सोमवार, 27 मई 2013

हर हत्या एक संभावना है

धरती को कोई झकझोरता है जोर से
तो अक्सर आसमान दरक जाता है
और एक ढहती हुई छत आ गिरती है सुबह के सीने पर
उसी सुबह कोई युवती बिलखती हुई देखती है
अपने दो चार सपनों को पिसते हुए
एक चिड़िया झुंझलाहट में आग लगा देती है
जतन से बनाए गए अपने घोंसले को
बारिश आने या अंडे रखने से ठीक पहले

अभी अभी जागे एक बच्चे की आंख से
काजल बह जाता है
और गहरे हो जाते हैं उसके गाल पर उगे धब्बे
मां सपने देखती है कि शहर सूख गया है
आंचल से कितना भी रगड़ो
कालिख नहीं छूटती

दूधिया जो दूध लाया है
उसका रंग कुछ काला है
सुबह की हवा का मिजाज विषैला है
जंगल में चूहे मारने गए कुछ बच्चों को
खतरा बताकर गोली मार दी गई है
एक बूढ़ा अपंग बाप जूझता अपनी पसलियों से
उन्हें कंधा देना चाहता है
काफी चीख मची है बस्ती में

चौड़ी सड़कों में दबे
बांध के पानी में समा गए
शहर के शोर में बिला गए
तमाम मुर्दे आज इकट्ठा हो गए हैं
उन्होंने अदालत लगा ली है
और इंसाफ पर अड़ गए हैं
हर हत्या एक संभावना हो गई है...।

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

सरकारी योजना


जब कोई उच्चारता है शहर
तो मेरे जेहन में कौंध जाता है
एक त्रासदी सा कुछ
मुझे लगता है कि किसी ने
शहर नहीं पुकारा है,
एक जिन्न का आह्वान किया है
ऐसा जिन्न जो बोतल से बाहर आता है
तो बस्तियां तब्दील हो जाती हैं श्मशान में

यहां पर मैं आपको रोककर
यह बताना चाहता हूं
कि इस श्मशान में हर कोई दफ्न नहीं होता
यह जिन्न नरमुंड लीलने से पहले
व्यावसायिक छंटनी करता है
जिसकी जेबें भरी हैं
वह उसका निवाला नहीं है
जिसकी रसोई में निवाला नहीं है
इस जिन्न का निवाला वही है

उंची उंची अट्टालिकाओं वाले इस श्मशान में
कुछ छटपटाती चीखें हैं मेरे दोस्त
इराक, अफगानिस्तान की तरह
कश्मीर और विदर्भ की तरह
इनका चीखना और घुट कर मर जाना
उंचे कान वालों के लिए कोई मुद्दा नहीं हैं

मैं एक ऐसे ही शहर में आ गिरा हूं
जो राजधानी में गढ़े गए जिन्न के चंगुल में है
यहां एक हरे भरे आसमान में
बूढ़े बरगद का खुदकुशी कर लेना
किसी के लिए गौरतलब नहीं है

वार्षिक योजनाओं और बजटों में एक झरोखा है
कभी उसमें झांकना तो पाओगे
फाइलों के बंडल में
एक नर्इ् नई सहेज कर रखी हुई मोटी सी फाइल है
जिसमें उजड़ें घरों को नेस्तनाबूत करने
और भूखों को उन्हीं के खेतों में
बहुत नीचे दफना देने का मसौदा है
इसी से श्मशानों के चमचमाने का
बीजारोपण होना है।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

