रविवार, 23 जून 2019

क्या आप जानते हैं कि देश में सालाना कितने किसान मर रहे हैं?

हमारे सियासी गलियारे में जिसके नाम का नारा लगे, समझिए उसके दुर्दिन आ चुके हैं. किसानों के नाम पर न राजनीति नई है, न किसानों की खुदकुशी का सिलसिला नया है. 

महाराष्ट्र में पिछले चार साल में 12 हजार 21 किसानों ने आत्महत्या की है. किसानों की कब्रगाह बन चुके महाराष्ट्र में पिछले चार साल से रोजाना 8 किसान खुदकुशी कर रहे हैं.राज्य में इस साल जनवरी से मार्च तक ही 610 किसानों ने आत्महत्या की है.
दिल्ली में किसानों के प्रदर्शन के दौरान महाराष्ट्र का एक बच्चा. फोटो: रायटर्स 

महाराष्ट्र के राहत और पुनर्वास मंत्री सुभाष देशमुख ने विधानसभा को बताया है कि जनवरी 2015 से दिसंबर 2018 के बीच 12 हजार 21 किसानों ने आत्महत्या की, जिनमें से सिर्फ 6 हजार 888 यानी 57 फीसदी किसानों के परिजन ही आर्थिक सहायता पाने के योग्य पाए गए.

मंत्री जी ने बताया है कि राज्य में किसान आत्महत्या थम नहीं रही है. उनके हिसाब से पिछले चार सालों में हर साल औसतन 3,005 किसानों ने आत्महत्या की है.

महाराष्ट्र भीषण सूखे से जूझ रहा है और ऊपर से किसानों की आत्महत्या के आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं.

इस मामले पर लगातार लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ ने न्यूज क्लिक से बातचीत में दावा किया है कि 'सरकार द्वारा आत्महत्या को लेकर जारी आंकड़े बोगस हैं. ये आंकड़े एनसीआरबी ने नहीं जारी किए हैं. ये आंकड़े राजस्व विभाग के हैं. वास्तविकता में इससे कही ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है. 2014 के बाद से ही वास्तविक आत्महत्या का आंकड़ा पता नहीं चल रहा है. सरकार ऐसा मुआवजा देने से बचने के लिए कर रही है. जिन 12 हजार किसानों की मौत को स्वीकार कर रही है, उसमें से भी सिर्फ आधे लोगों को मुआवजा दिया गया है.'

पी साईनाथ कहते हैं,'इसका सीधा कारण वही है जो पिछले 20 सालों से चला आ रहा है. यानी कृषि संकट. महंगाई बढ़ने से कृषि लागत बढ़ गई है. न्यूनतम समर्थन मूल्य भी किसानों को नहीं मिल पा रहा है. किसानों को बैंक से क्रेडिट नहीं मिल रहा है. मजबूरन किसान साहूकारों की चपेट में आ जाते हैं. अब सरकार में बैठे लोगों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह वास्तविक कारण जानना ही नहीं चाह रहे हैं. समस्या का हल निकालना तो दूर की बात है.'

21 जून को छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से खबर आई कि बीजेपी किसान मोर्चा के वरिष्ठ नेता मोहन राम निराला ने ही फांसी लगाकर जान दे दी. खुदकुशी की वजह कर्ज बताई जा रही है. मोहन राम निराला बीजेपी किसान मोर्चा के जिलाध्यक्ष थे. इस मामले में बीजेपी ने दावा किया कि एक सुसाइड नोट मिला है, लेकिन पुलिस ने इस दावे को खारिज कर दिया.

बीजेपी नेताओं का कहना है कि निराला के शव के पास एक सुसाइड नोट मिला था. नोट में कर्ज से परेशान होकर खुदकुशी करने का जिक्र है. बीजेपी नेताओं का दावा है कि सुसाइड नोट में निराला ने 4 लाख रुपये का कर्ज लेने की बात कही है. बीजेपी ने इस मामले की जांच के लिए एक कमेटी गठित की है.

आजतक की खबर में लिखा गया है कि बीजेपी कांग्रेस सरकार को घेरने की योजना बना रही है. लेकिन बीजेपी को यह याद रखना चाहिए कि इस वक्त केंद्र में उसकी सरकार है और किसानों की खुशहाली और दोगुनी आय का दावा पीएम खुद करते रहते हैं.

बीजेपी और कांग्रेस दोनों किसानों के साथ भद्दा मजाक कर रहे हैं. कांग्रेस शासित राज्यों में किसानों की कर्जमाफी का बड़ा शोर मचाया गया. पंजाब सरकार किसानों का कर्ज माफ करने का दावा कर रही है, लेकिन कर्ज माफी के नाम पर आए दिन किसानों के साथ मजाक भी होता रहता है. ताजा मामले में पंजाब के बरनाला के बड़बर गांव में कर्ज माफी के लिए किसानों की लिस्ट बनाई गई है, लेकिन इस लिस्ट में 13 जीवित किसानों को मृत दिखा दिया गया. इस पर किसानों ने एतराज जताया और कहा कि अगर सरकार को कर्ज माफ नहीं करना है तो न करे लेकिन कम से कम उन्हें कागजों में मरा हुआ तो ना दिखाए.

बड़बर गांव के किसान गुरमुख सिंह ने आजतक से कहा कि कर्ज माफी के नाम पर किसानों से पंजाब में सिर्फ मजाक किया जा रहा है. स्थानीय को-ऑपरेटिव सोसाइटी की ओर से जो कर्ज माफी की पहली किसानों की लिस्ट बनाई गई थी उसमें उन्हें कागजों में मृत दिखा दिया गया है. इसके बाद उन्होंने अपने जीवित होने के सबूत बैंक के सामने पेश किए और बड़ी मशक्कत के बाद अपना नाम दूसरी कर्ज माफी की लिस्ट में ऐड करवाया, लेकिन दूसरी लिस्ट में भी उन्हें एक बार फिर से मृत दिखा दिया गया है.

मजे की बात यह है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस किसानों के कर्ज को मुद्दा बना रही है और राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में बीजेपी भी इसे मुद्दा बना रही है. किसान दोगुनी स्पीड से मर रहे हैं और ये दोनों पार्टियां पब्लिक को मूर्ख बना रही हैं.

पी साईनाथ ने मुझसे एक इंटरव्यू में कहा था कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना एक बहुत बड़ा घोटाला है. इससे सिर्फ बीमा कंपनियों को फायदा हो रहा है, किसानों को कोई फायदा नहीं हो रहा. उल्टा उनसे भी पैसा वसूला जा रहा है.

किसान संगठनों की समन्वय समिति में सक्रिय योगेंद्र यादव का दावा है कि 'इस देश में सभी तरह की सरकारें आई हैं. अच्छी, बुरी. लेकिन वर्तमान सरकार जैसी झूठी सरकार नहीं आई. नरेंद्र मोदी सरकार साफ़ झूठ बोलती है. ये जुमला चलाते हैं कि किसानों की आय दोगुनी कर देंगे. सरकार का कार्यकाल ख़त्म हो गया लेकिन अब तक इनको यह पता तक नहीं है कि किसानों की आय बढ़ी या नहीं बढ़ी.'

यादव के मुताबिक, 'सरकार की एक उपलब्धि है कि फसल बीमा योजना में सरकार का ख़र्चा साढे चार गुणा बढ़ गया लेकिन उसके दायरे में आने वाले किसानों की संख्या नहीं बढ़ी. फसल बीमा योजना के तहत किए गए किसानों के दावों की संख्या इस सरकार में घट गई है. सरकार कहती है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य उसने डेढ़ गुणा कर दिया है, ये पूरी तरह झूठ है.'

किसान आत्महत्याओं की कहानियां अंतहीन हैं. एक लेख में नहीं लिखी जा सकती हैं. आप चाहें तो कुछ देर चिंतन कर सकते हैं कि जिस देश में पिछले 20 साल में 3 लाख से ज्यादा किसानों ने कर्ज, सूखा, फसल बर्बाद होने और आर्थिक तंगी के चलते आत्महत्या की हो, उस देश की सरकार ने ​इन आत्महत्याओं का आंकड़ा ही जारी करना बंद कर दिया है.

2015 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चला था कि किसान आत्महत्या की दर 42 फीसदी बढ़ गई है. इसके बाद से सरकार ने आंकड़े नहीं जारी होने दिए. जब तक आंकड़े जारी हुए, त​ब तक खुदकुशी करने वाले किसानों की संख्या 10 से 15 हजार सालाना थी. आज यह 10 हजार है या 20 हजार, किसी को नहीं मालूम है.

