गुरुवार, 12 मार्च 2015

जनांदोलन के विचार की दुर्गति

अरविंद केजरीवाल का उभार भाजपा और कांग्रेस मार्का घोड़ा खरीद राजनीति का नकार था. केजरीवाल उस काजल की कोठरी को पानी पी—पी कर कोसते हुए उसमें दाखिल हुए और कोठरी साफ करने की जगह सर से पांव तक खुद को कालिख से पोत लिया. केजरीवाल के उभार के साथ
हम सबने जनता की तड़पती हुई आकांक्षाओं को देखा है कि वह कितनी बेताबी से बदलाव के लिए छटपटाती है. नरेंद्र मोदी और भाजपा को मिला ऐतिहासिक बहुमत भी इसी जन छटपटाहट का नतीजा रहा. लेकिन इन दोनों ने ही जनता की आकांक्षाओं को बेरहमी से रौंदा. आम आदमी पार्टी के बारे में यह तो पहले से ही साफ था कि एक पार्टी बिना किसी घोषित विचारधारा के अगर चुनाव लड़ रही है तो वह सिर्फ सत्ता में जगह बनाने की कोशिश कर रही है. वह कोई दूरगामी परिवर्तन ला सकने की कूवत नहीं रखती. सत्ता मिलने के पंद्रह दिन बाद से सामने आई सिर फुटौवल इसका प्रमाण है. सिर्फ आलाकमान बनने की खब्त में केजरीवाल अपने तालीबाज अव​सरवादियों को अपनी विश्वसनीयता और अपने सियासी भविष्य से जैसा खिलवाड़ कर रहे हैं वह ऐतिहासिक मूर्खता असधारण है. केजरीवाल ऐसे लोगों से घिर गए हैं जिन्होंने अवसर देख राजनीति लपक ली है. राजनीतिक समझ से पैदल पदलोलुपों के भरोसे पार्टियां नहीं चलतीं. लेकिन केजरीवाल खुद को भी इस पदलोलुपता से नहीं बचा पा रहे हैं, नतीजतन वे अपने आदर्शों की तिलांजलि देकर दूसरी कांग्रेस या भाजपा बनाने में लगे हैं.
हिंदुस्तान की राजनीति में कई दशकों से खराबतर में से कम खराब चुनने का विकल्प मिलता रहा है. इस लिहाज से केजरीवाल जनता को कम खराब विकल्प के तौर पर मिले और उसने तवज्जो दी. अब वे यह साबित कर रहे हैं कि भारतीय युवा, जो अन्ना आंदोलन के बाद से राजनीति से कम घृणा करने लगे थे, राजनीति में शामिल हो रहे थे, वे गलत थे. केजरीवाल ने जनांदोलनों पर से जनता का भरोसा और हटा दिया है. उन्होंने अगले किसी आंदोलन पर भरोसा न करने की जमीन तैयार की है. 
दिल्ली में चुनाव जीतने के बाद से ही केजरीवाल ने लगातार यह साबित किया है कि जनता ने उनपर भरोसा करके गलती की. वे इस ऐतिहासिक बहुमत के सर्वथा अयोग्य थे और वे भाजपा या कांग्रेस मार्का राजनीति से अलग कुछ नहीं करने जा रहे हैं. अरविंद केजरीवाल के साथ जनता यकीनन इसलिए खड़ी हुई कि वे साफ सुथरी राजनीति और एक राजनीतिक आदर्श के चेहरे के रूप में दिखे थे. लेकिन वह एक भ्रम मात्र था. हो सकता है कि वे राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ते जाएं, लेकिन पारंपरिक भ्रष्ट राजनीति के काले बादल अभी छंटने नहीं जा रहे हैं. मोदी की अपेक्षा केजरीवाल का महत्व ज्यादा था, क्योंकि वे छोटे स्तर पर ही सही, पर जनता से ज्यादा जुड़े थे. हाल के कुछ प्रकरणों ने हमारी सामूहिक आशाओं पर न सिर्फ कुठाराघात किया, बल्कि यह साबित किया कि सत्ता की गली में जाने वाले की बातों और हरकतों में कितना फर्क होता है.
