

चूंकि विंस्टन चर्चिल भारतीयों को तुच्छ समझता था, इसलिए गांधी और नेहरू जैसे नेताओं के प्रति उसकी नफरत वक्त बेवक्त बाहर आती रहती थी.

1945 में लंदन में संयुक्त राष्ट्र की असेंबली का पहला सत्र आयोजित हुआ. इंडियन डेलीगेशन की अगुआई कर रही थीं नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित. सत्र के दौरान चर्चिल उनके बगल बैठे थे. अचानक चर्चिल ने विजयलक्ष्मी पंडित से पूछा, 'क्या आपके पति को हमने नहीं मारा? सच में हमने नहीं मारा?'

विजयलक्ष्मी पंडित के पति रणजीत सीताराम पंडित की जेल में मौत हो गई थी. चर्चिल इसी बारे में बात कर रहा था. विजयलक्ष्मी पंडित सकपका गईं, लेकिन थोड़ा सोचकर बोलीं, 'नहीं, हर आदमी अपने निर्धारित वक्त तक जिंदा रहता है.'

हालांकि, इस जवाब के बाद दोनों में मित्रवत व्यवहार हुआ. बाद में चर्चिल ने विजयलक्ष्मी पंडित से कहा, 'तुम्हारे भाई जवाहर लाल ने मनुष्य के दो दुश्मनों पर विजय पा ली है, नफरत और डर, जो कि मनुष्य के बीच सर्वोच्च सभ्य दृष्टिकोण है और आज के माहौल से गायब है.'

इसके कुछ समय बाद नेहरू महारानी के राज्याभिषेक में शामिल होने लंदन गए. समारोह खत्म हुआ तो संयोग से वहां नेहरू और च​र्चिल ही बचे, बाकी लोग चले गए. चर्चिल नेहरू की तरफ घूमे और कहा, 'मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, यह अजीब नहीं है कि दो लोग जिन्होंने एक दूसरे से बेहद नफरत की हो, उन्हें इस तरह से एक साथ फेंक दिया जाए?'

नेहरू ने जवाब दिया, 'लेकिन मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, मैंने आपसे कभी नफरत नहीं की.'

चर्चिल ने फिर कहा, 'लेकिन मैंने की, मैंने की.'

फिर उसी शाम डिनर पर चर्चिल ने नेहरू के लिए कहा, 'यहां एक ऐसा आदमी बैठा है जिसने नफरत और डर को जीत लिया है.'

1945 में चर्चिल को ब्रिटेन की जनता से सत्ता से उखाड़ फेंका. 47 में भारत आजाद हो गया.

Judith Brown किताब Nehru: A Political Life कहती है कि आजादी के बाद 1948 में जब चर्चिल की नेहरू से मुलाकात हुई तो ​चर्चिल ने भारत की आजादी का विरोध करने के लिए नेहरू से माफी मांगी थी.

जब तक ​चर्चिल को समझ में आया कि भारत की आजादी की लड़ाई की अगुआई करने वाले गांधी और नेहरू क्या चीज हैं, तब तक देर हो चुकी थी.

भारत के लोगों और गांधी से नफरत करने वाला चर्चिल हार गया. नफरत से भरे एक पिद्दी के हाथों जान गंवा कर भी गांधी जीत गया. गांधी के हत्यारे को दुनिया हत्यारे के रूप में ही जानेगी. भारत गांधी के देश के रूप में जाना जाएगा.

इसलिए गांधी से नफरत करने वालों से अपील है कि गांधी से नफरत मत करो, हार जाओगे. गांधी के प्रति अपने अंदर नफरत भर तो लोगे, लेकिन गांधी के बराबर आत्मबल कहां से लाओगे?

भारत के राष्ट्रपिता को नमन!

----------------------
(संदर्भ: इतिहासकार रामचंद्र गुहा, बिपनचंद्र, प्रोफेसर विश्वनाथ टंडन, टेलीग्राफ)

शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

गांधी और भगत सिंह के नाम झूठ कौन फैला रहा है?


कुछ सालों से नई पीढ़ी के दिमाग में भरा गया है कि महात्मा गांधी चाहते तो भगत सिंह की फांसी रुक सकती थी लेकिन उन्होंने नहीं चाहा। सोशल मीडिया पर यह मूर्खता खूब चल रही है। जानबूझ कर गलत तथ्य देकर गांधी को भगत सिंह के खिलाफ खड़ा किया जाता है, जैसे पटेल को नेहरू के खिलाफ खड़ा किया जाता है। 


मजेदार है कि यह बात उस विचारधारा के लोग फैला रहे हैं जो उस समय भगत सिंह और उनके साथियों का मजाक उड़ा रहे थे। अपने मुखपत्र में इनका कहना था कि 'ताकतवर से लड़ना बुजदिली है, इसलिए अंग्रेजों से लड़ने की जगह उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। इसके लिए शम्सुल इस्लाम को पढ़ा जा सकता है जहां मुखपत्र और महान गुरुजी की लेखनी के उद्धरण मौजूद हैं।

अंग्रेजी हुक्मरानों को उस समय सफलता नहीं मिली थी, लेकिन सत्तर सालों बाद उनके षड्यंत्र की विषवेल फलफूल रही है। गांधी और भगत सिंह को एक दूसरे का दुश्मन बताया जा रहा है।

सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी किताब "भारत का स्वाधीनता संघर्ष" में लिखा है-"महात्मा जी ने भगत सिंह को फांसी से बचाने की पूरी कोशिश की। अंग्रेजों को गुप्तचर एजेंसियों से पता चला कि यदि भगत सिंह को फांसी दे दी जाये और उसके फलस्वरूप हिंसक आंदोलन उभरेगा, अहिंसक गांधी खुलकर हिंसक आंदोलन का पक्ष नहीं ले पाएंगे तो युवाओं में आक्रोश उभरेगा। वे कांग्रेस और गांधी से अलग हो जायेंगे। इसका असर भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को समाप्त कर देगा।"

