शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' चुनावी जुमला था

नरेंद्र मोदी ने 2014 में भ्रष्टाचार और अपराध मुक्त संसद देने का वादा किया था. वे ऐसा कर तो नहीं सके लेकिन घोटालों की फेहरिश्त में एक नया घोटाला जुड़ गया. आरोप है कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी की मंत्री आनंदी बेन ने अपनी बेटी को 250 एकड़ कीमती जमीन कौड़ियों के भाव में दिलवाई. 125 करोड़ की जमीन मात्र डेढ़ करोड़ में. अब आनंदी बेन मुख्यमंत्री हैं. हाल ही में यह भी आरोप लगा था कि आनंदी बेन पटेल की बेटी अनार पटेल और बेटे संजय पटेल राज्य में समानांतर सरकार चला रहे हैं. वे सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप करते हैं.
इंतजार कीजिए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनके पार्टी अध्यक्ष अमित शाह कह दें​गे कि 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' चुनावी जुमला था. अगर वे नहीं भी कहें तो जिस तरह से लूट मची है और मोदी चुपचाप रोज एक नया नारा लॉन्च कर रहे हैं, साफ समझा जा सकता है कि घोटाले और लूट रोकना उनकी प्राथमिकता में नहीं है. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे बड़ा घोटाला ये हुआ कि यूपीए सरकार ​के जो ​कथित महाघोटाले थे, उनके संबंध न कोई जेल गया, न किसी की संपत्ति जब्त हुई, न किसी को कोई जुर्माना हुआ. कोयला घोटाला, टूजी, कॉमनवेल्थ आदि घोटालों का सच क्या है, यह अब अतीत की बात हो गई. मोदी के नारों में जो कुछ था वह नारों की फेहरिश्त में बहुत पीछे छूट चुका है.
भाजपा घोटालों के मामले में कांग्रेस से बिल्कुल पीछे नहीं है. नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद राज्यों में भाजपा की सरकारों ने लूट मचा रखी है. मध्य प्रदेश का व्यापमं घोटाला अब तक का सबसे भयानक घोटाला है. इसमें कितना पैसा खाया गया है यह तो पता ही नहीं है, उस पर 50 के करीब हत्याएं भी हुई हैं. लेकिन राज्य में शिवराज सरकार और केंद्र में मोदी की सरकार आराम से चल रही है. इसी के साथ डीमैट घोटाला भी हुआ है जो दस हजार करोड़ तक अनुमानित है.
हाल ही में राजस्थान में 45 हजार करोड़ का खनन घोटाला हुआ. छत्तीसगढ़ में 36 हजार करोड़ का चावल घोटाला हुआ. महाराष्ट्र के महिला और बाल विकास मंत्रालय में 206 करोड़ का चिक्की घोटाला हुआ, जिसमें मुख्य आरोपी पंकजा मुंडे हैं. महाराष्ट्र में ही 191 करोड़ का ई-टेंडरिंग घोटाला हुआ. इसके मुख्य आरोपी शिक्षा मंत्री विनोद तावड़े हैं. 25 हजार करोड़ का एलईडी घोटाला कम चर्चा में रहा. यह योजना केंद्र सरकार की है.
इन घोटालों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. जो कुछ हो रहा है उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस का शासन करने का जो तरीका था, वह समय के साथ विस्तार पा गया है. कुर्सी पर बैठने वाले चेहरे बदल गए हैं, बाकी कुछ नहीं बदला है.
अब आप कहेंगे कि फिर भी कांग्रेस से भाजपा अच्छी है, क्योंकि कांग्रेस में परिवारवाद है. तो यह समझने की आवश्यकता है कि कांग्रेस 125 साल पुरानी पार्टी है, उसकी पीढ़ियां कांग्रेसी रोजगार में खप गईं इसलिए वहां पर परिवार ज्यादा दिखता है. भाजपा 25 साल पुरानी है, भाजपा नेताओं के बच्चे अब बड़े हो रहे हैं और वह सब कर रहे हैं जो कांग्रेस नेताओं के बच्चे कर रहे हैं.
जो लोग कहते हैं कि कांग्रेस में परिवारवाद है और भाजपा में नहीं हैं उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि अब भाजपा परिवारवाद में बाकी दलों को पीछे छोड़ती ऩजर आ रही है. मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी उसी कांग्रेसी परिवारवाद से निकले हैं, जिससे कांग्रेस के राहुल गांधी निकले हैं. यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा, कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह, राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, विजयाराजे सिंधिया की बेटियां वसुंधरा और यशोधरा, वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत, रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह, प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर, मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय हैं.
कांग्रेसी नेता भगवत झा आज़ाद के पुत्र कीर्ति आज़ाद भाजपा में ही हैं. लालू के बेटे तेजस्वी यादव की तरह वे भी क्रिकेटर से नेता बने. भाजपा के दिवंगत नेताओं के पुत्र-पुत्रियों को भी उनके रहते या बाद में राजनीति में उतारा गया है. मध्य प्रदेश में दिलीप सिंह भूरिया की पु​त्री निर्मला भूरिया, महाराष्ट्र में दिवंगत प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन, गोपीनाथ मुण्डे की पुत्रियां पंकजा मुण्डे और प्रीतम मुंडे को सक्रिय राजनीति में भागीदारी और पद मिले हैं. दिल्ली में साहिब सिंह वर्मा के सुपुत्र प्रवेश वर्मा भी सांसद हैं. भाजपा की ओर से दिवंगत नेताओं की पत्नियों को भी बिना किसी राजनीतिक अनुभव या योग्यता के चुनाव लड़ाया जा रहा है. सरदार सदाशिव राव महादिक की ​बेटी गायत्री राजे महादिक, जो दिवंगत तुकोजीराव की पत्नी हैं, इसका ताजा उदाहरण है.
जो नरेंद्र मोदी देश भर में घूम घूम कर परिवारवाद को नेस्तनाबूद करने का नारा लगा रहे हैं, उनके मॉडल स्टेट गुजरात में मुख्यमंत्री के बच्चे समानांतर सरकार चला रहे हैं और जमीनें हथिया रहे हैं.
आप पूछेंगे कि फिर किसे चुनें? हम कहेंगे कि चाहे जिसे चुनें, लेकिन जिसे चुनें उससे सवाल पूछें. नरेंद्र मोदी की छाती पर चढ़कर पूछें कि यह देश सवा अरब भारतीयों का है और तुम इसके चौकीदार हो. जनता की संपत्ति कोई कैसे उठा ले जाता है, इसका जवाब दो. सरकारें चुनिए और जवाब मांगिए, वरना हमारे हाथ घोटाले गिनने के अलावा कुछ नहीं आएगा. 