केजरीवाल जब हल्ला मचा रहे थे कि भाजपा और कांग्रेस अनैतिक—अलोकतांत्रिक राजनीति करती हैं, तब वे कांग्रेस को तोड़कर सत्ता हथियाने का षडयंत्र रच रहे थे. यदि सामने आए स्टिंग की प्रामाणिकता पर संदेह करना चाहें तो योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की चिट्ठी इस बात की तस्दीक करती है कि केजरीवाल सत्ता हथियाने के लिए किस कदर बेताब थे, कितने यत्न किए, जिसकी वजह से इन दोनों नेताओं से उनके मतभेद शुरू हुए. 
केजरीवाल लगातार साबित कर रहे हैं कि वे 'इंदिरा इज इंडिया' सिंड्रोम से पीड़ित हो चुके हैं. प्रशांत भूषण का भारतीय राजनीति में अराजनीतिक तरीके से क्या योगदान है, यह बताने की जरूरत नहीं है. बावजूद इसके, जायज सवालों की वजह से उन्हें बेइज्जत किया जा रहा है. इसी तरह केजरीवाल योगेंद्र यादव के साथ पेश आ रहे हैं. जबकि, इन दोनों नेताओं की चिट्ठी केजरीवाल का कच्चा चिट्ठा है. हो सकता है कि केजरीवाल के विधायक उनका साथ दें और योगेंद्र प्रशांत को पार्टी से बाहर कर दें, लेकिन ऐसाी करके भी वे हार जाएंगे. चिट्ठी में आंतरिक लोकतंत्र, स्वराज, राजनीतिक शुचिता संबंधी तमाम सवाल हैं जिनका अब तक पार्टी कोई जवाब नहीं दे सकी है और पार्टी का बर्ताव इसके विपरीत रहा है. इन दोनों नेताओं के तमाम आदर्शवादी और तर्कसंगत सवालों के जवाब की जगह उनपर हंटर चलाने की कोशिश की जा रही है, जैसे कांग्रेस या भाजपा में होती रही है.
केजरीवाल अब मूर्ख चापलूसों की उस फौज के सहारे नई राजनीति करने के इच्छुक हैं जो सार्वजनिक तौर पर आपराधिक सोच के साथ खड़ी है. कुमार विश्वास कहते हैं कि 'अलगाववादियों को गिरफ्तार न करके गोली मार देनी चाहिए'. यह बातें उस देश में कही जा रही हैं, जिसने अंग्रेज सरकार से सौ वर्षों तक आजादी की लड़ाई लड़ी है. जिस धरती पर धरना, अनशन, असहयोग जैसे राजनीतिक के हथियार विकसित हुए, वहां पर इक्कीसवीं सदी में अलगाववादियों को गोली मार देने की आकांक्षा पालने वाला लंपट दिमाग केजरीवाल का विश्वस्त सहयोगी है. उनके प्रवक्ता आशुतोष, जो कि पत्रकारिता के शिखर पर विराजमान थे, योगेंद्र और प्रशांत आदि को 'अति वाम' खेमा कहते हैं. वरिष्ठ पत्रकार की ऐसी समझ पर आप या तो सर पीट सकते हैं या फिर जब वे बोल रहे हों तो शहर में सबसे अच्छी आइसक्रीम की दुकान के बारे में बात कर सकते हैं. 
हो सकता है कि योंगेंद्र यादव और भूषण परिवार पर लग रहे आरोप सही हों, लेकिन यह साफ है कि केजरीवाल अपने झूठ, अपने आदर्शों के मायाजाल और असली लोकतंत्र लाने के शगूफे पर उठ रहे सवालों का कोई जवाब न देकर लंपटों की एक फौज के सहारे भाजपा और कांग्रेस नुमा आलाकमान बनने के लिए सारी ताकत लगाए दे रहे हैं. वे जीतें या हारें, इससे फर्क नहीं पड़ता. कांग्रेस सवा सौ साल पुरानी पार्टी है लेकिन फिलहाल जनता उसे एक राजनीतिक बोझ से ज्यादा कुछ नहीं मान रही है. अब यह केजरीवाल को तय करना है कि वे क्या बनना चाहते हैं, एक मजबूत राजनीतिक विकल्प या मूर्खों के अप्रश्नेय सरदार!