पर शुक्र है उस समय भारतीय जनता ने अंग्रेजी साम्राज्यवादी चाल को विफल कर दिया। कुछ नवयुवकों ने आक्रोश में आकर काले झण्डों के साथ प्रदर्शन किया लेकिन उसके बाद ही हिंसक आंदोलन का अंत हो गया। महात्मा गांधी ने अफसोस के साथ कहा, मैंने सारे प्रयत्न किए लेकिन हम सफल नहीं हुए। जो विरोध कर रहे हैं उनको गुस्सा निकालने दीजिए। भगत ने देश की आजादी के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है। बलिदान का ऐसा उदाहरण कम मिलता है।

यह सच है कि अपने जीवन में पहली बार किसी व्यक्ति- भगत सिंह की सजा कम करने के लिए कहने वाले गांधी जी की बात यदि अंग्रेजी हुकूमत द्वारा मान ली गई होती तो इसका सबसे अधिक लाभ गांधी जी का होता, उनकी अहिंसा की विजय होती।

अंग्रेजों की यह साजिश थी कि ऐसी रणनीति बनाई जाये कि अवाम को ऐसा लगे महात्मा के अपील पर फांसी रुक जायेगी, महात्मा ने स्वयं वाइसराय से मिलकर लिखित रूप में अपील की कि भगतसिंह की फांसी रोक दी जाये।

लेकिन अचानक समय से पहले ही भगत सिंह को फांसी दे दी गई। करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन प्रारम्भ होने से पहले ही फांसी देने का एक मात्र मकसद था गांधी के प्रति नवयुवकों में विद्रोह पैदा करना।

भगत सिंह ने स्वयं फांसी के पूर्व अपने वकील से मिलने पर कहा था- मेरा बहुत बहुत आभार पंडित नेहरू और सुभाष बोस को कहियेगा, जिन्होंने हमारी फांसी रुकवाने के लिए इतने प्रयत्न किये।

इतना ही नहीं भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह जी जिन्होंने 23 मार्च को अपना पुत्र खोया था, 26 मार्च को कांग्रेस अधिवेशन में लोगों से अपील कर रहे थे- आप लोगों को अपने जेनरल महात्माजी का और सभी कांग्रेस नेताओं का साथ जरूर देना चाहिए। सिर्फ तभी आप देश की आजादी प्राप्त करेंगे।

इस पिता के उदगार के बाद पूरा पंडाल सिसकियों में डूब गया था। नेहरू, पटेल, मालवीय जी के आंखों से आंसू गिर रहे थे।

वैसे यह झूठ फैलाने वाले दंगापंथियों से एक सवाल है कि जब भगत सिंह को फांसी हो रही थी तब आरएसएस के कई बड़े नेता जैसे हेडगेवार, गोलवलकर, सावरकर, मुंजे आदि क्या कर रहे थे? भगत की फांसी रुकवाने के लिए इन लोगों ने क्या किया? जवाब ज़ाहिर तौर पर यही है कि कुछ नहीं। वे शाखा लगा रहे थे और जिन्ना के साथ हिन्दू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र का खेल रहे थे। जब पूरा देश भारत छोड़ो आंदोलन में लाठियां और गोलियां खा रहा था, तब जनसंघ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अंग्रेजों के लिए कैंप लगाकर सैनिकों की भर्ती कर रहे थे, ताकि हिंदुस्तान के युवा अंग्रेजों की फौज में भर्ती होकर अंग्रेजों की तरफ से विश्वयुद्ध में भाग ले सकें.

भगत सिंह को फांसी हुई तो आरएसएस के मुखपत्र में लेख लिखकर क्रांतिकारी नौजवानों को 'बुजदिल' कहकर उनको अपमानित करने का काम इन्होंने जरूर किया था।
कहते थे कि हम शाखाओं में देश पर मर मिटने वाले युवक तैयार करेंगे। लेकिन अंग्रेजों को लिखित में दे रखा था कि आरएसएस क्रांतिकारी आंदोलन से दूर रहेगा।

संघ शाखा लगाता रहा, लाठी भांजता रहा और तबतक भारत की जांबाज जनता ने देश आजाद करा लिया। जिन मुस्लिमों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को गोलवलकर हिंदुओं का दुश्मन बता रहे थे, वे सब मिलकर लड़े और देश आजाद हो गया।

अब जिन्होंने आज़ादी आंदोलन में नाखून तक न कटवाया, उल्टा राष्ट्रीय आंदोलन के साथ गद्दारी की, वे सबसे बड़े ठेकेदार बनकर सर्टिफिकेट बांटते फिर रहे हैं कि नेहरु ऐसे थे, गांधी ऐसे थे...

इनको इतिहास में जाकर सौ साल पुराना हिसाब इसीलिए करना है क्योंकि ये अपने अतीत से शर्मिंदा हैं। वरना इतिहास का सिर्फ इतना महत्व है कि उससे सबक लिया जाए। नेताओं की गलतियों से बड़ी है लाखों लोगों की कुर्बानी और उसका सम्मान! लेकिन लिंचतंत्र उसे भी अपमानित ही कर रहा है।

सौ साल पहले जो हुआ उसे आज सुधारा नहीं जा सकता, लेकिन नेहरू नेहरू करने में संघ परिवार को बहुत मजा आता है क्योंकि अपना बताने को कुछ है नहीं। इसलिए झूठ फैलाते रहते हैं।


भ्रष्टाचार से लड़ाई जनता को उल्लू बनाने के लिए लड़ी जाती है

भ्रष्टाचार एक ऐसी लड़ाई है जो भारत में जनता को उल्लू बनाने के लिए लड़ी जाती है। मजे की बात है कि नरेंद्र मोदी एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद, भ्रष्टाचार को ही मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री बने। वे आज भी लगभग अपने हर भाषण में भ्रष्टाचार पर जरूर बोलते हैं। लेकिन उनका पिछले छह साल का कार्यकाल यह गवाही देता है कि जनता को बहुत सफाई से उल्लू बना रहे हैं।
फोटो साभार: गूगल

