गुरुवार, 17 सितंबर 2015

मीडिया और भारतीय मानस की संवेदनाएं

शीना बोरा मर्डर केस में मीडिया ने करीब पखवाड़ा भर खबर चलाई. लेकिन अच्छे दिनों की लहर में कितने हजार किसान मरे, इस पर मीडिया ने कोई चर्चा प्रसारित की, न कोई रिपोर्ट दिखाई. जब यह साल पूरा हो जाएगा तो सरकार आंकड़े जारी कर देगी कि इस साल इतने किसानों ने आत्महत्या कर ली. उसके बाद मामला खत्म हो जाएगा और क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो अगले साल के लिए आंकड़े जुटाएगा.
एक शीना बोरा, एक इंद्राणी मखुर्जी और सवा तीन लाख किसानों की आत्महत्या में आपकी हमारी दिलचस्पी से ही हमारा चरित्र तय होता है. हम हत्याओं से विचलित नहीं होते. हम प्यार, सेक्स और धोखा की कहानियों में मगन रहते हैं. इसलिए एक शीना बोरा एक महीने तक खबर बनती है लेकिन सवा तीन लाख किसानों की सरकारी हत्या पर एक दिन भी हंगामा नहीं होता. देश के नेतृत्व का चरित्र हमारा चरित्र है. उसे देखिए गौर से. हम सब सामूहिक रूप बिल्कुल वैसे ही हैं.
शीना बोहरा या इंद्राणी मामले से तीन लाख किसानों की आत्महत्या की तुलना कीजिए. सोचिए, अगर 20 साल में सवा तीन लाख किसानों की जगह सवा तीन लाख अमीर लोग मर जाएं तो क्या होगा? टेलीविजन पर आपने किसानों की आत्महत्या पर कितने दिन खबरें देखीं? शीना इंद्राणी पर? इन दोनों मसलों पर अखबारों के भी कवरेज देखिए.
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में हर महीने औसतन 69 किसान खुदकुशी कर रहे हैं. इस प्रदेश में इस साल जनवरी से मार्च तक 601 किसान आत्महत्या कर चुके थे. एक तिमाही में 601 तो तीन तिमाही में 1800. पूरे देश में यह आंकड़ा 3000 के पार होगा. यह अभी अनुमान है. आंकड़े अगली साल सरकार जारी करेगी. 2014 में देश में 5650 किसानों ने आत्महत्या की थी. एक साल में किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा 20 प्रतिशत तक बढ़ा है. इस पर हमने कितना शोर सुना?
सोचिए, अगर 20 साल में सवा तीन लाख किसानों की जगह अमीर लोग मर जाएं तो क्या होगा? देश में गृहयुद्ध जैसी हालत हो जाएगी? हंगामा मच जाएगा. सरकार गिरने की नौबत आ जाएगी. मतलब यह देश सिर्फ अमीरों का है. मरना किसी को नहीं चाहिए. न अमीर को न गरीब को. लेकिन दोनों के मरने पर हम अलग अलग अनुपात में दुखी होते हैं. हमारी संवेदनाएं भी अमीरीपरस्त हैं.
सीरिया के एक बच्चे की लाश देखकर हम सब द्रवित हो गए. गुस्से में आ गए. क्योंकि उसकी फोटो इंटरनेट पर मिल गई. ब्रिटिश मेडिकल जर्नल 'द लैंसेट' के मुताबिक, 2015 में भारत में पांच साल की उम्र पूरी करने से पहले 12 लाख बच्चों की मौत हो चुकी है. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े कहते हैं कि भारत में हर साल कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र वाले दस लाख बच्चे मर जाते हैं. यानी करीब साढ़े सत्ताइस सौ रोज. बच्चों की मौत के मामले में भारत पूरी दुनिया में सबसे ऊपर है. आप जानते ही हैं कि भारत आज ही कल में विश्वगुरु बनने वाला है और एक एक जोड़ा दस दस बच्चा पैदा करेगा.
अपने देश में गरीबी और तंगहाली के चलते जिन सवा तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की, उन सबके परिवार थे. अपने परिवार का पेट नहीं पाल सकने के अपराधबोध में उन्होंने आत्महत्या की. वे परिवार और भी बर्बाद हुए. अगर हम सब उनके लिए भी दुखी हुए होते तो किसानों की आत्महत्या के मामले में बढ़ोत्तरी नहीं होती! शायद आप सबकी संवेदना और गुस्से का ख्याल करके सरकारें कुछ करतीं.
इंटरनेट पर वायरल हुई तस्वीर देखकर जो आंसू बहते हैं, वे फैशनेबल आंसू हैं. वरना 20 करोड़ भूखे और हर साल दस—बारह लाख बच्चों की मौत पर हम आप इतने गुस्सा होते और इतना चीखते कि सरकारों के कान के परदे फट जाते.

क्या हम हिंदू तालिबान बनेंगे?