सोमवार, 2 मार्च 2015

केजरी बाबू! लोकतंत्र कहां गया?

अरविंद केजरीवाल भारतीय राजनीति के स्यवंभू
लोकतांत्रिक और सबसे ईमानदार हैं, इसलिए एक से ज्यादा पद पर काबिज रह सकते हैं. बहाना वही है जो सोनिया गांधी, माया या मुलायम के पास है कि पार्टी नहीं चाहती कि वे हटें. वे देश का सिस्टम पारदर्शी चाहते हैं. पूरा सिस्टम श्रीधरन की मेट्रो की तरह चाहते हैं कि कोई भी रहे पर बेईमानी न कर पाए, लेकिन अपनी पार्टी में ऐसी व्यवस्था नहीं बनाते कि विकेंद्रीकरण हो. उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद संयोजक पद से इस्तीफा दिया, पार्टी के लोगों ने मना कर दिया और वे मान गए! फिर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के चापलूस यही करके क्या बुरा करते हैं? केजरीवाल के व्यवहार से तो लगता है कि खुदा न खास्ता, आम आदमी पार्टी की एक से ज्यादा राज्यों में सरकार बनने की नौबत आई तो स​बके मुख्यमंत्री केजरीवाल ही बनेंगे.
केजरीवाल ने चुनाव जीतने से पहले राजनीतिक ईमानदारी को लेकर बड़ा हल्ला मचाया लेकिन उम्मीदवारों को टिकट बांटने में वही किया जो कांग्रेस भाजपा करती हैं. टिकट बंटवारे को लेकर प्रशांत भूषण, शांति भूषण और पार्टी के लोकपाल की आपत्तियों को दरकिनार किया. जब लोकपाल की सुननी नहीं है तो वह दिखाने का दांत है किस काम का? केंद्र में मजबूत लोकपाल चाहिए जो एक ही शिकायत पर प्रधानमंत्री तक को जेल भिजवा दे. लेकिन अपना लोकपाल जो कहे, कहता रहे, चलता है.
उनके आंतरिक लोकपाल एडमिरल रामदास अगर पार्टी में लोकतंत्र को लेकर कई सवाल उठाते हैं तो केजरीवाल को क्यों नहीं सुनना चाहिए? अगर वे पार्टी के लोकपाल की हैसियत से कहते हैं कि यह पार्टी भी बाकी पार्टियों जैसी है, तो उनके सवालों पर गौर करने की जगह उनपर ही तलवार क्यों खींच लेना चाहिए? अगर वे पार्टी फंडिंग को लेकर सवाल पूछते हैं तो पार्टी को क्यों जवाब नहीं देना चाहिए?
प्रशांत भूषण वह आदमी है, जिसने एक साथ न्यायपालिका और केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था. हर बड़े घोटाले को अंजाम तक पहुंचाने वाले लोगों में प्रशांत सबसे आगे खड़े रहे. अब जब वे आम आदमी पार्टी से सवाल करते हैं तो केजरीवाल को बुरा क्यों लगता है? प्रशांत ने कहा, 'पार्टी ने अपने सभी अकाउंट को वेबसाइट पर जारी करने की बात की थी, लेकिन आरटीआई के अंतर्गत आने के बहुत बाद में भी हम ऐसे नहीं कर सके हैं. हमने चंदे के बारे में तो बता दिया लेकिन खर्च कितना किया, यह अभी भी पर्दे में है.' केजरीवाल के पास प्रशांत भूषण के इस सवाल का क्या जवाब है?