पिछली बार सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने हथियार में दलाली को वैधानिक दर्जा दे दिया था। दूसरा कारनामा राफेल विमान की खरीद में हुआ। राजीव गांधी के कार्यकाल में बोफोर्स घोटाला हुआ था। उसके बाद की सरकारों ने किसी भी रक्षा खरीद के लिए बहुस्तरीय प्रणाली बनाई थी। इस प्रणाली को काफी पारदर्शी बनाते हुए सरकार ने नियम बनाए थे कि किसी भी रक्षा खरीद में सेना, संसद की सुरक्षा समिति, रक्षा मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और मंत्रिमंडल की भूमिका होगी, लेकिन मोदी सरकार ने इन नियमों का पालन नहीं किया और ​राफेल की खरीद में जितने सवाल उठे, उनमें से किसी का भी जवाब नहीं दिया, न ही जांच कराई।

फिर इन्होंने लंबे आंदोलन के बाद बने लोकपाल को नहीं लागू होने दिया और अंततः उसमें संशोधन करके उसे कमजोर किया और फिर लागू किया। अब भारत का लोकपाल संस्था वजूद में तो है, लेकिन उसकी कानूनी स्थिति सीबीआई नामक 'पिंजरे के तोते' से अलग नहीं है, क्योंकि लोकपाल को जांच करने का अधिकार प्रिवेंशन आफ करप्शन एक्ट के तहत है और इस एक्ट में संशोधन करके सरकार ने यह व्यवस्था कर दी है कि बिना सरकार की अनुमति के कोई जांच नहीं जा सकती।

कई मामलों में जहां भ्रष्टाचार का आरोप लगा, मोदी सरकार ने ऐसे किसी भी मामले की जांच नहीं कराई। चाहे वह सहारा बिरला डायरी हो, चाहे फ्री में जमीन बांटने का मामला हो, राफेल घोटाला हो, व्यापम घोटाला हो, चावल घोटाला हो या फिर चिक्की घोटाला। किसी की न कायदे से जांच हुई न मामला अंजाम तक पहुंचा।

व्यापम शायद दुनिया का एकमात्र घोटाला होगा जिसमें दर्जनों लोग मारे गए।

पहले आडवाणी और फिर मोदी ने स्विस बैंक में काले धन को मुद्दा बनाया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद भारत से बाहर एक भी अकॉउंट चिह्नित नहीं किए गए, उल्टा कई लोग जनता का हजारों करोड़ लेकर भाग गए। जनता की जेब पर डाका डाल कर नोटबन्दी कर दी, जिसका फायदा बताया गया कि आतंकवाद और नक्सलवाद खत्म हो जाएगा। नतीजा हुआ कि अर्थव्यवस्था अपने 20 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है, कश्मीर में जो हो रहा है आप देख ही रहे हैं। नक्सलवाद का क्या बिगड़ा है वह खुद घोषणा करने वाले पीएम साब ही जानते होंगे।

अगला वार हुआ भ्रष्टाचार विरोधी कानून प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट पर। राफेल सौदे के बाद सरकार ने इस एक्ट को बदल कर कमजोर कर दिया। अब सरकार में शामिल किसी आदमी की जांच तब तक नहीं हो सकती, जब तक सरकार अनुमति न दे। अब कौन भ्रष्टाचारी इतना बड़ा महापुरुष होगा जो भ्रष्टाचार करके अपने ही खिलाफ जांच का आदेश देगा? चोर को ही कहा गया है कि तुम चौकीदारी करो।

अगला निशाना बना आरटीआई कानून, जो लंबे संघर्ष के बाद जनता को कानूनी अधिकार के रूप में मिला था। मोदी सरकार ने उस संस्था को कमजोर क्यों किया? जवाब साफ है कि भ्रष्टाचारी को बचाने के लिए। जनता सब बात को एक आवेदन से जान लेती थी, मोदी जी को यह अच्छा नहीं लगता था।

योजना आयोग को पिछली सरकार ने क्यों भंग किया था यह आजतक रहस्य ही है। उसकी जगह लेने वाले नीति आयोग ने सरकारी संपत्तियां बेचने की सिफारिश के अलावा आज तक क्या किया, कोई नहीं जानता।

सीबीआई, सीवीसी, आरटीआई, लोकपाल, प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट आदि को कमजोर करना, हथियार दलाली वैध करना और किसी भी घोटाले की जांच न होने का आपस मे गहरा संबंध है।

छह साल में ये स्पष्ट हो गया है कि एक पीएमओ के अलावा किसी मंत्रालय का कोई खास मतलब नहीं है। देश की सारी शक्तियां डेढ़ नेताओं और गुजरात कैडर के कुछ अधिकारियों द्वारा संचालित पीएमओ में एकत्र हो गई हैं। अब नया कारनामा होने जा रहा है कि तीनों सेनाओं का एक प्रमुख होगा।

कहने को मोदी के पहले भाषण से लेकर आज अंतिम भाषण तक में भ्रष्टाचार से लड़ने का कड़ा संकल्प मौजूद है।

इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि नेता में भगवान खोज रहे लोगों की नियति ही है अंत में उल्लू बनना। जो उल्लू बनकर खुश हैं उन्हें आप बधाई दे सकते हैं।

सोमवार, 12 अगस्त 2019

प्राचीन काल का परमाणु परीक्षण और पोखरियाल का घोड़ा चतुर

एक हैं रमेश पोखरियाल निशंक और वे एक ही हैं. यह भारत देश का सौभाग्य है कि इस बार शिक्षा व्यवस्था की खटिया खड़ी करने का जिम्मा इनको दिया गया है. शायद सीधे सादे आदमी हैं इसलिए पार्टी के एजेंडे पर प्रतिबद्ध होकर लंबा फेंकते तो हैं, लेकिन बारूद ज्यादा डाल देते हैं, इसलिए वार लक्ष्य के पार निकल जाता है.

झूठ बोलने की मुश्किल यह है कि हर बार याद नहीं रहता कि पिछली बार क्या बोला था. रमेश पोखरियाल निशंक इसी फेर में फंसे हैं बेचारे. पिछली बार बीजेपी की सरकार आई तो संसद में बोले कि पहली बार दूसरी सदी में महर्षि कण्व ने परमाणु परीक्षण किया था. फिर बाद में ​बोले कि ऋषि कणाद ने परमाणु परीक्षण किया था. अब आईआईटी में जाकर बोल रहे हैं कि चरक संहिता वाले चरक ऋषि ने परमाणु और अणु की खोज की थी और नासा कह रहा है कि संस्कृत की वजह से बोलने वाला कंप्युटर बनेगा.
फोटो साभार: गूगल

एक तो यह अनमोल हीरा सिर्फ भारत के पास है जिसके मुखारविंद से सिर्फ और सिर्फ विज्ञान और परमाणु तकनीक की जानकारी झरती है. लेकिन हर बार भूल जाते हैं कि​ पिछली बार क्या कहा था, इसलिए एक पे नहीं रह पाते और घोड़ा चतुर घोड़ा चतुर करते रहते हैं.