समस्या का उपाय करने की जगह यह कोशिश की जा रही है कि समस्या पर बात ही न हो. जिस गति से किसान अपनी जान दे रहे हैं, कोई दूसरा देश होता तो वहां हाहाकार मच गया होता. लेकिन भारत की सियासत से ज्यादा संवेदनहीन भारत की जनता है. आप लिखेंगे कि कि इतनी बड़ी संख्या में किसानों ने खुदकुशी कर ली तो कोई 'सोशल मीडिया वीर' आकर कमेंट बॉक्स में आपके लिए गाली लिख देगा.

लेकिन ​अगर कोई इंसान जिंदा है तो उसे अपने आप से पूछना चाहिए कि जिस देश में सिर्फ एक राज्य में एक सरकार के कार्यकाल में 12 हजार किसान आत्महत्या कर लेते हैं, क्या वह देश सच में मजबूत देश कहलाएगा?


शुक्रवार, 21 जून 2019

'धर्म धंधे से जुड़ जाए, इसी को ‘योग’ कहते हैं'

(व्यंग्य विधा के पितामह हरिशंकर परसाई का 'वैष्णव की फिसलन' शीर्षक से यह लेख बेहद लोकप्रिय है. यहां पर हेडिंग बदल दी गई है.)

वैष्णव करोड़पति है। भगवान विष्णु का मंदिर। जायदाद लगी है। भगवान सूदखोरी करते हैं। ब्याज से कर्ज देते हैं। वैष्णव दो घंटे भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, फिर गादी-तकिएवाली बैठक में आकर धर्म को धंधे से जोड़ते हैं। धर्म धंधे से जुड़ जाए, इसी को ‘योग’ कहते हैं। कर्ज लेने वाले आते हैं। विष्णु भगवान के वे मुनीम हो जाते हैं। कर्ज लेने वाले से दस्तावेज लिखवाते हैं-

‘दस्तावेज लिख दी रामलाल वल्द श्यामलाल ने भगवान विष्णु वल्द नामालूम को ऐसा जो कि...

वैष्णव बहुत दिनों से विष्णु के पिता के नाम की तलाश में है, पर वह मिल नहीं रहा। मिल जाय तो वल्दियत ठीक हो जाय।

वैष्णव के पास नंबर दो का बहुत पैसा हो गया है। कई एजेंसियां ले रखी हैं। स्टाकिस्ट हैं। जब चाहे माल दबाकर ‘ब्लैक’ करने लगते हैं। मगर दो घंटे विष्णु-पूजा में कभी नागा नहीं करते। सब प्रभु की कृपा से हो रहा है। उनके प्रभु भी शायद दो नंबरी हैं। एक नंबरी होते, तो ऐसा नहीं करने देते।

वैष्णव सोचता है- अपार नंबर दो का पैसा इकठ्ठा हो गया है। इसका क्या किया जाय? बढ़ता ही जाता है। प्रभु की लीला है। वही आदेश देंगे कि क्या किया जाय।

वैष्णव एक दिन प्रभु की पूजा के बाद हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगा- प्रभु, आपके ही आशीर्वाद से मेरे पास इतना सारा दो नंबर का धन इकठ्ठा हो गया है। अब मैं इसका क्या करूँ? आप ही रास्ता बताइए। मैं इसका क्या करूँ? प्रभु, कष्ट हरो सबका!

तभी वैष्णव की शुद्ध आत्मा से आवाज उठी- अधम, माया जोड़ी है, तो माया का उपयोग भी सीख। तू एक बड़ा होटल खोल। आजकल होटल बहुत चल रहे हैं।

वैष्णव ने प्रभु का आदेश मानकर एक विशाल होटल बनवाई। बहुत अच्छे कमरे। खूबसूरत बाथरूम। नीचे लॉन्ड्री। नाई की दुकान। टैक्सियाँ। बाहर बढ़िया लान। ऊपर टेरेस गार्डेन।

और वैष्णव ने खूब विज्ञापन करवाया।

कमरे का किराया तीस रुपए रखा।

फिर वैष्णव के सामने धर्म-संकट आया। भोजन कैसा होगा? उसने सलाहकारों से कहा - मैं वैष्णव हूँ। शुद्ध शाकाहारी भोजन कराऊँगा। शुद्ध घी की सब्जी, फल, दाल, रायता, पापड़ वगैरह।

बड़े होटल का नाम सुनकर बड़े लोग आने लगे। बड़ी-बड़ी कंपनियों के एक्जीक्यूटिव, बड़े अफसर और बड़े सेठ।

वैष्णव संतुष्ट हुआ।

पर फिर वैष्णव ने देखा कि होटल में ठहरने वाले कुछ असंतुष्ट हैं।

एक दिन कंपनी का एक एक्जीक्यूटिव बड़े तैश में वैष्णव के पास आया। कहने लगा- इतने महँगे होटल में हम क्या यह घास-पत्ती खाने के लिए ठहरते हैं? यहाँ ‘नानवेज’ का इंतजाम क्यों नहीं है?

वैष्णव ने जवाब दिया- मैं तो वैष्णव हूँ। मैं गोश्त का इंतजाम अपने होटल में कैसे कर सकता हूँ?

उस आदमी ने कहा- वैष्णव हो, तो ढाबा खोलो। आधुनिक होटल क्यों खोलते हो? तुम्हारे यहाँ आगे कोई नहीं ठहरेगा|

वैष्णव ने कहा- यह धर्म-संकट की बात है। मैं प्रभु से पूछूँगा।

उस आदमी ने कहा- हम भी बिजनेस में हैं। हम कोई धर्मात्मा नहीं हैं- न आप, न मैं।

वैष्णव ने कहा- पर मुझे तो यह सब प्रभु विष्णु ने दिया है। मैं वैष्णव धर्म के प्रतिकूल कैसे जा सकता हूँ? मैं प्रभु के सामने नतमस्तक होकर उनका आदेश लूँगा।

दूसरे दिन वैष्णव साष्टांग विष्णु के सामने लेट गया। कहने लगा- प्रभु, यह होटल बैठ जाएगा। ठहरने वाले कहते हैं कि हमें वहाँ बहुत तकलीफ होती है। मैंने तो प्रभु, वैष्णव भोजन का प्रबंध किया है। पर वे मांस माँगते हैं। अब मैं क्या करूँ?

वैष्णव की शुद्ध आत्मा से आवाज आई- मूर्ख, गांधीजी से बड़ा वैष्णव इस युग में कौन हुआ है? गाँधी का भजन है- ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिये, जे पीर पराई जाणे रे।’ तू इन होटलों में रहनेवालों की पीर क्यों नहीं जानता? उन्हें इच्छानुसार खाना नहीं मिलता। इनकी पीर तू समझ और उस पीर को दूर कर।

वैष्णव समझ गया।

उसने जल्दी ही गोश्त, मुर्गा, मछली का इंतजाम करवा दिया।

होटल के ग्राहक बढ़ने लगे।

मगर एक दिन फिर वही एक्जीक्यूटिव आया।

कहने लगा- हाँ, अब ठीक है। मांसाहार अच्छा मिलने लगा। पर एक बात है।

वैष्णव ने पूछा- क्या?

उसने जवाब दिया- गोश्त के पचने की दवाई भी तो चाहिए।

वैष्णव ने कहा- लवण भास्कर चूर्ण का इंतजाम करवा दूँ?

एक्जीक्यूटिव ने माथा ठोंका।

कहने लगा- आप कुछ नहीं समझते। मेरा मतलब है- शराब। यहाँ बार खोलिए।

वैष्णव सन्न रह गया। शराब यहाँ कैसे पी जाएगी? मैं प्रभु के चरणामृत का प्रबंध तो कर सकता हूँ। पर मदिरा! हे राम!

दूसरे दिन वैष्णव ने फिर प्रभु से कहा- प्रभु, वे लोग मदिरा माँगते हैं| मैं आपका भक्त, मदिरा कैसे पिला सकता हूँ?

वैष्णव की पवित्र आत्मा से आवाज आई- मूर्ख, तू क्या होटल बैठाना चाहता है? देवता सोमरस पीते थे। वही सोमरस यह मदिरा है। इसमें तेरा वैष्णव-धर्म कहाँ भंग होता है। सामवेद में तिरसठ श्लोक सोमरस अर्थात मदिरा की स्तुति में हैं। तुझे धर्म की समझ है या नहीं?

वैष्णव समझ गया।

उसने होटल में ‘बार’ खोल दिया।

अब होटल ठाठ से चलने लगा। वैष्णव खुश था।

फिर एक दिन एक आदमी आया। कहने लगा- अब होटल ठीक है। शराब भी है। गोश्त भी है। मगर मारा हुआ गोश्त है। हमें जिंदा गोश्त भी चाहिए।

वैष्णव ने पूछा- यह जिंदा गोश्त कैसा होता है?

उसने कहा- कैबरे, जिसमें औरतें नंगी होकर नाचती हैं।

वैष्णव ने कहा- अरे बाप रे!