प्रसिद्ध तर्कवादी और कन्नड़ साहित्यकार एमएम कलबुर्गी की हत्या कर दी गई. साहित्य अकादमी प्राप्त 77 वर्षीय कलबुर्गी हम्पी विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके थे. वे धार्मिक कुरीतियों, अंधविश्वासों और सामाजिक अन्याय के आलोचक थे. उनके लेखों और बयानों पर पिछले महीनों कुछ विवाद भी हुए थे. यह हत्या धार्मिंक अंधविश्वास पर अभियान चलाने वाले नरेंद्र दभोलकर और गोविंद पानसरे की हत्याओं की अगली कड़ी है. हाल ही में हिंदू अतिवादियों के हमलों से परेशान होकर तमिल साहित्यकार पेरुमल मुरुगन ने अपनी मौत की घोषणा की थी कि 'लेखक पेरुमल मुरुगन आज से मर गया'.
M M Kalburgi 
तीन प्रसिद्ध तर्कवादी विद्वानों की इन हत्याओं से कुछ गंभीर सवाल खड़े हुए हैं. हाल में ऐसे ही चार मामले बांग्लादेश में सामने आए हैं. वहां पर नास्तिक धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में लिखने वाले चार ब्लॉगरों की अतिवादियों ने हत्या कर दी. ठीक उसी तर्ज पर भारत में तीन लेखकों की हत्या की गई. क्या भारतीय लोकतंत्र पाकिस्तान और बांग्लादेश की राह पर है? क्या अब सही—गलत कहने के लिए साहित्यकारों की हत्याएं की जाएंगी? क्या हिंदुस्तान एक उदार, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र नहीं रह गया है जहां पर तमाम विरोधी विचार एक साथ मौजूद रह सकते हैं? क्या आप मुझसे या मेरे विचारों से असहमत हैं तो मुझे आपकी हत्या कर देनी चाहिए? क्या हम हिंदू तालिबान बनने की राह पर हैं जहां पर धार्मिक कुरीतियों और बुराइयों की आलोचना करने पर हमारा सर कलम कर दिया जाएगा? क्या यह सब एक स्वस्थ समाज के लिए बेहद भयावह नहीं है?

Govind Pansare
आस्था यदि राजनीतिक उन्माद में तब्दील हो जाए तो वह अतार्किक, हिंसक और क्रूर हो जाती है. तर्क हर हाल में अहिंसक, मानवीय और सौम्य हैं. नरेंद्र दभोलकर, गोविंद पानसरे, पेरुमल मुरुगन और एमएम कलबुर्गी जैसे विद्वानों ने किसी की हत्या नहीं की, किसी पर हमला नहीं किया. उन्होंने अंधविश्वास और धार्मिक कुरीतियों पर प्रहार किया. इससे कुछ अतिवादी बौखला उठे. उन्होंने साल भर के भीतर तीन लेखकों की हत्या कर दी. जिस देश में छह धर्मदर्शनों में चार किसी न किसी रूप में नास्तिक हैं, जिस देश में कभी एक साथ शंकराचार्य और चावार्क हो सकते थे, वह देश अपने ही विद्वानों के तर्कवादी होने पर उनकी हत्याएं करते हुए विश्वगुरु बनने के सपने देख रहा है. बन क्या रहा है? इस असहिष्णु बर्बरता के साथ हम कहां पहुंचेंगे, जहां असहमत होने पर हत्या कर दी जाती हो?

Narendra Dabholkar
इससे भी ज्यादा स्तब्ध कर देने वाला बजरंग दल के बंटवाल सेल के सह—संयोजक भुवित सेट्टी का ट्वीट रहा. उन्होंने कलबुर्गी की हत्या के बाद ट्वीट किया, 'तब यूआर अनंतमूर्ति थे और अब कलबुर्गी। हिंदुत्व का मजाक उड़ाओगे तो कुत्तों की मौत मरोगे। डियर, के.एस. भगवान, अगला नंबर आपका है।' के.एस भगवान भी कलबुर्गी की तरह रिटायर्ड प्रफेसर हैं. उनकी इस ट्वीट से कई सवाल उठते हैं. भुवित जिस तरह कलबुर्गी की हत्या का स्वागत कर रहे हैं और दूसरे प्रोफेसर को धमका रहे हैं, क्या इस हत्या में बजरंग दल की कोई भूमिका है? क्या जिस लेखक को वे धमका रहे हैं उन्हें भी मार दिया जाएगा? क्या हम हिंदू तालिबान बनने की राह पर हैं? क्या हमारे देश में धार्मिक आलोचनाओं पर खुलेआम धमकी और हत्याएं होंगी? अगला नंबर किसका होगा? आपका या मेरा?