सुना है कि ये साब दर्जनों किताबों के लेखक हैं लेकिन वे किताबें रद्दी में भी आठ रुपये किलो बिक सकी हैं या दीमकों ने उन्हें अपनी माटी ​में मिला कर 'वाल्मिीकि' बना दिया है, कौन जाने? बस इतना पता है कि इनके लिखे का जिक्र आजतक इस ब्रम्हांड में नहीं हुआ.

योग्यता के हिसाब से तो शिक्षा को बर्बाद करने के लिए निशंक जी एकदम सही आदमी हैं, लेकिन झूठ बोलने की इनकी ट्रेनिंग कमजोर रह गई. इन्हें देशहित में कुछ दिन के लिए संघ की शाखा में जाना चाहिए और राजेंद्र यादव के शब्दों में एकदम 'घाघ, घुन्ना और घुटा हुआ' झुट्ठा बनना चाहिए.

सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम बात यह है कि प्राचीन भारत का ज्ञान विज्ञान उपहास का पात्र नहीं है. उसने अपना लोहा मनवाया है. भारतीय दर्शन में हर विषय में गंभीर विचार हुआ है जिसका अपना वैश्विक महत्व है. हो सकता है कि किसी युग में हम तकनीकी रूप से बेहद वि​कसित रहे हों, लेकिन आज वहां नहीं है. उलूल जुलूल बातें कहने की जगह शोध कार्यों को बढ़ाना चाहिए. क्या कम्प्युटर साइंस और संस्कृत को लेकर भारत में कोई शोध हुआ है? क्या आधुनिक परमाणु तकनीक और वैदिक ज्ञान पर कोई प्रमाणिक शोध हुआ है जो दोनों का आपस में अनन्य संबंध स्थापित करे? अगर हुआ है तो भी, अगर नहीं हुआ है तो भी, निशंक जी को तुरंत इन पर काम शुरू करवाना चाहिए. अभी वे जगहंसाई करवा रहे हैं.

हाल ही में सरकार ने संसद को बताया है कि 'देश की 70 प्रमुख प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिकों के 2911 पद रिक्त हैं.

युवाओं को सुरक्षित भविष्य चाहिए. वे नौकरी की तलाश में इधर उधर भाग रहे हैं. उन्हें शोध करने में अपना भविष्य सुरक्षित नहीं दिखता. निशंक जी मानव संसाधन विकास मंत्री हैं. युवा शोध की तरफ जाएं, नई नई खोज करें, इसके लिए वे क्या कर रहे हैं? जवाब है कुछ नहीं. वे खुद ही इतिहासकार बन गए हैं.

भारत में दक्षिणपंथी राजनीति की यही विडंबना है कि वहां सर्वोच्च नेता से लेकर आम कार्यकर्ता तक सब इतिहासकार और वैज्ञानिक हैं. अमित शाह संसद में आजादी और कश्मीर का अनर्गल इतिहास बता रहे हैं. निशंक जी बाहर विज्ञान का गलत इतिहास बता रहे हैं. कार्यकर्ता व्हाट्सएप पर बाबर अकबर से लेकर सावरकर और नेहरू तक का इतिहास बता रहे हैं और सब मिलकर, इतिहास में लौटकर हिसाब बराबर कर लेने की तैयारी कर रहे हैं.

जिस वक्त बेरोजगार युवा यूपी में आत्महत्या कर रहे हैं, देश भर के प्रतियोगी छात्र रवीश कुमार को प्रोग्राम चलाने का मैसेज कर रहे हैं, दक्षिणपंथी चपेट में आए युवा लिंचिंग और कश्मीर में व्यस्त हैं, उस समय निशंक जी खुद ही इतिहास क्यों बता रहे हैं?

45 साल में सबसे निचले स्तर की रिकॉर्ड बेरोजगारी के दौर में निशंक का मंत्रालय शिक्षा और रोजगार को लेकर सुधार का कौन सा कदम उठाने जा रहा है? यह सब मत पूछिए. बस इतिहास पूछ लीजिए.

प्राचीन भारत का ज्ञान बहुत समृद्ध था तो यह गौरव की बात है. लेकिन आज के ज्ञान युग में आपके वैज्ञानिक या ऐतिहासिक दावों को अगर तार्किक, ऐतिहासिक व वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ पेश नहीं किया गया तो आप मूर्ख कहलाएंगे. दुनिया में जितनी महाशक्तियां हैं वे प्राचीन काल के गौरव के आधार पर महाशक्ति नहीं बनी हैं. वे अपनी आधुनिकतम आर्थिक और तकनीकी क्षमताओं के कारण महाशक्ति बनी हैं. संघ परिवार को यह बात कब समझ में आएगी?


रविवार, 4 अगस्त 2019

भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने का प्रचार झूठ पर आधारित है

यह बात मीडिया आपको नहीं बताएगा कि भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने का प्रचार झूठ पर आधारित है.

18 जुलाई, 2015 को आउटलुक में एक खबर छपी. अरविंद पनगढ़िया ने एक कार्यक्रम में कहा था कि '15 साल से भी कम समय में हमारी अर्थव्यवस्था में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावनाएं बहुत प्रबल हैं.' यह व्याख्यान इंडियन इंस्टीट्यूट आफ बैंकिंग एंड फाइनेंस ने आयोजित किया था. इस खबर में ​कहा गया कि विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) सहित कई विश्लेषक यह अनुमान व्यक्त कर चुके हैं कि अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है. वर्ष 2030 तक भारत की जीडीपी 10,000 अरब डालर तक पहुंच सकती है.

अब मोदी जी का लक्ष्य है कि 2025 तक 5000 अरब डॉलर की इकोनॉमी बनाएंगे. मतलब जो स्वाभाविक प्रगति थी, उससे भी कम का लक्ष्य रखा है. मंदी की आहट देखकर यह प्रचार किया गया है कि हम 2025 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बना देंगे.