उस आदमी ने कहा- इसमें ‘अरे बाप रे’ की कोई बात नहीं। सब बड़े होटलों में चलता है। यह शुरू कर दो तो कमरों का किराया बढ़ा सकते हो।

वैष्णव ने कहा- मैं कट्टर वैष्णव हूँ। मैं प्रभु से पूछूँगा।

दूसरे दिन फिर वैष्णव प्रभु के चरणों में था। कहने लगा- प्रभु, वे लोग कहते हैं कि होटल में नाच भी होना चाहिए। आधा नंगा या पूरा नंगा।

वैष्णव की शुद्ध आत्मा से आवाज आई- मूर्ख, कृष्णावतार में मैंने गोपियों को नचाया था। चीर-हरण तक किया था। तुझे क्या संकोच है?

प्रभु की आज्ञा से वैष्णव ने ‘कैबरे’ भी चालू कर दिया।

अब कमरे भरे रहते थे- शराब, गोश्त और कैबरे।

वैष्णव बहुत खुश था। प्रभु की कृपा से होटल भरा रहता था।

कुछ दिनों बाद एक ग्राहक ने बेयरे से कहा- इधर कुछ और भी मिलता है?

बेयरे ने पूछा- और क्या साब?

ग्राहक ने कहा- अरे यही मन बहलाने को कुछ? कोई ऊँचे किस्म का माल मिले तो लाओ।

बेयरा ने कहा- नहीं साब, इस होटल में यह नहीं चलता।

ग्राहक वैष्णव के पास गया। बोला- इस होटल में कौन ठहरेगा? इधर रात को मन बहलाने का कोई इंतजाम नहीं है।

वैष्णव ने कहा- कैबरे तो है, साहब।

ग्राहक ने कहा- कैबरे तो दूर का होता है। बिलकुल पास का चाहिए, गर्म माल, कमरे में।

वैष्णव फिर धर्म-संकट में पड़ गया।

दूसरे दिन वैष्णव फिर प्रभु की सेवा में गया। प्रार्थना की- कृपानिधान! ग्राहक लोग नारी माँगते हैं- पाप की खान। मैं तो इस पाप की खान से जहाँ तक बनता है, दूर रहता हूँ। अब मैं क्या करूँ?

वैष्णव की शुद्ध आत्मा से आवाज आई- मूर्ख, यह तो प्रकृति और पुरुष का संयोग है। इसमें क्या पाप और क्या पुण्य? चलने दे।

वैष्णव ने बेयरों से कहा- चुपचाप इंतजाम कर दिया करो। जरा पुलिस से बचकर, पच्चीस फीसदी भगवान की भेंट ले लिया करो।

अब वैष्णव का होटल खूब चलने लगा।

शराब, गोश्त, कैबरे और औरत।

वैष्णव धर्म बराबर निभ रहा है।

इधर यह भी चल रहा है।

वैष्णव ने धर्म को धंधे से खूब जोड़ा है।

(हिंदी समय से साभार)

शुक्रवार, 31 मई 2019

क्या नेहरू सरकार का पहला संविधान संशोधन प्रेस के खिलाफ था?

हमारे अजीज अरुण तिवारी ने तीन चार दिन पहले #नेहरूकीविरासत सीरीज में एक पोस्ट लिखी, एक पोस्ट लिखी कि 'भारत के गणतंत्र बन जाने के ठीक 18 महीने बाद पहला संविधान संशोधन प्रेस फ्रीडम को दबाने के लिए किया गया था. मद्रास की एक पत्रिका क्रॉस रोड्स नेहरू जी की नीतियों की आलोचना करती थी....सो उस समय की सरकार से बर्दाश्त नहीं हुआ. पत्रिका बैन कर दी गई थी. वामपंथी लेखक रोमेश थापर एडिटर हुआ करते थे.'

अगर ऐसा हुआ तो आजादी के तुरंत बाद ही बहुत बुरा हुआ था. लेकिन क्या सच में ऐसा ही हुआ था? आइए देखते हैं.

भीमा कोरेगांव की घटना के बाद, सितंबर, 2018 में पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई के संबंध में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, ‘जिनकी गिरफ्तारी हुई है वे पहले भी गिरफ्तार हो चुके हैं. आरोप गंभीर हैं. किसी सरकार को गिराने की साजिश रचना, हिंसा को बढ़ावा देने के लिए अपनी विचारधारा का सहारा लेना और सबसे बड़ी बात किसी देश को तोड़ने के लिए साजिश रचना, मैं समझता हूं इससे बड़ा अपराध कुछ और नहीं हो सकता...प्रेशर कुकर को हम दबाने की कोशिश नहीं करेंगे. लोकतंत्र में सबको बोलने की आजादी है. सबको चलने की आजादी है. सब कुछ करने की आजादी है. लेकिन किसी को भी देश को तोड़ने की इजाजत नही दी जा सकती है. हिंसा को बढ़ावा देने की आजादी नही दी जा सकती है.’
संविधान की कॉपी पर हस्ताक्षर करते हुए संविधान सभा के सदस्य.


यह एक उदाहरण है जिसे ध्यान में रखते हुए यह कह सकते हैं कि प्रेस की स्वतंत्रता हमेशा सत्ता से टकराती रही है. राजनाथ सिंह ने जो भी कहा, वह इससे पहले भी कई बार कहा जा चुका है. बोलने की आजादी पर सारे प्रतिबंध इन्हीं तर्कों के सहारे थोपे गए.

आजाद भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ पहला डंडा नेहरू मंत्रिमंडल ने चलाया, जिसमें सरदार पटेल और डॉक्टर अंबेडकर शामिल थे. इस डंडे का शिकार बने जनसंघ नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी, क्रासरोड साप्ताहिक के संपादक रोमेश थापर और आर्गेनाइजर के संपादक केआर मल्कानी.

आजादी के बाद मई, 1950 में सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला आया. यह दो केसों से संबंधित था. रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य और बृजभूषण बनाम दिल्ली राज्य. रोमेश थापर जानेमाने वामपंथी थे जो बंबई से 'क्रासरोड' नामक साप्ताहिक निकालते थे. वे इसके संपादक और प्रकाशक थे. थापर, नेहरू और उनकी नीतियों के घोर आलोचक थे. यह वही समय था जब मद्रास और केरल में वामपंथ तेजी से बढ़ रहा था. मद्रास सरकार ने मेंटेनेंस आफ पब्लिक आर्डर एक्ट 1949 के तहत इस पत्र के छपने और प्रसारित होने पर पाबंदी लगा दी. रोमेश थापर सुप्रीम कोर्ट चले गए.

दूसरा मामला दिल्ली से छपने वाले संघ के मुखपत्र आर्गेनाइजर का था. केआर मल्कानी इसके संपादक और बृजभूषण इसके प्रकाशक थे. दिल्ली के कमिश्नर ने भड़काने वाली फोटो और सामग्री छापने के आरोप में पंजाब पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1949 के तहत इस पर पाबंदी लगा दी. ध्यान रहे कि बंगाल और दिल्ली पंजाब सबसे ज्यादा दंगा प्रभावित इलाकों में थे.

दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक ही दिन फैसला दिया और कहा कि अनुच्छेद 19(2) में 'पब्लिक आर्डर' और 'पब्लिक सेफ्टी' जैसे पदों का जिक्र नहीं है इसलिए ये फैसले असंवैधानिक हैं.

जब यह फैसला आया, उसी दौरान भारत सरकार ने पाकिस्तान सरकार से एक समझौता किया. नेहरू और लियाकत अली के बीच समझौता हुआ कि दोनों सरकारें अपने यहां के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करेंगी. इसे नेहरू—लियाकत पैक्ट नाम दिया गया. इसमें ऐसी हर गतिविधियों पर पाबंदी लगाने का समझौता था, जिसके तहत दोनों देशों में युद्ध की स्थिति बने. मार्च, 1950 में नेहरू ने पटेल को पत्र लिखा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी लगातार अखंड भारत की बात कर रहे हैं जिससे परेशानी खड़ी हो रही है. पटेल ने जवाब में लिखा कि अब हम संविधान से बंधे हैं जो बोलने की आजादी देता है. हम कोई एक्शन नहीं ले सकते. समझौता साइन होने के बाद मुखर्जी ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और दोनों देशों में खुलकर युद्ध की बात करने लगे. पाकिस्तान ने इसपर प्रतिक्रिया दी. थापर नेहरू की विदेश नीति पर लगातार हमले कर रहे थे तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपने अखंड भारत के लिए प्रचार कर रहे थे.

