नींद का एक सिलसिला था जो टूटा है अभी
कोई सदियों का सफर करके लौट आया है
था तो सपना ही मगर, सच से कुछ ज्यादा सच था
ऐसा सपना भी बहुत रोज बाद आया है
देखता हूं कि कोई रात है, सियाह रात
और मैं थक के यूं बेफिक्र सो गया हूं कहीं
बिना बिस्तर, बिना तकिए के, बिना चादर के
घर के सब काम, कुछ वजह के, बिना वजहा के
सारे निपटा के मुझे खोजते मां आ पहुंची
ऐसे सोया हुआ देखा तो बस तड़प उट्ठी
सर पे रखके हथेली, हौले से हिला के कहा
अरे उठो तो सही ऐसे क्यूं पड़े हो यहां
आज वो सब तो बनाया है, जो पसंद तुम्हें
रोटियां बाजरे की घी में डुबाई है खूब
चने की दाल क्या जतन से बनाई है खूब
उठो चलो कि आज साथ मेरे खाओगे न?
पकड़ के हाथ मैंने पास मां को खींच लिया
बेझिझक पास आ गई तो कस के भींच लिया—
पहले इक बात सुनो, बाद में खिला देना
बस जरा देर को आंचल उतान दो मुंह पर
जरा—सा आज बचपने में लौटना है मुझे
ऐसा लगता है कि सोया नहीं हूं बरसों से
लिपट के आज तेरे सीने से सोना है मुझे
गाल पे नर्म सा एहसास मां के हाथों का
और मैं कांप गया,रूह तक सिहर—सा गया
आह! जैसे जहां उस गोद में ठहर—सा गया
कोई खटका—सा हुआ नींद मुई टूट गई
ओफ्फ! ये सख्त घड़ी, जैसे कि मां रूठ गई
फिर भी लगता है मां धड़क रही है सीने में
सच में गर रूठ जाए, क्या धरा है जीने में
आंख के कोर से कुछ बूंद ढलक आई है
मैं छत के पार जाने क्या, तलाशता हूं किसे...
कोई सदियों का सफर करके लौट आया है
था तो सपना ही मगर, सच से कुछ ज्यादा सच था
ऐसा सपना भी बहुत रोज बाद आया है
देखता हूं कि कोई रात है, सियाह रात
और मैं थक के यूं बेफिक्र सो गया हूं कहीं
बिना बिस्तर, बिना तकिए के, बिना चादर के
सारे निपटा के मुझे खोजते मां आ पहुंची
ऐसे सोया हुआ देखा तो बस तड़प उट्ठी
सर पे रखके हथेली, हौले से हिला के कहा
अरे उठो तो सही ऐसे क्यूं पड़े हो यहां
आज वो सब तो बनाया है, जो पसंद तुम्हें
रोटियां बाजरे की घी में डुबाई है खूब
चने की दाल क्या जतन से बनाई है खूब
उठो चलो कि आज साथ मेरे खाओगे न?
पकड़ के हाथ मैंने पास मां को खींच लिया
बेझिझक पास आ गई तो कस के भींच लिया—
पहले इक बात सुनो, बाद में खिला देना
बस जरा देर को आंचल उतान दो मुंह पर
जरा—सा आज बचपने में लौटना है मुझे
ऐसा लगता है कि सोया नहीं हूं बरसों से
लिपट के आज तेरे सीने से सोना है मुझे
गाल पे नर्म सा एहसास मां के हाथों का
और मैं कांप गया,रूह तक सिहर—सा गया
आह! जैसे जहां उस गोद में ठहर—सा गया
कोई खटका—सा हुआ नींद मुई टूट गई
ओफ्फ! ये सख्त घड़ी, जैसे कि मां रूठ गई
फिर भी लगता है मां धड़क रही है सीने में
सच में गर रूठ जाए, क्या धरा है जीने में
आंख के कोर से कुछ बूंद ढलक आई है
मैं छत के पार जाने क्या, तलाशता हूं किसे...
4 टिप्पणियां:
krishnakant, aapne sapne ko maa se jis tarah sajaya hai...bahut khoob...behad khoob..
krishankant, aapne jis tarah maa se sapney ko sajaya hai...bahut khoob..behad khoob...
krishankant, aapne jis tarah maa se sapney ko sajaya hai...bahut khoob..behad khoob...
achcha geet hai
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