प्रशांत भूषण ने अपने पत्र में लिखा है कि 'हम राष्ट्रीय दल बनें, इससे पहले देश के अहम मुद्दों पर हमारी सोच का स्पष्ट होना भी जरूरी है.' केजरीवाल को यह उम्मीद अराजकता क्यों लगती है? दुनिया की कौन सी पार्टी या संगठन है जिसने बिना किसी विचारधारा या स्पष्ट सोच के तीर मार लिया हो? प्रशांत भूषण अगर पीएसी में किसी महिला सदस्य को शामिल करने की वकालत करते हैं तो वे अनुशासनहीन कैसे हो गए? पार्टी में छह महिला विधायक हैं. किसी को मंत्रिमंडल या पार्टी में अहम पद क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? उनका सवाल है कि 'एक व्यक्ति केंद्रित प्रचार से हमारी पार्टी अन्य दूसरी पारंपरिक पार्टियों की तरह बनती जा रही है जो एक व्यक्ति पर केंद्रित है...एक व्यक्ति केंद्रित अभियान असरदार हो सकता है, लेकिन तब क्या अपने सिद्धांतों को उचित ठहराया जा सकता है? अगर वे चाहते हैं कि पार्टी में कोई एक सुप्रीमो न हो, तो केजरीवाल को इतना बुरा क्यों लगता है कि प्रशांत भूषण उन्हें खलनायक लगते हैं?
अगर योगेंद्र यादव चाहते हैं कि पार्टी अपने आदर्शों को मजबूत कर देश भर में एक राजनीतिक विकल्प बने तो केजरीवाल को नागवार क्यों गुजरता है? केजरीवाल क्यों चाहते हैं कि वे दूसरे राज्यों में भी अपना ही चेहरा आगे रखें? उन्होंने दिल्ली में रहने की कसम खाई है तो रहें लेकिन बाकी नेताओं को
पार्टी के विस्तार की इजाजत क्यों नहीं देना चाहते?
भाजपा कांग्रेस भ्रष्ट हैं परंतु उनकी एक सही—गलत विचारधारा तो है! केजरीवाल सिर्फ ​भ्रष्टाचार का शगूफा लेकर कहां तक जाना चाहते हैं? कहीं यह भ्रष्टाचार विरोधी नारा मुलायम का सेक्युलरिज्म तो नहीं बन जाएगा, जिसका जिक्र आते ही लोग या तो हंसेंगे या चिढ़कर गालियां बकेंगे? दिल्ली एक केंद्र  द्वारा शासित एक पिद्दी सा राज्य है. केजरीवाल को अगर लगता है कि जिस ढंग से दिल्ली की सत्ता मिल गई, वैसे ही राष्ट्रीय राजनीति पलकें बिछाए उनका स्वागत करेगी, तो वे भारी भ्रम में हैं. उनकी अबतक की राजनीतिक उपलब्धि यही है कि उन्होंने भाजपा कांग्रेस को गरियाया है और सत्ता पर काबिज हुए हैं. इसके लिए उन्होंने भी तमाम हथकंडे अपनाए हैं. अग्रवाल समाज, सिख, हिंदू, मुसलमान सबको साधने के दबे छुपे उपक्रम किए. इसी क्रम में वे नास्तिक से आस्तिक तो हो ही गए, उनके ईश्वर चुनाव प्रचार से लेकर शपथ ग्रहण तक में दिखे. अब जब पार्टी और सत्ता को लोकतंत्रिक साबित करने का वक्त है, तब वे वही कर रहे हैं जो नरेंद्र मोदी, अमित शाह, सोनिया—राहुल या माया—मुलायम करते.
केजरीवाल को इतना समझदार नहीं बनना चाहिए कि उनका घामड़पन उनकी हर हरकत में टपकने लगे. जनता को मूर्ख बनाने के चक्कर में अपना शातिरानापन तो छुपाना ही पड़ेगा. लोकतंत्र के लिए ​चीखना और इसे व्यवहार में उतारना, ये दोनों दो बातें हैं. उनकी पार्टी के दो सबसे मजबूत नेता अब उनके लिए खलनायक इसलिए हैं क्योंकि वे उनपर ही सवाल उठा रहे हैं.