सोमवार, 25 जनवरी 2016

संघ परिवार का सुभाष प्रेम

इंडियन आर्मी जब भारत की ओर कूच करने वाली थी, उसके पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने रंगून में रेडियो पर भाषण दिया था. इस भाषण में उन्होंने गांधीजी को 'फादर ऑफ नेशन' यानी राष्ट्रपिता बताया था और आईएनए के सैनिकों से कहा था कि जब भी आप भारत की सीमा में दाखिल होंगे, आपका 'कमांडर इन चीफ' मैं नहीं रहूंगा, बल्कि गांधीजी रहेंगे.
गांधी और सुभाष 36 का आंकड़ा था. घनघोर विरोध के बावजूद नेताजी, गांधी जी को फादर आॅफ नेशन बोल रहे थे. आज आप सरकार आलोचना करने पर राष्ट्रद्रोही करार दिए जाते हैं और प्रताड़ना झेलते हैं.
संघ परिवार को सुभाष बाबू तो कभी मिले नहीं, लेकिन सर्वसुलभ गांधी मिले जिनकी उन्होंने हत्या कर दी. तिरंगे को नकार दिया. संविधान को नकार दिया. आजादी को नकार दिया. उन्होंने भगवा झंडा और हिंदू राष्ट्र मांगा. यह हुज्जत आजादी की लड़ाई में नाखून तक न कटवाने के बावजूद थी. जिन्ना की मुस्लिम लीग को मुस्लिम राष्ट्र चाहिए था, सावरकर और गोलवलकर के संघ को हिंदू राष्ट्र चाहिए था. नास्तिक जिन्ना ने मुसलमानों को मुस्लिम राष्ट्र के लिए बहकाया. नास्तिक सावरकर ने हिंदू राष्ट्र की थ्योरी दी. जिन्ना सफल हुए, लेकिन संघ को सफलता नहीं मिली. संघ का वह अभियान तब सफल नहीं हुआ लेकिन अब तक चल रहा है. कभी नमाज नहीं पढ़ने वाले, बीफ, पोर्क, दारू सबका सेवन करने वाले जिन्ना को जब मुस्लिम राष्ट्र मिल गया तब उन्होंने पाकिस्तानियों से कहा, अब हिंदू मुसलमान सब अपने अपने पूजाघरों में जाने को आजाद हैं. संघ परिवार हिंदू राष्ट्र का अभियान भी चलाता है और लोकतंत्र का सबसे बड़ा ​पुरोधा भी बनता है. ​इस देश में जिस पार्टी और संगठन को मुसलमानों से सबसे ज्यादा दिक्कत है, उसके लोग पाकिस्तान और बांग्लादेश को भारत में मिलाकर अखंड भारत की बात करते हैं.
इन्हीं पाखंडों और विरोधाभासों की वजह से भारत की जनता ने इन्हें नकार दिया था. चार—पांच दशक गुजर जाने के बाद संघ परिवार ने जनता को मूर्ख बनाने की रणनीति अपनाई और सबसे बड़े राष्ट्रवादी हो गए. जिस संघ के नागपुर मुख्यालय पर कुछ साल पहले तक तिरंगे की जगह भगवा फहराया जाता था, उस संघ के लिए अब राष्ट्रीय झंडा और राष्ट्रगान उपद्रव का जरिया है. तिरंगे और राष्ट्रगान के बहाने लेकर संघी रोज ही देशभक्ति का प्रमाण पत्र बांटते फिरते हैं.
मोदी की अगुआई में अब संघ परिवार आंबेडकर, गांधी, भगत सिंह, पटेल, सुभाष—सबके नाम का नारा लगाता है. लेकिन आंबेडकर के विचारों को मानने वाले एक संगठन के पीछे पूरी सरकार पड़ जाती है. एक युवा के खिलाफ पूरी सरकार खड़ी हो जाती है और वह आत्महत्या कर लेता है. फिर उनका नेता आंसू भी टपका देता है. गांधीवादी संदीप पांडेय को नक्सली और देशद्रोही कहकर बीएचयू से बाहर कर दिया जाता है. सुभाष और भगत सिंह में विश्वास करने वाले साई बाबा को जेल में डाल दिया जाता है. उनकी गिरफ्तारी को गलत कहने पर अरुंधति राय पर मुकदमा करने का आदेश पारित हो जाता है. राजनीतिक उन्माद का विरोध करने वालों को सरेआम गालियां दी जाती हैं. आंबेडकर फाउंडेशन को आंबेडकर साहित्य प्रकाशित करने की इजाजत नहीं दी जाती. किस थ्योरी के तहत देश भर में प्रतिष्ठित और विश्वसनीय पत्रकारों की जमात को देशद्रोही, नक्सली और कांग्रेसी घोषित कर दिया गया, इस पर जरा सोचिएगा. रजत शर्मा और सुधीर चौधरी को छोड़कर पूरा मीडिया राष्ट्रद्रोही और कांग्रेसी हो गया तो यूपीए सरकार के दस साल के कार्यकाल में घोटाले हेडिंग कैसे बनते रहे?
आंबेडकर, भगत सिंह, गांधी और सुभाष में से कौन सांप्रदायिक था? कौन मुसलमान शब्द तक से घृणा करता था? सुभाष के विचारों, योगदान और कार्यों पर चर्चा न करके सिर्फ उनकी रहस्यमय मौत पर चर्चा करना, फर्जी चिट्ठियां और फोटोशॉप्ड आइटम वायरल करना संघियों के 90 साला कुत्सित अभियान का हिस्सा भर है. वे नेहरू गांधी पर हजारों फोटोशॉप प्रसारित कर चुके हैं.
संघ परिवारी आजादी आंदोलन के नायकों से कितना प्यार करते हैं, यह अब भी आप नहीं जानते तो आप बहुत भोले हैं और मूर्ख बनाये जाने के लिए अभिशप्त हैं. उन्हें तो ​उन्माद फैलाने के कारण चाहिए, मंदिर नहीं, तो गाय सही. गोडसे नहीं, तो सुभाष सही.
संघ परिवारी किसी से ज्यादा प्रेम दिखाएं तो उनपर शक कीजिए. उनसे जिनका भी विरोध है, वह इसी कारण है कि उनका मकसद बेहद कुत्सित है. वरना दीगर विचारधाराओं का सम्मान इस देश की विरासत में है. उनकी विचारधारा ही इस देश के लिए सबसे बड़ा खतरा है. सबसे बड़ा इसलिए कि वे मुख्यधारा की राजनीति में हैं और बहुसंख्या को प्रभावित कर सकते हैं. ऐसी विचारधारा से होशियार रहने की जरूरत है जो अपने पार्टी नेता के विरोध को राष्ट्रद्रोह बताती हो, जो लोकतांत्रिक चर्चाओं को नक्सलवाद बताती हो.  