इस मसले पर नेहरू और पटेल ने के पत्राचार में नेहरू ने लिखा कि मुख्य अभियुक्त श्यामा प्रसाद मुखर्जी और हिंदू महासभा हैं जो इस समझौते के क्रियान्वयन में बाधा बन रहे हैं. इस पर पटेल ने कहा कि दो मामलों में कोर्ट के निर्णय ने हमारे सभी संवैधानिक उपायों को हिलाकर रख दिया है. हमें जल्दी ही संविधान में संशोधन करना पड़ेगा.

जून, 1951 में संविधान में पहला संशोधन हुआ. तीन संशोधनों में से एक प्रेस और फ्री स्पीच को लेकर था. अनुच्छेद 19(2) जोड़कर अभिव्यक्ति की आजादी पर 'युक्तियुक्त निर्बंधन' यानी reasonable restrictions की बात जोड़ी गई. नेहरू का कहना था कि इससे मामला कोर्ट के पाले में चला जाएगा, लेकिन अंबेडकर ने कहा कि हमें बोलने की आजादी भी देनी है और सुरक्षा भी जरूरी है. इसलिए पाबंदी भी तार्किक होनी चाहिए. इसमें मोटा मोटी मानहानि, अभद्रता, कोर्ट की अवमानना, और राष्ट्र की सुरक्षा जैसे मसलों पर बोलने पर उचित पाबंदी की बात कही गई.

इस संशोधन के पक्ष में नेहरू ने कहा, किसी को बोलने की ऐसी आजादी नहीं दी जा सकती कि उसके बोलने के पश्चात दो देशों में युद्ध छिड़े और बर्बादी हो. हालांकि, मुखर्जी का कहना था कि देश का बंटवारा एक गलती थी. इसे बलप्रयोग से सुधार लेना चाहिए.

जस्टिस एपी शाह ने एमएन राय मेमोरियल लेक्चर में 2017 में कहा था, ''संविधान असेंबली के वाद-विवाद के दौरान दो बार इस बात का प्रयास किया गया कि अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगाने के लिए देशद्रोह को एक आधार बनाया जाए. परंतु असेंबली के अन्य सदस्यों के विरोध और उनको डर था कि देशद्रोह को फिर राजनीतिक असहमति को कुचलने के लिए प्रयोग किया जा सकता है, इसको संविधान के अनुच्छेद 19(2) से हटा दिया गया. वर्ष 1950 में संविधान बनाने वालों के इन एक्शन को खुद सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया. यह बातें सुप्रीम कोर्ट ने बृज भूषण एंड रोमेश थापर के केस में कही थी. इस फैसले के कारण ही संविधान में पहले संशोधन को बढ़ावा मिला और अनुच्छेद 19(2) को संशोधित किया गया. जिसके तहत 'अंडरमाईनिंग दाॅ सिक्योरटी आफ दाॅ स्टेट’ की जगह  'इन दाॅ इंटरेस्ट आफ पब्लिक आर्डर’ को शामिल किया गया. हालांकि संसद में बोलते समय नेहरू ने साफ किया कि जहां तक भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए की बात है तो मेरा मानना है कि यह धारा काफी आपत्तिजनक है और न तो इसका प्रैक्टिकल व न ही ऐतिहासिक तौर पर कोई स्थान होना चाहिए. अगर आप पसंद करे तो हम इस संबंध में निर्णय ले सकते हैं. जितना जल्दी हम इससे छुटकारा पा लेंगे, उतना अच्छा होगा.''

देशद्रोह की धारा अब तक बरकरार है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने समय समय पर उसकी व्याख्या की है.
खैर, क्या पहले संविधान संशोधन में बोलने की आजादी पर जो 'युक्तियुक्त निर्बंधन' जोड़ा गया, वह प्रेस पर हमला था? बेशक, सुप्रीम कोर्ट का रोमेश थापर और बृजभूषण केस का निर्णय नजीर बना और आज भी उसे अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में कोट किया जाता है. लेकिन संशोधन के साथ जोड़े गए युक्तियुक्त ​निर्बंधन को कोर्ट ने अपनी व्याख्या में गलत नहीं ठहराया, न ही कानूनविदों ने इसे गलत ठहराया. कानून में वैयक्तिक आजादी का महत्व है, लेकिन यह दुनिया भर में बहस का विषय बन चुका है कि क्या आजादी आत्यांतिक हो सकती है? या इस पर देश और समाज के हित में कुछ पाबंदियां जरूरी हैं? संशोधन के वक्त नेहरू, पटेल, अंबेडकर आदि सब सहमत थे कि राज्य के लिए समस्या उत्पन्न करने वाली आजादी से आजादी को ही खतरा है.
जैसे आज कश्मीर में अलगाववाद या नक्सलवाद के प्रसार को अभिव्यक्ति के नाम पर छूट नहीं मिल सकती, उसी तरह उस समय क्रासरोड और आरगेनाइजर के मामले में समझा गया.

यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारी आजादी, हमारा संविधान और हमारी व्यवस्था को 1947 से लेकर लंबे समय तक नकारने वाले यही दोनो थे, दक्षिणपंथी और वामपंथी. इन दोनों ने आजादी को झूठा कहकर उस पर हर संभव हमले किए और अब दोनों इस व्यवस्था के हिस्से हैं. ​एक पंक्ति में कोई बात कह देने मात्र से भ्रम फैलता है कि 'प्रेस पर पहली पाबंदी नेहरू ने लगाई थी'.

सूचना स्रोत: द हिंदू और स्क्रॉल के लेखों में कानूनविद अभिनव चंद्रचूड, लाइव लॉ में जस्टिस एपी शाह, एनडीटीवी, सीआईएस इंडिया में कानूनविद गौतम भाटिया, मीडिया चिंतन में माखनलाल चतुर्वेदी के कुलपति जगदीश उपासने.  

सोमवार, 26 नवंबर 2018

मोदी मनमोहन से थोड़ी विनम्रता सीखते तो 'तेरी मां मेरी मां' नहीं बोलना पड़ता

नरेंद्र मोदी, मनमोहन सिंह न सही, अपनी पार्टी के पितामह अटलबिहारी वाजपेयी का ही अनुसरण करते तो संसद की भाषाई मर्यादा बचा ले जाते.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मध्य प्रदेश में शनिवार को दिया भाषण सुना, तो उसी हफ्ते मनमोहन सिंह की प्रेस कॉन्फ्रेंस याद आई जिसमें उन्होंने कहा कि मैंने कभी कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया भी होगा तो मैं उसे दोहराना नहीं चाहूंगा. उन्होंने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी को अपने प्रधानमंत्री पद की गरिमा बनाए रखनी चाहिए और विपक्षी नेताओं के साथ सार्वजनिक मंच से गाली गलौज नहीं करनी चाहिए.

इदौर में 21 नवंबर को मनमोहन सिंह ने नरेंद्र मोदी के पुराने वादों की याद दिलाते हुए अच्छे दिनों की समीक्षा की. उन्होंने भाजपा की सरकार की असफलता गिनाने के लिए सिर्फ आंकड़ों की बात की.

एक पत्रकार ने पूछा कि मोदी जी भाषणों को देखते हुए क्या आपको लगता है कि वे अपने पद की मर्यादा रख पा रहे हैं? इसके जवाब में मनमोहन सिंह ने कहा, 'सम्मानपूर्वक मेरा मानना है कि मोदी जी प्रधानमंत्री के पद का ठीक इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं. प्रधानमंत्री को ये नहीं शोभा देता कि वे दूसरे नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर गाली गलौज करें. वे गैरबीेजेपी राज्यों में जाते हैं तो नेताओं पर खूब बरसते हैं. यह उचित बात नहीं हैं. इससे ज्यादा मैं और कुछ नहीं कहूंगा.'

एक पत्रकार ने पूछा कि आपने प्रधानमंत्री रहते हुए अपने अंतिम संबोधन में कहा था कि यदि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे तो यह एक त्रासदी होगी, अब आप क्या कहेंगे, यह त्रासदी थी या नहीं? इस पर मनमोहन सिंह ने कहा, 'मुझे नहीं याद आ रहा है कि मैंने 2014 में इतने कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था. अगर मैंने इस्तेमाल किया तो मैं इसे दोहराना नहीं चाहूंगा.'

मनमोहन सिंह की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद नरेंद्र मोदी मध्य प्रदेश की रैलियों में और कड़े शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं. प्रधानमंत्री ने शनिवार को कहा, 'कांग्रेस के पास चर्चा मुद्दे नहीं हैं, इसलिए ये लोग मेरी मां को गाली देने की राजनीति पर उतर आए हैं. कुछ बुराइयां उनके खून में समा गई हैं.'

मोदी ने कहा कि कांग्रेस इस चुनाव में न चार पीढ़ियों का हिसाब देने को तैयार है, न मध्य प्रदेश में 55 सालों के शासन का हिसाब देने को तैयार है, न शिवराज सिह चौहान द्वारा किए गए कामों पर चर्चा करने को तैयार है. वे अपनी चार पीढ़ी और एक चायवाले के चार साल के शासन की तुलना को भी तैयार नहीं हैं.