रविवार, 9 नवंबर 2014

नये उपग्रह की खोज बनाम गोरक्षा

पश्चिमी वैज्ञानिकों ने अभी अभी एक नया ग्रह खोजा. उसी समय भारत के महान शिक्षाविद बाबा बत्रा कह रहे
हैं कि स्कूलों में गोसेवा और सूर्यस्नान पढ़ाया जाए. वे गुजरात में पढ़ाए भी जा रहे हैं. पोप फ्रांसिस ने विज्ञान की बिग बैंग थ्योरी और क्रमिक उद्विकास के सिद्धांत को स्वीकार किया. हमारे एक महा धर्मगुरु बााब रामदेव कह रहे हैं कि 'बच्चों को वैज्ञानिक सिद्धांतों की जगह पढ़ाया जाए कि हम सब ईश्वर की संतान हैं और गुुरुकुल परंपरा फिर से शुरू की जाए.' उनकी वैज्ञानिक खोजों की यात्रा अनवरत जारी है. डार्विन की किताब On the Origin of Species 1859 में ही छप गई थी, जिसने चर्च और धार्मिक मान्यताओं की धज्जियां उड़ाकर सारी अंध—आस्थाओं को ध्वस्त कर दिया था. अब उनका धर्म प्रगतिशीलता दिखाते हुए इतने लंबे धर्म और विज्ञान के संघर्ष के बाद उसको स्वीकृति दे रहा है. ठीक उसी समय भारत के धार्मिक लोग इस बात के लिए संघर्ष कर रहे हैं कि एक युवक और युवती सार्वजनिक तौर पर हाथ में हाथ डालकर चल कैसे सकते हैं? वे संघर्ष कर रहे हैं कि हिंदू और मुसलमान अगर प्रेम में भी हों, तो शादी कैसे कर सकते हैं? ठीक इसी समय गोहाना के स्कूलों में बच्चों से 20-20 रुपए लेकर उन्हें गोवंश रक्षा के लिए किताब बांटी गई है। बच्चों से कहा गया है कि सरकारी किताब आई है। और मजा देखिए, हमारे परधान सेवक जी एक साल से कहते फिर रहे हैं कि हमें विश्वगुरु बनना है.
मूर्खता की ​हद तक पहुंची अज्ञानता के बादल अभी छंटने हैं. कितने साल लगेंगे? सौ साल? या पांच सौ साल? अभी साधारण सी यह बात समझने में इन लोगों काफी देर है कि इतिहास वही है जिसके बारे में कुछ तथ्य हों. सारे मिथक, सारे गप्प अब इतिहास
बनाकर पेश किए जा रहे हैं. दुनिया आगे जा रही है लेकिन ये भाई लोग पीछे जा रहे हैं.
क्या कीजिएगा. घर में बैठिए, भाड़े चैनल सेट करके भाषण सुनिए, भाड़े के दर्शकों का मोदी..मोदी नारा सुनिए और अपना कपार पीटिए.