शनिवार, 23 जनवरी 2016

विरासत के विरुद्ध फूहड़ अभियान

पिछले कुछ महीनों में राष्‍ट्रवादी फैक्‍ट्री के फूहड़ सिपाहियों ने जवाहर लाल नेहरू के कुछ पत्र जारी किए. हाल में सुभाष चंद्र बोस के बहाने नेहरू पर फिर अनाप शनाप कोशिश की गई. होता यह है कि भाई लोग फोटोशॉप पर एक पुराना पत्र तैयार करते हैं कि यह नेहरू का है. लेकिन हर बार पकड़े जाते हैं.
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ कथित नेहरू का पत्र
जिसमें एक दर्जन से ज्‍यादा गलतियां हैं. 
नेहरू बुरा प्रधानमंत्री हो सकता है, लेकिन वह भारत का निर्माता है. नेहरू नीतिगत गलतियां कर सकता है, भारत में संसदीय परंपरा की पहली ईंट रखने वाला व्‍यक्ति है. नेहरू को हम नापसंद कर सकते हैं, लेकिन वह योग्‍य अौर पढ़ा लिखा था. राजनीति के शीर्ष पर होकर भी उसने कई अमूल्‍य किताबें लिखीं. नेहरू की कोई एक किताब मूल्‍य के स्‍तर पर राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के नब्‍बे साल के साहित्‍य से श्रेष्‍ठ साबित होती हैं. क्‍योंकि विविधता, लोकतंत्र, उदारता, बराबरी आदि मूल्‍यों की वाहक हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने भी एक किताब लिखी है जिसमें वे कहते हैं कि मैला ढोने वालों को ऐसा करके आध्‍यात्मिक सुख मिलता है.
हो सकता है कि नेहरू मूर्ख भी रहे हों, लेकिन उन्‍होंने तक्षशिला को बिहार में कभी नहीं ला पटका, न ही पूरे देश को झूठ के समन्‍दर में डुबाने की कोशिश की और न ही अपने भाषणों के कारण प्रधानमंत्री रहते हुए चुटकुला बने.
मध्‍यम मार्ग पर चलने वाला एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत बनाने में सबसे बड़ा योगदान नेहरू का है. नेहरू और गांधी बुरे नेता हो सकते हैं, लेकिन उनके भारत में सबके लिए जगह थी, उनकी नजर में न कोई कुत्‍ता था, न कोई कुत्‍ते का बच्‍चा.
ऐसे व्‍यक्ति को वे लोग बदनाम करना चाहते हैं जो जवाहरलाल की स्‍पेलिंग नहीं जानते. दुखद है कि वे ऐसी फिजूल की चर्चाओं में लोगों को उलझाए रखना चाहते हैं.
सही चीज के लिए लडि़ए. अपनी फ्रस्‍ट्रेशन इस तरह निकालने की कोशिश में आप पकड़े जाते हैं और आपकी फ्रस्‍ट्रेशन और ज्‍यादा बढ़ जाती है.
यदि नेहरू, गांधी, कांग्रेस, सुभाष सबको नकार दिया जाए तब सवाल उठेगा कि संघ ने क्‍या किया?
संघ के हिस्‍से में तीन उपलब्धियां हैं:
1. सावरकर का जेल में अंग्रेजों से माफी मांग कर छूट जाना और फिर पूरे आजादी आंदोलन में संघ का किसी तरह के संघर्ष से दूर रहना.
2. अपनी घृणास्‍पद मानसिकता को मूर्तरूप देते हुए गांधी की हत्‍या
3. आजादी के बाद भी देश को हिंदू-मुसलमान में बांटने की लगातार कोशिश. यह कमंडल से होते हुए गाय तक पहुंच चुकी है.
संघ जितना बड़ा और ताकतवर संगठन है, उसका देश के इतिहास में सबसे बड़ा योगदान हो सकता था. आजादी की लड़ाई में उनकी सारी ऊर्जा बर्बाद हुई, लेकिन उन्होंने उससे कोई सबक नहीं लिया. हिंदू—मुसलमान दो अलग देश हैं, यह द्विराष्ट्र सिद्धांत इतना खतरनाक साबित हुआ कि सरकारी आंकड़ों में दस लाख लोगों का खून बहा. देश के दो टुकड़े हुए, फिर धर्म के आधार पर बना पाकिस्तान ध्वस्त हो गया. संघ परिवारी अब भी धर्म के आधार पर देश बनाने की खब्त से बाहर आने को तैयार नहीं हैं.
नेहरू, गांधी, सुभाष और पटेल जैसे बड़े नेताओं के आगे संघ पूरा संगठन बहुत बौना और निष्प्रभावी हैं. उन्हें इन कुत्सित को​शिशों से उबर जाना चाहिए. 