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, 'जिसके पक्ष में सत्य न हो, न्याय न हो, कुसंस्कार हो, अहंकार हो, वह मुद्दे छोड़कर तेरी मां मेरी मां पर आ जाता है. आजादी के बाद इतने सालों तक जिस पार्टी ने शासन किया, उसके नेता मोदी के साथ भिड़ने की बजाय, मां को गाली दे रहे हैं. मोदी से मुकाबला करने की ताकत नहीं, और आप मां को घसीटकर ले आते हैं.'

मोदी ने कहा, 'कांग्रेसी नामदार हैं, हम कामदार. नामदार चाहे जिसे गालियां दे सकते हैं, भले ही गलती उनकी हो. प्रदेश का बच्चा-बच्चा शिवराज को मामा बोलता है. कांग्रेसी उन्हें शकुनि मामा, कंस मामा कहने लगे. अच्छा होता अगर कांग्रेस के राजा-महाराजा और नामदार शिवराज को गाली देने से पहले क्वात्रोची मामा को याद कर लेते. भोपाल के गुनहगार एंडरसन मामा को याद कर लेते, जिन्हें नामदार के पिताजी की सरकार ने चोरी से भगा दिया था.'

मोदी ने दिल्ली की राजनीति में प्रवेश से पहले जिन मुद्दों और जनआकांक्षाओं को अभिव्यक्ति देते हुए विकास के नारे से अपनी शुरुआत की थी, वे अब उन्हीं की जुबान पर नहीं आ रहे हैं. क्वात्रोची और एंडरसन को कांग्रेसियों का मामा बताना कम से कम एक प्रधानमंत्री के मुंह से शोभा नहीं देता. उनके हर भाषण में अब गुस्सा और अपशब्द होते हैं.

मोदी पहले भी ऐसा बोलते रहे हैं. ‘मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा, मैं तो फक़ीर हूं’, ‘वे मुझे मार डालेंगे, मुझे थप्पड़ मार देना’, ‘मुझे लात मार कर सत्ता से हटा देना’, ‘मुझे फांसी पर चढ़ा देना’, ‘मुझे उलटा लटका देना’, ‘मुझे चौराहे पर जूते मारना’…. ये सब मोदी के ही जुमले हैं जो उनके अलग भाषणों में सुने जा चुके हैं.

उनको मनमोहन सिंह पर 'रेनकोट पहनकर नहाने' वाला कटाक्ष भी प्रधानमंत्री के पद के अनुरूप बेहद छिछला था. वे 'पचास करोड़ की गर्लफ़्रेंड' कहते हुए जरा भी नहीं हिचकिचाते. बल्कि इसे चुनावी इजहार मानकर संतोष कर लेते हैं कि उन्होंने महान भाषण दिया है.

चुनावी राजनीति में भाषा का पतन नरेंद्र मोदी से ही नहीं शुरू हुआ है. राहुल गांधी या दूसरे किसी भी पार्टी के नेता अपनी भाषाई मर्यादा के लिए नहीं जाने जाते. लेकिन प्रधानमंत्री पद से मोदी जैसी भाषा अभूतपूर्व है. वे यह परंपरा डाल रहे हैं कि किसी पद की कोई गरिमा नहीं है और चुनावी मुकाबले में अपशब्दों की अहम भूमिका होगी.

मनमोहन सिंह में एक बात गौर करने लायक है कि जब वे प्रधानमंत्री नहीं हैं, तब भी वे जब भी बोलते हैं तो एक विकास के विजन के साथ बोलते हैं. वे कभी भी व्यक्ति पर केंद्रित नहीं होते, किसी व्यक्ति के बारे में सवाल करने पर संक्षिप्त और सभ्य उत्तर देते हैं या फिर सवाल को टाल जाते हैं. जबकि मोदी पत्रकारों से कभी मुखातिब ही नहीं होते और अपने एकतरफा भाषणों में वह बोलते हैं जो उन्हें पसंद होता है.

मोदी अपने पांच राज्यों के चुनाव में सिर्फ व्यक्तियों पर बात कर रहे हैं. वे नेहरू, इंदिरा, सोनिया और राहुल पर न सिर्फ निजी हमले कर रहे हैं, बल्कि भाषाई मर्यादा को बार बार तोड़ रहे हैं.

इसके उलट जिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को लोग 'पप्पू' कहते हैं, मध्य प्रदेश में ही उन्होंने कहा, 'मोदी जी अपने भाषण में गलत शब्द का प्रयोग करेंगे, झूठ बोलेंगे नफ़रत भरी बात करेंगे. क्योंकि मोदी जी जानते हैं कि जो भरोसा जनता ने मोदी जी पर किया था वो टूट गया है.'

क्या मोदी जी को अपने गिरते ग्राफ से बौखलाहट होने लगी है? यह एक कारण हो सकता है लेकिन उनका पिछला भाषाई रिकॉर्ड भी बहुत खूबसूरत नहीं है. बस प्रधानमंत्री बनने के बाद उनसे उम्मीदें बढ़ी थीं. काश वे अपने पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह से ही सीखते कि पद की गरिमा के अनुरूप ही शब्दों का चुनाव करना चाहिए.

मोदी जब प्रधानमंत्री बनकर संसद पहुंचे थे तो पहले दिन संसद की चौखट पर सिर रखकर उसे प्रणाम किया था. यह भी पहली बार था. लेकिन संसद की उस पूजनीय पवित्रता को उन्होंने ही भंग कर दिया जो पिछले 70 सालों में कभी नहीं देखी गई थी. स्तरहीन भाषा का प्रयोग संसदीय परंपरा की अजीबोग़रीब गिरावट है जिसकी भरपाई मुश्किल है. देश के युवा को प्रधानमंत्री से सीखने के लिए क्या है, सिवाय इस स्तरहीन भाषा के? नरेंद्र मोदी, मनमोहन सिंह न सही, अपनी पार्टी के पितामह अटलबिहारी वाजपेयी का ही अनुसरण करते तो संसद की भाषाई मर्यादा बचा ले जाते.

शुक्रवार, 16 नवंबर 2018

सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद के आलोचक प्रेमचंद


प्रेमचंद यूरोपीय राष्ट्रवाद की आलोचना के साथ ऐसे राष्ट्रवाद की कल्पना करते थे जिसमें किसानों, मजदूरों और गरीबों के लिए जगह हो. 

'सांप्रदायिकता सरकार का सबसे बड़ा अस्त्र है और वह आखिर दम तक इस हथियार को हाथ से न छोड़ेगी.' प्रेमचंद यह पंक्ति उस अंग्रेजी शासन के लिए जब लिख रहे थे तब वे यह भली भांति समझ रहे थे कि यह जनता को बांटने का एक कारगर हथियार है. इसीलिए वे कह रहे थे कि 'सरकार ने भारत में सांप्रदायिकता का बीज बो दिया है और किसी दिन इस वृक्ष का फल भारत और भारतीय सरकार दोनों के लिए घातक साबित होगा.' ऐसा हुआ भी. यह सांप्रदायिकता देश के विभाजन का न सिर्फ कारण बनी, बल्कि आज तक हिंदुस्तान सांप्रदायिकता से ग्रस्त है. आश्चर्यजनक रूप से महात्मा गांधी, भगत सिंह, मौलाना आज़ाद और तमाम स्वतंत्रता के नायक जिस सांप्रदायिकता से लड़ रहे थे वही सांप्रदायिकता आज़ादी के बाद भी बार बार मुसीबत की वजह बनती रही है.

प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई, 1880 को बनारस के पास के गांव लमही में हुआ था. बचपन में ही उनके सिर से मां का साया उठ गया था. 15 साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गई और इसके कुछ ही समय बाद पिता का भी देहांत हो गया. प्रेमचंद के पिता डाकघर में मामूली नौकर का काम करते थे. वे भयंकर गरीबी में पले बढ़े थे. प्रेमचंद के उपन्यासों में गरीबी और जहालत का जो असीम संसार है, वह उनके अपने निजी जीवन की झलक भी है.

प्रेमचंद को अपनी आर्थिक परेशानियों से निपटने के लिए अपनी कोट और किताबें आदि बेचनी पड़ी थीं. बताते हैं कि एक बार जब वे आर्थिक रूप से परेशान थे, अपनी सारी किताबें लेकर एक किताब की दुकान पर पहुंचे. वहां उनकी मुलाकात एक स्कूल के हेडमास्टर से हुई. उन्होंने प्रेमचंद को स्कूल में अध्यापक नियुक्त करवा दिया.

लेकिन प्रेमचंद अध्यापक बनकर छात्र बन गए. वे आजीवन भारतीय समाज को अपनी बारीक निगाह से पढ़ते रहे और उसे कागज पर उतारते रहे.

