बुधवार, 5 सितंबर 2018

हम सब नक्सल हैं

हमारे एक अजीज मित्र हैं. हिंदू परिवार से हैं तो संस्कार भी हिंदू हैं. बातचीत में 24 कैरेट के नहीं हैं लेकिन 24 कैरेट के तो गांधी भी नहीं थे. कोई अन्य महापुरुष भी नहीं. वे आस्तिक हैं. पूजा पाठ करते हैं. किसी पार्टी के नहीं हैं. लेकिन अपना पत्रकार धर्म निभाते हुए सरकार की आलोचना करते हैं तो कोई आकर उन्हें वामपंथी कह देता है.

यह मूर्खता की प्रचंड प्रतियोगिता का दौर है. सरकार या रूलिंग पार्टी का प्रवक्ता किसी अंबेडकरवादी को खुलकर माओवादी बोल सकता है. ऐसे अंबेडकरवादी को जिसने न सिर्फ माओवाद की, बल्कि हिंसा और संपूर्ण वाम विचारधारा की आलोचना में किताब लिखी हो.

यदि गरीब, आदिवासी, वंचित, दलित और हाशिए के लोगों की आवाज को उठाने वाला वामपंथी है, इस न्याय से हमारे संविधान को भी वामपंथी अथवा नक्सल कहना होगा. हमारा संविधान ​आदिवासियों, गरीबों, दलितों, पिछड़ों और वंचितों के प्रति झुका हुआ है, तो क्या वह नक्सली दस्तावेज है? जब भी जनता की बात आएगी तो वह बात सरकार के विरोध में ही होगी. तो क्या सरकार का विरोध अथवा आलोचना नक्सलवाद, देशद्रोह अथवा आतंकवाद है? यह तो अंग्रेजी शासन की परिभाषा हुई कि जो भी सरकार के विरोध में है, सब आतंकवादी हैं. अंग्रेजों की इसी क्रूरता और अलोकतांत्रिकता के खिलाफ तो आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी. क्या हम 70 साल पीछे लौट आए हैं?

क्या कांग्रेस और भाजपा होना एक ही चीज है? क्या नाथूराम गोडसे होना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होना एक ही बात है? क्या वामपंथ और नक्सल एक ही चीज है? क्या सामाजिक कार्यकर्ता होना, मानवाधिकार कार्यकर्ता होना, दलित अधिकार कार्यकर्ता होना और देशद्रोही होना सब एक ही चीज है? क्या हम सिर्फ काला या सिर्फ सफेद ही देख पाते हैं?

जिस यलगार परिषद की रैली को नक्सली आयोजन कहा जा रहा है, उसे आयोजित करने वालों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस पीबी सावंत और हाईकोर्ट के पूर्व  जस्टिस कोलसे पाटिल भी थे. क्या हम अपने टॉप न्यायाधीशों को भी नक्सल ठहराएंगे?

इससे पहले अरुंधति राय को यूपीए के समय मुकदमा झेलना पड़ा था. विनायक सेन तो बाकायदा गिरफ्तार हुए और अदालत ने उनको ससम्मान बरी किया. छत्तीसगढ़ में तमाम पत्रकारों को नक्सल समर्थक बताकर प्र​ताड़ित किया जाता रहा है. भाजपा सरकार ने एक कदम और आगे जाते हुए अब सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को थोक में नक्सल कहना शुरू किया है. इस सिलसिले में कई गिरफ्तारियां भी हुई हैं.

पूर्व वायुसेना प्रमुख एल रामदास ने भी इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखकर इन गिरफ्तारियों पर चिंता जताई है कि यह हमें सिखाए गए मूल्यों के खिलाफ है. असह​मति ही लोकतंत्र है. राज्य को उसे कुचलना नहीं चाहिए.

पूर्व न्यायाधीश पीबी सावंत ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की इन गिरफ़्तारियों को "राज्य का आतंक" और "भयानक आपातकाल" बताया है. बीबीसी से उन्होंने कहा, "आज जो हो रहा है वो स्टेट टेररिज़्म है. आप विपक्ष और आलोचकों की आवाज़ कैसे दबा सकते हैं. सरकार के विरोध में अपनी बात रखना सबका अधिकार है. अगर मुझे लगता है कि ये सरकार आम लोगों की ज़रूरतों को पूरा नहीं करती तो सरकार की आलोचना करना मेरा अधिकार है, अगर तब मैं नक्सल बन जाता हूं तो मैं नक्सल हूँ... "ग़रीबों के पक्ष में और सरकार के विरोध में लिखना आपको नक्सल नहीं बना देता. ग़रीबों के पक्ष में लिखने पर गिरफ़्तारी संविधान और संवैधानिक अधिकारों की अवहेलना है."

हमें विरोधी के विचारों को सुनने और सहने की आदत विकसित करनी है, वरना हम जाने अनजाने उस देश का नुकसान करेंगे, जिसका आजकल कुछ ज्यादा ही नारा लगाया जा रहा है. वरना तो आज तमाम ऐसे लोग भी सरकार और पार्टी की किसी नीति के विरोध में हैं जो उसे वोट दे चुके हैं. तो क्या वे भी नक्सल हैं. इस तरह से तो पूरा देश नक्सल हो जाएगा, क्योंकि हर व्यक्ति किसी न किसी चीज से असहमत होता है. हर नागरिक सरकार या पार्टियों की आलोचना करता है. अगर यह पैमाना सेट किया जाएगा तो फिर कहना होगा कि हम सब नक्सल हैं. 

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