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

देशभक्ति की खूंखार कसौटी

कुछ दिन पहले किसी मूर्ख हिंदू नामधारी ने इस्‍लाम पर कुछ सिरफिरी टिप्‍पणी कर दी. चूंकि इस्‍लाम के अनुयायियों में मूर्खों की संख्‍या सर्वाधिक है, इसलिए उन्‍होंने आसमान सर पर उठा लिया. एक गुमनाम मूरख को चर्चा में ला दिया. उनका अल्‍लाह इतना कमजोर है कि किसी सिरफिरे की टिप्‍पणी पर आहत हो जाता है और पूरा इस्‍लाम खतरे में पड़ जाता है. दुख की बात है कि जितने धर्म जरा-जरा सी बात पर खतरे में आ जाते हैं, वे मिट नहीं रहे हैं. यह बड़े अफसोस की बात है.
तो उस टिप्‍पणी पर इस्‍लाम को खतरे में मानकर मुल्‍लों ने ऐतिहासिक रूप से भीड़ बटोरी और शहर-शहर प्रदर्शन किया. मालदा में आगजनी और तोड़फोड़ की. यह संघियों से मुसंघियों के गठबंधन का नतीजा है. ये दोनों आपस में एक हैं. एक-दूसरे को जहर उगलने का पूरा बहाना देते हैं. इस प्रदर्शन से संघियों को यह कहने का बहाना मिला कि उन बेचारों के साथ बड़ा भेदभाव होता है. प्रदर्शन या तोड़फोड़ करने वालों को फांसी दिए बगैर उनकी दंगाई हरकतों की आलोचना कैसे की जा सकती है?
अगर मालदा में तोड़फोड़ हुई और उसके लिए किसी को फांसी नहीं हुई, तो संघियों द्वारा सरकार प्रायोजित हत्‍याएं भी नाजायज कैसे हो सकती हैं? अगर आप उनकी हत्‍याअों को नाजायज कहेंगे तो वे आहत हो जाएंगे.
इन दोनों का आहत होने का धंधा बड़ा दिलचस्‍प है. इसका धरम से कोई ताल्‍लुक नहीं है. यह एक तरह का मूर्खतापूर्ण राजनीतिक प्रोजेक्‍ट है. स्‍वतंत्रता संग्राम के दौरान गाय और खलीफा को लेकर आहत हो रहे मुल्‍लों ने ही देश का बंटवारा करवा दिया था. आहत होने की संवेदनशीलता ऐसी संवेदनहीन है कि हिंदुओं के 'महान देवता' (?) महिला के मंदिर में प्रवेश करते ही अपना 'संयम' खो देते हैं और दुनिया चलाने वाले वे शक्तिशाली देवता अपना ब्रम्हचर्य तक नहीं बचा पाते.
हैदराबाद में एक की जान लेकर प्रधानमंत्री असम में वोट मांगने गया. इस निर्लज्‍जता पर सोचिए. राजनाथ सिंह गृहमंत्री हैं. उनके पास दादरी और हैदराबाद पर जवाब नहीं है, न राज्य से मांगा. लेकिन ममता बनर्जी से जवाब मांग रहे हैं. इस सिलेक्टिव आंतरिक​ सुरक्षा पर सोचिए. कट्टरता की सनक जब विरोधियों को निपटा चुकी होती है तब अपने लोगों पर जुटती है. प्रशांत भूषण के मुंह पर उछाली स्‍याही कब सुधींद्र कुलकर्णी के मुंह पर लिपट जाएगी, आप समझ नहीं पाएंगे. उन्‍माद अपने पराए में फर्क नहीं करता. मंटो ने यह उन्‍मादी 'मिश्‍टेक' करीब से देखा था.
सारे बुद्धिजीवी 'सेट' किये जा चुके हैं तो उन्हें छोड़ दीजिए उनके हाल पर. लेकिन अपने बारे में सोचिए. आपकी रसोईं में बने मशरूम को बीफ बताकर अफवाह उड़ सक​ती है और आप की जान ली जा सकती है. आप सरकार से असहमत हुए तो आपको नक्सली और देशद्रोही कहे जा सकते हैं.
इस कसौटी पर संघी गोविंदाचार्य को नक्सली और देशद्रोही कहा जाना चाहिए क्योंकि वे भी किसानों और गरीबों पर बोलते हैं, वे भी मोदी सरकार की आलोचना करते हैं. यह कसौटी इतनी संकीर्ण है कि आपको सवाल करने की इजाजत नहीं देती. यह कसौटी राष्ट्र की व्यापक संकल्पना को एक मूर्खता के पुंज से होते हुए एक मूर्ख व्यक्ति तक समेट देना चाहती है. यह कसौटी इस समूचे तंत्र को अंतत: सवर्णों, सामंतों और पूंजीपतियों तक समेट देती है.
इसी कसौटी पर देश का पूरा इंटैलीजेंशिया देशद्रोही हो गया है. हैदराबाद में रोहित वेमुला की आत्महत्या अथवा सरकारी हत्या के बाद 15 दलित अध्यापकों ने इस्तीफा दे दिया. कुछ ही दिन पहले बीएचयू से मैग्सेसे विजेता संदीप पांडेय को निष्कासित किया गया, जिस पर कोई हल्ला नहीं मचा. उन पर एबीवीपी का आरोप था कि वे नक्सली और देशद्रोही हैं. एबीवीपी की शिकायत के बाद बीएचयू के संघी प्रशासन ने यह कार्रवाई की.
90 प्रतिशत विकलांग डीयू के प्रोफेसर साईबाबा को नक्सली बताकर नागपुर की अंडाकार सेल में रखकर मरणासन्न होने तक प्रताड़ित किया गया. उनकी गिरफ्तारी को तथ्यत: गलत बताने पर अरुंधति राय पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया गया.
कल 20 जनवरी को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक सेमिनार में हिस्सा लेने गए प्रतिष्ठित पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन को नक्सली और देशद्रोही बताकर उनके कार्यक्रम का विरोध किया गया और उनके साथ बदतमीजी की गई. यदि सिद्धार्थ वरदराजन को देशद्रोही और नक्सली घोषित किया जा सकता है तो यह देश अब जाहिलों का स्वर्ग हो चुका है.
इसी कसौटी के आधार पर लगातार हत्याओं और अभिव्यक्ति पर हमलों के विरोध में उठ खड़े होने को 'मैनेज्ड और फिक्स' राजनीतिक कार्यक्रम बताने वाले लोग हर कैंपस में दीगर विचार रखने वालों को प्रताड़ित करने में लगे हैं.
राष्ट्रवाद और देशभक्ति अब एक बदबूदार कीचड़ में तब्दील हो चुका है जो हर कैंपस में, हर संस्थान में फैल रहा है. इस कीचड़ में दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों और संघ की घृणा आधारित अमानवीय विचारधारा असहमत लोगों के लिए कोई जगह नहीं है. दादरी से हैदराबाद तक की घटनाएं उसी का नतीजा हैं.
संघ सभी संस्थाओं में अपने लोगों घुसाए, कांग्रेस या अन्य पार्टियों की तरह यह उसका विशेषाधिकार है. उसके पास बुद्धिजीवी नहीं हैं तो हनुमान गढ़ी के पंडों को सब विश्वविद्यालयों का वाइस चांसलर बना दे. लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं गईं तेल लेने. लेकिन हत्याएं, उत्पीड़न, जेल और गोली के सहारे बुद्धिजीवियों का उत्पीड़न खतरनाक स्थिति तक पहुंच रहा है. नरेंद्र मोदी के तकनीकी लच्छेदार भाषणों के पीछे का सच यही है कि युवाओं को मूर्ख बनाकर उन्हें कैंपसों से निकली भेंड़ों में तब्दील किया जाएगा. जो इससे इनकार करेगा, उसे प्रताड़ित किया जाएगा.
बुद्धिजीवियों के साथ इतनी क्रूरता से अंग्रेज भी नहीं पेश आए थे. संघ के लोग बताते हैं कि किस तरह संघ में शुरू से ही पढ़े लिखे लोगों के लिए कोई जगह नहीं थी. अब भी नहीं है. वे समर्पित प्रचारक और कार्यकर्ता तैयार करते हैं, जो उनके किसी भी राजनीतिक प्रोजेक्ट पर धर्म के नाम पर मर​ मिटें. वे अब विश्वविद्यालय के युवाओं को इसी तरह की भीड़ में बदलना चाहते हैं. विश्वविद्यालय के युवाओं को तालिबानी मूर्खों की भीड़ में तब्दील कर देने का संघी सपना साकार हुआ तो यह देश क्या बनेगा, यह समझने के लिए अफगानिस्तान, पाकिस्तान और सीरिया पर नजर दौड़ा लीजिए. धर्म जब राजनीति में उतरता है तो उसकी खून की प्यास असीम हो जाती है. बंटवारा ज्यादा पुराना नहीं है जब धर्म के झगड़े ने पूरे हिंदुस्तान को खून के दरिया में तब्दील कर दिया था. यह लोकतंत्र ​बड़ी मुश्किल से मिला है. लोकतंत्र को समझकर उसकी रक्षा कीजिए. एक की हत्या पर आवाज उठाइए वरना एक-एक करके हम सब शांत कर दिए जाएंगे. 

रविवार, 27 दिसंबर 2015

करछना में सरकारी लूट का कहर

यह इसी देश में संभव है कि किसान विकास कार्यों के लिए अपनी जमीन दे, अपनी जीविका और सुरक्षा कुर्बान करे और अगर अपने अधिकार मांगने लगे तो लाठी खाए, गोली खाकर जान गंवाए. देश भर में जहां कहीं भी सरकारें जमीन अधिग्रहण करती हैं, वहां जनता से टकराव के बाद पुलिस बल का इस्तेमाल जैसे नियम बन गया है.

इलाहाबाद जिले की करछना तहसील के कचरी गांव में करीब दो महीने से धारा 144 लागू है. पुलिस आैैर ग्रामीणाें में संघर्ष के बाद पूरे गांव में पीएसी तैनात है. गांव के कई घरों में ताले लगेे हैं. गांव सूना  पड़ा है. पुलिस की दहशत से गांव के 70 फीसदी लोग घरों में ताला लगाकर वहां से भाग गए हैं. जो घर खुले हैं, उनमें सिर्फ महिलाएं और बच्चे हैं. कई घरों के दरवाजे टूटे हैं. घरों के अंदर भी तोड़फोड़ की गई है. गांव वालों के मुताबिक इन्हें पुलिस ने तोड़ा है. गांव के सभी पुरुष पुलिस के डर से फरार हैं,  यहां सिर्फ महिलाएं, बच्चे और बूढ़े बचे हैं.


