गुरुवार, 19 सितंबर 2013

आधी सदी में मर गईं 250 भाषाएं

कहा जाता है कि दि किसी सभ्यता अथवा संस्कृति को नष्ट करना है तो उसकी भाषा नष्ट कर दीजिए। भाषा किसी समुदाय विशेष की सांस्कृतिक पहचान होती है, जो कि तेजी से नष्ट हो रही है। वैश्वीकरण ने दुनिया को एक गांव में तब्दील करके हमें सिर्फ फायदे पहुंचाए हों, ऐसा नहीं है। इसने हमसे बहुत कुछ छीना है। छोटी-छोटी संस्कृतियां वैश्वीकरण की धारा में तिनकों की तरह बह रही हैं। उनकी बोंली-भाषा, उनकी सांस्कृतिक-सामाजिक पहचान आदि पर गंभीर संकट है। हाल ही में एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि पिछले 50 सालों में भारत में 250 भाषाएं नष्ट हों गईं। सर्वेक्षण में दावा किया गया है भाषाएं अलग-अलग वजहों से ब़डी तेजी से मर रही हैं।
इससे पहले इस तरह का कोई सर्वेक्षण ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेज अधिकारी जॉन अब्राहम ग्रियर्सन की अगुआई में 1894-1928 के बीच इस तरह का भाषाई सर्वे हुआ था। उसके करीब सौ साल बाद भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर नामक संस्था की ओर से भारतीय भाषाओं का लोक सर्वेक्षण (पीएलएसआइ) किया गया। करीब सदी भर बाद अपने तरह का यह पहला सर्वे है। इसमें कहा गया है कि 1961 में भारत में 1100 भाषाएं बोली जाती थीं। पिछले 50 सालों के दौरान इनमें से 250 भाषाएं लुप्त हो गई हैं और फिलहाल 850 भाषाएं जीवित हैं। व़डोदरा विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के अध्यापक रह चुके भाषाविद गणेश देवी इस सर्वे के अध्यक्ष हैं।
गणेश देवी ने बताया कि हम करीब 780 भाषाओं का अध्ययन कर सके। फिलहाल भारत में करीब 850 भाषाएं जीवित हैं। यदि 1961 की जनगणना के आधार माना जाए तो इन पचास सालों में 250 भाषाएं नष्ट हो चुकी हैं। सर्वेक्षण की प्रासंगिकता के सवाल पर उन्होंने कहा, हर शब्द एक अलग विश्व-दृष्टि पेश करता है। मिसाल के तौर पर हम कितने लाख बार रोए होंगे तो एक शब्द पैदा हुआ होगा आंसू। यह शब्द गया तो हमारी विश्व-दृष्टि भी गई।
हालांकि, इस सर्वे में बोली और भाषा में वर्गीकरण नहीं किया गया है। इस विषय पर गणेश देवी का कहना है कि यह विवाद ही फिजूल है। भाषा सिर्फ भाषा होती है। हम इस धारणा को सिरे से खारिज करते हैं कि जिस भाषा की लिपि नहीं है वह बोली है। विश्व की ज्यादातर भाषाओं के पास लिपि नहीं है। विश्व में कुल छह हजार भाषाएं हैं और 300 से ज्यादा के पास अपनी कोई लिपि नहीं है, लेकिन वे बहुत मशहूर भाषाएं हैं। यहां तक कि अंग्रेजी की भी अपनी लिपि नहीं है। वह भी उधार की लिपि यानी रोमन में लिखी जाती है। हिंदी देवनागरी में लिखी जाती है। देवनागरी में ही संस्कृत, मराठी, नेपाली आदि भी लिखी जाती हैं। यानी भाषा की अपनी लिपि होनी जरूरी नहीं है। कुछ विद्वान इसकी परिभाषा देते हैं कि जो भाष कराए, वही भाषा है। उसका लिखा जाना जरूरी नहीं है। वेदों के बारे में भी कहा जाता है कि वह बोला हुआ ज्ञान है। श्रुति है। वह प़ढा अथवा लिखा हुआ ज्ञान बाद में बना।
गणेश देवी का कहना है कि इन सैक़ड़ों भाषाओं के करोड़ों शब्दों की विश्व दृष्टि को अगली पी़ढी को सौंपने के उद्देश्य से हमने यह सर्वे किया। इसमें सरकार की कोई मदद नहीं ली गई। करीब तीन हजार स्वंसेवियों, शिक्षाविदों, शिक्षकों, लेखकों, किसानों, बनजारों आदि की सहायता से यह सर्वेक्षण पूरा किया गया। इसे शिक्षक दिवस के रोज 68 खंडों में करीब 35 हजार पन्नों की रिपोर्ट के रूप में जारी किया गया।