भारत अर्थव्यवस्था के आकार के मामले में पांचवें नंबर से फिसल कर सातवें पर पहुंच गया है. मौजूदा विकास दर 5.8 प्रतिशत है और 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कम से कम आठ प्रतिशत की विकास दर चाहिए, जबकि बाजार में मचा हाहाकार बता रहा है कि आने वाला समय और मुश्किल होगा.

पनगढ़िया ने उक्त कार्यक्रम में कहा था, 'वर्ष 2003-04 से 2012-13 के दशक के दौरान रपये में आई वास्तविक मजबूती पर यदि गौर किया जाये तो डालर के लिहाज से हमने सालाना 10 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की. इस रफ्तार से हम 2014-15 के दाम पर मौजूदा 2,000 अरब डालर की अर्थव्यवस्था को अगले 15 साल अथवा इससे भी कम समय में 8,000 अरब डालर तक पहुंचा सकते हैं, इसके साथ ही हम दुनिया की तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था जापान से आगे निकल सकते हैं.'

2003-04 से लेकर 2012-13 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था 8.3 प्रतिशत की अच्छी रफ्तार से आगे बढ़ी थी. यही वह दौर था जब गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों की संख्या में सबसे अधिक कमी आई. आज भारत की विकास दर 5.8 फीसदी पर अटकी हुई है और बाजार में जिस तरह की भगदड़ है, यह और नीचे जाएगी.

बेरोजगारी का प्रकोप शुरू हो गया है.

मारुति सुजुकी इंडिया ने 1,000 से ज्यादा अस्थायी कर्मचारियों की छंटनी कर दी है और नई भर्तियां रोक दी है. कंपनी अपने को मंदी से बचाने के लिए अन्य लागत कटौती उपायों की योजना बना रही है.

अनुमान है कि माह-दर-माह बिक्री गिरने और डीलरशिप पर इनवेंट्री बढ़ने के चलते आटो सेक्टर की हालत खस्ता हो चुकी है. वाहन कंपनियों की बिक्री निचले स्तर पर है. आने वाले महीनों में आटो सेक्टर से 10 लाख नौकरियां जा सकती हैं.

हुंडई, महिंद्रा, टाटा, बजाज आदि सबकी हालत खराब है. अर्थव्यवस्था की सुस्ती बढ़ रही है, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों में नकदी का संकट बना हुआ है. मानसून की देरी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी तेजी नहीं आ पाई.

बेरोजगारी अपने 45 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है. नोटबंदी ने सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले कुटीर, लघु और मझोले उद्योगों की रीढ़ तोड़ दी थी. वहां पर हालत और खराब ही हुए हैं. कारखाने बंद होने का सिलसिला जारी है और उत्पादन सिकुड़ रहा है जिसके चलते रोजगार छिन रहे हैं. देश में हस्तकला और छोटे छोटे पारंपरिक उद्योगों के लिए मशहूर इलाकों में मुर्दनी छा गई है.

जुलाई महीना भारतीय शेयर बाजार के लिए पिछले 17 साल का सबसे खराब महीना था.
5 जुलाई को आम बजट पेश होने के बाद शेयर बाजार धड़ाम हो गया और सरकार के 50 दिन पूरे होने तक शेयर बाजार में निवेशकों के 12 लाख करोड़ डूब गए.

एसबीआई के चेयरमैन रजनीश कुमार कह रहे हैं कि अब 'SBI की वित्तीय हालत को सुधारने के लिए केवल भगवान का सहारा ही बचा है.'

एचडीएफसी के दीपक पारेख कह रहे हैं कि 'मंदी साफ दिख रही है' आरबीआई गवर्नर कह रहे हैं कि 'अर्थव्यवस्था अनिश्चित दौर की ओर जा रही है.'

दर्जनों उद्योगपति ढहती अर्थव्यवस्था पर खुलकर चिंता जाहिर कर रहे हैं. अर्थशास्त्री सरकार को आगाह कर रहे हैं लेकिन सरकार ने इसका उपाय ढूंढने की तरह आपको 5 ट्रिलियन डॉलर का झुनझुना पकड़ा दिया है.

रविवार, 23 जून 2019

क्या आप जानते हैं कि देश में सालाना कितने किसान मर रहे हैं?

हमारे सियासी गलियारे में जिसके नाम का नारा लगे, समझिए उसके दुर्दिन आ चुके हैं. किसानों के नाम पर न राजनीति नई है, न किसानों की खुदकुशी का सिलसिला नया है. 

महाराष्ट्र में पिछले चार साल में 12 हजार 21 किसानों ने आत्महत्या की है. किसानों की कब्रगाह बन चुके महाराष्ट्र में पिछले चार साल से रोजाना 8 किसान खुदकुशी कर रहे हैं.राज्य में इस साल जनवरी से मार्च तक ही 610 किसानों ने आत्महत्या की है.
दिल्ली में किसानों के प्रदर्शन के दौरान महाराष्ट्र का एक बच्चा. फोटो: रायटर्स 

महाराष्ट्र के राहत और पुनर्वास मंत्री सुभाष देशमुख ने विधानसभा को बताया है कि जनवरी 2015 से दिसंबर 2018 के बीच 12 हजार 21 किसानों ने आत्महत्या की, जिनमें से सिर्फ 6 हजार 888 यानी 57 फीसदी किसानों के परिजन ही आर्थिक सहायता पाने के योग्य पाए गए.

मंत्री जी ने बताया है कि राज्य में किसान आत्महत्या थम नहीं रही है. उनके हिसाब से पिछले चार सालों में हर साल औसतन 3,005 किसानों ने आत्महत्या की है.

महाराष्ट्र भीषण सूखे से जूझ रहा है और ऊपर से किसानों की आत्महत्या के आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं.