प्रधानमंत्री जी को एक पत्र

आदरणीय प्रधानमंत्री जी
आपके विरोधियों को पाकिस्तान भेजने वाले गिरिराज सिंह को आपने अपने मंत्रिमंडल में जगह दी है. ये वही गिरिराज सिंह हैं जिनके घर से चोरी करने वाले आरोपियों के पास से करोड़ों रुपये की नकदी व गहने मिले थे और इस पर उन्होंने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया था. आप लोकसभा चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के पहले से अबतक कांग्रेसमुक्त भारत की बात कहते रहे हैं. यह मुक्ति सिर्फ कांग्रेस पार्टी से लेनी थी, या कांग्रेस के अलोकतांत्रिक कुकृत्यों से भी? देशवासियों को तो आप वही सब अता कर रहे हैं जो कांग्रेस करती रही है. आपकी सरकार बनते ही आपने अपने मंत्रिमंडल में एक ऐसे मंत्री को जगह दी, जिनपर बलात्कार का आरोप था. आपके एक मंत्री जी की संपत्ति पांच महीने में अचानक दस करोड़ से ज्यादा बढ़कर दोगुनी हो गई. आपने इनपर कोई सफाई नहीं दी, न ही कोई कार्यवाही की.
यकीनन भ्रष्ट और अलोकतांत्रिक हो चुकी कांग्रेस पार्टी से जनता ने मुक्ति लेनी चाही और आपको मौका दिया लेकिन आपने कांग्रेस के कुछ नेताओं और उनकी सारी भ्रष्ट अलोकतांत्रिक प्रवृत्तियों को ज्यों का त्यों अपना लिया. आपने कभी यह संदेश नहीं दिया कि एक पार्टी के समर्थन में देश की कुछ प्रतिशत जनता होती है लेकिन प्रधानमंत्री पूरे देश का होता है. आपने एक गांव गोद लिया, मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि उस गांव में एक भी मुसलमान नहीं है और वह गांव पहले से आरएसएस का गढ़ है. अब आपने ऐसे व्यक्ति को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया जो विरोधियों को पाकिस्तान भेजना चाहता है और प्रथमदृष्टया भ्रष्ट गतिविधियों में लिप्त है. करीब सात दशक पहले आजाद हुए इस देश का संघर्ष एक लोकतांत्रिक, उदार और सेकुलर देश के लिए था. जबकि आपकी गतिविधियां ठीक प्रतिगामी हैं. जनता को नये युग में आगे बढ़ने की उम्मीद है, न कि पीछे जाने की. हम नागरिकों को अब भी आशा है कि इस देश के महान संघर्षों और विरासतों का आप सम्मान करेंगे.
आपका
एक नाचीज नागरिक

शनिवार, 31 मई 2014

अच्छे दिन

मित्रों! नई सरकार के आने पर अच्छे दिन आने थे. कहा जा रहा है कि अच्छे दिन आ गए हैं. आइए अच्छे दिनों की पड़ताल करें कि वे कैसे हैं, किसके लिए आए हैं? 

1. गुजरात में दो संवेदनशील फर्जी मुठभेड़ों के केस में सीबीआई के पब्लिक प्रॉसीक्यूटर बदल दिए गए हैं. सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति केस देख रहे सीबीआई के वकील ऐजाज खान और सादिक जमाल केस देख रहे आईएच सैयद को रिलीव कर दिया गया है. ऐजाज खान की जगह पीवी राजू पब्लिक प्रॉसीक्यूटर हांगे. सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति केस में अमित शाह पर आरोप हैं.


2. 2004 में हुए इशरत जहां मुठभेड़ मामले में अभियुक्त आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल को बहाल कर दिया गया है. इस पर मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त जूलियो एफ़ रिबेरियो की प्रतिक्रिया है कि 'ऐसा पहले नहीं होता था, कोई पुलिस अधिकारी अगर किसी आपराधिक मामले में अभियुक्त बनाया गया हो और जेल गया हो तो उसका निलंबन तब तक ख़त्म नहीं होता था जब तक अदालत से वह बरी न हो जाए. यह मैं नया चलन देख रहा हूँ. ऐसा तब तक नहीं हो सकता जब तक आप नियमों को बदल नहीं देते हैं. मुझे लगता है कि नियमों को बदल दिया गया है. यह सब कुछ नया है. मैंने पहले ऐसा नहीं सुना था. गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) कह रहे हैं कि ऐसा नियमों के अनुसार किया गया है. मुझे नहीं पता कि एसके नंदा किस नियम का हवाला दे रहे हैं. ये वही सिंघल हैं जिनके घर से सीबीआई को पेन ड्राइव मिली थी, जिसमें जिसमें 267 रिकॉर्डिंग थीं. एक रिकॉर्डिंग में राज्य के क़ानून अधिकारियों और मंत्रियों के बीच इशरत मामले की जाँच को बाधित करने की योजना बनाने की बात थी. एक रिकॉर्डिंग में कथित पूर्व गृह मंत्री अमित शाह और सिंघल के बीच 'साहेब' प्रकरण की बातचीत थी.