अच्छे दिनों में किसान

तेलंगाना के एक किसान ने बीते नौ सितंबर को हैदराबाद जाकर फांसी लगा ली. मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के गृहनगर मेडक में ही कुल 34 किसानों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए जा चुके हैं. इनमें से पांच तेलंगाना के बनने के बाद हुईं हैं.
महाराष्ट्र के सिर्फ मराठवाड़ा क्षेत्र में इस साल 628 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. बीते अगस्त में ही यहां फसल बर्बादी के चलते 105 किसानों ने आत्महत्या कर ली. विदर्भ में किसान आत्महत्याओं की दर मराठवाड़ा से भी ज्यादा है. मराठवाड़ा में 2014 में 574 किसानों ने आत्महत्या की थी. यह वही महाराष्ट्र है जहां के नेता शरद पवार दस साल से ज्यादा कृषि मंत्री रहे और अब मोदी जी उनके सपनों का कृषि विज्ञान केंद्र बनवा रहे हैं. फरवरी में बारामती में बने इस केंद्र का उद्घादन प्रधानमंत्री मोदी ने किया था. पवार और मोदी ने एक—दूसरे को किसानों का हितैषी बताया था, लेकिन ताबड़तोड़ किसान आत्महत्याओं पर दोनों ने कुछ नहीं कहा था. चुनाव प्रचार में मोदी के लिए एनसीपी ‘स्वाभाविक रूप से भ्रष्ट पार्टी’ थी. बाद में उन्होंने कहा कि 'कोई ऐसा दिन नहीं है जब मेरी और पवार की फोन पर बात न होती हो. हम दोनों के हित एक हैं.'
विदर्भ और मराठवाड़ा में सूखे की जबरदस्त स्थिति है. केंद्र सरकार वहां पर मनोचिकित्सा केंद्र खोलने जा रही है. जैसे एक केंद्रीय मंत्री कह रहे थे कि किसान प्रेम प्रसंगों में असफल होकर आत्महत्याएं कर रहे हैं, उसी तरह सरकार भी मान रही है कि आर्थिक तंगी से मरने वाले किसान मेंटल हो गए हैं. इसलिए वह मनोचिकित्सालय खोलेगी.
सहारनपुर में गन्ने का बकाया मांगने के लिए प्रदर्शन कर रहे किसानों पर लाठी चार्ज की गई. कई किसानों को चोट आई. किसानों के कुछ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. यूपी में हमीरपुर के मझगवां में फसल सूख जाने के कारण एक किसान ने पांच सितंबर को फांसी लगा ली थी.
पिछले 19 सालों में सवा तीन लाख से अधिक किसान देश में आत्महत्या कर चुके हैं. आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक साल में किसानों की आत्महत्याओं की दर में 20 प्रतिशत वृद्धि हुई है.
तेलंगाना के मेडक जिले का एक गांव है रयावरम. सात साल का वम्शी इसी गांव के स्कूल में पढ़ता है. उस दिन वम्शी के पिता अचानक स्कूल आये थे. बेटे को कक्षा से बुलाकर स्कूल के पास की एक चाय की दुकान पर ले गये. उसे बन खिलाया. चाय पिलायी. पांच रुपये दिये और मन लगाकर पढ़ने की सलाह दी. सात साल का वम्शी पिता के व्यवहार को समझ नहीं पा रहा था. पर उसे अच्छा लगा था कि पिता ने बन खिलाया. फिर पिता ने बेटे के सिर पर दुलार से हाथ रखकर कहा था, ‘कभी किसान मत बनना.’ वम्शी इस बात को भी समझ नहीं पाया. फिर वम्शी के किसान पिता उसे स्कूल में छोड़कर चले गये. फिर कभी नहीं लौटे. उन्होंने आत्महत्या कर ली थी.
किसान बच्चों के पिता मरने से पहले कह रहे हैं, ‘कभी किसान मत बनना.’ भविष्य में कोई वम्शी किसान नहीं बनेगा. मॉनसून सत्र के दौरान मोदी सरकार ने सदन में बताया था कि 2014 में देश में 5650 किसानों ने आत्महत्या की है. मोदी सरकार के सत्ता में आने के एक साल के भीतर अडाणी की संपत्ति 48 प्रतिशत बढ़ गई. पिछले एक साल में किसान आत्महत्याओं की दर 20 प्रतिशत बढ़ी.
यानी किसान मरेंगे. उद्योगपति फलेंगे—फूलेंगे. अनाज उगाने वाले मरेंगे. खेती छोड़ेंगे. तब अडानी अंबानी मिलकर कार और मोटर बनाएंगे. मशीन बनाएंगे. हम सारे देशवासी मिलकर कार, मोटर और मशीन खाएंगे.