इस मामले पर लगातार लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ ने न्यूज क्लिक से बातचीत में दावा किया है कि 'सरकार द्वारा आत्महत्या को लेकर जारी आंकड़े बोगस हैं. ये आंकड़े एनसीआरबी ने नहीं जारी किए हैं. ये आंकड़े राजस्व विभाग के हैं. वास्तविकता में इससे कही ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है. 2014 के बाद से ही वास्तविक आत्महत्या का आंकड़ा पता नहीं चल रहा है. सरकार ऐसा मुआवजा देने से बचने के लिए कर रही है. जिन 12 हजार किसानों की मौत को स्वीकार कर रही है, उसमें से भी सिर्फ आधे लोगों को मुआवजा दिया गया है.'

पी साईनाथ कहते हैं,'इसका सीधा कारण वही है जो पिछले 20 सालों से चला आ रहा है. यानी कृषि संकट. महंगाई बढ़ने से कृषि लागत बढ़ गई है. न्यूनतम समर्थन मूल्य भी किसानों को नहीं मिल पा रहा है. किसानों को बैंक से क्रेडिट नहीं मिल रहा है. मजबूरन किसान साहूकारों की चपेट में आ जाते हैं. अब सरकार में बैठे लोगों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह वास्तविक कारण जानना ही नहीं चाह रहे हैं. समस्या का हल निकालना तो दूर की बात है.'

21 जून को छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से खबर आई कि बीजेपी किसान मोर्चा के वरिष्ठ नेता मोहन राम निराला ने ही फांसी लगाकर जान दे दी. खुदकुशी की वजह कर्ज बताई जा रही है. मोहन राम निराला बीजेपी किसान मोर्चा के जिलाध्यक्ष थे. इस मामले में बीजेपी ने दावा किया कि एक सुसाइड नोट मिला है, लेकिन पुलिस ने इस दावे को खारिज कर दिया.

बीजेपी नेताओं का कहना है कि निराला के शव के पास एक सुसाइड नोट मिला था. नोट में कर्ज से परेशान होकर खुदकुशी करने का जिक्र है. बीजेपी नेताओं का दावा है कि सुसाइड नोट में निराला ने 4 लाख रुपये का कर्ज लेने की बात कही है. बीजेपी ने इस मामले की जांच के लिए एक कमेटी गठित की है.

आजतक की खबर में लिखा गया है कि बीजेपी कांग्रेस सरकार को घेरने की योजना बना रही है. लेकिन बीजेपी को यह याद रखना चाहिए कि इस वक्त केंद्र में उसकी सरकार है और किसानों की खुशहाली और दोगुनी आय का दावा पीएम खुद करते रहते हैं.

बीजेपी और कांग्रेस दोनों किसानों के साथ भद्दा मजाक कर रहे हैं. कांग्रेस शासित राज्यों में किसानों की कर्जमाफी का बड़ा शोर मचाया गया. पंजाब सरकार किसानों का कर्ज माफ करने का दावा कर रही है, लेकिन कर्ज माफी के नाम पर आए दिन किसानों के साथ मजाक भी होता रहता है. ताजा मामले में पंजाब के बरनाला के बड़बर गांव में कर्ज माफी के लिए किसानों की लिस्ट बनाई गई है, लेकिन इस लिस्ट में 13 जीवित किसानों को मृत दिखा दिया गया. इस पर किसानों ने एतराज जताया और कहा कि अगर सरकार को कर्ज माफ नहीं करना है तो न करे लेकिन कम से कम उन्हें कागजों में मरा हुआ तो ना दिखाए.

बड़बर गांव के किसान गुरमुख सिंह ने आजतक से कहा कि कर्ज माफी के नाम पर किसानों से पंजाब में सिर्फ मजाक किया जा रहा है. स्थानीय को-ऑपरेटिव सोसाइटी की ओर से जो कर्ज माफी की पहली किसानों की लिस्ट बनाई गई थी उसमें उन्हें कागजों में मृत दिखा दिया गया है. इसके बाद उन्होंने अपने जीवित होने के सबूत बैंक के सामने पेश किए और बड़ी मशक्कत के बाद अपना नाम दूसरी कर्ज माफी की लिस्ट में ऐड करवाया, लेकिन दूसरी लिस्ट में भी उन्हें एक बार फिर से मृत दिखा दिया गया है.

मजे की बात यह है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस किसानों के कर्ज को मुद्दा बना रही है और राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में बीजेपी भी इसे मुद्दा बना रही है. किसान दोगुनी स्पीड से मर रहे हैं और ये दोनों पार्टियां पब्लिक को मूर्ख बना रही हैं.

पी साईनाथ ने मुझसे एक इंटरव्यू में कहा था कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना एक बहुत बड़ा घोटाला है. इससे सिर्फ बीमा कंपनियों को फायदा हो रहा है, किसानों को कोई फायदा नहीं हो रहा. उल्टा उनसे भी पैसा वसूला जा रहा है.

किसान संगठनों की समन्वय समिति में सक्रिय योगेंद्र यादव का दावा है कि 'इस देश में सभी तरह की सरकारें आई हैं. अच्छी, बुरी. लेकिन वर्तमान सरकार जैसी झूठी सरकार नहीं आई. नरेंद्र मोदी सरकार साफ़ झूठ बोलती है. ये जुमला चलाते हैं कि किसानों की आय दोगुनी कर देंगे. सरकार का कार्यकाल ख़त्म हो गया लेकिन अब तक इनको यह पता तक नहीं है कि किसानों की आय बढ़ी या नहीं बढ़ी.'

यादव के मुताबिक, 'सरकार की एक उपलब्धि है कि फसल बीमा योजना में सरकार का ख़र्चा साढे चार गुणा बढ़ गया लेकिन उसके दायरे में आने वाले किसानों की संख्या नहीं बढ़ी. फसल बीमा योजना के तहत किए गए किसानों के दावों की संख्या इस सरकार में घट गई है. सरकार कहती है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य उसने डेढ़ गुणा कर दिया है, ये पूरी तरह झूठ है.'

किसान आत्महत्याओं की कहानियां अंतहीन हैं. एक लेख में नहीं लिखी जा सकती हैं. आप चाहें तो कुछ देर चिंतन कर सकते हैं कि जिस देश में पिछले 20 साल में 3 लाख से ज्यादा किसानों ने कर्ज, सूखा, फसल बर्बाद होने और आर्थिक तंगी के चलते आत्महत्या की हो, उस देश की सरकार ने ​इन आत्महत्याओं का आंकड़ा ही जारी करना बंद कर दिया है.