3. गुजरात दंगों, बेस्ट बेकरी, जाहिरा शेख कांड और फर्जी मुठभेड़ हत्याकांड मामलों में गुजरात सरकार को सफलतापूर्वक बचाने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील मुकुल रोहतगी नए अटॉर्नी जनरल बन गए हैं. रोहतगी 2जी घोटाले के मामले में कई कॉरपोरेट घरानों के भी वकील हैं. रोहतगी ही हैं जिन्होंने वरुण गांधी को उनके घृणास्पद भाषण मामले में बचाया था.4. 2007 में डीएलएफ को गांधीनगर के प्राइम लोकेशन में औने−पौने के भाव ज़मीन दी थी। राष्ट्रपति को शिकायत की गई कि गांधीनगर की इन्फोसिटी के पास करीब एक लाख वर्गमीटर जमीन डीएलएफ को दी गई। सरकार ने इसका दाम पांच हजार रुपये वर्गमीटर लगाया था जबकि उन दिनों इसका बाजार मूल्य तीस हजार रुपये वगर्मीटर था। रजिस्ट्री और स्टांप ड्यूटी के लिए तय सरकारी कीमत भी 19 हजार रुपये वर्गमीटर थी। इस मामले की जांच जस्टिस एमबी शाह ने की और राज्य सरकार को क्लीन चिट मिली. दिलचस्प है कि यह जमीन सेज़ के नाम पर दी गई थी, लेकिन बाद में डीएलएफ के कहने पर राज्य सरकार ने वहां आईटी पार्क बनाने की इजाजत दे दी। वे जस्टिस शाह अब काले धन के लिए बनी एसआईटी के प्रमुख हैं.
इन सूचनाओं का स्रोत टाइम्स आफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, एनडीटीवी और बीबीसी है. मैं कोई जांच एजेंसी नहीं हूं. कोई अथॉरिटी भी नहीं हूं. यह कोई आरोप नहीं हैं, बस आशंकाएं और जिज्ञासाएं हैं. हो सकता है कि उक्त सभी फैसलों और प्रक्रियाओं में कानूनी तौर पर कोई समस्या न हो, लेकिन लिखित कानूनों के अलावा एक नैतिक कानून भी होता है, जो अलिखित होता है. जिसका पालन अपेक्षित होता है. खासकर तब, जब आप अपने को बेहद ईमानदार, देशभक्त और पारदर्शी कह रहे हों. हर जगह अपने वफादारों या करीबियों की नियुक्ति और उन्हें बचाने की पहल को क्या कहा जाएगा?