प्रधानमंत्री के नाम खुला खत

आदरणीय प्रधानमंत्री जी
नमस्कार!
कुछ दिन से बहुत परेशान हूं. दिमाग की नसें फटने लगी हैं. चुनाव से पहले आप कहते थे कि अच्छे दिन आने वाले हैं, लेकिन जबसे मैंने होश संभाला है, ऐसे दुर्दिन पहली बार देख रहा हूं. मुझे बहुत डर लगता है. आप कहेंगे क्यों? हाल में तीन बड़े लेखकों की हत्या कर दी गई. अभी अभी कन्नड़ लेखक कलबर्गी की हत्या के बाद केएस भगवान को दो बार धमकी मिली. अब ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त भालचंद नेमाडे को भी जान से मारने की धमकी मिली है. आपने जिस विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन किया, उसमें पूंजीपति थे, हमारे प्रतिष्ठित साहित्यकार नहीं थे लेकिन यह कोई मसला नहीं. हैरत यह है कि आप लगातार इन हत्याओं और धमकियों पर चुप हैं, आपकी सरकार भी, पार्टी भी और आपका संरक्षक संगठन आरएसएस भी. क्या अब हम आइएसआइएस के दौर में पहुंचेंगे? हत्याएं, खून—खराबा आदि तो पहले भी होता रहा है लेकिन इतना भयावह समय नहीं था कि बड़े बड़े लेखकों को सरेआम धमकी देकर मारा जाए. हमारी पीढ़ी जिस भारत में पैदा हुई, वह इतना भयावह नहीं था.
दूसरी डराने वाली बात तो सनातन है. आपके विकास के दावे की बात पीछे छूट गई है. अब पूरे देश में सिर्फ हिंदू—मुस्लिम, गाय—सुअर, मुर्गा—मुर्गी, बकरा—बकरी हो रहा है. कोई क्या खाएगा, यह कोई सरकार कैसे तय करेगी? सरकारें लोगों के किचन और बिस्तर में क्यों घुसना चाहती हैं? आपकी पार्टी के संतों का मन हरदम बच्चा पैदा करने में अटका रहता है. वे विकृति के शिकार हो गए हैं. यह और डरावना है. उनका इलाज कराने के साथ उनको यह समझाने की जरूरत है कि अगर 10—12 बच्चा पैदा करने वाली प्रजाति ताकतवर होती तो एक बार में 12 बच्चे देने वाला सुअर इस धरती का सबसे ताकतवर जानवर होता.
इन सबको अपनी सरकार के आंकड़े दिखाइए कि हर साल 10—12 लाख बच्चे डायरिया, निमोनिया और कुपोषण से मर जाते हैं और 20 करोड़ लोग रोजाना भूखे सोते हैं. उन सबका पेट भर गया तो देश अपने आप ताकतवर हो जाएगा.
तीसरी डराने वाली बात आपके चंडीगढ़ दौरे से जुड़ी है. आप पूरे देश में दौरे करते हैं, पर चंडीगढ़ में आपातकाल जैसी हालत क्यों हो गई? क्या चंडीगढ़ के श्मशानों और स्कूलों से भी आपको खतरा था? वहां पर इतने सारे लोगों को नजरबंद क्यों किया गया? लोगों को इस तरह नजरबंद करने की घटनाएं आपातकाल में हुई थीं, जिसकी कहानी आपकी पार्टी के पितृपुरुष आडवाणी जी अक्सर सुनाया करते हैं. किसी 77 साल के बूढ़े से आपको क्या खतरा उत्पन्न हो गया कि उसे रात को 11.30 बजे उनके घर से उठा लिया गया?
आपको बताना चाहता हूं कि मैंने आपको वोट नहीं दिया था, लेकिन आपसे यह सब कह रहा हूं क्योंकि इस लोकतंत्र के बारे में यह जानता हूं कि जनप्रतिनिधि समग्र जनता का होता है. आप उनकी भी सुरक्षा करें, जो आपकी पार्टी से नहीं हैं, जो आपकी विचारधारा से भिन्न विचार रखते हैं या जिनका खानपान आपसे भिन्न है. हमारे लेखक हमारी विरासत हैं. उन सबको मार दिया जाए तो पटेल या विवेकानंद की आसमान से ऊंची मूर्ति बनवाने का भी कोई लाभ नहीं होगा.
सोच रहा हूं क्या—क्या गिनाऊं. पूरे देश से एक ही दिन में इतनी सारी डरावनी खबरें आती हैं कि रोजनामचा बने तो हर दिन एक महाभारत लिख जाए. आप कहते थे कि आप भारत को आगे ले जाएंगे. यह तेजी से पीछे जा रहा है. हर दिन पिछले दिन से बुरा गुजरता है. महंगाई, बेरोजगारी जाने दीजिए, पहले देश जैसा था, इसे वैसा बने रहने देना ज्यादा जरूरी है. देश का ऐसा विकास न कीजिए जिसमें सब खान—पान की आदतों और आचार—विचार पर लड़ मरें. आप अपने भाषणों में इस देश से जितना प्यार जताते हैं, उसका एक टुकड़ा इस देश की जनता को दे दीजिए तो सब अपने—अपने तरीके से जी लेंगे. हो सके तो इस धरती को जीने लायक बनी रहने दीजिए. देश आपका बहुत शुक्रगुजार रहेगा.
आपका
एक नाचीज नागरिक