मां को चिट्ठी


मां! बहुत दुख में हूं। तुम्हारा आंचल सर से हटने के बाद समय बहुत कठिन हो गया। भीतर से बाहर तक बलात्कार, ​नरसंहार, खूनखराबा इसके सिवा कुछ नहीं रह गया। 'इंसान' बनने का जो सपना तुमने मेरी आंखों में डाला था, उसमें खलल पड़ गया है। तमाम बलत्कृत होते, चीखते सपनों के बीच में न कान बंद किया जाता है, न सुना जाता है। आसपास जो है वह बहुत नाकाफी है सुकून से जीने के लिए। यह कोलाहल भरा समय मुझे संज्ञाशून्य किए देता है। मैं एक संज्ञाशून्य यंत्र होता जा रहा हूं।
आज का दिन बहुत भयावह था। रात भी स्याहियों से डूबी हुई, डरावनी सी। रात को देखा कि मैं कहीं से घर लौट रहा हूं। मेरे ठीक आगे खूब मतवाली चाल से एक स्त्री चल रही है। वह कौन थी, नहीं जानता। लेकिन जो भी थी, अपनी थी। नितांत अपनी। सपने में संबंध परिभाषित नहीं होते। वे बस संबंध होते हैं। वह निश्चिंत हो मेरे आगे आगे चल रही थी कि इतने में दो व्यक्ति फुसफुसाते हुए मेरे बगल से गुजरते हैं। एक दूसरे से कहता है कि तुम इस तरफ से उसका रास्ता रोको, मैं उस तरफ से। भागने न पाए।
मुझे महसूस होता है कि वे उस स्त्री पर हमला करने जा रहे हैं। मैं बेचैन होता हूं और दौड़कर उसका हाथ पकड़ता हूं और पूरे वेग से भागता हूं। उससे बोलता हूं कि जितनी तेज दौड़ सको, दौड़ो। वह मेरे साथ घिसटती हुई भागती है। वे हमलावर हम दोनों के पीछे दौड़ते हैं, हमें पकड़ने के लिए। मैं उसका हाथ और कस लेता हूं। पूरे दम से और भागता हूं। इतने में गांव आ जाता है। वही अपना गांव, जहां मैं कभी डरता नहीं था। तुम भी नहीं। बहनें भी नहीं। वह बच जाती है।
मेरी आंख खुल जाती है। यह सपना था और बेहद डरावना था। मैं पसीने से भीगा बिस्तर पर कांप रहा था। जिसे बचाने के लिए नींद की अवचेतना में मैं भागा था, वह कौन थी, नहीं पता। वह शायद तुम थीं। बहन रही होगी। प्रिया रही होगी...कुल मिलाकर वह थी मेरे ही भीतर की स्त्री।
मां, क्या यह सपना सच होगा कि मैं किसी को बलत्कृत न होने दूं? क्या यह संभव है मां? जानती हो, सपने में तो मैंने उसे बचा लिया, ​लेकिन कहीं कुछ था, जो टूटा था। आवाज दिन के उजाले में भी मेरे कानों में चटक रही थी।
उसे बचा कर, इस भय से मुक्त होने की कोशिश करते करते जब दफ्तर पहुंचा तो पाया कि मैं उसे नहीं बचा सका। जिस जमीन पर तुमने हमें खेलना—चलना सिखाया था, उसी जमीन पर एक मंत्री के घर के सामने झाड़ियों में एक बच्ची का बलात्कार कर पत्थरों से उसका सर कुचल दिया गया। उसका शरीर जानवर खा गए थे। लाश से अलग हुआ एक पैर कुत्ता लेकर सड़क पर आ गया तो हल्ला मचा कि यह तो किसी बच्ची का पैर है। पुलिस आई, लाश खोजी गई। आठ साल की बच्ची की लाश। उसकी लाश के पास किसी नरपिशाच की जांघिया भी पड़ी थी, उसके वीर्य और बच्ची के खून से सनी हुई।
मां, मैं खबरनवीस हूं। यह सब आज मैंने अपने हाथों से लिखकर भेजा है। सुबह होगी तो दुनिया इसे पढ़ेगी। यह लोगों के लिए एक खबर होगी। इसे मैंने लिखा है। मेरे हाथों से मुझे खून की बदबू आती है। मेरे कानों में उस बच्ची की चीख सुनाई देती है। मां, मेरे भीतर की स्त्री आज फिर बलत्कृत हुई। मां मैं टूट रहा हूं। मुझे ताकत दो। मैं उसे नहीं बचा सका। रात का सपना दिन में टूट गया। मां बहुत पीड़ा में हूं। मां तुम कहां हो...?