1907 में प्रेमचंद की पांच कहानियों का संग्रह सोज़े-वतन प्रकाशित हुआ. देशप्रेम और आम जनता के दर्द से सराबोर इन कहानियों को अंग्रेज सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया और उनके लिखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इसके बाद वे नाम बदल कर प्रेमचंद नाम से लिखने लगे.

आम जनता के जीवन और ग्रामीण भारतीय समाज को विस्तार से अपने उपन्यासों में रचने वाले प्रेमचंद ने बहुत से वैचारिक लेख लिखे और राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता, उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद पर बेबाक राय रखी. उनके वे लेख आज भी महत्वपूर्ण हैं. 

प्रेमचंद की चेतावनी को लोगों ने नहीं सुना 

आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू कह रहे थे कि 'अगर सांप्रदायिकता से कड़ाई से नहीं निपटा गया तो यह भारत को तोड़ डालेगी', तो आजादी मिलने से कुछ वर्षों पहले प्रेमचंद लिख रहे थे कि 'सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है. उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है. हालांकि, संस्कृति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं.'

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं, 'सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की खाल ओढ़कर आती है... जब प्रेमचंद ऐसा लिख रहे थे तब वे एक चेतावनी दे रहे थे. ये चेतावनी वे नब्बे साल पहले दे रहे थे. उस चेतावनी को इस देश के लोगों ने सुना नहीं. उसका नतीजा है कि अब वह हमारी गर्दन पर चढ़ बैठी है.'

सांप्रदायिकता किस संस्कृति की दुहाई देती है? 

'सांप्रदायिकता और संस्कृति' (1934) शीर्षक से अपने लेख में संस्कृति के बहाने धर्म के झगड़ों पर चर्चा करते हुए प्रेमचंद लिखते हैं, 'हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना ज़ोर बांध रही है. वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखंड. शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं. यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मन्त्र है और कुछ नहीं. हिंदू और मुस्लिम संस्कृति के रक्षक वही महानुभाव और वही समुदाय हैं, जिनको अपने ऊपर, अपने देशवासियों के ऊपर और सत्य के ऊपर कोई भरोसा नहीं, इसलिए अनन्त तक एक ऐसी शक्ति की ज़रूरत समझते हैं जो उनके झगड़ों में सरपंच का काम करती रहे.'

प्रेमचंद को अल्बेयर कामू और जॉर्ज आॅरवेल के समकक्ष रखते हुए अपूर्वानंदकहते हैं, 'प्रेमचंद हों, जॉर्ज आॅरवेल हों, अल्बेयर कामू हों या हजारी प्रसाद द्विवेदी हों, उनकी प्रासंगिकता यही है कि उन्होंने इन लक्षणों को बहुत पहले पहचान लिया था. और लोगों को बहुत स्पष्ट रूप से बताया भी था. जो लोग सांप्रदायिक शक्तियों को लेकर बहुत उत्साहित रहते हैं, उन्हें प्रेमचंद को पढ़ना चाहिए. अगर सांप्रदायिक सोच के लोग यह मानते हैं कि प्रेमचंद बहुत महान लेखक थे तो उन्हें प्रेमचंद के विचारों पर भी सोचने की जरूरत पड़ेगी.' 

प्रेमचंद लिखते हैं, 'इन संस्थाओं को जनता को सुख-दुख से कोई मतलब नहीं, उनके पास ऐसा कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है जिसे राष्ट्र के सामने रख सकें. उनका काम केवल एक-दूसरे का विरोध करके सरकार के सामने फरियाद करना है. वे ओहदों और रियायतों के लिए एक-दूसरे से चढ़ा-ऊपरी करके जनता पर शासन करने में शासक के सहायक बनने के सिवा और कुछ नहीं करते.'

जैसा कि उनके साहित्य से इतर लेखन से स्पष्ट है कि वे सांप्रदायिकता के घोर आलोचक हैं, यह विचार उनकी रचनाओं में भी दिखता है. अपनी कहानियों और उपन्यासों में प्रेमचंद ने धार्मिक एकता की नायाब नजीरें पेश कीं.

प्रेमचंद और राष्ट्रवाद 

प्रेमचंद अपने लेखों के जरिये भारत में राष्ट्रवाद को लेकर चल रही बहस में भी शरीक हुए. रवींद्रनाथ टैगोर मानते थे कि आधुनिक राष्ट्रवाद की अवधारणा में संकीर्णता की भावना निहित है. प्रेमचंद भी इसी विचार के साथ खड़े हुए. प्रेमचंद उपनिवेशवाद, आधुनिक राष्ट्र और लोकतंत्र में आम जनता की जगह न पाकर व्यथित थे. वे उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में राष्ट्रवाद की भूमिका की तरफदारी करते हुए भी पश्चिमी राष्ट्रवाद और उसके अंतर्विरोधों के आलोचक थे.

वे लिखते हैं, 'वर्तमान राष्ट्र यूरोप की ईजाद है... इसी राष्ट्रवाद ने साम्राज्यवाद, व्यवसायवाद आदि को जन्म देकर संसार में तहलका मचा रखा है. व्यापारिक प्रभुत्व के लिए महान युद्ध होते हैं. यह सारे अनर्थ इसलिए हो रहे हैं कि धन और भूमि की तृष्णा ने राष्ट्रों को चक्षुहीन सा कर दिया है. प्राणि मात्र को भाई समझने वाला ऊंचा और पवित्र आदर्श इस राष्ट्रवाद के हाथों ऐसा कुचला गया कि अब उसका कहीं चिह्न भी नहीं रहा.'

अपूर्वानंद कहते हैं कि प्रेमचंद ने राष्ट्रवाद को कोढ़ कहा था. वे राष्ट्रवाद के घोर आलोचक रहे. जितनी बेबाकी से उन्होंने उस समय लिखा, आज का समय ऐसा है कि कोई लेखक राष्ट्रवाद को कोढ़ बता दे तो मुमकिन है कि वह जेल में पहुंच जाए. 

प्रेमचंद्र महात्मा गांधी से प्रभावित थे और उसी तरह के राष्ट्रवाद में उनका यकीन था. वे आजादी की लड़ाई में एकजुटता के लिए राष्ट्रवाद की भूमिका को महत्व दे रहे थे, लेकिन आजाद भारत में ऐसा राष्ट्रवाद चाहते थे जो गरीबों, किसानों और मजदूरों का हिमायती हो. जो सामंतवाद का विरोधी हो. वे जाति, धर्म और संप्रदायवाद से मुक्त राष्ट्र चाहते थे.

वे लिखते हैं, 'आज भी राष्ट्रीयता का रोग उन्हीं लोगों को लगा हुआ है जो शिक्षित हैं, इतिहास के जानकार हैं. वे संसार को राष्ट्र के रूप में ही देख सकते हैं. संसार के संगठन की दूसरी कल्पना उनके मन में आ ही नहीं सकती. जैसे शिक्षा से कितनी ही अस्वाभाविकताएं हमने अंदर भर ली हैं, उसी तरह इस रोग को भी पाल लिया है.'

महात्मा गांधी यूरोपीय लोकतंत्र पश्चिमी सभ्यता को शैतानी सभ्यता कहते थे. प्रेमचंद भी गांधी की तरह स्वराज के समर्थक और लोकतंत्र के आलोचक थे. उन्होंने लिखा, 'डेमोक्रेसी केवल एक दलबंदी बन कर रह गई. जिसके पास धन था, जिनकी जबान में जादू था, जो जनता को सब्जबाग दिखा सकते थे, उन्होंने डेमोक्रेसी की आड़ में सारी शक्ति अपने हाथ में कर ली. व्यवसायवाद और साम्राज्यवाद उस सामूहिक स्वार्थपरता के भयंकर रूप थे जिन्होंने संसार को गुलाम बना डाला और निर्बल राष्ट्रों को लूट कर अपना घर भरा और आज तक वही नीति चली आ रही है. डेमोक्रेसी की इन दो सदियों में संसार में जो जो अनर्थ हुए, वह एकाधिपत्य की असंख्य सदियों में न हुए थे. अपने राष्ट्र के लिए डेमोक्रेसी चाहे जितनी मंगलमय सिद्ध हुई हो, पर संसार की दृष्टि से तो उसने ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिस पर वह गर्व कर सके.'

वे चाहते थे कि 'संसार का कल्याण तभी हो सकता है जब संकुचित राष्ट्रीयता का भाव छोड़ कर व्यापक अंतर्राष्ट्रीय भाव से विचार हो.' प्रेमचंद का राष्ट्रवाद ऐसा था जो जाति भेद और धर्म के बंधनों से मुक्त हो. उन्होंने लिखा है, 'राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्ण व्यवस्था, ऊंच नीच के भेद और धार्मिक पाखंड की जड़ खोदना है.'