मंगलवार, 9 जून 2015

अपराधमुक्त संसद का सपना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान जगह—जगह अपनी सभाओं में वादा किया था कि वे संसद को अपराध मुक्त बनाएंगे. हमारे देश की संसद आपराधिक गतिविधियों में लिप्त नेताओं से मुक्त हो, यह लोकतंत्र के लिहाज से एक सुंदर सपना था, जिसे उन्होंने पूरा करने का भरोसा दिलाया था, लेकिन सरकार बनने के बाद स्थिति एकदम उलट ठहरी. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के अनुसार, मौजूदा केंद्रीय मंत्रिमंडल में दागी सांसदों की संख्या बीते दो दशकों में दोगुनी से ज्यादा हो गई है. मंत्रिमंडल में 66 सदस्य हैं जिनमें से करीब 31 फीसदी मंत्रियों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं. संसद को दागियों से मुक्त करने का वादा करने वाले प्रधानमंत्री की कैबिनेट में ही करीब एक तिहाई अपराधी हैं. कुल 20 मंत्रियों ने अपने हलफनामों में स्वीकार किया है कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. 17 फीसदी यानी 11 मंत्रियों पर गंभीर अपराध के आरोप हैं। यह मामले हत्या की कोशिश, राज्य के खिलाफ युद्ध, आपराधिक धमकी और धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोपों से जुड़े हैं. इस तरह मोदी कैबिनेट ने दागियों की संख्या के मामले में यूपीए सरकार को पीछे छोड़ दिया है.
मोदी कैबिनेट में कम से कम पांच मंत्रियों के खिलाफ बलात्कार और सांप्रदायिक हिंसा जैसे गंभीर मामले पेंडिंग हैं. मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री डा. रामशंकर कठेरिया पर 23 आपराधिक मामले हैं. एडीआर का कहना है कि वे 21 मामलों में नामजद हैं. कठेरिया फर्जी मार्कशीट लगाकर प्रोफेसर बन जाने को लेकर चर्चा में रहे. उनके मंत्री बनते ही तमाम आलोचना होने के बाद भी मोदी सरकार की ओर से उनके अपराधी होने की बात को नकार दिया गया. इसी तरह नए रसायन और उर्वरक राज्य मंत्री हंसराज अहिर पर 20 से ज्यादा मामले चल रहे हैं, जिनमें राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने, धमकाने और विद्रोह को उकसाने जैसे गंभीर मामले भी हैं. 
मोदी के विरोधियों को पाकिस्तान भेजने वाले गिरिराज सिंह पर चुनाव के दौरान धांधली का मामला चल रहा है. बाकी उनके घर से चोरों की मार्फत सामने आए डेढ़ करोड़ का अब तक कोई हिसाब नहीं मिल पाया है कि वह काला था या सफेद. गंगा की सफाई की जिम्मेदारी निभाने में लगी केंद्रीय मंत्री उमा भारती 13 मामलों में आरोपी हैं जिनमें से हत्या के प्रयास समेत सात गंभीर अपराध के आरोप हैं. नितिन गडकरी पर चार और उपेंद्र कुशवाहा पर अपराध के चार मामले चल रहे हैं। विज्ञान एवं प्रद्योगिकी मंत्री वाईएस चौधरी पर बैंक में कई देनदारियां बाकी हैं. चौधरी की कंपनी सुजाता टावर्स लिमिटेड का एक बैंक का एनपीए 317 करोड़ 61 लाख रुपए है। वैसे बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ भी फर्जी एनकाउंटर का केस चल रहा है और वे एक बार गिरफ्तार भी किए जा चुके हैं. 
अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने दागी सांसदों, विधायकों को कैबिनेट में शामिल करने का फैसला प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के विवेक पर छोड़ते हुए कहा था कि पीएम और सीएम को दागियों को केबिनेट में नहीं रखना चाहिए।
संसद को दागीमुक्त बनाने की बात छोड़िए, यह हाल केंद्रीय मंत्रिमंडल का है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस मसले पर कहा कि मंत्रिमंडल में कोई अपराधी नहीं है. 'ये मामले आरोप आधारित हैं, अपराध आधारित नहीं.' उन्होंने इन सभी मामलों को राजनीति से प्रेरित बताया. याद कीजिए, दागियों के मसले पर यही तर्क कांग्रेस के भी थे. हम मान सकते हैं कि नेताओं पर ऐसे मामले राजनीतिक विरोधियों की ओर से दुर्भावनावश दर्ज कराए जाते हैं, लेकिन आंकड़ों के उलट हम अपने सांसदों या विधायकों का सार्वजनिक जीवन, उनकी छवि, उनकी दबंगई आदि के साक्षी बनते हैं. हम अपने क्षेत्र के सांसद या विधायक का जिस रूप में दिन—ब—दिन सामना करते हैं, वह किसी राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित नहीं है. यह तथ्य है कि राजनीति में आने के लिए आदमी का संगीन किस्म का अपराधी होना जरूरी है. 
मंत्रिमंडल के पहले विस्तार के बाद जब आपराधिक छवि के नेताओं के मसले पर कांग्रेस ने भाजपा पर हमला किया तो अरुण जेटली का तर्क था कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहते हुए अपने फैसले खुद नहीं कर सकते थे, वे सोनिया गांधी के फैसले को ही मानने के लिए बाध्य थे, लेकिन नरेंद्र मोदी अपने फैसले खुद लेते हैं. उन्होंने सोच समझ कर निर्णय लिया है. इस पर कोई पूछ सकता है कि मोदी के ताकतवर प्रधानमंत्री बनने का जनता को या देश को क्या लाभ मिला? संसद में दागी सदस्यों की हालत तो जस की तस है, बल्कि केंद्रीय कैबिनेट में दागी छवि के नेताओं की संख्या बढ़ी ही. 
गौर करने की बात है कि जब यूपीए सरकार में दागी मंत्रियों का मामला सामने आया था तो बीजेपी ने संसद में उनका बहिष्कार किया था। जब दागी सांसद बोलने के लिए खड़े होते तो बीजेपी के सांसद बाहर चले जाते थे। सत्ता में रहकर कांग्रेस जो कर रही थी, तब बीजेपी उसकी आलोचना करती थी. अब वही काम बीजेपी कर रही है और कांग्रेस उसकी आलोचना कर रही है. संसद में दागी छवि के नेता पहली बार नहीं आए हैं, लेकिन यह ध्यान रखना होगा इस बार के लोकसभा चुनाव परिणाम ऐतिहासिक रहा और यह बदलाव जनता की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है. पिछले दस सालों में एक लुंजपुंज नेतृत्व वाली भ्रष्ट सरकार थी, जिससे जनता उकताई हुई थी. नरेंद्र मोदी और भाजपा के तमाम वादों पर उसने भरोसा करके जनादेश दिया. चुनाव में किए गए वादों पर आंशिक रूप से भी अमल न करना जनता की उन आकांक्षाओं के साथ विश्वासघात करना है. यदि सरकार के नीतिगत रवैये और कामकाज के लिहाज देखा जाए तो हालत जस के तस हैं. अपराधियों से मुक्त संसद का सपना फिलहाल एक सपना ही है. फिर भी अगर किसी को लगता है कि भ्रष्ट छवि वाली यूपीए की सरकार जाने के बाद कुछ बदला है तो हां, चेहरे जरूर बदल गए हैं.