सर्वेक्षण के मुताबिक, करीब चार सौ भाषाएं ऐसी हैं, जो घुमंतू, आदिवासी और गैर-अधिसूचित जातियों द्वारा बोली जाती हैं। सर्वेक्षण में जिन 780 भाषाओं का अध्ययन किया गया, उनमें से 400 भाषाओं का व्याकरण और शब्दकोश भी तैयार किया गया है। गणेश देवी का कहना है कि है सर्वेक्षण किसी भाषा के नष्ट होने का रोना रोने के लिए नहीं, बल्कि अपनी विविधता का उत्सव मनाने के लिए किया गया है। अध्ययन में पाया गया कि दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद जैसे शहरों में 300 से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं। अरुणाचल में 90 भाषाएं बोली जाती हैं। दादर और नागर हवेली में गोरपा नाम की एक भाषा मिली, जिसका अब तक कोई रिकॉर्ड नहीं है। हिंदी बोलने वालों की संख्या लगभग चालीस करोड़ है, जबकि सिक्किम में माझी बोलने वालों की संख्या सिर्फ चार है। इस सर्वेक्षण में उन भाषाओं को भी शामिल किया गया, जिन्हें बोलने वालों की संख्या दस हजार से कम है।
सर्वेक्षण में इन भाषाओं के शामिल करने करने के पीछे देवी ने तर्क दिया कि बांग्लादेश युद्ध के बाद भाषाई संघर्ष की संभावनाओं को खत्म करने के लिए रणनीति के तहत उन भाषाओं को जनगणना में शामिल करना बंद कर दिया गया, जिन्हें बोलने वालों की संख्या दस हजार से कम है। यही वजह है कि 1961 की जनगणना में 1652 भाषाओं का जिक्र है, जबकि 1971 में यह संख्या घटकर 182 हो गई और 2001 में 122 रह गई। सर्वेक्षण में ऐसा माना गया कि 1961 की जनगणना में जिन 1652 भाषाओ का जिक्र है, उनमें से अनुमानतः 11 सौ को भाषा का दर्जा दिया जा सकता है। भारत सरकार की तरफ से 2006-07 में भारतीय भाषाओं पर सर्वेक्षण कराए जाने की पहल हुई थी, लेकिन यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
वैश्विक स्तर पर देखें तो वहां भी अंग्रेजी के वर्चस्व के आगे सैक़ड़ों भाषाओं पर अस्तित्व का संकट है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से 2009 में जारी आंक़ड़ों के मुताबिक, सबसे खराब हालत भारत में है जहां 196 भाषाएं मिटने की कगार पर हैं, इसके बाद अमेरिका का स्थान है, जहां 192 भाषाएं विलुप्तप्राय हैं। इंडोनेशिया में भी 147 भाषाएं मिटने वाली हैं। दुनिया में 199 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या दस से भी कम है। 178 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या 150 लोगों से भी कम है। एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया भर में 6900 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें से 2500 भाषाओं की स्थिति चिंताजनक है। कहा जा सकता है कि यदि भाषा संस्कृति का आधार है तो इन भाषाओं के नष्ट होने के साथ ये संस्कृतियों भी नष्ट हो जाएंगी।
दरअसल, ऐसा नहीं है कि यह भाषाएं स्वाभाविक तौर पर नष्ट हो रही हैं। दुनिया भर में बढ़ रहे आर्थिक और बौद्धिक साम्राज्यवाद के चलते अंग्रेजी या दूसरी वर्चस्व वाली भाषाएं तेजी से विकास कर रही हैं। जो भाषाएं सीधे तौर पर आर्थिकी से जुड़ी हैं और सत्ता को प्रभावित करती हैं, वे अपना विकास कर रही हैं। जो भाषाएं कमजोर तबकों अथवा समुदायों की हैं, वे विनष्ट हो रही हैं, क्योंकि उन भाषाओं में रोजगार की कोई गारंटी न होने के कारण उस समुदाय के लोग भी भाषाई पलायन करके उस भाषा का दामन थाम लेते हैं, जिसमें रोजगार की सुरक्षा मिलती हो। यह हाल हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं का भी है। इन भाषाओं से संबंध रखने वाले लोग तेजी से अंग्रेजी या दूसरी विश्व भाषाओं को सीखने और रोजगार पाने के लिए अपनी भाषा तज रहे हैं। वास्तव में यह बहस किसी भाषा के अच्छी या खराब होने की नहीं, बात सिर्फ किसी समुदाय के पहचान की है। जिस समुदाय की भाषा साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शिकार होती है, उस समुदाय का आमूल स्वरूप ही बदल जाता है।  यह विडंबना ही है कि हमारे यहां आज तक भाषाओं के संरक्षण के लिए कोई नीति नहीं है, न ही निकट भविष्य में ऐसा होता दिख रहा है।