शनिवार, 22 मार्च 2014

जय धनतंत्र

संसद में गूलर का फूल पाया जाता है. वहां पहुंचने के बाद लोगों की संपत्तियां बेतहाशा बढ़ती हैं. वर्तमान लोकसभा में 157 सांसद ऐसे हैं जो 2004 में भी सांसद चुने गए थे. इनमें से 145 ऐसे हैं जिनकी संपत्ति पांच सालों में बेतहाशा बढ़ी. 16 मौजूदा सांसद ऐसे हैं जिनकी सं​पत्ति में 500 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़त हुई. 77 सांसद ऐसे हैं जिनकी दौलत सौ प्रतिशत तक बढ़ी. 
कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के पास 2004 में 12.12 करोड़ रुपये थे. अब 131 करोड़ हैं. कांग्रेसी सांसद लगड़ापति राजगोपाल के पास 2004 में 9.91 करोड़ थे, अब 122 करोड़ हैं. पल्लम राजू के पास तब 1.2 करोड़ की दौलत थी, अब 6.55 करोड़ है. कांग्रेसी सांसद भारत सिंह सोलंकी के पास 04 में 9 लाख रुपये थे, अब 3.9 करोड़ हैं. 
भाजपा सांसद उदय सिंह के पास 04 में 3.6 करोड़ की दौलत थी, अब 41 करोड़ है. सचिन पायलट के पास 25 लाख थी, अब 4.64 करोड़ है. कांग्रेसी सांसद मेकापति राजमोहन रेड्डी के पास तब 5.52 करोड़ की दौलत थी, अब 36.34 करोड़ है. 
संदीप दीक्षित की संपत्ति 2009 के आम चुनाव में 1.8 करोड़ थी. अब बढ़कर 7.3 करोड़ हो गई है. कपिल सिब्बल की संपत्ति में तीन साल में तीन गुना इजाफा हुआ. 2011 में सिब्बल की संपत्ति 38 करोड़ थी जो कि अब 114 करोड़ रुपये हो गई है। मीरा कुमार की सं​पत्ति छह साल में तीन गुना बढ़ी. 2009 में उनकी संपत्ति 10 करोड़ रुपए थी जो अब 36.49 करोड़ रुपए हो गई है।
इस चुनाव में पिछले चुनावों से ज्यादा करोड़पति—अरबपति होंगे. दिल्ली में कांग्रेस के सात में से पांच उम्मीदवार करोड़पति हैं. दिल्ली में भाजपा की मीनाक्षी लेखी, हर्षवर्धन, प्रवेश वर्मा भी करोड़पति हैं. सबसे गौरतलब हैं बेंगलुरु दक्षिण लोकसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार नंदन नीलेकणि. उनकी कुल संपत्ति 7700 करोड़ है। आम आदमी के नाम पर बनी पार्टी भी खास हो चुकी है. इसके उम्मीदवारों में राजमोहन गांधी, देवेंद्र सहरावत, शाजिया इल्मी करोड़पति हैं. 
अभी जैसे जैसे नामांकन होगा, और भी पूंजीपति सामने आएंगे. सवाल यह है कि हमारी विधायिका आज किसका प्रतिनिधित्व करती है? जिस अनुपात में संसद में पूंजीपति भरे हैं, क्या जनता भी उसी अनुपास समृद्ध है? यह धन कैसे बहता है? कहां से आता है? कैसे कुछ लोगों के पास इकट्ठा होता जाता है? 

बुधवार, 19 मार्च 2014

मां धड़क रही है सीने में

नींद का एक सिलसिला था जो टूटा है अभी 
कोई सदियों का सफर करके लौट आया है
था तो सपना ही मगर, सच से कुछ ज्यादा सच था
ऐसा सपना भी बहुत रोज बाद आया है
देखता हूं कि कोई रात है, सियाह रात 
और मैं थक के यूं बेफिक्र सो गया हूं कहीं 
बिना बिस्तर, बिना तकिए के, बिना चादर के


घर के सब काम, कुछ वजह के, बिना वजहा के 
सारे निपटा के मुझे खोजते मां आ पहुंची 
ऐसे सोया हुआ देखा तो बस तड़प उट्ठी 
सर पे रखके हथेली, हौले से हिला के कहा 
अरे उठो तो सही ऐसे क्यूं पड़े हो यहां 
आज वो सब तो बनाया है, जो पसंद तुम्हें
रोटियां बाजरे की घी में डुबाई है खूब
चने की दाल क्या जतन से बनाई है खूब 
उठो चलो कि आज साथ मेरे खाओगे न? 

पकड़ के हाथ मैंने पास मां को खींच लिया
बेझिझक पास आ गई तो कस के भींच लिया—
पहले इक बात सुनो, बाद में खिला देना
बस जरा देर को आंचल उतान दो मुंह पर 
जरा—सा आज बचपने में लौटना है मुझे 
ऐसा लगता है कि सोया नहीं हूं बरसों से 
लिपट के आज तेरे सीने से सोना है मुझे 

गाल पे नर्म सा एहसास मां के हाथों का 
और मैं कांप गया,रूह तक सिहर—सा गया
आह! जैसे जहां उस गोद में ठहर—सा गया
कोई खटका—सा हुआ नींद मुई टूट गई
ओफ्फ! ये सख्त घड़ी, जैसे कि मां रूठ गई
फिर भी लगता है मां धड़क रही है सीने में 
सच में गर रूठ जाए, क्या धरा है जीने में 
आंख के कोर से कुछ बूंद ढलक आई है
मैं छत के पार जाने क्या, तलाशता हूं किसे...

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...