जमीन बचाने के लिए कचरी गांव के किसान 1,850 से ज्यादा दिनों से धरने पर हैं. इसी साल 9 सितंबर की सुबह 7 बजे किसान आंदोलनकारियों पर पुलिस ने धावा बोल दिया. ग्रामाणों और पुलिस के बीच जबर्दस्त संघर्ष हुआ. लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले छोड़े गए, जमकर पथराव हुआ, चापड़ चले और आगजनी भी हुई. ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिस ने एक घर में आग भी लगा दी. कई राउंड गोलियां चलाईं. धरनास्थल पर मौजूद लोगों की पिटाई की और उन्हें गिरफ्तार कर ले गई. हालांकि पुलिस ज्यादातर आरोपों से इंकार कर रही है. पुलिस का कहना है कि उन्होंने गोली नहीं चलाई और घर में आग खुद ग्रामीणों ने लगाई थी.

गांव के एक घर में दो ग्रेनेड फेंके गए. घर के अंदर की दीवारें काली पड़ गई हैं. गांव वाले कह रहे हैं कि यह ग्रेनेड पुलिस ने फेंका है जबकि पुलिस का कहना है कि बम घर के अंदर से फेंका गया. अब सवाल ये है कि अगर बम घर के अंदर से फेंका गया तो अंदर ही कैसे फट गया? यदि अंदर से कोई बम फेंक रहा था और बम अंदर ही फट गया तो कोई हताहत क्यों नहीं हुआ? बहरहाल, ये बम आर्टिलरी (आयुध कारखाने) के बने हैं, जिन पर सितंबर 2010 एक्सपाइरी डेट है. पुलिस अधिकारियों ने सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की एक जांच समिति के सवालों के जो जवाब दिए, उनमें हास्यास्पद किस्म का विरोधाभास है. अधिकारियों ने एक ही बातचीत में बार-बार बयान बदले हैं.

तीन साल के एक बच्चे के कंधे पर 12 टांके आए हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि उसे पुलिस की गोली छूकर निकली है जबकि पुलिस का कहना है कि बच्चा ग्रामीणों के हमले में दराती से घायल हुआ है. जो भी हो, पुलिस को कम से कम ऐसे सवाल का जवाब देना चाहिए कि चारपाई पर पड़े 84 साल के बुजुर्ग से सरकार को क्या खतरा था, जिसे घर में से घसीट कर पीटा गया? सरकार या पुलिस को 13-14 साल के बच्चे से क्या खतरा हो सकता है जिसे जेल में डाल दिया गया?

बहरहाल, गांव के 41 किसान इलाहाबाद की नैनी जेल में बंद हैं. इन 41 लोगों में 13 साल से लेकर 17 साल तक के नाबालिग और 75 साल के बुजुर्ग भी शामिल हैं. ये सभी बिना किसी सुनवाई के जेल में बंद हैं. इन लोगों के अलावा पुलिस अन्य किसानों और 300 अज्ञात लोगों के खिलाफ गैंगस्टर और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) की कार्रवाई की तैयारी कर रही है. महिलाओं और बच्चों के साथ आंदोलन में उतरे किसानों को प्रशासन ने उपद्रवी मानते हुए उनके खिलाफ हत्या के प्रयास सहित विभिन्न गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज कराए हैं.

आंदोलनकारियों के मुखिया किसान नेता राज बहादुर पटेल अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं. उन पर 12 हजार रुपये का इनाम है. उनके परिवार के 22 सदस्य जेल में बंद हैं. यह सब इसलिए हुआ है क्योंकि किसान अपनी जमीन किसी कंपनी को देने का विरोध कर रहे हैं, इसीलिए पुलिस उन्हें अपराधी मानती है. कचरी गांव के कई घरों में पुलिस ने तोड़फोड़ की है. राज बहादुर पटेल के घर की महिलाओं ने बताया, ‘नौ सितंबर को भारी संख्या में आई पुलिस ने पूरा गांव घेर लिया, जो सामने मिला, उसे पीटा, घरों में तोड़फोड़ की और 46 ग्रामीणों को पकड़ कर थाने ले गई. पुलिस दल के साथ डीएम भी थे.’

लगातार धारा 144 लागू होने, गांव में पुलिस की दबिश और उत्पीड़न के चलते गांववाले दहशत में जी रहे हैं. आठ अक्टूबर को एक किसान सहदेव (65) की मौत हो गई. ग्रामीणों का कहना है कि सहदेव की मौत पुलिस की प्रताड़ना और सदमे से हुई है. पुलिस गांव वालों को इतना प्रताड़ित कर रही है कि हर कोई भय में जी रहा है. इसी तरह से पास के कोहड़ार गांव में जय प्रकाश के घर पर बुलडोजर चलवाकर उसे ध्वस्त करा दिया है.

इन किसानों का दोष बस इतना है कि वे अपनी जमीन जेपी समूह को नहीं देना चाहते. गौर करने लायक बात ये है कि सरकार भी ग्रामीणों से बातचीत करने को राजी नहीं है, वह कोर्ट का आदेश मानने को तैयार नहीं है कि किसानों की जमीन वापस की जाए. सरकार कोई भी यत्न करके ग्रामीणों से निपटने के मूड में है.

इलाहाबाद के पास के इलाके में 20 किलोमीटर की दूरी में तीन थर्मल पावर प्लांट लगाए जाने हैं. करछना और बारा में दो पावर प्लांट जेपी समूह के होंगे और बारा में एक प्लांट एनटीपीसी और यूपी पावर कॉरपोरेशन का होगा. इसके लिए भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना 23 नवंबर, 2007 को अधिग्रहण अधिनियम की धारा 4, 17(1) और 17(4) के तहत जारी हुई थी. तत्कालीन प्रदेश सरकार ने अधिग्रहीत जमीन पावर प्रोजेक्ट के लिए जेपी समूह को हस्तांतरित कर दी थी.

जब अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई तो कचरी के किसान नेता राजबहादुर पटेल की अगुवाई में दर्जनों किसानों ने अधिग्रहण के खिलाफ प्रशासन को आवेदन सौंपा लेकिन प्रशासन ने इसकी अनदेखी की और अधिग्रहण संबंधी कार्रवाई जारी रही. आखिरकार अप्रैल, 2008 में सात किसानों की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिग्रहण की योजना को चुनौती दी गई. इस प्रोजेक्ट के लिए 2010 में 2200 बीघा जमीन अधिग्रहीत की गई. सरकार ने जमीन का मुआवजा बाजार दर से दस गुना कम तय किया, कुल तीन लाख रुपये प्रति बीघा, जबकि तब जमीन का बाजार भाव 30 लाख रुपये प्रति बीघा था. यहां के किसान ‘किसान कल्याण संघर्ष समिति’ के बैनर तले भूमि अधिग्रहण के विरोध में लामबंद हैं. किसानों का संघर्ष जारी है तो पुलिस का दमन भी. इस मुद्दे पर अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा दूसरे संगठनों के साथ मिलकर आंदोलन कर रही है. विरोध के चलते अभी तक अधिग्रहीत जमीन की घेराबंदी पूरी नहीं हो सकी है.