सोमवार, 27 मई 2013

हर हत्या एक संभावना है

धरती को कोई झकझोरता है जोर से
तो अक्सर आसमान दरक जाता है
और एक ढहती हुई छत आ गिरती है सुबह के सीने पर
उसी सुबह कोई युवती बिलखती हुई देखती है
अपने दो चार सपनों को पिसते हुए
एक चिड़िया झुंझलाहट में आग लगा देती है
जतन से बनाए गए अपने घोंसले को
बारिश आने या अंडे रखने से ठीक पहले

अभी अभी जागे एक बच्चे की आंख से
काजल बह जाता है
और गहरे हो जाते हैं उसके गाल पर उगे धब्बे
मां सपने देखती है कि शहर सूख गया है
आंचल से कितना भी रगड़ो
कालिख नहीं छूटती

दूधिया जो दूध लाया है
उसका रंग कुछ काला है
सुबह की हवा का मिजाज विषैला है
जंगल में चूहे मारने गए कुछ बच्चों को
खतरा बताकर गोली मार दी गई है
एक बूढ़ा अपंग बाप जूझता अपनी पसलियों से
उन्हें कंधा देना चाहता है
काफी चीख मची है बस्ती में

चौड़ी सड़कों में दबे
बांध के पानी में समा गए
शहर के शोर में बिला गए
तमाम मुर्दे आज इकट्ठा हो गए हैं
उन्होंने अदालत लगा ली है
और इंसाफ पर अड़ गए हैं
हर हत्या एक संभावना हो गई है...।

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

सरकारी योजना


जब कोई उच्चारता है शहर
तो मेरे जेहन में कौंध जाता है
एक त्रासदी सा कुछ
मुझे लगता है कि किसी ने
शहर नहीं पुकारा है,
एक जिन्न का आह्वान किया है
ऐसा जिन्न जो बोतल से बाहर आता है
तो बस्तियां तब्दील हो जाती हैं श्मशान में

यहां पर मैं आपको रोककर
यह बताना चाहता हूं
कि इस श्मशान में हर कोई दफ्न नहीं होता
यह जिन्न नरमुंड लीलने से पहले
व्यावसायिक छंटनी करता है
जिसकी जेबें भरी हैं
वह उसका निवाला नहीं है
जिसकी रसोई में निवाला नहीं है
इस जिन्न का निवाला वही है

उंची उंची अट्टालिकाओं वाले इस श्मशान में
कुछ छटपटाती चीखें हैं मेरे दोस्त
इराक, अफगानिस्तान की तरह
कश्मीर और विदर्भ की तरह
इनका चीखना और घुट कर मर जाना
उंचे कान वालों के लिए कोई मुद्दा नहीं हैं

मैं एक ऐसे ही शहर में आ गिरा हूं
जो राजधानी में गढ़े गए जिन्न के चंगुल में है
यहां एक हरे भरे आसमान में
बूढ़े बरगद का खुदकुशी कर लेना
किसी के लिए गौरतलब नहीं है