बुधवार, 3 जून 2015

अच्छे दिनों की संपूर्ण अडानी कथा

उद्योगपति गौतम अडानी की कंपनी अडानी ग्लोेबल के खिलाफ 2000 करोड़ की अनियमितता का आरोप है लेकिन जांच एजेंसियों ने जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. खबरों के मुताबिक, भारी घोटाले की आशंका के बावजूद कस्टम और रेवेन्यू अधिकारियों ने अडानी की कंपनी के खिलाफ सबूत जुटाने के बावजूद जांच को आगे नहीं बढ़ा रहे हैं, क्योंकि शायद वे अडानी और मोदी की करीबी से भयभीत हैं. सच क्या है यह जांच से ही पता चल सकता है. हर घोटाले में जांच से पहले सारे तथ्य अनुमान होते हैं.
जुलाई 2014 में सीबीआई ने अडानी की कंपनी के खिलाफ 2300 करोड़ का फ्रॉड केस दर्ज किया था. इसके बावजूद, नवंबर, 2014 में ही अडानी को 6000 करोड़ का सरकारी कर्ज दिया गया. जिस कंपनी पर सीबीआई केस दर्ज करे, उसे ही सरकार कर्ज दे, यह घोटाला तो नहीं है न? अडानी को लगातार अभयदान क्यों मिल रहा है? फेहरिस्त लंबी है.
छत्तीसगढ़ में अडानी इंटरप्राइजेज राजस्थान और छत्तीसगढ़ सरकार के साथ ज्वाइंट वेंचर के तहत खनन कर रही है. कोयला घोटाला सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सारे कोल ब्लॉक को अवैध घोषित करते हुए 218 में से 214 रद्द कर दिए थे. ऐसे में राज्य सरकार द्वारा किए गए सारे ज्वाइंट वेंचर और कांट्रैक्ट अवैध माने जाएंगे. लेकिन अडानी की कंपनी ज्वाइंट वेंचर में खनन कर रही है. 2012 में सीएजी की रिपोर्ट थी कि नियमों में फेरबदल के चलते केवल छत्तीसगढ़ को 1549 करोड़ का नुकसान हुआ. यह खनन अबतक चल रहा है तो नुकसान कितना हुआ होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है.
राजा रानी की कहानी की ही तरह मोदी और अडानी की कहानी भी काफी पुरानी है. पूरा देश जानता है कि गौतम अडानी ने लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के प्रचार के लिए फंडिंग की थी. प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के लिए नरेंद्र मोदी अडाणी के हेलीकॉप्टर में सवार होकर गुजरात से दिल्ली आए थे. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही अडाणी साये की तरह उनके साथ फिर रहे हैं.
कुछ महीने पहले तक अडानी के कारोबार का टर्न ओवर 2002 के 76.50 करोड़ डॉलर से बढ़कर फिलहाल 10 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. संयोग से यह दौर नरेंद्र मोदी के सत्ता में लगातार मजबूत होते जाने का है. इस हफ्ते के आंकड़े कहते हैं कि पिछले एक साल में अडानी की संपत्ति में 48 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई है.
मोदी ने अडानी से चुनाव में कितनी मदद ली, देश की जनता को यह नहीं मालूम, न ही यह मालूम कि बदले में वे कितना मूल्य चुका रहे हैं. लेकिन इस सच से कौन इनकार करेगा कि यह जिस धन का लेनदेन चल रहा है, वह जनता है. इतनी तेजी से एक व्यक्ति के पास धन इकट्ठा होना पूंजीवाद का लोकतांत्रिक मायाजाल है जो घोटालों और लूट को कानूनों की आड़ में वैध ठहराता है.
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने अडानी ग्रुप को 6000 करोड़ रुपए का लोन देना मंजूर किया. ऑस्ट्रेलिया के वेस्टरर्न क्वींसलैंड स्थित क्लेेरमोंट के करीब कारमाइकल में अडाणी माइनिंग प्रोजेक्टर है, जिसके लिए यह पैसा दिया गया. अडाणी के पास पहले से करीब 65 हजार करोड़ रुपए की देनदारी थी. उधर, बैंकों की ओर से लगातार कहा जा रहा है कि कंपनियों को दिया गया कर्ज वसूलना मुश्किल हो रहा है. एसबीआई ने इस ऋण समझौते को लेकर किसी प्रकार का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है. अडाणी और एसबीआई के बीच यह समझौता बेहद गोपनीय तरीके से किया गया, जबकि कई बड़े वैश्विक बैंकों ने पर्यावरण कारणों के मद्देनजर इस उद्यम को लेकर सवाल उठाए थे, साथ ही क्रेडिट लिमिट बढ़ाने से भी इनकार कर दिया था. एसबीआई ने अडानी को ऐसे उद्यम के लिए ऋण देने का निर्णय लिया है, जिसका भविष्य क्या होगा, किसी को नहीं मालूम. देश की जनता का पैसा एक ऐसे उद्योगपति को राहत देने के लिए इस्तेमाल किया किया जा रहा है जिसने सत्ताधारी पार्टी को चुनावों में मदद की.
2002 में दंगों के बाद व्यापार जगत की संस्था कन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज़ (सीआईआई) से जुड़े उद्योगपतियों ने हालात पर काबू पाने में ढिलाई बरतने के लिए मोदी की आलोचना की थी. तब अडाणी ने उद्योगपतियों को मोदी के पक्ष में करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने सीआईआई के समांतर एक और संस्था खड़ी करने की चेतावनी भी दी थी.
इसके बाद जैसे जैसे मोदी मजबूत हुए अडानी भी मजबूत होते गए. बाद में नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार पर आरोप लगा था कि उन्होंने अडानी समूह को भारत के सबसे बड़े बंदरगाह मुंदड़ा के लिए बड़े पैमाने पर कौड़ियों के भाव ज़मीन दी. मई, 2014 में सरकारी अधिकारियों ने बिजली बनाने के काम में आने वाले उपकरणों के आयात की क़ीमत को कथित तौर पर क़रीब एक अरब डॉलर बढ़ाकर दिखाने के लिए अडानी की कंपनी को नोटिस जारी किया था. फरवरी, 2010 में अडानी ग्रुप के प्रंबंध निदेशक और गौतम अडानी के भाई राजेश अडानी को कथित तौर पर कस्टम ड्यूटी चोरी के मामले में गिरफ़्तार भी किया गया था. मोदी की गुजरात सरकार पर अडानी को फायदा पहुंचाने संबंधी कई आरोप लगे, लेकिन न किसी की जांच हुई न ही वे दोनों ही प्रभावित हुए.
जुलाई 2014 में सीबीआई ने अडानी की कंपनी के खिलाफ 2300 करोड़ का फ्रॉड केस दर्ज किया था. इसके बावजूद, नवंबर, 2014 में ही अडानी को 6000 करोड़ का सरकारी कर्ज दिया गया. जिस कंपनी पर सीबीआई केस के साथ इतने सारे आरोप लगे, वह केंद्र की मोदी सरकार की सबसे चहेती कंपनी है.
यदि अध्ययन हो तो मोदी—अडानी की कहानी पूंजीवाद के इतिहास में क्रोनी कैपिटलिज्म की सबसे धांसू कहानी साबित होगी. अडानी पर आरोप कैसे भी लगें, वे प्रभावित नहीं होते. उन पर बहुत आरोप लगे लेकिन वे लगातार मजबूत होते गए. अब जब एक साल में ही उनकी संपत्ति 48 प्रतिशत बढ़ी है, जब वे देश के प्रधानमंत्री के सबसे करीबी हैं, तब उनका कुछ बिगड़ेगा, इसमें संदेह ही है. अडानी को यह अभयदान क्यों मिल रहा है? क्या यह मोदी जी को चुनाव में प्लेन मुहैया कराने व अंधाधुंध पैसा देने का ईनाम है? हालांकि, मोदी जी कह रहे हैं कि एक साल में कोई घोटाला नहीं हुआ. तो यह अडानी कथा क्या कहलाएगी? क्या यह 'भ्रष्टाचार मुक्त भ्रष्टाचार' है?
(नोट: इन सारी सूचनाओं का कोई गुप्त स्रोत नहीं है. सब सूचनाएं फुटकर तौर पर मीडिया में प्रसारित होती रही हैं.)