22 अगस्त, 2010 से इलाके के किसान धरने पर बैठे. सरकार ने जब इस तरफ भी ध्यान नहीं दिया तो किसानों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया. प्रशासन ने बातचीत करके मसला सुलझाने की जगह आंदोलन को कुचलने का रास्ता अपनाया. जनवरी 2011 में अनशनरत किसानों पर लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले दागे गए और फायरिंग की गई. इस संघर्ष में पुलिस की गोली से एक किसान गुलाब विश्वकर्मा की मौत हो गई थी, जिसके कारण किसानों का गुस्सा बढ़ गया. उस वक्त किसानों के उग्र हो जाने पर पुलिस को पीछे हटना पड़ा था. इसके बाद 22 अगस्त 2015 को भी कचरी के 122 ग्रामीणों के विरुद्ध शांति भंग की धारा 107/116 के अंतर्गत कार्रवाई करते हुए नोटिस तामील किया गया.


इस बीच 13 अप्रैल, 2012 को हाईकोर्ट ने करछना में प्रस्तावित जेपी समूह के थर्मल पावर प्लांट के लिए भूमि का अधिग्रहण रद्द करते हुए कहा था कि किसानों को मुआवजा लौटाना होगा, इसके बाद उनकी जमीनें वापस कर दी जाएं. वहीं बारा पावर प्रोजेक्ट के मामले में किसानों की याचिका खारिज कर दी गई. दोनों ही मामलों में भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली अवधेश प्रताप सिंह और अन्य किसानों की याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया. बारा में जेपी के पावर प्रोजेक्ट के मामले पर कोर्ट ने कहा कि बारा प्लांट में निर्माण का कार्य काफी आगे बढ़ चुका है, इसलिए वहां भूमि अधिग्रहण रद्द किया जाना नामुमकिन है. नोएडा भूमि अधिग्रहण मामले में गजराज सिंह केस का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर अधिग्रहण के बाद प्रोजेक्ट पर काम प्रारंभ हो चुका है तो वहां का अधिग्रहण रद्द नहीं किया जा सकता है. बारा के किसान मुआवजे को लेकर अपनी लड़ाई जारी रख सकते हैं. करछना के किसानों के मामले में कोर्ट ने कहा कि अभी तक  परियोजना का कार्य शुरू नहीं किया गया है.

मामले में प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल जवाब में कहा गया कि किसानों के आंदोलन के कारण पावर प्लांट का कार्य प्रारंभ नहीं हो सका. तब कोर्ट ने कहा कि भूमि का अधिग्रहण मनमाने और मशीनरी तरीके से नहीं किया जा सकता. किसानों की आपत्तियों को सुनना जरूरी है. करछना मामले में कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह छूट दी है कि वह चाहे तो कानून के मुताबिक नए सिरे से अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर सकती है.

किसानों की मांग है कि पांच साल तक उनकी जमीनें सरकार के पास खाली पड़ी रहीं. अगर जमीनें उनके पास होतीं तो उस पर फसल पैदा की जाती. इसलिए सरकार पांच साल में उन जमीनों पर पैदा होने वाले अनाज की कीमत किसानों को दे लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की बात पर गौर करने की बजाय उनके विरोध को कुचलने के लिए पुलिस ने दमन का सहारा लेना शुरू कर दिया. गांववाले बताते हैं कि नौ सितंबर को गांव में पुलिसिया हमला करवाने वाले डीएम कौशल राज शर्मा ने धमकी दी थी कि जिस तरह उन्होंने मुजफ्फरनगर में दंगा करवाया था, वैसे ही यहां भी करवा सकते हैं इसलिए सुधर जाओ. उनका अब कानपुर तबादला हो चुका है. संजय कुमार नए डीएम बनकर आए हैं. कनहर गोलीकांड के बाद इनको सोनभद्र में लगाया गया था. जांच टीम के सदस्याें के साथ एक अनौपचारिक बातचीत में उन्हाेंने पिछले डीएम कौशल राज को ‘दंगा स्पेशलिस्ट’ भी बताया.

कुछ स्थानीय पत्रकारों ने बताया कि जिन जमीनों को लेकर मामला फंसा है, वे सारी अधिग्रहण से पहले आला अधिकारियों की पत्नियों और सगे-संबंधियों के नाम कर दी गई थीं, इसलिए किसानों को मुआवजा वापसी का नोटिस नहीं दिया जा रहा कि बात कहीं खुल न जाए. यह आरोप सही भी लगता है क्योंकि जब कोर्ट ने किसानों की जमीन वापस करने का आदेश दे दिया है तो प्रशासन जमीन वापस क्यों नहीं कर रहा है? इस सवाल पर डीएम संजय कुमार का कहना है, ‘अखबारों में विज्ञापन दिया गया लेकिन गांववाले पैसा वापस नहीं कर रहे हैं.’ जबकि ग्रामीणों का कहना है कि कैसे करना है, क्या करना है, हमें कुछ मालूम ही नहीं है. प्रशासन ने जमीन वापस करने की प्रक्रिया के बारे में कोई सूचना नहीं दी है. प्रशासनिक अधिकारियाें का कहना है कि वे जो कर रहे हैं, वह सब ‘ऊपर’ के आदेश के मुताबिक कर रहे हैं.


पुलिस की रिपोर्ट में गांव के आधे से ज्यादा लोग अधिग्रहण से असहमत हैं और अपनी जमीन नहीं देना चाहते. दूसरी तरफ डीएम से फोन पर हुई बातचीत में उन्हाेंने कहा कि अस्सी फीसदी लोग जमीन देने के लिए सहमत हैं यानी ग्रामीणों की असहमति और कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रशासन जमीन वापस करने की प्रक्रिया शुरू करने की बजाय अधिग्रहण की कोशिश में लगा है. प्रशासन का कहना है कि हम ग्रामीणों को सहमत करने का प्रयास कर रहे हैं. किसानों के इस आंदोलन से अलग ‘पावर प्लांट बचाओ आंदोलन’ भी चल रहा है जिससे सपा से पूर्व सांसद रेवती रमण सिंह भी जुड़े हैं. हाल ही में वे पावर प्लांट का काम पूरा कराने का संकल्प भी जता चुके हैं.

उधर, 26 सितंबर को नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर आंदोलन कर रहे किसानों से मिलने जा रही थीं, तभी इलाहाबाद पुलिस ने उनको समर्थकों के साथ हिरासत में ले लिया. मेधा भूमि अधिग्रहण का विरोध करने पर बच्चों और महिलाओं की जेल में डालने का विरोध कर रही हैं. वे किसानों से मिलना चाह रही थीं लेकिन जिलाधिकारी संजय कुमार ने उन्हें वहां जाने से रोक दिया. उन्होंने कहा, ‘गांव में धारा 144 लगी हुई है और किसी सभा की इजाजत नहीं है.’ प्रशासन ने मेधा को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में ही नजरबंद कर दिया था. उन्हें बाद में छोड़ दिया गया.

मेधा को नजरबंद किए जाने को लेकर पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई कि मेधा पाटकर की नजरबंदी गैरकानूनी थी. याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश सरकार से जवाबी हलफनामा तलब करके पूछा है कि मेधा और उनके समर्थकों को क्यों गिरफ्तार किया गया? पीयूसीएल की इस याचिका में कचरी गांव में धारा 144 लगाने को लेकर भी चुनौती दी गई है. गौरतलब है कि पुलिस ने 144 लागू करने का जो आदेश जारी किया है, उसमें कहा गया है कि प्रशासन को यह ‘आभास’ है कि क्षेत्र में अशांति की ‘संभावना’ है. सवाल यह भी है कि क्या ‘आभास’ और ‘संभावना’ के आधार पर किसी क्षेत्र में इतने लंबे समय तक धारा 144 लागू की जा सकती है?