जेम्स की जगह नायडू के आने से क्या बदलेगा 

जैसे भगत सिंह मानते थे कि संपूर्ण समाज का परिवर्तन ही असली आजादी होगी वरना गोरे अंग्रेजों की जगह भूरे अंग्रेज काबिज हो जाएंगे और कुछ नहीं बदलेगा. उसी तरह प्रेमचंद मानते थे कि 'जेम्स की जगह मिस्टर नायडू के आ जाने से जनता का क्या उपकार होगा.'

उनके राष्ट्र की कल्पना में किसान और मजदूर थे. वे कहते हैं, 'हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें जन्मगत वर्णों की तो गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय. उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन.'

वे भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों को खत्म करने का आह्वान करते हुए लिखते हैं, 'हमारा स्वराज केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है, बल्कि सामाजिक जुए से भी, इस पाखंडी जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है.'

क्या भारत जाति या धर्म से मुक्त ऐसा समाज बन सका? यदि आज प्रेमचंद होते तो दिनोदिन बढ़ती असमानता और पूंजी के केंद्रीकरण के खिलाफ ही खड़े होते. प्रेमचंद के लेखन का एकमात्र पक्ष था जनता का पक्ष. इस जनपक्ष को गौर से पढ़ने और चिंतन करने की जरूरत है.

रविवार, 9 सितंबर 2018

क्या विदेशों में मोदी जी का डंका बजता है?

विदेशों में मोदी जी का डंका बजता है. इसे साबित करने के लिए उन्होंने कई देशों में बांसुरी और नगाड़े बजाए. विदेश में रह रहे भारतीयों से नारे लगवाए. बराक भाई के साथ फोटो खिंचवाई और जिनपिंग के साथ हिंडोला झूले. प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने कहा कि हम विदेश नीति को एकदम अलग दिशा में ले जाएंगे. लेकिन जब एक साल बीता तो कभी मोदी के प्रशंसक रहे वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक का हमने एक इंटरव्यू लिया. उनका कहना था कि शोर बहुत था, लेकिन मोदी जी का सारा शोर मोर का नाच साबित हुआ है. भाजपा और नरेंद्र मोदी विदेशी मोर्चे पर बुरी तरह फेल हो चुके हैं.
http://nationalspeak.in/
सबसे बड़ा मुद्दा पाकिस्तान था लेकिन पाकिस्तान को न आप घेर सके, न कोई दबाव बना सके, न ही बातचीत शुरू कर सके. पांच साल कनफ्यूज रहे कि उसे दुश्मन मानें या दोस्त बनाएं. बस नारों में और भाषणों में पाकिस्तान जिंदा रहा. आईएसआई को बुलाकर पठानकोट हमले की जांच जरूर करवा ली. जम्मू कश्मीर में हालात और ही खराब हुए. जो मिलिटेंसी लगभग शांत थी, वह फिर से उभरी.
अमेरिका से हालिया समझौता भारत की संप्रभुता पर चोट है जिसके तहत अमेरिका आपको निर्देश दे रहा है कि आप ईरान से तेल लेना बंद करें वरना हम प्रतिबंध लगा देंगे. वह आपको रूस से हथियार खरीदने में बाधा खड़ी कर रहा.
अमेरिका पर सब कुछ लुटा देने वाली मुद्रा में भी आप न तो एनएसजी के सदस्य बन सके, न पाकिस्तान से आतंकी ला पाए. न माल्या आया, न मेहुल भाई आए. मालदीव में चीन ने अपना अड्डा जमा लिया. बांग्लादेश से भी आपका कुछ खास रिश्ता नहीं है. जबकि चीन वहां पर दक्षिणी और उत्तरी बांग्लादेश को जोड़ने वाला पुल बना रहा है. बांग्लादेश ने अपना ढाका स्टॉक एक्सचेंज का 25 फीसदी हिस्सा चीन को बेच दिया जबकि भारत के अधिकारी वहां गए थे, नाकाम होकर लौट आए.
नेपाल जो करीब करीब भारतीय ही है, जिसकी हमारी सीमाएं खुली हैं, वहां जाकर शेखी बघारकर लोगों को नाराज किया, नाकेबंदी करके और वहां हिंदू राष्ट्र का अभियान चलाकर अपनी ही जड़ खोद ली. उस नाकेबंदी से कोई फायदा नहीं हुआ, सिवाय नेपाल चीन की नजदीकी बढ़ने के. श्रीलंका ने अपना हम्बनटोटा पोर्ट चीन के सुपुर्द कर दिया. नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश हर देश में चीन मजबूत हुआ.
विदेश नीति विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी की मानें तो 'डोकलाम में चीन ने रणनीतिक स्तर पर जीत हासिल की है. चीन विवादित इलाक़े में निर्माण कार्य कर रहा है. इसके चलते भूटान अपनी सुरक्षा को लेकर भारत पर भरोसा करने से पहले सौ बार सोचेगा. दक्षिण एशिया और इसके क़रीब के देशों से भारत दूर हुआ है. नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान में भारत की स्थिति कमज़ोर हुई है. ऐसा भारत की दूरदर्शिता में अभाव के कारण हुआ है. शुरू में मोदी ने मज़बूत शुरुआत की थी, लेकिन आगे चलकर चीज़ें नाकाम रहीं.'
मेक इन इंडिया का नारा लगाते रहे लेकिन यह केवल मोदी जी और भगवान राम ही जानते हैं कि कितना विदेशी निवेश ला पाए. फिर इतने देशों में आप घूमे किसलिए? रंगबिरंगे कपड़े पहनकर नगाड़ा और बांसुरी बजाने के लिए? स्पष्ट है कि विदेश नीति के साथ नोटबंदी कांड हो गया.

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम

मई, 1928 के ‘किरती’ में यह लेख छपा। जिसमें भगत सिंह ने धर्म की समस्या पर प्रकाश डाला है।

अमृतसर में 11-12-13 अप्रैल को राजनीतिक कान्फ्रेंस हुई और साथ ही युवकों की भी कान्फ्रेंस हुई। दो-तीन सवालों पर इसमें बड़ा झगड़ा और बहस हुई। उनमें से एक सवाल धर्म का भी था। वैसे तो धर्म का प्रश्न कोई न उठाता, किन्तु साम्प्रदायिक संगठनों के विरुद्ध प्रस्ताव पेश हुआ और धर्म की आड़ लेकर उन संगठनों का पक्ष लेने वालों ने स्वयं को बचाना चाहा। वैसे तो यह प्रश्न और कुछ देर दबा रहता, लेकिन इस तरह सामने आ जाने से स्पष्ट बातचीत हो गयी और धर्म की समस्या को हल करने का प्रश्न भी उठा। प्रान्तीय कान्फ्रेंस की विषय समिति में भी मौलाना जफर अली साहब के पाँच-सात बार खुदा-खुदा करने पर अध्यक्ष पण्डित जवाहरलाल ने कहा कि इस मंच पर आकर खुदा-खुदा न कहें। आप धर्म के मिशनरी हैं तो मैं धर्महीनता का प्रचारक हूँ। बाद में लाहौर में भी इसी विषय पर नौजवान सभा ने एक मीटिंग की। कई भाषण हुए और धर्म के नाम का लाभ उठाने वाले और यह सवाल उठ जाने पर झगड़ा हो जाने से डर जाने वाले कई सज्जनों ने कई तरह की नेक सलाहें दीं।

सबसे ज़रूरी बात जो बार-बार कही गयी और जिस पर श्रीमान भाई अमरसिंह जी झबाल ने विशेष ज़ोर दिया, वह यह थी कि धर्म के सवाल को छेड़ा ही न जाये। बड़ी नेक सलाह है। यदि किसी का धर्म बाहर लोगों की सुख-शान्ति में कोई विघ्न डालता हो तो किसी को भी उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की जरूरत हो सकती है? लेकिन सवाल तो यह है कि अब तक का अनुभव क्या बताता है? पिछले आन्दोलन में भी धर्म का यही सवाल उठा और सभी को पूरी आज़ादी दे दी गयी। यहाँ तक कि कांग्रेस के मंच से भी आयतें और मंत्र पढ़े जाने लगे। उन दिनों धर्म में पीछे रहने वाला कोई भी आदमी अच्छा नहीं समझा जाता था। फलस्वरूप संकीर्णता बढ़ने लगी। जो दुष्परिणाम हुआ, वह किससे छिपा है? अब राष्ट्रवादी या स्वतंत्रता प्रेमी लोग धर्म की असलियत समझ गये हैं और वही उसे अपने रास्ते का रोड़ा समझते हैं।