2015 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चला था कि किसान आत्महत्या की दर 42 फीसदी बढ़ गई है. इसके बाद से सरकार ने आंकड़े नहीं जारी होने दिए. जब तक आंकड़े जारी हुए, त​ब तक खुदकुशी करने वाले किसानों की संख्या 10 से 15 हजार सालाना थी. आज यह 10 हजार है या 20 हजार, किसी को नहीं मालूम है.

समस्या का उपाय करने की जगह यह कोशिश की जा रही है कि समस्या पर बात ही न हो. जिस गति से किसान अपनी जान दे रहे हैं, कोई दूसरा देश होता तो वहां हाहाकार मच गया होता. लेकिन भारत की सियासत से ज्यादा संवेदनहीन भारत की जनता है. आप लिखेंगे कि कि इतनी बड़ी संख्या में किसानों ने खुदकुशी कर ली तो कोई 'सोशल मीडिया वीर' आकर कमेंट बॉक्स में आपके लिए गाली लिख देगा.

लेकिन ​अगर कोई इंसान जिंदा है तो उसे अपने आप से पूछना चाहिए कि जिस देश में सिर्फ एक राज्य में एक सरकार के कार्यकाल में 12 हजार किसान आत्महत्या कर लेते हैं, क्या वह देश सच में मजबूत देश कहलाएगा?


शुक्रवार, 21 जून 2019

'धर्म धंधे से जुड़ जाए, इसी को ‘योग’ कहते हैं'

(व्यंग्य विधा के पितामह हरिशंकर परसाई का 'वैष्णव की फिसलन' शीर्षक से यह लेख बेहद लोकप्रिय है. यहां पर हेडिंग बदल दी गई है.)

वैष्णव करोड़पति है। भगवान विष्णु का मंदिर। जायदाद लगी है। भगवान सूदखोरी करते हैं। ब्याज से कर्ज देते हैं। वैष्णव दो घंटे भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, फिर गादी-तकिएवाली बैठक में आकर धर्म को धंधे से जोड़ते हैं। धर्म धंधे से जुड़ जाए, इसी को ‘योग’ कहते हैं। कर्ज लेने वाले आते हैं। विष्णु भगवान के वे मुनीम हो जाते हैं। कर्ज लेने वाले से दस्तावेज लिखवाते हैं-

‘दस्तावेज लिख दी रामलाल वल्द श्यामलाल ने भगवान विष्णु वल्द नामालूम को ऐसा जो कि...

वैष्णव बहुत दिनों से विष्णु के पिता के नाम की तलाश में है, पर वह मिल नहीं रहा। मिल जाय तो वल्दियत ठीक हो जाय।

वैष्णव के पास नंबर दो का बहुत पैसा हो गया है। कई एजेंसियां ले रखी हैं। स्टाकिस्ट हैं। जब चाहे माल दबाकर ‘ब्लैक’ करने लगते हैं। मगर दो घंटे विष्णु-पूजा में कभी नागा नहीं करते। सब प्रभु की कृपा से हो रहा है। उनके प्रभु भी शायद दो नंबरी हैं। एक नंबरी होते, तो ऐसा नहीं करने देते।

वैष्णव सोचता है- अपार नंबर दो का पैसा इकठ्ठा हो गया है। इसका क्या किया जाय? बढ़ता ही जाता है। प्रभु की लीला है। वही आदेश देंगे कि क्या किया जाय।

वैष्णव एक दिन प्रभु की पूजा के बाद हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगा- प्रभु, आपके ही आशीर्वाद से मेरे पास इतना सारा दो नंबर का धन इकठ्ठा हो गया है। अब मैं इसका क्या करूँ? आप ही रास्ता बताइए। मैं इसका क्या करूँ? प्रभु, कष्ट हरो सबका!

तभी वैष्णव की शुद्ध आत्मा से आवाज उठी- अधम, माया जोड़ी है, तो माया का उपयोग भी सीख। तू एक बड़ा होटल खोल। आजकल होटल बहुत चल रहे हैं।

वैष्णव ने प्रभु का आदेश मानकर एक विशाल होटल बनवाई। बहुत अच्छे कमरे। खूबसूरत बाथरूम। नीचे लॉन्ड्री। नाई की दुकान। टैक्सियाँ। बाहर बढ़िया लान। ऊपर टेरेस गार्डेन।

और वैष्णव ने खूब विज्ञापन करवाया।

कमरे का किराया तीस रुपए रखा।

फिर वैष्णव के सामने धर्म-संकट आया। भोजन कैसा होगा? उसने सलाहकारों से कहा - मैं वैष्णव हूँ। शुद्ध शाकाहारी भोजन कराऊँगा। शुद्ध घी की सब्जी, फल, दाल, रायता, पापड़ वगैरह।

बड़े होटल का नाम सुनकर बड़े लोग आने लगे। बड़ी-बड़ी कंपनियों के एक्जीक्यूटिव, बड़े अफसर और बड़े सेठ।

वैष्णव संतुष्ट हुआ।

पर फिर वैष्णव ने देखा कि होटल में ठहरने वाले कुछ असंतुष्ट हैं।

एक दिन कंपनी का एक एक्जीक्यूटिव बड़े तैश में वैष्णव के पास आया। कहने लगा- इतने महँगे होटल में हम क्या यह घास-पत्ती खाने के लिए ठहरते हैं? यहाँ ‘नानवेज’ का इंतजाम क्यों नहीं है?

वैष्णव ने जवाब दिया- मैं तो वैष्णव हूँ। मैं गोश्त का इंतजाम अपने होटल में कैसे कर सकता हूँ?

उस आदमी ने कहा- वैष्णव हो, तो ढाबा खोलो। आधुनिक होटल क्यों खोलते हो? तुम्हारे यहाँ आगे कोई नहीं ठहरेगा|

वैष्णव ने कहा- यह धर्म-संकट की बात है। मैं प्रभु से पूछूँगा।

उस आदमी ने कहा- हम भी बिजनेस में हैं। हम कोई धर्मात्मा नहीं हैं- न आप, न मैं।

वैष्णव ने कहा- पर मुझे तो यह सब प्रभु विष्णु ने दिया है। मैं वैष्णव धर्म के प्रतिकूल कैसे जा सकता हूँ? मैं प्रभु के सामने नतमस्तक होकर उनका आदेश लूँगा।

दूसरे दिन वैष्णव साष्टांग विष्णु के सामने लेट गया। कहने लगा- प्रभु, यह होटल बैठ जाएगा। ठहरने वाले कहते हैं कि हमें वहाँ बहुत तकलीफ होती है। मैंने तो प्रभु, वैष्णव भोजन का प्रबंध किया है। पर वे मांस माँगते हैं। अब मैं क्या करूँ?