अब इस आंदोलन में कई किसान संगठन शामिल हो गए हैं.  ‘कृषि भूमि बचाओ मोर्चा’ और ‘जन संघर्ष समन्वय समिति’ ने 27 अक्टूबर को बनारस में किसान-मजदूर संगठनों का एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया. इस सम्मेलन में तय किया गया कि पांच नवंबर को प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर सामूहिक धरना दिया जाएगा और 16 नवंबर को लखनऊ में धरना प्रदर्शन होगा.

उधर, जेल में बंद ग्रामीणों ने जमानत लेने से इनकार कर दिया है. उनका कहना है, ‘हमने कोई अपराध नहीं किया है. हमारी जमीन पर हमारा अधिकार है. सरकार जब तक चाहे, हमें जेल में रखे, पर हम जमानत नहीं लेंगे.’ गांव के एक बुजुर्ग ने एक लोकगीत गाकर अपनी भावनाएं कुछ इस तरह जाहिर कीं, ‘जब सर पर कफन को बांध लिया तब पांव हटाना न चाहिए…’ पर सवाल यह है कि जब सरकार ही इन गरीब ग्रामीणों को पांव पीछे हटाने पर मजबूर कर दे तो ये न्याय की अपेक्षा किससे करें?

प्रशासन का सभी आरोपों से इंकार 

इलाहाबाद के जिलाधिकारी संजय कुमार ने इन आरोपों के मद्देनजर कहा, ‘ये सारे आरोप गलत हैं. हम जनता के दुश्मन नहीं हैं. हम जनता की सेवा के लिए हैं, अन्याय क्यों करेंगे? सबको साथ लेकर काम करना है.’ भारी संख्या में पुलिस बल तैनात करने या लाठी चार्ज करने की जरूरत क्या थी, इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘कुछ लोगों ने जनता को भड़काने की कोशिश की. रणनीति के तहत पुलिस पर हमला किया गया, जिसके बचाव में पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी.’

महिलाओं और बच्चों को भी जेल में डालने के बारे में उनका कहना है, ‘जिन लोगों ने माहौल खराब करने की कोशिश की, उन पर कार्रवाई की गई. कुछ और नाम भी प्रकाश में आए हैं, जिनके बारे में जांच की जा रही है.’ कोर्ट के आदेश के बावजूद जमीन वापसी की प्रक्रिया नहीं शुरू करने के सवाल पर उन्होंने कहा, ‘हमने प्रक्रिया शुरू की थी, अखबारों में विज्ञापन दिए थे, गांव में भी अधिकारियों को भेजा गया, लेकिन गांववालों ने कोई रुचि नहीं दिखाई. कोई अपनी जमीन वापस लेने नहीं आया.’ हालांकि, वे यह भी कह रहे हैं कि 80 फीसदी लोग जमीन देने के लिए सहमत हैं. बाकी को सहमत करने का प्रयास किया जा रहा है.

(यह रिपोर्ट तहलका पत्रिका के 15 नवंबर, 2015 के अंक में प्रक‍ाशित है.)

किसान आत्महत्याएं और तेलंगाना का शाही यज्ञ

तेलंगाना में सरकार शाही यज्ञ करा रही है. वही ​तेलंगाना जो करीब आधी सदी तक संघर्ष के बाद नया राज्य बना है. वही तेलंगाना जहां इसी साल करीब एक हजार किसानों ने आत्महत्या की है. अभी का आंकड़ा नौ सौ के आसपास है. 2015 के आधिकारिक आंकड़े जारी होंगे. किसानों की लाशें इस देश में आंकड़ों से ज्यादा कुछ नहीं हैं. जैसे राज्य सरकार का यज्ञ आयोजन एक खबर से ज्यादा कुछ नहीं है.
रविवार को खबर आई कि तेलंगाना में चल रहे इस शाही के यज्ञ के पंडाल में आग लग गई. यह पंडाल 7 करोड़ रुपये की लागत से बना था. सच कहूं, इस खबर से मुझे खुशी हुई. किसानों की लाशों पर होने वाले सरकारी यज्ञ में आग ही लगनी चाहिए. इन सरकारों के पास घास की रोटियां खा रहे किसानों के लिए कुछ नहीं हैं. रोटी की जगह फिनायल पीकर मरने वाले किसानों के लिए कुछ नहीं है. लेकिन सरकारी यज्ञ कराने के लिए खजाने लुटा रहे हैं. मात्र एक पंडाल पर जितना पैसा खर्च किया गया, उतने में इस साल करीब 1000 किसानों की आत्‍महत्‍या रोकी जा सकती थी.
जिन किसानों की मौत को सरकारी आंकड़ों में आत्महत्या कहा जाता है, वे दरअसल आत्‍महत्याएं नहीं, सरकारी हत्याएं हैं. जनता के हिस्से का धन हवन हो जाता है और जनता भूख से मरती है.
यह वही तेलंगाना राज्‍य है जिसके लिए लंबा संघर्ष चला और सैकड़ों लोगों ने जान गंवाई. अंतत: 2 जून, 2014 को इस 29वें राज्य का गठन हुआ. आजादी के पहले तक तेलंगाना  हैदराबाद निजाम का हिस्‍सा था. बाद में इसे 1956 में नवगठित आंध्र प्रदेश में मिला दिया गया. तेलंगाना क्षेत्र में आजादी के पहले से असंतोष था, क्योंकि यह क्षेत्र पिछड़ा था और यहां के लोगों को लगता था कि उन्हें सत्ता में उचित भागीदारी और विकास के पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे हैं. 1940 के दशक से ही वामपंथी नेता कॉमरेड वासुपुन्यया के नेतृत्व में वामपंथी धड़ा अलग तेलंगाना राज्य की मांग कर रहा था. तेलंगाना क्षेत्र को आंध्र में मिलाए जाने के बाद यहां के छात्रों ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया और अलग राज्य की मांग जोर पकड़ गई. 1969 में इस आंदोलन ने हिंसक रूप धारण कर लिया. उस्मानिया विश्वविद्यालय इस आंदोलन का केंद्र बना.
6 अप्रैल, 1969 को तेलंगाना के समर्थन में उस्मानिया के सैकड़ों छात्रों ने मिलकर तेलंगाना के विरोध में बुलाई गई एक मीटिंग का घेराव किया. यह मीटिंग आंध्र प्रदेश के तेलंगाना विरोधियों ने बुलाई थी. छात्रों की जबरदस्त भीड़ पर पुलिस ने फायरिंग कर दी जिसमें तीन छात्र मारे गए. एक मई को एक बार फिर छात्रों ने तेलंगाना क्षेत्र के लोगों के समर्थन से एक बड़ी रैली निकाली. रैली पर रोक लगाने के बावजूद हजारों की भीड़ जमा हो गई. इस रैली में भी पुलिस फायरिंग हुई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे. 1969 के पूरे तेलंगाना आंदोलन के दौरान पुलिस की गोली से 369 लोगों की जान गई थी. मारे गए लोगों में ज्यादातर उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्र थे.
हालांकि, बाद में एम. चेन्नारेड्डी की अगुआई वाली तेलंगाना प्रजा समिति का कांग्रेस में विलय हो गया और फिर यह आंदोलन शांत हो गया. 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने तीन नए राज्यों का गठन किया-उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़. इसके बाद तेलंगाना की मांग फिर से उठी. 2001 में के. चंद्रशेखर राव अलग तेलंगाना का मुद्दा उठाते हुए तेलुगू देशम पार्टी से अलग हुए और तेलंगाना राष्ट्र समिति बना ली. 2014 में तेलंगाना अलग राज्य बना.
तेलंगाना संघर्ष की मुख्य वजह थी कि राज्य का अलग ढंग से विकास होगा और गरीबी दूर होगी. लेकिन नया राज्य बनने के बाद सूखा, गरीबी, भुखमरी, आत्महत्याएं वैसे ही जारी हैं. नये राज्य की नई सरकार शाही यज्ञ कराकर जनता के पैसे फूंक रही है. इतने लंबे संघर्ष के बाद गठित राज्य में भी किसानों को आत्महत्या करनी पड़ रही है.
वे कौन से देवी-देवता हैं जो किसानों की कीमत पर हवि और शमिधा से खुश होंगे और मुख्‍यमंत्री के चंद्रशेखर राव को अभयदान देंगे? ऐसी निर्दयी और अधर्मी सत्ता को फिर-फिर आग लगे. 