सोमवार, 28 जनवरी 2013

चाय बागान के मजदूरों के नाम


 चाय बागानों में विचरते नरकंकाल
टूटी पत्तियों जैसे सूखते
महीनों तक रोटियों के इंतजार में
पत्थर हुईं आंखें 
छटपटातीं, चीखतीं, सूखतीं आतें

उन्हें याद नहीं है
कि पिछली बार कब खाया था
उन्होंने भर पेट खाना
उन्हें याद नहीं कि उनके घर में
कब जला था चूल्हा
उन्हें घर हैं
लेकिन दरोदीवार और छत
नदारद हैं 

मांओं की सूखी छातियां
तड़फड़ाती हैं बिलखते बच्चों को देख
जो जंगली पौधों की जड़ों से
पेट भरने की नाकाम कोशिशें करते करते
चीख पड़ते हैं
वे केवल रोटी बोलते हैं
वे केवल रोटी खोजते हैं
सपने में रोटी देखते हैं


उनके कुनबे में लगातार हो रही
असंख्य मौतें भी
गणनाओं का अनोखा खेल हैं
दबी हुई सरकारी फाइलों
एनजीओ की नाकाम गणनाओं
और कोने में लगी अखबारी रिपोर्टों के

रोज होतीं हैं दस बीस मौतें
उदार व्यवस्था के निवाले हैं
जिन्हें वह रोज लील जाती है
और डकार भी नहीं लेती 

आहिस्ताआहिस्ता
माटी में मिलते जा रहे
हजारों लोगों की खामोश मौतों के बारे में
किसी ने नहीं सुना
राष्ट्रपति को बुखार होने की गर्म चचाओं के बीच
जलपाईगुड़ी के नरसंहार के बारे में
किसी नहीं सुना
लोगों ने बस यह जाना
कि जंगली मजदूरों ने
भून कर खा लिया 
चाय बागान के मालिक को
खामोश मौतों के बारे में
यकीनन किसी ने नहीं सुना 

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

एक पुरानी लालटेन


गोल बनाकर बैठे 
दो बहनें और एक मैं 
एक पुरानी लालटेन के गिर्द 
बहनों की आंखों में झांकने के दिन थे वे 
जब हम अपनी—अपनी किताबों की आड़ में 
फुसफसाकर पढ़ा करते थे 
एक दूसरे की होटों की चुप्पी हंसी 
पलकों पर बैठा पिता का भय 
माथे पर चस्पा मां की हथेली

मद्धम नीम उजाले में झांकती
बहनों की डबडबाई आंखें अब भी मेरे साथ हैं
उस पुरानी लालटेन का ढांचा
अब भी रखा है छज्जे पर
जब कभी इकट्ठे होते हैं हम
देखते हैं उस पर छपे हुए हमारे चेहरे

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

सृजन की रात


एक काली रात का अँधेरा 
दौड़ता है मेरी रगों में 
अक्सर, जब हम जन रहे होते हैं 
साथ साथ, एक चाँद 
एक बहुत सुन्दर घड़ी में 
होता हूँ मैं तुम्हारे साथ 
और इस श्याम-श्वेत, धूसर रंग से डरी हुई 
भयातुर आँखों वाली तुम 
दुबकी होती हो मेरे सीने में 
मैं एक बाजू में थामे तुम्हें 
दुसरे से लड़ रहा होता हूँ, तमाम स्याहियों से 
बिना तुम्हें खबर किये 
इस दुर्दांत संघर्ष के बावजूद 
तुम्हारी आँखों के उजाले में 
बहुत सुन्दर होती है 
सृजन की हर रात