सोमवार, 23 मार्च 2015

भारत कृषिप्रधान देश या किसानों की कब्रगाह?

सरकार ने 13 मार्च को संसद में जानकारी दी कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद डिवीजन में 2015 के शुरुआती 58 दिनों के भीतर 135 किसानों ने आत्महत्या कर ली। कृषि राज्यमंत्री मोहनभाई कुंडारिया ने बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 और 2013 में क्रमश: 13,754 और 11,772 किसानों ने आत्महत्या की। भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, फसल की लागत बढ़ने, सिंचाई की सुविधा न होने, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं।
1995 से लेकर अब तक 2,96,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इसी साल एक जनवरी से अब तक 200 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं।
उरई में फसल बर्बाद होने के सदमे में नरेंद्र कुशवाहा (35) ने कल सोमवार को आत्महत्या कर ली। रविवार को मध्य प्रदेश के खंडवा में एक किसान ने आत्महत्या कर ली। पिछले हफ्ते हमीरपुर के कुनैठा गांव के किसान इंद्रपाल ने बढ़ते कर्ज और फसल की बर्बादी से परेशान होकर खेत में फांसी लगा ली। हमीरपुर के ही सुमेरपुर परहेटा के 68 वर्षीय किसान राजाभैया तिवारी को खेत में दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई। उन्नाव के पूराचांद निवासी विरेंद्र सिंह की दिल का दौरा पड़ने से खेत में ही मौत हो गई। 
लगातार 12वें साल महाराष्ट्र किसान आत्महत्या के मामले में अव्वल है। यहां का सूखाग्रस्त विदर्भ क्षेत्र किसानों की कब्रगाह है। अकेले महाराष्ट्र में 1995 से अब तक 60,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। बीती फरवरी में प्रधानमंत्री मोदी ने बारामती में शरद पवार के किसी ड्रीम प्रोजेक्ट कृषि विज्ञान केंद्र का उद्घाटन किया और दोनों नेताओं ने एक दूसरे को किसानों का हितैषी बताया। यह गौर करने की बात है कि 1995 से अब तक बीस साल में शरद पवार दस साल कृषि मंत्री रहे और सबसे ज्यादा किसान महाराष्ट्र में मरे। 
जब शरद पवार के कथित ड्रीम प्रोजेक्ट का उद्घाटन हो रहा था, तब किसानों की इन मौतों का तो कोई जिक्र नहीं हुआ पर कृषि को वैश्विक बाजार में तब्दील करने की घोषणा जरूर हुई। जबकि एक जनवरी से 45 दिन के भीतर महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में 93 किसानों ने आत्महत्या की थी। नई सरकार आने के बाद से अब तक एक बार भी किसानों को कोई सांत्वना नहीं दी है कि वे कर्ज और गरीबी के चलते आत्महत्या न करें, सरकार उनकी समस्याओं को सुलझाने के कुछ उपाय करेगी।
चुनाव प्रचार के दौरान मोदी हर सभा में कहा करते थे कि देश के संसाधनों पर पहला हक गरीबों और किसानों का है। लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनते ही अडाणी को छह हजार करोड़ का सरकारी कर्ज दिलवाना उनकी शुरुआती बड़ी घोषणाओं में से एक थी। तब से वे दुनिया भर में घूम-घूम कर पूंजीपतियों को भरोसा दे रहे हैं कि उनकी सरकार पूंजीपतियों को पूरी सुरक्षा देगी। 
अमेरिका से परमाणु समझौते के तहत आनन फानन में भारत सरकार ने अमेरिकी कंपनियों को दुर्घटना संबंधी जवाबदेही से मुक्त कर दिया और देश के खजाने से 1500 करोड़ का मुआवजा पूल गठित कर दिया। यदि पूंजीपतियों के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा सकता है तो क्या कर्ज से मरते किसानों की जान बचाने के लिए कुछ सौ करोड़ रुपए की योजनाएं नहीं शुरू की जा सकतीं?
किसानों और गरीबों के लिए क्या मूक मनमोहन, क्या वाचाल मोदी! कोई अंतर नहीं आया। जैसे मनमोहन की चुप्पी किसानों को लील रही थी, ठीक वैसे ही मोदी के भाषणों का शोर किसानों को लील रहा है।
जब संसद में सरकार किसान के आत्महत्या की जानकारी दे रही थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्रा पर जा चुके थे। उन्होंने जाफना में श्रीलंकाई तमिलों को भारत की मदद से बने 27 हजार मकान सौंपे और इस परियोजना के दूसरे चरण में भारत के सहयोग से और 45 हजार मकान बनाए जाने की घोषणा की। 