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

कांग्रेसी तरीके से बिना जांच की क्लीनचिट


किसी नेता पर गंभीर किस्म के घोटाले में लिप्त होने का आरोप लगने से पहले ही उसे क्लीन चिट कैसे दी जा सकती है? लेकिन भारतीय लोकतंत्र में यह संसदीय रवायत है कि किसी पर आरोप लगने के साथ ही पार्टी और सरकारें उसे क्लीन चिट दे देती हैं. यह घोटाले से निपटने का कांग्रेसी तरीका है. इसी तर्ज पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डीडीसीए मामले में अरुण जेटली पर लगे सभी आरोपों को बे​बुनियाद बता रहे हैं. मोदी ने संसदीय पार्टी मीटिंग में कहा, 'जेटली पाक साफ हैं. जिस तरह हवाला घोटाले में लालकृष्ण आडवाणी बेदाग साबित हुए, वैसे ही जेटली भी बेदाग होकर बाहर निकलेंगे.' अमित शाह पार्टी के अध्यक्ष हैं. वे अपनी पार्टी लाइन की मजबूरी के चलते कदाचार में शामिल लोगों का भी हर तरह से बचाव करेंगे, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी अपनी सामूहिक जवाबदेही को ताक पर रखकर बिना किसी जांच पड़ताल के ही जेटली को क्लीन चिट कैसे दे रहे हैं?
भाजपा सांसद और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद करीब आठ वर्षों से डीडीसीए में व्याप्त भ्रष्टाचार पर आवाज उठाते रहे हैं. लेकिन उनकी नहीं सुनी गई. अब दिल्ली सचिवालय में छापे के बाद जब आम आदमी पार्टी ने भी इस घोटाले को उछाला तो यह मसला हंगामाखेज हो गया. अंतर इतना रहा कि कीर्ति आजाद ने पार्टी लाइन को दरकिनार कर पहले की ही तरह अपनी बात मजबूती से रखी. अब भाजपा कह रही है कि वे कांग्रेस से मिल गए हैं. जिस आरोप के समर्थन में तमाम तथ्य और दस्तावेज मौजूद हैं, सरकार उसकी जांच कराने से क्यों कतरा रही है?
कीर्ति आजाद के लगाए आरोप गंभीर हैं और उनकी निष्पक्ष तरीके से जांच होनी चाहिए. आरोपों के कुछ बिंदु ऐसे हैं जो गंभीर हैं:
डीडीसीए की ओर से 14 ऐसी कंपनियों को लाखों रुपये भुगतान किए गए, जिनके पते फर्जी थे और उनके बारे में जान​कारियां गलत या अधूरी थीं.
फिरोजशाह कोटला स्टेडियम के पुनर्निर्माण में गंभीर वित्तीय अनियमितताएं हुईं.
निर्माण कंपनियों को एक से ज़्यादा बार भुगतान हुए. एक ही पते और एक ही फोन नंबर वाली कई कंपनियां थीं, जिनसे डीडीसीए के अधिकारियों के निजी संबंध भी जाहिर हुए.
इन कंपनियों के पास पैन कार्ड जैसी बुनियादी चीजें तक नहीं थीं.
विकीलीक्स और सन स्टार अख़बार ने दावा किया था कि डीडीसीए ने लैपटॉप और प्रिंटर किराये पर लिए थे. एक लैपटॉप का प्रतिदिन किराया 16000 रुपए और एक प्रिंटर का किराया 3000 रुपए  प्रतिदिन भुगतान किया गया.
कीर्ति आजाद का आरोप है कि उन्होंने लगातार गड़बड़ियों की जानकारी तत्कालीन अध्यक्ष रहे अरुण जेटली को दी, पर उन्होंने इस पर गौर नहीं किया.
कीर्ति आज़ाद ने कई बार फ़िरोज़शाह कोटला के बाहर धरना दिया. इस मामले में बिशन सिंह बेदी, मदन लाल, मनिंदर सिंह और दूसरे खिलाड़ी भी उनके साथ रहे. फिर भी इस बार उचित कार्यवाही क्यों नहीं हुई?
कीर्ति आजाद का इलजाम है कि खिलाड़ियों के चयन में पैसों का लेनदेन किया जाता है.
सवाल उठते हैं कि क्या जेटली डीडीसीए के रोज़मर्रा के कामकाज से संबंधित थे? क्या उन्होंने कथित भ्रष्टाचार करने वालों का बचाव किया?
कीर्ति आजाद ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो वीडियो जारी किया उसमें जेटली बोलते सुने जा सकते हैं कि 'डीडीसीए का अध्यक्ष होने के नाते ये मेरा दायित्व है कि जिन लोगों पर आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं मैं उनका बचाव करूं.'

आम तौर पर किसी घोटाले में लिप्त आरोपी कभी भी अपना अपराध कबूल नहीं करते. वे अंत समय तक अपने को पाक-साफ बताते रहते हैं. जिस तरह जेटली वीडियो में कह रहे हैं कि मेरा दायित्व है कि जिन लोगों पर आप​राधिक मामले दर्ज हुए हैं मैं उनका बचाव करूं, प्रधानमंत्री मोदी भी वही कर रहे हैं. उनका दायित्व है कि वे अपने ताकतवर मंत्री का बचाव करें. ऐसा करके केंद्र सरकार यह संदेश दे रही है कि जो ताकतवर है, उसपर तमाम आरोपों के बाद भी आंच नहीं आ सकती. आरोपों में कितना दम है, यह तो जांच के बाद ही सामने आ सकता है, लेकिन सवाल यह है कि सत्ता जब भ्रष्टाचार के आरोपी का बचाव करेगी तो आरोपों की जांच कौन करेगा?

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...