वार्षिक योजनाओं और बजटों में एक झरोखा है
कभी उसमें झांकना तो पाओगे
फाइलों के बंडल में
एक नर्इ् नई सहेज कर रखी हुई मोटी सी फाइल है
जिसमें उजड़ें घरों को नेस्तनाबूत करने
और भूखों को उन्हीं के खेतों में
बहुत नीचे दफना देने का मसौदा है
इसी से श्मशानों के चमचमाने का
बीजारोपण होना है।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

मां को चिट्ठी


मां! बहुत दुख में हूं। तुम्हारा आंचल सर से हटने के बाद समय बहुत कठिन हो गया। भीतर से बाहर तक बलात्कार, ​नरसंहार, खूनखराबा इसके सिवा कुछ नहीं रह गया। 'इंसान' बनने का जो सपना तुमने मेरी आंखों में डाला था, उसमें खलल पड़ गया है। तमाम बलत्कृत होते, चीखते सपनों के बीच में न कान बंद किया जाता है, न सुना जाता है। आसपास जो है वह बहुत नाकाफी है सुकून से जीने के लिए। यह कोलाहल भरा समय मुझे संज्ञाशून्य किए देता है। मैं एक संज्ञाशून्य यंत्र होता जा रहा हूं।
आज का दिन बहुत भयावह था। रात भी स्याहियों से डूबी हुई, डरावनी सी। रात को देखा कि मैं कहीं से घर लौट रहा हूं। मेरे ठीक आगे खूब मतवाली चाल से एक स्त्री चल रही है। वह कौन थी, नहीं जानता। लेकिन जो भी थी, अपनी थी। नितांत अपनी। सपने में संबंध परिभाषित नहीं होते। वे बस संबंध होते हैं। वह निश्चिंत हो मेरे आगे आगे चल रही थी कि इतने में दो व्यक्ति फुसफुसाते हुए मेरे बगल से गुजरते हैं। एक दूसरे से कहता है कि तुम इस तरफ से उसका रास्ता रोको, मैं उस तरफ से। भागने न पाए।
मुझे महसूस होता है कि वे उस स्त्री पर हमला करने जा रहे हैं। मैं बेचैन होता हूं और दौड़कर उसका हाथ पकड़ता हूं और पूरे वेग से भागता हूं। उससे बोलता हूं कि जितनी तेज दौड़ सको, दौड़ो। वह मेरे साथ घिसटती हुई भागती है। वे हमलावर हम दोनों के पीछे दौड़ते हैं, हमें पकड़ने के लिए। मैं उसका हाथ और कस लेता हूं। पूरे दम से और भागता हूं। इतने में गांव आ जाता है। वही अपना गांव, जहां मैं कभी डरता नहीं था। तुम भी नहीं। बहनें भी नहीं। वह बच जाती है।
मेरी आंख खुल जाती है। यह सपना था और बेहद डरावना था। मैं पसीने से भीगा बिस्तर पर कांप रहा था। जिसे बचाने के लिए नींद की अवचेतना में मैं भागा था, वह कौन थी, नहीं पता। वह शायद तुम थीं। बहन रही होगी। प्रिया रही होगी...कुल मिलाकर वह थी मेरे ही भीतर की स्त्री।
मां, क्या यह सपना सच होगा कि मैं किसी को बलत्कृत न होने दूं? क्या यह संभव है मां? जानती हो, सपने में तो मैंने उसे बचा लिया, ​लेकिन कहीं कुछ था, जो टूटा था। आवाज दिन के उजाले में भी मेरे कानों में चटक रही थी।
उसे बचा कर, इस भय से मुक्त होने की कोशिश करते करते जब दफ्तर पहुंचा तो पाया कि मैं उसे नहीं बचा सका। जिस जमीन पर तुमने हमें खेलना—चलना सिखाया था, उसी जमीन पर एक मंत्री के घर के सामने झाड़ियों में एक बच्ची का बलात्कार कर पत्थरों से उसका सर कुचल दिया गया। उसका शरीर जानवर खा गए थे। लाश से अलग हुआ एक पैर कुत्ता लेकर सड़क पर आ गया तो हल्ला मचा कि यह तो किसी बच्ची का पैर है। पुलिस आई, लाश खोजी गई। आठ साल की बच्ची की लाश। उसकी लाश के पास किसी नरपिशाच की जांघिया भी पड़ी थी, उसके वीर्य और बच्ची के खून से सनी हुई।
मां, मैं खबरनवीस हूं। यह सब आज मैंने अपने हाथों से लिखकर भेजा है। सुबह होगी तो दुनिया इसे पढ़ेगी। यह लोगों के लिए एक खबर होगी। इसे मैंने लिखा है। मेरे हाथों से मुझे खून की बदबू आती है। मेरे कानों में उस बच्ची की चीख सुनाई देती है। मां, मेरे भीतर की स्त्री आज फिर बलत्कृत हुई। मां मैं टूट रहा हूं। मुझे ताकत दो। मैं उसे नहीं बचा सका। रात का सपना दिन में टूट गया। मां बहुत पीड़ा में हूं। मां तुम कहां हो...?