वैष्णव की शुद्ध आत्मा से आवाज आई- मूर्ख, गांधीजी से बड़ा वैष्णव इस युग में कौन हुआ है? गाँधी का भजन है- ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिये, जे पीर पराई जाणे रे।’ तू इन होटलों में रहनेवालों की पीर क्यों नहीं जानता? उन्हें इच्छानुसार खाना नहीं मिलता। इनकी पीर तू समझ और उस पीर को दूर कर।

वैष्णव समझ गया।

उसने जल्दी ही गोश्त, मुर्गा, मछली का इंतजाम करवा दिया।

होटल के ग्राहक बढ़ने लगे।

मगर एक दिन फिर वही एक्जीक्यूटिव आया।

कहने लगा- हाँ, अब ठीक है। मांसाहार अच्छा मिलने लगा। पर एक बात है।

वैष्णव ने पूछा- क्या?

उसने जवाब दिया- गोश्त के पचने की दवाई भी तो चाहिए।

वैष्णव ने कहा- लवण भास्कर चूर्ण का इंतजाम करवा दूँ?

एक्जीक्यूटिव ने माथा ठोंका।

कहने लगा- आप कुछ नहीं समझते। मेरा मतलब है- शराब। यहाँ बार खोलिए।

वैष्णव सन्न रह गया। शराब यहाँ कैसे पी जाएगी? मैं प्रभु के चरणामृत का प्रबंध तो कर सकता हूँ। पर मदिरा! हे राम!

दूसरे दिन वैष्णव ने फिर प्रभु से कहा- प्रभु, वे लोग मदिरा माँगते हैं| मैं आपका भक्त, मदिरा कैसे पिला सकता हूँ?

वैष्णव की पवित्र आत्मा से आवाज आई- मूर्ख, तू क्या होटल बैठाना चाहता है? देवता सोमरस पीते थे। वही सोमरस यह मदिरा है। इसमें तेरा वैष्णव-धर्म कहाँ भंग होता है। सामवेद में तिरसठ श्लोक सोमरस अर्थात मदिरा की स्तुति में हैं। तुझे धर्म की समझ है या नहीं?

वैष्णव समझ गया।

उसने होटल में ‘बार’ खोल दिया।

अब होटल ठाठ से चलने लगा। वैष्णव खुश था।

फिर एक दिन एक आदमी आया। कहने लगा- अब होटल ठीक है। शराब भी है। गोश्त भी है। मगर मारा हुआ गोश्त है। हमें जिंदा गोश्त भी चाहिए।

वैष्णव ने पूछा- यह जिंदा गोश्त कैसा होता है?

उसने कहा- कैबरे, जिसमें औरतें नंगी होकर नाचती हैं।

वैष्णव ने कहा- अरे बाप रे!

उस आदमी ने कहा- इसमें ‘अरे बाप रे’ की कोई बात नहीं। सब बड़े होटलों में चलता है। यह शुरू कर दो तो कमरों का किराया बढ़ा सकते हो।

वैष्णव ने कहा- मैं कट्टर वैष्णव हूँ। मैं प्रभु से पूछूँगा।

दूसरे दिन फिर वैष्णव प्रभु के चरणों में था। कहने लगा- प्रभु, वे लोग कहते हैं कि होटल में नाच भी होना चाहिए। आधा नंगा या पूरा नंगा।

वैष्णव की शुद्ध आत्मा से आवाज आई- मूर्ख, कृष्णावतार में मैंने गोपियों को नचाया था। चीर-हरण तक किया था। तुझे क्या संकोच है?

प्रभु की आज्ञा से वैष्णव ने ‘कैबरे’ भी चालू कर दिया।

अब कमरे भरे रहते थे- शराब, गोश्त और कैबरे।

वैष्णव बहुत खुश था। प्रभु की कृपा से होटल भरा रहता था।

कुछ दिनों बाद एक ग्राहक ने बेयरे से कहा- इधर कुछ और भी मिलता है?

बेयरे ने पूछा- और क्या साब?

ग्राहक ने कहा- अरे यही मन बहलाने को कुछ? कोई ऊँचे किस्म का माल मिले तो लाओ।

बेयरा ने कहा- नहीं साब, इस होटल में यह नहीं चलता।

ग्राहक वैष्णव के पास गया। बोला- इस होटल में कौन ठहरेगा? इधर रात को मन बहलाने का कोई इंतजाम नहीं है।

वैष्णव ने कहा- कैबरे तो है, साहब।

ग्राहक ने कहा- कैबरे तो दूर का होता है। बिलकुल पास का चाहिए, गर्म माल, कमरे में।

वैष्णव फिर धर्म-संकट में पड़ गया।

दूसरे दिन वैष्णव फिर प्रभु की सेवा में गया। प्रार्थना की- कृपानिधान! ग्राहक लोग नारी माँगते हैं- पाप की खान। मैं तो इस पाप की खान से जहाँ तक बनता है, दूर रहता हूँ। अब मैं क्या करूँ?

वैष्णव की शुद्ध आत्मा से आवाज आई- मूर्ख, यह तो प्रकृति और पुरुष का संयोग है। इसमें क्या पाप और क्या पुण्य? चलने दे।

वैष्णव ने बेयरों से कहा- चुपचाप इंतजाम कर दिया करो। जरा पुलिस से बचकर, पच्चीस फीसदी भगवान की भेंट ले लिया करो।

अब वैष्णव का होटल खूब चलने लगा।

शराब, गोश्त, कैबरे और औरत।

वैष्णव धर्म बराबर निभ रहा है।

इधर यह भी चल रहा है।

वैष्णव ने धर्म को धंधे से खूब जोड़ा है।

(हिंदी समय से साभार)

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...