मॉरीशस को इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए 50 करोड़ डॉलर का रियायती कर्ज देने की पेशकश की। इसी तरह अनुदान और कर्ज के रूप में सेशेल्स को भी 7.50 करोड़ डालर की राशि दी गई। काश प्रधानमंत्री अपने देश में मर रहे किसानों पर कुछ करते नहीं तो कोई घोषणा ही करते।
मोदी एक ऐसे देश के प्रधानमंत्री हैं जहां पांच करोड़ लोग बेघर हैं। इन बेघर लोगों के लिए मोदी सरकार ने कोई पहल की हो, ऐसा अभी सुनने में नहीं आया है। सरकार भूमि अधिग्रहण बिल के लिए जरूर पूरा जोर लगा चुकी है जिसके तहत किसानों की सहमति के बिना उनकी जमीनें लेकर कॉरपोरेट को सस्ते दाम में देने की योजना है।
यह वही देश है जो स्मार्ट सिटी बनाने और बुलेट ट्रेन चलाने की बात करता है, लेकिन इस पर कोई बात नहीं करता कि पहले से चल रही खटारा ट्रेनों में पानी नहीं होते। इस पर बात नहीं होती कि ज्यादातर जनसंख्या को पीने के लिए शुद्ध पानी तक नहीं है। यहां इस पर कोई बात नहीं होती कि हर साल करीब साढ़े तेरह लाख बच्चे पांच साल की उम्र पूरी करने से पहले मर जाते हैं। इसका कारण डायरिया और निमोनिया जैसी साधारण बीमारियां हैं। हम इन शर्मनाक आंकड़ों पर कभी शर्मिंदा नहीं होते।
हम आप जब तक मनुष्य रहेंगे, तब तक कार या बुलेट ट्रेन का डिब्बा नहीं खाएंगे, न यूरेनियम खाएंगे। न मेक इन इंडिया के तहत बने कल पुर्जे खाएंगे। हम आप रोटी ही खाएंगे जो किसान उगाते हैं। यह सामान्य बात नहीं है कि उदारीकरण लागू होने के बाद से देश के सरकारी रिकॉर्ड में करीब तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की। इन आंकड़ों के साथ भी राज्य सरकारें बाजीगरी करती हैं, यह बात पी साईनाथ साबित करते रहे हैं। किसान कर्ज से मरता है तो सरकारें उसे बीमारी से हुई मौत साबित करने का प्रयास करतीं हैं। 
आप याद कर सकते हैं कि विजय माल्या जैसे उद्योगपति खुद को दिवालिया घोषित करते हैं तो भारत सरकार अरबों देकर उन्हें उबार लेती है। पर संसद में बदजबानी करने वालों में से कोई एक नेता नहीं है जो पूरे दम से कह सके कि मेरे देश के किसानों, अब फांसी लगाना और फिनायल पीना बंद करो। तुम्हारी फसलें बर्बाद हो जाएंगी तब भी तुम्हारे बच्चों को मरने नहीं देंगे।
चुनाव से पहले भाजपा ने वादा किया था कि किसानों को उनकी लागत में 50 फ़ीसदी मुनाफ़ा जोड़कर फ़सलों का दाम दिलाया जाएगा। लेकिन सरकार बनाने के बाद मोदी एंड टीम का पूरा जोर कॉरपोरेट और मैन्यूफैक्चरिंग पर है। उनकी प्राथमिकता में कृषि और किसान कहीं नहीं हैं। सरकार मेक इन इंडिया के लिए तो मशक्कत कर रही है लेकिन कृषि के लिए उसके पास कोई योजना या सोच नहीं है। देश की करीब 60 प्रतशित जनसंख्या की आजीविका का आधार कृषि क्षेत्र है। लेकिन इस क्षेत्र को लेकर सरकार ने अब तक किसी बड़े नीतिगत बदलाव या घोषणा से परहेज ही किया है। जबकि कृषि पर गंभीर संकट मंडरा रहे हैं। चालू वित्त वर्ष (2014-15) में कृषि विकास दर सिर्फ़ 1.1 फ़ीसदी रहने का अनुमान है।
कृषि की दयनीय हालत के बावजूद अपने पहले बजट में मोदी सरकार ने कृषि आय की बात तो की, लेकिन कृषि बजट में कटौती कर दी। बजट में किसानों के लिए कुछ खास नहीं रहा। सरकार द्वारा जिस कृषि लोन की बात की जाती है, उसका फायदा किसानों से ज्यादा कृषि उद्योग से जुड़े लोगों को होता है। हालिया बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ऐलान किया कि कॉरपोरेट टैक्स को अगले चार सालों में 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी किया जाएगा।
मोदी सरकार की अब तक की नीतियों और केंद्रीय बजट का साफ संदेश है कि किसानों को वह सांत्वना मात्र देने को तैयार नहीं हैं। यह कृषिप्रधान देश फिलहाल किसानों की कब्रगाह बना रहेगा।

क्या मजदूरों और किसानों की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं?

एक तरफ करोड़ों की संख्या में नौकरियां चली गई हैं और बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है. दूसरी तरफ, सरकार की तरफ से किसानों और मजदूरों पर एक साथ ...