सोमवार, 28 जनवरी 2013

चाय बागान के मजदूरों के नाम


 चाय बागानों में विचरते नरकंकाल
टूटी पत्तियों जैसे सूखते
महीनों तक रोटियों के इंतजार में
पत्थर हुईं आंखें 
छटपटातीं, चीखतीं, सूखतीं आतें

उन्हें याद नहीं है
कि पिछली बार कब खाया था
उन्होंने भर पेट खाना
उन्हें याद नहीं कि उनके घर में
कब जला था चूल्हा
उन्हें घर हैं
लेकिन दरोदीवार और छत
नदारद हैं 

मांओं की सूखी छातियां
तड़फड़ाती हैं बिलखते बच्चों को देख
जो जंगली पौधों की जड़ों से
पेट भरने की नाकाम कोशिशें करते करते
चीख पड़ते हैं
वे केवल रोटी बोलते हैं
वे केवल रोटी खोजते हैं
सपने में रोटी देखते हैं


उनके कुनबे में लगातार हो रही
असंख्य मौतें भी
गणनाओं का अनोखा खेल हैं
दबी हुई सरकारी फाइलों
एनजीओ की नाकाम गणनाओं
और कोने में लगी अखबारी रिपोर्टों के

रोज होतीं हैं दस बीस मौतें
उदार व्यवस्था के निवाले हैं
जिन्हें वह रोज लील जाती है
और डकार भी नहीं लेती 

आहिस्ताआहिस्ता
माटी में मिलते जा रहे
हजारों लोगों की खामोश मौतों के बारे में
किसी ने नहीं सुना
राष्ट्रपति को बुखार होने की गर्म चचाओं के बीच
जलपाईगुड़ी के नरसंहार के बारे में
किसी नहीं सुना
लोगों ने बस यह जाना
कि जंगली मजदूरों ने
भून कर खा लिया 
चाय बागान के मालिक को
खामोश मौतों के बारे में
यकीनन किसी ने नहीं सुना 

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

एक पुरानी लालटेन


गोल बनाकर बैठे 
दो बहनें और एक मैं 
एक पुरानी लालटेन के गिर्द 
बहनों की आंखों में झांकने के दिन थे वे 
जब हम अपनी—अपनी किताबों की आड़ में 
फुसफसाकर पढ़ा करते थे 
एक दूसरे की होटों की चुप्पी हंसी 
पलकों पर बैठा पिता का भय 
माथे पर चस्पा मां की हथेली

मद्धम नीम उजाले में झांकती
बहनों की डबडबाई आंखें अब भी मेरे साथ हैं
उस पुरानी लालटेन का ढांचा
अब भी रखा है छज्जे पर
जब कभी इकट्ठे होते हैं हम
देखते हैं उस पर छपे हुए हमारे चेहरे

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

सृजन की रात


एक काली रात का अँधेरा 
दौड़ता है मेरी रगों में 
अक्सर, जब हम जन रहे होते हैं 
साथ साथ, एक चाँद 
एक बहुत सुन्दर घड़ी में 
होता हूँ मैं तुम्हारे साथ 
और इस श्याम-श्वेत, धूसर रंग से डरी हुई 
भयातुर आँखों वाली तुम 
दुबकी होती हो मेरे सीने में 
मैं एक बाजू में थामे तुम्हें 
दुसरे से लड़ रहा होता हूँ, तमाम स्याहियों से 
बिना तुम्हें खबर किये 
इस दुर्दांत संघर्ष के बावजूद 
तुम्हारी आँखों के उजाले में 
बहुत सुन्दर होती है 
सृजन की हर रात

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...