बुधवार, 30 मई 2012

गांधीजी भ्रष्ट कांग्रेस का दाह-संस्कार चाहते थे


महात्मा गांधी ने गांधी सेवा संघ के कार्यकर्ताओं से मई 1939 में कहा था- ‘‘मैं समूची कांग्रेस पार्टी का दाह-संस्कार कर देना अच्छा समझता हूं, बजाय इसके कि इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करना पड़े।’’ आज जब प्रधानमंत्री सहित देश के पंद्रह मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे हैं, क्या अगर गांधीजी जीवित होते तो पार्टी का दाह-संस्कार कर देते? 

टीम अन्ना एक बार फिर मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के खिलाफ गंभीर आरोपों के साथ उतरी है और उसका दावा है कि वह इन आरोपों के समर्थन में पुख्ता सबूत भी पेश करने का दावा कर रही है। टीम अन्ना का कहना है कि जब तक मंत्रिमंडल का शुद्धिकरण नहीं होगा, तब तक लोकपाल पास नहीं हो पाएगा। यह बात टीम अन्ना के लोग लंबे समय से कह रहे हैं। अन्ना हजारे और उनकी टीम के सदस्य आज कांग्रेस पार्टी और अन्य दलों के भ्रष्टाचार पर जितना परेशान हैं, गांधीजी उससे कहीं ज्यादा थे, यह और बात है कि तब स्थिति इतनी दमघोंटू नहीं थी। नवंबर, 1938 में गांधीजी ने हरिजन में लिखा- ‘‘यदि कांग्रेस से अवैध और अनियमित तत्वों की सफाई नहीं होती, तो आज जो इसकी शक्ति है, वह खत्म हो जाएगी और जब देश को वास्तविक संघर्ष का सामना करना होगा तब कांग्रेस लोगों की आशाओं को पूरा नहीं कर सकेगी।’’ दुर्भाग्य से गांधी की यह बात भविष्यवाणी की तरह उनके युग का अंत होते-होते सच साबित हुई। 

हालांकि, टीम अन्ना के ये आरोप नए नहीं हैं, लेकिन उन्हें इस बार व्यवस्थित ढंग से रखा गया है। टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार के आरोपी जिन पंद्रह मंत्रियों की सूची पेश की है, उनमें मिस्टर क्लीन की छवि वाले नेता प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी भी शामिल हैं। इनके अलावा सरकार में सबसे ज्यादा मुखर लगभग सभी मंत्रियों के नाम इस सूची में शामिल हैं। मसलन, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, शरद पवार, एस एम कृष्णा आदि। टीम अन्ना ने मनमोहन सिंह को पत्र लिख कर सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जजों की निगरानी में एक विशेष जांच दल की मांग की है और ऐसा न होने की स्थिति में 25 जुलाई से आमरण अनशन की धमकी दी है। अपने को बेगुनाह साबित करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उन्होंने यह मांग की है कि वे खुद पहल करके जांच कराएं। इन आरोपों का आधार नियंत्रक महालेेखा परीक्षक की रिपोर्ट और मीडिया में प्रसारित खबरें हैं। टीम अन्ना ने अपने आंदोलन के दौरान अब तक प्रधानमंत्री पर कोई भी आरोप नहीं लगाए थे। 

प्रशांत भूषण का कहना है कि जिस दौरान प्रधानमंत्री के पास कोयला मंत्रालय हुआ करता था, कोयला ब्लाकों के आवंटन में अनियमितता बरती गई। प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल के मुताबिक, उन्होंने अपनी छानबीन में यह पाया कि प्रधानमंत्री जब कोयला मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे थे, उस दौरान लाइसेंस, परमिट आदि बहुत कम दामों पर बांटे गए, जिससे करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ। प्रधानमंत्री के समक्ष यह मसला उठाया गया, लेकिन उन्होंने इस पर कोई कदम नहीं उठाया और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा। 

