सोमवार, 4 अप्रैल 2011

उदास रातों में 
अक्सर ही उदास रातों में 
जी करता है 
तुमसे दो एक बात करूँ 
तुम्हारी शान में झुक कर 
मांगू पनाह
सजदे करूँ
बच्चे सा छुप-छुप जाऊं
कभी तुम्हारे आँचल में
किलकारियां भरूं
फूलों सा खिल-खिल जाऊं
कभी तुम्हारे दामन में
तमाम रात देखूं तुम्हे
भर-भर निगाह
और देखता रहूँ
अक्सर ही उदास रातों में....

1 टिप्पणी:

विकास शर्मा ने कहा…

भाई बहुत अच्छा लिखा है शानदार .. लगे रहो..

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