बात यह है कि क्या धर्म घर में रखते हुए भी, लोगों के दिलों में भेदभाव नहीं बढ़ता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर नहीं पड़ता? इस समय पूर्ण स्वतंत्रता के उपासक सज्जन धर्म को दिमागी गु़लामी का नाम देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्चे से यह कहना कि ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं, मिट्टी का पुतला है, बच्चे को हमेशा के लिए कमज़ोर बनाना है। उसके दिल की ताकत और उसके आत्मविश्वास की भावना को ही नष्ट कर देना है। लेकिन इस बात पर बहस न भी करें और सीधे अपने सामने रखे दो प्रश्नों पर ही विचार करें तो हमें नज़र आता है कि धर्म हमारे रास्ते में एक रोड़ा है। मसलन हम चाहते हैं कि सभी लोग एक-से हों। उनमें पूँजीपतियों के ऊँच-नीच की छूत-अछूत का कोई विभाजन न रहे। लेकिन सनातन धर्म इस भेदभाव के पक्ष में है। बीसवीं सदी में भी पण्डित, मौलवी जी जैसे लोग भंगी के लड़के के हार पहनाने पर कपड़ों सहित स्नान करते हैं और अछूतों को जनेऊ तक देने की इन्कारी है। यदि इस धर्म के विरुद्ध कुछ न कहने की कसम ले लें तो चुप कर घर बैठ जाना चाहिये, नहीं तो धर्म का विरोध करना होगा। लोग यह भी कहते हैं कि इन बुराइयों का सुधार किया जाये। बहुत खूब! अछूत को स्वामी दयानन्द ने जो मिटाया तो वे भी चार वर्णों से आगे नहीं जा पाये। भेदभाव तो फिर भी रहा ही। गुरुद्वारे जाकर जो सिख ‘राज करेगा खालसा’ गायें और बाहर आकर पंचायती राज की बातें करें, तो इसका मतलब क्या है?

धर्म तो यह कहता है कि इस्लाम पर विश्वास न करने वाले को तलवार के घाट उतार देना चाहिये और यदि इधर एकता की दुहाई दी जाये तो परिणाम क्या होगा? हम जानते हैं कि अभी कई और बड़े ऊँचे भाव की आयतें और मंत्र पढ़कर खींचतान करने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन सवाल यह है कि इस सारे झगड़े से छुटकारा ही क्यों न पाया जाये? धर्म का पहाड़ तो हमें हमारे सामने खड़ा नज़र आता है। मान लें कि भारत में स्वतंत्रता-संग्राम छिड़ जाये। सेनाएँ आमने-सामने बन्दूकें ताने खड़ी हों, गोली चलने ही वाली हो और यदि उस समय कोई मुहम्मद गौरी की तरह, जैसी कि कहावत बतायी जाती है, आज भी हमारे सामने गायें, सूअर, वेद-कुरान आदि चीज़ें खड़ी कर दे, तो हम क्या करेंगे? यदि पक्के धार्मिक होंगे तो अपना बोरिया-बिस्तर लपेटकर घर बैठ जायेंगे। धर्म के होते हुए हिन्दू-सिख गाय पर और मुसलमान सूअर पर गोली नहीं चला सकते। धर्म के बड़े पक्के इन्सान तो उस समय सोमनाथ के कई हजार पण्डों की तरह ठाकुरों के आगे लोटते रहेंगे और दूसरे लोग धर्महीन या अधर्मी-काम कर जायेंगे। तो हम किस निष्कर्ष पर पहुंचे? धर्म के विरुद्ध सोचना ही पड़ता है। लेकिन यदि धर्म के पक्षवालों के तर्क भी सोचे जायें तो वे यह कहते हैं कि दुनिया में अँधेरा हो जायेगा, पाप पढ़ जायेगा। बहुत अच्छा, इसी बात को ले लें।

रूसी महात्मा टॉल्स्टॉय ने अपनी पुस्तक (Essay and Letters) में धर्म पर बहस करते हुए उसके तीन हिस्से किये किये हैं —

1. Essentials of Religion, यानी धर्म की ज़रूरी बातें अर्थात सच बोलना, चोरी न करना, गरीबों की सहायता करना, प्यार से रहना, वगैरा।

2. Philosophy of Religion, यानी जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार-रचना आदि का दर्शन। इसमें आदमी अपनी मर्जी के अनुसार सोचने और समझने का यत्न करता है।

3. Rituals of Religion, यानी रस्मो-रिवाज़ वगैरा। मतलब यह कि पहले हिस्से में सभी धर्म एक हैं। सभी कहते हैं कि सच बोलो, झूठ न बोलो, प्यार से रहो। इन बातों को कुछ सज्जनों ने Individual Religion कहा है। इसमें तो झगड़े का प्रश्न ही नहीं उठता। वरन यह कि ऐसे नेक विचार हर आदमी में होने चाहिये। दूसरा फिलासफी का प्रश्न है। असल में कहना पड़ता है कि Philosophy is the out come of Human weakness, यानी फिलासफी आदमी की कमजोरी का फल है। जहाँ भी आदमी देख सकते हैं। वहाँ कोई झगड़ा नहीं। जहाँ कुछ नज़र न आया, वहीं दिमाग लड़ाना शुरू कर दिया और ख़ास-ख़ास निष्कर्ष निकाल लिये। वैसे तो फिलासफी बड़ी जरूरी चीज़ है, क्योंकि इसके बगैर उन्नति नहीं हो सकती, लेकिन इसके साथ-साथ शान्ति होनी भी बड़ी ज़रूरी है। हमारे बुजुर्ग कह गये हैं कि मरने के बाद पुनर्जन्म भी होता है, ईसाई और मुसलमान इस बात को नहीं मानते। बहुत अच्छा, अपना-अपना विचार है। आइये, प्यार के साथ बैठकर बहस करें। एक-दूसरे के विचार जानें। लेकिन ‘मसला-ए-तनासुक’ पर बहस होती है तो आर्यसमाजियों व मुसलमानों में लाठियाँ चल जाती हैं। बात यह कि दोनों पक्ष दिमाग को, बुद्धि को, सोचने-समझने की शक्ति को ताला लगाकर घर रख आते हैं। वे समझते हैं कि वेद भगवान में ईश्वर ने इसी तरह लिखा है और वही सच्चा है। वे कहते हैं कि कुरान शरीफ में खु़दा ने ऐसे लिखा है और यही सच है। अपने सोचने की शक्ति, (Power of Reasoning) को छुट्टी दी हुई होती है। सो जो फिलासफी हर व्यक्ति की निजी राय से अधिक महत्त्व न रखती हो तो एक ख़ास फिलासफी मानने के कारण भिन्न गुट न बनें, तो इसमें क्या शिकायत हो सकती है।

अब आती है तीसरी बात – रस्मो-रिवाज़। सरस्वती-पूजावाले दिन, सरस्वती की मूर्ति का जुलूस निकलना ज़रूरी है उसमें आगे-आगे बैण्ड-बाजा बजना भी ज़रूरी है। लेकिन हैरीमन रोड के रास्ते में एक मस्जिद भी आती है। इस्लाम धर्म कहता है कि मस्जिद के आगे बाजा न बजे। अब क्या होना चाहिये? नागरिक आज़ादी का हक (Civil rights of citizen) कहता है कि बाज़ार में बाज़ा बजाते हुए भी जाया जा सकता है। लेकिन धर्म कहता है कि नहीं। इनके धर्म में गाय का बलिदान ज़रूरी है और दूसरे में गाय की पूजा लिखी हुई है। अब क्या हो? पीपल की शाखा कटते ही धर्म में अन्तर आ जाता है तो क्या किया जाये? तो यही फिलासफी व रस्मो-रिवाज़ के छोटे-छोटे भेद बाद में जाकर National Religion बन जाते हैं और अलग-अलग संगठन बनने के कारण बनते हैं। परिणाम हमारे सामने है।

सो यदि धर्म पीछे लिखी तीसरी और दूसरी बात के साथ अन्धविश्वास को मिलाने का नाम है, तो धर्म की कोई ज़रूरत नहीं। इसे आज ही उड़ा देना चाहिये। यदि पहली और दूसरी बात में स्वतंत्र विचार मिलाकर धर्म बनता हो, तो धर्म मुबारक है।

लेकिन अगल-अलग संगठन और खाने-पीने का भेदभाव मिटाना ज़रूरी है। छूत-अछूत शब्दों को जड़ से निकालना होगा। जब तक हम अपनी तंगदिली छोड़कर एक न होंगे, तब तक हमें वास्तविक एकता नहीं हो सकती। इसलिए ऊपर लिखी बातों के अनुसार चलकर ही हम आजादी की ओर बढ़ सकते हैं। हमारी आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेजी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह पूर्ण स्वतंत्रता का नाम है। जब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आज़ाद हो जायेंगे।

(साभार: www.marxists.org)

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