टीम अन्ना के निशाने पर सिर्फ यही पंद्रह मंत्री नहीं हैं। उनकी मांग है कि जो जांच दल बनाया जाय, वह इन पंद्रहों के अलावा बसपा की मुखिया मायावती, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह और लालू यादव पर लगे आरोपों की भी जांच करे। जांच दल के लिए टीम ने छह सेवानिवृत्त जजों के नाम सुझाए हैं, जिन्हें वे विश्वसनीय समझते हैं। इनमें जस्टिस ए के गांगुली, सुदर्शन रेड्डी, ए पी शाह, जे एस वर्मा, कुलदीप सिंह और एम एन वेंकटचिल्लैया के नाम शामिल हैं। यहां यह गौरतलब है कि टीम अन्ना सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों पर भी भरोसा नहीं करती। इसकी भी वजह शायद भ्रष्टाचार है। प्रशांत भूषण ने पहले ही सुप्रीम कोर्ट को आठ जजों के खिलाफ लिफाफा बंद हलफनामा देकर उन पर सवाल उठा चुके हैं। 
सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस ने इन आरोपों पर अपने चिरपरिचित अंदाज में प्रतिक्रिया दी कि ये सभी आरोप बेबुनियाद हैं और इसका जवाब देने की जरूरत नहीं हैं। पार्टी का कहना है कि यह कोई नई बात नहीं है। टीम अन्ना पहले भी ऐसी बातें करती रही है। कांग्रेस पार्टी की  प्रतिक्रिया अप्रत्याशित नहीं है। टीम अन्ना के अब तक के आंदोलन के दौरान अब तक उठे सभी सवालों को वह सिरे से नकारती रही है। तब भी, जब प्रशांत भूषण, स्वामी सुब्रमण्यम और अन्य के प्रयासों से कई घोटाले उजागर हुए और ए राजा, कनिमोझी और अलागिरी को मंत्री पद छोड़ जेल जाना पड़ा। टूजी को लेकर भी सरकार के मंत्रियों ने सभी आरोपों को बार-बार नकार कर कोई भी अनियमितता होने से इन्कार किया और सुप्रीम कोर्ट की डांट खाई।

यहां सवाल टीम अन्ना या सरकार के पक्ष-विपक्ष में खड़े होने का नहीं है, जैसा कि पिछले महीनों लगातार देखने में आया है। सवाल तो यह है कि व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और स्वच्छ प्रशासन कैसे पाया जाए? क्या सरकार इस दिशा में कोई प्रयास कर रही है? पहले से पर्याप्त कानून मौजूद होने और नए की जरूरत न होने की बात स्वीकारी जा सकती है, यदि मौजूदा कानून वर्तमान व्यवस्था को अपेक्षित पारदर्शिता तक पहुंचा सके। 
26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान को अपनाए जाने के दौरान अपने समापन भाषण में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था- ‘‘यदि लोग, जो चुनकर आएंगे, योग्य, चरित्रवान और ईमानदार हुए तो वे दोषपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्त बना देंगे। यदि उनमें इन गुणों का अभाव हुआ तो संविधान देश की कोई मदद नहीं कर सकता। आखिरकार, एक मशीन की तरह संविधान भी निर्जीव है। इनमें प्राणों का संचार उन व्यक्तियों के द्वारा होता है, जो इस पर नियंत्रण करते हैं। भारत को इस समय ऐसे लोगों की जरूरत है जो ईमानदार हों तथा देश के हित को सर्वोपरि रखें। 
क्या हम उस स्थिति से आगे आ सके हैं? क्या आज भी डॉ राजेंद्र प्रसाद की बातें सही नहीं हैं? तो क्या हमें फिर से एक गांधी की जरूरत है जो भ्रष्ट पार्टी और सरकार का दाह-संस्कार कर भारत की जनता को एक स्वच्छ व्यवस्था प्रदान करे?

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...